डोनाल्ड ट्रंप की ‘सुपर इंटेलिजेंस फोर्स’ क्या है

डोनाल्ड ट्रंप की ‘सुपर इंटेलिजेंस फोर्स’ क्या है

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-मिया आर्मिटेज

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘सुपर इंटेलिजेंस फोर्स’ की घोषणा करते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को “औद्योगिक क्रांति और इंटरनेट से भी बड़ा” बदलाव बताया। इस तुलना के बारे में उन्होंने कहा कि “कई दूसरे लोग” भी ऐसा मानते हैं। ALSO READ: 100 साल पहले मिले जीवाश्म ने दी नए डायनासोर की खबर

 

एआई उद्योग के तेजी से विस्तार को देखते हुए ट्रंप ने यह कदम सितंबर के आखिर में प्रमुख एआई कंपनियों के अधिकारियों से मुलाकात के बाद उठाया है। यह घोषणा नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से लगभग एक महीने पहले की गई। इस तकनीक पर ज्यादातर कोई सख्त नियम-कानून न होने के कारण ट्रंप पर कारोबारी और राजनीतिक नेताओं का दबाव बढ़ता जा रहा है। वे इस बारे में लगातार चेतावनी भी दे रहे हैं।

 

यह नाम ट्रंप के सितंबर के उस कार्यकारी आदेश की याद दिलाता है, जिसमें उन्होंने ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (एआई) का नाम बदलकर ‘सुपर इंटेलिजेंस’ (एसआई) कर दिया था। राष्ट्रीय सुरक्षा निदेशक और राष्ट्रपति के नवनियुक्त एआई सलाहकार जे क्लेटन को इस टास्क फोर्स की कमान सौंपी गई है।

 

ट्रंप ने कहा कि यह टास्क फोर्स सरकार की कोशिशों के साथ तालमेल बिठाएगी, “ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अमेरिका ‘सुपर इंटेलिजेंस’ के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करना जारी रखे।” साथ ही, यह “सभी अमेरिकियों के हितों की रक्षा करेगी और उनके जीवन को बेहतर बनाएगी।”

 

ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वह ऐसे नियम नहीं चाहते, जो सुपर इंटेलिजेंस (एसआई) उद्योग की प्रगति को रोकें। इस समूह के कथित चार्टर में कहा गया है कि यह “अत्यधिक नियम-कानूनों और रेगुलेटरी कैप्चर” को रोकने के लिए काम करेगा। ALSO READ: पुतिन और ट्रंप की डीजल डील क्या है?

 

सुपर इंटेलिजेंस फोर्स क्या करेगी?

व्हाइट हाउस ने सुपर इंटेलिजेंस फोर्स के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है, लेकिन इस समूह की जिम्मेदारियों का विवरण देने वाले चार्टर की एक प्रति ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ और ‘पॉलिटिको’ में प्रकाशित हुई है।

 

इस दस्तावेज से पता चलता है कि टास्क फोर्स को कई तरह के काम करने हैं। इसमें जैव सुरक्षा और जल आपूर्ति के लिए खतरों को खास तौर पर ध्यान देने वाले क्षेत्रों में शामिल किया गया है। हाल के साइबर हमलों में अमेरिका में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया है।

 

यह समूह अमेरिका की कुछ सबसे अहम सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर काम करेगा। इनमें पेंटागन, न्याय विभाग, गृह सुरक्षा विभाग और संघीय व्यापार आयोग (एफटीसी) शामिल हैं। इसका उद्देश्य ऐसे नए कानूनों के लिए सुझाव तैयार करना है, जिनसे सरकार की प्रतिक्रिया और कार्रवाई को बेहतर बनाया जा सके।

 

इसमें इस बात पर विचार किया जाएगा कि एआई लैब के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया जाए कि वे किसी भी तरह के ‘ब्रीच (सुरक्षा उल्लंघन), हैक या जेलब्रेक’ की जानकारी सरकार को दें। इसके अलावा, अपने आप अलर्ट जारी करने की व्यवस्था (ऑटोमैटिक अलर्ट) पर भी विचार किया जा सकता है।

 

रिपोर्ट किए गए दस्तावेज में कहा गया है, “हालांकि, एआई लैब अपने मॉडल के कारण बढ़ने वाले जोखिमों और मिलने वाले अवसरों के लिए आखिरकार खुद जिम्मेदार हैं, लेकिन इस बदलाव के दौर को पहचानना और समझना संघीय सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार का काम देश के कानूनों को लागू करना भी है, ताकि हमारे गणतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों की रक्षा हो सके और उन्हें आगे बढ़ाया जा सके।”

 

इस चार्टर के तहत वित्तीय सेवाओं, ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे, परिवहन, कृषि और आपातकालीन सेवाओं जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है। ट्रंप ने कहा कि यह टास्क फोर्स आम लोगों, जनहित समूहों और धार्मिक संगठनों के साथ-साथ महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा मुहैया कराने वाली संस्थाओं और एआई कंपनियों के साथ सरकार के संपर्क और सहयोग में तालमेल बिठाएगी। हालांकि, कुछ आलोचकों ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि इसमें कामगारों का कोई जिक्र नहीं है।

 

इस टास्क फोर्स को एआई से जुड़े खतरों पर रिपोर्ट सौंपने के लिए 120 दिन का समय दिया गया है। रिपोर्ट में नागरिक स्वतंत्रता के लिए संभावित खतरे, साइबर सुरक्षा, उन्नत एआई मॉडल के मानक और जरूरत से ज्यादा नियम बनाने के संभावित असर पर खास ध्यान दिया जाएगा।

 

सुपर इंटेलिजेंस फोर्स में कौन-कौन शामिल है?

