उत्तरकाशी को ₹218 करोड़ से अधिक की सौगात, CM धामी ने बर्नीगाड़ की विकास परियोजनाओं पर दिया बड़ा अपडेट

उत्तरकाशी को ₹218 करोड़ से अधिक की सौगात, CM धामी ने बर्नीगाड़ की विकास परियोजनाओं पर दिया बड़ा अपडेट

pushkar singh dhami

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि राज्य सरकार प्रदेश के प्रत्येक क्षेत्र का नियोजित और संतुलित विकास सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी दिशा में उत्तरकाशी के बर्नीगाड़ क्षेत्र में 218 करोड़ रुपये से अधिक की विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया गया है।

 

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर यह जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं से सीमांत जिले उत्तरकाशी में विकास कार्यों को नई गति मिलेगी। साथ ही, स्थानीय स्तर पर जनसुविधाएं मजबूत होंगी और विकास के नए अवसर पैदा होंगे।

 

सीमांत क्षेत्र में विकास को मिलेगी नई गति

 

मुख्यमंत्री के मुताबिक, इन विकास परियोजनाओं का उद्देश्य राज्य के सभी क्षेत्रों में विकास को आगे बढ़ाना है। उत्तरकाशी जैसे सीमांत जिले में बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने से स्थानीय लोगों को लाभ मिलने और क्षेत्रीय विकास को गति मिलने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि सरकार प्रदेश के हर क्षेत्र में संतुलित विकास के लिए काम कर रही है, ताकि विकास का लाभ स्थानीय स्तर तक पहुंच सके।

 

जनसुविधाओं को मजबूत करने पर जोर

 

बर्नीगाड़ में शुरू की गई इन परियोजनाओं से स्थानीय स्तर पर सुविधाओं के विस्तार और विकास की नई संभावनाएं पैदा होने की उम्मीद जताई गई है। हालांकि, मुख्यमंत्री की पोस्ट में परियोजनाओं के नाम, उनकी अलग-अलग लागत और निर्धारित समयसीमा का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।

इटली में महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन हिंसक, मिलान में दुकानों में लूटपाट और आगजनी, 50 लोग हिरासत में

इटली में महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन हिंसक, मिलान में दुकानों में लूटपाट और आगजनी, 50 लोग हिरासत में

itlay protest

इटली में बढ़ती महंगाई और युद्ध के खिलाफ निकाला गया प्रदर्शन शनिवार को हिंसक हो गया। मिलान के मध्य हिस्से में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प के बाद दुकानों में लूटपाट और संपत्तियों में आगजनी की घटनाएं सामने आईं। हालात बिगड़ने के बाद पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल कर भीड़ को तितर-बितर किया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, कम से कम दो पुलिस अधिकारी घायल हुए और करीब 50 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।

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शांतिपूर्ण मार्च के बाद भड़की हिंसा

 

मिलान में युद्ध और बढ़ती महंगाई के खिलाफ मार्च की शुरुआत शांतिपूर्ण तरीके से हुई थी। हालांकि, बाद में नकाब पहने कुछ प्रदर्शनकारियों ने दंगा नियंत्रण पुलिस पर पत्थर और अन्य वस्तुएं फेंकनी शुरू कर दीं। इसके बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई और कई जगह हिंसा फैल गई।

 

प्रदर्शन के दौरान दुकानों में लूटपाट की गई और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया। हिंसा के चलते मिलान का प्रसिद्ध पियाजा डेल डुओमो चौक और महंगी वस्तुओं की दुकानों वाला बाजार खाली हो गया। आमतौर पर इन जगहों पर बड़ी संख्या में खरीदार और पर्यटक मौजूद रहते हैं।

 

पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछारों का किया इस्तेमाल

 

प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछार करने वाली गाड़ियों का इस्तेमाल किया। घटना के बाद सामने आई तस्वीरों में काराबिनिएरी पुलिस की एक गाड़ी बुरी तरह क्षतिग्रस्त दिखाई दी। समाचार एजेंसी लाप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, झड़पों में कम से कम दो पुलिस अधिकारी घायल हुए। पुलिस ने कई नाबालिगों समेत करीब 50 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया।

 

प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने की हिंसा की निंदा

 

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर हिंसा की निंदा की। उन्होंने कहा, “प्रदर्शन करना एक अधिकार है। अपने शहरों में आग लगाना नहीं।” मेलोनी ने उन उपद्रवियों की आलोचना की, जो प्रदर्शनों का फायदा उठाकर अराजकता फैलाते हैं, सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले अधिकारियों पर हमला करते हैं और शहरों को बंधक जैसी स्थिति में पहुंचा देते हैं।

 

मिलान के मेयर ने भी जताई नाराजगी

 

मिलान के मेयर ग्यूसेप्पे सेला ने सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ हिंसा और शहर की संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की आलोचना की। उन्होंने कहा कि कानून लागू कराने वाले सुरक्षाकर्मियों पर हमले करना और शहर को भारी नुकसान पहुंचाना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। इस घटना ने इटली में महंगाई, युद्ध और अन्य सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को लेकर बढ़ते असंतोष के बीच सार्वजनिक सुरक्षा और विरोध प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती को फिर सामने ला दिया है।

