नेहा बोरा, प्रशांत भूषण पर कांग्रेस की सफाई

कांग्रेस पार्टी कॉकरोच जनता पार्टी, आइसा और सिविल सोसायटी के कुछ अति उत्साही लोगों के चक्कर में फंस गई है। अभिजीत दीपके के कॉकरोच जनता पार्टी के लोग पुलिस वालों से लेकर जजों के खिलाफ बयान दे रहे हैं या धमका रहे हैं। वे इस अहंकार में घूम रहे हैं कि हमने तो केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ले लिया तुम्हारी क्या औकात है। ऐसे ही सीपीआई एमएल के छात्र संगठन आइसा की नेता नेहा बोरा ने कह दिया कि उनको बांग्लादेश में युवाओं के आंदोलन से प्रेरणा मिली। बची खुशी कसर सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने पूरी कर दी। उन्होंने 16 अक्टूबर के तिरंगा मार्च की जानकारी देने के लिए बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में अति उत्साह में आकर कह दिया कि आंदोलन का मकसद ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता बदलने का है।

इससे भारतीय जनता पार्टी को मौका मिल गया। उसने नेहा बोरा और प्रशांत भूषण के बयान को एक साथ मिला दिया। उसने कहना शुरू कर दिया कि कांग्रेस और उसकी तरफ से प्रदर्शन कर रहे लोग बांग्लादेश के मॉडल का इस्तेमाल करके भारत में सत्ता बदलना चाहते हैं। भाजपा ने इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए राजनाथ सिंह के उतार दिया। उन्होंने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह बात कही। उसके बाद से इसका प्रचार हो रहा है।

इस प्रचार के कारण कांग्रेस बैकफुट पर आई। कांग्रेस नेताओं को मीडिया के सामने और सोशल मीडिया में सफाई देनी पड़ रही है। जयराम रमेश ने भी सफाई दी। लेकिन न तो नेहा बोरा को फर्क पड़ रहा है और प्रशांत भूषण को। तभी कांग्रेस के नेता इस मामले में गलती स्वीकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च के दौरान राहुल का नेहा बोरा के कंधे पर हाथ रखना और उसके अगले दिन घर पर चाय पार्टी में बुला कर मीडिया के सामने बयान दिलवाना ठीक फैसला नहीं था।

दिल्ली में प्रदर्शन जारी रहेगा

कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों ने भले यह फैसला किया है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया से बाहर निकल कर दिल्ली की सड़कों पर अभी प्रदर्शन नहीं करना है लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी या दूसरे संगठन ऐसा नहीं हो सोच रहे हैं। ऐसे संगठन या समूह, जिनका चुनावी राजनीति से कोई लेना देना नहीं है वे भी दिल्ली में प्रदर्शन करेंगे। अभी कॉकरोच जनता पार्टी के तिरंगा मार्च का विवाद चल ही रहा था कि राकेश टिकैत के भारतीय किसान यूनियन ने दिल्ली में प्रदर्शन का ऐलान कर दिया। हैरानी की बात है कि किसान यूनियन भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने के लिए प्रदर्शन करेगा।

राकेश टिकैत के संगठन ने 23 अक्टूबर को दिल्ली कूच का ऐलान किया है। उनका आधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है। अगर वे अपने साथ कुछ अन्य किसान संगठनों को जोड़ते हैं तो 23 अक्टूबर के आसपास फिर दिल्ली और एनसीआर में घमासान होगा। एक तरफ सरकार अडिग है कि वह किसी को भी दिल्ली में प्रदर्शन नहीं करने देगी। दूसरी ओर अनेक अराजनीतिक संगठन प्रदर्शन करने की जिद किए बैठे हैं। बताया जा रहा है कि कांग्रेस के नेता भी हैरान परेशान हैं। उनको समझ में नहीं आ रहा है कि इन संगठनों को कौन उकसा रहा है या कौन प्रेरित कर रहा है कि वे मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगने के लिए अलग अलग तरह के प्रदर्शन करें।

