सोना खरीदने की क्या जरूरत? इन 5 सरकारी और प्राइवेट Gold ETF ने 3 साल में दिया 34% तक का छप्परफाड़ रिटर्न

Top Performing Gold ETFs in India: भारतीय बाजारों में सोने को हमेशा से निवेश का सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद जरिया माना गया है। लेकिन अब लोग फिजिकल सोना यानी गहने या सिक्के खरीदने के बजाय गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) में पैसा लगाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। इसमें न तो मेकिंग चार्ज की टेंशन होती है, न चोरी होने का डर और रिटर्न भी दमदार मिलता है।

हाल ही में आए म्यूचुअल फंड डेटा (ACE MF) के मुताबिक, देश के बड़े गोल्ड ईटीएफ ने पिछले 3 सालों में निवेशकों को 34% तक का सालाना कंपाउंडेड रिटर्न (CAGR) दिया है। इस लिस्ट में UTI Gold ETF सबसे आगे रहा है। आइए जानते हैं कि गोल्ड ईटीएफ क्या है और इस समय रिटर्न के मामले में कौन से टॉप 5 फंड्स धमाल मचा रहे हैं।

क्या होता है Gold ETF?

गोल्ड ईटीएफ एक तरह का म्यूचुअल फंड प्रोडक्ट ही होता है, जो शेयर बाजार में लिस्टेड होता है। इसे आप अपने डीमैट अकाउंट के जरिए ठीक वैसे ही खरीद और बेच सकते हैं, जैसे किसी कंपनी के शेयर को।

12 लाख रुपये सालाना सैलरी से ₹5 करोड़ का रिटायरमेंट फंड जुटाने का पूरा गणित, ये बिल्कुल पॉसिबल है!

इसका प्रदर्शन सीधे तौर पर घरेलू बाजार में सोने की वास्तविक कीमतों को ट्रैक करता है। जब सोने के दाम बढ़ते हैं, तो आपके गोल्ड ईटीएफ की वैल्यू भी बढ़ जाती है। इसमें निवेश करने के लिए आपको लिक्विडिटी यानी आसानी से बेचने की सुविधा और कम ट्रैकिंग डिफरेंस का फायदा मिलता है।

3 साल के रिटर्न में UTI Gold ETF रहा नंबर-1

2 जुलाई के लेटेस्ट डेटा के मुताबिक, कम से कम ₹1500 करोड़ से अधिक के एसेट अंडर मैनेजमेंट वाले फंड्स की कैटेगरी में UTI Gold ETF ने सबसे शानदार प्रदर्शन किया है।

बेंचमार्क को पछाड़ा: 3 साल की अवधि में जहां इसके बेंचमार्क ने महज 1.7% का रिटर्न दिया, वहीं यूटीआई गोल्ड ईटीएफ ने 34% का सालाना रिटर्न (CAGR) देकर अपने बेंचमार्क को 32.2% से मात दी।

1 साल का रिटर्न: 1 साल की अवधि में भी यह फंड टॉप पर रहा, जिसने निवेशकों को 45.6% का बंपर रिटर्न दिया, जबकि इसका बेंचमार्क 10.1% ही बढ़ सका।

सबसे बड़ा फंड: हालांकि, साइज (फंड साइज) के मामले में ICICI Pru Gold ETF सबसे बड़ा है, जिसका कुल कॉर्पस ₹27578.2 करोड़ है।

Top 5 Gold ETFs: रिटर्न और फंड साइज का पूरा रिपोर्ट कार्ड

अगर आप भी सोने में डिजिटल तरीके से निवेश करने की सोच रहे हैं, तो इन टॉप 5 स्कीम्स के प्रदर्शन पर नजर डाल सकते हैं:

Top 5 Gold ETFs: रिटर्न और फंड साइज का पूरा रिपोर्ट कार्ड

(नोट: इस रैंकिंग में केवल उन्हीं स्कीमों को शामिल किया गया है जिनका AUM ₹1500 करोड़ से ज्यादा है। 1 महीने और 3 महीने की छोटी अवधि में मीरा एसेट गोल्ड ईटीएफ का प्रदर्शन अन्य के मुकाबले थोड़ा बेहतर रहा है, जहां गिरावट क्रमशः -8.6% और -2.5% तक सीमित रही।)

निवेशकों के लिए काम की सलाह

म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि अलग-अलग टाइम फ्रेम में फंड्स की रैंकिंग बदल सकती है। इसलिए हेडलाइन या 3 साल के लंबे रिटर्न को देखने के साथ-साथ शॉर्ट-टर्म (1 महीना, 3 महीना) और मीडियम-टर्म के प्रदर्शन को भी समझना जरूरी है। सोने में निवेश हमेशा पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई करने और महंगाई से सुरक्षा पाने के लिए एक बेहतरीन विकल्प माना जाता है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Govt Cooperative Insurance Company: देश में जल्द लॉन्च होगी सरकारी सहकारी जीवन बीमा कंपनी, जानिए किसे होगा फायदा

Cooperative Life Insurance Company Explainer: देश के करोड़ों आम लोगों, किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए इंश्योरेंस सेक्टर से जुड़ा एक बहुत बड़ा अपडेट आया है। केंद्र सरकार जल्द ही सहकारी क्षेत्र में एक नई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी शुरू करने जा रही है।

इस ऐतिहासिक कदम का उद्देश्य देश के सुदूर इलाकों, छोटे शहरों और गांवों तक किफायती जीवन बीमा की पहुंच को बढ़ाना है। आइए आपको बताते हैं कि सरकार की इस नई पहल कैसे काम करेगी और इससे सीधे आपको या आम पॉलिसीधारकों को क्या-क्या फायदे होने वाले हैं।

सहकारी जीवन बीमा कंपनी क्या है और इसकी घोषणा क्यों हुई?

केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह ने सहकारिता मंत्रालय के पांचवें स्थापना दिवस के मौके पर इस बड़ी योजना का ऐलान किया। अभी तक देश के सहकारिता आंदोलन का दायरा मुख्य रूप से डेयरी, चीनी, बीज और खाद जैसे पारंपरिक क्षेत्रों तक ही सीमित था।

अब सरकार इस पूरे इकोसिस्टम को वित्तीय सेवाओं से जोड़ने जा रही है। सरकार का मानना है कि सहकारी मॉडल के जरिए इंश्योरेंस बिजनेस में उतरने से देश के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी जीवन बीमा सुरक्षा चक्र के दायरे में लाया जा सकेगा, वह भी बेहद किफायती प्रीमियम पर।

फर्टिलाइजर सेक्टर की दिग्गज सहकारी संस्था ‘इफको’ (IFFCO) पहले से ही एक जापानी पार्टनर के साथ मिलकर जनरल इंश्योरेंस के क्षेत्र में काम कर रही है। अब इसी सफलता को दोहराते हुए ‘लाइफ इंश्योरेंस’ के लिए एक पूरी तरह से नई सहकारी कंपनी खड़ी की जाएगी।

किसे और कैसे होगा इसका सीधा फायदा?

भारत में इस समय लगभग 8.5 लाख सहकारी समितियां हैं, जिनसे 30 करोड़ से अधिक सदस्य जुड़े हुए हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा सहकारी नेटवर्क है। नई बीमा कंपनी से इन लोगों को निम्नलिखित फायदे मिलेंगे:

कम प्रीमियम पर लाइफ इंश्योरेंस: सहकारी कंपनियों का मुख्य उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि अपने सदस्यों को सेवा देना होता है। इसलिए, प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनियों के मुकाबले यहां लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी का प्रीमियम काफी कम होने की उम्मीद है।

गांवों और किसानों को सीधा लाभ: देश के करोड़ों किसान जो प्राइमरी एग्रीकल्चर कोऑपरेटिव सोसाइटीज (PACS) से जुड़े हैं, वे अब सीधे अपने नजदीकी सहकारी केंद्र से ही जीवन बीमा पॉलिसी खरीद और क्लेम कर सकेंगे। उन्हें बड़े शहरों या बैंकों के चक्कर नहीं काटने होंगे।

भरोसा और पारदर्शिता: सरकारी देखरेख और राष्ट्रीय डेटाबेस के जरिए संचालित होने के कारण इस कंपनी में आम लोगों का भरोसा निजी कंपनियों से कहीं ज्यादा मजबूत होगा।

डिजिटल बदलाव: अब 50,000 ई-पैक से मिलेगी मदद

इस वित्तीय समावेशन को जमीन पर उतारने के लिए सरकार बुनियादी ढांचे को पूरी तरह डिजिटल बना रही है। इसके तहत देश की 50,000 प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (PACS) को अपग्रेड करके e-PACS में बदल दिया गया है।

भविष्य में ये डिजिटल e-PACS केंद्र केवल खाद-बीज देने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) की तरह काम करेंगे, जहां से ग्रामीण लोग अपनी जीवन बीमा पॉलिसी का प्रीमियम जमा कर सकेंगे और क्लेम की प्रक्रिया भी पूरी कर सकेंगे।

सहकारी क्षेत्र से जुड़े कुछ अन्य बड़े ऐलान

बीमा कंपनी के अलावा, सरकार ने इस सेक्टर को मजबूत करने के लिए कई और बड़ी घोषणाएं की हैं:

  1. भरत टैक्सी: सहकारी क्षेत्र की इस टैक्सी पहल को अगले दो वर्षों में देश के 500 शहरों तक बढ़ाया जाएगा।
  2. त्रिभुवन सहकारी यूनिवर्सिटी: सहकारिता के क्षेत्र में प्रोफेशनल्स और मैनपावर की कमी को दूर करने के लिए आनंद (गुजरात) में ‘Tribhuvan Sahkari University’ की स्थापना की जा रही है।
  3. अनाज भंडारण क्षमता: देश में अनाज की बर्बादी रोकने के लिए 75,000 टन क्षमता वाले 135 गोदामों को ट्रांसफर किया गया है और 85 नए गोदामों का उद्घाटन हुआ है।
  4. सहकार वन प्रोजेक्ट: अमूल और NCCF मिलकर पर्यावरण को बढ़ावा देने के लिए ‘सहकार वन’ परियोजनाओं पर काम शुरू कर रहे हैं।

कुल मिलाकर साल 2047 तक भारत को ‘विकसित भारत’ बनाने के लक्ष्य में यह नई सहकारी जीवन बीमा कंपनी मील का पत्थर साबित हो सकती है। आम आदमी के लिहाज से देखें तो आने वाले समय में आपको लाइफ इंश्योरेंस के लिए एक नया, सुरक्षित और बेहद सस्ता सरकारी विकल्प मिलने जा रहा है।

Investment Tips: ज्यादा रिटर्न के चक्कर में कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलती? जानिए निवेश का वो सच जो कोई नहीं बताता

Right Investment Fund vs High Savings Rate: जब लोग निवेश करने का मन बनाते हैं, तो वे अपनी पूरी ऊर्जा और समय कुछ खास सवालों के जवाब ढूंढने में लगा देते हैं। ‘लार्ज कैप फंड बेहतर रहेगा या फ्लेक्सी कैप?’, ‘डायरेक्ट प्लान चुनें या रेगुलर?’, ‘किस म्यूचुअल फंड का 3 साल का रिकॉर्ड सबसे शानदार है?’ लोग घंटों रिसर्च और बहस करते हैं।

लेकिन, वे अक्सर उस इकलौते सवाल को पूरी तरह भूल जाते हैं जो असल में उनकी अमीरी का फैसला करने वाला है ‘आप हर महीने कितना पैसा बचाकर निवेश करने वाले हैं?’

फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स इसे ‘होशियारी के भेष में काम टालना’ कहते हैं। सही फंड चुनना मजेदार और अंतहीन बहस का विषय हो सकता है, लेकिन हर महीने जेब से ज्यादा पैसा निकालकर निवेश करना थोड़ा दर्दनाक और उबाऊ होता है। इसलिए दिमाग बड़े और जरूरी सवाल को छोड़कर छोटे सवालों में उलझ जाता है। आइए समझते हैं कि निवेश में ‘फंड’ से ज्यादा ‘रकम’ क्यों मायने रखती है।

इस गणित से समझें: बेहतर रिटर्न या ज्यादा बचत, कौन जीतेगा?

मान लेते हैं दो दोस्त हैं- इन्वेस्टर ‘A’ और इन्वेस्टर ‘B’है। दोनों बिल्कुल शुरुआत से 10 साल के लिए निवेश करना शुरू करते हैं:

इन्वेस्टर ‘A’ (ज्यादा बचत, साधारण रिटर्न): यह हर महीने ₹20000 की बड़ी बचत करता है और किसी बहुत ही साधारण या सुरक्षित फंड में निवेश करता है, जहां इसे सालाना 8% का रिटर्न मिलता है।

इन्वेस्टर ‘B’ (कम बचत, बेहतरीन रिटर्न): यह बाजार की पूरी समझ रखता है, बेहतरीन रिसर्च करके बेस्ट फंड चुनता है और सालाना 14% का शानदार रिटर्न कमाता है। लेकिन अपनी इस काबिलियत के घमंड में वह हर महीने सिर्फ ₹12000 ही निवेश करता है।

10 साल बाद का नतीजा

10 साल पूरे होने पर साधारण रिटर्न (8%) वाले इन्वेस्टर ‘A’ के पास कुल ₹36 लाख का फंड जमा होगा। वहीं, अपनी काबिलियत से 14% का बंपर रिटर्न कमाने के बावजूद इन्वेस्टर ‘B’ के पास केवल ₹32 लाख ही जमा हो पाएंगे।

कम रिटर्न के बावजूद क्यों जीत गई ‘ज्यादा बचत’?

अगर आंकड़ों को करीब से देखें, तो इन्वेस्टर ‘B’ इस बात में सही था कि उसने मार्केट से ज्यादा मुनाफा कमाया। मार्केट ने उसे ₹17 लाख का रिटर्न दिया, जबकि इन्वेस्टर ‘A’ को सिर्फ ₹13 लाख का रिटर्न मिला। इन्वेस्टर ‘B’ निवेश की रेस में तो जीत गया, लेकिन उसने अपनी जेब से इतना कम पैसा लगाया था कि उसका 6% का एक्स्ट्रा रिटर्न भी ₹8000 प्रति माह की कम बचत के नुकसान की भरपाई नहीं कर पाया।

शुरुआती 10 सालों में आपकी जेब का पैसा करता है ‘हेवी लिफ्टिंग’

शुरुआत के सालों में ऐसा क्यों होता है? वजह साफ है शुरुआत में आपका कुल फंड छोटा होता है। जब फंड छोटा होगा, तो उस पर मिलने वाला रिटर्न रुपयों के मामले में हमेशा कम ही रहेगा, भले ही आपका रिटर्न प्रतिशत कितना भी ऊंचा क्यों न हो।शुरुआती दशक में आपके फंड को बड़ा बनाने का असली काम वह पैसा करता है जो आप हर महीने अपनी जेब से जोड़ रहे हैं।

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रिटर्न का असली खेल तो बहुत बाद में शुरू होता है, जब आपका बेस बहुत बड़ा हो जाता है। लेकिन तब तक ज्यादा बचत करने वाले का फंड इतना आगे निकल चुका होता है कि बेस्ट फंड चुनने वाला कभी उसकी बराबरी नहीं कर पाता।

विडंबना यही है कि ज्यादातर लोग फंड चुनने पर तब सबसे ज्यादा सिर खपाते हैं जब उसकी अहमियत सबसे कम होती है (शुरुआत में), और जब इसकी असल जरूरत होती है, तब तक वे निवेश में दिलचस्पी खो देते हैं।

नए निवेशकों के लिए क्या है सही तरीका?

अगर आप निवेश की शुरुआत कर रहे हैं, तो एक्सपर्ट्स के मुताबिक आपको इस क्रम का पालन करना चाहिए:

  1. अपनी बचत की क्षमता तय करें: पहले यह देखें कि आप हर महीने कितना बचा सकते हैं। फिर उस रकम को अपनी आरामदायक स्थिति से थोड़ा और ऊपर खींचें यानी जितना हो सके ज्यादा बचाएं।
  2. फंड चुनने पर बाद में सोचें: जब निवेश की रकम तय हो जाए, तब फंड्स पर ध्यान दें। निवेश को बहुत सीधा, साधारण और उबाऊ रखें। जैसे- किसी अच्छे इंडेक्स या फ्लेक्सी कैप फंड में डाल दें।
  3. समय को अपना काम करने दें: एक बार निवेश शुरू करने के बाद बार-बार पोर्टफोलियो को न छुएं, कंपाउंडिंग को अपना जादू दिखाने दें।

वैसे इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप कहीं भी लापरवाही से पैसा लगा दें। अगर आप पैसा सिर्फ सेविंग्स अकाउंट में छोड़ देंगे, तो महंगाई आपके पैसे को खा जाएगी। वहीं अगर आप बिना सोचे-समझे क्रिप्टो या F&O जैसे सट्टेबाजी वाले जुए में पड़ गए, तो कोई भी बचत दर आपको बर्बाद होने से नहीं बचा सकती।

लेकिन अगर आपके विकल्प समझदारी भरे और सुरक्षित हैं, तो इस बात पर माथापच्ची करना बंद कर दीजिए कि कौन सा फंड बेस्ट है। ज्यादा से ज्यादा बचाएं, साधारण फंड चुनें और बार-बार चिंता करना छोड़ दें।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

