ईरान युद्ध से अमेरिका का सुपर पॉवर तमगा डगमगाया

Iran US War: अहंकार की लड़ाई जब दो व्यक्तियों में हो तो दो परिवार प्रभावित या बरबाद होते हैं, लेकिन जब ये दो देशों के बीच हो तो समूचा विश्व प्रभावित होता है और टकराने वाले दोनों ही देश बरबाद हो सकते हैं। रूस-यूक्रैन में टकराव तो 2014 से ही प्रारंभ हो गया था, किंतु पूर्णकालिक युद्ध 24 फरवरी 2022 से शुरू हुआ, जिसमें सीधे दोनों ने मैदान पकड़ लिया है, जिसमें अभी तक कोई कमजोर पड़ता नहीं दिखाई देता। इसी तरह से अमेरिका-वियतनाम के बीच 1955 में शुरू हुआ युद्ध 1975 में समाप्त हो सका था, वह भी अमेरिका सेना के पीछे हट जाने से। पीछे तो उसे अफगानिस्तान से भी हटना पड़ा, लेकिन फटे में टांग अड़ाने का अब भी कोई मौका वह नहीं छोड़ता। ऐसा ही है ईरान के साथ अमेरिका व इजराइल का हालिया पंगा, जो गले की हड्‌डी बन अटका है।

 

इस समय पूरी दुनिया में एक ही चर्चा है कि मध्य पूर्व एशिया में हाल-फिलहाल शांति हो पायेगी या अमेरिका-इजराइल का ईरान के साथ युद्ध चलता रहेगा? इस लाख टके के सवाल का अभी तो एक भी सही जवाब देने का माद्दा किसी में नहीं है। इन युद्धरत देशों में भी। फिर भी अभी तक के हालात के परिप्रेक्ष्य में यह तो कहा ही जा सकता है कि ईरान ने ऐंठ दिखाकर और अमेरिका ने युद्ध छेड़कर अक्लमंदी तो नहीं की। इजराइल तो आजीवन युद्धरत रहा है तो उसकी तो दिनचर्या ही ऐसी हो चुकी है। फिर भी, वह भी तीसमारखां तो नहीं बन पाया। इतिहास इस कालखंड का जब निर्मम, बेबाक और वास्तविक तथ्यों पर आधारित विश्लेषण करेगा, तब समूची दुनिया के लिए वे ऐसे सबक होंगे, जो आगामी काल के लिए निर्णायक और विषम परिस्थितियों में सटीक फैसले लेने में सहायक होंगे।

 

कोई माने या न माने, यह अटल सत्य है कि सुपर पॉवर का तमगा लिए दुनिया के सामने इतराने वाले अमेरिका की बुरी गत हुई है। यह न तो उसके लिए न शेष विश्व के लिए अच्छा संकेत है। जिस आतंकवाद से समूची दुनिया थर्राती आई है, उसे नकेल डालने में जो भूमिका अमेरिका निभा सकता था, यह उस पर संशय खड़े करता है। हालांकि यह भी उतना ही बड़ा सच है कि विश्व में आतंकवाद को पल्लवित करने में अमेरिका का प्रमुख हाथ रहा है। भले ही वह अपनी हथियार लॉबी की ब्लैकमेलिंग या ताकत के आगे झुककर फैसले लेते रहा हो। इक्कीसवीं सदी में अब जो आगे होगा, वह अमेरिका के एकाधिकार के खात्मे का इतिहास बनेगा। इसके लिए निर्विवाद रूप से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ही दोषी करार दिए जाएंगे। 

 

बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में अभी तक इतना भ्रमित, विचलित, विवादास्पद, सनकी और तानाशाही के मिश्रित चरित्र वाले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प पर ठप्पा लगेगा कि उन्होंने अमेरिका के सुपर पॉवर की छवि वाली बंद मुट्‌ठी को अंगुलियां मरोड़कर खोल दिया। यह कोई मामूली बात नहीं है कि उनके अपने देश में 60 लाख लोग उनकी युद्ध नीति के खिलाफ सड़क पर उतर आए थे। वे भले ही कार्यकाल पूरा करें, लेकिन इतना तय जान लीजिए कि वे जितने समय व्हाइट हाउस में काबिज रहेंगे, उतना अधिक अमेरिका गर्त की ओर लुढ़केगा।

 

अब, जबकि कुछ दिन शांति के मिले हैं, तब दुनिया यह विश्लेषित करने में जुटी है कि आखिरकार इस युद्ध के भड़कने के कारण क्या थे? हम यह तो नहीं कह सकते कि ईरान निर्दोष है या ट्रम्प एकतरफा गलत हैं, लेकिन विभीषिका के इस स्वरूप की जरूरत तो बिल्कुल नहीं थी। जिन मुद्दों पर सीधे मिसाइलें दाग दी गईं, वे हलवे की तरह चट कर जाने वाले नहीं हैं। ईरान के पास परमाणु हथियारों के होने का अभी तक कोई प्रमाण नहीं मिला है और न उसने किसी ऐसी वैश्विक आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली घटना को अंजाम दिया था, जो उसके खिलाफ जंग का एलान करवा दे। जो गलती अमेरिका ने अतीत में इराक के पास रासायनिक हथियार होने का कारण बताकर वहां अमेरिकी फौजें उतार कर की थी, वही उन्होंने ईरान के साथ करना चाहा। यह पासा इसलिए उलटा पड़ा कि ईरान के पास अस्त्र-शस्त्र का ऐसा विरल भंडार भरा था, जिसकी कल्पना अमेरिका समेत दुनिया में शायद ही किसी को रही होगी। यह तो अब पता चला कि उसने ऑइल मनी को चीन, रूस से हथियारों का जखीरा जमा करने के लिए उपयोग किया था। चूंकि दोनों ही देश अमेरिका के खिलाफ हैं तो स्वाभाविक रूप से ईरान से दोस्ती का हाथ बढ़ाना फायदेमंद ही रहना था। हो सकता है, होर्मुज के सामरिक व आर्थिक महत्व से भी वे परिचित रहे हों।