अक्टूबर की शुरुआत में ट्रंप ने क्लेटन को एआई सलाहकार नियुक्त किया था। अब वह इस टास्क फोर्स की अध्यक्षता करेंगे। उन्होंने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ से कहा कि उन्हें उम्मीद है कि एआई सिस्टम “बातचीत के जरिए विकसित” किए जाएंगे। उन्होंने इसके लिए ‘सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन’ (एसईसी) और ‘फेडरल रिजर्व’ की ओर से वित्तीय उद्योग के लिए बनाए गए रिस्क मॉडल का उदाहरण दिया। बता दें कि ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान क्लेटन एसईसी के प्रमुख थे।

 

सामने आए चार्टर में टास्क फोर्स के तीन उपाध्यक्षों के नाम भी दिए गए हैं:

  • एंड्रयू फर्ग्यूसन, एफटीसी के चेयरमैन
  • एमिल माइकल, रक्षा विभाग में रिसर्च और इंजीनियरिंग के अंडरसेक्रेटरी
  • स्कॉट कुपोर, ऑफिस ऑफ पर्सनल मैनेजमेंट के डायरेक्टर

रिपोर्ट किए गए चार्टर के मुताबिक, फर्ग्यूसन को उपभोक्ताओं के हितों और उनके अधिकारों के लिए काम करने वाले समूहों की जिम्मेदारी दी गई है। यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब एफटीसी, ओपनएआई, एंथ्रोपिक और एमईटीआर की जांच कर रहा है। ये ऐसे एआई एजेंटों से जुड़े मामले को लेकर जांच के दायरे में हैं जो नियंत्रण से बाहर होकर नुकसान पहुंचाने वाले काम कर सकते हैं।

 

माइकल पहले टेक्नोलॉजी सलाहकार के रूप में काम कर चुके हैं और ‘परप्लेक्सिटी एआई’ के सलाहकार बोर्ड में भी रह चुके हैं। अब वह एआई कंपनियों के साथ संपर्क और तालमेल का काम संभालेंगे। कुपोर महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे से जुड़ी संस्थाओं और उद्योग के दूसरे संबंधित लोगों के साथ तालमेल बनाएंगे।

 

ट्रंप के मंत्रिमंडल के कई अहम सदस्य भी इस टास्क फोर्स में शामिल हैं। इनमें उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ शामिल हैं। चार्टर में ट्रंप के पूर्व एआई सलाहकार डेविड सैक्स और पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में विदेश मंत्री रहीं कोंडोलीजा राइस के नाम भी बाहरी सदस्यों के रूप में दर्ज हैं।

 

टास्क फोर्स को अपनी रिपोर्ट और सुझाव राष्ट्रपति ट्रंप और व्हाइट हाउस की चीफ ऑफ स्टाफ सूसी वाइल्स को सौंपने हैं।

 

टास्क फोर्स पर प्रतिक्रिया

पॉलिटिको के मुताबिक, ट्रंप की घोषणा से पहले कई प्रमुख रिपब्लिकन नेताओं को सुपर इंटेलिजेंस फोर्स की योजना के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी। यह टास्क फोर्स ऐसे समय में बनाई गई है, जब रिपब्लिकन पार्टी के वरिष्ठ सीनेटर एआई से होने वाले खतरों को कम करने के उद्देश्य से एक बड़ा कानून लाने की तैयारी कर रहे हैं।

 

डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने राष्ट्रपति ट्रंप की आलोचना की है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (प्रतिनिधि सभा) की सदस्य लोरी ट्रेहन ने सीएनएन से कहा कि ट्रंप “सिर्फ एक एआई फोर्स बनाने की बात कर रहे हैं, लेकिन उनके पास यह बताने के लिए कोई ठोस योजना नहीं है कि इसे कांग्रेस की मंजूरी के जरिए कैसे लागू किया जाएगा।” उन्हें यह पहल समस्या के समाधान के बजाय उसे टालने की कोशिश ज्यादा लगी।

 

ट्रेहन ने कहा, “हमें अत्याधुनिक एआई पर काम करने वाली कंपनियों के लिए कानून बनाने और सुरक्षा उपाय तय करने चाहिए। लेकिन इस योजना में ऐसा कुछ भी नहीं है।”

 