ITR Filing 2026: ITR भरने में हो गई गलती? बिना किसी जुर्माने के मिलता है रिटर्न सुधारने का मौका, जानें पूरी डिटेल

How Many Times Can We Revise ITR Form: इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करते समय सही फॉर्म का चुनाव करना सबसे जरूरी स्टेप है। अगर आपने गलती से गलत आईटीआर फॉर्म चुन लिया है, तो आपकी रिटर्न डिफेक्टिव या इनवैलिड घोषित हो सकती है। इससे न केवल आपका रिफंड अटक सकता है, बल्कि टैक्स विभाग का नोटिस भी आ सकता है।

टैक्स एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर आपसे फॉर्म चुनने में कोई गलती हो गई है, तो आयकर विभाग के नोटिस का इंतजार करने के बजाय खुद ही उसे जल्द से जल्द सुधार लें। आइए समझते हैं कि गलत फॉर्म को कैसे सुधारा जा सकता है, कितनी बार बदलाव की अनुमति है और बजट 2026 में समय-सीमा को लेकर क्या बड़ा बदलाव हुआ है।

क्या गलत आईटीआर फॉर्म को सुधारा जा सकता है?

हां, बिल्कुल सुधारा जा सकता है। अगर आपने अपनी ओरिजिनल रिटर्न फाइल और वेरिफाई कर दी है, तो आयकर अधिनियम की धारा 139(5) के तहत आप ‘रिवाइज्ड रिटर्न’ दाखिल करके अपनी गलती सुधार सकते हैं।

मुंबई के चार्टर्ड अकाउंटेंट प्रवीन काकड़े बताते हैं, ‘कानूनन टैक्सपेयर्स रिवाइज्ड रिटर्न के जरिए अपना आईटीआर फॉर्म बदल सकते हैं। रिवाइज्ड रिटर्न पूरी तरह से ओरिजिनल रिटर्न की जगह ले लेती है। उदाहरण के लिए, अगर किसी को कैपिटल गेंस था जिसके लिए ITR-2 भरना था, लेकिन उसने गलती से ITR-1 भर दिया, तो वह सही फॉर्म चुनकर रिवाइज्ड रिटर्न भर सकता है।’

CA श्रेया गुप्ता गोयल के मुताबिक, अगर विभाग को पहले ही गलती का पता चल जाता है और वह धारा 139(9) के तहत डिफेक्टिव रिटर्न का नोटिस जारी कर देता है, तो आपको तय समय के भीतर उसका जवाब देना होगा। अगर आप नोटिस को नजरअंदाज करते हैं, तो मान लिया जाएगा कि आपने रिटर्न फाइल ही नहीं की थी।

कितनी बार रिवाइज कर सकते हैं अपना ITR?

इनकम टैक्स एक्ट में इस बात पर कोई पाबंदी नहीं है कि आप कितनी बार अपनी रिटर्न को रिवाइज कर सकते हैं। अगर आपको बार-बार अपनी गलतियों का पता चलता है, तो आप तय समय-सीमा के भीतर कितनी भी बार रिवाइज्ड आईटीआर फाइल कर सकते हैं।

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वैसे भले ही रिवाइज करने की कोई लिमिट न हो, लेकिन सीए प्रवीन काकड़े सलाह देते हैं कि बार-बार रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल करने से बचना चाहिए। सभी सुधारों को एक ही बार में ठीक से चेक करके एक फाइनल रिवाइज्ड रिटर्न भरना बेहतर होता है, क्योंकि बार-बार रिवाइज करने से आपका केस टैक्स विभाग की नजरों में आ सकता है।

बजट 2026 में बढ़ गई डेडलाइन, लेकिन लगेगा जुर्माना!

बजट 2026 में रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल करने की समय-सीमा को लेकर एक बहुत बड़ा बदलाव किया गया है, जिसे जानना बेहद जरूरी है:

विंडो को बढ़ाया गया: एसेसमेंट ईयर (AY 2026-27) के लिए रिवाइज्ड रिटर्न भरने की आखिरी तारीख को 31 दिसंबर से बढ़ाकर सीधे 31 मार्च 2027 कर दिया गया है। यानी अब आपको सुधार के लिए 3 महीने का अतिरिक्त समय मिलेगा।

31 दिसंबर 2026 तक फ्री: अगर आप अपनी रिटर्न में कोई भी सुधार 31 दिसंबर 2026 या उससे पहले कर लेते हैं, तो आपको कोई अतिरिक्त फीस या पेनल्टी नहीं देनी होगी।

1 जनवरी के बाद ₹5000 की फीस: अगर आप इस बढ़ी हुई विंडो का फायदा उठाते हुए 1 जनवरी 2027 से 31 मार्च 2027 के बीच रिवाइज्ड आईटीआर भरते हैं, तो आपको ₹5000 की फीस देनी होगी। हालांकि, अगर आपकी कुल आय ₹5 लाख से कम है, तो यह फीस ₹1000 होगी।

गलती न सुधारने पर क्या होगा नुकसान?

अगर आप गलत फॉर्म को समय रहते नहीं सुधारते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं:

  1. अटक जाएगा रिफंड: फॉर्म गलत होने पर टैक्स रिफंड की प्रक्रिया रोक दी जाएगी।
  2. लॉस कैरी फॉरवर्ड नहीं होगा: आप कैपिटल लॉस या बिजनेस लॉस को अगले सालों के लिए कैरी फॉरवर्ड नहीं कर पाएंगे।
  3. ITR-U का आखिरी विकल्प: एक बार जब 31 मार्च की रिवाइज्ड विंडो भी बंद हो जाएगी, तो आपके पास केवल अपडेटेड रिटर्न (ITR-U) भरने का रास्ता बचेगा, जिसमें आपको भारी ब्याज के साथ अतिरिक्त पेनल्टी टैक्स भी चुकाना पड़ेगा।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Personal Loan: पर्सनल लोन लेने की सोच रहे हैं? अप्लाई करने से पहले इन 6 बातों को नहीं जाना, तो भुगतना पड़ेगा भारी नुकसान

