E20 Petrol: क्या सच में एथेनॉल वाले पेट्रोल से कम हो जाता है गाड़ी का माइलेज और खराब होता है इंजन? इस डिटेल FAQ में हर सवाल का जवाब

देश में इस समय एथेनॉल और E20 पेट्रोल की काफी चर्चा हो रही है। E20 फ्यूल का मतलब है ऐसा पेट्रोल जिसमें 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत साधारण पेट्रोल मिला होता है। देशभर में E20 पेट्रोल को लेकर कई तरह की अफवाहें और भ्रामक दावे सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। कोई कह रहा है कि E20 पेट्रोल से इंजन खराब हो जाता है, तो कोई दावा कर रहा है कि इससे गाड़ी का माइलेज बहुत कम हो जाता है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि E20 बनाने में हजारों लीटर पानी बर्बाद होता है।

वहीं इन दावों पर पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने विस्तृत जानकारी जारी करते हुए कहा है कि ये बातें पूरी तरह गलत, बेबुनियाद और वैज्ञानिक तथ्यों से परे हैं। मंत्रालय ने ऑटोमोबाइल अनुसंधान संस्थानों और वाहन उद्योग से जुड़ी कई रिपोर्टों का हवाला देते हुए इन अफवाहों को खारिज किया है।

  • E20 पेट्रोल क्या है और इसकी इतनी चर्चा क्यों हो रही है?

E20 पेट्रोल ऐसा ईंधन है, जिसमें 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल मिलाया जाता है। इथेनॉल एक जैव ईंधन (बायोफ्यूल) है, जिसे गन्ना, मक्का और अतिरिक्त चावल जैसी कृषि फसलों से तैयार किया जाता है। सरकार का कहना है कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, वाहनों से होने वाले प्रदूषण को घटाना और देश में जैव ईंधन के उत्पादन को बढ़ावा देना है।

भारत ने दिसंबर 2025 तक पूरे देश में पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य हासिल कर लिया, जबकि यह लक्ष्य पहले 2030 तक पूरा करना था। इसके बाद सोशल मीडिया पर ई20 पेट्रोल को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि इसका गाड़ी के इंजन, माइलेज, वारंटी और लंबे समय तक वाहन के प्रदर्शन पर क्या असर पड़ेगा।

  • क्या E20 पेट्रोल से इंजन खराब होता है या माइलेज कम हो जाता है?

केंद्र सरकार ने उन दावों को गलत बताया है, जिनमें कहा जा रहा है कि E20 पेट्रोल से इंजन खराब हो जाता है या गाड़ी का माइलेज बहुत कम हो जाता है। सरकार ने बताया कि इस विषय पर ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआरएआई), इंडियन ऑयल, भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (देहरादून) और सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (सियाम) ने मिलकर अध्ययन किया था। इसमें अलग-अलग तरह के वाहनों पर E20 पेट्रोल की जांच की गई।

स्टडी के अनुसार, कारों पर 40,000 किलोमीटर और दोपहिया वाहनों पर 20,000 किलोमीटर तक किए गए टेस्च में इंजन की एफिशिएंसी, गाड़ी स्टार्ट होने या धातु और प्लास्टिक के पुर्जों पर कोई बड़ी समस्या नहीं मिली। हालांकि, कुछ पुराने मॉडल की गाड़ियों में रबर के कुछ हिस्सों और गैस्केट को पहले बदलने की जरूरत पड़ सकती है।

केंद्र सरकार का कहना है कि ई20 पेट्रोल, सामान्य पेट्रोल की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन जैसे प्रदूषकों का उत्सर्जन कम करता है। सरकार के अनुसार, इथेनॉल की ऑक्टेन क्षमता अधिक होने के कारण ई20 के लिए तैयार किए गए वाहनों में इंजन की नॉकिंग कम होती है, गाड़ी की रफ्तार बेहतर होती है और ड्राइविंग का अनुभव भी अच्छा रहता है।

माइलेज को लेकर सरकार ने कहा है कि E20 पेट्रोल से बहुत ज्यादा माइलेज घटने की बातें सही नहीं हैं। मंत्रालय के मुताबिक, किसी भी गाड़ी का माइलेज सिर्फ ईंधन पर नहीं, बल्कि चलाने के तरीके, टायर में सही हवा, समय पर सर्विस और एयर कंडीशनर के इस्तेमाल जैसी कई बातों पर निर्भर करता है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी कहा कि रेसिंग कारों में लंबे समय से इथेनॉल का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इससे गाड़ी का प्रदर्शन बेहतर होता है और इंजन की नॉकिंग कम होती है। उन्होंने माना कि माइलेज में हल्की कमी आ सकती है, लेकिन इसके बारे में पहले से ही साफ जानकारी दी गई है।

  • क्या E20 पेट्रोल इस्तेमाल करने से गाड़ी का बीमा या वारंटी खत्म हो जाएगी?

