Accenture Q3 Results: एक्सेंचर के कमजोर नतीजों ने तोड़ी आईटी शेयरों की कमर, अब इस सेक्टर में क्या हो निवेश रणनीति?

Accenture Q3 Results: एक्सेंचर(Accenture) के कमजोर नतीजे और गाइडेंस ने आज आईटी सेक्टर की कमर तोड़ दी है। निफ्टी का आईटी इंडेक्स करीब 6 फीसदी फिसला है। आज निफ्टी और वायदा के सभी टॉप लूजर्स IT शेयर हैं। टेक महिंद्रा,इंफोसिस,TCS और एम्फैसिस 5-8 फीसदी तक लुढ़के हैं। कंपनी के तीसरी तिमाही के नतीजे काफी खराब रहे हैं। इसने अपना आगे का अनुमान भी घटा दिया है।

Accenture Q3 नतीजे (YoY)

तीसरी तिमाही में EPS 3.49 डॉलर से बढ़कर 3.80 डॉलर रहा है। रेवेन्यू 5.6% बढ़कर 18.76 अरब डॉलर रही है। Q3 में आय अनुमान से कम रही है। नई बुकिंग्स 1.9% घटकर 19.32 अरब डॉलर रही हैं। कंसल्टिंग बुकिंग्स 13% बढ़ी हैं। ऑपरेटिंग कैश फ्लो 3.79 अरब डॉलर रहा है। वहीं, मैनेज्ड सर्विसेज बुकिंग्स 15% घटी है। बड़े AI ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम्स बढ़ने की उम्मीद है।

Accenture Q4 गाइडेंस

रेवेन्यू 17.75-18.4 अरब डॉलर रहने का अनुमान है। रेवेन्यू ग्रोथ 1 से 5% रहने का अनुमान है। रेवेन्यू गाइडेंस 18.47 अरब डॉलर के अनुमान से कम रहा है। Accenture के FY26 आउटलुक की बात करें तो FY26 के लिए आय ग्रोथ अनुमान घटाकर 3-4% कर दिया गया है, जो पहले 3-5% था। फेडरल असर को छोड़कर रेवेन्यू ग्रोथ 4-5% रहने का अनुमान (पहले 4-6% था)हैं। वहीं, Adj EPS आउटलुक बढ़ाकर 13.78-13.90 डॉलर किया गया है। ऑपरेटिंग और फ्री कैश फ्लो आउटलुक बकररार रखा गया है। वेस्ट एशिया युद्ध से रेवेन्यू पर 10 करोड़ डॉलर और सेल्स पर 40 करोड़ डॉलर का असर पड़ा है।

Accenture के नतीजों का असर

गुरुवार को Accenture का शेयर 18 फीसदी गिरा। यह इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट है। Accenture के नतीजों के बाद Cognizant में 10.5 फीसदी, Capgemini में 9 फीसदी, Infosys ADR में 10 फीसदी और Wipro ADR में 4 फीसदी की गिरावट हुई।

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IT शेयरों में अब क्या हो रणनीति?

सीएनबीसी-आवाज़ के मैनेजिंग एडिटर अनुज सिंघल में कहा है कि निफ्टी IT मार्च में 28,500 तक गिरा था। वहां से 31,800 की रैली हुई जिसमें हमने फंसने से बचाया। कई लोग उस रैली में बुरी तरह फंस गए थे। उसके बाद वहां से फिर वन-वे गिरावट आई और 14 मई का क्लोज 27,360 था। फिर वहां से 31,116 तक की एक बड़ी रैली हुई जिसमें फिर हमने फंसने से बचाया, फिर भी कुछ लोग उस रैली में बुरे फंस गए। इसके बाद 16 जून तक वाली गिरावट में 27,800 की क्लोजिंग मिली। इस बार ये नजरिया लिया गया कि शायद एक डबल बॉटम बना है। अब जब तक 27,500 के ऊपर हैं,बहुत बड़ी गिरावट शायद ना हो। मगर लार्ज कैप IT से CNBC-आवाज ने हमेशा सतर्क ही किया है।

Accenture के नतीजे से एक बात साफ है कि ट्रेडिशनल IT बिजनेस पर दबाव है। अब IT कंपनियों को कुछ बोल्ड कदम उठाने होंगे। जैसे HCLTech ने Sarvam में निवेश किया और Coforge ने कुछ बड़े अधिग्रहण किए। मगर अब आज की गिरावट के बाद शॉर्ट करना थोड़ा रिस्की होगा। आज की क्लोजिंग साफ कर देगी कि IT में डबल बॉटम बना या नहीं।

 

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डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

INR vs USD: डॉलर के मुकाबले रुपया 94.35 पर खुला, क्रूड में नरमी से मिल रहा सपोर्ट, आगे कैसा रहेगा आउटलुक

INR vs USD:  शुक्रवार, 19 जून को रुपया US डॉलर के मुकाबले 2 पैसे की मामूली गिरावट के साथ 94.35 पर खुला, क्योंकि US फेडरल रिजर्व के सख्त रुख के बाद घरेलू फ्लो और सेंटिमेंट में सुधार से मजबूत डॉलर के असर को कम करने में मदद मिली।

मार्केट पार्टिसिपेंट्स ने बताया कि हाल के सेशंस में कैपिटल फ्लो भारतीय करेंसी के लिए तेजी से सपोर्टिव हो गया है। घरेलू डेट मार्केट में मजबूत इनफ्लो, इक्विटी से विदेशी पोर्टफोलियो आउटफ्लो में कमी और इंपोर्टर्स और एक्सपोर्टर्स की बैलेंस्ड भागीदारी ने फॉरेक्स मार्केट में डिमांड-सप्लाई डायनामिक्स को बेहतर बनाने में मदद की है।

बैंकर्स ने बताया कि इंपोर्टर हेजिंग एक्टिविटी अभी भी ऊंची बनी हुई है, लेकिन मार्केट में एकतरफा डॉलर डिमांड से एक साफ बदलाव देखा गया है, जिसने हाल के हफ्तों में रुपये पर दबाव डाला था। इससे पहले, इंपोर्टर्स की तेज खरीदारी और लगातार विदेशी फंड आउटफ्लो ने लोकल करेंसी पर दबाव बनाए रखा था।

रुपये को विदेशी कैपिटल को आकर्षित करने और डॉलर इनफ्लो को बढ़ाने के मकसद से पॉलिसी उपायों से भी फायदा हुआ है। इसके अलावा, US-ईरान शांति समझौते के बाद कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट से भारत के इंपोर्ट बिल को लेकर चिंता कम हुई है, जिससे करेंसी को लेकर ओवरऑल सेंटिमेंट बेहतर हुआ है।

मज़बूत इनफ्लो, तेल की कम कीमतों और मार्केट में बढ़ते भरोसे के मेल से US डॉलर में नई मज़बूती के बावजूद रुपया मज़बूत बना हुआ है।

क्रूड में नरमी से मिला रुपये को मजबूत सपोर्ट

मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कच्चा तेल अभी भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपये के लिए सबसे बड़ा पॉज़िटिव फ़ैक्टर बना हुआ है। ब्रेंट क्रूड अभी $75–78 प्रति बैरल की रेंज में ट्रेड कर रहा है, जो इस साल की शुरुआत में ईरान संघर्ष से पहले के लेवल पर वापस आ गया है। हालांकि हाल ही में हुए US-ईरान शांति समझौते ने तुरंत सप्लाई की चिंताओं को कम किया है, लेकिन एनालिस्ट एक बड़े स्ट्रक्चरल ट्रेंड की ओर इशारा करते हैं जो तेल की कीमतों को कम रख सकता है।

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) को उम्मीद है कि 2027 तक ग्लोबल तेल सप्लाई लगभग 8 मिलियन बैरल प्रति दिन बढ़ जाएगी, जबकि डिमांड ग्रोथ केवल लगभग 2 मिलियन बैरल प्रति दिन रहने का अनुमान है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि सप्लाई-डिमांड के इस बढ़ते अंतर से तेल की कीमतों पर एक नैचुरल लिमिट लग सकती है, जिससे भारत जैसी तेल इंपोर्ट करने वाली इकॉनमी को सपोर्ट मिल सकता है।

पॉजिटिव सेंटिमेंट में यह भी शामिल है कि गल्फ के रास्ते तेल शिपमेंट नॉर्मल हो गए हैं, सऊदी अरब और UAE के टैंकर महीनों की रुकावटों के बाद रेगुलर ऑपरेशन फिर से शुरू कर रहे हैं, जिससे सप्लाई में रुकावटों को लेकर चिंता और कम हो गई है।

बेहतर फंडामेंटल्स के बीच रुपये में रिकवरी जारी

करेंसी स्ट्रैटेजिस्ट्स का कहना है कि तेल की कीमतों में गिरावट पर रुपये ने पॉजिटिव रिस्पॉन्स दिया है, लगातार पांच सेशन तक मजबूत हुआ है और 94.30–94.60 प्रति डॉलर की रेंज में आराम से ट्रेड कर रहा है। यह कुछ हफ्ते पहले देखे गए दबाव से एक बड़ी रिकवरी है, जब क्रूड ऑयल की ऊंची कीमतों और विदेशी आउटफ्लो ने करेंसी पर दबाव डाला था।

एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि कैपिटल फ्लो में सुधार, इंपोर्ट से जुड़ी डॉलर की कम डिमांड और जियोपॉलिटिकल रिस्क में कमी, इन सभी ने रुपये की हालिया मजबूती में योगदान दिया है।

फेड के सख्त रवैये से डॉलर को मिला सपोर्ट

हालांकि रुपया मजबूत हुआ है, लेकिन एनालिस्ट चेतावनी दे रहे हैं कि फेडरल रिजर्व के पॉलिसी रुख से US डॉलर को सपोर्ट मिलता रहेगा।

US सेंट्रल बैंक ने इंटरेस्ट रेट को 3.50%-3.75% पर बिना किसी बदलाव के रखा, लेकिन पॉलिसी बनाने वालों ने तुलनात्मक रूप से सख्त रुख बनाए रखा, जिसमें कमिटी के लगभग आधे सदस्य अभी भी इस साल कम से कम एक और रेट बढ़ने की उम्मीद कर रहे हैं।

हाल के US इकोनॉमिक डेटा ने भी डॉलर की मजबूती को और मजबूत किया है। शुरुआती बेरोजगारी के दावे कम होकर 226,000 हो गए, जबकि छंटनी अब भी ऐतिहासिक रूप से कम है। हालांकि लगातार दावे बढ़े हैं, एक्सपर्ट्स का कहना है कि लेबर मार्केट तेजी से कमजोर होने के बजाय धीरे-धीरे ठंडा होता दिख रहा है।

इस वजह से, डॉलर को जल्द ही सपोर्ट मिल सकता है, हालांकि मार्केट यह देखना जारी रखेंगे कि क्या महंगाई कम होने और एनर्जी की कीमतों में नरमी से फेड आखिरकार ज्यादा न्यूट्रल रुख अपना पाएगा।

