योगी सरकार में पर्यावरणीय बदलाव की नई इबारत, जल से जंगल तक विकास की नई पहचान

new chapter of environmental change in Yogi government

– जल, जंगल, जमीन और जैव विविधता संरक्षण में उत्तर प्रदेश बना मिसाल

– सुरक्षित पेयजल और स्वच्छ नदियों से बदली पर्यावरण संरक्षण की तस्वीर

– वृक्षारोपण, वेटलैंड संरक्षण और अमृत सरोवर से मजबूत हुआ हरित उत्तर प्रदेश

– बुंदेलखंड जल क्रांति, स्वच्छ हवा और नगर वनों ने बढ़ाई पर्यावरणीय मजबूती

Chief Minister Yogi Adityanath : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मार्गदर्शन में उत्तर प्रदेश ने पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संवर्धन के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन का नया अध्याय लिखा है। पिछले नौ वर्षों में योगी सरकार ने सुरक्षित पेयजल, नदियों के पुनर्जीवन, वनीकरण, आर्द्रभूमि संरक्षण, जल संरक्षण, स्वच्छ वायु, वन्यजीव सुरक्षा और वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएं लागू कर प्रदेश की पर्यावरणीय तस्वीर बदलने का प्रयास किया है। इसका उद्देश्य केवल प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण नहीं, बल्कि लोगों के जीवन स्तर, स्वास्थ्य और आजीविका को भी बेहतर बनाना रहा है।
 

आर्सेनिक-फ्लोराइड मुक्त पेयजल से लाखों लोगों को मिला सुरक्षित जीवन

बलिया, गाजीपुर, मऊ, वाराणसी, चंदौली, सोनभद्र सहित पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में पहले भूजल प्राकृतिक रूप से आर्सेनिक और फ्लोराइड से प्रदूषित था। लाखों लोग असुरक्षित हैंडपंपों का पानी पीने को मजबूर थे, जिससे आर्सेनिकोसिस, कंकाल फ्लोरोसिस, श्वसन संबंधी बीमारियों और कैंसर जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ गया था।

योगी सरकार ने जल जीवन मिशन और राज्य जल एवं स्वच्छता मिशन के माध्यम से सतही जल आधारित पाइप पेयजल योजनाओं का व्यापक विस्तार किया। गहरे जलस्रोतो के उपयोग तथा आधुनिक तकनीकों के माध्यम से हजारों गांवों को सुरक्षित नल जल उपलब्ध कराया गया, जिससे आर्सेनिक और फ्लोराइड जनित बीमारियों के खतरे में उल्लेखनीय कमी आई है। 
 

नमामि गंगे और 'एक जिला-एक नदी' अभियान से नदियों में लौटी स्वच्छता

नमामि गंगे मिशन के अंतर्गत गंगा नदी को स्वच्छ बनाने की दिशा में बड़े स्तर पर कार्य हुए हैं। कानपुर के सीसामऊ नाले से प्रतिदिन गंगा में गिरने वाले लगभग 140 एमएलडी गंदे पानी को रोककर आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों तक पहुंचाया गया।

वाराणसी, प्रयागराज और कानपुर सहित अनेक शहरों में सीवेज उपचार क्षमता बढ़ाई गई तथा औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण को मजबूत किया गया, जिससे गंगा जल की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला। सरकार के एक जिला एक नदी अभियान ने गोमती, हिंडन, तमसा, सोत और अन्य छोटी नदियों के पुनर्जीवन को नई गति दी।  

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240 करोड़ से अधिक पौधरोपण से बढ़ा हरित आवरण

अतिक्रमण हटाने, गाद निकालने, सीवरेज नेटवर्क विकसित करने और एसटीपी स्थापित करने से अनेक नदियों का प्राकृतिक प्रवाह फिर से बहाल हुआ। इससे भूजल पुनर्भरण और सिंचाई व्यवस्था को भी मजबूती मिली। वहीं हरित उत्तर प्रदेश के संकल्प के तहत वर्ष 2017 से 2026 के बीच 240 करोड़ से अधिक पौधरोपण कर प्रदेश ने देश में नई पहचान बनाई।

स्थानीय प्रजातियों के पौधों को बढ़ावा देने, नदी किनारे वृक्षारोपण, नगर वन, मियावाकी वन और सैटेलाइट आधारित निगरानी जैसी व्यवस्थाओं ने हरित आवरण बढ़ाने के साथ जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने की क्षमता भी मजबूत की।

 

रामसर वेटलैंड और अमृत सरोवर अभियान से जल संरक्षण को मिली नई ताकत

आर्द्रभूमियों के संरक्षण में भी उल्लेखनीय सफलता मिली है। नवाबगंज, सांडी, समसपुर, सुर सरोवर और सुरहा ताल जैसी प्रमुख वेटलैंड्स का पुनरुद्धार किया गया। सुरहा ताल को भारत के 100वें रामसर स्थल का दर्जा मिलना प्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि रही।

इन प्रयासों से प्रवासी पक्षियों के आवास सुरक्षित हुए और जैव विविधता को नई मजबूती मिली। मिशन अमृत सरोवर के तहत लगभग 69 हजार तालाबों और पारंपरिक जल निकायों का पुनर्जीवन किया गया। तालाबों की खुदाई, गाद निकालने, जल भंडारण क्षमता बढ़ाने और रिचार्ज संरचनाओं के निर्माण से ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल संरक्षण और सिंचाई की व्यवस्था को नया आधार मिला।

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बुंदेलखंड में जल क्रांति और ऊसर भूमि सुधार से किसानों को मिला नया संबल

बुंदेलखंड जैसे सूखा प्रभावित क्षेत्र में जल संरक्षण को लेकर विशेष अभियान चलाया गया। चेक डैम, तालाबों के पुनरुद्धार, वाटरशेड विकास, सिंचाई परियोजनाओं और केन-बेतवा लिंक परियोजना के माध्यम से जल उपलब्धता बढ़ाने के प्रयास हुए।

इससे खेती को नई मजबूती मिली और पलायन की समस्या में कमी आने की दिशा में सकारात्मक परिणाम सामने आए। प्रदेश में ऊसर और क्षारीय भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए वैज्ञानिक भूमि सुधार कार्यक्रम संचालित किए गए। जिप्सम, जल निकासी और आधुनिक मृदा सुधार तकनीकों के माध्यम से लाखों हेक्टेयर अनुपजाऊ भूमि को खेती योग्य बनाया गया, जिससे किसानों की आय बढ़ाने में सहायता मिली।

 

एयरशेड मॉडल, नगर वन और ग्रीन बेल्ट से स्वच्छ हवा की दिशा में बड़ी पहल

स्वच्छ हवा के लिए सरकार ने एयरशेड आधारित रणनीति अपनाई। जिग-जैग तकनीक वाले ईंट भट्ठों को बढ़ावा दिया गया, औद्योगिक उत्सर्जन की निगरानी को मजबूत किया गया तथा उत्तर प्रदेश स्वच्छ वायु प्रबंधन परियोजना (यूपी कैम्प) लागू की गई।

इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन और रियल टाइम एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग जैसे कदमों से वायु प्रदूषण नियंत्रण को नई दिशा मिली। लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद और कानपुर जैसे शहरों में नगर वन, जैव विविधता पार्क और ग्रीन बेल्ट विकसित किए गए। इन पहलों से शहरी हरित क्षेत्र बढ़ा, हीट आइलैंड प्रभाव कम करने में मदद मिली और नागरिकों को बेहतर पर्यावरण उपलब्ध हुआ।

 

दुधवा, रानीपुर और चंद्रप्रभा में वन्यजीव संरक्षण को मिली नई गति

वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में दुधवा लैंडस्केप और तराई क्षेत्र में आवास संरक्षण, हाथी रिजर्व, वन्यजीव गलियारों की बहाली, सोलर फेंसिंग और त्वरित प्रतिक्रिया दलों की स्थापना जैसे कदम उठाए गए। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने और इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने में मदद मिली।

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बुंदेलखंड में रानीपुर टाइगर रिजर्व की स्थापना ने जैव विविधता संरक्षण को नई मजबूती दी। वहीं चंद्रप्रभा सहित अन्य वन क्षेत्रों में प्राकृतिक पुनर्जनन, मिट्टी एवं नमी संरक्षण तथा वन बहाली कार्यक्रमों के माध्यम से खराब हो चुके वन क्षेत्रों को पुनर्जीवित किया गया।