Gujarat Investment : गुजरात में विदेशी निवेश लाने की बड़ी तैयारी, 22 देशों में जाएंगे प्रतिनिधिमंडल, 8 शहरों में रोड शो

Gujarat Investment : गुजरात में विदेशी निवेश लाने की बड़ी तैयारी, 22 देशों में जाएंगे प्रतिनिधिमंडल, 8 शहरों में रोड शो

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गुजरात को वैश्विक निवेश के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए राज्य सरकार ने वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2027 (Vibrant Gujarat Global Summit 2027) की तैयारियां तेज कर दी हैं। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में होने वाले इस समिट से पहले देशी और विदेशी निवेशकों तक पहुंचने के लिए विशेष रणनीति तैयार की गई है। इसके तहत दुनिया के 22 देशों में प्रतिनिधिमंडल भेजने और भारत के 8 बड़े शहरों में रोड शो आयोजित करने की योजना है।

 

22 देशों में विदेशी निवेशकों के साथ होंगी बैठकें

 

गुजरात में विदेशी निवेश बढ़ाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ऑस्ट्रेलिया, जापान, जर्मनी और फ्रांस सहित 22 देशों में प्रतिनिधिमंडल भेजेगी। अक्टूबर और नवंबर के दौरान विदेशी निवेशकों तथा उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के साथ बैठकें आयोजित करने की योजना है। इन मुलाकातों के दौरान गुजरात में उपलब्ध औद्योगिक बुनियादी सुविधाओं, निवेश के अवसरों और विभिन्न क्षेत्रों की संभावनाओं की जानकारी दी जाएगी।

 

देश के 8 शहरों में आयोजित होंगे रोड शो

 

विदेशी निवेशकों के साथ-साथ भारतीय उद्योगपतियों को भी गुजरात में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सरकार देश के 8 शहरों में रोड शो आयोजित करेगी। गुवाहाटी से भुवनेश्वर सहित विभिन्न शहरों में होने वाले इन कार्यक्रमों के माध्यम से गुजरात में नए उद्योग स्थापित करने, विनिर्माण इकाइयां शुरू करने और मौजूदा कारोबार का विस्तार करने के अवसरों की जानकारी दी जाएगी।

 

सेमीकंडक्टर, AI और ग्रीन एनर्जी पर विशेष फोकस

 

वाइब्रेंट गुजरात समिट 2027 में भविष्य के उद्योगों और आधुनिक तकनीक के क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने पर विशेष जोर दिया जाएगा। इसमें सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), फिनटेक, ग्रीन एनर्जी और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से राज्य में औद्योगिक विकास, रोजगार के अवसरों और तकनीक आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

 

10 से 12 जनवरी 2027 तक महात्मा मंदिर में होगा समिट

 

वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2027 का आयोजन 10 से 12 जनवरी 2027 तक गांधीनगर के महात्मा मंदिर में करने की योजना है। इस समिट में देश-विदेश के निवेशकों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों को गुजरात में निवेश करने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।

 

राज्य सरकार का मुख्य उद्देश्य गुजरात को विनिर्माण, तकनीक और नवाचार आधारित उद्योगों के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करना है। इस समिट के माध्यम से नए निवेश प्रस्ताव आकर्षित करने और गुजरात की आर्थिक प्रगति को गति देने का प्रयास किया जाएगा।

यूरोप में सड़कों पर संग्राम, फ्रांस में बवाल, आगजनी-लूटपाट के बाद 1,200 से ज्यादा गिरफ्तार, 60 पुलिसकर्मी घायल

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फ्रांस में बढ़ती महंगाई, सार्वजनिक सेवाओं की बिगड़ती स्थिति और सरकारी नीतियों के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़क उठी। शनिवार को पेरिस समेत कई शहरों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच जमकर झड़पें हुईं। हालात बिगड़ने के बाद पुलिस ने 1,200 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया।

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हिंसा के दौरान कई दुकानों और सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचा। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने आगजनी, लूटपाट और सार्वजनिक संपत्तियों पर हमले करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का ऐलान किया है।

 

महंगाई और सरकारी सेवाओं को लेकर सड़कों पर उतरे लोग

 

फ्रांस में प्रदर्शन बढ़ती जीवन-यापन लागत और सार्वजनिक सेवाओं की खराब होती स्थिति के विरोध में आयोजित किए गए थे। इन प्रदर्शनों को उन छात्रों का भी समर्थन मिला, जो स्कूलों की परिस्थितियों और पुलिस की कथित अत्यधिक सख्ती के खिलाफ आवाज उठा रहे थे।

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हालांकि, शांतिपूर्ण विरोध के बीच कई जगह हालात हिंसक हो गए। पेरिस और दूसरे शहरों में पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया।

 

दुकानों में लूटपाट, गाड़ियों में लगाई आग

 

हिंसा के दौरान नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने कई स्थानों पर तोड़फोड़ की। कारों को आग के हवाले कर दिया गया और दुकानों में लूटपाट की घटनाएं सामने आईं। कई सार्वजनिक इमारतों में भी आग लगाई गई।