Personal Loan Checklist Before Applying: जब अचानक पैसों की जरूरत पड़ती है, तो पर्सनल लोन सबसे आसान और तुरंत मिलने वाला जरिया नजर आता है। आजकल बैंक और डिजिटल लेंडर्स मिनटों में इंस्टेंट अप्रूवल और बिना किसी खास कागजी कार्रवाई के लोन ऑफर कर देते हैं। इस चक्कर में कई बार लोग बिना सोचे-समझे पहला ही ऑफर स्वीकार कर लेते हैं।

लेकिन पर्सनल लोन एक अनसिक्योर्ड लोन होता है, जिसकी ब्याज दरें काफी ऊंची होती हैं। इसलिए लोन के लिए हां कहने से पहले आपको इसकी कुल लागत, रीपेमेंट की शर्तों और अपनी मंथली ईएमआई (EMI) के गणित को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। आइए जानते हैं वो 6 जरूरी बातें, जिन्हें लोन लेने से पहले चेक करना बेहद जरूरी है।

1. लोन लेने का असली मकसद क्या है?

लोन अप्लाई करने से पहले खुद से यह सवाल जरूर पूछें कि आपको इन पैसों की जरूरत क्यों है? अगर आप किसी मेडिकल इमरजेंसी, बच्चों की पढ़ाई या बहुत जरूरी काम के लिए लोन ले रहे हैं, तो यह समझ आता है। लेकिन अगर आप सिर्फ अपनी लग्जरी, महंगे गैजेट्स खरीदने या घूमने-फिरने के लिए पर्सनल लोन ले रहे हैं, तो यह आगे चलकर आपकी जेब पर भारी वित्तीय तनाव पैदा कर सकता है।

2. सिर्फ ब्याज दर न देखें, कुल लागत समझें

ज्यादातर लोग पर्सनल लोन लेते समय सिर्फ ब्याज दर की तुलना करते हैं। हालांकि कम ब्याज दर जरूरी है, लेकिन यह लोन की कुल लागत का सिर्फ एक हिस्सा है। आपको लोन लेते समय इन छिपे हुए खर्चों को भी देखना चाहिए:

  1. प्रोसेसिंग फीस: यह लोन अमाउंट का 1% से 3% तक हो सकती है।
  2. फोरक्लोजर या प्री-पेमेंट चार्ज: समय से पहले लोन बंद करने पर लगने वाली पेनल्टी।
  3. लेट पेमेंट फीस: ईएमआई बाउंस होने पर लगने वाला भारी जुर्माना।

ये सभी चार्जेस मिलकर आपके लोन को काफी महंगा बना देते हैं।

3. अपनी रीपेमेंट क्षमता का आकलन करें

कोई लोन आज आपकी सैलरी के हिसाब से भले ही किफायती लग रहा हो, लेकिन भविष्य में वित्तीय उतार-चढ़ाव के कारण उसकी ईएमआई चुकाना भारी पड़ सकता है। फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, आपकी कुल मंथली इनकम का 50% से अधिक हिस्सा सभी लोन की ईएमआई चुकाने में नहीं जाना चाहिए। अपनी क्षमता से अधिक कर्ज लेना आपको डिफॉल्टर बना सकता है और मानसिक तनाव बढ़ा सकता है।

4. अपना क्रेडिट स्कोर जरूर जांचें

पर्सनल लोन अप्रूवल और उसकी ब्याज दरें काफी हद तक आपके क्रेडिट स्कोर पर निर्भर करती हैं। लोन अप्लाई करने से पहले अपना सिबिल स्कोर मुफ्त में ऑनलाइन जरूर चेक करें। अगर आपका स्कोर 750 या उससे ऊपर है, तो आप बैंकों से कम ब्याज दरों और बेहतर शर्तों पर लोन के लिए मोलभाव कर सकते हैं। पहले से स्कोर चेक करने पर अगर उसमें कोई गड़बड़ी दिखती है, तो आप उसे समय रहते ठीक भी करवा सकते हैं।

5. लोन की अवधि को समझदारी से चुनें

लोन चुकाने की अवधि का सीधा असर आपकी ईएमआई और कुल ब्याज पर पड़ता है:

लंबी अवधि: इसमें आपकी हर महीने की ईएमआई तो छोटी हो जाएगी, लेकिन आपको लंबे समय तक ब्याज चुकाना पड़ेगा, जिससे लोन की कुल लागत बहुत बढ़ जाएगी।

कम अवधि: इसमें हर महीने जाने वाली ईएमआई बड़ी होगी, लेकिन आप जल्दी कर्जमुक्त हो जाएंगे और आपकी जेब से ब्याज के रूप में बहुत कम पैसा जाएगा। अपनी मंथली इनकम के बजट के हिसाब से ही सही अवधि का चुनाव करें।

6. लोन एग्रीमेंट के ‘नियम व शर्तें’ ध्यान से पढ़ें

लोन एग्रीमेंट के बारीक अक्षरों में लिखे नियम और शर्तों को पढ़े बिना कभी भी हस्ताक्षर या डिजिटल सबमिट न करें। इसमें लोन रीपेमेंट के नियम, पेनल्टी क्लॉज और छिपे हुए नियम लिखे होते हैं। एग्रीमेंट को अच्छी तरह समझ लेने से भविष्य में किसी भी तरह के धोखे या पछतावे से बचा जा सकता है।

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Mutual Fund SIP SWP Calculator: रिटायरमेंट के बाद ठाठ से जिंदगी जीना और हर महीने लाखों की पेंशन पाना कोई मुश्किल काम नहीं है, बस आपको निवेश का सही और स्मार्ट तरीका पता होना चाहिए। आम निवेशक एक तय रकम की एसआईपी (SIP) शुरू करके उसे सालों-साल चलाते हैं, जिससे वे एक अच्छा फंड तो बना लेते हैं, लेकिन ‘स्मार्ट निवेशक’ अपनी बढ़ती आमदनी के साथ हर साल अपने निवेश को भी बढ़ाते हैं।