 

अमेरिका-ईरान के बीच पहली शांति वार्ता असफल होने के बाद दूसरी, तीसरी, चौथी होती रही, जो बेनतीजा ही कही जाएगी। ईरान-अमेरिका दोनों ही अब भी मोल-तौल करने की स्थिति में है। युद्ध विराम करने के बदले भी ईरान ने 10 सूत्री मांग पत्र थमाया था, जिस पर अमेरिका सहमत नहीं है। इसमें चार मांगें बेहद खास हैं, जिन पर ईरान अड़ा है और अमेरिका कतई तैयार नहीं है। ईरान खाड़ी देशों (सउदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन व जॉर्डन) से 25 लाख करोड़ रुपए का मुआवजा चाहता है, जिस पर अभी तो कोई सहमत नहीं।

 

दूसरा, वह होर्मुज से गुजरने वाले तेल जहाजों से प्रति बैरल एक डॉलर टोल चाहता है तो दूसरी तरफ अमेरिका होर्मुज पर खुद कब्जा चाहता है। अमेरिका ने सैन्य नाकाबंदी भी की, लेकिन चीन समेत अन्य जहाज वहां से सुरिक्षत निकल चुके हैं। तीसरा, ईरान परमाणु कार्यक्रम 5 साल तक रोकेगा, जबकि अमेरिका 20 साल तक इसे रोकना चाहता है। चौथा, युद्ध विराम में लेबनान भी शामिल रहेगा, जिस पर इजराइल को आपत्ति है। अब देखना दिलचस्प है कि बाजुओं का जोर दिखाने में किसकी रुचि है और कौन हाथ मिलाने को तैयार है।

 

इस युद्ध ने दुनिया के सामने एक और पहलू पर ध्यान दिलाया है। अब लड़ाई के लिए तोप-मिसाइलें, जल-थल-नभ सेना की मजबूती ज्यादा मायने नहीं रखती। यह दौर आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स (एआई) का है, जिससे ड्रोन संचालित होते हैं। ये युद्ध की समूची दिशा बदलने में सक्षम है, जो ईरान ने कर दिखाया। यूक्रेन भी इसी बूते रूस को पानी पिला रहा है। अमेरिका-इजराइल की सबसे बड़ी चूक यही हुई कि वे मिसाइल हमले रोकने की व्यूह रचना करते रहे और ईरान ने छोटा बम, बड़ा धमाका की तर्ज पर ड्रोन हमले कर बड़े लक्ष्य भेद डाले। खाड़ी देशों में ईरानी ड्रोन ने जो कहर बरपाया है, उस नुकसान से उबरने में इन्हें 3 से 5 साल तक लगेंगे और अरबों डॉलर का खर्च होगा, वह अलग। ड्रोन हमलों की मार यूक्रैन दिखा चुका है, जिसने महाशक्ति रूस को नाको चने चबवा रखे हैं।

 

इस युद्ध से एक और तस्वीर साफ हुई कि अब अमेरिका अकेला सब कुछ नहीं कर सकता। जिस तरह से नाटो देशों ने उसका साथ देने से स्पष्ट इनकार किया, वह दुनिया के सामने बड़ी चेतावनी है। इसका संदेश साफ है कि प्रत्येक देश अब अपने हित-अहित पहले देखेगा, फिर पंचायत में उलझेगा। ट्रम्प की खीज ने यह बताया है कि वे मुगालते में थे कि मित्र देश ईरान पर टूट पड़ेंगे। यदि वाकई ऐसा होता तो रूस-यूक्रेन (5 वर्ष हो चुके हैं) की तरह यह भी अनिश्चित काल चलता रहता और रूस व चीन को भी हस्तक्षेप का मौका मिल जाता, जो पूरी दुनिया की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था को तहस-नहस करने की ओर ले जाता। इसकी विभीषिका तीसरे विश्व युद्ध के समान होती, जिसमें क्या-क्या गुल खिलते, कोई नहीं कह पाता।

 

सबसे प्रमुख बात-इसमें भारत की क्या स्थिति रही? उसने निष्पक्ष रहकर स्वयं को सुरक्षित रखा। जिसका नतीजा यह हुआ कि चलते युद्ध में गैस व तेल से भरे टैंकर आते रहे, वह ईरान से ही सात साल के लिए तेल खरीदने का समझौता कर सका और चीन के साथ उसके मालवाहक जहाज निकलते रहे। यह लड़ाई हमारी किसी भी तरह से नहीं थी, बावजूद इसके कि ऑपरेशन सिंदूर में ईरान ने पाकिस्तान को ड्रोन व हथियार दिए थे। इसके उलट हमारा तंत्र ईरान के समानांतर लोगों से बात करता रहा, जिसे ईरान ने सकारात्मक माना। भविष्य में इसके वास्तविक संदेश नजर आएंगे और काफी हद तक वे भारत के पक्ष में रहेंगे।