दीपके को महाराष्ट्र में राजनीति करनी है

दिल्ली में सीजेपी के लोगों के साथ साथ कांग्रेस, लेफ्ट और दूसरी पार्टियों के लोग भी यह सवाल पूछ रहे हैं कि जब राहुल गांधी के घर पर हुई चाय पार्टी में यह तय कर लिया गया कि अब त्योहारों की बीच में कोई विरोध प्रदर्शन नहीं होगा तो फिर सीजेपी ने क्यों कनॉट प्लेस में तिरंगा मार्च का ऐलान किया? य़ह सवाल इसलिए पूछा जा रहा है क्योंकि राजनीतिक दलों को यह फीडबैक मिली थी कि आम लोग इससे परेशान हो रहे हैं। कारोबारियों का धंधा ठप्प है। हजारों करोड़ रुपए के बिजनेस का नुकसान हो रहा है। ध्यान रहे दिल्ली में दिवाली सबसे बड़ा त्योहार है, जिसमें सबसे ज्यादा कारोबार होता है। इसी वजह से विपक्ष ने दिवाली के बाद ही प्रदर्शन आगे बढ़ाने का फैसला किया।

ऐसा लग रहा है कि अभिजीत दीपके को इसकी परवाह नहीं है। कांग्रेस के एक नेता ने अनौपचारिक बातचीत में कहा कि दीपके को दिल्ली या उत्तर भारत में कहीं राजनीति नहीं करनी है। इसलिए उनको इस बात की कोई चिंता नहीं है कि दिल्ली के कारोबारी क्या सोचते हैं और प्रदर्शन को लेकर नोएडा और दिल्ली में क्या सोचा जा रहा है। उन्होंने दिल्ली को लॉन्च पैड बनाया है महाराष्ट्र में और वहां भी संभाजीनगर में राजनीति करने के लिए। इसका किसी को अंदाजा नहीं है कि वे कब पार्टी बनाएंगे। लेकिन राजनीति संभाजीनगर में करेंगे। वहां उनको लोकसभा का चुनाव लड़ना है। उनके करीबी जानकारों का कहना है कि वे चाहते हैं कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां उनके लिए यह सीट छोड़ दें। इस सीट पर 2019 में ओवैसी की पार्टी के इम्तियाज जलील जीते थे। विपक्ष इसको अपने लिए बहुत मुफीद नहीं मानता है। इसलिए उनके लिए सीट छोड़ी जा सकती है। लेकिन अगर वे विपक्ष के साथ जाने की बजाय अपनी पार्टी भी बनाते हैं तब भी उनको और अजिंक्य शिंदे को महाराष्ट्र में ही राजनीति करनी है।

सीजेपी ने शिक्षा का मुद्दा छोड़ दिया

कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने क्या शिक्षा का मुद्दा छोड़ दिया? उसके नेता इस पर कुछ नहीं बोल रहे हैं। उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद स्कूल बदलने का अभियान शुरू किया था। हालांकि शुरू में वे सिर्फ भाजपा शासित राज्यों में गए। लेकिन जब दबाव बना तो कुछ विपक्षी शासन वाले राज्यों में भी गए। लेकिन वहां से सिर्फ अच्छी तस्वीरें दिखाईं। फिर भी स्कूल सुधारों और शिक्षा में बदलाव का उनका एक बड़ा एजेंडा था, जिस पर युवाओं और छात्रों का समर्थन उनको मिल रहा था। उनके आंदोलन और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद ही केंद्र सरकार ने नीट सहित अन्य परीक्षाओं में सुधार के लिए नंदन नीलेकणी कमेटी का गठन किया था।

पिछले चार दिन में इनसे जुड़े दो बड़े घटनाक्रम हुए हैं लेकिन सीजेपी का कोई बयन देखने को नहीं मिला। मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगने में बिजी सीजेपी के नेताओं ने न तो नंदन नीलेकणी कमेटी की सिफारिशों को लेकर कोई टिप्पणी की और न इस पर कोई बयान दिया कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने संसद की शिक्षा मामलों की समिति के सामने कहा कि उसके नौ साल के कार्यकाल में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ है। एनटीए ने इतना बडा झूठ बोला लेकिन नीट पेपर लीक पर आंदोलन करने वाली सीजेपी ने लगता है कि इसको देखा ही नहीं। इसी तरह नीलेकणी कमेटी की सिफारिशें तैयार हो गई हैं। उसमें कहा गया है कि परीक्षा कंप्यूटर बेस्ड होगी। यह भी कहा गया है कि हजारों सवालों का बैंक तैयार किया जाएगा और परीक्षा के समय उस प्रश्न बैंक से एआई के जरिए रैंडम सवाल सीधे कंप्यूटर पर आ जाएंगे। इस सिफारिश को अच्छा या बुरा बताने वाली कोई टिप्पणी सीजेपी की नहीं आई।