 

प्लास्टिक मुक्त तीर्थस्थलों और जैव विविधता संरक्षण से पर्यावरण को मजबूती

अयोध्या, वाराणसी और प्रयागराज जैसे प्रमुख धार्मिक नगरों में सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रभावी रोक लगाने, कचरा प्रबंधन को मजबूत करने और स्वच्छता ढांचे का विस्तार करने से धार्मिक पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण का बेहतर संतुलन स्थापित हुआ।
 

सारस, गंगा डॉल्फिन, मीठे पानी के कछुओं और अन्य दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण के लिए विशेष कार्यक्रम संचालित किए गए। स्वच्छ नदियों, बेहतर आर्द्रभूमि प्रबंधन और आवास संरक्षण के माध्यम से प्रदेश की जैव विविधता को नई ऊर्जा मिली। गोरखपुर में स्थापित जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र गिद्धों की घटती आबादी को पुनर्जीवित करने की दिशा में देश की महत्वपूर्ण पहल बनकर उभरा है। आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से संकटग्रस्त गिद्ध प्रजातियों के संरक्षण का कार्य किया जा रहा है।

 

सौर ऊर्जा, जैविक खेती और स्वच्छ ऊर्जा से सतत विकास को बढ़ावा

सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में सौर ऊर्जा आधारित पेयजल और सिंचाई योजनाओं का विस्तार कर स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा दिया गया। इससे डीजल पर निर्भरता कम हुई और दूरदराज गांवों में जलापूर्ति अधिक विश्वसनीय बनी। गंगा कॉरिडोर के किनारे जैविक और प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित कर रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी लाने तथा नदी प्रदूषण को रोकने की दिशा में भी प्रभावी प्रयास किए गए।

इससे मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा मिला। इसके साथ ही स्वच्छ भारत मिशन और शहरी विकास कार्यक्रमों के अंतर्गत वैज्ञानिक ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, कचरे के पृथक्करण, आधुनिक प्रोसेसिंग प्लांट और पुराने लैंडफिल के उपचार जैसे कार्यों को गति दी गई। इससे शहरों में स्वच्छता व्यवस्था मजबूत हुई और पर्यावरणीय प्रदूषण को कम करने में सफलता मिली।

Gurugram-Rewari highway: गुरुग्राम से रेवाड़ी के लिए खुल रहा है नया चमचमाता एक्सप्रेसवे, इसी महीने शुरू होगा पहला फेज! इन इलाकों की बदलेगी किस्मत

Gurugram-Rewari highway: हरियाणा और एनसीआर के लोगों के लिए बड़ी राहत की खबर है। जल्द ही शुरू होने वाला 46 किलोमीटर लंबा गुरुग्राम-रेवाड़ी हाईवे दोनों शहरों के बीच यात्रा को तेज और आसान बना देगा। हाईवे के शुरू होने के बाद गुरुग्राम से रेवाड़ी का सफर सिर्फ 45 मिनट में पूरा किया जा सकेगा। इसके अलावा इस परियोजना से क्षेत्र में रियल एस्टेट, उद्योग और निवेश को भी नई रफ्तार देने की उम्मीद है।

जानकारों का कहना है कि गुरुग्राम-रेवाड़ी हाईवे से सिर्फ़ सफर का समय ही कम नहीं होगा। बल्कि और भी कई फायदे होंगे। इस नई सड़क से प्रॉपर्टी की मांग बढ़ने, बिजनेस को बढ़ावा मिलने और नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) के दक्षिणी हिस्सों में कनेक्टिविटी बेहतर होने की उम्मीद है।

दो चरणों में खुलेगा हाईवे

पहला चरण: 10 किलोमीटर का हिस्सा जुलाई 2026 में चालू होने की संभावना है।

दूसरा चरण: शेष मार्ग सितंबर 2026 तक पूरा होने की उम्मीद है।

पहला चरण शुरू होने के बाद द्वारका एक्सप्रेसवे से KMP एक्सप्रेसवे तक का सफर, जो अभी पीक ट्रैफिक में करीब 45 मिनट लेता है, घटकर 10 मिनट से भी कम रह जाएगा।

इन इलाकों को मिलेगा सीधा फायदा

नया हाईवे सेक्टर-88B (द्वारका एक्सप्रेसवे) से शुरू होकर कुंडली-मानेसर-पलवल (KMP) एक्सप्रेसवे से जुड़ेगा। इससे इन प्रमुख क्षेत्रों की कनेक्टिविटी बेहतर होगी:-

द्वारका एक्सप्रेसवे

न्यू गुरुग्राम

मानेसर

IMT मानेसर

रेवाड़ी

ट्रैफिक जाम से मिलेगी राहत

यह हाईवे मौजूदा सड़कों का विकल्प बनेगा, जिससे मानेसर और गुरुग्राम के केंद्रीय हिस्सों में ट्रैफिक का दबाव कम होगा। रोजाना आने-जाने वाले लोगों और माल ढुलाई करने वाले वाहनों को भी काफी राहत मिलेगी।

रेवाड़ी बनेगा नया निवेश और औद्योगिक हब

बेहतर सड़क संपर्क के बाद रेवाड़ी में उद्योग, वेयरहाउस और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है। आसान परिवहन व्यवस्था के कारण कंपनियों का निवेश बढ़ सकता है, जिससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

रियल एस्टेट को मिलेगा बूस्ट

रियल एस्टेट विशेषज्ञों का मानना है कि हाईवे के किनारे स्थित इलाकों में आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाओं की मांग तेजी से बढ़ सकती है। गुरुग्राम के बिजनेस हब तक कम समय में पहुंचने की सुविधा मिलने से इन क्षेत्रों में प्रॉपर्टी की कीमतों में भी उछाल आने की संभावना है।

RRTS से भी जुड़ेगा हाईवे

यह परियोजना दिल्ली-गुरुग्राम-SNB-अलवर रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) से भी जुड़ेगी। इससे एनसीआर और हरियाणा के बीच क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और मजबूत होगी तथा रेवाड़ी को एक उभरते हुए ग्रोथ सेंटर के रूप में नई पहचान मिलेगी।

बेहतर कनेक्टिविटी

यह हाईवे द्वारका एक्सप्रेसवे पर सेक्टर 88B के पास से शुरू होगा और सीधे केएमपी एक्सप्रेसवे से जुड़ेगा। इससे न्यू गुरुग्राम, मानेसर और आईएमटी (IMT) मानेसर जैसे प्रमुख स्थानों तक पहुंच आसान हो जाएगी। इसके अलावा, यह दिल्ली-गुरुग्राम-एसएनबी-अलवर रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) सहित बड़े ट्रांसपोर्ट नेटवर्क से भी जुड़ेगा।

औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स विकास

बेहतर रोड कनेक्टिविटी से रेवाड़ी के एक प्रमुख औद्योगिक और निवेश केंद्र के रूप में बदलने की उम्मीद है। इससे माल की आवाजाही आसान होगी, जिससे यह क्षेत्र मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स, गोदामों (warehouses) और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के लिए अधिक आकर्षक बन जाएगा।

रियल एस्टेट में उछाल

रियल एस्टेट सलाहकारों को उम्मीद है कि इस कॉरिडोर के साथ आने वाले आवासीय (residential) और वाणिज्यिक (commercial) प्रोजेक्ट्स की मांग बढ़ेगी, क्योंकि गुरुग्राम के बिजनेस डिस्ट्रिक्ट्स तक आना-जाना तेज और अधिक सुविधाजनक हो जाएगा।

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अमेरिकी नागरिकता के पक्ष में फैसले से क्यों खुश हैं भारतीय

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मुरली कृष्णन

जन्म के आधार पर नागरिकता के मामले में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने अमेरिका में रह रहे भारतीय परिवारों की चिंताएं घटाई हैं। आखिर इस फैसले से प्रवासी भारतीयों को क्या फायदा होगा? ALSO READ: खमेनेई के बाद ईरान: कितनी बदल जाएगी मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था

 