 

एक जो सबसे चिंताजनक बात उभरी है, वह यह कि ट्रम्प इसे गली-मोहल्ले के दादा-पहलवानों की तरह लड़ रहे हैं और पल-पल में उनकी बदलती रीति-नीति ने उलझनों को बढ़ाया ही है। वे कभी अपने हित साधने वाले व्यापारी हो जाते हैं तो कभी तानाशाह। कभी दुनिया को कदमों तले मानकर पेश आते हैं तो कभी जादूगर की तरह डमरू बजाकर मसले हल करने का दावा करते हैं। उनके विरोधाभासी चरित्र को यूं तो दुनिया ने टैरिफ लागू करते हुए बखूबी देख ही लिया है, लेकिन युद्ध जैसे संवेदनशील व दूरगामी मसलों में उनका रवैया बचकाना रहा, जो विश्व के लिये बड़े खतरे का आगाज है। उन्हें रोका नहीं गया तो इस दुनिया को ज्वालामुखी के लावे की तरह बहते देखना भी नसीब हो जाएगा।

भारत-PAK के 117 प्रमुख लोगों ने मोदी-शहबाज को पत्र लिखा:बोले- दुश्मनी खत्म करें, बातचीत और रिश्ते फिर शुरू हों

भारत और पाकिस्तान के 117 नेताओं, पूर्व अधिकारियों और सामाजिक हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को खुली चिट्ठी लिखी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चिट्ठी में दोनों देशों के रिश्ते सुधारने की अपील की गई है। भारत की ओर से फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, मिर्वाइज उमर फारूक और आरजेडी सांसद मनोज झा समेत 61 लोगों ने इस चिट्ठी पर हस्ताक्षर किए हैं। पाकिस्तान की ओर से पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी समेत 56 लोगों ने इसका समर्थन किया है। चिट्ठी में दोनों प्रधानमंत्रियों से कहा गया है कि टकराव नहीं, बातचीत का रास्ता चुनिए, ताकि दक्षिण एशिया में शांति और विकास का माहौल बन सके। लगातार तनाव से दोनों देशों के आम लोगों और खासकर युवाओं का भविष्य प्रभावित हो रहा है। खबर लगातार अपडेट की जा रही है…

वर्ल्ड अपडेट्स:अफगानिस्तान का दावा- पाकिस्तान में ISIS के ठिकानों पर एयरस्ट्राइक की

अफगानिस्तान ने दावा किया है कि उसकी वायुसेना ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में ISIS के ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं। अफगान रक्षा मंत्रालय ने कहा कि इन ठिकानों का इस्तेमाल अफगानिस्तान में हमलों की योजना बनाने और आतंकवादी गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। मंत्रालय ने चेतावनी दी, “हम अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बनने वाली हर जगह को निशाना बनाएंगे।” मंत्रालय के मुताबिक, बलूचिस्तान के पिशिन जिले के सरानान, खैबर पख्तूनख्वा के कंबर खेल और चित्राल की शाह सलीम घाटी में कार्रवाई की गई। अफगानिस्तान का दावा है कि इन हमलों में कई आतंकवादी मारे गए। यह भी कहा गया कि सरानान इलाके के एक स्कूल का इस्तेमाल ISIS के अड्डे के रूप में किया जा रहा था। अफगानिस्तान ने कहा कि यह कार्रवाई हाल में पाकिस्तान की ओर से सीमा पार किए गए हवाई हमलों के बाद की गई है, जिनमें संयुक्त राष्ट्र के अनुसार कई आम नागरिक मारे गए थे। भारत ने भी पहले पाकिस्तान के अफगानिस्तान में किए गए हवाई हमलों की आलोचना करते हुए उन्हें अफगानिस्तान की संप्रभुता पर हमला और क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा बताया था।

वर्ल्ड अपडेट्स:अफगानिस्तान का दावा- पाकिस्तान में ISIS के ठिकानों पर एयरस्ट्राइक की

अफगानिस्तान ने दावा किया है कि उसकी वायुसेना ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में ISIS के ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं। अफगान रक्षा मंत्रालय ने कहा कि इन ठिकानों का इस्तेमाल अफगानिस्तान में हमलों की योजना बनाने और आतंकवादी गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। मंत्रालय ने चेतावनी दी, “हम अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बनने वाली हर जगह को निशाना बनाएंगे।” मंत्रालय के मुताबिक, बलूचिस्तान के पिशिन जिले के सरानान, खैबर पख्तूनख्वा के कंबर खेल और चित्राल की शाह सलीम घाटी में कार्रवाई की गई। अफगानिस्तान का दावा है कि इन हमलों में कई आतंकवादी मारे गए। यह भी कहा गया कि सरानान इलाके के एक स्कूल का इस्तेमाल ISIS के अड्डे के रूप में किया जा रहा था। अफगानिस्तान ने कहा कि यह कार्रवाई हाल में पाकिस्तान की ओर से सीमा पार किए गए हवाई हमलों के बाद की गई है, जिनमें संयुक्त राष्ट्र के अनुसार कई आम नागरिक मारे गए थे। भारत ने भी पहले पाकिस्तान के अफगानिस्तान में किए गए हवाई हमलों की आलोचना करते हुए उन्हें अफगानिस्तान की संप्रभुता पर हमला और क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा बताया था।