एक्सपर्ट्स का यह भी मानना ​​है कि रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया अपने बाहरी बफ़र्स को मज़बूत करने के लिए अच्छे मार्केट हालात का फ़ायदा उठा रहा है। कच्चे तेल की कम कीमतों और बेहतर विदेशी करेंसी इनफ़्लो से रुपये को सपोर्ट मिलने के साथ, RBI से उम्मीद है कि वह फ़ॉरेक्स रिज़र्व को फिर से भरने के लिए एक्टिव रूप से डॉलर खरीदेगा और धीरे-धीरे अपनी बड़ी फ़ॉरवर्ड डॉलर पोज़िशन को कम करेगा, जिसका अनुमान लगभग $110 बिलियन है।

मार्केट पार्टिसिपेंट्स का अनुमान है कि सेंट्रल बैंक ने पिछले कुछ सेशन में मार्केट से $3-5 बिलियन एब्ज़ॉर्ब किए होंगे। एनालिस्ट्स ज़ोर देते हैं कि इस तरह का दखल करेंसी के ट्रैजेक्टरी को लेकर किसी चिंता के बजाय समझदारी भरे रिज़र्व मैनेजमेंट को दिखाता है।

हालांकि ये खरीदारी रुपये की बढ़त की रफ़्तार को कम कर सकती हैं, एक्सपर्ट्स का कहना है कि इनसे करेंसी की रिकवरी ज़्यादा टिकाऊ होगी और भविष्य के बाहरी झटकों से कम कमज़ोर होगी।

रुपये का आउटलुक

CR फ़ॉरेक्स एडवाइज़र्स के MD, अमित पाबारी के अनुसार, तेल की कीमतें सपोर्टिव बनी हुई हैं, विदेशी इनफ़्लो बेहतर हो रहे हैं, और डॉलर की मज़बूती नए सवालों का सामना कर रही है।

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

होर्मुज खुला, लेकिन सिर्फ 60 दिन फ्री रहेगा:अमेरिका ₹28 लाख करोड़ देगा, बदले में ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा; समझौते के 14 पॉइंट की पूरी डिटेल

अमेरिका और ईरान ने जंग खत्म करने के समझौते के मसौदे पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने बुधवार देर रात डिजिटल हस्ताक्षर किए, जिसके साथ ही यह समझौता लागू हो गया। इस डील से जुड़े एक अमेरिकी अधिकारी ने बुधवार को रिपोर्टरों के साथ हुई एक कॉन्फ्रेंस कॉल में 14 पॉइंट्स वाली डील की पूरी जानकारी दी है। 800 शब्दों वाले डेढ़ पन्ने के इस दस्तावेज में होर्मुज को सिर्फ 60 दिनों के लिए मुफ्त खोले जाने की बात कही गई है। डील में ईरान ने परमाणु हथियार नहीं बनाने का भरोसा दिया है, जबकि ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर (28 लाख करोड़ रुपए) के फंड की योजना पर भी सहमति बनी है। अधिकारी ने अपनी पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर यह जानकारी दी। समझौते के मसौदे में शामिल 14 पॉइंट्स की पूरी डिटेल (क्रम बदल सकते हैं) पॉइंट-1: होर्मुज स्ट्रेट फिर से खोला जाएगा ईरान ने वादा किया है कि वह होर्मुज स्ट्रेट फिर से खोल देगा। यह व्यवस्था 60 दिनों तक लागू रहेगी। इस दौरान जहाजों से एक्स्ट्रा टैक्स नहीं लिया जाएगा। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक इस समझौते की सबसे अहम लाइन है- सिर्फ 60 दिनों तक बिना किसी फीस के। इसका मतलब है कि 60 दिन पूरे होने के बाद ईरान जहाजों पर शुल्क या फीस लगा सकता है। युद्ध से पहले ईरान आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय जहाजों से इस तरह का पैसा नहीं लेता था। अब टैक्स लगाने से वैश्विक समुद्री व्यापार की लागत बढ़ सकती है। पॉइंट-2: ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा समझौते में ईरान ने एक बार फिर भरोसा दिया है कि वह कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और न ही उन्हें हासिल करने की कोशिश करेगा। दस्तावेज में कहा गया है कि ईरान के पास पहले से मौजूद संवर्धित यूरेनियम (एनरिच्ड यूरेनियम) के भंडार का क्या किया जाएगा, इस पर दोनों देश मिलकर फैसला करेंगे। इसके लिए एक अलग व्यवस्था बनाई जाएगी, जिस पर आगे की बातचीत में सहमति बनेगी। फिलहाल न्यूनतम सहमति यह है कि इस संवर्धित सामग्री को ईरान के भीतर ही इस तरह बदला जाएगा कि उससे परमाणु हथियार बनाना संभव न रहे। यह पूरी प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में होगी। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक यह समझौते का सबसे अहम हिस्सा माना जा रहा है, क्योंकि इसमें पहली बार सीधे ईरान के परमाणु कार्यक्रम की बात की गई है। यही मुद्दा अमेरिका और ईरान के बीच टकराव और युद्ध की सबसे बड़ी वजह रहा है। हालांकि इस पॉइंट में सबसे विवादित मुद्दों पर स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है। दस्तावेज में ईरान ने फिर से कहा है कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा, लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। ईरान ने 1970 में परमाणु अप्रसार संधि में शामिल होने के समय भी यही वादा किया था। बाद में 2015 के परमाणु समझौते में भी उसने यही कहा था कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। समझौते में ईरान से कहा गया है कि वह अपने पास मौजूद लगभग 11 टन संवर्धित परमाणु सामग्री को कम घनत्व वाला बनाए। इसे डाउन-ब्लेंडिंग कहा जाता है। इसका मतलब है कि यूरेनियम को इतना पतला कर दिया जाए कि उसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में न हो सके। इन 11 टन सामग्री में करीब 440 किलो ऐसा यूरेनियम भी शामिल है, जिसे 60% तक एनरिच्ड किया जा चुका है। यह स्तर परमाणु बम बनाने के लिए जरूरी स्तर के काफी करीब माना जाता है। लेकिन समझौते में यह नहीं कहा गया है कि ईरान को यह सामग्री देश से बाहर भेजनी होगी। ईरान लंबे समय से अपने यूरेनियम भंडार को विदेश भेजने का विरोध करता रहा है। हालांकि, 2015 के परमाणु समझौते में ईरान ने अपने उस समय के लगभग 97 प्रतिशत एनरिच्ड यूरेनियम भंडार को रूस भेज दिया था। यही कारण है कि अभी कई बड़े सवाल अनसुलझे हैं। जैसे… पॉइंट-3: ईरान को ₹28 लाख करोड़ का हर्जाना अमेरिका ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर, यानी 28 लाख करोड़ रुपए की योजना तैयार करने का वादा किया है। हालांकि, यह पैसा तुरंत नहीं दिया जाएगा। पहले अमेरिका और ईरान को 60 दिनों में अंतिम समझौते पर पहुंचना होगा। इससे ही तय होगा कि 300 अरब डॉलर का फंड कैसे बनाया जाएगा, पैसा कहां से आएगा और उसे किस तरह खर्च किया जाएगा। राष्ट्रपति ट्रम्प पहले ही कह चुके हैं कि इस फंड में अमेरिका सीधे पैसा नहीं लगाएगा। हालांकि, उन्होंने यह संभावना जरूर खुली छोड़ी कि खाड़ी देश, जैसे सऊदी अरब, कतर और UAE इस फंड के लिए पैसा उपलब्ध करा सकते हैं। पॉइंट-4: ईरानी तेल के निर्यात पर छूट समझौते के बाद अमेरिका ईरानी तेल के निर्यात पर राहत देना शुरू कर देगा। इसके लिए अमेरिकी वित्त मंत्रालय जरूरी छूट और मंजूरियां जारी करेगा, ताकि ईरान अपना तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच सके। यह राहत सिर्फ तेल बेचने तक सीमित नहीं होगी। इसमें बैंकिंग लेन-देन, बीमा, जहाजरानी, माल ढुलाई और अन्य वित्तीय सेवाओं से जुड़ी बाधाओं को भी कम किया जाएगा, जो ईरान के तेल निर्यात में रुकावट बनती रही हैं। यह व्यवस्था तब तक जारी रहेगी, जब तक ईरान पर लगे सभी प्रतिबंधों को हटाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक समझौते का यह हिस्सा ईरान के खिलाफ सख्त रुख रखने वाले नेताओं और विशेषज्ञों के बीच सबसे ज्यादा चिंता का कारण बना हुआ है। उनका मानना है कि तेल निर्यात पर लगी रोक अमेरिका का सबसे प्रभावी दबाव का साधन थी। इसी के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव बना हुआ था। पॉइंट-5: ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटेंगे अमेरिका ने ईरान पर लगे सभी प्रतिबंधों को एक-एक करके खत्म करने का वादा किया है। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, अमेरिका ईरान पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देकर उसे अपने परमाणु कार्यक्रम पर सख्त शर्तें मानने के लिए तैयार करना चाहता है। माना जा रहा है कि प्रतिबंधों में छूट ही वह सबसे बड़ा फायदा है, जो अमेरिका ईरान को समझौते के बदले दे सकता है। यही व्यवस्था 2015 के परमाणु समझौते में भी अपनाई गई थी। उस समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कई प्रतिबंध स्वीकार किए थे और बदले में उसे आर्थिक प्रतिबंधों से राहत मिली थी। हालांकि उस समझौते में लगी पाबंदियों की अवधि अधिकतम 15 साल थी। लेकिन ट्रम्प का कहना है कि वे ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर हमेशा के लिए प्रतिबंध चाहते हैं। पॉइंट-6: ईरान की फ्रीज्ड संपत्तियां रिलीज होंगी समझौते के तहत अमेरिका ने वादा किया है कि वह ईरान की फ्रीज्ड संपत्तियों को छोड़ देगा। हालांकि, यह पैसा कब और कैसे जारी होगा, यह दोनों देश बातचीत से तय करेंगे। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक इसका मतलब यह हो सकता है कि अंतिम समझौता होने का इंतजार किए बिना ही ईरान के लिए अरबों डॉलर की रकम जारी होना शुरू हो जाए। अनुमान है कि यह राशि 24 अरब डॉलर या उससे भी अधिक हो सकती है। पॉइंट-7: अमेरिका समुद्री नाकेबंदी हटाएगा ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिका नौसैनिक नाकेबंदी 30 दिन के भीतर पूरी तरह खत्म करेगा। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक नाकेबंद हटने से ईरान फिर से अपने बंदरगाहों से तेल और अन्य सामान खरीद-बेच सकेगा। यह ईरान के लिए बहुत बड़ी और तत्काल राहत होगी, क्योंकि उसके ज्यादातर निर्यात चीन को जाते हैं। जैसे ही निर्यात दोबारा शुरू होगा, ईरान के पास विदेशी मुद्रा आनी शुरू हो जाएगी। पॉइंट-8: एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देंगे अमेरिका-ईरान एक-दूसरे की आजादी, सीमाओं और संप्रभुता का सम्मान करेंगे। घरेलू मामलों में दखल नहीं देंगे। समझौते का यह हिस्सा ईरान के सरकार विरोधी गुटों को पसंद नहीं आ सकता। इन्हें उम्मीद थी कि अमेरिका भविष्य में भी ईरान में राजनीतिक बदलाव या लोकतंत्र समर्थक आंदोलनों का खुलकर समर्थन करेगा। दरअसल, इसी साल ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान ट्रम्प ने प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए कहा था कि उनकी मदद की जाएगी। लेकिन नए समझौते के मुताबिक माना जा रहा है कि ईरान के अंदरूनी मुद्दों को लेकर अमेरिका का रुख पहले की तुलना में नरम हुआ है। पॉइंट-9: लेबनान समेत सभी मोर्चों पर संघर्ष खत्म होगा अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी देशों के बीच सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई तुरंत और स्थायी रूप से बंद की जाएगी। इसमें लेबनान भी शामिल है। अमेरिका के लिए यह मुद्दा इसलिए अहम है, क्योंकि ट्रम्प को चिंता थी कि हिजबुल्लाह के खिलाफ इजराइल की सैन्य कार्रवाई पीस डील को कमजोर कर सकती है। पहला पॉइंट इजराइल के खिलाफ माना जा रहा है। इजराइल पहले ही कह चुका है कि वह अमेरिका-ईरान बातचीत में लेबनान को लेकर हुई किसी भी सहमति को नहीं मानेगा। पॉइंट-10: दोनों पक्ष मौजूदा स्थिति में बदलाव नहीं करेंगे समझौते में कहा गया है कि जब तक अमेरिका और ईरान के बीच अंतिम समझौता नहीं हो जाता, तब तक दोनों पक्ष मौजूदा स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं करेंगे। इसका मतलब है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को अभी जिस स्तर पर चला रहा है, उससे आगे नहीं बढ़ाएगा। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि अंतिम समझौते तक दोनों पक्ष कोई नया दबाव न बनाएं। ईरान परमाणु कार्यक्रम नहीं बढ़ाएगा और अमेरिका नए प्रतिबंध या अतिरिक्त सैन्य तैनाती नहीं करेगा। पॉइंट-11: दोनों देश मिलकर निगरानी व्यवस्था बनाएंगे अमेरिका और ईरान मिलकर एक विशेष निगरानी व्यवस्था बनाएंगे, जो यह देखेगी कि MoU की सभी शर्तों का सही तरीके से पालन हो रहा है या नहीं। यह सिस्टम इस बात की जांच करेगा कि: न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि अमेरिका यह तय करना चाहता है कि ईरान के हर वादे की स्वतंत्र रूप से जांच और पुष्टि की जा सके। यानी केवल ईरान के वादे करना पर्याप्त नहीं होगा। पॉइंट-12: तुरंत सभी मुद्दों पर बातचीत शुरू नहीं होगी दोनों देशों को समझौते के कुछ अहम बिंदुओं को लागू करना होगा। इनमें युद्धविराम बनाए रखना, होर्मुज को खोलना, नौसैनिक नाकेबंदी हटाना, तेल निर्यात पर राहत देना और ईरान की फ्रीज्ड संपत्तियों तक पहुंच बहाल करना जैसे कदम शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक इससे पता चलता है कि आगे सबसे बड़ा और सबसे अहम विषय ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही होगा। परमाणु गतिविधियों की सीमा क्या होगी, एनरिच्ड यूरेनियम का क्या होगा, मॉनीटरिंग कैसे होगी और प्रतिबंध किस तरह हटाए जाएंगे, जैसे सवाल अभी पूरी तरह तय नहीं हुए हैं। पॉइंट-13: 60 दिनों में अंतिम समझौते का टारगेट अमेरिका-ईरान ने अधिकतम 60 दिनों में समझौता लागू करने का टारगेट रखा है। हालांकि, दोनों देश सहमति से इसे आगे भी बढ़ा सकते हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक अमेरिकी अधिकारी मानते हैं कि इतने कम समय में अंतिम समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा। खासकर इसलिए क्योंकि ईरान के साथ पहले हुई परमाणु बातचीत में कई साल लग चुके हैं। हालांकि, ट्रम्प सरकार ने जानबूझकर यह समय सीमा तय की है। अगर तय समय में यह समझौता हो जाता है, तो अमेरिका में नवंबर में होने वाले मिडटर्म इलेक्शन में राष्ट्रपति ट्रम्प को फायदा हो सकता है। पॉइंट-14: अंतिम समझौते को UNSC मंजूरी देगी जब अमेरिका और ईरान के बीच अंतिम समझौता हो जाएगा, तो उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के एक प्रस्ताव के जरिए मंजूरी दी जाएगी। इसका मतलब है कि अंतिम समझौता केवल अमेरिका और ईरान के बीच का राजनीतिक समझौता नहीं रहेगा, बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय कानूनी मान्यता भी मिल जाएगी। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे समझौते को मजबूती मिलेगी, जैसा कि पिछले वर्ष गाजा से जुड़े समझौते के मामले में हुआ था, जिसे भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का समर्थन मिला था। हालांकि कई एक्सपर्ट्स को शक है कि यह चरण वास्तव में आएगा भी या नहीं। —————————————- अमेरिका- ईरान से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें अमेरिका-ईरान युद्ध खत्म, ट्रम्प चिल्लाकर बोले- डील साइन:ईरानी राष्ट्रपति पजशकियान ने डिजिटल दस्तखत किए, पेरिस के वर्साय पैलेस में समझौता अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने के लिए अंतरिम समझौते (MoU) पर दस्तखत हो गए हैं। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प ने बुधवार को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ बैठक के दौरान पेरिस के वर्साय पैलेस में इस दस्तावेज पर साइन किए। पूरी खबर पढ़ें