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में जन्म के आधार पर नागरिकता को बरकरार रखा है। इस फैसले से हजारों भारतीय परिवारों को राहत मिली है। हालांकि, इस बात पर राजनीतिक लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है कि कौन व्यक्ति अमेरिकी कहलाने का हकदार है। जब 30 जून को सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आया, तब सिएटल में रहने वाले एक भारतीय जोड़े, राजेश और नेहा ने काम पर निकलने से पहले नाश्ते की मेज पर इस खबर को पढ़ा।

 

सॉफ्टवेयर इंजीनियर राजेश 2016 में एच-1बी वीजा पर दक्षिण भारतीय शहर बेंगलुरु से अमेरिका आए थे। एक साल बाद नेहा भी उनके साथ आ गईं। उनकी छह साल की बेटी आन्या का जन्म अमेरिका में ही हुआ था। नेहा ने डीडब्ल्यू को बताया, “यह राहत की बात थी। महीनों तक हम सोचते रहे कि क्या इतनी बुनियादी चीज सच में बदल सकती है।”

 

इस फैसले के बाद उनकी बेटी तो अमेरिकी नागरिक बनी रहेगी, लेकिन उनके लिए कुछ खास नहीं बदला है। अमेरिका में रह रहे हजारों अन्य भारतीय पेशेवरों की तरह, वे भी सालों से लाइन में लगे हुए हैं और नौकरी के आधार पर मिलने वाले ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे हैं। राजेश ने कहा, “हम खुश हैं कि हमारी बेटी का भविष्य सुरक्षित हो गया है, लेकिन हमारी अपनी जिंदगी अब भी हर बार वीजा रिन्यू होने की चिंता के साथ गुजर रही है।” ALSO READ: जर्मनी में गर्मी की वजह से इस साल 5,100 लोगों की मौत

 

राहत की सांस

जून के आखिर में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने जन्म के आधार पर नागरिकता को बरकरार रखा। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अमेरिकी धरती पर पैदा होने वाले बच्चे अमेरिकी नागरिक बने रहेंगे, चाहे उनके माता-पिता का इमिग्रेशन स्टेटस कुछ भी हो।

 

दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पिछले साल एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किया था, जिसमें कहा गया था कि अमेरिका में गैर-कानूनी तरीके से या अस्थायी वीजा पर रह रहे माता-पिता के बच्चे अपने-आप अमेरिकी नागरिक नहीं बनेंगे। उस आदेश पर फिलहाल रोक लगी हुई है और उस पर अदालत में कानूनी सुनवाई चल रही है।

 

सामाजिक और राजनीतिक संस्था ‘इंडियन अमेरिकन इम्पैक्ट' के कार्यकारी निदेशक चिंतन पटेल ने कहा, “यह फैसला इस बात की बेहतर तरीके से पुष्टि करता है कि अमेरिका में किसे रहने और नागरिक कहलाने का अधिकार है।” पटेल ने एक बयान में कहा, “ट्रंप के कार्यकारी आदेश से जिन लोगों को सबसे सीधा खतरा था, उनमें भारतीय और दक्षिण एशियाई मूल के प्रवासी परिवार शामिल हैं। ये समुदाय वर्षों से वीजा बैकलॉग और अनिश्चित आव्रजन प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं। ऐसे में अक्सर उनके बच्चों का जन्म अमेरिका में हो जाता है, जबकि माता-पिता के पास स्थायी रूप से वहां रहने का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं होता।”

 

‘प्यू रिसर्च सेंटर' की मई 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में चीनी-अमेरिकियों के बाद भारतीय मूल के लोग एशिया के दूसरे सबसे बड़े प्रवासी समूह हैं। 2023 में अमेरिका में भारतीय मूल के लगभग 52 लाख लोग रहते थे, जो देश की एशियाई मूल की आबादी का लगभग 21 फीसदी है। अमेरिकी कंपनियों को कुशल विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखने की सुविधा देने वाले ‘एच-1बी वीजा' को पाने में भारतीय सबसे आगे हैं। लेकिन, हर देश के लिए तय सीमा होने की वजह से, नौकरी के आधार पर मिलने वाले ग्रीन कार्ड के लिए सबसे लंबा इंतजार भी इन्हीं भारतीयों को करना पड़ता है।

 

सामुदायिक संगठनों का अनुमान है कि अमेरिका में अस्थायी वर्क वीजा पर रह रहे भारतीय माता-पिता के यहां लाखों बच्चे पैदा हुए हैं। कोर्ट के इस फैसले से अब उनकी नागरिकता और उससे जुड़े अधिकार सुरक्षित रहेंगे, जिनमें अमेरिकी पासपोर्ट और सोशल सिक्योरिटी नंबर भी शामिल हैं।

 

कर्मचारी अपना स्टेटस (कानूनी दर्जा) खराब होने के डर से नौकरी बदलने में हिचकिचाते हैं। वहीं दूसरी तरफ, उनके जीवनसाथी (पति या पत्नी) को भी काम करने को लेकर कई तरह की पाबंदियों का सामना करना पड़ सकता है।

 

जो बच्चे अपने माता-पिता के सहारे यानी डिपेंडेंट के तौर पर अमेरिका आए थे, वे 21 साल के होते ही अपना कानूनी दर्जा खो सकते हैं, बशर्ते उनके माता-पिता को तब तक पक्का ग्रीन कार्ड न मिला हो। इस गंभीर समस्या को ‘एजिंग आउट' कहा जाता है। इस तरह के कठिन हालात के बीच, जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता ही उन कुछ चुनिंदा भरोसेमंद चीजों में से एक रही है, जिस पर ये परिवार पक्के तौर पर यकीन कर सकते हैं।

 

रोजगार और परिवार-आधारित इमिग्रेशन के विशेषज्ञ और अमेरिकी इमिग्रेशन अटॉर्नी राजकृष्ण एस। अय्यर ने डीडब्ल्यू से कहा, “यह अदालती फैसला इस पुराने संवैधानिक नियम को और मजबूत करता है कि जो कोई भी अमेरिका में पैदा हुआ है, वह वहां का नागरिक है। भले ही, उसके माता-पिता का इमिग्रेशन स्टेटस कुछ भी हो। भारतीय एच-1बी परिवारों के लिए इसका मतलब है कि उनके बच्चों को जन्म के समय ही अमेरिकी नागरिकता मिल जाएगी।” ALSO READ: फ्रांस की धुर दक्षिणपंथी नेता की सजा घटी लेकिन चुनौतियां नहीं

 

समाज को बांटने वाले मुद्दा

यह अदालती फैसला अमेरिकी राजनीति के सबसे ज्यादा विवादित और समाज को बांटने वाले सवालों में से एक को दोबारा चर्चा के केंद्र में ले आया है। दरअसल, सालों से ट्रंप और कई रूढ़िवादी नेता यह तर्क देते आ रहे हैं कि बिना किसी शर्त के मिलने वाली जन्म आधारित नागरिकता इमिग्रेशन सिस्टम के गलत इस्तेमाल को बढ़ावा देती है। अमेरिकी नागरिकता हासिल करने के लिए मौजूदा इमिग्रेशन सिस्टम का इस तरह जानबूझकर इस्तेमाल करना ही रूढ़िवादी नेताओं और इमिग्रेशन का विरोध करने वालों की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है।

 

ट्रंप के रूख का समर्थन करने वालों का कहना है कि जन्म के आधार पर नागरिकता मिलने से ‘बर्थ टूरिज्म' को बढ़ावा मिलता है। इसमें विदेशी नागरिक खास तौर पर बच्चे को जन्म देने के लिए अमेरिका आते हैं, ताकि उनके बच्चों को अमेरिकी नागरिकता मिल सके।

 

अय्यर ने कहा कि यह आपत्ति आम तौर पर एच-1बी वीजा रखने वाले लोगों के लिए नहीं जताई जाती है। उन्होंने बताया, “खास बात यह है कि रूढ़िवादी लोगों ने अमेरिका में कानूनी तौर पर आए प्रवासी कामगारों के बच्चों के जन्म पर बहुत कम आपत्ति जताई है।”

 