केंद्र सरकार ने साफ कहा है कि E20 पेट्रोल इस्तेमाल करने से गाड़ी का बीमा या कंपनी की वारंटी खत्म नहीं होती। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, बीमा कंपनियों और वाहन बनाने वाली कंपनियों ने स्पष्ट किया है कि अगर वाहन कंपनी के तय मानकों के अनुसार ई20 पेट्रोल के लिए उपयुक्त है, तो इस ईंधन के इस्तेमाल से बीमा या वारंटी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार ने सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (सियाम) का भी हवाला दिया है। सियाम के अनुसार, ई20 पेट्रोल के अनुकूल वाहनों पर कंपनी की वारंटी पहले की तरह लागू रहेगी और ग्राहकों को किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है।

  • क्या इथेनॉल बनाने में बहुत ज़्यादा पानी का इस्तेमाल होता है?

सरकार का कहना है कि एक लीटर इथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर पानी लगने का दावा सही नहीं है। सरकार के मुताबिक, धान की खेती में इस्तेमाल होने वाले पूरे पानी को इथेनॉल उत्पादन से जोड़ना गलत है, क्योंकि धान और गेहूं की खेती सबसे पहले देश की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए की जाती है। जब जरूरत से ज्यादा चावल बच जाता है, तभी उसका इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में किया जाता है।

सरकार का यही कहना गन्ने के मामले में भी है। उसके अनुसार, पहले देश में चीनी की जरूरत पूरी की जाती है और उसके बाद ही अतिरिक्त गन्ने या उससे बने कच्चे माल का उपयोग इथेनॉल बनाने के लिए किया जाता है।

सरकार ने यह भी बताया कि अब इथेनॉल बनाने में मक्के को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है, क्योंकि मक्का उगाने में धान के मुकाबले काफी कम पानी लगता है। फिलहाल इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल में मक्के की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।

सरकार के अनुसार, इथेनॉल बनाने की प्रक्रिया के दौरान एक लीटर इथेनॉल तैयार करने में आमतौर पर केवल 3 से 5 लीटर पानी की जरूरत होती है। इसके अलावा कई आधुनिक कारखानों में पानी को दोबारा इस्तेमाल करने की तकनीक अपनाई जाती है, जिससे पानी की खपत और भी कम हो जाती है।

  • EBP प्रोग्राम से क्या फायदे हुए हैं?

सरकार का कहना है कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ईबीपी) योजना से देश को आर्थिक और पर्यावरण दोनों स्तर पर बड़े फायदे हुए हैं। सरकार के मुताबिक, साल 2014-15 के बाद इस योजना की वजह से 1.90 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की विदेशी मुद्रा बचाई गई है। साथ ही किसानों को 1.60 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया है।

सरकार के अनुसार, इस योजना से करीब 930 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का उत्सर्जन कम हुआ है और 310 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा कच्चे तेल की जगह इथेनॉल का इस्तेमाल किया गया है। इससे पेट्रोलियम पर देश की निर्भरता घटाने में भी मदद मिली है।

सरकार ने यह भी बताया कि इथेनॉल उत्पादन की सालाना क्षमता 2013-14 में करीब 38 करोड़ लीटर थी, जो अब बढ़कर लगभग 2,000 करोड़ लीटर हो गई है। सरकार का कहना है कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत से ज्यादा इथेनॉल मिलाने का फैसला तभी लिया जाएगा, जब वैज्ञानिक जांच, परीक्षण और वाहन कंपनियों से चर्चा के बाद संबंधित विशेषज्ञ संस्था की मंजूरी मिल जाएगी।

देश में 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को मिलने वाले फ्री राशन का चावल बदल गया, इसे लेकर हो गया फाइनल फैसला

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के तहत मुफ्त राशन पाने वाले देश के 80 करोड़ से अधिक लाभार्थियों के लिए केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी ने राशन में दिए जाने वाले चावल की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए एक बड़े सुधार को मंजूरी दे दी है। लगभग तीन दशकों में पहली बार सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत आपूर्ति किए जाने वाले चावल के क्वालिटी स्पेसिफिकेशन्स में संशोधन किया है। इस फैसले के बाद अब लाभार्थियों को उनके मौजूदा कोटे में बिना किसी कटौती के, बहुत कम टूटे हुए दानों वाला बेहतर और उच्च गुणवत्ता का चावल दिया जाएगा।

चावल के नियमों में क्या हुआ बदलाव?