वर्ल्ड अपडेट्स:भारत के बेने मेनाशे समुदाय को इजराइल लाएगी नेतन्याहू सरकार

इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने घोषणा की है कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों मिजोरम और मणिपुर में रहने वाले बेने मेनाशे समुदाय के सभी शेष सदस्यों को अगले चार वर्षों में इजराइल लाया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह समुदाय यहूदी लोगों का अभिन्न हिस्सा है और इजराइल उनका घर है। हाल ही में इजराइल के नोफ हा-गलील शहर में बसे भारतीय मूल के यहूदी प्रवासियों को संबोधित करते हुए नेतन्याहू ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मजबूत संबंधों के कारण दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष की शुरुआत से अब तक समुदाय के करीब 600 सदस्य इजराइल पहुंच चुके हैं। वर्ष 2026 के अंत तक लगभग 600 और लोगों के आने की उम्मीद है। बेने मेनाशे का अर्थ है “मनश्शे के पुत्र”। यह समुदाय मुख्य रूप से मिजोरम और मणिपुर में रहता है। समुदाय के लोग सबाथ का पालन, यहूदी त्योहारों का आयोजन, कोषेर भोजन परंपरा और अन्य यहूदी रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। वे स्वयं को इजराइल की “दस खोई हुई जनजातियों” में से एक मनश्शे जनजाति का वंशज मानते हैं, जिसे लगभग 2,700 वर्ष पहले असीरियाई साम्राज्य ने निर्वासित कर दिया था। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी अन्य बड़ी खबरें… पाकिस्तान में सैनिटरी पैड और गर्भनिरोधक प्रोडक्ट्स पर 18% टैक्स खत्म करेगा पाकिस्तान सरकार सैनिटरी पैड और गर्भनिरोधक प्रोडक्ट्स पर लगने वाला 18% सेल्स टैक्स खत्म करने की तैयारी कर रही है। पिछले हफ्ते पेश किए गए बजट में सरकार ने टैक्स हटाने का प्रस्ताव रखा था। पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने कहा कि सैनिटरी प्रोडक्ट्स महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और सामाजिक जीवन में उनकी भागीदारी के लिए बेहद जरूरी हैं। इसके पीछे उन्होंने देश की तेजी से बढ़ती आबादी को वजह बताया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान आबादी के मामले में दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा देश है और परिवार नियोजन सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। यूनिसेफ के अनुसार पाकिस्तान में केवल 12% महिलाएं और लड़कियां ही बाजार में मिलने वाले सैनिटरी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करती हैं। बाकी महिलाएं कपड़े या घर में तैयार किए गए अन्य विकल्पों का सहारा लेती हैं। यूनिसेफ के मुताबिक स्थानीय और अन्य टैक्स को जोड़ने के बाद पाकिस्तान में महिलाओं को सैनिटरी प्रोडक्ट्स खरीदने के लिए करीब 40% अतिरिक्त टैक्स चुकाना पड़ता है। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और कमजोर वर्ग की महिलाओं पर पड़ता है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार 2025 के मध्य तक पाकिस्तान की लगभग 45% आबादी प्रतिदिन 4.20 डॉलर (करीब 1,175 पाकिस्तानी रुपए) की आय वाली निम्न-मध्यम आय गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिता रही थी।
वहीं एक पैकेट में मिलने वाले 10 सैनिटरी पैड की कीमत औसतन एक दिन की कमाई के एक-तिहाई से भी ज्यादा होती है। कई मामलों में एक पैकेट पूरे महीने के लिए पर्याप्त भी नहीं होता। अमेरिका में स्काइडाइविंग विमान हादसा: भारतीय टेक प्रोफेशनल समेत 12 की मौत
अमेरिका के मिसौरी राज्य में स्काइडाइविंग के लिए इस्तेमाल होने वाला एक विमान रविवार सुबह टेकऑफ के तुरंत बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया। हादसे में 24 वर्षीय भारतीय टेक प्रोफेशनल साई कार्तिक वर्मा दतला समेत सभी 12 लोगों की मौत हो गई। यह दुर्घटना बेट्स काउंटी स्थित बटलर मेमोरियल एयरपोर्ट के पास हुई। अधिकारियों के मुताबिक, स्काइडाइव कैनसस सिटी द्वारा संचालित पैसिफिक एयरोस्पेस P750XL विमान उड़ान भरने के कुछ देर बाद वापस लौटने की कोशिश करता दिखाई दिया। इसके बाद विमान एयरपोर्ट के नजदीक एक खेत में गिर गया और टक्कर के साथ उसमें आग लग गई। हादसे में विमान में सवार सभी लोगों की मौत हो गई। साई कार्तिक वर्मा दतला कैनसस सिटी क्षेत्र में कार्यरत भारतीय टेक प्रोफेशनल थे। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट्रल मिसौरी से पढ़ाई की थी और हेल्थकेयर टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम कर रहे थे। उनकी विशेषज्ञता क्लाउड कंप्यूटिंग, डेवऑप्स इंजीनियरिंग और आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर में थी। हादसे में यूनाइटेड स्टेट्स पैराशूट एसोसिएशन की टेक्नोलॉजी डायरेक्टर जेन शार्प, संगीत शिक्षक डेव हर्शबर्गर, कैंसर सर्वाइवर और अनुभवी स्काइडाइवर मैथ्यू स्वोप, वीडियोग्राफर डस्टिन मैककिनी, प्रशिक्षक बनने की तैयारी कर रहे विल फिशर समेत कई अनुभवी स्काइडाइवर्स और प्रशिक्षकों की भी मौत हुई। वियतनाम में बिल्ली तस्करी गिरोह का भंडाफोड़: कैट-मीट बाजार में बेचने की थी तैयारी
वियतनाम के हो ची मिन्ह सिटी में पुलिस ने पालतू बिल्लियों की चोरी और तस्करी करने वाले बड़े गिरोह का भंडाफोड़ किया है। कार्रवाई में 400 से ज्यादा जिंदा बिल्लियों को बचाया गया, जिन्हें अवैध कैट-मीट बाजार में बेचने के लिए वधशालाओं तक पहुंचाने की तैयारी थी। मामले में नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया है। आरोपियों ने पूछताछ में स्वीकार किया कि वे पिछले तीन वर्षों से इस नेटवर्क का संचालन कर रहे थे। पालतू जानवरों की चोरी की लगातार मिल रही शिकायतों के आधार पर पुलिस ने गिरोह के सप्लाई नेटवर्क का पता लगाया और एक वितरण केंद्र पर छापा मारा। छापेमारी के दौरान 400 से अधिक जिंदा बिल्लियां बरामद की गईं। वहीं, बर्फ में संरक्षित 80 मृत बिल्लियां भी मिलीं, जिन्हें कथित तौर पर खाद्य प्रसंस्करण के लिए तैयार रखा गया था। पशु अधिकार संगठनों ने इस कार्रवाई को वियतनाम के इतिहास में सबसे बड़े पशु बचाव अभियानों में से एक बताया है।