अगर आप 30 साल की उम्र में रोजाना महज ₹200 बचाकर ₹6000 की मंथली म्यूचुअल फंड एसआईपी शुरू करते हैं, तो रिटायरमेंट के समय आपके पास ₹9 करोड़ से ज्यादा का भारी-भरकम फंड हो सकता है। इसके बाद एक खास ट्रिक के जरिए आप इसी फंड से ताउम्र ₹6 लाख महीना की पेंशन भी पा सकते हैं। आइए आसानी से समझते हैं इस ‘SIP + SWP’ कैलकुलेटर का पूरा गणित।

स्टेप-अप एसआईपी का जादू: ऐसे बनेगा ₹9 करोड़ का फंड

इस जादुई आंकड़े तक पहुंचने के लिए आपको ‘स्टेप-अप एसआईपी’ का इस्तेमाल करना होगा। इसका मतलब है कि आपको हर साल अपनी एसआईपी की रकम में अपनी इनकम के हिसाब से थोड़ी बढ़ोतरी करनी होगी। एसबीआई सिक्योरिटीज के म्यूचुअल फंड कैलकुलेटर के मुताबिक इसका गणित इस प्रकार है:

  • शुरुआती मंथली निवेश: ₹6000 प्रति माह
  • सालाना स्टेप-अप: 10%, यानी हर साल आपको एसआईपी की रकम में 10% की बढ़ोतरी करनी है। जैसे पहले साल ₹6000, तो दूसरे साल ₹6600 मंथली।
  • निवेश की अवधि: 30 वर्ष, मान लेते हैं आपकी उम्र 30 साल है और आप 60 की उम्र तक निवेश करते हैं।
  • अनुमानित सालाना रिटर्न: 15%, इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में लंबी अवधि में इतना रिटर्न मिलना मुमकिन है।
  • 30 साल बाद कुल मैच्योरिटी फंड: करीब ₹9.01 करोड़

वहीं अगर आप बिना स्टेप-अप के सीधे ₹6000 की सिंपल एसआईपी 30 साल तक चलाते, तो 15% रिटर्न के हिसाब से केवल ₹4.20 करोड़ ही जमा हो पाते। यानी सिर्फ 10% सालाना निवेश बढ़ाकर आपने अपने फंड को दोगुने से भी ज्यादा कर लिया।

पेंशन के लिए अपनाएं SWP फॉर्मूला: हर महीने मिलेंगे ₹6 लाख

जब आप 60 वर्ष की उम्र में ₹9 करोड़ का फंड जमा कर लेते हैं, तो अब आपको म्यूचुअल फंड से पैसे निकालने के लिए सिस्टमैटिक विड्रॉल प्लान (SWP) का सहारा लेना होगा। सीनियर सिटीजंस और रिटायर्ड लोगों के लिए SWP रेगुलर इनकम का सबसे बेहतरीन जरिया है।

SWP कैलकुलेटर का गणित

  • एसडब्ल्यूपी में कुल निवेश: ₹9 करोड़
  • पेंशन की अवधि: 25 वर्ष, 60 साल से लेकर 85 साल की उम्र तक
  • SWP पर अनुमानित रिटर्न: 7% (सुरक्षित या कंजर्वेटिव फंड्स के लिहाज से)
  • मंथली फिक्स्ड पेंशन: ₹6 लाख प्रति माह

बचा हुआ इमरजेंसी फंड: हर महीने ₹6 लाख की पेंशन निकालने के बाद भी 25 साल पूरे होने पर आपके पास ₹2.64 करोड़ का फंड अलग से बच जाएगा। इस रकम का इस्तेमाल बुढ़ापे में किसी बड़ी मेडिकल इमरजेंसी के लिए किया जा सकता है।

30 साल बाद आखिर ₹6 लाख की पेंशन क्यों है जरूरी?

कई लोगों को लग सकता है कि ₹6 लाख महीने की पेंशन बहुत ज्यादा है, लेकिन इसके पीछे महंगाई का बड़ा रोल है। फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ‘आज के समय में एक लोअर-मिडिल क्लास सीनियर सिटीजन के लिए ₹50000 का मंथली खर्च काफी होता है।

₹4000 तक बढ़ेगी टेक-होम सैलरी, लेकिन रिटायरमेंट पर होगा ₹80 लाख का भारी नुकसान! एक्सपर्ट से समझिए नए EPF नियम का पूरा गणित

अगर हम स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा सहित सालाना 8% की महंगाई दर को जोड़ें, तो आज के ₹50000 की वैल्यू 30 साल बाद बढ़कर करीब ₹5 लाख प्रति माह हो जाएगी। इसमें बुढ़ापे के अन्य मेडिकल खर्चों और फुटकर खर्चों को जोड़ दें, तो 30 साल बाद एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए ₹6 लाख की मंथली पेंशन बिल्कुल सही और आदर्श मानी जाएगी।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

₹4000 तक बढ़ेगी टेक-होम सैलरी, लेकिन रिटायरमेंट पर होगा ₹80 लाख का भारी नुकसान! एक्सपर्ट से समझिए नए EPF नियम का पूरा गणित

New EPF Rules Take Home Salary vs Retirement: नए लेबर कोड के तहत मिलने वाली फ्लैक्सिबिलिटी के कारण अब कई कंपनियों में कर्मचारियों को भविष्य निधि (EPF) में अपना योगदान घटाकर न्यूनतम वैधानिक सीमा पर लाने का विकल्प मिल सकता है। ऐसा करने से आपकी हर महीने हाथ में आने वाली सैलरी तो तुरंत बढ़ जाएगी, लेकिन वित्तीय सलाहकारों का कहना है कि यह तात्कालिक खुशी आपके रिटायरमेंट के बड़े फंड को भारी चपत लगा सकती है।

यह फैसला पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आप हर महीने बचने वाले एक्स्ट्रा पैसे का क्या करेंगे? उसे अनुशासन के साथ सही जगह निवेश करेंगे या सिर्फ खर्च कर देंगे? आइए एक्सपर्ट्स के हवाले से समझते हैं कि पीएफ में कटौती करने का यह नया नियम क्या है और इसके दूरगामी वित्तीय परिणाम क्या हो सकते हैं।

क्या बदल गया है ईपीएफ का नया फ्रेमवर्क?