अय्यर के मुताबिक, एच-1बी वीजा रखने वाले लोग कानूनी तौर पर आए कामगार होते हैं। ये लोग टैक्स देते हैं और आम तौर पर इन्हें सरकारी संसाधनों पर बोझ नहीं माना जाता। उन्होंने कहा, “इसलिए, ऐसा लगता है कि उनका असली विरोध सिर्फ प्रवासियों के कानूनी दर्जे (इमिग्रेशन स्टेटस) को लेकर नहीं है। उनका गुस्सा इस बात पर ज्यादा है कि लोग कानूनी व्यवस्था को दरकिनार कर रहे हैं, देश में अवैध रूप से दाखिल हो रहे हैं या फिर ‘बर्थ टूरिज्म' (सिर्फ बच्चे को नागरिकता दिलाने के लिए यात्रा करना) के लिए वैध वीजा का इस तरह फायदा उठा रहे हैं जिसके लिए वह वीजा बनाया ही नहीं गया था।”

 

अय्यर कहते हैं कि जन्म के आधार पर नागरिकता के नियम को लेकर अक्सर लोगों के बीच कई तरह की गलतफहमियां होती हैं। अमेरिका में पैदा हुए बच्चे 21 साल की उम्र से पहले अपने माता-पिता के परमानेंट रेजिडेंसी के लिए आवेदन नहीं कर सकते। इसका मतलब यह है कि बच्चे को जन्म से मिलने वाली नागरिकता, पूरे परिवार को तुरंत कानूनी दर्जा दिलाने का कोई सीधा रास्ता नहीं खोलती। वे संगठित रूप से होने वाले ‘ऑर्गनाइज्ड बर्थ टूरिज्म' के इक्का-दुक्का मामलों और उन परिवारों के बीच एक साफ अंतर देखते हैं, जो कंपनी के वीजा पर सालों से कानूनी तौर पर अमेरिका में रह रहे हैं और काम कर रहे हैं।

 

यह फर्क खासकर भारतीय एच-1बी परिवारों के लिए अहम है। बिना दस्तावेजों वाले (अवैध) प्रवासियों के उलट, ज्यादातर भारतीय पेशेवर कानूनी तौर पर अमेरिका में दाखिल होते हैं, वहां ईमानदारी से टैक्स भरते हैं और नौकरी-आधारित दुनिया की सबसे लंबी इमिग्रेशन लिस्ट (बैकलॉग) का सामना करते हुए भी हमेशा अपना कानूनी दर्जा बनाए रखते हैं।

 

नई दिल्ली के एक वकील करन ठुकराल ने कहा कि भारतीय पेशेवरों को जबरदस्ती एक ऐसी बहस में घसीटा जा रहा है, जो असल में अवैध प्रवासियों को ध्यान में रखकर शुरू की गई थी। उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, “इस फैसले से भारतीय एच-1बी वीजा वाले परिवारों के सामने बनी एक बड़ी अनिश्चितता दूर हो गई है। यह फैसला ग्रीन कार्ड के लिए दशकों लंबे इंतजार या अस्थाई वीजा पर जीने की कड़वी हकीकत को नहीं बदलता। वे कानूनी तौर पर आए हुए पेशेवर हैं। सिस्टम के गलत इस्तेमाल की चिंताओं की कीमत अमेरिका में पैदा हुए बच्चों के संवैधानिक अधिकारों को छीनकर नहीं चुकाई जानी चाहिए।” ALSO READ: ब्रिटेन का शाही परिवार कहां से और कैसे धन कमाता है

 

जन्म के आधार पर नागरिकता को लेकर खत्म नहीं हुई है लड़ाई

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से जन्म के आधार पर नागरिकता को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। इसके बजाय, इस फैसले ने उन परिस्थितियों को सीमित कर दिया है, जिनमें निचली अदालतें राष्ट्रपति की नीतियों को पूरे देश में लागू होने से रोक सकती हैं। जब तक इस संवैधानिक सवाल का कोई पक्का समाधान नहीं निकल जाता, तब तक ट्रंप के कार्यकारी आदेश को देश भर की अदालतों में चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

 

अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत मीरा शंकर इस फैसले को किसी पक्के समाधान के बजाय एक तरह का भरोसा दिलाना मानती हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, “यह फैसला कई भारतीय परिवारों के लिए राहत की बात है, क्योंकि इससे अमेरिका में पैदा हुए बच्चों को अमेरिकी नागरिक के रूप में एक मजबूत कानूनी आधार (सुरक्षा) मिलता है।”

 

उन्होंने आगे कहा, “लेकिन ट्रंप प्रशासन के आने के बाद से, अमेरिका अब प्रवासियों का पहले की तरह स्वागत नहीं कर रहा है। इसलिए कई प्रतिभाशाली भारतीय, जो पहले अमेरिका जाना अपना सबसे अच्छा विकल्प मानते थे, अब शायद अपना फैसला बदलने पर विचार कर सकते हैं।”

 

अनिश्चितता के बीच कैसी होती है जिंदगी

कई भारतीय पेशेवरों के लिए, अदालत का यह फैसला एक बहुत बड़ी समस्या के सिर्फ एक हिस्से को ही हल करता है।

 

नौकरी के आधार पर मिलने वाले ग्रीन कार्ड के लिए हर साल अलग-अलग देशों का एक तय कोटा होता है। इसकी वजह से भारतीय आवेदकों के लिए बहुत बड़ा बैकलॉग बन गया है, यानी उनके लिए इंतजार की अवधि काफी बढ़ गई है। अलग-अलग अनुमानों के मुताबिक, 10 लाख से भी ज्यादा भारतीय यहां स्थायी तौर पर बसने के लिए लाइन में लगे हैं और इनमें से कुछ तो दशकों से इंतजार कर रहे हैं।

UP Mega Infrastructure Plan: लखनऊ समेत इन 6 जिलों की बदलेगी तस्वीर, आउटर रिंग रोड और नमो भारत कॉरिडोर को मिली मंजूरी

UP Mega Infrastructure Plan: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्टेट कैपिटल रीजन (SCR) में विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर की गाड़ी तेजी से दौड़ाने की तैयारी कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और उसके आसपास के जिले को स्टेट कैपिटल रीजन (SCR) के विकास को बड़ा बढ़ावा मिलने जा रहा है। राज्य सरकार ने एससीआर के लिए कई महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। इनमें 300 किलोमीटर लंबी आउटर रिंग रोड, 187 किलोमीटर का नमो भारत कॉरिडोर, 151 किलोमीटर की रिंग रेल और औद्योगिक क्लस्टर जैसी परियोजनाएं शामिल हैं।

इन योजनाओं के लागू होने से क्षेत्र में परिवहन, निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। पूरे एससीआर को कवर करने वाली आउटर रिंग रोड के अलावा कई अहम परियोजनाओं को विभागीय स्तर पर सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई है। आवास विभाग की दो दिन चली बैठक में इन परियोजनाओं पर सहमति बनी है। लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने इन प्रस्तावों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर शासन को भेजी थी। इस पर मुख्यमंत्री की सहमति मिलने के बाद इन पर क्रियांवयन शुरू होगा।

300 KM आउटर रिंग रोड से छह जिलों को फायदा

स्टेट कैपिटल रीजन (SCR) में यूपी के 6 जिले शामिल हैं। उनमें लखनऊ, रायबरेली, बाराबंकी, सीतापुर, उन्नाव और हरदोई शामिल है। प्रस्तावित आउटर रिंग रोड लखनऊ, रायबरेली, बाराबंकी, सीतापुर, उन्नाव और हरदोई को जोड़ते हुए लगभग 300 किलोमीटर लंबी होगी। यह परियोजना राजधानी के ट्रैफिक दबाव को कम करने और आसपास के जिलों के बीच तेज कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाएगी।

पहला चरण: 105 किमी सड़क का निर्माण, अनुमानित लागत 2,100 करोड़ रुपये

दूसरा चरण: 195 किमी सड़क, अनुमानित लागत 3,900 करोड़ रुपये

187 KM नमो भारत कॉरिडोर

हाई स्पीड रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) के तहत प्रस्तावित 187 किलोमीटर लंबा नमो भारत कॉरिडोर कानपुर के न्यायगंज से अयोध्या तक बनाया जाएगा। इसकी अनुमानित लागत 32,000 करोड़ रुपये बताई गई है।

दो चरणों में पूरा होगा प्रोजेक्ट

पहला चरण: न्यायगंज से अमौसी तक 67 किलोमीटर

दूसरा चरण: अमौसी से अयोध्या तक

कॉरिडोर पर कुल 12 स्टेशन प्रस्तावित हैं। इनमें न्यायगंज, उन्नाव, बशीरतगंज, नवाबगंज, बांगर, अमौसी, सुशांत गोल्फ सिटी, जुग्गौर, बरेल, सफदरगंज, भिटरिया और अयोध्या शामिल हैं।