दुनिया के 16 नेताओं से छोटे हैं ट्रम्प:91% नेताओं से ज्यादा उम्रदराज, उनसे 10 साल ज्यादा सऊदी किंग की उम्र

डोनाल्ड ट्रम्प इस हफ्ते 14 जून को 80 साल के हो गए। राष्ट्रपति पद पर रहते हुए 80 साल की उम्र देखने वाले वे अमेरिका के दूसरे राष्ट्रपति हैं। उनसे पहले राष्ट्रपति जो बाइडेन ने नवंबर 2022 में अपना 80वां जन्मदिन मनाया था। ट्रम्प दुनिया के सबसे उम्रदराज नेताओं में जरूर शामिल हो गए हैं, लेकिन वे दुनिया के सबसे बुजुर्ग शासक नहीं हैं। प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र के 186 देशों के नेताओं में 16 नेता ऐसे हैं जो ट्रम्प से भी ज्यादा उम्र के हैं। रिपोर्ट के अनुसार ट्रम्प दुनिया के लगभग 91% राष्ट्रीय नेताओं से बड़े हैं। वहीं दुनिया के राष्ट्रीय नेताओं की औसत उम्र 63 साल है। दुनिया के सबसे उम्रदराज मौजूदा राष्ट्रीय नेता कैमरून के राष्ट्रपति पॉल बिया हैं। उनकी उम्र 93 साल है और वे 1982 से सत्ता में बने हुए हैं। उनके बाद सऊदी अरब के राजा सलमान बिन अब्दुलअजीज अल सऊद आते है, जिनकी उम्र 90 साल है और वे 2015 से देश के शासक हैं। अफ्रीकी देशों के नेताओं की सबसे ज्यादा उम्र रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि दुनिया के सबसे ज्यादा उम्र वाले नेताओं में बड़ी संख्या अफ्रीकी देशों की है। इनमें युगांडा, इक्वेटोरियल गिनी, मलावी, आइवरी कोस्ट, जिम्बाब्वे और रिपब्लिक ऑफ कांगो के नेता शामिल हैं। युगांडा के राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी की उम्र अब 82 साल है और वे करीब 40 साल से सत्ता में बने हुए हैं। वहीं इक्वेटोरियल गिनी के राष्ट्रपति तेओदोरो ओबियांग न्गुएमा म्बासोगो भी दुनिया के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। वे 1979 से देश पर शासन कर रहे हैं। 10 सबसे उम्रदराज नेताओं में 7 गैर-स्वतंत्र देशों के प्रमुख दुनिया के दस सबसे उम्रदराज नेताओं में से 7 ऐसे देशों का नेतृत्व कर रहे हैं जिन्हें फ्रीडम हाउस ने नॉट फ्री यानी स्वतंत्र नहीं की श्रेणी में रखा है। दूसरे शब्दों में कहें तो इन देशों में लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकार सीमित माने जाते हैं। ट्रम्प से ज्यादा उम्र वाले 16 नेताओं में से लगभग आधे ऐसे देशों का नेतृत्व कर रहे हैं जिन्हें इसी श्रेणी में रखा गया है। इस वजह से फिर से यह सवाल उठने लगा है कि क्या लंबे समय तक सत्ता में बने रहना लोकतांत्रिक जवाबदेही को प्रभावित करता है। ————————- ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने जन्मदिन पर व्हाइट हाउस में UFC फाइट कराई:अब तक का सबसे महंगा शो, ₹567 करोड़ खर्च; जीत के बाद विजेता राष्ट्रपति से मिला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने व्हाइट हाउस के साउथ लॉन में अल्टीमेट फाइटिंग चैम्पियनशिप यानी UFC मुकाबलों के साथ अपना 80वां जन्मदिन मनाया। UFC ने इस आयोजन पर करीब 6 करोड़ डॉलर (567 करोड़ रुपए) खर्च किए। ये अब तक का सबसे महंगा UFC आयोजन माना जा रहा है। पूरी खबर पढ़ें

वर्ल्ड अपडेट्स:रूस का बॅाम्बर विमान क्रैश, चारों पायलट सुरक्षित, इंजन फेल होने की आशंका