टैक्सस्पैनर(Taxspanner) के को-फाउंडर और सीईओ सुधीर कौशिक के मुताबिक, ईपीएफ योगदान का मूल सिद्धांत अभी भी 12 प्रतिशत ही है, लेकिन असली पेंच उस ‘वेतन आधार’ का है जिस पर यह 12% लागू होता है।

पहले का नियम: कई कंपनियां या तो वास्तविक बेसिक सैलरी पर 12% पीएफ काटती थीं या इसे ₹15000 प्रति माह की वैधानिक सीमा पर सीमित रखती थीं, जिससे न्यूनतम अनिवार्य पीएफ योगदान ₹1800 प्रति माह होता था।

नया नियम: नए लेबर कोड के तहत, केवल वैधानिक वेतन सीमा (₹15000) तक ही 12% का अनिवार्य योगदान लागू रहेगा। इस सीमा से अधिक वेतन पर पीएफ काटना पूरी तरह स्वैच्छिक होगा, जो कंपनी और कर्मचारी की आपसी सहमति पर निर्भर करेगा।

इसका मतलब है कि अगर आप वर्तमान में अपनी पूरी बेसिक सैलरी पर अधिक पीएफ कटवा रहे हैं, तो आप और आपकी कंपनी आपसी सहमति से इसे घटाकर केवल अनिवार्य ₹1800 प्रति माह के स्तर पर ला सकते हैं। इससे आपकी मंथली टेक-होम सैलरी तो बढ़ जाएगी, लेकिन रिटायरमेंट फंड छोटा हो जाएगा।

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किन्हें पीएफ योगदान घटाने की गलती ‘बिल्कुल नहीं’ करनी चाहिए?

प्रोमोर फिनटेक की को-फाउंडर और डायरेक्टर निशा संघवी के अनुसार, यह विकल्प ज्यादातर नौकरीपेशा लोगों के लिए सही नहीं है। इन 5 तरह के लोगों को पीएफ कम करने से बचना चाहिए:

जिनकी मुख्य बचत सिर्फ ईपीएफ है: अधिकांश वेतनभोगियों के लिए पीएफ ही एकमात्र ऐसी बचत है जो हर महीने ऑटोमैटिक होती है। बिना निवेश अनुशासन के, हाथ में आने वाला एक्स्ट्रा पैसा सिर्फ खर्चों में उड़ जाएगा।

कंपनी का मैचिंग कॉन्ट्रिब्यूशन खोने का डर: अगर कंपनी आपकी पूरी बेसिक सैलरी पर 12% योगदान दे रही है और आपने अपना स्वैच्छिक हिस्सा घटा लिया, तो मुमकिन है कि कंपनी भी वैधानिक सीमा से ऊपर अपना योगदान बंद कर दे। यानी आप कंपनी की तरफ से मिलने वाला फ्री रिटायरमेंट बेनिफिट खो देंगे।

40 और 50 की उम्र वाले कर्मचारी: जिनके पास नौकरी के कम साल बचे हैं, उन्हें कंपाउंडिंग का फायदा कम मिलता है। इसलिए योगदान घटाने से उनके रिटायरमेंट फंड पर बहुत बड़ा और बुरा असर पड़ेगा।

रूढ़िवादी या सेफ इन्वेस्टर्स: वित्तीय वर्ष 2026 के लिए ईपीएफ 8.25% की सरकारी गारंटीड ब्याज दर दे रहा है, जो पूरी तरह टैक्स-फ्री है। इतनी सुरक्षा के साथ इतना बढ़िया रिटर्न किसी अन्य फिक्स्ड-इनकम प्रोडक्ट में मिलना नामुमकिन है।

टेक-होम सैलरी बढ़ाने का लॉन्ग-टर्म नुकसान

एक्सपर्ट निशा संघवी ने एक आसान उदाहरण से इसके वित्तीय नुकसान को समझाया है:

मान लीजिए किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी ₹50000 है। अभी 12% के हिसाब से उसका पीएफ योगदान ₹6000 प्रति माह जाता है।

नए नियमों के तहत अगर वह न्यूनतम अनिवार्य सीमा चुनता है, तो उसका पीएफ केवल ₹1800 कटेगा, जिससे उसकी टेक-होम सैलरी में हर महीने ₹4200 बढ़ जाएंगे।

कंपाउंडिंग का नुकसान: अगर यह ₹4200 पीएफ खाते में ही रहते और 8.25% की दर से बढ़ते, तो 25 सालों में यह रकम करीब ₹41 से ₹42 लाख बन जाती।

डबल झटका: अगर आपकी देखा-देखी आपकी कंपनी ने भी एक्स्ट्रा हिस्से पर अपना मैचिंग कॉन्ट्रिब्यूशन बंद कर दिया, तो आपके रिटायरमेंट कॉर्पस में सीधे ₹80 लाख से ज्यादा का बड़ा नुकसान होगा।

इसके अलावा, जो एक्स्ट्रा पैसा आपकी टेक-होम सैलरी में जुड़ेगा, वह आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से पूरी तरह टैक्स के दायरे में आएगा, जबकि पीएफ में रहने पर यह टैक्स-फ्री कंपाउंड होता। यहां आपको बता दें कि सालाना ₹2.5 लाख से अधिक के कर्मचारी योगदान के ब्याज पर ही टैक्स लगता है।

किन्हें चुनना चाहिए कम पीएफ का विकल्प?