 

लिमोज शहर के टाउन हॉल में लगी आग से इमारत को भारी नुकसान पहुंचा। रिपोर्ट के मुताबिक, आग के कारण इमारत की छत का एक हिस्सा ढह गया। कई अन्य सार्वजनिक इमारतें और व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी हिंसा की चपेट में आए।

 

राष्ट्रपति मैक्रों ने दी सख्त कार्रवाई की चेतावनी

 

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट किया है कि आगजनी, लूटपाट और सार्वजनिक इमारतों पर हमले करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। सरकार ने हिंसक घटनाओं में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का संकेत दिया है।

 

60 सुरक्षाकर्मी घायल

 

फ्रांस के गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज के मुताबिक, हिंसा के दौरान 60 सुरक्षाकर्मी घायल हुए। इनमें से दो को बेहोशी की हालत में अस्पताल ले जाना पड़ा। लगातार बढ़ती हिंसा ने फ्रांस में कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। सरकार के सामने एक ओर महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर लोगों की नाराजगी दूर करने की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर हिंसक घटनाओं पर नियंत्रण और सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी हो गया है।

ग्वालियर में दर्दनाक हादसा: शीतला माता मंदिर जा रहे श्रद्धालुओं को ट्रक ने रौंदा, 14 की मौत

ग्वालियर में दर्दनाक हादसा: शीतला माता मंदिर जा रहे श्रद्धालुओं को ट्रक ने रौंदा, 14 की मौत

ग्वालियर में शीतला माता मंदिर के पास शनिवार देर रात एक अनियंत्रित ट्रक की चपेट में आने से कम से कम 14 लोगों की मौत हो गई और 40 लोग घायल हो गए। हादसा लगभग 1.30 बजे चीनोर की तरफ से आने वाली सड़क पर हुआ। एसएसपी धर्मवीर सिंह ने बताया कि नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर जा रहे थे।

 

चीनोर की ओर वाली सड़क पर खड़ी ढलान है, जहां भारी वाहनों का आना प्रतिबंधित है। उन्होंने कहा कि धान से लदा एक ट्रक पुलिस बैरिकेड्स तोड़कर अचानक बेकाबू हो गया। ट्रक नीचे की ओर आया और मंदिर की बाहरी दीवार व गेट से जा टकराया। सड़क पर मौजूद श्रद्धालु इसकी चपेट में आ गए।

मौके पर तैनात दो पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं। कलेक्टर रुचिका चौहान ने बताया कि सूचना मिलते ही एम्बुलेंस और अन्य वाहन मौके पर भेजे गए। उनके अनुसार, इस घटना में 12 लोगों की मौत हो गई है और 5 से 6 मरीज गंभीर हालत में हैं। करीब 29 लोगों को अलग-अलग तरह की चोटें आई हैं।

Kolkata stampede : कोलकाता दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़ से 19 की मौत, 12 हिरासत में, जानिए कैसे हुआ हादसा और अब तक क्या अपडेट

Kolkata stampede : कोलकाता दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़ से 19 की मौत, 12 हिरासत में, जानिए कैसे हुआ हादसा और अब तक क्या अपडेट

Kolkata Durga Pandal Stampede

कोलकाता के चोरबागान स्थित दुर्गा पूजा पंडाल में सप्तमी की शाम भगदड़ मचने से कम से कम 19 लोगों की मौत की खबर है, जबकि 25 लोग घायल बताए जा रहे हैं। पुलिस ने आयोजकों समेत 12 लोगों को हिरासत में लिया है।  शुरुआती जानकारी के मुताबिक, हादसे से पहले उत्तर और मध्य कोलकाता में तेज बारिश हुई थी। बारिश से बचने के लिए पंडाल के बाहर मौजूद लोगों के अंदर की ओर बढ़ने और भीड़ में धक्का-मुक्की होने की बात सामने आई है।

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हालांकि, हादसे की वास्तविक वजह की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। पुलिस के मुताबिक, घटना शाम करीब 7:40 बजे पंडाल के निकास द्वार के पास हुई। यह पंडाल गिरिश पार्क पुलिस थाने के अधिकार क्षेत्र में आता है। हादसे के बाद पुलिस ने पंडाल में श्रद्धालुओं और दर्शकों के प्रवेश पर रोक लगा दी। घायलों को बचाकर कोलकाता मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल पहुंचाया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, कुछ घायलों को अस्पताल लाए जाने के समय होश नहीं था। पश्चिम बंगाल सरकार ने घटना की जांच के आदेश दिए हैं। खबरों के मुताबिक, जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित करने और कलकत्ता हाईकोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश की निगरानी में जांच कराने की घोषणा की गई है। सरकार ने मृतकों के परिवारों को 25 लाख रुपए का मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है।

 

हादसे की परिस्थितियों को समझने के लिए तीन प्रमुख बातें सामने आई हैं।

– भारी बारिश और अचानक बढ़ी भीड़: बारिश शुरू होते ही बाहर मौजूद कई लोग पंडाल में प्रवेश करने लगे। इससे अंदर मौजूद श्रद्धालुओं पर दबाव बढ़ गया।