रूस का Tu-22M3 बॉम्बर विमान सोमवार को साइबेरिया के इरकुत्स्क क्षेत्र में ट्रेनिंग उड़ान के दौरान क्रैश हो गया। रूस के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, विमान जमीन की ओर तेजी से गिरा, जिससे घटनास्थल पर धुएं का बड़ा गुबार उठ गया। रक्षा मंत्रालय ने बताया कि विमान में सवार चारों क्रू मेंबर समय रहते इजेक्ट (पैराशूट के जरिए बाहर निकल) हो गए और उनकी जान को कोई खतरा नहीं है। सभी को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। हादसे में जमीन पर भी किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ। इरकुत्स्क क्षेत्र के गवर्नर इगोर कोबजेव ने बताया कि विमान कामेंका गांव के पास दुर्घटनाग्रस्त हुआ। शुरुआती जांच में इंजन फेल होना हादसे की वजह माना जा रहा है। Tu-22, जिसे NATO ने Backfire कोडनेम दिया है, सोवियत काल का एक सुपरसोनिक बॉम्बर विमान है। रूस इसका इस्तेमाल सीरिया और यूक्रेन में सैन्य अभियानों के दौरान कर चुका है। Tu-22M3 इसका आधुनिक संस्करण है, जो Kh-22 क्रूज मिसाइलों और हवा से लॉन्च होने वाली हाइपरसोनिक किंझाल मिसाइलों को ले जाने में सक्षम है। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी अन्य बड़ी खबरें… ब्रिटेन में 16 साल की उम्र से पहले बच्चे नहीं चला सकेंगे सोशल मीडिया, प्रस्ताव से 10 में से 9 अभिभावक खुश ब्रिटेन में 16 साल से छोटे बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर बैन लगेगा। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने सोमवार को इसकी घोषणा की। संबंधित नियम इस साल दिसंबर तक बन जाएंगे और 2027 मार्च- अप्रैल तक लागू होने की उम्मीद है। सरकार का तर्क है कि एल्गोरिदम आधारित प्लेटफॉर्म बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई और सामाजिक विकास पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं। प्रस्ताव के तहत सोशल मीडिया के उपयोग से पहले उम्र सत्यापन सख्ती से लागू होगा और नियम पालन कराने की जिम्मेदारी कंपनियों पर होगी। बैन एप में स्नैपचैट, टिकटॉक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म शामिल होंगे। वॉट्सएप और सिग्नल जैसी मैसेजिंग सेवाएं फिलहाल प्रतिबंध में शामिल नहीं होंगी। ब्रिटिश सरकार के एक सर्वे में 10 में से 9 अभिभावकों ने इस प्रतिबंध का स्वागत किया है। ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी फॉर पब्लिक हेल्थ द्वारा 14-24 वर्ष के युवाओं के बीच किए सर्वे के मुताबिक स्नैपचैट, फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम से डिप्रेशन, चिंता, अपने शरीर को लेकर हीन भावना और अकेलेपन में बढ़ोतरी होती है। अमेरिकी सर्जन जर्नल के मुताबिक रोज 3 घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया पर बिताने वाले किशोरों में मानसिक समस्याओं का खतरा दोगुना होता है। अमेरिका में एक परीक्षण में पाया गया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल बंद करने से युवाओं में खुशी, जीवन से संतुष्टि बढ़ी, डिप्रेशन-एंग्जाइटी में सुधार हुआ। 25 से ज्यादा देश किशोरों-बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने की पहल कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में साल भर पहले प्रतिबंध लागू किया गया था। मलेशिया, इंडोनेशिया और ब्राजील में भी इस साल की शुरुआत से प्रतिबंध लागू हो चुके हैं। नॉर्वे, फ्रांस, अमेरिका, चीन जैसे कई देशों में बच्चों के लिए सोशल मीडिया से जुड़े नियम सख्त किए जा रहे हैं। इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप में 6.7 तीव्रता का भूकंप, जानमाल के नुकसान की जानकारी नहीं इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप के पास मंगलवार को 6.7 तीव्रता का भूकंप आया। भूकंप का केंद्र पालू शहर से लगभग 42 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित था। भूकंप की गहराई जमीन से 10 किलोमीटर नीचे दर्ज की गई। फिलहाल जान-माल के नुकसान या सुनामी की कोई अलर्ट नहीं । नॉर्वे की क्राउन प्रिंसेस के बेटे को रेप केस में 4 साल की जेल
नॉर्वे की क्राउन प्रिंसेस मेटे-मैरिट के बेटे मारियस बोर्ग होइबी (29) को ओस्लो डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने रेप, घरेलू हिंसा और अन्य अपराधों में दोषी ठहराते हुए 4 साल की जेल की सजा सुनाई है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब मेटे-मैरिट भी दिवंगत अमेरिकी यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से अपने पुराने संबंधों को लेकर विवादों में हैं। अदालत ने होइबी को दो रेप मामलों में दोषी ठहराया, जबकि दो अन्य रेप आरोपों से बरी कर दिया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 2018 से 2024 के बीच उन्होंने कई महिलाओं का यौन शोषण किया, जिनमें कुछ महिलाएं सो रही थीं या प्रतिरोध करने की स्थिति में नहीं थीं। होइबी, क्राउन प्रिंसेस मेटे-मैरिट और क्राउन प्रिंस हाकोन के साथ शाही माहौल में बड़े हुए हैं। हालांकि, उनके पास कोई शाही उपाधि नहीं है और वे राजपरिवार की ओर से कोई आधिकारिक भूमिका नहीं निभाते। अदालत ने उन्हें अपनी पूर्व प्रेमिका के साथ दुर्व्यवहार, दूसरी साथी पर हमला, ड्रग्स से जुड़े अपराध और ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के मामलों में भी दोषी पाया। होइबी ने रेप के आरोपों से इनकार किया था, लेकिन कोकीन के इस्तेमाल और मारपीट की बात स्वीकार की थी। भारत दौरे के बाद चीन पहुंचे नेपाल के विदेश मंत्री
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने भारत दौरे के कुछ दिनों बाद चीन पहुंचकर शीर्ष चीनी राजनयिक वांग यी से मुलाकात की। मार्च में सत्ता में आई नई सरकार के गठन के बाद यह उनका पहला चीन दौरा है। चीनी विदेश मंत्रालय के अनुसार, वांग यी ने कहा कि चीन हमेशा नेपाल को अपनी पड़ोसी कूटनीति में प्राथमिकता देता है और उसकी संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के प्रयासों का समर्थन करेगा। विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल भारत और चीन के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है। हाल ही में नई दिल्ली दौरे के दौरान खनाल ने कहा था कि नई सरकार अतीत के राजनीतिक बोझ से मुक्त है और भारत के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए तैयार है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, चीन नेपाल को लगभग 31 करोड़ डॉलर का कर्ज दे चुका है। वहीं चीनी कंपनियों ने ऊर्जा और रियल एस्टेट क्षेत्रों में 1.12 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है। विश्लेषकों का कहना है कि नेपाल के हालिया राजनीतिक बदलावों ने चीन के लिए नई चुनौती पैदा की है। ऐसे में बीजिंग नेपाल के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाए रखने और क्षेत्र में अपना प्रभाव कायम रखने की कोशिश कर रहा है। इजराइली मंत्री बेन-गवीर पर EU में नहीं बनी सहमति: प्रतिबंध प्रस्ताव अटका
यूरोपीय संघ (EU) इजराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव पर सहमति बनाने में विफल रहा। EU की विदेश नीति प्रमुख काजा कालास ने सोमवार को कहा कि कई सदस्य देशों ने आर्थिक प्रतिबंध लगाने की मांग की थी, लेकिन सर्वसम्मति नहीं बनने के कारण प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका। बेन-गवीर हाल ही में गाजा की ओर जा रहे ग्लोबल सुमुद फ्लोटिला के कार्यकर्ताओं के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर विवादों में रहे हैं। फ्लोटिला को इजराइली सैनिकों ने रोककर कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया था। बाद में एक वीडियो सामने आया, जिसमें बेन-गवीर कथित तौर पर हाथ बंधे हुए और जमीन पर बैठे कार्यकर्ताओं का मजाक उड़ाते दिखाई दिए। इस घटना के बाद कई यूरोपीय देशों में उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग उठी। हालांकि EU स्तर पर प्रतिबंध लगाने के लिए सभी सदस्य देशों की सहमति जरूरी होती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक जर्मनी, ऑस्ट्रिया और चेक गणराज्य उन देशों में शामिल हैं जिन्होंने प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। यूरोपीय संघ इजराइल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और पिछले वर्ष इजराइल के कुल वस्तु व्यापार में उसकी हिस्सेदारी 30% से अधिक रही थी। थाईलैंड ने परमाणु अप्रसार का दोहराया समर्थन
थाईलैंड ने वियना में आयोजित व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि संगठन (CTBTO) के 66वें सत्र में परमाणु हथियारों के परीक्षण और परमाणु तकनीक के सैन्य इस्तेमाल का विरोध दोहराया। देश ने परमाणु अप्रसार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए परमाणु तकनीक के शांतिपूर्ण उपयोग का समर्थन किया। थाईलैंड के ऑफिस ऑफ एटम्स फॉर पीस (OAP) ने कहा कि देश CTBTO की वैश्विक निगरानी और सत्यापन प्रणाली का सक्रिय समर्थक है। OAP के अनुसार, CTBTO नेटवर्क से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग भूकंप निगरानी, सुनामी चेतावनी, आपदा जोखिम न्यूनीकरण, पर्यावरण निगरानी और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे कई क्षेत्रों में किया जाता है। सत्र में थाईलैंड ने परमाणु अप्रसार के समर्थन को दोहराते हुए कहा कि परमाणु तकनीक का इस्तेमाल केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए होना चाहिए। देश ने चिकित्सा, ऊर्जा और उद्योग जैसे क्षेत्रों में इसके सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। पोलैंड में रूसी कलाकार और पुतिन आलोचक की हत्या: पार्किंग में मारीं 5 गोलियां
पोलैंड में रूसी कलाकार और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के मुखर आलोचक सेम्योन स्क्रेपेत्स्की की गोली मारकर हत्या कर दी गई। बियाला पोडलास्का शहर में सोमवार सुबह हुई इस वारदात के बाद पुलिस और अभियोजन एजेंसियों ने जांच शुरू कर दी है। मामले में दो बेलारूसी नागरिकों को हिरासत में लिया गया है। ल्यूबलिन जिला अभियोजन कार्यालय के अनुसार, स्क्रेपेत्स्की का वास्तविक नाम रॉबर्ट कुजोवकोव था। 44 वर्षीय कलाकार पर एक अज्ञात हमलावर ने पार्किंग क्षेत्र में हमला किया। आरोपी ने पहले दो गोलियां चलाईं और पीड़ित के गिरने के बाद उसके पास जाकर तीन और गोलियां दाग दीं। कलाकार को सिर, सीने और पीठ में गोलियां लगीं, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। घटनास्थल बेलारूस के वाणिज्य दूतावास से करीब 600 मीटर की दूरी पर स्थित है। जांचकर्ताओं को वहां से पांच खोखे और 9 मिमी की एक गोली बरामद हुई है। स्क्रेपेत्स्की अपने राजनीतिक व्यंग्यचित्रों के लिए जाने जाते थे। उन्होंने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको और चेचन नेता रमजान कादिरोव पर कई आलोचनात्मक चित्र बनाए थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, वे सार्वजनिक रूप से रूस की वर्तमान नीतियों की आलोचना भी करते थे। स्थानीय मीडिया के अनुसार, स्क्रेपेत्स्की 2021 में पोलैंड आकर बस गए थे। अधिकारियों ने बताया कि पोस्टमॉर्टम बुधवार को किया जाएगा और हत्या के पीछे की वजहों की जांच जारी है। चीन में 6.3 तीव्रता का भूकंप: 1 की मौत, 4 घायल; कोयला खदानों से सभी मजदूरों को निकाला गया
चीन के उत्तर-पश्चिमी प्रांत चिंगहाई में मंगलवार शाम 6.3 तीव्रता का भूकंप आया। सरकारी मीडिया के मुताबिक हादसे में एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि चार लोग घायल हुए हैं। भूकंप के बाद राहत और बचाव दल मौके पर पहुंच गए हैं। चीन भूकंप नेटवर्क केंद्र (CENC) के मुताबिक, भूकंप स्थानीय समयानुसार शाम 5:06 बजे हाइक्सी प्रीफेक्चर के ऊंचाई वाले इलाके में आया। इसका केंद्र जमीन से 10 किलोमीटर नीचे था। सरकारी मीडिया ने बताया कि भूकंप के केंद्र के पास मौजूद कोयला खदानों से सभी कर्मचारियों को एहतियात के तौर पर बाहर निकाल लिया गया है। अधिकारी अभी जनहानि और संपत्ति के नुकसान का आकलन कर रहे हैं। समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, राहत और बचाव दल फंसे लोगों की तलाश में जुटे हैं। साथ ही भूकंप के बाद संभावित द्वितीयक आपदाओं के खतरे का भी आकलन किया जा रहा है। चीन के भूकंप प्रशासन ने इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्मट एक्टिव कर दिया है। मुख्य झटके के बाद कई आफ्टरशॉक भी महसूस किए गए, जिनमें एक की तीव्रता 4.9 मापी गई।

ट्रम्प ने जन्मदिन पर व्हाइट हाउस में UFC फाइट कराई:अब तक का सबसे महंगा शो, ₹567 करोड़ खर्च; जीत के बाद विजेता राष्ट्रपति से मिला

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने व्हाइट हाउस के साउथ लॉन में अल्टीमेट फाइटिंग चैम्पियनशिप यानी UFC मुकाबलों के साथ अपना 80वां जन्मदिन मनाया। UFC ने इस आयोजन पर करीब 6 करोड़ डॉलर (567 करोड़ रुपए) खर्च किए। ये अब तक का सबसे महंगा UFC आयोजन माना जा रहा है। इस फाइट कार्ड में कुल 7 मुकाबले हुए। मेन फाइट लाइटवेट चैंपियन रहे इलिया टोपुरिया और जस्टिन गेथजे के बीच हुई। 4 राउंड तक चले मुकाबले में अमेरिकी फाइटर गेथजे ने अपने स्पेनिश विरोधी टोपुरिया को हराकर उलटफेर किया। गेथजे को लाइटवेट टाइटल बेल्ट मिली, जबकि टोपुरिया को अपने करियर की पहली हार मिली। मुकाबले देखने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, उनके कई सीनियर अफसर, खास मेहमान और हजारों सैन्यकर्मी मौजूद थे। पहले मुकाबले में बो निकल ने पहले ही राउंड में काइल डाउकस को नॉकआउट कर दिया। उन्होंने एक जोरदार लेफ्ट हुक और राइट पंच से प्रतिद्वंद्वी को गिराया, जिसके बाद रेफरी ने मुकाबला रोक दिया। जीत के तुरंत बाद बो निकल रिंग से बाहर आए और सीधे राष्ट्रपति ट्रम्प के पास पहुंचे। दोनों ने हाथ मिलाया और कुछ देर बातचीत की। UFC फाइट से जुड़ी 10 तस्वीरें…
ट्रम्प ने कहा- यह धरती का सबसे बड़ा शो राष्ट्रपति ट्रम्प और कई अधिकारियों ने आयोजन की तारीफ की। ट्रम्प ने इसे ‘धरती का सबसे बड़ा शो’ बताया और ‘क्लॉ’ की तुलना पेरिस के एफिल टॉवर से की। वहीं विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने UFC को अमेरिका की सॉफ्ट डिप्लोमैटिक पावर बताया। इस इवेंट में कुल 14 फाइटर ने हिस्सा लिया। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस आयोजन का सबसे बड़ा फायदा UFC ब्रांड को मिल सकता है। एक समय ऐसा था, जब इस खेल को प्रायोजकों और कई आयोजकों ने स्वीकार नहीं किया था। एक अमेरिकी सीनेटर ने इसे कभी ‘मानव मुर्गा लड़ाई’ तक कहा था। 33 साल पहले शुरू हुआ था UFC का सफर अल्टीमेट फाइटिंग चैम्पियनशिप (UFC) आज दुनिया की सबसे बड़ी मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स (MMA) लीग है। इसकी शुरुआत 1993 में अमेरिका में हुई थी। उस दौर में बॉक्सिंग, कराटे, कुश्ती और ब्राजीलियन जिउ-जित्सु जैसी अलग-अलग फाइटिंग शैलियों के समर्थक अपनी-अपनी तकनीक को सबसे प्रभावी बताते थे। इस पर काफी बहस होती थी कि असली मुकाबले में कौन-सा मार्शल आर्ट सबसे ज्यादा कारगर साबित होगा। इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए UFC का पहला टूर्नामेंट आयोजित किया गया। इसमें ब्राजीलियन जिउ-जित्सु विशेषज्ञ रॉयस ग्रेसी चैंपियन बने। ग्रेसी शारीरिक रूप से कई प्रतिद्वंद्वियों से छोटे और हल्के थे, लेकिन उन्होंने अपनी तकनीक के दम पर बड़े और ताकतवर फाइटर्स को हराकर सबको चौंका दिया। समय के साथ खेल का स्वरूप भी बदल गया। अब फाइटर्स सिर्फ एक शैली पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि बॉक्सिंग, रेसलिंग, जूडो, कराटे, ताइक्वांडो, जिउ-जित्सु और किक बॉक्सिंग जैसी कई तकनीकों को मिलाकर मुकाबला करते हैं। यही वजह है कि इसे आज ‘मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स’ कहा जाता है। अमेरिका की आजादी के 250 साल पूरे हो रहे अमेरिका इस साल अपनी आजादी के 250 साल पूरे करने जा रहा है। अमेरिका जुलाई 1776 में ब्रिटेन से स्वतंत्र हुआ था। आजादी के जश्न की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। पूरे देश में एक साल से ज्यादा समय तक चलने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की गई है। UFC इवेंट भी इसी जश्न का हिस्सा है, जिसे ट्रम्प प्रशासन प्रमुख आकर्षण के तौर पर पेश कर रहा है। अमेरिका की स्थापना का आधार माने जाने वाले ‘डिक्लेरेशन ऑफ इंडिपेंडेंस’ पर 4 जुलाई 1776 को हस्ताक्षर हुए थे। इसी की 250वीं सालगिरह के मौके पर देशभर में परेड, प्रदर्शनी, सांस्कृतिक कार्यक्रम और बड़े सार्वजनिक समारोह आयोजित किए जाएंगे। व्हाइट हाउस ने ‘टास्क फोर्स 250’ बनाई है, जो संघीय सरकार, राज्यों, निजी संस्थाओं और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर आयोजन कर रही है। ——————————– UFC से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प जन्मदिन पर व्हाइट हाउस में फाइटिंग कराएंगे:मुकाबले के लिए स्टेज तैयार हो रहा, 1 लाख लोग फ्री में मुकाबला देखेंगे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 14 जून को 80 साल के हो जाएंगे। इस मौके पर व्हाइट हाउस में अल्टीमेट फाइटिंग चैंपियनशिप (UFC) के मुकाबले करााए जाएंगे। UFC दुनिया की सबसे बड़ी मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स (MMA) संस्था है। इसमें अलग-अलग फाइटिंग खेलों के खिलाड़ी एक-दूसरे के खिलाफ मुकाबला करते हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