रिंग रेल परियोजना भी होगी विकसित

एससीआर क्षेत्र में 151 किलोमीटर लंबी रिंग रेल परियोजना भी प्रस्तावित है। इससे लखनऊ और आसपास के जिलों के बीच रेल कनेक्टिविटी बेहतर होगी।

पहला चरण: पहले चरण में 63 किलोमीटर

सेकंड चरण: दूसरे चरण में 88 किलोमीटर रेल लाइन विकसित की जाएगी।

औद्योगिक विकास को मिलेगा बढ़ावा

  • सरकार ने बहराइच (रायबरेली) और संडीला (हरदोई) में औद्योगिक क्लस्टर विकसित करने की भी मंजूरी दी है।
  • बहराइच क्षेत्र में पहले चरण में 12,500 करोड़ रुपये और दूसरे चरण में 13,500 करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्ताव है।
  • संडीला में फूड प्रोसेसिंग, केमिकल, पैकेजिंग, टेक्सटाइल और लॉजिस्टिक्स उद्योगों के विकास के लिए हजारों करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है।
  • इसके अलावा लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे कॉरिडोर के दोनों ओर आवासीय, व्यावसायिक और औद्योगिक विकास किया जाएगा।

300 किमी आउटर रिंग रोड और रिंग रेल

बाराबंकी, सीतापुर, उन्नाव और हरदोई को जोड़ने वाले 300 किलोमीटर लंबे आउटर रिंग रोड को मंजूरी दी गई है:-

पहला चरण: 105 किलोमीटर सड़क का निर्माण 2100 करोड़ रुपये की लागत से होगा।

दूसरा चरण: 195 किलोमीटर हिस्से के लिए 3,900 करोड़ रुपये खर्च होंगे।

रिंग रेल परियोजना: एससीआर क्षेत्र के चारों ओर 151 किलोमीटर लंबी रिंग रेल परियोजना के पहले चरण में 63 किलोमीटर और दूसरे चरण में 88 किलोमीटर रेल लाइन विकसित की जाएगी।

औद्योगिक निवेश और रोजगार के नए अवसर

इससे जुड़े अहम बैठक में औद्योगिक निवेश बढ़ाने के लिए बछरावां को स्पेशल इनवेस्टमेंट रीजन और संडीला को विस्तारित औद्योगिक क्षेत्र के रूप में विकसित करने का फैसला लिया गया है:-

बछरावां (रायबरेली): पहले चरण में 12,500 करोड़ और दूसरे चरण में 13,500 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है।

संडीला (हरदोई): फूड प्रोसेसिंग, पेय पदार्थ, केमिकल, पैकेजिंग, टेक्सटाइल और लॉजिस्टिक्स उद्योगों के लिए पहले चरण में 6,250 करोड़ और दूसरे चरण में 5,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।

अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रीय विकास परियोजनाएं

एक्सप्रेसवे डेवलपमेंट: लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे कॉरिडोर के ओरिएंटेड डेवलपमेंट के तहत एक्सप्रेसवे के दोनों ओर आवासीय, व्यावसायिक और औद्योगिक विकास किया जाएगा।

लॉजिस्टिक्स हब: दुबग्गा-वरुण विहार क्षेत्र में इंटीग्रेटेड एग्री-ट्रेड, फूड चेन और लॉजिस्टिक्स हब बनेगा।

आध्यात्मिक केंद्र: नैमिषारण्य को आध्यात्मिक-आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित करने की 750 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी।

अस्पताल और ट्रांसपोर्ट नगर: सीतापुर में मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल तथा उन्नाव और गोसाईंगंज में नए ट्रांसपोर्ट नगर विकसित करने के प्रस्तावों पर सहमति बनी है।

इन जिलों को होगा सीधा फायदा

लखनऊ

रायबरेली

बाराबंकी

सीतापुर

उन्नाव

हरदोई

क्या होगा असर?

इन परियोजनाओं के पूरा होने से राजधानी क्षेत्र में ट्रैफिक जाम की समस्या कम होगी। यात्रा का समय घटेगा। औद्योगिक निवेश बढ़ेगा और हजारों लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। साथ ही लखनऊ और आसपास के जिलों का समग्र आर्थिक और शहरी विकास तेज होने की उम्मीद है।

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यूपी में 10 हजार युवाओं की होगी भर्ती, प्रोजेक्ट गंगा से गांव में होगी 20 हजार से एक लाख तक की इनकम, जानिए पूरी स्कीम

Project Ganga Scheme Explained: उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों की तस्वीर बदलने और गांवों को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने के लिए योगी आदित्यनाथ की सरकार ने एक बड़ी पहल की है। राज्य सरकार एक महत्वाकांक्षी योजना प्रोजेक्ट गंगा लेकर आ रही है। सरकार का दावा है कि प्रोजेक्ट गंगा उत्तर प्रदेश के ग्रामीण डिजिटल भविष्य की आधारशिला बनने जा रही है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य प्रदेश की 57000 ग्राम पंचायतों, गांवों और दूरस्थ क्षेत्रों तक हाई-स्पीड फाइबर ब्रॉडबैंड इंटरनेट पहुंचाकर डिजिटल असमानता को पूरी तरह खत्म करना है।

इस परियोजना के जरिए गांवों को शहरों जैसी आधुनिक डिजिटल सुविधाओं से जोड़ा जाएगा। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, ई-गवर्नेस, स्मार्ट कृषि, डिजिटल भुगतान और रोजगार के नए अवसरों का द्वार खुलेगा। अब ग्रामीणों को सरकारी सेवाओं, बैंकिंग और विभिन्न प्रमाणपत्रों के लिए शहरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। इस योजना के तहत 8 से 10 हजार युवाओं की भर्ती की जाएगी। इनकी मासिक आमदनी 1 लाख रुपये तक हो सकती है।

प्रोजेक्ट गंगा की प्रमुख विशेषताएं और बड़े माइलस्टोन

प्रोजेक्ट गंगा के सभी प्रमुख माइलस्टोन पूरे कर लिए गए हैं और सरकार व पार्टनर्स ने इसकी तैयारियों को तेज कर दिया है। इस योजना की मुख्य बातें यहां नीचे दी गई हैं-

10 हजार युवाओं को रोजगार: डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर के रूप में 8000 से 10000 युवाओं की भर्ती की जाएगी। युवाओं को अपने ही गांव में डिजिटल सेवा केंद्र स्थापित करने का सुनहरा अवसर मिलेगा।

₹20 हजार से ₹1 लाख तक की इनकम: शुरुआत में डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर के रूप में काम करने वाले युवाओं की मासिक आय करीब 20000 रुपये होगी। जैसे-जैसे ग्राहकों की संख्या बढ़ेगी यह आमदनी बढ़कर 1 लाख रुपये प्रतिमाह तक पहुंच सकती है।

महिलाओं की 50% भागीदारी: महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के लिए गंगा प्रोजेक्ट के अंतर्गत बनने वाले डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी महिलाओं की सुनिश्चित की गई है। इससे ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकेंगी।

ब्याज मुक्त लोन: अपने गांव या घर में इंटरनेट उद्यम शुरू करने के लिए सरकार मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना के तहत युवाओं को 5 लाख रुपये तक का ब्याज-मुक्त लोन उपलब्ध करा रही है।

पहले चरण में 21 जिले शामिल, नेपाल सीमा को प्राथमिकता

यह परियोजना चरणबद्ध तरीके से पूरे उत्तर प्रदेश में लागू की जाएगी। योजना के पहले चरण में राज्य के 21 जिलों को शामिल किया गया है। इसमें नेपाल सीमा से सटे श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर जैसे सीमावर्ती जिलों को प्राथमिकता दी जाएगी। अगले 2 से 3 वर्षों में इस परियोजना का विस्तार पूरे उत्तर प्रदेश में कर दिया जाएगा। इस योजना से प्रदेश की सभी 57 हजार ग्राम पंचायतों और करीब 20 लाख परिवारों को सीधे तौर पर डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाएगा। इसके माध्यम से पूरे प्रदेश में 1 लाख से अधिक रोजगार सृजन की दिशा में कदम बढ़ाया जा रहा है।