– निकास मार्ग पर परेशानी: प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पंडाल से बाहर निकलने के रास्ते पर सीढ़ियां थीं। भीड़ के दबाव में कुछ लोग गिर गए और उनके पीछे आ रहे लोग भी उनकी चपेट में आ गए।

– भीड़ प्रबंधन पर सवाल: स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों ने पुलिसकर्मियों तथा स्वयंसेवकों की तैनाती और प्रवेश-निकास व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। इन आरोपों की जांच की जा रही है। 

  

 कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि आयोजकों की ओर से की गई एक घोषणा के बाद लोगों में अचानक अफरा-तफरी बढ़ी। हालांकि, हादसे के सभी कारणों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।  मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इससे पहले कहा था कि घटना की जांच कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक मौजूदा न्यायाधीश की अध्यक्षता वाला विशेष जांच दल (एसआईटी) करेगा। उन्होंने कहा कि एसआईटी में विशेष कार्य बल (एसटीएफ), अपराध जांच विभाग (सीआईडी) और अन्य विभागों के सदस्य शामिल होंगे।

 

कोलकाता पुलिस के ‘एंटी-राउडी सेक्शन’ (एआरएस) ने घटना के समय के सीसीटीवी फुटेज एकत्र किए हैं। अधिकारी ने कहा कि हम फुटेज की जांच करेंगे और भीड़ को नियंत्रित करने में नाकाम रहने वालों के खिलाफ उचित कार्रवाई करेंगे। वह कोई भी हो सकता है.. पूजा समिति का कोई सदस्य, होमगार्ड, अस्थायी कर्मचारी, पुलिसकर्मी या किसी निजी कंपनी का कोई सुरक्षा गार्ड हो सकता है। किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा।

‘टिपिंग प्वाइंट’ से बच पाएगा भारत?

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने हाल में सार्वजनिक रूप से कहा कि उनका अदालती प्रक्रिया से विश्वास उठ गया है। ..सिब्बल ने उल्लेख किया कि अदालत को मतदाताओं के नाम कथित रूप से गलत तरीके से हटाने और जोड़ने के बारे में बार-बार सूचित किया गया, फिर भी उसने कोई राहत नहीं दी, जबकि बाद के ट्रिब्यूनल डेटा से पता चला कि बहुत से नामों को हटाना गलत था।

कई ओर से खिंचाव और दबाव की शिकार हो रही भारत की संवैधानिक व्यवस्था का अंतिम खंभा भी इस परिघटना के दायरे में आ गया है। 12 अक्टूबर इस मायने में एक असाधारण दिन था, जब विपक्षी दलों के आह्वान पर हजारों लोगों के हुजूम ने सर्वोच्च न्यायालय पर जाकर मोर्चा लगाया। इसके साथ ही इस आम मान्यता पर विराम लग गया कि राजनीतिक दलों के लिए,

  • विरोध दर्ज कराने या अपना पक्ष रखने का उचित मंच संसद और विधानसभाएं हैं
  • अपना विरोध जताने के लिए जन अभियान, जन सभाएं, प्रेस कॉन्फ्रेंस, अधिकारियों के घेराव आदि जैसे वैध माध्यम उन्हें उपलब्ध हैं।
  • राजनीतिक दल या संगठन अगर अदालत तक जुलूस निकालते हैं, तो इससे संदेश जाता है कि वे न्यायिक प्रक्रिया को सड़क के दबाव से प्रभावित करना चाहते हैं। न्यायपालिका को ऐसे विवादों से ऊपर समझा जाता रहा है।
  • इसीलिए अदालत तक जुलूस निकालना अब तक नाजुक और विवादास्पद मामला माना जाता था।
  • खुद सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि न्यायालय पर दबाव डालने वाले विरोध प्रदर्शन स्वीकार्य नहीं हैं।

लेकिन 12 अक्टूबर को ऐसा ही विरोध प्रदर्शन आयोजित हुआ। लोगों के हुजूम के साथ सुप्रीम कोर्ट पहुंच कर विपक्ष के 11 नेताओं ने निर्वाचन आयोग के खिलाफ अपनी याचिका दायर कराई। याचिका दायर कराना एक वैधानिक प्रक्रिया है। लेकिन जिस रूप में उस रोज यह कराया गया, निर्विवाद रूप से उसे एक राजनीतिक वक्तव्य और सियासी कदम अधिक समझा जाएगा। कहा जा सकता है कि यह तरीका अपना कर विपक्ष ने खुद न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।

विचारणीय यह है कि आखिर ये नौबत क्यों आई? संवैधानिक मर्यादा के तहत राजनीतिक एवं तमाम विवादों से ऊपर मानी जाने वाली न्यायपालिका को लेकर ऐसी धारणा क्यों बनी कि उससे “इंसाफ पाने के लिए” यह जरूरी है कि राजनीतिक तरीके से उस पर दबाव डाला जाए? इस सवाल पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। इसलिए कि इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि न्यायपालिका को अब राजनीतिक विवादों से ऊपर नहीं समझा जा रहा है। यानी यह मान्यता कमजोर पड़ी कि अदालतें अपने फैसले विशुद्ध कानूनी आधार पर और संवैधानिक दायरों के अंदर रहते हुए देती हैं। अगर यह धारणा टूटती है, तो उसका मतलब यह भी होगा कि न्यायपालिका के निर्णयों का आदर के साथ स्वेच्छा से अनुपालन करने का चलन कमजोर हो जाएगा।

