बंगाल में मिड-डे मील से अंडा हटने के शोर के बीच जानिए दिल्ली, यूपी, तमिलनाडु, तेलंगना समेत देश के दूसरे राज्यों में क्या मिलता है, फुल लिस्ट

भारतीय स्कूलों में मिड-डे मील योजना (PM POSHAN) के तहत बच्चों को अंडा दिए जाने पर बहस कोई नई नहीं है। अब यह विवाद पश्चिम बंगाल में एक बार फिर गरमा गया है। यहां के सरकारी स्कूलों के मेनू से अंडे को हटा दिया गया है। सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार ने कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के स्कूलों में मिड-डे मील तैयार करने की जिम्मेदारी इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) को सौंपने का फैसला किया है। इस्कॉन सिर्फ शाकाहारी भोजन ही परोसता है इसलिए अब बच्चों के मेनू में अंडे की जगह पनीर, सोया, राजमा और दालों जैसे विकल्पों को शामिल करने की चर्चा है। इस फैसले ने एक बड़े राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है। वैसे राज्य सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि वह छात्रों तक अंडे की पहुंच बनाए रखने के लिए ओडिशा मॉडल को अपना सकती है।

क्या है ओडिशा मॉडल और पीएम पोषण (PM POSHAN) योजना?

ओडिशा मॉडल: इस मॉडल के तहत मिड-डे मील तैयार करने वाली मुख्य एजेंसी भोजन में अंडा नहीं देती है। इसके बजाय स्कूलों को अलग से अतिरिक्त फंड दिया जाता है। इससे वे खुद अंडे खरीदकर छात्रों को अलग से परोस सकें।

पीएम पोषण: मिड-डे मील कार्यक्रम को अब पीएम पोषण के नाम से जाना जाता है। ये दुनिया की सबसे बड़ी स्कूल फीडिंग योजनाओं में से एक है। केंद्र सरकार इसके लिए कैलोरी और प्रोटीन आवश्यकताओं सहित पोषण संबंधी मानक तय करती है लेकिन मेनू चुनने की आजादी पूरी तरह राज्यों के पास होती है। यही वजह है कि देश के अलग-अलग राज्यों में बच्चों को अलग-अलग भोजन मिलता है।

अंडा परोसने वाले राज्यों में आई कमी

पिछले एक दशक में पीएम पोषण योजना के तहत अंडा परोसने वाले राज्यों की संख्या में लगातार गिरावट आई है। साल 2015-16 में देश के 16 राज्यों में मिड-डे मील के मेनू में अंडा शामिल था। यह साल 2025-26 में घटकर सिर्फ 13 राज्य तक रह गया है। इसका मतलब है कि अब भारत के केवल एक-तिहाई राज्यों में ही स्कूली बच्चों को अंडा दिया जा रहा है।

देश के प्रमुख राज्यों का मिड-डे मील मेनू: कहां क्या मिलता है?

तमिलनाडु: यह स्कूल के भोजन में अंडा शामिल करने वाला अग्रणी राज्य रहा है। यहां चावल, सांभर, सब्जियों और अन्य पौष्टिक चीजों के साथ सप्ताह में कई बार बच्चों को अंडा परोसा जाता है। स्कूल न्यूट्रिशन के मामले में अक्सर इस राज्य को एक मॉडल के रूप में देखा जाता है।

आंध्र प्रदेश: यहां साप्ताहिक मेनू में नियमित रूप से अंडा शामिल होता है। इसके साथ ही बच्चों को चावल, दाल, सब्जियां और कुछ क्षेत्रों में दूध भी दिया जाता है।

तेलंगाना: तेलंगाना के सरकारी स्कूलों में बच्चों को सप्ताह में कई बार अंडा दिया जाता है। इसके अलावा चावल, दाल और सब्जियों की करी यहां के मुख्य भोजन का हिस्सा हैं।

ओडिशा: विशेष रूप से आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में व्यापक रूप से अंडा परोसा जाता है। पश्चिम बंगाल के लिए भी यह एक संभावित मॉडल के रूप में उभरा है ताकि केंद्रीय रसोई के शाकाहारी होने के बावजूद बच्चों को अंडा मिलता रहे।

बिहार: बिहार के सरकारी स्कूलों में पीएम पोषण मेनू के तहत चावल, दाल और सब्जियों के साथ बच्चों को अंडा दिया जाता है।

असम: सरकारी स्कूलों के मिड-डे मील मेनू में अंडा शामिल है।

त्रिपुरा: इस योजना के तहत प्रोटीन सप्लीमेंट के रूप में बच्चों को अंडा दिया जाता है।

उत्तराखंड: इस पहाड़ी राज्य में भी स्कूल के भोजन के हिस्से के रूप में अंडा परोसा जाता है।

मुख्य रूप से शाकाहारी मेनू वाले राज्य

देश के कई राज्य ऐसे हैं जहां मिड-डे मील का मेनू पूरी तरह या मुख्य रूप से शाकाहारी है और वहां अंडा नहीं दिया जाता:

दिल्ली: दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पीएम पोषण योजना के तहत मुख्य रूप से शाकाहारी भोजन ही प्रदान किया जाता है।