डेमोक्रेटिक पार्टी के एक अन्य प्रतिनिधि जोश गॉटहाइमर ने भी पॉलिटिको से कहा कि उन्हें ट्रंप की मंशा पर संदेह है। बतौर गॉटहाइमर, “अगर राष्ट्रपति को अब एहसास हो रहा है कि एआई से जुड़े खतरे कोई मनगढ़ंत बातें नहीं हैं और वह अमेरिका की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठा रहे हैं, तो यह अच्छी बात है। लेकिन अगर यह सिर्फ अपनी छवि चमकाने और अपने परिवार के निवेश को बचाने की कोशिश है, तो मुझे इससे गंभीर आपत्ति है।”

LIVE: दिल्ली पुलिस ने नेहा बोरा को रिहा किया, दिपके की अदालत में पेशी होगी

LIVE: दिल्ली पुलिस ने नेहा बोरा को रिहा किया, दिपके की अदालत में पेशी होगी

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Latest News Today Live Updates in Hindi : दिल्ली पुलिस ने तिरंगा मार्च के दौरान हिरासत में ली गई नेहा बोरा को रिहा किया। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके को आज अदालत में पेश किया जाएगा। पल पल की जानकारी…

-दिल्ली पुलिस ने ‘दिल्ली पुलिस अधिनियम’ की धारा 65 के तहत औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को हिरासत से रिहा कर दिया है। उन्हें 16 अक्टूबर की शाम को एहतियाती धाराओं के तहत हिरासत में लिया गया था।

-अभिजीत दिपके के खिलाफ BNSS की धारा 126/170 के तहत कार्रवाई शुरू की गई है। उन्हें SEM कोर्ट के सामने पेश किया जाएगा।

-16 अक्टूबर की शाम को AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा और एक्टिविस्ट अभिजीत दिपके को एहतियाती धाराओं के तहत हिरासत में लिया गया था।

अमित शाह का इतना भरोसा!

अमित शाह ने इस सप्ताह खम ठोंक कर कहा कि विपक्ष कुछ कर लें 2029 में मोदी जीतेंगे। कांग्रेस की लगातार चौथी हार होगी। सवाल है यह शाह की गणित है या अहंकार? आखिर 2029 के चुनाव में अभी ढाई वर्ष से अधिक का समय है। तब तक देश की आर्थिकी का कैसा कबाड़ा होगा? 35 वर्ष की उम्र से कम नौजवानों की उम्मीदों और बेकारी का गुस्सा किस करवट बैठेगा? नैरेटिव कैसा चलेगा? ट्रंप, शी जिनपिंग, मुनीर जैसी विदेशी ताकतें भारत का कितना टेंटुआ दबा चुकी होंगी? इसलिए कि घर के अंदर हो या घर के बाहर कोई ऐसा है नहीं, जिसे मोदी सरकार ने ठगा नहीं! बावजूद इसके अमित शाह के लिए 2029 का चुनाव चुटकी बजा कर जीतना वैसा ही है जैसे महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल जीता और आने वाले महीनों में जीतेंगे। मानों चुनाव होना महज औपचारिकता हो। नतीजा उन्होंने पहले से लिखाया हुआ हो। 13 अक्टूबर का उनका वाक्य था, ‘2029 के चुनाव में भी कांग्रेस बुरी तरह से हारेगी’।

यों राजनीति में नेता की मजबूरी होती है कि वह आत्मविश्वास दिखाए। पर अमित शाह का हुंकारा उस समय और परिस्थितियों में है, जिसमें अब गारंटीशुदा माना जा रहा है कि मतदाता सूचियों में वोटरों के नाम कटवा कर, हटवा कर भाजपा पश्चिम बंगाल में चुनाव जीती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के मोदी से मोहभंग को मोदी सरकार-चुनाव आयोग की मशीनरी ने वोट सूचियों में हेराफेरी से पलटा है। देश अब करोड़ों नामों (15 करोड़ मतदाताओं के अनुमान!) के कटने, नए नाम जुड़वाने की शर्तों, माता-पिता के दस्तावेजों, प्रवासी मजदूरों और पहली बार वोट देने वाले नौजवानों की पात्रता पर तलवार लटकी देख रहा है। चुनाव आयोग अराजक सूचियां बना रहा है!

सोचें, इसके पीछे की राजनीति पर। जरा सोचें। चुनाव में जनता किसे वोट देगी, उससे पहले यह तय होता है कि वोट देने वालों की सूची में कौन होगा? फिर यह कि किस इलाके के वोट किस लोकसभा क्षेत्र में (आगे की सीट परिसीमन योजना) गिने जाएंगे! फिर इरादा महिला आरक्षण लागू कराने का है। मतलब किस सीट पर किस तरह का उम्मीदवार खड़ा करने में मोदी-शाह का अपर हैंड। मुझे लग रहा है कि तीनों बातें चुनाव से पहले तय होंगी। तीनों के नियम, प्रक्रियाएं और प्रशासनिक फैसले (याकि सरकार) हैं। अब यदि इसी गेमप्लान में मोदी-शाह अपने चक्रवर्ती राजनीतिक भविष्य की गारंटी मान काम करें, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग आदि सभी रास्ता बनवाएं तो सड़क पर राहुल गांधी या जेनरेशन ज़ेड कितना ही आंदोलन करें, हल्ला मचाएं पर 2029 के नतीजे मोदी के लिए पश्चिम बंगाल जैसे होंगे।