गांवों में रुकगा पलायन, मिलेंगे फ्रीलांसिंग और रिमोट वर्क के अवसर

हाई-स्पीड इंटरनेट और फ्री वाई-फाई की उपलब्धता से ग्रामीण यूपी में डिजिटल क्रांति आएगी। इससे युवाओं को बड़े फायदे मिलेंगे। गांवों में ही ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी होने से युवाओं को फ्रीलांसिंग, रिमोट वर्क, ऑनलाइन वोकेशनल ट्रेनिंग और डिजिटल लाइब्रेरी जैसी सुविधाएं मिलेंगी। हाई-स्पीड इंटरनेट की मदद से अब गांवों के युवाओं को कोडिंग सीखने, फ्रीलांसिंग करने या अपना खुद का टेक-स्टार्टअप शुरू करने के लिए दिल्ली या नोएडा जैसे बड़े शहरों में पलायन नहीं करना पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को आसानी से जोड़ने के लिए सरकार बेहद किफायती दरों पर इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराएगी।

साइबर सिक्योरिटी और स्मार्ट कनेक्टिविटी पर विशेष फोकस

इस प्रोजेक्ट का टारगेट सिर्फ इंटरनेट पहुंचाना ही नहीं है बल्कि गांवों को भविष्य की डिजिटल तकनीकों के लिए तैयार करना है। योजना के तहत सीसीटीवी आधारित सुरक्षा समाधान, साइबर सिक्योरिटी सेवाएं और विभिन्न संस्थानों की डिजिटल कनेक्टिविटी को बेहद मजबूत किया जाएगा। साइबर सुरक्षा, सीसीटीवी और स्मार्ट कनेक्टिविटी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है ताकि ग्रामीण डेटा और परिसर पूरी तरह सुरक्षित रहें।

हिंदुजा समूह की कंपनी है नॉलेज पार्टनर

इस विशाल और महत्वाकांक्षी डिजिटल परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए सरकार ने मजबूत साझेदारी की है। दिग्गज हिंदुजा समूह की ब्रॉडबैंड इकाई वनओटीटी इंटरटेनमेंट लिमिटेड इस पूरे प्रोजेक्ट में नॉलेज पार्टनर और इम्प्लीमेंटेशन एनैबलर के रूप में शामिल है।

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DDA Dwarka Commercial Hub Plan: दिल्ली का अगला ‘गुड़गांव’ बनेगा द्वारका! डीडीए बनाएगा मेगा इकोनॉमिक हब, जानिए क्या है पूरा प्लान

DDA Dwarka Plan: दिल्ली का द्वारका उप-शहर आने वाले समय में राजधानी का सबसे बड़ा बिजनेस और कमर्शियल हॉटस्पॉट बनने जा रहा है। दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने द्वारका को एक प्रमुख आर्थिक और वाणिज्यिक केंद्र के रूप में मजबूत करने के लिए उद्योग जगत के टॉप रिप्रेजेंटेटिव के साथ एक इंटरैक्टिव बैठक की अध्यक्षता की है। इस बैठक के दौरान उपराज्यपाल ने साफ किया कि दिल्ली के दीर्घकालिक आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए शहरी पुनर्विकास, बुनियादी ढांचे के अपग्रेडेशन और योजना सुधारों को लागू करना बेहद जरूरी है। उन्होंने द्वारका में एक स्वच्छ, प्रदूषण मुक्त और लेबर सेंट्रिक इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम की वकालत की है। ऐसा सिस्टम जो लोकल के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा कर सके।

एयरपोर्ट से नजदीकी और बेहतरीन कनेक्टिविटी बनेगी ताकत

एलजी ने कहा रि एशिया की सबसे बड़ी प्लांड सब सिटी में से एक होने की वजह से द्वारका इन्वेस्टमेंट के लिए एक टॉप डेस्टिनेशन के रूप में उभरने के लिए सही स्थिति में है। इसकी कनेक्टिविटी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से काफी आसान है। यहां मजबूत ट्रांसपोर्ट सिस्टम है। एलजी ने स्पष्ट किया कि द्वारका पूरी तरह विकसित हो चुकी है। इस लिहाज से ये कॉमर्स, हॉस्पिटैलिटी, हेल्थकेयर और टेक्नोलॉजी जैसे अलग अलग-अलग क्षेत्रों में निवेश पाने के लिए पूरी तरह से तैयार है।

प्रदूषण मुक्त उद्योगों और रोजगार पर रहेगा मुख्य फोकस

उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने विशेष रूप से जोर दिया कि द्वारका का औद्योगिक विकास पूरी तरह से स्वच्छ, टिकाऊ और गैर-प्रदूषणकारी होना चाहिए। यहां ऐसे उद्योगों से पूरी तरह दूरी बनाई जाएगी जो उप-शहर की पर्यावरणीय गुणवत्ता से समझौता करते हों।

एफएआर (FAR) मानदंडों की होगी समीक्षा, सिंगल-विंडो सिस्टम पर जोर

इस उच्च स्तरीय बैठक में रीयल एस्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, हॉस्पिटैलिटी और हेल्थकेयर सेक्टर के प्रमुख प्रतिनिधियों के साथ-साथ डीडीए के उपाध्यक्ष, दिल्ली सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों और आईटीपीओ (ITPO) के प्रबंध निदेशक ने हिस्सा लिया। उपराज्यपाल ने उद्योग जगत के रचनात्मक सुझावों की सराहना की और कहा कि उभरती शहरी आवश्यकताओं के अनुरूप फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) सहित योजना और विकास मानदंडों की समीक्षा और उन्हें तर्कसंगत बनाने की आवश्यकता है। उद्योग प्रतिनिधियों ने द्वारका और दिल्ली में निवेश के अनुकूल माहौल बनाने के लिए बुनियादी ढांचे में सुधार, अनुसंधान एवं नवाचार सुविधाएं, एक सुव्यवस्थित सिंगल-विंडो क्लीयरेंस मैकेनिज्म और सिंप्लिफाई अप्रूवल्स की व्यवस्था करने का सुझाव दिया।

इसके अलावा नॉलेज-बेस्ड इंडस्ट्रीज, आईटी, आईटीईएस और जीसीसी को प्रोत्साहित करने के साथ यशोभूमि और भारत मंडपम जैसे प्रमुख कन्वेंशन और एग्जीबिशन इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ उठाने पर जोर दिया गया।

TOD पॉलिसी और 5-स्टार होटल

निवेश और विकास को रफ्तार देने के लिए विभिन्न विभागों ने अपनी तैयारियों की जानकारी साझा की। डीडीए के उपाध्यक्ष ने बताया कि भविष्य के निवेश के लिए जमीन उपलब्ध करा दी गई है। हाल ही में उपराज्यपाल के मार्गदर्शन में तैयार की गई ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) पॉलिसी के तह टीओडी समिति पात्र परियोजनाओं के लिए सिंगल-पॉइंट और समयबद्ध मंजूरी की सुविधा प्रदान कर रही है। दिल्ली सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (उद्योग) ने आश्वासन दिया कि द्वारका और दिल्ली में निवेश के लिए बड़ा ईज ऑफ डूइंग बिजनेस सुधार चल रहा है।

इसके तहत एक नई औद्योगिक नीति तैयार की जा रही है और विभागों के बीच मंजूरी प्रक्रियाओं को इंटिग्रेट किया जा रहा है। दिल्ली सरकार के पर्यटन सचिव ने बताया कि दिल्ली की इवनिंग इकोनॉमी को बढ़ावा देने और पर्यटन को आकर्षित करने के लिए अर्बन डेस्टिनेशन डेवलप किए जा रहे हैं। आईटीपीओ (ITPO) के प्रबंध निदेशक ने कहा कि दिल्ली के हॉस्पिटैलिटी इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए फाइव-स्टार होटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर विचार किया जा रहा है।

विकसित दिल्ली की ओर बढ़ते कदम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए उपराज्यपाल ने अंत में दोहराया कि प्रशासन एक पारदर्शी, कुशल और निवेशक-अनुकूल इकोसिस्टम को बढ़ावा देने के लिए पूरी तरह केंद्रित है। यह पहल सतत विकास को गति देगी, बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करेगी और दिल्ली के विकसित दिल्ली बनने के सफर को और मजबूत करेगी।