PoK में प्रदर्शन, लोग बोले- हम पाकिस्तान का हिस्सा नहीं:₹1 करोड़ का इनामी शौकत नवाज गिरफ्तार; JAAC के 600 से ज्यादा नेता-कार्यकर्ता हिरासत में

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ प्रदर्शन तेज हो गए हैं। मंगलवार को रावलकोट के ईदगाह ग्राउंड में हजारों लोग जुटे। उन्हेंने ऐलान किया कि PoK पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है। यह आंदोलन जम्मू-कश्मीर अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) की अगुआई में चल रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, JAAC के प्रमुख नेता शौकत नवाज मीर को दो साथियों के साथ धीरकोट के सांगर फत्तारे इलाके से गिरफ्तार कर लिया गया। PoK में JAAC के 600 से ज्यादा नेता और कार्यकर्ताओं को भी हिरासत में लिया गया है। शौकत नवाज मीर समेत JAAC के नेताओं की गिरफ्तारी की सूचना देने वालों के लिए पाकिस्तान सरकार ने ₹1 करोड़ के इनाम की घोषणा की थी। प्रदर्शनकारी बोले- हमें नहीं, पाकिस्तान को हमारी जरूरत प्रदर्शन के दौरान JAAC नेता सरदार अमन खान ने कहा, ‘हमें आपके राशन की जरूरत नहीं, आपको हमारी जरूरत है। अगर जरूरी सामान की सप्लाई बंद रही तो लोग जिंदा रहने के लिए दूसरा रास्ता चुनने को मजबूर होंगे।’ उनका आरोप है कि पाकिस्तान सरकार आंदोलन को दबाने के लिए जानबूझकर जरूरी सामान की सप्लाई रोक रही है। महंगाई से शुरू हुआ आंदोलन, अब राजनीतिक मुद्दा बना रिपोर्ट के मुताबिक, आंदोलन महंगाई, खाद्य संकट, बढ़ती कीमतों और स्थानीय प्रशासन के मुद्दों को लेकर शुरू हुआ था। अब यह पाकिस्तान सरकार के खिलाफ राजनीतिक विरोध का रूप ले चुका है। हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने रावलाकोट और मीरपुर के लोगों को ‘असल कश्मीरी नहीं’ बताया था। इसके बाद विरोध और बढ़ गया। रिपोर्ट के मुताबिक, JAAC के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत केस भी दर्ज किए गए हैं। सरकार ने 5 जून को JAAC पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद से इलाके में तनाव लगातार बढ़ रहा है। इंटरनेट बंद, 22 मौतों का दावा रिपोर्ट के मुताबिक, जून की शुरुआत से PoK के कई इलाकों में इंटरनेट सेवाएं सीमित हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि ऐसा आंदोलन की तस्वीरें और वीडियो बाहर जाने से रोकने के लिए किया गया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पिछले दो हफ्तों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पों में कम से कम 22 लोगों की मौत हुई है। PoK में 27 जुलाई को चुनाव होंगे गिलगित-बाल्टिस्तान के बाद 27 जुलाई को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK ) में विधानसभा चुनाव कराए जाएंगे। PoK की विधानसभा में कुल 53 सीटें हैं। इनमें से 45 सीटों पर सीधे चुनाव होता है, जबकि 8 सीटें महिलाओं, तकनीकी विशेषज्ञों और धार्मिक विद्वानों के लिए आरक्षित हैं।

चीन-तुर्की की मदद से विनाशक तैयारियों में जुटा पाकिस्तान! ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदली उसकी चाल, मिले ये सबूत

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने अपनी सैन्य ताकत और मॉडर्न वारफेयर का ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने पाकिस्तान का हाल बेहाल कर दिया था। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कई अहम एयर बेस, एयर डिफेंस सिस्टम और रणनीतिक संसाधनों को निशाना बनाकर पाक सेना ऐसा हाल किया था कि पूरी दुनिया के सामने उसकी पोल खुल गई थी। भारत के मिली करारी शिकस्त के बाद पाकिस्तान ने अपनी सैन्य रणनीति में बड़े बदलाव शुरू कर दिए हैं। अब वह अपनी कमजोरियों को दूर करने के लिए चीन और तुर्की जैसे देशों की मदद से सेना के मॉर्डनाइजेशन पर काम कर रहा है। स्टील्थ लड़ाकू विमान, लंबी दूरी की मिसाइलें, आधुनिक ड्रोन, लेज़र हथियार और नए एयर डिफेंस सिस्टम को शामिल करने की तैयारी की जा रही है।

