8th Pay Commission: बेसिक पे से लेकर भत्तों तक, जानिए 7 और 10 अगस्त को वेतन आयोग किस बात पर करेगा महत्वपूर्ण चर्चा

8th Pay Commission Salary Structure: देश के करीब एक करोड़ सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स में आठवां वेतन आयोग को लेकर खूब चर्चा है। यह आयोग अब अपने सबसे महत्वपूर्ण फेज में पहुंच चुका है। इस दौरान कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतन, भत्ते और पेंशन में संशोधन के लिए हितधारकों, कर्मचारी यूनियनों से लगातार चर्चा की जा रही है।

7 और 10 अगस्त को होगी बड़ी बैठक

आठवें केंद्रीय वेतन आयोग ने अगले वेतन संशोधन पर चल रहे परामर्श के तहत दिल्ली स्थित केंद्र सरकार और केंद्र शासित प्रदेशों (UT) के कर्मचारी संघों, परिसंघों और यूनियनों को 7 अगस्त और 10 अगस्त 2026 को बैठक के लिए आमंत्रित किया है। 23 जुलाई 2026 को जारी एक नोटिस में आयोग ने बताया कि यह बैठक उसकी हितधारक परामर्श प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसके जरिए वह अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करने से पहले कर्मचारी प्रतिनिधियों के सुझाव और सिफारिशें जुटा रहा है।

सैलरी स्ट्रक्चर के 3 मुख्य पिलर, जिन पर टिकी है पूरी चर्चा

8वें वेतन आयोग में केंद्रीय कर्मचारियों की सैलरी का नया गणित मुख्यतः तीन हिस्सों में तय किया जा रहा है:

A. बेसिक पे और फिटमेंट फैक्टर

बेसिक पे आपकी सैलरी और पेंशन की सबसे मजबूत नींव है, क्योंकि ग्रेच्युटी, पीएफ और बाकी भत्ते इसी के आधार पर तय होते हैं। पुराने बेसिक पे को नए बेसिक पे में बदलने के लिए फिटमेंट फैक्टर का इस्तेमाल किया जाता है। नेशनल काउंसिल – जेसीएम (NC-JCM) ने 3.83 फिटमेंट फैक्टर की मांग रखी है।

वहीं ऑल इंडिया एनपीएस एंप्लाइज फेडरेशन (AINPSEF) ने परिवार की निर्भरता इकाई को 3 से बढ़ाकर 4.4 करने का प्रस्ताव दिया है, जिससे बेसिक पे में बड़ा उछाल आएगा।

B. भत्ते (DA, HRA और TA)

नए बेसिक पे के लागू होते ही उस पर आधारित सभी प्रमुख भत्ते री-कैलकुलेट होंगे:

HRA (मकान किराया भत्ता): एआईएनपीएसईएफ ने X कैटेगरी के शहरों के लिए 36%, Y के लिए 24% और Z कैटेगरी के लिए 12% HRA करने की सिफारिश की है। साथ ही यह भी प्रस्ताव है कि जब भी DA बढ़े, HRA में खुद-ब-खुद बढ़ोतरी हो।

TA (ट्रेवल भत्ता): लेवल-1 के कर्मचारियों के लिए न्यूनतम TA बढ़ाकर ₹9,000 प्रति महीने करने का प्रस्ताव है।

C. ग्रॉस सैलरी

बेसिक पे और सभी भत्तों को मिलाकर आपकी कुल कमाई तय होती है। उदाहरण के तौर पर, अगर यूनियनों के ये सभी प्रस्ताव मान लिए जाते हैं, तो लेवल-1 के कर्मचारियों की सैलरी ₹37,080 से बढ़कर सीधे ₹61,344 तक पहुंच सकती है यानी करीब 65% तक की भारी बढ़ोतरी!

कब तक लागू हो सकती हैं सिफारिशें?

आयोग का गठन 3 नवंबर 2025 को 18 महीने की अवधि के लिए किया गया था। इसके अनुसार, आयोग अपनी अंतिम रिपोर्ट फरवरी 2027 से मध्य-2027 के बीच सौंप सकता है।

अगर हम ऐतिहासिक ट्रेंड्स को देखें तो सिफारिशें आने के बाद सरकार द्वारा इसे पूरी तरह लागू करने में 2 से 3 साल का समय लगता है। हालांकि, कयास लगाए जा रहे हैं कि यह बढ़ोतरी 1 जनवरी 2026 से एरियर के साथ प्रभावी हो सकती है।

New Tax Regime : न्यू टैक्स रिजीम चुनने से पहले सैलरी की इन 8 बातों का रखें ध्यान, वरना बढ़ सकती है टैक्स देनदारी