मंजूर की गई नई नीति के तहत राशन के चावल में टूटे हुए दानों के प्रतिशत को भारी मात्रा में घटा दिया गया है। पीएमजीकेएवाई के तहत मिलने वाले कच्चे चावल में अब टूटे हुए दानों की मात्रा अधिकतम 10% तक ही हो सकेगी। अब तक इसके लिए अधिकतम 25% की सीमा तय थी। उबले हुए चावल में अब टूटे हुए दानों की मात्रा अधिकतम 5% तक ही होगी जबकि पहले इसकी मौजूदा सीमा 16% तक निर्धारित थी।

खरीफ सीजन 2027-28 तक चरणबद्ध तरीके से होगा लागू

बेहतर गुणवत्ता वाले इस चावल की खरीद तुरंत शुरू कर दी जाएगी। सभी धान खरीद वाले राज्यों में इसे खरीफ विपणन सीजन (KMS) 2027-28 तक चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा। इसी तरह लाभार्थियों के बीच इस सुधारे गए चावल का वितरण भी चरणबद्ध तरीके से होगा ताकि सभी राज्यों में यह बदलाव सुचारू रूप से लागू हो सके।

80 करोड़ लाभार्थियों को क्या होगा फायदा?

सरकार का दावा है कि इस फैसले से 80 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को मिलने वाले अनाज की गुणवत्ता में बड़ा सुधार होगा। लाभार्थियों को ऐसा चावल मिलेगा जिसके दाने साबुत और बेहतर होंगे, दिखने में अच्छे होंगे और जिन्हें उपभोक्ता आसानी से पसंद कर सकेंगे। मिलिंग के दौरान निकलने वाले टूटे हुए चावल को अलग कर दिया जाएगा और उसका इस्तेमाल दूसरे उत्पादक और औद्योगिक काम में किया जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि सिर्फ बेस्ट कैटिगरी का खाने योग्य चावल ही गरीबों तक पहुंचे।

सरकार को सालाना 2161 करोड़ की होगी बचत

सरकार के दावे के मुताबिक इस नीतिगत सुधार से राशन प्रबंधन की परिचालन दक्षता बढ़ेगी और सरकार को भारी वित्तीय बचत होगी। टूटे हुए चावल की नीलामी सीधे मिलर्स के परिसरों से की जाएगी। इससे परिवहन, भंडारण, और हैंडलिंग की लागत कम होगी। टूटे चावल को एचडीपीई बैगों में स्टोर किया जाएगा, जिससे जूट के बोरों की आवश्यकता कम होगी। इन सब बदलावों से लॉजिस्टिक्स, स्टोरेज और पैकेजिंग की लागत घटने से सरकार को सालाना लगभग 2161 करोड़ रुपये की बचत होगी। इसके साथ ही टूटे चावल की बिक्री से अतिरिक्त राजस्व भी जेनरेट होगा। इससे खाद्य सब्सिडी का बोझ कम करने में मदद मिलेगी।

कई राज्यों में पायलट प्रोजेक्ट रहा सफल

कैबिनेट से मंजूरी मिलने से पहले इस योजना को देश के कई राज्यों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर परख लिया गया है। हरियाणा, आंध्र प्रदेश, पंजाब, ओडिशा, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में इसका सफल क्रियान्वयन किया गया। इससे साबित हुआ कि बड़े पैमाने पर इस बेहतर क्वालिटी के चावल का उत्पादन व्यावहारिक रूप से संभव है। पायलट प्रोजेक्ट के तहत तैयार किए गए इस बेहतर चावल की आपूर्ति भी अब लाभार्थियों को की जाएगी।

राशन प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाएगा QR-Code

राशन वितरण प्रणाली में किसी भी तरह की गड़बड़ी या लीकेज को रोकने के लिए तकनीक का सहारा लिया जाएगा। चावल के बोरों पर क्यूआर-कोड टैगिंग की जाएगी। इस क्यूआर-कोड की मदद से पूरी सप्लाई चेन में चावल के मूवमेंट को शुरू से अंत तक ट्रैक किया जा सकेगा। इससे सार्वजनिक वितरण प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और इन्वेंट्री मैनेजमेंट को मजबूती मिलेगी। सरकार का कहना है कि उसने हर पात्र परिवार के लिए खाद्य सुरक्षा निश्चित करने के बाद अब गुणवत्ता के साथ खाद्य सुरक्षा हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। दावा किया जा रहा है कि इस ऐतिहासिक फैसले से गरीब परिवारों को सम्मान के साथ बेहतर गुणवत्ता का अनाज मिल सकेगा।