यह स्थिति क्यों आई? इस बात को समझने के लिए हाल के वर्षों में बनी पृष्ठभूमि पर गौर करना चाहिए। कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं की टिप्पणियों से इस पृष्ठभूमि को बेहतर समझा जा सकता हैः

  • वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने हाल में सार्वजनिक रूप से कहा कि उनका अदालती प्रक्रिया से विश्वास उठ गया है। उन्होंने कहा कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोर्ट के पास जाने का उन्हें कोई खास औचित्य नजर नहीं आता।
  • सिब्बल ने कहा- मैं सुप्रीम कोर्ट बार-बार जाकर थक चुका हूं। मुझे नहीं लगता कि वहां जाने का कोई फायदा है। मुझे भारत के सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा उम्मीद नहीं बची है।
  • सिब्बल ने उल्लेख किया कि अदालत को मतदाताओं के नाम कथित रूप से गलत तरीके से हटाने और जोड़ने के बारे में बार-बार सूचित किया गया, फिर भी उसने कोई राहत नहीं दी, जबकि बाद के ट्रिब्यूनल डेटा से पता चला कि बहुत से नामों को हटाना गलत था। उन्होंने कहा कि हालांकि अभी भी संविधान को बचाने वाली एकमात्र संस्था सुप्रीम कोर्ट ही है, लेकिन कुछ मामलों में व्यक्तिगत रूप से उन्हें अब उससे बहुत उम्मीद नजर नहीं आती।

कपिल सिब्बल के अलावा कई अन्य वकीलों ने भी हाल में न्यायपालिका की सार्वजनिक रूप से कड़ी आलोचना की हैं। इनमें उनका आशय रहा है कि सुप्रीम कोर्ट लोगों के मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करने में विफल या अप्रभावी साबित हो रहा है। मसलन,

  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर अक्टूबर के पहले हफ्ते में शुरू हुए कॉकरोच आंदोलन के क्रम दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों और प्रदर्शनकारियों/ वकीलों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने चेतावनी दी कि अगर सुप्रीम कोर्ट शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और वकीलों के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए हस्तक्षेप नहीं करता, तो “यह ना केवल अपनी प्रासंगिकता खो देगा, बल्कि देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपहास का पात्र भी बन जाएगा।”
  • इसके पहले भूषण ने न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा में सुप्रीम कोर्ट के नाकाम रहने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि लगभग आधे जज सरकार की कठपुतलियों की तरह काम कर रहे हैं। उन जजों के महत्त्वपूर्ण मामलों में सरकार के खिलाफ फैसला सुनाने की संभावना बहुत कम होती है।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष दुष्यंत दवे अदालत पर मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहने, इंसाफ देने से बचने, और नागरिकों को निराश करने का आरोप लगा चुके हैं। उन्होंने ऐसे सवालों से सुप्रीम कोर्ट को कठघरे में खड़ा किया है कि क्या वह नागरिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में अपने संवैधानिक कर्त्तव्य को निभा रहा है?
  • मिहिर देसाई और गोपाल नारायण जैसे वरिष्ठ वकील भी इससे मिलती-जुलती बातें कह चुके हैं।
  • ये विचार आम तौर पर चुनावी मुद्दों, विरोध प्रदर्शनों, नागरिक स्वतंत्रता के मामलों, कड़े कानूनों के तहत जमानत ना मिलने, और वर्तमान सरकार के प्रति अत्यधिक नरमी के संदर्भ में जताए गए हैं।

भारत की संवैधानिक व्यवस्था के भविष्य के लिए ये बातें बेहद अहम हैं। इसलिए कि भारत में सरकार (कार्यपालिका) और विधायिका को लेकर आम जन में पहले ही भरोसा काफी घट चुका है। इसकी वजह आम जन से किए गए वादों को पूरा ना किया जाना है। सरकारें लोगों को बेहतर जीवन स्तर देने में विफल रही हैं और विधायिकाएं उनकी प्रभावशाली ढंग से जवाबदेही तय करने की अपनी भूमिका नहीं निभा पा रही हैं। इस कारण लोगों का सब्र टूट रहा है।

इसके बीच न्यायपालिका एकमात्र संस्था है, जिससे लोगों को इंसाफ पाने तथा सरकार के अतिरेक कदमों को रोकने की आशा बची थी। लेकिन गुजरे वर्षों में जनमत का एक बड़ा हिस्सा यह देखकर निराश होता चला गया है कि खास कर जिन मामलों में नरेंद्र मोदी सरकार के राजनीतिक हित जुड़े थे, उनमें न्यायपालिका संवैधानिक अपेक्षाओं के अनुरूप अवरोध एवं संतुलन की अपनी भूमिका निभाने में नाकाम रही। इस भावना की अभिव्यक्ति ही हालिया प्रतिक्रियाओं और विपक्ष की राजनीतिक गतिविधियों के जरिए हुई है।