असली सवाल बूथ का है। मोदी की कमान में भाजपा ने बूथवार मतदाताओं का राजनीतिक हिसाब रखने के पेशेवरों (सर्वेयर, पन्ना प्रमुखों आदि) की फौज बनाई हुई है। इनके पास मतदाताओं की केवल जानकारी ही नहीं है, बल्कि मतदाता सूचियों में मनमाफिक छंटनी की सामर्थ्य भी है। फॉर्म-7 सबमिट करो और नाम कटाओ। फिलहाल इतना तो प्रमाणित है कि एसआईआर के बहाने बड़ी संख्या में मौजूद मतदाताओं के नाम हटे हैं। और नए नौजवानों के वोटर पंजीकरण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल हैं। नौजवान पहले यों भी कम वोटर बनते थे लेकिन अब तो उनके आगे पंजीकरण में अतिरिक्त दस्तावेजी शर्तों को ऐसा बनाया है कि यूथ भले बेरोजगार भटकता रहे, सड़क पर आंदोलन करे लेकिन वोटर बनने के महत्त्व के प्रति लापरवाह बना रहेगा। जैसे नौकरी के आवेदनों से निराशा है वैसे ही वोटर बनने की भागदौड़ से बेरुखी रही तो 2029 में मोदी 2014 से भी बड़े बहुमत से जीतेंगे।

यही अमित शाह के आत्मविश्वास का बीजमंत्र है। सो, जेनरेशन ज़ेड का सड़क पर गुस्सा एक बात है और मतदाता सूची में उनका नाम होना दूसरी। फिर मतदान केंद्र पहुंचकर वोट डालना तीसरी। यदि पहली बार वोट देने वाले लाखों पात्र नौजवानों के पंजीकरण में बाधाएं हों तो उनकी राजनीतिक सक्रियता और चुनावी भागीदारी के बीच फासला अपने आप होगा।

अमित शाह ने कांग्रेस को याद दिलाया कि वह एसआईआर से पहले भी चुनाव हारती रही है। सही है। लेकिन इससे एसआईआर के सवाल का जवाब कैसे है? कांग्रेस 2014 और 2019 में हारी, 2024 में भी सरकार नहीं बना सकी। मगर 2024 में भाजपा की अपनी सीटें 303 से घटकर 240 हुई थीं। कांग्रेस 52 से 99 पर पहुंची थी। तब क्या उस चुनाव का सबक केवल कांग्रेस की हार था? या यह भी था कि पूर्ण बहुमत वाली भाजपा को गठबंधन के सहारे सरकार बनानी पड़ी? भाजपा के जीत के लाले पड़े तो एसआईआर को सुनियोजित नए फॉर्म, नई प्रक्रियाओं याकि झंझटों से भरपूर बनाने की धांधलेबाजी हुई।

दीपके, नेहा पुलिस हिरासत में

नई दिल्ली। दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके को हिरासत में लेकर उनका तिरंगा मार्च रोक दिया। दीपके अपने समर्थकों के साथ शाम पांच बजे के करीब कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में तिरंगा मार्च निकालने जा रहे थे। लेकिन पुलिस ने वहां पहुंचने से पहले ही उनको हिरासत में ले लिया गया। हालांकि उनके कुछ समर्थक तिरंगा लेकर सेंट्रल पार्क पहुंच गए थे और वहां तिरंगा फहराया। सीपीआई माले के छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी पुलिस ने हिरासत में लिया है। सीजेपी ने देर शाम कहा कि दीपके को दिल्ली पुलिस किसी अज्ञात जगह ले गई है।

दिल्ली पुलिस ने डेढ़ सौ अन्य लोगों को भी हिरासत में लिया है। दीपके को छह दिन में दूसरी बार दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया। इससे पहले 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए आए दीपके को इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर ही हिरासत में ले लिया गया था। एक दिन बाद 11 अक्टूबर को दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका एक बॉन्ड भर कर रिहा हुए थे। पांच दिन बाद उनको फिर से हिरासत में लिया गया। दीपके को हिरासत में लिए जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने इसे अघोषित आपातकाल बताया।

गौरतलब है कि सीजेपी का तिरंगा मार्च रोकने के लिए एनडीएमसी ने सेंट्रल पार्क को दिन के लिए बंद कर दिया था और पुलिस ने नई दिल्ली जिले में बीएनएसएस की धारा 163 लागू कर दी है। इसके तहत चार या उससे ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक है। बहरहाल, दीपके को हिरासत में लेने से पहले दिल्ली पुलिस झंडेवालान स्थित उस घर पर पहुंची थी, जहां वे ठहरे हुए थे। पुलिस ने उन्हें प्रदर्शन नहीं करने का नोटिस दिया था। यह घर शरद पवार की एनसीपी के एक नेता का है।