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Sawan 2026: सावन में पानी है भगवान शिव की कृपा, तो पहले जान लें सावन में शिवलिंग पर क्या चढ़ाएं और क्या नहीं

Sawan 2026: आषाढ़ का महीने लगने के साथ ही लोग सावन के महीने की तैयारियां शुरू कर देते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन का महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इस महीने जो भक्त सच्चे मन से मां पार्वती और भगवान शिव की आराधना करता है, उन पर महादेव प्रसन्न होते हैं। उन्हें सारी दुख-तकलीफों से मुक्त करते हैं। सावन के पावन महीने में भगवान शिव की आराधना में शिवलिंग का जलाभिषेक और उस पर कुछ चीजें अर्पित की जाती हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं, वहीं कुछ चीजों को चढ़ाना शास्त्रों में पूरी तरह वर्जित माना गया है। सावन में आपको शिवलिंग पर क्या चढ़ाना चाहिए और क्या नहीं, इसकी पूरी सूची नीचे दी गई है:

शिवलिंग पर क्या चढ़ाना चाहिए?

शिवलिंग पर इन पवित्र चीजों को चढ़ाने से महादेव की विशेष कृपा प्राप्त होती है :

जल या गंगाजल : भोलेनाथ को सबसे प्रिय जल है। तांबे या पीतल के लोटे से शिवलिंग पर जल चढ़ाना सबसे उत्तम माना जाता है।

बेलपत्र : सावन में भगवान शिव को तीन पत्तियों वाला साफ, हरा और बिना कटा-फटा बेलपत्र उल्टा (चिकना हिस्सा नीचे की तरफ) करके चढ़ाएं।

दूध, दही और घी : गाय के कच्चे दूध, दही और शुद्ध देसी घी से शिवलिंग का अभिषेक करने से सुख-समृद्धि और अच्छा स्वास्थ्य मिलता है।

शहद और शक्कर : शिवलिंग पर शहद और मिश्री/शक्कर चढ़ाने से जीवन में मिठास आती है और वाणी में मधुरता बढ़ती है।

धतूरा और भांग : शिव जी को धतूरा, भांग और आक (मदार) के फूल बेहद प्रिय हैं। इन्हें चढ़ाने से जीवन की कठिन बाधाएं दूर होती हैं।

सफेद चंदन और भस्म : शिव जी वैरागी हैं, इसलिए उन्हें चंदन का तिलक लगाना और भस्म (विभूति) अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

अक्षत : शिवलिंग पर चावल चढ़ाते समय ध्यान रखें कि चावल का कोई भी दाना टूटा हुआ (खंडित) न हो।

शिवलिंग पर ये चीजें भूलकर भी नहीं चढ़ाएं

शास्त्रों के अनुसार, कुछ चीजों को शिवलिंग से दूर रखना चाहिए, क्योंकि इन्हें चढ़ाने से पूजा खंडित हो सकती है :

तुलसी के पत्ते : पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने तुलसी जी के पति (असुर जालंधर) का वध किया था, इसलिए शिव पूजा में तुलसी पूरी तरह वर्जित है।

हल्दी और कुमकुम/सिंदूर : हल्दी और कुमकुम को स्त्री तत्व और सौंदर्य प्रसाधन से जोड़ा जाता है। चूंकि शिवलिंग पुरुष तत्व और वैराग्य का प्रतीक है, इसलिए इस पर हल्दी, रोली या सिंदूर नहीं चढ़ाया जाता।

केतकी का फूल : भगवान शिव ने केतकी के फूल को झूठ बोलने के कारण श्राप दिया था, तब से शिव पूजा में केतकी के फूलों का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

शंख से जल : शिव पुराण के अनुसार, महादेव ने शंखचूड़ नाम के दैत्य का वध किया था, जिसके कारण शिव जी की पूजा में न तो शंख बजाया जाता है और न ही शंख से जल चढ़ाया जाता है।

नारियल पानी : शिवलिंग पर चढ़ाई गई चीजें ग्रहण करना वर्जित होता है, और नारियल पानी देवताओं को चढ़ाने के बाद प्रसाद रूप में पिया जाता है। इसलिए शिवलिंग पर नारियल का पानी नहीं चढ़ाया जाता। हालांकि साबुत नारियल माता पार्वती के आगे अर्पित किया जा सकता है।

लाल रंग के फूल : शिव जी को सफेद रंग के फूल प्रिय हैं। चमेली या लाल रंग के अन्य फूल आमतौर पर देवी पूजन में उपयोग होते हैं, इन्हें शिवलिंग पर नहीं चढ़ाना चाहिए।