यह संवैधानिक व्यवस्था के लिए बढ़ती चुनौतियों के एक नए मुकाम पर पहुंच जाने का संकेत है। राजनीतिक अर्थशास्त्री राहुल मुखर्जी ने भारत में आर्थिक सुधारों को समझाने के लिए एक मॉडल विकसित किया था, जिसे ‘टिपिंग-प्वाइंट मॉडल’ (Tipping-Point Model) कहा जाता है। यह मॉडल भारत की संवैधानिक व्यवस्था के प्रति हो रही प्रतिक्रियाओं को समझने के लिहाज से भी सहायक हो सकता है। इसके मुताबिक किसी व्यवस्था के भीतर चुनौतियां इकट्ठी हो रही हों, तब भी वह व्यवस्था वर्षों तक दबाव को सहन कर सकती है। लेकिन जब ये चुनौतियां एक निश्चित सीमा को पार जाती हैं, तो एक छोटा-सा झटका भी बहुत बड़े बदलाव की राह खोल सकता है।

राजनीतिक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में मुखर्जी ने इस बात तो दो उदाहरणों से समझाने का प्रयास किया था। इसके मुताबिक किसी पुल पर वाहनों का बोझ बढ़ता चला जाए, तब भी पुल टिका रहता है। लेकिन एक हद के बात कोई आखिरी मोटर साइकिल आती है, तो पुल अपने ऊपर जमा हुए बोझ को सह पाने में नाकाम हो जाता है। वही क्षण टिपिंग प्वाइंट कहा जाता है। लेकिन टिपिंग प्वाइंट पुल ढहने का असल कारण नहीं होता। इसी तरह कोई भूकंप लंबे समय से धरती के नीचे टेक्टोनिक परतों की स्थिति में जारी अस्थिरता का परिणाम होता है। मगर किसी एक रोज कोई आखिरी परत खिसकती है, जिससे भूकंप आ जाता है।

भारतीय राजनीति भी शायद ऐसे ही किसी मोड़ की ओर बढ़ रही है। शिक्षा से जुड़े विरोध प्रदर्शनों ने दिखाया कि लगातार जारी लामबंदी (प्रदर्शन) सरकारों को झुकने पर मजबूर कर सकती है। निर्वाचन आयोग से जुड़े विवाद ने अब इस दबाव को चुनावी राजनीति तक पहुंचा दिया है।

तो इस समय हमारे सामने यह महत्त्वपूर्ण सवाल उपस्थित है कि क्या देश किसी बड़ी उथल-पुथल की ओर बढ़ रहा है?

अथवा, फिलहाल देश में बिखरा हुआ गुस्सा किसी टिकाऊ राजनीतिक संगठन का रूप ले सकता है?

पहली सूरत भयावह है। इसलिए कि सिर्फ उथल-पुथल से कभी कुछ नहीं बनता। उलटे बहुसंख्यक जनता को इसकी पीड़ा से गुजरना पड़ता है, जबकि उससे हासिल कुछ नहीं होता। लेकिन, जैसे पुल के ढहने या भूकंप के आने का पूर्वानुमान संभव नहीं है, वैसे ही अगर स्थितियां बन रही हों, तो सामाजिक या राजनीतिक उथल-पुथल से बचना अक्सर मुमकिन नहीं रह जाता है।

असल बात है ऐसी स्थितियों का बनना। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नतीजों की बिना चिंता किए भारत में राजनीतिक ताकतों ने ऐसी स्थिति बनने दी है। वे यह समझने में नाकाम रहीं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था एक सेफ्टी वॉल्व की तरह काम करती है, जिसमें लोगों का गुस्सा विस्फोट की स्थिति आने के पहले ही संस्थागत माध्यमों के जरिए निकल जाता है। अपनी बात कहने और प्रतिरोध जताने की इजाजत, विधि-सम्मत न्याय व्यवस्था और अंततः चुनाव के जरिए जवाबदेही तय करने का सिस्टम- इसी तरह के सेफ्टी वॉल्व समझे जाते हैं। भले इनसे असल में कुछ ना बदलता हो- लोगों की जिंदगी बेहतर ना होती हो, लेकिन इस सिस्टम के जरिए ऐसा होने का भ्रम बना रहता है, जिससे व्यवस्था सुरक्षित रहती है। यह साफ है, आज भारत की संवैधानिक व्यवस्था के बारे में ऐसा भरोसा रखना कठिन हो गया है।

वैसे, एक और सूरत होती है, जिससे टिपिंग प्वाइंट किसी नए निर्माण का बिंदु बन सकती है। ऐसा तब होता है, अगर ऐसी नई ताकतें उभरें, जो पुरानी व्यवस्था को चुनौती भर देने से आगे बढ़ें और अगली व्यवस्था का निर्माण करें। क्या भारत में इसकी संभावना है? फिलहाल, ये उम्मीद नहीं दिखती। इसलिए कि नई ताकतों का उदय नए विमर्श के साथ होता है। फिलहाल, राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे किसी विमर्श का संकेत तक मौजूद नहीं है।