Gwalior Accident: शीतला मंदिर के पास बेकाबू ट्रक का कहर, 13 श्रद्धालुओं की मौत, 40 को कुचलने की खबर

Gwalior Accident: शीतला मंदिर के पास बेकाबू ट्रक का कहर, 13 श्रद्धालुओं की मौत, 40 को कुचलने की खबर

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मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर में शनिवार देर रात एक मंदिर के पास खड़े श्रद्धालुओं को एक ट्रक ने कुचल दिया, जिससे 13 लोगों की मौत हो गई और करीब 40 अन्य घायल हो गए। पुलिस ने यह जानकारी दी। एक अधिकारी ने बताया कि यह घटना देर रात करीब डेढ़ बजे शीतला माता मंदिर मार्ग पर हुई, जब ट्रक चालक ने वाहन पर से नियंत्रण खो दिया। उन्होंने बताया कि इसके बाद ट्रक ने वहां खड़े और बैठे श्रद्धालुओं को टक्कर मार दी और मंदिर की दीवार से टकराकर रुक गया। 

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धान से लदा एक ट्रक पुलिस बैरिकेड्स तोड़कर अचानक बेकाबू हो गया। ट्रक नीचे की ओर आया और मंदिर की बाहरी दीवार व गेट से जा टकराया। सड़क पर मौजूद श्रद्धालु इसकी चपेट में आ गए।  पुलिस के मुताबिक नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर जा रहे थे। छिनोर की ओर वाली सड़क पर खड़ी ढलान है, जहां भारी वाहनों का आना प्रतिबंधित है।

अराजकता फैलाना चाहता है विपक्ष

प्रशांत भूषण ने ‘रिजीम चेंज’ की बात कही। वे वकील हैं और राजनीति में भी खूब सक्रिय रहे हैं। वे पहले आम आदमी पार्टी में थे, जहां से अरविंद केजरीवाल ने उनको निकाल दिया। उन्होंने जब ‘रिजीम चेंज’ की बात कही तो उसका एक खास संदर्भ होता है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को रिजीम नहीं कहा जाता है। रिजीम का मतलब होता है तानाशाहों का शासन, जिसको जन विद्रोह के जरिए या विदेशी ताकतों के समर्थन से बदला जाता है।

विपक्ष के चेहरे पर लोकतंत्र, संविधान, संसदीय प्रणाली, गांधी मार्ग आदि का जो झीना सा परदा था वह परदा भी गिर गया है। उसकी असलियत खुल कर सामने आ गई है। देश और दुनिया को यह पता चल गया है कि भारत का विपक्ष बांग्लादेश के कट्टरपंथी जमात के लोगों के आंदोलन से प्रभावित है और उसी मॉडल पर देश में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता बदलने की मंशा से काम कर रहा है। निष्कर्ष अनजाने में दिए गए किसी प्रदर्शनकारी के बयान या किसी की जुबान से अनायास निकल गए किसी जुमले पर आधारित नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने के लिए प्रदर्शन कर रहे दो अलग अलग लोगों ने इस तरह के बयान दिए है। इसलिए यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता है। सीपीआई एमएल के छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा ने कहा कि वे बांग्लादेश के आंदोलन और वहां के आंदोलनकारियों से प्रभावित हैं तो सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने कॉकरोच जनता पार्टी और आइसा नेताओं की मौजूदगी में कहा कि इस प्रदर्शन का उद्देश्य ‘रिजीम चेंज’ करना यानी सत्ता बदलना है।