सेना को तेजी से मजबूत कर रहा है पाकिस्तान

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान अपनी सेना को तेजी से मजबूत करने में जुट गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान लड़ाकू विमानों, मिसाइलों, ड्रोन और आधुनिक हथियारों पर बड़ा निवेश कर रहा है। इसके लिए उसे चीन और तुर्की का सबसे ज्यादा सहयोग मिल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान तुर्की से 1,000 से अधिक आधुनिक ड्रोन (यूएवी) खरीदने की तैयारी कर रहा है। साथ ही ड्रोन और टारगेट पर हमला करने वाले लोइटरिंग म्यूनिशन (आत्मघाती ड्रोन) की संख्या भी बढ़ाई जाएगी।

चीन से मिलेगा स्टील्थ फाइटर प्लेन 

पाकिस्तानी सेना अपनी 5 आर्टिलरी रेजिमेंट (तोपखाना) को मिसाइल रेजिमेंट में बदलने की योजना पर काम कर रही है। इसके अलावा देश का एयर डिफेंस नेटवर्क भी लगातार मजबूत किया जा रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान को 2026 के आखिर तक चीन से 40 जे-35 स्टील्थ फाइटर प्लेन मिलने की उम्मीद है। वहीं, चीनी तकनीक की मदद से हाई-एनर्जी लेज़र हथियार भी विकसित किए जा रहे हैं।

अटैक हेलीकॉप्टर को कर रहा अपग्रेड

इसके अलावा पाकिस्तानी सेना के 29 कोबरा अटैक हेलीकॉप्टरों को अपग्रेड किया जाएगा और 30 से ज्यादा जेड-10 अटैक हेलीकॉप्टर शामिल करने की भी योजना है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन पाकिस्तान को 200 से अधिक एसएच-15 तोपें भी उपलब्ध करा चुका है। कुल मिलाकर पाकिस्तान अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण की दिशा में काम कर रहा है।

आकाश शर्मा की रिपोर्ट

महाराजा रणजीत सिंह की बरसी पर पाकिस्तान गए श्रद्धालु लौटे:गुरुद्वारों के दर्शन कर जताई खुशी; सरकारों से मांगी वीजा में ढील

महाराजा रणजीत सिंह की बरसी के अवसर पर पाकिस्तान गया सिख श्रद्धालुओं का जत्था मंगलवार को अटारी-वाघा बॉर्डर के रास्ते भारत लौट आया। इस यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं ने ननकाना साहिब, पंजा साहिब, करतारपुर साहिब सहित कई ऐतिहासिक गुरुद्वारों के दर्शन किए। भारत लौटने पर श्रद्धालुओं के चेहरों पर खुशी झलक रही थी। श्रद्धालुओं ने बताया कि यह यात्रा उनके लिए काफी इमोशनल रही। इसे वह भुला नहीं सकते। अमृतसर के श्रद्धालु बलवीर सिंह ने कहा कि सबसे पहले उन्होंने ननकाना साहिब में गुरु नानक देव जी के जन्मस्थान के दर्शन किए। इसके बाद पंजा साहिब, लाहौर स्थित अन्य ऐतिहासिक गुरुद्वारे और करतारपुर साहिब के दर्शन का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि इन पवित्र स्थलों पर पहुंचकर मन को गहरी शांति और आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हुआ। पाकिस्तान में व्यवस्थाओं और सुरक्षा की सराहना श्रद्धालुओं ने पाकिस्तान में की गई व्यवस्थाओं की भी सराहना की। उन्होंने बताया कि यात्रा के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे और हर समय सुरक्षा कर्मी उनके साथ मौजूद रहे। किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना नहीं करना पड़ा। श्रद्धालुओं ने कहा कि उन्हें वहां लोगों से बहुत प्रेम, सम्मान और सहयोग मिला, जिससे उनका अनुभव और भी बेहतर हो गया। एक अन्य श्रद्धालु हरजीत कौर ने बताया कि यह जत्था 21 जून को पाकिस्तान गया था और आज 30 जून को वापस लौटा। उन्होंने कहा कि इस यात्रा के दौरान उनकी वर्षों पुरानी मनोकामना पूरी हुई। पवित्र गुरुद्वारों के दर्शन कर उन्होंने अत्यंत आनंद और संतोष महसूस किया। वीजा प्रक्रिया आसान करने की श्रद्धालुओं की अपील श्रद्धालुओं ने भारत और पाकिस्तान दोनों सरकारों से अपील की कि धार्मिक यात्राओं को और सरल बनाया जाए। उन्होंने कहा कि वीजा प्रक्रिया को आसान किया जाना चाहिए और श्रद्धालुओं को अधिक से अधिक अवसर दिए जाने चाहिए ताकि वे अपने पवित्र स्थलों के दर्शन कर सकें। इससे दोनों देशों के बीच आपसी प्रेम, भाईचारा और सांस्कृतिक संबंध मजबूत होंगे। साझा विरासत को संरक्षित करने बेहतर प्रयास उन्होंने यह भी कहा कि साझा विरासत को संरक्षित करने और लोगों के बीच विश्वास बढ़ाने के लिए सीमा पार धार्मिक यात्राओं को बढ़ावा देना बहुत आवश्यक है। श्रद्धालुओं का मानना है कि ऐसे आयोजनों से न केवल आध्यात्मिक लाभ मिलता है, बल्कि दोनों देशों के बीच शांति और सद्भाव का संदेश भी जाता है।