यह सुझाव देश के हित में है

Photo of Prime Minister Narendra Modis foreign trip, Georgia Meloni with Modi in the image

शरद पवार ने देश की विदेश नीति पर आंतरिक राजनीतिक व्यवहार के संदर्भ में जो कुछ कहा है उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के बाहर देश की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। हमारे राजनीतिक विचार अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन जब देश के सम्मान की बात आती है तो राजनीतिक मतभेदों को बीच में नहीं लाना चाहिए। 

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच दिवसीय विदेश यात्रा पर भारत के अंदर राजनीतिक व गैर राजनीतिक मोर्चे पर हो रही टिप्पणियों के संदर्भ में उनका यह मंतव्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात से आरंभ कर स्वीडन, नीदरलैंड, ज्नॉर्वे और इटली की द्विपक्षीय यात्रा की तथा नार्वे की राजधानी ओस्लो में स्कैंडिनेवियाई भारत शिखर सम्मेलन में शामिल हुए। 

 

प्रधानमंत्री के समक्ष अपने राष्ट्रीय हित को साधने का उद्देश्य था और इन यात्राओं पर विशेषज्ञों का मत यही है कि उसमें उन्हें अधिकतम सफलता मिली। किंतु राजनीतिक और गैर राजनीतिक एक्टिविज्म और सोशल मीडिया पर उनके विदेश में रहते हुए ही हमले शुरू हो गए। सारे हमलों‌ व‌ आलोचनाओं के हल्ला बोल में ऐसा एक तथ्य नहीं आया जिसमें बताया गया हो कि अमुक बिंदु पर प्रधानमंत्री ने अपने राष्ट्रीय हित के अनुकूल काम नहीं किया।

 

जाहिर है कि विरोध केवल राजनीतिक मतभेदों और असहमतियों के इर्द-गिर्द था। यह चिंताजनक है क्योंकि भारत की भौगोलिक सीमाओं के अंदर की राजनीतिक असहमतियां और मतभेद सीमाओं से बाहर चला जाए तो राष्ट्रीय हित प्रभावित होता है। इसका अर्थ है कि हम देश हित को प्राथमिकता देने की जगह अपने राजनीतिक, व्यक्तिगत हित को प्राथमिकता दे रहे हैं या फिर हमारा वैचारिक दुराग्रह हावी है।

 

ऐसा नहीं है कि पवार की मोदी से पूरी तरह सहमति है। महाराष्ट्र में आज शरद पवार की राकांपा शक्तिहीन है तो इसी कारण क्योंकि स्वर्गीय अजीत पवार ने विद्रोह कर भाजपा से हाथ मिला लिया। बावजूद हमारी पारंपरिक राजनीति, जिसका प्रतिनिधित्व करने वाले गिने-चुने नेता रह गए हैं, में यही व्यवहार लंबे समय तक रहा है। देश में हमारी असहमति होती है, आरोप – प्रत्यारोप करते हैं लेकिन जब विदेशों की, अंतरराष्ट्रीय मंच की बात आती है तो देश साथ खड़ा होता है। 

 

अंतरराष्ट्रीय मंच पर या विदेश में प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक दल का नहीं भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहां केवल राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए। पत्रकारिता में भी अनेक बार प्रधानमंत्री या दूसरे मंत्रियों के विदेश में दिए बयानों से असहमति होती थी लेकिन वरिष्ठ लोग बताते थे कि विदेश नीति पर हमारी आलोचना का स्वर ऐसा नहीं हो सकता। अपवाद हर समय रहे हैं पर पर वह कभी मुख्य धारा नहीं बना। 

 

इसलिए ज्यादातर विदेशी यात्राओं या विदेशी मेहमानों के भारत आगमन पर हुए समझौते आदि पर राजनीतिक दलों व मीडिया की ध्वनि एक समान होती थी। जैसे-जैसे राजनीतिक मतभेद बढ़े, भारत और वैश्विक स्तर पर अलग-अलग राजनीतिक धाराओं, निहित स्वार्थी संगठनों, समूहों के बीच संपर्क संबंध बढ़ा इस स्वाभाविक व्यवहार में अंतर आता गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता शीर्ष पर आने के बाद यह अतिवाद तक चला गया है। इसी का प्रकटीकरण इस समय दिखा है। 

 

एक भारतवासी के नाते इस समय हमारा उद्देश्य क्या होना चाहिए? पश्चिम एशिया संकट यानी ईरान अमेरिका इजरायल टकराव और तनाव ने ईंधन आपूर्ति में उथल-पुथल पैदा कर दिया है। हार्मूज जलडमरूमध्य की खतरनाक नाकेबंदी से निपटना विश्व के लिए मुश्किल हो रहा है।

इसमें पेट्रोल डीजल आदि के लिए आयात पर निर्भर भारत या अन्य देशों के लिए दूरगामी दृष्टि से आपूर्ति की सुनिश्चित व्यवस्था करना, देशों के संबंधों में हो रहे बदलावों के साथ सामंजस्य स्थापित करना या अस्थिरता के काल में उसका आधार बनाते रहना तथा भविष्य में बनने वाले अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की दृष्टि से ऐसी स्थिति में होना ताकि देश के रूप में हम कहीं अलग-थलग न पड़ें। 

 

मोटा-मोटी प्रधानमंत्री की यात्रा में यही लक्ष्य समाहित होंगे। इन सबमें यहां विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं। आप चाहे भाजपा के सरकार के विरोधी हों या समर्थक दृष्टि एक ही होनी चाहिए कि प्रधानमंत्री की यात्राओं के दौरान उन देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय और प्रतिनिधिमंडलों की बातचीत, संयुक्त घोषणाओं तथा संपन्न समझौतों में क्या-क्या हुआ? जब आप गहराई से उन सबको देखेंगे तो आपका विचार अपने आप बदल जाएगा। दुर्भाग्य से हम उन पर सरसरी दृष्टि भी डालना नहीं चाहते। 

 

किसी पत्रकार ने नॉर्वे में दोनों प्रधानमंत्रियों के स्वागत वक्तव्य में निर्धारित प्रोटोकॉल के विपरीत जबरन कैमरे घूमाकर भारत के प्रधानमंत्री से मानवाधिकार एवं प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रश्न पूछे और वह हमारे लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गया। नॉर्वे के साथ हमारे समझौते, हमारे यहां पेंशन फंड से 28 अरब डॉलर के निवेश की योजना, ब्लू इकोनामी साझेदारी, हरित साझेदारी आदि पर हमने चर्चा नहीं की।

यही नहीं नॉर्दिक भारत शिखर सम्मेलन में औपचारिक रूप से ट्रस्टेड ग्रीन टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप यानी विश्वसनीय हरित तकनीक एवं अन्वेषण रणनीतिक साझेदारी का दर्जा मिलना और कातिक परिषद में भी पर्यवेक्षक की हैसियत हासिल करना इनके लिए हास्य पर चला गया। 

 

इसी तरह इटली की यात्रा में प्रधानमंत्री ने पार्ले कंपनी के सामान्य मेलोडी ट्रॉफी वहां की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी को भेंट करते हुए एक रोचक वीडियो पोस्ट किया। इटली के साथ हमारी ठोस विशेष रणनीतिक साझेदारी कायम हुई, भारत और इटली में निर्माण करो तथा विश्व को आपूर्ति करो का ढांचा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत के स्थान की दृष्टि से महत्वपूर्ण था, अनेक मुद्दों पर हमारे साथ सहमति बनी जिनमें आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष भी है। 

 

इस यात्रा में स्वीडन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया और काम करने वाली पत्रकार और कार्टून छापने वाले अखबार के देश नार्वे ने भी। संयुक्त राष्ट्र संघ की खाद्य और कृषि संगठन ने प्रधानमंत्री को विशेष रूप से सम्मानित किया। इन सब पर चर्चा की जगह हमारे यहां टौफी वीडियो को लेकर ऐसी टिप्पणियां की जा रही है जिनमें कई को देखने सुनने या पढ़ने में शर्म आए। भारत जैसे देश में विमर्श का यह स्तर किसी को भी अंदर से परेशान कर देगा।

 