देश के सामान्य नागरिकों को यह समझना चाहिए कि ये दोनों बातें कितनी खतरनाक हैं। एक तो बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा और दूसरी उसी मॉडल से ‘रिजीम चेंज’ की बात, दोनों के गहरे निहितार्थ हैं। सबसे पहले यह समझने की जरुरत है कि बांग्लादेश में क्या हुआ था। बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन ‘जमात ए इस्लामी’ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन किया था। बाद में जब आरक्षण के नियमों में बदलाव किए गए तो कुछ युवा भी उस आंदोलन में जुड़े। लेकिन चाहे जमात के लोग हों या युवाओं की ‘नेशनल सिटीजंस पार्टी’ के लोग हैं, सबने आंदोलन के दौरान जितना सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया उससे ज्यादा हमला वहां के अल्पसंख्यकों यानी हिंदुओं पर किया। बांग्लादेश के ‘जेन जी’ का पूरा आंदोलन वहां के हिंदुओं के खिलाफ था। किस तरह के जघन्य कांड हुए, वह पूरी दुनिया ने देखा। हिंदुओं के घरों को चारों तरफ से घेर कर उनमें आग लगाई गई। हिंदुओं की हत्या करके उनके शव पेड़ से लटकाए गए। क्या भारत में ऐसे हालात बनाना चाहते हैं प्रदर्शनकारी?

उस आंदोलन के बाद भी बांग्लादेश में क्या बदला? हिंसक आंदोलन के जरिए एक चुनी हुई सरकार को हटा दिया गया और एक कठपुतली के रूप में मोहम्मद यूनुस को बैठाया गया। यूनुस के शासन में बांग्लादेश के हिंदुओं पर जितने अत्याचार हुआ उनकी मिसाल नहीं है। उसके बाद भी जब चुनाव हुए तो उसका नतीजा यह निकला कि युवा देखते रह गए और सैनिक तानाशाह रहे जिया उर रहमान व खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान देश के प्रधानमंत्री बन गए। क्या ऐसा ही आंदोलन नेहा बोरा भारत में करना चाहती हैं कि एक चुनी हुई सरकार को अराजकता के जरिए हटाने का प्रयास किया जाए, उसके बाद कोई कठपुतली बैठे और फिर पुराने राज परिवार के किसी व्यक्ति को सत्ता मिल जाए? भारत के विकास और मजबूती से ईर्ष्या कर रहे बहुत से देश भारत की जनता द्वारा लगातार तीसरी बार चुनी हुई सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अस्थिर करना चाह रहे हैं। क्या यह आंदोलन उन विदेशी ताकतों की मंशा पूरी करने के लिए चलाया जा रहा है?

इन बयानों को इस संदर्भ में देखने का कारण यह भी है कि प्रशांत भूषण ने ‘रिजीम चेंज’ की बात कही। वे वकील हैं और राजनीति में भी खूब सक्रिय रहे हैं। वे पहले आम आदमी पार्टी में थे, जहां से अरविंद केजरीवाल ने उनको निकाल दिया। उन्होंने जब ‘रिजीम चेंज’ की बात कही तो उसका एक खास संदर्भ होता है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को रिजीम नहीं कहा जाता है। रिजीम का मतलब होता है तानाशाहों का शासन, जिसको जन विद्रोह के जरिए या विदेशी ताकतों के समर्थन से बदला जाता है। रिजीम सीरिया में असद था, इराक में सद्दाम का था और लीबिया में गद्दाफी का था। भारत में रिजीम नहीं होता है। भारत में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार होती है, जिसे लोकतांत्रिक तरीके से ही बदला जाता है। इंदिरा गांधी की तानाशाही और इमरजेंसी का जवाब भी इस देश की जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से ही दिया था। उनको वोट के जरिए हराया गया था। नरेंद्र मोदी को देश की जनता ने लगातार तीसरी बार वोट देकर प्रधानमंत्री चुना है। इस जनादेश के बाद नरेंद्र मोदी सबसे ज्यादा समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना चुके हैं। देश की जनता न सिर्फ उनको बार बार देश की सत्ता सौंप रही है, बल्कि उनकी अपील पर बंगाल, असम जैसे पूर्वी व पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर पश्चिम में गुजरात और महाराष्ट्र तक भाजपा की सरकार बनवाती है। इतने लोकप्रिय नेता के शासन को ‘रिजीम’ कहना अपने आप में विपक्ष के लोगों की मंशा दिखाने वाला है।