सावन में करें चंद्राकार परिक्रमा : सावन में जब भी आप शिवलिंग की परिक्रमा करें, तो ध्यान रखें कि ‘जलाधारी’ (सोमसूत्र यानी जहां से जल बहता है) को कभी लांघें नहीं। हमेशा चंद्राकार (आधी परिक्रमा) ही करनी चाहिए।

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Monsoon Special Recipes: मानसून की 5 बेहतरीन रेसिपीज, देखते ही मुंह में आ जाएगा पानी

An image providing information on preparing hot, spicy, and special recipes for rainy days

Monsoon Special Recipes: रिमझिम बारिश की बूंदें, ठंडी हवा और खिड़की से आती मिट्टी की सोंधी खुशबू… मानसून का मजा तब तक अधूरा है, जब तक किचन से गरमा-गरम और चटपटी चीजों की महक न आए। मानसून का मौसम केवल ठंडी हवाओं और सुहाने मौसम का ही नहीं, बल्कि परिवार और दोस्तों के साथ स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लेने का भी होता है। इस सुहाने मौसम का लुत्फ दोगुना करने के लिए यहां मानसून की 5 सबसे बेहतरीन और सदाबहार रेसिपीज दी गई हैं, जिन्हें देखते ही आपके मुंह में पानी आ जाएगा:

 

1. कड़क चाय के साथ 'चीज़ी ब्रेड पकौड़ा'

ब्रेड पकौड़ा तो आपने कई बार खाया होगा, लेकिन इस बार बारिश में इसे एक ट्विस्ट दें। आलू के चटपटे मसाले के साथ ब्रेड के बीच में मोज़ेरेला या स्लाइस चीज़/Cheese रखें। इसे बेसन के गाढ़े घोल में डुबोकर सुनहरा होने तक डीप फ्राई करें। जब आप इसे बीच से काटेंगे, तो पिघलता हुआ चीज़ और आलू का तीखापन मानसून का मजा बढ़ा देगा।

 

2. गरमा-गरम 'कॉर्न भजिया'

बारिश के मौसम में भुट्टा (स्वीट कॉर्न) हर गली-नुक्कड़ पर मिलता है। इस बार भुट्टे को उबालकर खाने के बजाय इसके क्रिस्पी भजिए बनाएं। ताजे मक्के के दानों को दरदरा पीस लें, फिर इसमें थोड़ा बेसन, चावल का आटा (क्रिस्पी बनाने के लिए), हरी मिर्च, बारीक कटा प्याज और हरा धनिया मिलाएं। तैयार गरमा-गरम मक्के के भजिए हरी चटनी के साथ लाजवाब लगते हैं।

 

3. मुंबई स्टाइल 'कांदा भजी' (चटपटी प्याज के पकौड़े)

अगर कुछ बेहद क्रिस्पी और झटपट खाने का मन है, तो लच्छेदार प्याज के पकौड़े (कांदा भजी) से बेहतर कुछ नहीं। प्याज को लंबा और पतला काटें, उसमें नमक डालकर 5 मिनट छोड़ दें ताकि प्याज पानी छोड़ दे। अब उसी पानी में बेसन, अजवाईन, कुटी हुई लाल मिर्च और थोड़ा सा गरम तेल डालकर बिना पानी के गूंथ लें और कुरकुरा होने तक तलें। तली हुई हरी मिर्च के साथ इसका स्वाद लाजवाब आता है।

 

4. सूजी का हलवा या 'गुलगुले' (मीठे पकौड़े)

चटपटे के बाद कुछ मीठा हो जाए! उत्तर भारत में बारिश के दिनों में 'गुलगुले', जो कि गेहूं के आटे और गुड़ से बने मीठे पकौड़े बनाने की पुरानी परंपरा है। अगर वो न बनाना चाहें, तो देसी घी में भुना हुआ गरमा-गरम सूजी का शीरा या हलवा बनाएं। इलायची की खुशबू और ड्राई फ्रूट्स से सजा यह हलवा बारिश के मौसम में आत्मा को तृप्त कर देता है।

 

5. चटपटा वेज सूप

बारिश में जब थोड़ी ठंडक बढ़ने लगती है, तो कुछ गरमा-गरम और हेल्दी पीने का मन करता है। ऐसे में स्पाइसी 'हॉट एंड सॉर सूप' या 'क्लियर सूप' एक बेहतरीन विकल्प है। ढेर सारी सब्जियां- जैसे गाजर, पत्तागोभी, शिमला मिर्च और अदरक-लहसुन के तड़के के साथ बना यह सूप न सिर्फ आपके मुंह का स्वाद बदलेगा, बल्कि मानसून की बीमारियों से भी बचाएगा।

 

मानसून स्पेशल टिप: इन सभी रेसिपीज के साथ अदरक, इलायची और लौंग वाली कड़क मसाला चाय बनाना बिल्कुल न भूलें, क्योंकि इसके बिना हर मानसून रेसिपी अधूरी है!