पुलिस जब उनको नोटिस देने गई तो इस दौरान दीपके की पुलिस से बहस हो गई थी। दीपके ने पुलिस से कहा कि यह कोई रैली या प्रोटेस्ट नहीं है। उन्होंने कहा, ‘हम सिर्फ सेंट्रल पार्क तक जाकर तिरंगा फहराना चाहते हैं’। गौरतलब है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने शुक्रवार, 16 अक्टूबर को शाम पांच बजे ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का ऐलान किया था। सीजेपी ने प्रदर्शनकारियों को शाम पांच बजे कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में आने के लिए कहा था।

दूसरी ओर इस मार्च को रोकने के लिए दिल्ली में 28 हजार से ज्यादा सुरक्षा बलों को तैनात किया गया था। अर्धसैनिक बलों के साथ साथ दिल्ली पुलिस के जवानों ने पूरे कनॉट प्लेस को घेर लिया था। सात लेयर की बैरिकेडिंग की गई थी। ऐसी की बैरिकेडिंग और सुरक्षा बंदोबस्त करके 10 अक्टूबर का जंतर मंतर का प्रदर्शन भी रोका गया था। उस दिन सात हजार के करीब लोग हिरासत में लिए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट का मार्च रोकने से इनकार

नई दिल्ली। शुक्रवार को लगातार दूसरे दिन सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के तिरंगा मार्च को रोकने से इनकार किया। कनॉट प्लेस के व्यापारियों के कई समूहों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी और शुक्रवार की शाम को पांच बजे के तिरंगा मार्च को रोकने का आदेश देने की मांग की थी। लेकिन सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली के व्यापारियों की याचिका पर तत्काल आदेश देने से इनकार कर दिया। एक दिन पहले गुरुवार को भी सुप्रीम कोर्ट ने मार्च रोकने का आदेश नहीं दिया था। लेकिन पुलिस को सुरक्षा के पर्याप्त बंदोबस्त करने का निर्देश दिया था।

दिल्ली के व्यापारियों की इस याचिका में कॉकरोच जनता पार्टी के सेंट्रल पार्क में प्रदर्शन से कारोबार प्रभावित होने की आशंका जताई गई थी। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने प्रदर्शन से जुड़ी अन्य याचिकाओं का जिक्र करते हुए कहा, ‘कोई प्रदर्शन करना चाहता है, कोई मूंगफली बेचना चाहता है, कोई कानून व्यवस्था चाहता है, ये सभी बातें आपस में जुड़ी हैं’। गौरतलब है कि प्रदर्शन के कारण एनडीएमसी ने पहले ही सेंट्रल पार्क को दिन तक बंद करने का आदेश दे दिया था।

बहरहाल, कनॉट प्लेस के व्यापारियों का दावा है प्रदर्शन और उसे रोकने के बंदोबस्तों से कनॉट प्लेस में हर दिन दो सौ करोड़ रुपए का कारोबार प्रभावित हो सकता है। व्यापारियों ने यह भी कहा है कि 10 अक्टूबर को प्रदर्शन शुरू होने के बाद से दो हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है।शुक्रवार को जो याचिका सुप्रीम कोर्ट के सामने लाई थी वह दिल्ली किराना कमेटी और दिल्ली आयरन एंड हार्डवेयर मर्चेंट एसोसिएशन ने दायर की थी। शुक्रवार सुबह चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस पर सुनवाई की।

अदालत ने कहा, ‘हम उम्मीद करते हैं कि सभी लोग बेहतर समझदारी दिखाएंगे। हम जानते हैं कि सभी छोटे दुकानदार इन दिनों अपनी रोजी रोटी कमाते हैं। हम जानते हैं कि पूरे परिवारों को किन मुश्किलों और परेशानियों का सामना करना पड़ेगा’। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सेंट्रल पार्क बंद होने से ठेले वालों और छोटे व्यापारियों का कारोबार भी प्रभावित हो सकता है। प्रदर्शन के कारण उन्हें नुकसान होने का खतरा है। व्यापारी संगठनों ने त्योहार और शादी के सीजन में मध्य दिल्ली में प्रदर्शन के कारण संभावित कारोबार नुकसान का मुद्दा उठाया है।

सरकार बुला सकती संसद का विशेष सत्र

नई दिल्ली। केंद्र सरकार एक बार फिर संसद का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी कर रही है। सरकार ने इस साल 16 से 18 अप्रैल तक तीन दिन का विशेष सत्र बुलाया था, जिसमें महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधयेक पेश किए गए थे। हालांकि सरकार उसे पास कराने में कामयाब नहीं हुई थी। अब बताया जा रहा है कि इसी महीने एक बार फिर सरकार संसद का विशेष सत्र बुला सकती है।