क्या हम ऐसा करते समय विचार भी नहीं करते कि एक देश के रूप में विदेश में हमारी कैसी छवि बनेगी? यहीं पर शरद पवार का यह कथन प्रासंगिक हो जाता है कि जब भी राष्ट्रीय हित के लिए सामूहिक रूप से काम करने का मौका मिले तो सभी को एक साझा उद्देश्य के साथ जुड़ना चाहिए और देश की प्रतिष्ठा मजबूत करने में मदद करनी चाहिए। कोई भी प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री देश के बाहर होते हैं तो अपने दृष्टिकोण से वह देश के भविष्य और सम्मान को ही केंद्र में रखते हैं। कई बार इनमें गलतियां भी हुई है। 

 

आज के दौर के अनुसार उनकी आलोचना भी अस्वाभाविक नहीं है किंतु आलोचना तथ्यों के आधार पर होगी। अखिर जॉर्जिया मेलोनी को मेलोडी ट्रॉफी भेंट करने से हमारी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को कैसे नुकसान पहुंचा? इटली प्राचीन सभ्यता संस्कृति वाला यूरोप का महत्वपूर्ण और मजबूत देश है।

वर्तमान तनावपूर्ण अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में दो प्रधानमंत्रियों के बीच इस तरह के सहज संबंध, मुस्कान और ठहाके कूटनीति की दुनिया में बहुत बड़ी उपलब्धि है। एक बार दो नेताओं के बीच सहज सामान्य संवाद निर्मित हो गए तो जटिल से जटिल मुद्दों पर भी सहमति बनती है तथा रास्ता निकल जाता है। दूसरे, इससे हमारे देश के एक सामान्य ब्रांड का भी जबरदस्त विपणन हुआ। इस विषय पर स्थापित अंतरराष्ट्रीय मीडिया की टिप्पणियां देखेंगे तो सकारात्मक भाव पैदा होगा। 

 

कूटनीति में एक सामान्य वस्तु का उपयोग कर माहौल बदल देना, दुनिया को संदेश देना और उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परस्पर व्यवहार का रास्ता दिखा देना सामान्य बात नहीं है। अभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का चीन दौरा हुआ और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी बातचीत के सारे तस्वीर और वीडियो देख लीजिए।

इसके बाद रुस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की चीन यात्रा हुई। दोनों नेताओं के सारे तस्वीर और वीडियो देख लीजिए। पुतिन और शी जिनपिंग के बीच सामान्य संबंध हैं। बावजूद उनके व्यवहार में सहज मुस्कान नहीं दिखेगा। 

 

तनावपूर्ण और अनिश्चितताओं की दुनिया में दो महत्वपूर्ण देश के नेताओं के बीच सरल सहज मुस्कान और संबंध कूटनीति के लिए नया मानक है। कायदे से देश में इसकी प्रशंसा होनी चाहिए। भारत ने अपने लक्ष्य के अनुरूप यात्रा से सारी उपलब्धियां हासिल की जिसकी ओर तत्काल दृष्टि थी।

दूसरे देश भी अपने हित के अनुसार काम कर रहे थे और उन्हें भी प्राप्त हुआ। पर मूल बात यह है कि हम एक राष्ट्र के रुप में कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं? शरद पवार जैसे वरिष्ठ नेता अब ज्यादा उपलब्ध नहीं है कि सामने आकर रास्ता दिखाएं। ज्यादातर जा चुके हैं। हमें ही अपने हर व्यवहार पर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देकर स्वयं को बदलना होगा।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

AI का बूम, कंपनी ने कर्मचारियों को बांटा 3.25 करोड़ का बोनस

दुनियाभर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का तेजी से बढ़ता प्रभाव अब टेक कंपनियों की कमाई में भी साफ नजर आने लगा है। इसी AI बूम का सबसे बड़ा फायदा दक्षिण कोरियाई टेक दिग्गज सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स (Samsung Electronics) के चिप कारोबार को मिला है। AI डाटा सेंटरों की बढ़ती मांग के चलते मेमोरी चिप्स की जरूरत तेजी से बढ़ी है और सैमसंग दुनिया की सबसे बड़ी मेमोरी चिप निर्माता कंपनियों में शामिल है।

 

इसी वजह से पिछले तिमाही में कंपनी के चिप डिवीजन की आय में 49 गुना तक का जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया। अब कंपनी इस मुनाफे का हिस्सा अपने कर्मचारियों को भी देने जा रही है। बुधवार को सैमसंग के सबसे बड़े कर्मचारी यूनियन ने चिप डिवीजन के कर्मचारियों के लिए भारी-भरकम बोनस पैकेज को मंजूरी दे दी। इस पैकेज के तहत प्रत्येक कर्मचारी को औसतन 3.40 लाख डॉलर (करीब 3.25 करोड़ रुपए) का बोनस मिल सकता है।

 

यह मंजूरी ऐसे समय में आई है जब कर्मचारियों ने 18 दिनों की हड़ताल की चेतावनी दी थी।  इस साल मार्च में सैमसंग ने अपनी फाइलिंग में बताया था कि 2025 में कंपनी के कर्मचारियों की औसत वार्षिक आय 15.8 करोड़ वॉन (करीब 1 करोड़ रुपए) रही थी।

 

कंपनी और यूनियन के बीच मुनाफे के बंटवारे को लेकर समझौता होने के बाद संभावित हड़ताल टल गई है। इससे वैश्विक मेमोरी चिप सप्लाई पर पड़ने वाला बड़ा संकट भी टल गया। माना जा रहा था कि यदि हड़ताल होती तो न केवल सैमसंग का उत्पादन प्रभावित होता, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन पर भी इसका बड़ा असर पड़ सकता था।

 

सैमसंग के अनुसार, कंपनी के चिप डिवीजन में करीब 78 हजार कर्मचारी कार्यरत हैं। ऐसे में केवल बोनस पर कंपनी लगभग 26.5 अरब डॉलर खर्च कर सकती है। यूनियन की ओर से बताया गया कि इस समझौते के पक्ष में 73.7 प्रतिशत सदस्यों ने मतदान किया। करीब 62,600 बैलेट डाले गए, जो पात्र सदस्यों के 95 प्रतिशत से अधिक थे। समझौते को पारित करने के लिए आधे से अधिक मतों की जरूरत थी।

 

यह बोनस सभी सैमसंग कर्मचारियों के लिए नहीं है, बल्कि केवल चिप निर्माण डिवीजन के कर्मचारियों को मिलेगा। यह डिवीजन प्रोसेसर और मेमोरी चिप्स जैसे RAM का निर्माण करता है, जिनका इस्तेमाल स्मार्टफोन, लैपटॉप, कारों और ChatGPT व Gemini जैसे AI प्लेटफॉर्म को संचालित करने वाले बड़े डाटा सेंटरों में किया जाता है।

 

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के ऑपरेटिंग प्रॉफिट के आधार पर कर्मचारियों को औसतन 51.3 करोड़ वॉन यानी लगभग 3.40 लाख डॉलर का बोनस मिल सकता है। Yonhap News की रिपोर्ट के मुताबिक मेमोरी डिवीजन के कर्मचारियों को करीब 60 करोड़ वॉन (लगभग 3.82 करोड़ रुपए) तक मिल सकते हैं।  Edited by : Sudhir Sharma

अमेरिका और ईरान युद्ध दोबारा भड़का तो क्या होगा?

अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल को लागू हुआ युद्धविराम फिलहाल बना हुआ है, लेकिन शाब्दिक नोक-झोंक और पूर्ववत तनावों के बीच उनकी बातचीत में प्रगति के संकेत भी मिल रहे हैं।

 

अमेरिकी न्यूज़ पोर्टल एक्सिओस (Axios) के अनुसार, सबसे नई प्रगति यह है कि एक 'समझौता ज्ञापन' (मेमोरैंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग) दोनों देशों के बीच विवाद के सभी प्रमुख मुद्दों को संबोधित करता है। वह कथित तौर पर सभी तरह की शत्रुता को अस्थायी रूप से रोकने तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से संबंधित है। ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाना और अमेरिका द्वारा ज़ब्त ईरानी संपत्तियों को मुक्त करना भी कथित तौर पर चर्चा का विषय है।

 

अमेरिकी के सूत्रों के अनुसार, आशा है कि ईरान युद्धविराम की अवधि के दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाज़ों के गुज़रने में मदद करेगा। कोई टोल (शुल्क) नहीं लिया जाएगा। जहाज़ों का यातायात जल्द ही 'युद्ध-पूर्व के स्तर' पर लौट जाएगा। किंतु, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि यह युद्धविराम कितने समय तक चलेगा। अमेरिकी सूत्रों ने 60 दिनों की अवधि की बात कही है। हालांकि, ईरानी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने सरकारी टेलीविज़न पर '30 से 60 दिनों की अवधि' का ज़िक्र किया।

ईरान बारूदी सुरंगें हटाने के लिए भी तैयार 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बिछाई गई बारूदी सुरंगें हटाने के लिए भी तैयार है। इसके बदले में, अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगी अपनी नाकेबंदी हटा सकता है और ईरान को बिना किसी रोक-टोक के तेल निर्यात करने की अनुमति दे सकता है। किंतु, इस बारे में ईरान से आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएं भी आई हैं। वहां की समाचार एजेंसी 'फ़ार्स' ने लिखा कि ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुज़रने वाले जहाज़ों की संख्या को युद्ध-पूर्व स्तर पर वापस लाने पर सहमति जताई तो है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि युद्ध से पहले जैसी 'मुक्त आवाजाही' की स्थिति फिर से बहाल हो गई है। इसलिए, ट्रंप के बयान को 'अधूरा' माना जा रहा है और कहा जा रहा है कि वह वास्तविकता को नहीं दर्शाता।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य

ईरान ने कथित तौर पर वादा किया है कि वह कभी भी परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा। किंतु, उसके यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को निलंबित करने के संबंध में बातचीत अभी होनी है। अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का भंडार भी चर्चा का विषय है; उसे ईरान से संभवतः हटाया जा सकता है। इसके बदले में, अमेरिका ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने और उस की संपत्तियों को मुक्त करने की बात कही है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने 'कुछ प्रगति' की बात करते हुए, बहुत सावधानी भरी आशावादिता का स्वर अपनाया। उन्होंने संकेत दिया कि वे संभवतः कुछ ही दिनों के भीतर कोई सही घोषणा कर पाएंगे।

 

दूसरी ओर, अमेरिका में टेक्सास राज्य के रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज़ ने X पर लिखाः अगर इसका नतीजा 'एक ऐसा ईरानी शासन देखने में आता है— जिसका नेतृत्व अभी भी वे इस्लामी कट्टरपंथी ही कर रहे हैं जो ''अमेरिका का नाश हो'' के नारे लगाते हैं— और जिसे अब अरबों डॉलर मिलते हैं, जो यूरेनियम को समृद्ध करने और परमाणु हथियार बनाने में सक्षम है और जो होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर प्रभावी रूप से नियंत्रण रखता है, तो यह एक विनाशकारी ग़लती होगी।' 