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बंगाल में मिड-डे मील से अंडा हटने के शोर के बीच जानिए दिल्ली, यूपी, तमिलनाडु, तेलंगना समेत देश के दूसरे राज्यों में क्या मिलता है, फुल लिस्ट

भारतीय स्कूलों में मिड-डे मील योजना (PM POSHAN) के तहत बच्चों को अंडा दिए जाने पर बहस कोई नई नहीं है। अब यह विवाद पश्चिम बंगाल में एक बार फिर गरमा गया है। यहां के सरकारी स्कूलों के मेनू से अंडे को हटा दिया गया है। सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार ने कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के स्कूलों में मिड-डे मील तैयार करने की जिम्मेदारी इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) को सौंपने का फैसला किया है। इस्कॉन सिर्फ शाकाहारी भोजन ही परोसता है इसलिए अब बच्चों के मेनू में अंडे की जगह पनीर, सोया, राजमा और दालों जैसे विकल्पों को शामिल करने की चर्चा है। इस फैसले ने एक बड़े राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है। वैसे राज्य सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि वह छात्रों तक अंडे की पहुंच बनाए रखने के लिए ओडिशा मॉडल को अपना सकती है।

क्या है ओडिशा मॉडल और पीएम पोषण (PM POSHAN) योजना?

ओडिशा मॉडल: इस मॉडल के तहत मिड-डे मील तैयार करने वाली मुख्य एजेंसी भोजन में अंडा नहीं देती है। इसके बजाय स्कूलों को अलग से अतिरिक्त फंड दिया जाता है। इससे वे खुद अंडे खरीदकर छात्रों को अलग से परोस सकें।

पीएम पोषण: मिड-डे मील कार्यक्रम को अब पीएम पोषण के नाम से जाना जाता है। ये दुनिया की सबसे बड़ी स्कूल फीडिंग योजनाओं में से एक है। केंद्र सरकार इसके लिए कैलोरी और प्रोटीन आवश्यकताओं सहित पोषण संबंधी मानक तय करती है लेकिन मेनू चुनने की आजादी पूरी तरह राज्यों के पास होती है। यही वजह है कि देश के अलग-अलग राज्यों में बच्चों को अलग-अलग भोजन मिलता है।

अंडा परोसने वाले राज्यों में आई कमी

पिछले एक दशक में पीएम पोषण योजना के तहत अंडा परोसने वाले राज्यों की संख्या में लगातार गिरावट आई है। साल 2015-16 में देश के 16 राज्यों में मिड-डे मील के मेनू में अंडा शामिल था। यह साल 2025-26 में घटकर सिर्फ 13 राज्य तक रह गया है। इसका मतलब है कि अब भारत के केवल एक-तिहाई राज्यों में ही स्कूली बच्चों को अंडा दिया जा रहा है।

देश के प्रमुख राज्यों का मिड-डे मील मेनू: कहां क्या मिलता है?

तमिलनाडु: यह स्कूल के भोजन में अंडा शामिल करने वाला अग्रणी राज्य रहा है। यहां चावल, सांभर, सब्जियों और अन्य पौष्टिक चीजों के साथ सप्ताह में कई बार बच्चों को अंडा परोसा जाता है। स्कूल न्यूट्रिशन के मामले में अक्सर इस राज्य को एक मॉडल के रूप में देखा जाता है।

आंध्र प्रदेश: यहां साप्ताहिक मेनू में नियमित रूप से अंडा शामिल होता है। इसके साथ ही बच्चों को चावल, दाल, सब्जियां और कुछ क्षेत्रों में दूध भी दिया जाता है।

तेलंगाना: तेलंगाना के सरकारी स्कूलों में बच्चों को सप्ताह में कई बार अंडा दिया जाता है। इसके अलावा चावल, दाल और सब्जियों की करी यहां के मुख्य भोजन का हिस्सा हैं।

ओडिशा: विशेष रूप से आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में व्यापक रूप से अंडा परोसा जाता है। पश्चिम बंगाल के लिए भी यह एक संभावित मॉडल के रूप में उभरा है ताकि केंद्रीय रसोई के शाकाहारी होने के बावजूद बच्चों को अंडा मिलता रहे।