असल में चाहे कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल हों या कॉकरोच जनता पार्टी जैसे सोशल मीडिया हैंडल्स हों या आइसा जैसे छात्र संगठन हों या प्रशांत भूषण जैसे कथित सिविल सोसायटी के लोग हों, इनका प्रदर्शन एक खास राजनीतिक मंशा से प्रेरित है। वह राजनीतिक मंशा है सरकार बदलने की। दूसरी बात यह है कि इनके प्रदर्शन से आम आदमी का कोई लेना देना नहीं है। जंतर मंतर पर सीजेपी का पहला प्रदर्शन पीड़ित पक्ष यानी पेपर लीक से प्रभावित हुए छात्रों, युवाओं और उनके परिजनों का था। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जो प्रदर्शन हो रहा है वह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में नाम कटने से प्रभावित मतदाताओं का नहीं है। ऐसे लोग तो सामने आ ही नहीं रहे हैं। क्योंकि ऐसे वास्तविक मतदाता बहुत कम हैं, जिनके नाम कटे हैं और अगर कट गए हैं तो वे उसे जुड़वाने की कोशिश कर रहे हैं। तभी किसी प्रदर्शन में ऐसे लोग नहीं दिख रहे हैं, जिनके नाम कटे हैं। प्रदर्शन के दौरान, जिससे भी पूछा जाता है, वह कहता है कि उसका नाम मतदाता सूची में है। जब प्रभावित पक्ष आंदोलन में नहीं शामिल है तो इसका क्या मतलब है?

जाहिर है इसका मकसद अराजकता फैलाना है। लोगों की भावनाओं को उभार कर सरकार के खिलाफ नाराजगी पैदा करना है। इसमें भी कोई बुराई नहीं है। विपक्ष का यही काम है कि वह सरकार के खिलाफ आम आदमी के मन में नाराजगी बढ़ाने की कोशिश करे। लेकिन इसके लिए पहले आम आदमी के मन में नाराजगी होनी भी तो चाहिए? जिस मामले में आम आदमी प्रभावित था वहां जुड़ा और सरकार ने भी उसे समझते हुए तत्काल केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा कराया। लेकिन मौजूदा प्रदर्शन तो आम आदमी का है ही नहीं। यह राजनीतिक दलों का विरोध है और इसका मकसद संवैधानिक या लोकतांत्रिक तरीके से कोई मुद्दा उठाना नहीं, बल्कि अराजकता फैलाना है। अगर अराजकता फैलाना मकसद नहीं होता है तो क्या कोई समझदार नेता या राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करता है? आपने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया और राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया यहां तक तो बात समझ में आती है। लेकिन विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया। कांग्रेस की एक प्रदेश कमेटी की ओर से चीफ जस्टिस के लिए असम्मानजनक संबोधन वाला पोस्ट किया गया, जिसे बाद में डिलीट किया गया। प्रदर्शन में शामिल नेताओं ने चीफ जस्टिस के खिलाफ अपमानजनक बातें कहीं। यह इससे पहले कभी नहीं हुआ था।

विपक्ष के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों को कोहनी मार रहे थे। प्रदर्शनकारी महिला पुलिसकर्मियों की वर्दी पर हाथ डाल रहे थे और उनके नाम सोशल मीडिया में उजागर करके उनको शर्मिंदा करने की कोशिश कर रहे थे। यह सब पहले कभी नहीं हुआ। पूरे आंदोलन के दौरान पुलिस को उकसाने का प्रयास किया गया ताकि पुलिस पलट कर कार्रवाई करे तो उसका मुद्दा बनाया जाए। यह सोची समझी रणनीति के तहत किया जा रहा था। पूरे प्रदर्शन का मकसद चुनाव आयोग की साख और देश के स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना है। इसके जरिए विपक्ष यह दिखाना चाहता है कि वह अपनी कमजोरी से नहीं हार रहा है, बल्कि उसको हराया जा रहा है। लेकिन इसकी हकीकत देश की जनता से बेहतर और कौन जानता है! आखिर जनता ही वोट देकर भाजपा को जीता रही है और कांग्रेस व अन्य विपक्षी पार्टियों को हरवा रही है। विपक्ष को जनता के जनादेश को अराजक आंदोलनों के जरिए चुनौती देने की बजाय राजनीतिक रूप से अपने को मजबूत करके आगे की लड़ाई की तैयारी करनी चाहिए।

(लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

जुलाई हिंसा की जांच का दायरा बढ़ेगा

नई दिल्ली। इस साल जुलाई में दिल्ली के जंतर मंतर और देश के अन्य हिस्सों में हुई हिंसा की जांच का दायरा बढ़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ हुए आंदोलन के दौरान अलग अलग हिस्सों में हुई हिंसा की जांच के लिए एक हाई पावर्ड इन्क्वायरी कमेटी यानी एचपीईसी का गठन किया था। रिटायर जज जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यों की कमेटी ने एक पोर्टल लॉन्च किया है। इस पर जुलाई में हुई हिंसा से प्रभावित लोग अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं।