यह विकल्प केवल दो ही परिस्थितियों में फायदेमंद हो सकता है:

महंगे लोन चुकाने के लिए: अगर आप 12 से 14 प्रतिशत की भारी ब्याज दर वाला पर्सनल या क्रेडिट कार्ड लोन चुका रहे हैं, तो पीएफ घटाकर लोन का प्री-पेमेंट करना 8.25% के पीएफ रिटर्न से बेहतर परिणाम देगा।

अनुशासित इक्विटी निवेशक: जो लोग हाथ में आने वाले इस अतिरिक्त पैसे को बिना चूके हर महीने लंबी अवधि के लिए इक्विटी म्यूचुअल फंड में डाइवर्ट करने का पक्का अनुशासन रखते हैं।

एक्सपर्ट की सलाह है कि कोई भी फैसला लेने से पहले अपनी कंपनी की ईपीएफ पॉलिसी जांचें। अगर अतिरिक्त पैसा केवल रोजमर्रा के सामान्य खर्चों या लाइफस्टाइल को अपग्रेड करने में जाने वाला है, तो पीएफ योगदान को बिल्कुल न छुएं। आज की थोड़ी सी नकदी का आराम, कल के बुढ़ापे के बड़े फंड को दांव पर लगाने जैसा है।

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल पर विशेषज्ञों द्वारा व्यक्त किए गए विचार और निवेश टिप्स उनके अपने हैं, वेबसाइट या उसके प्रबंधन के नहीं। मनीकंट्रोल यूजर्स को सलाह देता है कि वे कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट्स से जांच कर लें।

SBI Bank Holiday: कल 6 जुलाई, सोमवार को देश के कई राज्यों में बंद रहेंगे बैंक! जानिए RBI ने क्यों दी है छुट्टी

Bank Holiday on 6 July: अगर सोमवार, 6 जुलाई को आपको बैंक से जुड़ा कोई जरूरी काम है, तो ये खबर आपके लिए बेहद जरूरी है। कल देश के कुछ राज्यों में बैंक बंद रहने वाले हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की छुट्टियों की लिस्ट के मुताबिक, 6 जुलाई को कुछ चुनिंदा राज्यों में सरकारी और निजी बैंक शाखाओं में कामकाज नहीं होगा। हालांकि, यह छुट्टी पूरे देश में लागू नहीं है। आइए जानते हैं कि कल किन राज्यों में बैंक बंद रहेंगे और कहां सामान्य रूप से काम होगा।

इन राज्यों में कल बंद रहेंगे बैंक

6 जुलाई 2026 को देश के दो प्रमुख राज्यों में विशेष क्षेत्रीय त्योहारों और महापुरुषों की जयंती के कारण बैंकों में अवकाश रहेगा:

पश्चिम बंगाल: देश के महान विचारक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के विशेष अवसर पर कल पश्चिम बंगाल के सभी बैंक बंद रहेंगे।

मिजोरम: मिजोरम में कल ‘MHIP Day’ (मिजो ह्मेइछे इंसुइखौम पावल दिवस) मनाया जाएगा, जिसके चलते राज्य सरकार और आरबीआई के निर्देशानुसार वहां के सभी बैंकों में छुट्टी रहेगी।

क्या दिल्ली-मुंबई और अन्य शहरों में भी बंद रहेंगे बैंक?

नहीं, कल पूरे देश में छुट्टी नहीं है। दिल्ली, मुंबई, नोएडा, चेन्नई, बेंगलुरु, लखनऊ, पटना और उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र समेत देश के ज्यादातर राज्यों में बैंक अपने सामान्य समय पर खुलेंगे। यह छुट्टी केवल पश्चिम बंगाल और मिजोरम में ही है।

जुलाई 2026 में बैंक की छुट्टियां(RBI)

  1. 5 जुलाई (रविवार): साप्ताहिक अवकाश (पूरे देश में)
  2. 6 जुलाई (सोमवार): MHIP डे / डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जयंती (मिजोरम और पश्चिम बंगाल में बंद)
  3. 9 जुलाई (गुरुवार): बेहदेहिनखलाम (मेघालय में बंद)
  4. 11 जुलाई (शनिवार): दूसरा शनिवार (पूरे देश में)
  5. 12 जुलाई (रविवार): साप्ताहिक अवकाश (पूरे देश में)
  6. 16 जुलाई (गुरुवार): रथ यात्रा / कांग / हरेला (ओडिशा, उत्तराखंड और मणिपुर में बंद)
  7. 17 जुलाई (शुक्रवार): यू तिरोत सिंह की पुण्यतिथि (मेघालय में बंद)
  8. 18 जुलाई (शनिवार): द्रुकपा त्शे-जी (सिक्किम में बंद)
  9. 19 जुलाई (रविवार): साप्ताहिक अवकाश (पूरे देश में)
  10. 22 जुलाई (बुधवार): खारची पूजा (त्रिपुरा में बंद)
  11. 25 जुलाई (शनिवार): चौथा शनिवार (पूरे देश में)
  12. 26 जुलाई (रविवार): साप्ताहिक अवकाश (पूरे देश में)

डिजिटल और ऑनलाइन बैंकिंग सेवाएं रहेंगी चालू

बैंक की शाखाएं बंद रहने के बावजूद ग्राहकों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। डिजिटल बैंकिंग के इस दौर में सभी ऑनलाइन सेवाएं चौबीसों घंटे काम करेंगी:

  • UPI पेमेंट सामान्य रूप से काम करेंगे।
  • इंटरनेट बैंकिंग और मोबाइल बैंकिंग के जरिए आप पैसे ट्रांसफर कर सकेंगे।
  • एटीएम (ATM) से कैश निकालने और जमा करने की सुविधा पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

अगर आपको चेक क्लीयरेंस, बैंक लॉकर या ड्राफ्ट जैसे ब्रांच से जुड़े जरूरी काम हैं, तो राज्यों की छुट्टियों की इस लिस्ट को ध्यान में रखकर ही अपनी योजना बनाएं।