फिलहाल सूरत यह है कि एक तरफ सत्ता पक्ष है, जो अपने समर्थन आधार और चुनाव प्रबंधन की क्षमता के बूते अपनी सत्ता कायम रखने को लेकर आश्वस्त है। इसलिए उसे दूसरी तरफ उबल रहे “गुस्से” की कोई परवाह नहीं है। उसे वह पराजित एवं विफल ताकतों की निष्प्रभावी प्रतिक्रिया मानता है। उसे यकीन है कि राज्य के दमनकारी तंत्र के जरिए विरोधी ताकतों को वह नियंत्रित रखा जा सकता है।

दूसरी तरफ विपक्ष एवं वे समूह हैं, जो सही या गलत, लेकिन धीरे-धीरे यह मानने लगे हैं कि सत्ता पक्ष इसलिए सत्ता में नहीं है कि उसके साथ लोगों की बहुसंख्या है। बल्कि वह सत्ता में इसलिए बना हुआ है, क्योंकि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के धरातल को अनुचित तरीकों से अपनी तरफ झुका कर वह जनादेश गढ़ रहा है। इस स्थिति में निर्वाचित सरकार की वैधता (legitimacy) का सवाल खड़ा होता है, जिसे असल में इस समय उठाया जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे दावा कर चुके हैं कि 2024 से हुए सभी चुनावों में धांधली हुई और इस कारण उनसे चुनी गई सरकारें अवैध हैं। विपक्षी दलों और सिविल सोसायटी मे ऐसे बहुत से लोग हैं, जो खड़गे की राय से सहमत नजर आते हैं।

इन हालात ने भारत के राजनीतिक क्षितिज पर एक गतिरोध निर्मित कर दिया है। अगर न्यायपालिका से न्याय पाने की संभावना सभी पक्षों में बनी रहती, तो इस गतिरोध का समाधान संभव था। दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब खुद न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल गहरा गए हैं। इसी से उपजे विवाद की झलक 12 अक्टूबर को देखने को मिली। उस रोज जो हुआ, वह कई वर्षों से बनती स्थिति का परिणाम था। इस नई सूरत का क्या नतीजा होगा, उस बारे में सोचना भयभीत करता है, हालांकि उसका सही अनुमान लगाना फिलहाल संभव नहीं है।

सरकार के पास संख्या अब भी नहीं है

इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी की जा रही है। सरकार के जानकार सूत्रों की कहना है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट ने विशेष सत्र बुला कर महिला आरक्षण कानून में संशोधन और परिसीमन बिल पास कराने के सरकार के प्रयास को धीमा कर दिया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर आई रिपोर्ट के बाद से लगातार विपक्ष हमलावर है। विपक्ष की पार्टियों के साथ साथ कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन भी चल रहा है। सरकार के प्रबंधकों का मानना है कि इससे राजनीतिक माहौल में गर्मी बनी हुई है।

ऐसे समय में चुनाव से जुड़ा हुआ कोई भी सुधार करने की कोशिश समस्या पैदा कर सकती है। सरकार और भाजपा के संसदीय प्रबंधकों को यह भी लग रहा है कि इस समय कोई भी पार्टी सरकार का साथ देने से हिचकेगी। तभी सवाल है कि अचानक सरकार ने यह विचार कैसे शुरू कर दिया कि इसी महीने यानी बचे हुए 12 दिन में संसद का विशेष सत्र बुला कर महिला आरक्षण कानून में संशोधन करा लिया जाए और परिसीमन बिल भी पास हो जाए?

ध्यान रहे परिसीमन से जुड़े दो बिल हैं, एक राज्यों के लिए और एक केंद्र शासित प्रदेशों के लिए। इनको साधारण बहुमत से पास किया जा सकता है। लेकिन महिला आरक्षण कानून में बदलाव संविधान संशोधन के जरिए होगा, जिसके लिए दोनों सदनों में अलग अलग दो तिहाई बहुमत की जरुरत है। वास्तविक स्थिति यह है कि अब भी सरकार के पास दो तिहाई बहुमत नहीं है। दो तिहाई बहुमत नहीं होने के कारण ही 16 से 18 अप्रैल के विशेष सत्र में यह बिल पास नहीं हो पाया था।

पिछले कई दशक में पहली बार ऐसा हुआ था कि सरकार का बिल गिर गया। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए भी यह शर्मिंदगी की बात थी। कहा जा रहा है कि उसके बाद दोनों ने इसे प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाया है। इसी वजह से संसद के मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं किया जा रहा है। पिछले 65 दिन से सत्रावसान नहीं हुआ है। ऐसा इसलिए किया गया है कि सात दिन के अंदर नोटिस देकर फिर सत्र बुला लिया जाए।

जब से दूसरे विशेष सत्र की चर्चा शुरू हुई है तब से भाजपा के नेता भी परेशान हैं। उनको लग रहा है कि इस बार भी संख्या पूरी नहीं हो पाएगी। इसका कारण यह है कि सरकार को लोकसभा में हर हाल में 360 सांसदों की जरुरत है। इस समय विपक्ष के साथ 178 सांसद लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। राहुल गांधी और कांग्रेस नेताओं ने 30 सितंबिर की ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक में शामिल पार्टियों और उनके सांसदों की यह संख्या बताई है। विपक्ष की यह ताकत स़ड़कों पर भी दिख रही है। राज्यसभा में जरूर विपक्ष के साथ सिर्फ 62 सांसद हैं।