इस सत्र में नारी शक्ति वंदन कानून को बदलने के लिए 131वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया जाएगा। इसके अलावा परिसीमन से जुड़े दो बिल पेश किए जाएंगे। ये ही तीनों बिल अप्रैल के विशेष सत्र में भी पेश किया गया था। चूंकि 131वां संविधान संशोधन बिल पास कराने के लिए सरकार को दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की जरुरत है। इसलिए पिछली बार बिल पास नहीं हो पाया था। उसके बाद से तृणमूल कांग्रेस और शिव सेना में टूट हुई है, जबकि कांग्रेस औऱ डीएमके अलग अलग हो गए हैं।

जानकार सूत्रों का कहना है कि सरकार ने जरूरी दो तिहाई बहुमत जुटा लिया है। गौरतलब है कि संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को खत्म हुआ था, लेकिन इसका अब तक सत्रावसान नहीं किया गया है। इसलिए विशेष सत्र बुलाने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी की जरुरत नहीं है। सरकार एक हफ्ते पहले सूचना देकर विशेष सत्र आहूत कर सकती है।

बहरहाल, दो तिहाई बहुमत जुटा लेने के दावे के बरक्स वास्तविक स्थिति देखें तो अब भी सरकार इससे दूर है। इस समय लोकसभा की दो सीटें खाली हैं यानी 541 सांसद हैं। इनमें से एनडीए के 318 सांसद हैं। बिल को पास कराने के लिए 360 वोट चाहिए। अगर डीएमके के 22 सांसद बिल का समर्थन करते हैं तो बिल के समर्थन में 340 सांसद हो जाएंगे। इसके बाद भी भाजपा को लगभग 20 सांसदों की जरूरत है। ऐसे ही राज्यसभा में एनडीए के 153 सांसद हैं। वहां बिल पास कराने के लिए 162 सांसद चाहिए। वहां भी एनडीए को नौ सांसदों की जरूरत पड़ेगी। हालांकि वहां संख्या जुटा लेना ज्यादा आसान है।

खड़गे ने पीएम को चेताया

कांग्रेस

नई दिल्ली। संसद का विशेष सत्र बुला पर नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन करने और परिसीमन बिल पास कराने की खबरों के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिख कर चेतावनी दी है। उन्होंने 13 अगस्त को खत्म हुए मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं करने पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि सरकार किसी भी विधेयक को जोर जबरदस्ती पास कराने का प्रयास न करे।

खड़गे ने प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग भी की है। खड़गे ने परिसीमन को लेकर भी केंद्र सरकार को आगाह किया है। उन्होंने इस मामले पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग करते हुए प्रधानमंत्री से कहा है कि संसद में परिसीमन प्रस्तावों को अंतिम रूप देने से पहले सभी पार्टियों से विचार विमर्श करने की सख्त आवश्यकता है। उन्होंने कहा है कि विपक्ष परिसीमन के प्रस्ताव पर हर तरह से चर्चा करना चाहता है।

कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष खड़गे ने प्रधानमंत्री को चेतावनी दी है सरकार किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को जबरन पास न कराए। खड़गे ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र में कहा है कि कहा कि मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ था। इसके बाद से 64 दिन बीत चुके हैं, लेकिन संसद के दोनों सदनों का अभी तक सत्रावसान नहीं किया गया है। कांग्रेस महासचिव औऱ संचार विभाग के प्रमुख जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कांग्रेस अध्यक्ष का पत्र साझा करते हुए लिखा है कि खड़गे जी ने अभी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर संसद के मानसून सत्र के सत्रावसान में हुई अभूतपूर्व देरी और मोदी सरकार की संभावित योजनाओं के बारे में बात की है।

मस्क के आरोपों पर रिलायंस का जवाब

मुंबई। दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी इलॉन मस्क के आरोपों पर पहली बार रिलायंस समूह ने जवाब दिया है। रिलायंस ने कहा है कि कंपनी भारत में हर तरह के निवेश और प्रतिस्पर्धा का स्वागत करती है। गौरतलब है कि मस्क ने आरोप लगाया था कि सेटेलाइट से इंटरनेट की सेवा देने वाली उनकी कंपनी स्टारलिंक को भारत में मुकेश अंबानी की वजह से मंजूरी नहीं मिल रही है।

रिलायंस ने अपने जवाब में कहा है कि दूसरी कंपनियों की तरह उसने भी लाइसेंस के लिए आवेदन किया है और मंजूरी का इंतजार कर रही है। रिलायंस समूह ने जियो का आईपीओ लॉन्च होने से ठीक पहले यह सफाई दी है। उसने यह भी कहा है कि कंपनी स्टारलिंक जैंसी कंपनी का भारत में स्वागत करेगी। रिलायंस समूह ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जवाब में कहा कि वह प्रतिस्पर्धा से नहीं डरती। रिलायंस ने कहा, ‘असली मुकाबला वही है, जिससे यह पता चले कि सबसे अच्छी सर्विस कौन दे रहा है’।