‘हम उन हाथों को काट देंगे जो…’: सिंधु जल विवाद पर पाकिस्तान ने फिर दी गीदड़भभकी

पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने भारत के खिलाफ एक बार फिर भड़काऊ बयान दिया है। इस बार उन्होंने कहा कि जो भी पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर दावा करेगा, उसके “हाथ काट दिए जाएंगे।” बता दें कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है।

गौरतलब है कि साल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले में 25 पर्यटकों और एक स्थानीय नागरिक की मौत के बाद भारत ने इस संधि को फिलहाल स्थगित रखने का फैसला किया था।

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मलिक ने भारत पर पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकने का आरोप लगाया और कहा कि पाकिस्तान अपने हिस्से के पानी में किसी भी तरह की रुकावट बर्दाश्त नहीं करेगा।

‘डॉन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मलिक ने कहा, “एक पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री एक नल को कंट्रोल कर रहे हैं। उनका कहना है कि वह पाकिस्तान में पानी की एक बूंद भी नहीं बहने देंगे।”

उन्होंने बताया कि पाकिस्तान की 40-50 प्रतिशत आबादी अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर है। उन्होंने कहा, “कोई बाहरी ताकत देश की खाद्य सुरक्षा, 50% रोजगार और 25% अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रहा है।”

मंत्री ने दावा किया कि पाकिस्तान ने “पहले ही साफ कर दिया है कि जो कोई भी उसे पानी से वंचित करने की कोशिश करेगा, उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।”

उन्होंने ने कहा, ” लेकिन यह सिर्फ पानी का नहीं, बल्कि न्याय का भी सवाल है। हम अपनी रक्षा करेंगे… ऐसा नहीं है कि हमने बस इसकी घोषणा की है, बल्कि हमने साबित किया है कि अगर कोई हमारे हिस्से के पानी पर हाथ भी डालेगा, तो हम वह हाथ काट देंगे।”

मलिक ने कहा कि दुनिया में दूसरी जगहों पर, बिना किसी संधि के भी पानी बहता रहता है, जो सिर्फ एक कन्वेंशन (समझौते) से नियंत्रित होता है।

उन्होंने आगे कहा, “क्या अब हर ‘अपर रिपेरियन’ (नदी के ऊपरी हिस्से वाले देश) को ‘लोअर रिपेरियन’ (नदी के निचले हिस्से वाले देश) की ओर पानी का बहाव रोकने का अधिकार है?… लेकिन हमारे पास तो संधि भी है। तो फिर यहां पानी कैसे रोका जा सकता है? यही बात हम कल रखेंगे।”

उन्होंने जोर देकर कहा कि “संधि मौजूद है” और साथ ही यह भी कहा कि मंगलवार का सम्मेलन मुख्य रूप से न्याय और अधिकारों के बारे में था।

उन्होंने ने कहा, “यह तय किया जाएगा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्याय क्या है। यह तय किया जाएगा कि क्या दुनिया भर में नदी के निचले इलाकों में रहने वाले बच्चों को पानी का अधिकार है।”

पाकिस्तान ने जल संधि का बचाव किया

उसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में, पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने भी जोर देकर कहा कि सिंधु जल संधि कानूनी रूप से बाध्यकारी है और इसे एकतरफा तौर पर निलंबित, रद्द या उसमें संशोधन नहीं किया जा सकता। उन्होंने दावा किया कि “कानूनी रूप से लागू संधि” के तहत पाकिस्तान के लोगों का सिंधु जलमार्गों पर अधिकार है, जो अभी भी प्रभावी है।

‘डॉन’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा, “कानूनी तौर पर पाकिस्तान के रुख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मिला है, क्योंकि IWT को एकतरफा तौर पर रद्द, समाप्त या उसमें संशोधन नहीं किया जा सकता है।”

मंत्री ने दावा किया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और रक्षा बलों के प्रमुख तथा सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने कई बार कहा है कि “पानी हमारी जीवन रेखा के साथ-साथ हमारी ‘रेड लाइन’ (अति-महत्वपूर्ण सीमा) भी है”।

संधि

सीमापार से आए इन बयानों के कुछ हफ्तों बाद केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सी.आर. पाटिल ने मीडिया को दिए एक विशेष इंटरव्यू में कहा था कि भारत अगले डेढ़ से दो वर्षों के भीतर सिंधु जल में अपने हिस्से का पूरा उपयोग करने की योजना बना रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट कहा था कि भारत के हिस्से का एक भी बूंद पानी पाकिस्तान की ओर नहीं जाने दिया जाएगा।

भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन से संचालित सीमा पार आतंकवाद के ढांचे को खत्म करने के लिए ठोस और सत्यापन योग्य कदम नहीं उठाता, तब तक यह संधि स्थगित ही रहेगी।

बता दें की यह संधि 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी और तब से भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी प्रणाली और उसकी सहायक नदियों के पानी के बंटवारे और उपयोग को नियंत्रित करती आ रही है।

यह भी पढ़ें: Warren Buffett Stops Donation: वॉरेन बफेट ने गेट्स फाउंडेशन को अरबों डॉलर का दान रोका, एपस्टीन की वजह से बिल गेट्स संग रिश्तों में दरार?