बिहार: बिहार के सरकारी स्कूलों में पीएम पोषण मेनू के तहत चावल, दाल और सब्जियों के साथ बच्चों को अंडा दिया जाता है।

असम: सरकारी स्कूलों के मिड-डे मील मेनू में अंडा शामिल है।

त्रिपुरा: इस योजना के तहत प्रोटीन सप्लीमेंट के रूप में बच्चों को अंडा दिया जाता है।

उत्तराखंड: इस पहाड़ी राज्य में भी स्कूल के भोजन के हिस्से के रूप में अंडा परोसा जाता है।

मुख्य रूप से शाकाहारी मेनू वाले राज्य

देश के कई राज्य ऐसे हैं जहां मिड-डे मील का मेनू पूरी तरह या मुख्य रूप से शाकाहारी है और वहां अंडा नहीं दिया जाता:

दिल्ली: दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पीएम पोषण योजना के तहत मुख्य रूप से शाकाहारी भोजन ही प्रदान किया जाता है।

उत्तर प्रदेश: यूपी के स्कूलों में बड़े पैमाने पर शाकाहारी भोजन ही परोसा जाता है, जिसमें बिना अंडे के चावल, दाल, रोटी और मौसमी सब्जियां शामिल हैं।

गुजरात: यहां का मिड-डे मील पूरी तरह शाकाहारी है, जिसमें आमतौर पर चावल या खिचड़ी, दाल, सब्जियां और कभी-कभी दूध शामिल होता है।

मध्य प्रदेश: यहां का मेनू मुख्य रूप से शाकाहारी है, जो अनाज, दालों और सब्जियों पर केंद्रित है।

राजस्थान: सरकारी स्कूलों में शाकाहारी भोजन मिलता है, जिसके मुख्य मेनू में दाल, रोटी, चावल और सब्जियां शामिल हैं।

हरियाणा: यहां भी मिड-डे मील शाकाहारी है और इसमें अंडे शामिल नहीं हैं।

छत्तीसगढ़ और गोवा: छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से चावल, दाल और सब्जियों पर आधारित शाकाहारी भोजन मिलता है, जबकि गोवा का आधिकारिक मिड-डे मील मेनू भी शाकाहारी है।

महाराष्ट्र का विशेष मामला

महाराष्ट्र सरकार ने वित्तीय दिक्कतों का हवाला देते हुए पीएम पोषण योजना के तहत दिए जाने वाले अंडे और चीनी के लिए राज्य की फंडिंग को वापस ले लिया है। हालांकि स्कूलों को अंडा परोसने से रोका नहीं गया है लेकिन अगर वे इसे जारी रखना चाहते हैं तो उन्हें सार्वजनिक योगदान (जनसहयोग) या अन्य स्थानीय स्रोतों के माध्यम से खुद फंड की व्यवस्था करनी होगी।

बंगाल में फैसले को लेकर छिड़ा सियासी और पोषण संबंधी विवाद

पश्चिम बंगाल में इस फैसले के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने मेनू से अंडा हटाने के फैसले की आलोचना की है। उनका कहना है कि बड़ा सवाल यह है कि क्या धार्मिक खान-पान की मान्यताओं को एक सरकार द्वारा वित्तपोषित पोषण कार्यक्रम का रूप तय करना चाहिए, जो लाखों स्कूली बच्चों के लिए बनाया गया है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने विधानसभा में इस फैसले का बचाव किया। उन्होंने कहा कि हम मिड-डे मील पकाने की जिम्मेदारी इस्कॉन को दे रहे हैं। अगर आपको कोई आपत्ति है तो हरे कृष्णा न कहें, कोई आपको मजबूर नहीं करेगा। आपको खाने के लिए अच्छा और शुद्ध भोजन मिलेगा, चिंता की कोई बात नहीं है।

पोषण के नजरिए से कितना जरूरी है अंडा?

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (NIN) के मुताबिक अंडे को आहार प्रोटीन का सबसे कुशल और बेहतरीन स्रोत माना जाता है। इसकी प्रोटीन बायोअवेलेबिलिटीलगभग 94% होती है। इसके उलट चने की प्रोटीन बायोअवेलेबिलिटी लगभग 76% और सोयाबीन की करीब 54% होती है। अंडे जरूरी अमीनो एसिड, विटामिन और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। ये तत्व बच्चों के शारीरिक विकास, संज्ञानात्मक विकास और समग्र स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

Weekly monsoon tracker: बारिश की बढ़ती कमी और जलाशयों का घटता लेवल बढ़ा रहा चिंता, 22.7% गिरी खरीफ फसलों की बुआई