गौरतलब है कि इलॉन मस्क भारत में स्टारलिंक को लाइसेंस मिलने और सेवा शुरू होने में देरी के लिए रिलायंस समूह के प्रमुख मुकेश अंबानी को जिम्मेदार बताया है। पिछले दिनों मस्क ने अपनी एक पोस्ट में मुकेश अंबानी पर तंज करते हुए उन्हें ‘प्राइम मिनिस्टर अंबानी’ लिखा था। एक पोस्ट में उन्होंने अंबानी को ‘भारत का रियल बॉस’ बताया था। बहरहाल, भारत सरकार ने भी इस पर स्थिति स्पष्ट की है और कहा है कि देश में तीन सेटेलाइट इंटरनेट कंपनियों को लाइसेंस मिल चुके हैं। इनमें रिलायंस जियो सैटकॉम, भारती एयरटेल सपोर्टेड यूटेलसेट वनवेब और इलॉन मस्क की स्टारलिंक शामिल है। लेकिन इन सभी कंपनियों की सुरक्षा मंजूरी अभी बाकी है। इसके अलावा सेटेलाइट स्पेक्ट्रम का प्राइसिंग फ्रेमवर्क भी तय किया जा रहा है। सभी जरूरी शर्तें पूरी होने के बाद ही भारत में ये सेवाएं शुरू हो सकेंगी।

मोदी 11 दिसंबर को कनाडा जाएंगे

मोदी

नई दिल्ली। जस्टिन ट्रूडो के समय भारत और कनाडा के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघल गई है। कनाडा की मंत्री अनिता आनंद की भारत यात्रा के बाद अब भारत ने ऐलान किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 और 12 दिसंबर को कनाडा के दौरे पर रहेंगें। इस दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत होगी। भारत और कनाडा के बीच व्यापार समझौते, सीईपीए पर दस्तखत होने की संभावना भी है। इसके तहत दोनों देश व्यापार, निवेश और कारोबार बढ़ाने के लिए नियम तय करेंगे।

गौरतलब है कि भारत और कनाडा 2030 तक आपसी कारोबार को बढ़ा कर सालाना सात लाख करोड़ रुपए करना चाहते हैं। अभी दोनों देशों के बीच करीब तीन लाख करोड़ रूपए का व्यापार होता है। गौरतलब है कि इस समय कनाडा और अमेरिका के बीच आपसी संबंधों में बहुत तनाव है और कनाडा ने अमेरिका के ऊपर जैसे को तैसा टैरिफ लगाने का ऐलान किया है। ऐसी स्थिति में कनाडा नए बाजार तलाश रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के बीच 13 अक्टूबर को फोन पर बातचीत हुई थी। मोदी ने इसे अच्छी बातचीत बताया। दोनों नेताओं ने व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, सुरक्षा और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर सहमति जताई। कनाडा के प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक, दोनों नेता चाहते हैं कि भारत और कनाडा के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत जल्दी पूरी हो। दोनों नेताओं की बातचीत में हिंद प्रशांत क्षेत्र के हालात पर भी चर्चा हुई।

कितने भक्तों के भरोसे 2029 की जीत?

सवाल है भाजपा के पास ऐसे कितने करोड़ वोट हैं जो कुछ भी हो जाए, मोदी के नाम पर ही वोट देंगे? महंगाई बढ़े, बेरोजगारी बढ़े, रुपया गिरे, नौजवान सड़कों पर उतरें, मुसलमान नाराज हों, दलित और आदिवासी बिदकें, तब भी जिनका वोट नहीं बदलेगा। क्या ऐसे मतदाता बीस करोड़ हैं? पच्चीस करोड़ हैं? या तीस करोड़? पिछले तीन चुनावों का हिसाब देखें। 2014 में भाजपा को 31.34 प्रतिशत वोट मिले थे। 2019 में यह बढ़कर 37.7 प्रतिशत हुआ। फिर 2024 में घटकर 36.56 प्रतिशत रह गया। एनडीए को इन तीन चुनावों में क्रमशः लगभग 38.5, 45.4 और 43.8 प्रतिशत वोट मिले। मतलब 2019 के मुकाबले 2024 में भाजपा और एनडीए, दोनों का वोट प्रतिशत घटा। भाजपा की सीटें 303 से घटकर 240 हो गईं। बावजूद इस ट्रेंड के अमित शाह को 2029 में जीत का पक्का भरोसा है!

सवाल है क्या उन्हें लगता है कि भाजपा के 2024 के लगभग 23.6 करोड़ मतदाता अब स्थायी मोदी भक्त बन चुके हैं? या एनडीए के लगभग 28.3 करोड़ वोटों में कोई कमी संभव नहीं? लेकिन इन संख्याओं में तो सब तरह के मतदाता हैं। हिंदुत्व के पक्के समर्थक हैं तो सरकारी योजनाओं के लाभार्थी भी। जाति के हिसाब से वोट देने वाले हैं तो स्थानीय उम्मीदवार के कारण भाजपा को चुनने वाले भी। कुछ मोदी के नाम पर वोट देते हैं तो कुछ विपक्ष को पसंद नहीं करने के कारण। इनमें से कितने ऐसे हैं जो हर परिस्थिति में भाजपा को ही वोट देंगे?