New Tax Regime : नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime) को अपनाने वाले नौकरीपेशा लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है। इसकी वजह कम टैक्स रेट और आसान नियम हैं।

लेकिन सिर्फ कम टैक्स स्लैब देखकर फैसला करना सही नहीं है। आपकी सैलरी का स्ट्रक्चर, टैक्स बचाने वाले निवेश, छूट (Exemptions) और वित्तीय जिम्मेदारियां तय करती हैं कि आपके लिए कौन-सी टैक्स व्यवस्था बेहतर रहेगी।

आइए जानते हैं कि नई टैक्स रिजीम को चुनने से पहले आपको किन 8 बातों का ध्यान रखना चाहिए।

1. HRA का फायदा मिलेगा या नहीं?

अगर आप किराए के घर में रहते हैं और House Rent Allowance (HRA) का फायदा लेते हैं, तो पुरानी टैक्स व्यवस्था आपके लिए फायदेमंद हो सकती है। नई टैक्स व्यवस्था में HRA की छूट नहीं मिलती।

2. LTA का इस्तेमाल करते हैं?

अगर आप नियमित रूप से Leave Travel Allowance (LTA) का क्लेम करते हैं, तो नई टैक्स व्यवस्था चुनने पर यह टैक्स छूट खत्म हो जाएगी।

3. 80C में निवेश

अगर आप EPF, PPF, ELSS, लाइफ इंश्योरेंस, टैक्स सेविंग FD, बच्चों की ट्यूशन फीस, होम लोन या फिर सुकन्या समृद्धि योजना में निवेश करते हैं, तो पुरानी टैक्स व्यवस्था में इन पर टैक्स छूट मिलती है। नई व्यवस्था में यह लाभ नहीं मिलता।

4. NPS का नियम अलग है

अगर आपके NPS में कंपनी भी योगदान देती है, तो उसके योगदान पर मिलने वाली टैक्स छूट नई टैक्स व्यवस्था में भी जारी रहती है। लेकिन आपके अपने योगदान पर अतिरिक्त छूट नहीं मिलती।

5. होम लोन है तो हिसाब जरूर लगाएं

अगर आपने खुद रहने के लिए घर खरीदा है और उस पर होम लोन चल रहा है, तो पुरानी व्यवस्था में मूलधन और ब्याज दोनों पर टैक्स छूट मिल सकती है। नई व्यवस्था में यह फायदा नहीं मिलता।

5. सैलरी अलाउंस भी देखें

बच्चों की शिक्षा, हॉस्टल, ट्रांसपोर्ट जैसे कई अलाउंस पुरानी व्यवस्था में टैक्स बचाने में मदद करते हैं। नई व्यवस्था में इनमें से ज्यादातर छूट खत्म हो जाती हैं।

6. Flexible Benefit Plan (FBP)

कई कंपनियां भोजन, फोन, इंटरनेट, किताबें, प्रोफेशनल सब्सक्रिप्शन और दूसरे खर्चों का रीइंबर्समेंट देती हैं। इनका टैक्स नियम हर मामले में अलग हो सकता है। इसलिए अपनी सैलरी स्ट्रक्चर को ध्यान से समझें।

7. प्रोफेशनल टैक्स

कुछ राज्यों में कर्मचारियों से प्रोफेशनल टैक्स लिया जाता है। पुरानी टैक्स व्यवस्था में इसकी कटौती का लाभ मिलता है, जबकि नई व्यवस्था में आमतौर पर यह सुविधा नहीं होती।

8. रिटायरमेंट बेनिफिट

EPF, NPS और सुपरएन्युएशन फंड में कंपनी के योगदान पर तय सीमा तक टैक्स राहत मिलती है। अगर यह सीमा पार होती है, तो अतिरिक्त रकम पर टैक्स देना पड़ सकता है। यह नियम दोनों व्यवस्थाओं में लागू होता है।

किसके लिए कौन-सी व्यवस्था बेहतर?

अगर आप HRA लेते हैं, होम लोन चुका रहे हैं, 80C में अच्छा निवेश करते हैं, LTA और दूसरी टैक्स छूट का फायदा उठाते हैं, तो पुरानी टैक्स व्यवस्था अब भी ज्यादा फायदेमंद हो सकती है।

वहीं, अगर आपकी सैलरी सीधी-सादी है, HRA नहीं मिलता, होम लोन नहीं है और टैक्स बचाने वाले निवेश कम हैं, तो नई टैक्स व्यवस्था बेहतर विकल्प साबित हो सकती है।

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।