पाकिस्तान बोला- हमारा पानी रोका तो हाथ काट देंगे:सिंधु जल संधि अब भी लागू, भारत इसे एकतरफा खत्म नहीं कर सकता

पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि पर एक बार फिर भारत को धमकी दी है। पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने कहा कि अगर किसी ने पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकने की कोशिश की तो हम उन हाथों को काट देंगे। उन्होंने दावा किया कि भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी को रोकना चाहता है। मुसादिक मलिक ने सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार के साथ जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री के हाथ में एक नल है। वह कहते हैं कि पाकिस्तान में पानी की एक बूंद भी नहीं जाने देंगे। जो हमारे हिस्से के पानी पर दावा करेंगे, उनके हाथ काट दिए जाएंगे। वहीं अताउल्लाह तरार ने कहा कि सिंधु जल संधि कानूनी रूप से अब भी लागू है। उनके मुताबिक, भारत इसे न तो एकतरफा स्थगित कर सकता है, न रद्द कर सकता है और न ही इसमें बदलाव कर सकता है। सिंधु जल संधि पर सेमिनार करेगा पाकिस्तान पाकिस्तानी मंत्रियों ने बताया कि मंगलवार को इस्लामाबाद में सिंधु जल संधि पर पहला अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया जाएगा। इसमें कानूनी एक्सपर्ट, जल एक्सपर्ट्स और विदेशी प्रतिनिधि शामिल होंगे। सेमिनार में संधि के कानूनी और तकनीकी पहलुओं पर चर्चा होगी। डॉन के मुताबिक, तरार ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत पाकिस्तान के अधिकार सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पहले भी साफ कर चुके हैं कि पानी हमारी जीवनरेखा है और यह हमारी रेड लाइन भी है। 21 जून को PAK रक्षा मंत्री बोले थे- भारत के खिलाफ जंग छेड़ सकते हैं पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने 21 जून को सिंधु जल संधि स्थगित रहने को लेकर भारत को धमकी दी थी। पाकिस्तानी चैनल ARY न्यूज से बातचीत में आसिफ ने कहा कि अगर पाकिस्तान को लगा कि उसकी जल सुरक्षा खतरे में है, तो वह भारत के खिलाफ जंग छेड़ सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी के प्रवाह में दखल दे रहा है और रणनीतिक हथियार के तौर पर इसका इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पिछले एक साल में इस मामले में क्या नए घटनाक्रम हुए हैं, इसकी उन्हें पूरी जानकारी नहीं है। अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत के बाद भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया था। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि बहाल नहीं की जाएगी। भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौता क्या है? सिंधु नदी प्रणाली में कुल 6 नदियां हैं- सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज। इनके किनारे का इलाका करीब 11.2 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसमें 47% जमीन पाकिस्तान, 39% जमीन भारत, 8% जमीन चीन और 6% जमीन अफगानिस्तान में है। इन सभी देशों के करीब 30 करोड़ लोग इन इलाकों में रहते हैं। 1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के पहले से ही भारत के पंजाब और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच नदियों के पानी के बंटवारे का झगड़ा शुरू हो गया था। 1947 में भारत और पाकिस्तान के इंजीनियरों के बीच ‘स्टैंडस्टिल समझौता’ हुआ। इसके तहत दो मुख्य नहरों से पाकिस्तान को पानी मिलता रहा। ये समझौता 31 मार्च 1948 तक चला। 1 अप्रैल 1948 को जब समझौता लागू नहीं रहा तो भारत ने दोनों नहरों का पानी रोक दिया। इससे पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की 17 लाख एकड़ जमीन पर खेती बर्बाद हो गई। दोबारा हुए समझौते में भारत पानी देने को राजी हो गया। इसके बाद 1951 से लेकर 1960 तक वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में भारत पाकिस्तान में पानी के बंटवारे को लेकर बातचीत चली और आखिरकार 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के PM नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच दस्तखत हुए। इसे इंडस वाटर ट्रीटी या सिंधु जल संधि कहा जाता है। सिंधु जल समझौता स्थगित करने का पाकिस्तान पर असर पाकिस्तान में खेती की 90% जमीन यानी 4.7 करोड़ एकड़ एरिया में सिंचाई के लिए पानी सिंधु नदी प्रणाली से मिलता है। पाकिस्तान की नेशनल इनकम में एग्रीकल्चर सेक्टर की हिस्सेदारी 23% है और इससे 68% ग्रामीण पाकिस्तानियों की जीविका चलती है। ऐसे में पाकिस्तान में आम लोगों के साथ-साथ वहां की बेहाल अर्थव्यवस्था और बदतर होने लगी है। पाकिस्तान के मंगल और तारबेला हाइड्रोपावर डैम को पानी नहीं मिल पा रहा है। इससे पाकिस्तान के बिजली उत्पादन में 30% से 50% तक की कमी आ सकती है। साथ ही औद्योगिक उत्पादन और रोजगार पर असर पड़ेगा। —————– ये भी पढ़ें… सिंधु नदी का पानी न मिलने से पाकिस्तान परेशान:आर्मी चीफ भारत के खिलाफ जंग की सा​जिश रच रहे, LoC पर 35 ड्रोन यूनिट तैनात पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु नदी का पानी रोका, तो पाकिस्तान की परेशानियां बढ़ गई हैं। पाकिस्तान ने यह मसला अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में भी लेकिन वहां भी इस पर कोई फैसला नहीं हुआ। इसके बाद अब रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भारत को जंग छेड़ने की धमकी दे रहे हैं। वहीं, आर्मी चीफ आसिम मुनीर जंग की साजिश रचने में जुटे हैं। नियंत्रण रेखा यानी LoC पर पाकिस्तानी सेना की 8 ब्रिगेड ने 35 एंटी ड्रोन यूनिट तैनात की हैं। पाकिस्तान ने एआई फेंसिंग भी की है। इसके तहत टारगेटिंग और सर्विलांस को तेज किया गया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