Weekly monsoon tracker:  बारिश की बढ़ती कमी, मॉनसून की धीमी रफ़्तार और जलाशयों के कम लेवल की वजह से खेती-बाड़ी वाले खास राज्यों में चावल और कपास जैसी गर्मियों की फसलों की बुआई पर असर पड़ा है। 25 जून तक खरीफ की बुआई पिछले साल के मुकाबले 22.7 फीसदी कम हुई है।

खरीफ फसलों का रकबा 182.72 लाख हेक्टेयर रहा, जो एक साल पहले के 236.46 लाख हेक्टेयर से कम है यानी 53.74 लाख हेक्टेयर की कमी आई। यह कमी सभी मुख्य फसलों की कैटेगरी में थी, जिसमें तिलहन, कपास, चावल और दालों का रकबा कम रहा।

तिलहन में सबसे ज़्यादा गिरावट देखी गई, जिसका रकबा एक साल पहले के 36.41 लाख हेक्टेयर से 19.42 लाख हेक्टेयर घटकर 16.99 लाख हेक्टेयर रह गया। तिलहन में, सोयाबीन की बुआई सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई है, जो 13.05 लाख हेक्टेयर कम हुई है, इसके बाद मूंगफली की बुआई 6.42 लाख हेक्टेयर कम हुई है।

भारत का सोयाबीन इंपोर्ट बढ़ रहा है, देश चीन समेत कुछ सप्लायर्स पर निर्भर है। मई तक, भारत के कच्चे सोयाबीन तेल के इंपोर्ट में चीन का 8.1 फीसदी हिस्सा था।

कपास का रकबा 15.70 लाख हेक्टेयर घटकर 29.66 लाख हेक्टेयर रह गया, जबकि चावल की बुआई 8.65 लाख हेक्टेयर घटकर 25.75 लाख हेक्टेयर रह गई। दालों का रकबा भी कमज़ोर हुआ है, जो 6.53 लाख हेक्टेयर कम हुआ है, जिसमें अरहर और उड़द सबसे आगे हैं।

बारिश और जलाशयों की चिंताए

बारिश का डिस्ट्रीब्यूशन अभी भी अनियमित है। इंडिया मेटियोरोलॉजिकल डिपार्टमेंट (IMD) ने अगले कुछ दिनों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा और विदर्भ में भारी बारिश का अनुमान लगाया है, लेकिन बिहार, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में हीटवेव की स्थिति बनी हुई है, जिससे कुछ उत्तरी इलाकों में बुआई में देरी हो रही है।

29 जून को बारिश में कमी 43 फीसदी के हाई लेवल पर पहुंच गई थी। बुआई कमजोर इसलिए है क्योंकि मॉनसून की तरक्की एक जैसी नहीं है, देश के 48 फीसदी हिस्से में कमी है और 26 फीसदी हिस्से में बड़ी कमी है।

रिजर्वॉयर का लेवल चिंता को और बढ़ा देता है। 166 बड़े रिज़र्वॉयर में लाइव स्टोरेज पिछले साल के लेवल से कम था। रिज़र्वॉयर अपनी कैपेसिटी के 26.4 फीसदी तक भरे हुए हैं, जबकि पिछले साल इसी समय में यह 36 फीसदी था, लेकिन यह पांच साल के एवरेज से 5 फीसदी ज़्यादा है।

खास तौर पर दक्षिणी और पूर्वी इलाकों में दबाव दिख रहा है, जो खरीफ की खेती के लिए ज़रूरी हैं। दक्षिणी इलाके के रिज़र्वॉयर 20.8 फीसदी पर हैं, जो पिछले साल के 44.7 फीसदी के आधे से भी कम हैं। कर्नाटक के जलाशय एक साल पहले के 48.6 फीसदी के मुकाबले सिर्फ़ 14.7 फीसदी भरे हैं, जबकि तमिलनाडु का स्टोरेज 81 फीसदी से घटकर 34.3 फीसदी हो गया है। पूर्व में, ओडिशा के जलाशय सिर्फ़ 15.3 फीसदी भरे हैं, जो पिछले साल के 22.4 फीसदी से कम है।

जलाशय का लेवल कम होने से धान, कपास और दालों जैसी फसलों के लिए सिंचाई में मदद कम हो जाती है, जिससे बुवाई समय पर बारिश पर ज़्यादा निर्भर हो जाती है। अगर जुलाई में बारिश कमज़ोर रहती है, तो फसल उत्पादन, ग्रामीण आय और खाने की चीज़ों की महंगाई, खासकर दालों और खाने के तेलों को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं।

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