समिति का गठन तीन महीने पहले अगस्त में हुआ था। तीन महीने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह पोर्टल तैयार किया है, जिसे शनिवार को लॉन्च किया गया। hpec.nic.in नाम से तैयार इस पोर्टल पर प्रभावित आम लोगों के साथ साथ पुलिसकर्मी भी अपने साथ हुई हिंसा की शिकायत दर्ज कर सकेंगे। गौरतलब है कि 20 जुलाई की घटना के बाद दिल्ली पुलिस के कई अधिकारियों और जवानों के परिजनों से प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उसके बाद अक्टूबर के घटनाक्रम में भी दिल्ली पुलिस के जवानों को पीड़ित दिखाते हुए वीडियो बनाया गया है।

इस मामले में पहले दिन से ऐसा लग रहा है कि सरकार किसी तरह से प्रदर्शनकारियों को कठघरे में खड़ा करना चाहती है। पुलिस की बर्बर कार्रवाई के ऊपर प्रदर्शनकारियों के कथित हमले को मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है। इस पोर्टल को इस तरह के तैयार किया गया है कि संवेदनशील मामलों में प्रभावित लोगों की पहचान गोपनीय रखी जा सके और उनकी इच्छा के अनुसार पहचान सार्वजनिक न हो।

हिंसा से प्रभावित लोगों और अन्य संबंधित पक्षों से अपील की गई है कि वे पोर्टल पर जाकर तय फॉर्मेट के अनुसार अपनी शिकायतें या प्रतिनिधित्व अपलोड करें। कहा गया है कि यह कमेटी जुलाई में हुई हिंसा खास कर पैलेट गन के इस्तेमाल की शिकायतों की विस्तार से जांच करेगी। यह भी कहा गया है कि कमेटी दोनों पक्षों की ओर से की गई हिंसा की जांच करेगी। महिला प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई की भी जांच की जाएगी। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों के ऊपर दर्ज सारे मुकदमे रद्द करा चुकी है। लेकिन इस जांच के बाद क्या होगा, यह नहीं कहा जा सकता है।

डीएमके ने सीईसी का इस्तीफा मांगा

नई दिल्ली। महिला आरक्षण और परिसीमन पर डीएमके से समर्थन की उम्मीद कर रही भाजपा को झटका लगा है। डीएमके संसदीय बोर्ड की शनिवार को हुई बैठक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का विरोध करने का फैसला हुआ है। साथ ही पार्टी ने एसआईआर में कथित गड़बड़ियों का मुद्दा उठा कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। गौरतलब है कि कांग्रेस सहित सभी विपक्षी पार्टियां भी यही मांग कर रही हैं।

हालांकि डीएमके ने एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ साथ कांग्रेस पर भी सवाल उठाए। संसदीय दल की बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता ए राजा ने कांग्रेस पर सवाल उठाते हुए कहा कि डीएमके शुरुआत से एसआईआर का विरोध कर रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को डीएमके की आलोचना करने का नैतिक अधिकार नहीं है। बहरहाल, संसदीय दल की बैठक में चार प्रस्ताव पास किए गए।

गौरतलब है कि चार मई को आए विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस और डीएमके अलग हो गए हैं। कांग्रेस ने टीवीके से अलायंस कर लिया है। बहरहाल, ए राजा ने कहा कि डीएमके ने एसआईआर लागू होने के समय से ही इसका विरोध किया है। उन्होंने कहा कि पार्टी ने संसद के अंदर और बाहर कई कदम उठाए हैं और पार्टी का यह रुख अभी भी कायम है। उन्होंने बताया कि डीएमके संसदीय दल का प्रस्ताव तमिलनाडु की जनता और देश भर के राजनीतिक पर्यवेक्षकों के सामने पार्टी के विरोध का क्रम रखने के लिए तैयार किया गया है।

एसआईआर की प्रक्रिया पर निशाना साधते हए राजा ने कहा कि इसके जरिए वैध वोटर्स को वोटिंग के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। डीएमके ने कहा कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर एसआईआर का विरोध कर रही है, लेकिन केरलम और तमिलनाडु में वह इसी तरह की आलोचना से बच रही है। प्रस्ताव में टीवीके प्रमुख और राज्य के मुख्यमंत्री विजय की चुप्पी पर भी सवाल उठाया गया।