पाकिस्तान में 125 साल पुराना गुरुद्वारा तोड़ा:सिखों में गुस्सा, तोड़फोड़ और कंस्ट्रक्शन का काम रुकवाया; प्रशासन ने ताला लगाकर जगह सील की

पाकिस्तान के पंजाब में गुरुद्वारों को गिराने का सिलसिला थम नहीं रहा। बीते शुक्रवार (26 जून) को फारूखाबाद (मंडी चूरकाना) में भूमाफिया ने प्रशासन के साथ मिलकर 125 साल पुराने ऐतिहासिक सिंह सभा गुरुद्वारे का एक हिस्सा गिरा दिया। पाकिस्तान में गुरुद्वारा गिराने के कदम से सिख समुदाय में गुस्सा है। गुरुद्वारा गिराने के बाद सिखों ने इसका विरोध किया और गिराने के काम को रुकवाया। सिख संगत विरोध जताने के बाद प्रशासन ने फिलहाल इस जगह को सील कर दिया है और किसी भी तरह का निर्माण या तोड़फोड़ पर रोक लगा दी गई है। स्थानीय जानकारों और सिख एक्टिविस्ट्स के मुताबिक, करीब 4 साल पहले तक इस गुरुद्वारा साहिब की ऐतिहासिक पहचान और प्राचीन निशानियां सुरक्षित थीं। इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर शेयर किया गया था। इसके कुछ समय बाद भूमाफिया ने गुरुद्वारा साहिब का मुख्य गुंबद तोड़ दिया। सिखों का कहना है कि उस वक्त भी पुलिस से शिकायत की गई और विरोध दर्ज कराया गया था। बावजूद इसके न तो इवैक्युएशन ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड और न ही पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी ने इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाए। सिलसिलेवार तरीके से समझें पूरा मामला… नियमों को दरकिनार कर गुरुद्वारा को तोड़ा गया इन ऐतिहासिक इमारतों की देखरेख करने वाले शब्बीर हुसैन ने बताया कि शरणार्थियों को केवल रहने के उद्देश्य से इस गुरुद्वारे की इमारत को दिया गया था। क्योंकि ये बहुत पुरानी थी। नियमों के मुताबिक, इन अलॉट की गई संपत्तियों के मूल ढांचे में कोई भी बदलाव, नया कंस्ट्रक्शन या इन्हें गिराने की सख्त मनाही थी। बावजूद इसके इस 125 साल पुरानी विरासत को मलबे में तब्दील कर दिया गया। जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग दुनियाभर के सिख संगठनों ने मांग की है कि इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। सोशल मीडिया पर इस कार्रवाई का विरोध हो रहा है। लोगों का कहना है कि गुरुद्वारा साहिब किसी एक धर्म या देश की बपौती नहीं होते, बल्कि ये पूरी इंसानियत की साझी अमानत हैं। गुरुद्वारा सिंह सभा का इतिहास
जत्थेदार करतार सिंह झब्बर ने सन 1912 में चूहड़काणा में खालसा दीवान खरा सौदा बार का गठन किया और इसमें अधिकतर स्थानीय विर्क परिवारों को सदस्य बनाया गया। सन 1918 में उन्होंने गुरुद्वारा सच्चा सौदा के पास गांव भनौर में भाई मूल सिंह गुरमुला द्वारा खरीदी गई 13 कनाल जमीन पर इसी संगठन के अधीन गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा, मंडी चूहड़काणा के अंदर मिडिल स्कूल शुरू किया। स्कूल के सभी खर्चों का प्रबंधन खालसा दीवान खरा सौदा बार और मंडी चूहड़काणा कमेटी करती रही। वर्तमान समय में गुरुद्वारा साहिब के मुख्य भाग पर सतगुरु नानक प्रगट्या, मिटी धुंध जग चानण होआ, पोह सुदी 7 संवत 1919 (सन 1862) गुरमुखी में उकेरा दिखता है। ॰॰॰॰॰॰॰॰ यह खबर भी पढ़ें… पाकिस्तान के गुरुद्वारे में सेवादार दंपती की गोलियां मारकर हत्या, हमले के बाद से परिसर के CCTV गायब, पुलिस को टारगेट किलिंग का शक पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में गुरुद्वारे के अंदर सिख केयरटेकर दंपती की हत्या कर दी गई। पुलिस के मुताबिक, घटना पेशावर से करीब 60 किमी दूर मरदान के बाबू मोहल्ला इलाके में हुई। पढ़ें पूरी खबर…