उत्तर प्रदेश: यूपी के स्कूलों में बड़े पैमाने पर शाकाहारी भोजन ही परोसा जाता है, जिसमें बिना अंडे के चावल, दाल, रोटी और मौसमी सब्जियां शामिल हैं।

गुजरात: यहां का मिड-डे मील पूरी तरह शाकाहारी है, जिसमें आमतौर पर चावल या खिचड़ी, दाल, सब्जियां और कभी-कभी दूध शामिल होता है।

मध्य प्रदेश: यहां का मेनू मुख्य रूप से शाकाहारी है, जो अनाज, दालों और सब्जियों पर केंद्रित है।

राजस्थान: सरकारी स्कूलों में शाकाहारी भोजन मिलता है, जिसके मुख्य मेनू में दाल, रोटी, चावल और सब्जियां शामिल हैं।

हरियाणा: यहां भी मिड-डे मील शाकाहारी है और इसमें अंडे शामिल नहीं हैं।

छत्तीसगढ़ और गोवा: छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से चावल, दाल और सब्जियों पर आधारित शाकाहारी भोजन मिलता है, जबकि गोवा का आधिकारिक मिड-डे मील मेनू भी शाकाहारी है।

महाराष्ट्र का विशेष मामला

महाराष्ट्र सरकार ने वित्तीय दिक्कतों का हवाला देते हुए पीएम पोषण योजना के तहत दिए जाने वाले अंडे और चीनी के लिए राज्य की फंडिंग को वापस ले लिया है। हालांकि स्कूलों को अंडा परोसने से रोका नहीं गया है लेकिन अगर वे इसे जारी रखना चाहते हैं तो उन्हें सार्वजनिक योगदान (जनसहयोग) या अन्य स्थानीय स्रोतों के माध्यम से खुद फंड की व्यवस्था करनी होगी।

बंगाल में फैसले को लेकर छिड़ा सियासी और पोषण संबंधी विवाद

पश्चिम बंगाल में इस फैसले के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने मेनू से अंडा हटाने के फैसले की आलोचना की है। उनका कहना है कि बड़ा सवाल यह है कि क्या धार्मिक खान-पान की मान्यताओं को एक सरकार द्वारा वित्तपोषित पोषण कार्यक्रम का रूप तय करना चाहिए, जो लाखों स्कूली बच्चों के लिए बनाया गया है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने विधानसभा में इस फैसले का बचाव किया। उन्होंने कहा कि हम मिड-डे मील पकाने की जिम्मेदारी इस्कॉन को दे रहे हैं। अगर आपको कोई आपत्ति है तो हरे कृष्णा न कहें, कोई आपको मजबूर नहीं करेगा। आपको खाने के लिए अच्छा और शुद्ध भोजन मिलेगा, चिंता की कोई बात नहीं है।

पोषण के नजरिए से कितना जरूरी है अंडा?

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (NIN) के मुताबिक अंडे को आहार प्रोटीन का सबसे कुशल और बेहतरीन स्रोत माना जाता है। इसकी प्रोटीन बायोअवेलेबिलिटीलगभग 94% होती है। इसके उलट चने की प्रोटीन बायोअवेलेबिलिटी लगभग 76% और सोयाबीन की करीब 54% होती है। अंडे जरूरी अमीनो एसिड, विटामिन और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। ये तत्व बच्चों के शारीरिक विकास, संज्ञानात्मक विकास और समग्र स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पश्चिम बंगाल में अब अंडों को लेकर बवाल, मिड डे मील से इसके हटने की सुगबुगाहट और इस्कॉन से जोड़ा जा रहा पूरा विवाद क्या है? समझिए

पश्चिम बंगाल मिड-डे मील विवाद (West Bengal Mid-Day Meal Controversy): पश्चिम बंगाल में स्कूलों के मिड-डे मील (स्कूली भोजन) के मेनू से अंडों को हटाए जाने की सुगबुगाहट को लेकर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। इस पूरे मामले को धार्मिक संस्था इस्कॉन (ISKCON) और राज्य की नई भाजपा सरकार से जोड़कर देखा जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया है कि राज्य में शाकाहार थोपने की कोशिश की जा रही है और इससे बच्चों के पोषण पर असर पड़ेगा। आइए समझते हैं कि आखिर यह पूरा विवाद क्या है और इस पर अलग-अलग पक्षों का क्या कहना है।

विवाद की शुरुआत: बजट में इस्कॉन को शामिल करने का प्रस्ताव

इस पूरे विवाद की जड़ पश्चिम बंगाल सरकार के नए बजट से जुड़ी है। सोमवार को राज्य का पहला बजट पेश करते हुए पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री स्वप्न दासगुप्ता ने घोषणा की थी कि मिड-डे मील योजना के तहत भोजन तैयार करने और उसके वितरण में इस्कॉन की सहायता लेने की उम्मीद है। इसके बाद ऐसी खबरें और सोशल मीडिया पर दावे सामने आने लगे कि कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के तहत आने वाले स्कूलों में जहां राज्य सरकार पके हुए भोजन की जिम्मेदारी इस्कॉन को सौंपने पर विचार कर रही है, वहां के मेनू से अंडों को पूरी तरह हटा दिया जाएगा। चर्चा यह भी चली कि इस्कॉन के नए मेनू में अंडों की जगह पौधों से मिलने वाले प्रोटीन जैसे कि पनीर और सोयाबीन को शामिल किया जा सकता है।