ऐसी ही एक दूसरी गणित भी है। 2014 में भाजपा ने महज 31.34 प्रतिशत वोटों से लोकसभा में अपने दम पर बहुमत बनाया था। यानी सौ वोट डालने वालों में लगभग 69 ने भाजपा को वोट नहीं दिया, फिर भी उसे पूर्ण बहुमत मिला। 2019 में 37.7 प्रतिशत वोटों से 303 सीटें मिलीं। और 2024 में 36.56 प्रतिशत वोटों पर 240 सीटें। अंतर सिर्फ वोट प्रतिशत का नहीं था। वोट कहां पड़े, किस सीट पर विपक्ष बंटा, कहां उम्मीदवार मजबूत था, कहां गठबंधन बना, इन बातों से सीटों का गणित बदला और हमेशा बदलता है।

यहीं 2029 में मोदी-शाह की जीत का असली सूत्र याकि रहस्य है। भाजपा को देश के पचास प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन मिलना जरूरी नहीं। उसे उन निर्वाचन क्षेत्रों में पर्याप्त वोट चाहिए जहां से लोकसभा की बहुमत वाली संख्या बनती है। इसलिए संभव है कि देश में असंतोष बढ़े, कई सामाजिक समूहों में नाराजगी हो, नौजवान आंदोलन करें, फिर भी पार्टी विशेष का चुनावी आधार बना रहे। हालांकि इसमें यह भी खतरा है कि राष्ट्रीय वोट प्रतिशत में मामूली गिरावट से दर्जनों सीटें हाथ से निकल जाएं। जैसे 2024 में भाजपा का अनुभव था।

फिलहाल जेनरेशन ज़ेड का भौकाल मुखर है। नौजवानों में आज कितने मोदी समर्थक हैं और कितने विरोधी? मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों में कितने भाजपा को वोट देते हैं? पर इन्हें एक साथ जोड़कर कोई मोदी विरोधी आबादी नहीं बनाई जा सकती। जेनरेशन ज़ेड में भी मोदी समर्थक हैं। दलितों और आदिवासियों में भी भाजपा को वोट मिले हैं। लेकिन यह भी सच है कि एक ही मतदाता युवा भी हो सकता है, दलित भी और किसी आंदोलन का समर्थक भी। इसलिए इन समूहों की आबादी जोड़कर भाजपा विरोधी वोटों की संख्या निकालना संभव ही नहीं।

तो अमित शाह ने कैसे हिसाब लगाया हुआ होगा? मेरा मानना है कि वे भाजपा के प्रतिबद्ध वोटों पर निर्भर नहीं रहते। वह बूथवार वोट हिसाब के पारखी हैं। समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने से लेकर उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय सामाजिक समीकरणों का हिसाब रखते हैं। अब इस सबके साथ मतदाता सूचियों के एसआईआर, परिसीमन और महिला आरक्षण की संभावनाएं भी हैं। इसलिए राहुल गांधी, कांग्रेस और विपक्ष के लिए जीवन-मरण का स्वाभाविक सवाल है कि 2029 का चुनाव आखिर किन मतदाता सूचियों, किन निर्वाचन क्षेत्रों और किन नियमों के अंतर्गत होगा?

कैसे? आखिर जब चुनावी जीत का अंतर कई जगह कुछ हजार वोटों का हो, तब मतदाताओं के नाम कटने या जुड़ने से ही चुनावी मुकाबला तय होता है। पश्चिम बंगाल उदाहरण है। दो-चार, दस लाख नहीं, लाखों (39 लाख) वैध दस्तावेजी सबूतों के बावजूद वोट डालने के अधिकार से वंचित किया गया। ऐसा चुनाव आयोग, ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट सभी के बावजूद हुआ।

तो नरेंद्र मोदी-अमित शाह के 2029 में चुनाव जीतने के अडिग विश्वास का कारण सत्ता का ऐसा दुरुपयोग और अहंकार क्या नहीं है? यदि 2024 के 23.6 करोड़ भाजपा वोटों को भक्तों की स्थायी संख्या भी मान लें तब भी इनके बूते जीत संभव नहीं है जब तक वोट सूची ईमानदार न हो। 2029 में कितने करोड़ नए या पुराने वोटर मतदान करने के पात्र रहेंगे? कितने कटेंगे, और कितने बंगाल की तरह लटकाए रखे जाएंगे, उससे अधिक तय होगा?

सो, भाजपा को 2029 में कितने करोड़ लोग पसंद करते हैं, से अधिक महत्त्वपूर्ण होगा कि उसने सीटवार अपने वोट कितने करवाए हुए हैं? और यह काम ज्ञानेश कुमार की कमान के चुनाव आयोग के जरिए चुटकियों में संभव बना रहेगा।