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यूपी की नई स्टार्टअप पॉलिसी का एलान, स्टार्टअप मासिक भत्ता 17500 रुपए से बढ़कर 20000 रुपए किया गया

उत्तर प्रदेश सरकार ने नई स्टार्टअप पॉलिसी 2026 और नए स्टार्टअप मिशन को मंजूरी दी है। इसके तहत स्टार्टअप्स के मासिक भत्ते से लेकर सीड फंडिंग तक को बढ़ाया गया है। लखनऊ जिले के छोटे से गांव भुलभुलपुर में 10 हजार रुपए की छोटी सी लागत से अंजलि सिंह ने एकेले ही जूट फॉर लाइफ नाम से स्टार्टअप शुरू किया था,जो अब 5 करोड़ के टर्न-ओवर तक पहुंच चुका है। इस सफर में अंजलि ने अपने साथ 250 महिलाओं को रोजगार का मौका भी दिया है। यूपी में ऐसे ही स्टार्टअप्स के लिए माहौल बनाने के मकसद से यूपी सरकार ने नई स्टार्टअप्स पॉलिसी बनाई है।

उत्तर प्रदेश सरकार की नई नीति के तहत स्टार्टअप्स के लिए शुरुआती मदद भत्ते को 17,500 रुपये से बढ़ाकर 20,000 रुपये प्रति माह कर दिया गया है और ये रकम अब 1 साल की बजाय 2 साल तक मिलेगी। इसी के तरह प्रोटोटाइप अनुदान 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 10 लाख रुपये और सीड फंडिंग 7.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 15 लाख रुपये कर दी गई है। विशेष परिस्थितियों में इसे 50 लाख रुपए तक बढ़ाया जा सकेगा।

इसके साथ ही स्वतंत्र स्टार्टअप मिशन का भी गठन किया गया है, जिसकी कमान मुख्य सचिव के पास होगी। इसमें प्रति वर्ष 2 लाख रुपये तक का क्लाउड रिम्बर्समेंट और 1,000 करोड़ रुपये का स्टार्टअप फंड भी रखा गया है। AI और Deep-tech जैसे आधुनिक क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। जूट फॉर लाइफ जैसे स्टार्टअप को सफलता तक पहुंचाने वाली अंजलि मानती हैं कि यूपी सरकार की नई स्टार्ट अप नीति छोटे उद्यमियों के लिए वरदान साबित हो सकती है।

खास बात यह है कि इस नीति में AI,मशीन लर्निंग,रोबोटिक्स और एयरोस्पेस जैसे डीप-टेक क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। इन क्षेत्रों की बड़ी परियोजनाओं को ₹100 करोड़ तक की पेशेंट कैपिटल मिल सकती है। नई नीति के तहत यूपी स्टार्टअप मिशन को एक स्वायत्त संस्था के रूप में मंजूरी दी गई है, जो अब यूपी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन की जगह स्टार्टअप्स से जुड़े कामकाज को संभालेगी और जिसकी अगुवाई मुख्य सचिव करेंगे।

नई नीति में महिला उद्यमियों,दिव्यांगजन,ट्रांसजेंडर उद्यमियों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए विशेष प्रावधान बरकरार रखे गए हैं। पूर्वांचल और बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थापित स्टार्टअप्स को अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलता रहेगा, ताकि राज्य के पिछड़े इलाकों में भी उद्यमिता को बढ़ावा मिल सके।

यह स्टार्टअप नीति राज्य को वन ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी बनाने के लक्ष्य से सीधे जुड़ी हुई है। 2030 के लिए निर्धारत इस लक्ष्य में योगी सरकार स्टार्टअप्स की अहम भूमिका देख रही है।

 

 

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World Population Day 2026: विश्व जनसंख्या दिवस क्यों मनाया जाता है, जानें इतिहास, महत्व और इस साल की थीम

The image conveys a message about realizing the hopes and aspirations of the youth on World Population Day- for both today and the future

World Population Day: हर वर्ष 11 जुलाई को पूरी दुनिया में विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य बढ़ती जनसंख्या, प्रजनन स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, परिवार नियोजन, शिक्षा और सतत विकास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों के प्रति लोगों को जागरूक करना है। तेजी से बढ़ती आबादी का प्रभाव प्राकृतिक संसाधनों, पर्यावरण, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, रोजगार और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ता है। ऐसे में विश्व जनसंख्या दिवस लोगों को जनसंख्या से जुड़े अवसरों और चुनौतियों पर विचार करने का अवसर प्रदान करता है।

 

इस दिवस से जुड़ी तारीख, इतिहास, महत्व और इस साल की खास थीम की पूरी जानकारी यहां नीचे जानें…

 

विश्व जनसंख्या दिवस 2026 की थीम

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) द्वारा हर साल इस दिन के लिए एक विशेष थीम तय की जाती है। वर्ष 2026 के लिए विश्व जनसंख्या दिवस की आधिकारिक थीम 'युवाओं की आशाओं और आकांक्षाओं को साकार करना – आज और भविष्य के लिए' (Realizing the hopes and aspirations of young people – today and for the future) तय की गई है।

 

थीम का मायने: इस साल की थीम पूरी तरह से युवा पीढ़ी पर केंद्रित है। यह इस बात पर जोर देती है कि दुनिया भर के युवाओं को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, रोजगार के अवसर और सही निर्णय लेने के अधिकार दिए जाएं। जब देश की युवा आबादी सशक्त होगी, तभी वैश्विक स्तर पर सतत विकास और जनसंख्या संतुलन की चुनौतियों से निपटा जा सकेगा।

 

क्यों मनाया जाता है यह दिवस?

तेजी से बढ़ती आबादी के कारण दुनिया के सामने कई गंभीर चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। इस दिवस को मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य हैं:

 

जागरूकता बढ़ाना: लोगों को परिवार नियोजन, लैंगिक समानता, मानवाधिकार और मातृ स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना।

 

संसाधनों पर दबाव: बढ़ती जनसंख्या का पर्यावरण, भुखमरी, गरीबी, स्वास्थ्य सेवाओं और पानी व भोजन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर क्या असर पड़ रहा है, इस ओर सरकारों और आम जनता का ध्यान आकर्षित करना।

 

अधिकारों की रक्षा: विशेष रूप से महिलाओं और लड़कियों को उनके प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े फैसले खुद लेने के अधिकार के प्रति सशक्त बनाना।

 

विश्व जनसंख्या दिवस का इतिहास

शुरुआत कब हुई: विश्व जनसंख्या दिवस की स्थापना 1989 में 'संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम' (UNDP) की तत्कालीन गवर्निंग काउंसिल द्वारा की गई थी। इस बार विश्व जनसंख्या दिवस 2026 11 जुलाई, शनिवार को मनाया जाएगा।

 

11 जुलाई को ही क्यों चुना गया: इसके पीछे एक ऐतिहासिक घटना है। 11 जुलाई 1987 को दुनिया की कुल आबादी का आंकड़ा 5 अरब (5 Billion) को पार कर गया था। इस दिन को 'फाइव बिलियन डे' (Five Billion Day) कहा गया। दुनिया की इतनी तेज रफ्तार से बढ़ती आबादी को देखते हुए लोगों को जागरूक करने की जरूरत महसूस हुई और तय किया गया कि हर साल 11 जुलाई को 'विश्व जनसंख्या दिवस' मनाया जाएगा। तथा आधिकारिक तौर पर पहला विश्व जनसंख्या दिवस 11 जुलाई 1990 को 90 से अधिक देशों में मनाया गया था।

 

विश्व जनसंख्या दिवस मनाने का महत्व

वर्तमान में दुनिया की आबादी 8 अरब के आंकड़े को पार कर चुकी है, जिसमें भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बना हुआ है। ऐसे समय में इस दिन का महत्व और अधिक बढ़ जाता है:

 

सतत विकास: यह दिन याद दिलाता है कि यदि जनसंख्या अनियंत्रित ढंग से बढ़ती रही, तो गरीबी उन्मूलन, भुखमरी और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करना नामुमकिन हो जाएगा।

 

नीति निर्धारण: यह सरकारों और नीति निर्माताओं को डेटा के आधार पर स्वास्थ्य, रोजगार और शहरीकरण की बेहतर योजनाएं बनाने के लिए एक मंच प्रदान करता है।

 

स्वास्थ्य और सुरक्षा: अवांछित गर्भधारण को रोकने और सुरक्षित मातृत्व के माध्यम से मातृ-शिशु मृत्यु दर को कम करने में यह वैश्विक अभियान बड़ी भूमिका निभाता है।

 

विश्व जनसंख्या दिवस- FAQs

 

1. विश्व जनसंख्या दिवस कब मनाया जाता है?