टीएमसी विधायक कुणाल घोष ने जताई चिंता, सरकार से पुनर्विचार की मांग की

तृणमूल कांग्रेस के विधायक कुणाल घोष ने सरकार के इन संकेतों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा कि वर्तमान में अंडे मिड-डे मील योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और बच्चों के पोषण में इनका बड़ा योगदान है। उन्होंने राज्य सरकार से ऐसे किसी भी कदम पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है जिससे अंडे मेनू से बाहर हो जाएं।

कुणाल घोष ने कहा कि, ‘इस्कॉन एक बेहद सम्मानित धार्मिक संस्था है, लेकिन समस्या यह है कि बच्चों को खाना खिलाना एक बड़ी चुनौती है। अंडा एक ऐसी चीज है जिसे बच्चे बहुत पसंद करते हैं। यह न केवल उनके पोषण और स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, बल्कि बच्चों को काफी आकर्षित भी करता है। चूंकि इस्कॉन एक धार्मिक संगठन है, इसलिए यदि वे मिड-डे मील तैयार करेंगे तो उन्हें भोजन को पूरी तरह से शाकाहारी रखना होगा। ऐसे में बच्चों का मेनू नॉन-वेजिटेरियन से वेजिटेरियन हो जाएगा और अंडे पूरी तरह से खत्म हो जाएंगे। इसलिए हम सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध करते हैं।’

डेरेक ओ’ब्रायन का भाजपा सरकार पर तीखा हमला, ‘बंगाल में शाकाहार थोपने की कोशिश’

तृणमूल कांग्रेस के संयुक्त सचिव और राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने भी इस मुद्दे को लेकर भाजपा पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि बंगाल की नई भाजपा सरकार बच्चों को पोषण से वंचित कर रही है और राज्य में जबरन शाकाहार थोपने की कोशिश कर रही है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में ओ’ब्रायन ने इस विवाद को चुनाव प्रचार के दौरान खान-पान की आदतों पर हुई राजनीतिक बहस से जोड़ते हुए लिखा कि चुनाव अभियान के दौरान ‘मछली खाने’ के तमाशे के बाद, आखिरकार गुजरात जिमखाना का असली रूप सामने आ गया है। बंगाल में नई भाजपा सरकार काम पर लग गई है। विरोधियों पर अंडे फेंको, लेकिन मिड-डे मील से अंडे हटाकर बच्चों को पोषण से वंचित कर दो। शाकाहार थोपा जा रहा है। बंगाल इसे खारिज करता है।’

अफवाहों पर इस्कॉन का स्पष्टीकरण- अभी कोई मेनू फाइनल नहीं हुआ

विवाद और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे दावों के बीच इस्कॉन कोलकाता के उपाध्यक्ष राधारमण दास ने स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने वायरल हो रहे कथित मेनू को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि अभी भोजन सूची को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। राधारमण दास ने X पर पोस्ट में कहा कि, ‘मेरे संज्ञान में आया है कि कुछ लोग कोलकाता में मिड-डे मील के लिए एक प्रस्तावित मेनू साझा कर रहे हैं। हालांकि, मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि ऐसा कोई भी मेनू अभी फाइनल नहीं किया गया है और न ही यह सूची हमारी ओर से जारी की गई है। एक बार मेनू फाइनल हो जाने के बाद, हम इसकी आधिकारिक घोषणा करेंगे। कृपया इस तरह की गलत जानकारी साझा करने से बचें।’

क्या हैं मिड-डे मील (PM POSHAN) के नियम?

शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, ‘पीएम पोषण’ (प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण) योजना के तहत सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में बालवाटिका और कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को गर्म पका हुआ भोजन दिया जाता है। इस योजना के नियम कुछ इस तरह हैं-

स्थानीय मेनू की छूट: केंद्र सरकार के नियमों के तहत, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह छूट दी गई है कि वे निर्धारित पोषण मानकों का पालन करते हुए स्थानीय परिस्थितियों और प्राथमिकताओं के अनुरूप अपना मेनू खुद तय कर सकते हैं।

गुणवत्ता और स्वच्छता गाइडलाइंस: केंद्र सरकार ने भोजन की गुणवत्ता, सुरक्षा और स्वच्छता को लेकर कड़े दिशानिर्देश जारी किए हैं। इसमें प्रमाणित सामग्री का उपयोग, रसोइयों का प्रशिक्षण और बच्चों को परोसे जाने से पहले स्कूल प्रबंधन समिति के सदस्यों व शिक्षकों द्वारा भोजन को अनिवार्य रूप से चखना शामिल है।

मुख्य जिम्मेदारी: इस योजना को जमीनी स्तर पर लागू करने और बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की पूरी जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन की होती है।

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