बेल बॉन्ड भर कर छूटे दीपके

नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को शनिवार को जमानत मिल गई। उनको शुक्रवार की शाम को राजधानी दिल्ली के कनॉट प्लेस में बिना अनुमति तिरंगा मार्च निकालने के प्रयास में हिरासत में लिया गया था। शनिवार को उनको सब डिवीजनल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। मजिस्ट्रेट ने उनको जमानत दे दी। जमानत की शर्तों के मुताबिक उनको 50 हजार रुपए का बेल बॉन्ड भी भरना पड़ा। उसके बाद वे रिहा हुए।

पिछले आठ दिन में दीपके के खिलाफ यह दूसरी बार कार्रवाई है। इससे पहले 10 अक्टूबर को उन्हें दिल्ली एयरपोर्ट पर विमान से हिरासत में लिया गया था। अगले दिन वे बॉन्ड भर कर रिहा हो गए थे। उस समय उनके साथ हिरासत में लिए गए पार्टी के दो अन्य नेता आशुतोष रांका और सौरव दास को भी छोड़ दिया गया था। लेकिन 13 अक्टूबर को दोनों को फिर गिरफ्तार किया गया और उसके बाद से वे तिहाड़ जेल में बंद हैं। उनके ऊपर बेल बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन का आरोप है।

बहरहाल, शनिवार को अभिजीत दीपके को लेकर सुबह में कई घंटे तक ड्रामा चलता रहा। सीजेपी की कानूनी टीम की प्रमुख रत्ना सिंह ने दावा किया कि पुलिस दीपके की लोकेशन नहीं बता रही है। हालांकि बाद में वे दीपके के वकील पुष्प शर्मा के साथ मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन पहुंचीं। वहां एसईएम कोर्ट में दीपके को पेश किया गया। इससे पहले शुक्रवार को दीपके के साथ ही हिरासत में ली गईं छात्र नेता नेहा बोरा को पुलिस ने देर रात रिहा कर दिया था। बहरहाल, शनिवार को किसी भी संगठन की ओर से दिल्ली में प्रदर्शन का आयोजन नहीं किया गया था। फिर भी कई हिस्से में छोटी छोटी रैलियां हुईं और सेंट्रल दिल्ली में कई जगह पहले से की गई बैरिकेडिंग लगी रही।

रामलीला मैदान में कांग्रेस करेगी रैली

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में हुई कथित गड़बड़ियों के खिलाफ कई दिन तक प्रदर्शन के बाद अब कांग्रेस पार्टी ने बड़ी रैली का ऐलान किया है। एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में इसे लेकर एक महारैली का आय़ोजन किया जाएगा। कांग्रेस पार्टी ने इस रैली के लिए दिल्ली पुलिस की अनुमति हासिल कर ली है।

शनिवार को दिल्ली पुलिस ने कांग्रेस पार्टी को रामलीला मैदान में एक नवंबर को होने वाली रैली के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र यानी एनओसी जारी कर दिया। सेंट्रल दिल्ली के डीसीपी रोहित राजबीर सिंह ने बताया कि पार्टी ने मैदान की बुकिंग के लिए 25 अक्टूबर से तीन नवंबर तक की तारीखें मांगी थी। उसे एक नवंबर को रैली करने की इजाजत मिल गई है। इससे पहले कांग्रेस पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर छह अक्टूबर से लेकर 12 अक्टूबर तक लगातार प्रदर्शन किया।

गौरतलब है कि पिछले दिनों गृह मंत्रालय ने जंतर मंतर पर प्रदर्शनों पर रोक लगाते हुए रामलीला मैदान सहित तीन जगहों को प्रदर्शन स्थल घोषित किया। इन तीन जगहों में रामलीला मैदान एक है, जहां 50 हजार लोगों तक की रैली हो सकती है। अभी यह तय नहीं है कि रैली सिर्फ कांग्रेस पार्टी की होगी या उसमें विपक्षी पार्टियों के नेताओं को भी बुलाया जाएगा। गौरतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और एसआईआर के खिलाफ कांग्रेस के आंदोलन में ‘इंडिया’ ब्लॉक की सभी पार्टियां शामिल रही हैं।