हर वर्ष 11 जुलाई को।

 

2. विश्व जनसंख्या दिवस की शुरुआत कब हुई?

सन् 1989 में इस दिन की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा की गई थी।

 

3. विश्व जनसंख्या दिवस का मुख्य उद्देश्य क्या है?

जनसंख्या से जुड़ी चुनौतियों का समाधान खोजते हुए प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार, स्वास्थ्य और बेहतर जीवन की दिशा में जागरूकता फैलाना।

 

4. विश्व जनसंख्या दिवस क्यों मनाया जाता है?

परिवार नियोजन, जनसंख्या, प्रजनन स्वास्थ्य, शिक्षा और सतत विकास के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए।

 

5. विश्व जनसंख्या दिवस 2026 की थीम क्या है?

युवाओं की आशाओं और आकांक्षाओं को साकार करना – आज और भविष्य के लिए। (Realizing the hopes and aspirations of young people – today and for the future) है। 

 

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अमेरिका में H-1B वीजा के नियम सख्त हो सकते हैं:विश्वविद्यालयों की छूट सीमित हो सकती है; ग्रीन कार्ड से जुड़े नए नियम आना संभव

अमेरिका का ट्रम्प प्रशासन नए इमिग्रेशन नियमों की तैयारी कर रहा है, जिससे एच-1बी वीजा, रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड और छात्र वीसा की प्रक्रिया पहले से अधिक सख्त हो सकती है। प्रस्तावित बदलाव लागू होने पर भारतीय पेशेवरों, छात्रों और अमेरिकी कंपनियों के लिए नियमों का पालन करना अधिक कठिन और महंगा हो सकता है। ये प्रस्ताव अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग, श्रम विभाग और विदेश विभाग के एकीकृत रेगुलेटरी एजेंडा में शामिल हैं। इसके लिए अगस्त में बदलाव का प्रस्ताव आ सकता है। अगस्त में आ सकता है प्रस्ताव एच-1बी: विश्वविद्यालयों और कुछ शोध संस्थानों को मिलने वाली एच-1बी कैप छूट सीमित की जा सकती है। कई ऐसे प्रस्ताव हैं जिनसे कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। ग्रीन कार्ड: एच-1बी व ग्रीन कार्ड के लिए लागू न्यूनतम वेतन बढ़ाने का प्रस्ताव है। साथ ही भर्ती नियमों, अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी से जुड़े प्रावधानों और भेदभाव-रोधी उपायों में बदलाव प्रस्तावित हैं। छात्र वीसा: प्रस्ताव के तहत विदेशी छात्रों के लिए मौजूदा ‘ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस’ व्यवस्था खत्म कर निश्चित अवधि का प्रवास तय किया जा सकता है। जयशंकर ने भी उठाया था मुद्दा विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इसी साल मई में यह मामला अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के सामने उठाया था। रूबियो ने माना था कि नए इमिग्रेशन सिस्टम में बदलाव के दौरान कुछ दिक्कतें और तनाव हो सकते हैं। हालांकि, रूबियो ने कहा था कि अमेरिका इमिग्रेशन सिस्टम को ज्यादा प्रभावी बनाने की कोशिश कर रहा है और लंबे समय में इसका फायदा सभी पक्षों को मिलेगा। रूबियो ने यह भी कहा था कि यह कदम खासतौर पर भारत को निशाना बनाकर नहीं उठाया गया। उनके मुताबिक अमेरिका पिछले कुछ सालों में बड़े पैमाने पर अवैध प्रवासियों की समस्या से जूझ रहा है। 2 करोड़ से ज्यादा लोग गैरकानूनी तरीके से अमेरिका में दाखिल हुए और उसी चुनौती से निपटने के लिए यह बदलाव किए जा रहे हैं। —————————————– ये खबर भी पढ़ें… H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर वसूलने का आदेश रद्द:कोर्ट बोला- ट्रम्प फीस के नाम पर टैक्स नहीं ले सकते; भारतीयों को सबसे ज्यादा राहत अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने 9 जून को ट्रम्प के H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर (करीब 95 लाख रुपए) फीस वसूलने वाली नीति को रद्द कर दिया था। बॉस्टन कोर्ट ने कहा कि यह फीस नहीं बल्कि एक टैक्स है और इसे लागू करने के लिए राष्ट्रपति नहीं, बल्कि संसद की मंजूरी जरूरी थी। पूरी खबर पढ़ें…

अमेरिका में H-1B वीजा के नियम सख्त हो सकते हैं:विश्वविद्यालयों की छूट सीमित हो सकती है; ग्रीन कार्ड से जुड़े नए नियम आना संभव

अमेरिका का ट्रम्प प्रशासन नए इमिग्रेशन नियमों की तैयारी कर रहा है, जिससे एच-1बी वीजा, रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड और छात्र वीसा की प्रक्रिया पहले से अधिक सख्त हो सकती है। प्रस्तावित बदलाव लागू होने पर भारतीय पेशेवरों, छात्रों और अमेरिकी कंपनियों के लिए नियमों का पालन करना अधिक कठिन और महंगा हो सकता है। ये प्रस्ताव अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग, श्रम विभाग और विदेश विभाग के एकीकृत रेगुलेटरी एजेंडा में शामिल हैं। इसके लिए अगस्त में बदलाव का प्रस्ताव आ सकता है। अगस्त में आ सकता है प्रस्ताव एच-1बी: विश्वविद्यालयों और कुछ शोध संस्थानों को मिलने वाली एच-1बी कैप छूट सीमित की जा सकती है। कई ऐसे प्रस्ताव हैं जिनसे कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। ग्रीन कार्ड: एच-1बी व ग्रीन कार्ड के लिए लागू न्यूनतम वेतन बढ़ाने का प्रस्ताव है। साथ ही भर्ती नियमों, अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी से जुड़े प्रावधानों और भेदभाव-रोधी उपायों में बदलाव प्रस्तावित हैं। छात्र वीसा: प्रस्ताव के तहत विदेशी छात्रों के लिए मौजूदा ‘ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस’ व्यवस्था खत्म कर निश्चित अवधि का प्रवास तय किया जा सकता है। जयशंकर ने भी उठाया था मुद्दा विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इसी साल मई में यह मामला अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के सामने उठाया था। रूबियो ने माना था कि नए इमिग्रेशन सिस्टम में बदलाव के दौरान कुछ दिक्कतें और तनाव हो सकते हैं। हालांकि, रूबियो ने कहा था कि अमेरिका इमिग्रेशन सिस्टम को ज्यादा प्रभावी बनाने की कोशिश कर रहा है और लंबे समय में इसका फायदा सभी पक्षों को मिलेगा। रूबियो ने यह भी कहा था कि यह कदम खासतौर पर भारत को निशाना बनाकर नहीं उठाया गया। उनके मुताबिक अमेरिका पिछले कुछ सालों में बड़े पैमाने पर अवैध प्रवासियों की समस्या से जूझ रहा है। 2 करोड़ से ज्यादा लोग गैरकानूनी तरीके से अमेरिका में दाखिल हुए और उसी चुनौती से निपटने के लिए यह बदलाव किए जा रहे हैं। —————————————– ये खबर भी पढ़ें… H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर वसूलने का आदेश रद्द:कोर्ट बोला- ट्रम्प फीस के नाम पर टैक्स नहीं ले सकते; भारतीयों को सबसे ज्यादा राहत अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने 9 जून को ट्रम्प के H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर (करीब 95 लाख रुपए) फीस वसूलने वाली नीति को रद्द कर दिया था। बॉस्टन कोर्ट ने कहा कि यह फीस नहीं बल्कि एक टैक्स है और इसे लागू करने के लिए राष्ट्रपति नहीं, बल्कि संसद की मंजूरी जरूरी थी। पूरी खबर पढ़ें…