लेकिन लोकसभा में 178 सांसद हैं। इनके अलावा कई और पार्टियां हैं, जो विपक्ष के साथ नहीं हैं लेकिन सरकार के साथ भी नहीं हैं। जगन मोहन रेड्डी अब खुल कर भाजपा का विरोध कर रहे हैं। के चंद्रशेखर राव की पार्टी सरकार के खिलाफ है। अरविंद केजरीवाल और ओवैसी की पार्टी सरकार के खिलाफ है। ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे की पार्टी टूटने के बाद भी एनडीए के पास 318 ही सांसद हैं, जबकि ‘इंडिया’ ब्लॉक के पास 178 सांसद हैं। डीएमके सहित तटस्थ सांसदों की संख्या इस समय 45 है। इनमें से कम से कम 40 लोग सरकार को वोट करें तभी दो तिहाई बहुमत पूरा होगा। इसकी संभावना बहुत कम दिख रही है।

नेहा बोरा, प्रशांत भूषण पर कांग्रेस की सफाई

कांग्रेस पार्टी कॉकरोच जनता पार्टी, आइसा और सिविल सोसायटी के कुछ अति उत्साही लोगों के चक्कर में फंस गई है। अभिजीत दीपके के कॉकरोच जनता पार्टी के लोग पुलिस वालों से लेकर जजों के खिलाफ बयान दे रहे हैं या धमका रहे हैं। वे इस अहंकार में घूम रहे हैं कि हमने तो केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ले लिया तुम्हारी क्या औकात है। ऐसे ही सीपीआई एमएल के छात्र संगठन आइसा की नेता नेहा बोरा ने कह दिया कि उनको बांग्लादेश में युवाओं के आंदोलन से प्रेरणा मिली। बची खुशी कसर सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने पूरी कर दी। उन्होंने 16 अक्टूबर के तिरंगा मार्च की जानकारी देने के लिए बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में अति उत्साह में आकर कह दिया कि आंदोलन का मकसद ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता बदलने का है।

इससे भारतीय जनता पार्टी को मौका मिल गया। उसने नेहा बोरा और प्रशांत भूषण के बयान को एक साथ मिला दिया। उसने कहना शुरू कर दिया कि कांग्रेस और उसकी तरफ से प्रदर्शन कर रहे लोग बांग्लादेश के मॉडल का इस्तेमाल करके भारत में सत्ता बदलना चाहते हैं। भाजपा ने इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए राजनाथ सिंह के उतार दिया। उन्होंने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह बात कही। उसके बाद से इसका प्रचार हो रहा है।

इस प्रचार के कारण कांग्रेस बैकफुट पर आई। कांग्रेस नेताओं को मीडिया के सामने और सोशल मीडिया में सफाई देनी पड़ रही है। जयराम रमेश ने भी सफाई दी। लेकिन न तो नेहा बोरा को फर्क पड़ रहा है और प्रशांत भूषण को। तभी कांग्रेस के नेता इस मामले में गलती स्वीकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च के दौरान राहुल का नेहा बोरा के कंधे पर हाथ रखना और उसके अगले दिन घर पर चाय पार्टी में बुला कर मीडिया के सामने बयान दिलवाना ठीक फैसला नहीं था।

दिल्ली में प्रदर्शन जारी रहेगा

कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों ने भले यह फैसला किया है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया से बाहर निकल कर दिल्ली की सड़कों पर अभी प्रदर्शन नहीं करना है लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी या दूसरे संगठन ऐसा नहीं हो सोच रहे हैं। ऐसे संगठन या समूह, जिनका चुनावी राजनीति से कोई लेना देना नहीं है वे भी दिल्ली में प्रदर्शन करेंगे। अभी कॉकरोच जनता पार्टी के तिरंगा मार्च का विवाद चल ही रहा था कि राकेश टिकैत के भारतीय किसान यूनियन ने दिल्ली में प्रदर्शन का ऐलान कर दिया। हैरानी की बात है कि किसान यूनियन भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने के लिए प्रदर्शन करेगा।

राकेश टिकैत के संगठन ने 23 अक्टूबर को दिल्ली कूच का ऐलान किया है। उनका आधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है। अगर वे अपने साथ कुछ अन्य किसान संगठनों को जोड़ते हैं तो 23 अक्टूबर के आसपास फिर दिल्ली और एनसीआर में घमासान होगा। एक तरफ सरकार अडिग है कि वह किसी को भी दिल्ली में प्रदर्शन नहीं करने देगी। दूसरी ओर अनेक अराजनीतिक संगठन प्रदर्शन करने की जिद किए बैठे हैं। बताया जा रहा है कि कांग्रेस के नेता भी हैरान परेशान हैं। उनको समझ में नहीं आ रहा है कि इन संगठनों को कौन उकसा रहा है या कौन प्रेरित कर रहा है कि वे मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगने के लिए अलग अलग तरह के प्रदर्शन करें।