ईरानी राष्ट्रपति को अमेरिका पर विश्वास नहीं

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने यथासंभव कूटनीतिक समाधान के प्रति अपनी तत्परता दिखाई, लेकिन उन्होंने वाशिंगटन के प्रति तेहरान के गहरे अविश्वास पर ज़ोर भी दिया। उन्होने कहा, 'हम बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन अमेरिका के साथ पिछली वार्ताओं के अनुभवों ने हमें अत्यधिक सावधानी बरतने पर मज़बूर कर दिया है।'

 

ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के महीनों बाद भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) अभी भी बंद है। 'समझौता ज्ञापन' वाला समाचार आने से दो ही दिन पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का कहना था कि ईरान के साथ बातचीत उम्मीद से कहीं ज़्यादा मुश्किल साबित हो रही है। यदि कोई समझौता हो भी जाता है, तब भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य को निरापद बनाने के अभियान के समय अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की ज़रूरत पड़ेगी।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य लिए एक 'प्लान B' की वकालत

स्वीडन के हेलसिंगबोर्ग नगर में 22 मई को हुई नाटो (NATO) के विदेश मंत्रियों की बैठक में बोलते हुए, मार्को रूबियो ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए एक 'प्लान B' की वकालत की। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ ऐसे किसी भी समझौते का, जिसमें इस जलडमरूमध्य को — जो वैश्विक तेल और गैस बाज़ार के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण जलमार्ग है— फिर से खोलने का प्रावधान हो, हर कोई स्वागत ही करेगा। लेकिन, ईरान यदि इस जलडमरूमध्य को फिर से खोलने से इनकार कर देता है और उस पर अपना नियंत्रण बनाए रखने तथा वहां से गुज़रने के लिए टोल (शुल्क) लगाने पर अड़ा रहता है— तो एक 'प्लान B' की ज़रूरत पड़ेगी।

 

अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो ने बताया कि फ्रांस और ब्रिटेन के नेतृत्व वाला एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन, वर्तमान टकराव खत्म होने के बाद के लिए एक संभावित नौसैनिक मिशन की तैयारी कर रहा है। साथ ही उनका कहना था कि 'तब भी हमें एक 'प्लान B' की ज़रूरत है, यदि कोई गोलीबारी शुरू कर दे, तो ऐसी स्थिति में आप जलडमरूमध्य को फिर से कैसे खोलेंगे?' उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि यह ज़रूरी तौर पर नाटो (NATO) का एक मिशन होना चाहिए या नहीं, 'लेकिन इसमें निश्चित रूप से वे नाटो देश शामिल होंगे जो अपना योगदान देने में सक्षम हैं।'

 

रूबियो ने स्वीडन वाले अपने वक्तव्य में इस बात पर ज़ोर दिया कि अमेरिका अपने सहयोगियों की मदद पर निर्भर नहीं है। उनके शब्दों में, 'संयुक्त राज्य अमेरिका यह कर सकता है, लेकिन कुछ ऐसे देश भी हैं जिन्होंने इस तरह के काम में संभावित रूप से हिस्सा लेने में दिलचस्पी दिखाई — ऐसी नौबत यदि सचमुच आती है।' उन्होंने किसी खास देश का नाम नहीं लिया।

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होर्मुज़ जलडमरूमध्य का खुलना विवाद का विषय

अमेरिका और ईरान के बीच इस समय रुकी हुई बातचीत में होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलना उनके बीच विवाद के मुख्य बिंदुओं में से एक है। युद्ध शुरू होने के बाद, ईरान ने धमकियां देकर और तेलवाही टैंकरों तथा मालवाही जहाज़ों पर गोलाबारी करके इस जलडमरूमध्य से होकर जहाज़ों की आवाजाही को काफी हद तक बंद कर दिया है। इसके जवाब में, अमेरिका ने भी अपनी तरफ से ईरानी बंदरगाहों की तरफ जहाजों की आवाजाही रोक रखी है।

 

इस दोहरी नाकेबंदी के अलवा, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से हो कर जहाज़ों का आना-जाना तब तक इसलिए भी ख़तरे से खाली नहीं होगा, जब तक ईरान द्वारा जलडमरूमध्य की तलहटी में बिछाई गई विस्फोटक सुरंगों को ढूंढ-ढूंढ कर नष्ट नहीं कर दिया जाता। अमेरिका के लिए यह एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा बन गया है। दैनिक 'द टेलीग्राफ़' के अनुसार, अमेरिकी नौसेना, ईरान द्वारा बिछाई गई समुद्री सुरंगों को हटाने में अभी शायद सक्षम नहीं है— न तो तेज़ी से और न ही अकेले। इस काम में यूरोपीय देशों के सहयोग की भी एक प्रमुख भूमिका हो सकती है।

अनगिनत बारूदी सुरंगें, हटाने में छह महीने लग सकते हैं

'द टेलीग्राफ़' के अनुसार, ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य की तलहटी में 'महाम,' 'सदाफ़,' 'MDM,' और 'EM-52' आदि नाम वाली अनगिनत बारूदी सुरंगें फैला रखी हैं। अमेरिकी कांग्रेस (संसद) को बंद दरवाज़े के पीछे दी गई एक ब्रीफ़िंग में, पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) ने कथित तौर पर कहा कि इन सुरंगों को हटाने के अभियान में छह महीने तक का समय लग सकता है।

 

'द टेलीग्राफ़' के अनुसार, अमेरिकी नौसेना के पूर्व अधिकारी केविन आयर ने कहा, 'लगभग 518 वर्ग किलोमीटर का इलाका साफ़ करना होगा। यह बहुत बड़ा समुद्री विस्तार है।' इससे पता चलता है कि ऐसा कोई अभियान कितना जटिल और जोखिम भरा होगा। जिन नौसैनिक जहज़ों की सहायता से यह काम करना होगा, उनका अभी तक असली युद्ध की परिस्थितियों में परीक्षण तक नहीं हुआ है। एक अंदरूनी सूत्र ने 'द टेलीग्राफ' को बताया: 'गठबंधन के भीतर क्षमताओं का सबसे बड़ा हिस्सा यूरोपीय देशों के पास है।'

अमेरिका के लिए यूरोपीय समर्थन

अतीत के रूस-अमेरिकी 'शीत युद्ध' वाले समय के बाद के दौर में अमेरिका ने मुख्य रूप से विमान वाहक जहाज़ों, पनडुब्बियों और विध्वंसक जहाज़ों पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि कई यूरोपीय देशों ने बारूदी सुरंगों का पता लगाने की अपनी विशेष क्षमताओं को बनाए रखा। 'द टेलीग्राफ' के अनुसार, जर्मनी बारूदी सुरंगों का पता लगाने वाले अपने जहाज़ 'फुल्दा' को पहले ही तैनात कर चुका है। बताया जा रहा है कि ब्रिटेन भी स्वचालित बारूदी सुरंग-खोजी जहाज़ और गोताखोर उपलब्ध करा रहा है, जबकि इटली बारूदी सुरंगें हटाने वाले जहाज़ भेज रहा है।

 

रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका के दो जहाज— यूएस पायोनियर और यूएस चीफ़— पहले ही फ़ारस की खाड़ी की ओर रवाना हो चुके हैं। हालांकि, वहां पहुंचने के बाद उन्हें काफ़ी मदद की ज़रूरत पड़ सकती है। माना जाता है कि बारूदी सुरंगों संबंधी किसी संभावित सफ़ाई अभियान की स्थिति में अमेरिका अपने यूरोपीय सहयोगी देशों के साथ मिलकर ही कोई कदम उठाएगा।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी IEA की चेतावनी

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ उपयोगी बातचीत की आशा में उस पर नए हमलों को फिलहाल रोक रखा है। यदि फिर से युद्ध भड़का तो कच्चे तेल की कीमतों में विस्फोटक बढ़ोतरी होनी तय है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने कहा है कि ज़रूरत पड़ने पर वह और अधिक तेल-भंडारों से तेल जारी करने के लिए तैयार है, लेकिन दीर्घकालिक नुकसान से बचने के लिए हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को जल्द खोलना भी बेहद ज़रूरी है।

 

ईरान के भौगोलिक नियंत्रण वाले इस 21 किलोमीटर चौड़े जलमार्ग के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा है। IEA ने चेतावनी दी कि यदि हॉर्मुज जलडरूमध्य दोबारा नहीं खुला या ऊर्जा निर्यात के वैकल्पिक रास्ते नहीं बनाए गए, तो दुनिया तेल की आपूर्ति के और भी बड़े संकट में फंस सकती है।

वैश्विक ऊर्जा संकट की सबसे गंभीर चेतावनी

ऐसे में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने वैश्विक ऊर्जा संकट को लेकर अब तक की सबसे गंभीर चेतावनी जारी की है। एजेंसी के प्रमुख फ़ेथ बिरोल ने कहा है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुज़रने वाला यातायात ठप होने से दुनिया के बाजारों से प्रतिदिन करीब 1.4 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति कम हो गई है। वैश्विक तेल भंडार तेजी से घट रहे हैं। मार्च में IEA और उसके 32 सदस्य देशों ने रिकॉर्ड 40 करोड़ बैरल तेल बाज़ार में जारी किया था, लेकिन अब ये भंडार भी लगभग ख़त्म होने की स्थिति में पहुंच गए हैं। फ़ेथ बिरोल ने चेतावनी दी कि हालत यदि सुधरी नहीं, तो जुलाई तक वैश्विक तेल बाज़ार ख़तरे की घंटी वाले ''रेड ज़ोन'' में पहुंच सकता है।

 

''रेड ज़ोन'' का अर्थ ऐसी स्थिति है, जब वैश्विक तेल आपूर्ति मांग के दबाव को संभालने में असमर्थ हो जाए। यानी, तेल भंडार इतने कम हो जाएं कि कोई भी अतिरिक्त बाधा आपूर्ति संकट और कीमतों में तेज़ उछाल पैदा कर दे। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें फिलहाल 104 से 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी हैं, जबकि ईरान युद्ध शुरू होने से पहले यह क़रीब 72 डॉलर प्रति बैरल थी। बिरोल पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि वर्तमान तेल संकट 1973, 1979 और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान आए तेल संकटों से भी ज्यादा गंभीर है। उन्होंने कहा कि वैश्विक बाजार से प्रतिदिन 1.4 करोड़ बैरल तेल पहले ही ग़ायब हो चुका है।

दोबारा युद्ध भड़का तो क्या होगा?

मई की शुरुआत में कच्चे तेल की क़ीमतें 114 डॉलर तक पहुंची थीं। यदि युद्ध दोबारा भड़का तो क़ीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। IEA के अनुसार, 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान 18.27 करोड़ बैरल तेल जारी किया गया था, लेकिन इस बार 40 करोड़ बैरल जारी करने के बावजूद संकट काबू में नहीं आ रहा है। बिरोल ने कहा कि इस भयावः स्थिति का सबसे अधिक असर गरीब देशों पर पड़ेगा, ख़ासकर अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में तो खाद्य संकट तक पैदा हो सकता है! कहने की आवश्यकता नहीं कि तब भारत में भी कुहराम मच जायेगा। किंतु, प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक अंध विरोधी तब भी तेल के अकाल के लिए उन्हें ही दोषी ठहराएंगे।