US Russia Sanctions Bill: US सीनेट (अमेरिकी राज्यसभा) ने शुक्रवार को रूस और उसके पेट्रोलियम उत्पादों के मुख्य खरीदारों (जैसे चीन और भारत) पर फाइन लगाने वाला एक अहम बिल पास कर दिया है। उनका तर्क यह है कि इस तरह का व्यापार यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा देता है।सीनेट ने 86-11 वोटों के बड़
भारत सरकार ने शुक्रवार को अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और भौगोलिक विशेषताओं को सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक नक्शे पर दर्ज किया। यह कदम चीन की ओर से सीमावर्ती राज्य की जगहों के नाम बदलने की कोशिशों के बीच उठाया गया है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, यह काम अरुणाचल प्रदेश सरकार से सलाह लेकर किया गया है। इसका मकसद इन जगहों की सही पहचान सुनिश्चित करना और आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। मंत्रालय ने बयान में कहा, “भारत सरकार ने अरुणाचल प्रदेश की राज्य सरकार से सलाह लेकर राज्य में स्थित कुल 27 जगहों और भौगोलिक विशेषताओं को सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक नक्शे पर उनके मानक नामों के साथ दर्ज किया है।” बयान में कहा गया कि इन जगहों को आधिकारिक नक्शे पर दर्ज करने का उद्देश्य उनकी सटीक पहचान आसान बनाना और आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। चीन अरुणाचल की जगहों के नाम जारी करता रहा है चीन समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश की जगहों के लिए नामों की सूची जारी करता रहा है। वह अरुणाचल प्रदेश को जांगनान कहता है। भारत ने चीन की इन कोशिशों को लगातार खारिज किया है। भारत का कहना है कि इनका भारत की राज्य पर संप्रभुता पर कोई असर नहीं पड़ता। लॉन्गजू में 1959 में चीनी सेना पहुंची थी सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे पर औपचारिक रूप से दर्ज जगहों में वास्तविक नियंत्रण रेखा(LAC) के पास स्थित लॉन्गजू भी शामिल है। 1959 में चीनी सेना के इस इलाके में घुसने के बाद लॉन्गजू भारत-चीन सीमा तनाव के शुरुआती केंद्रों में से एक बना था। अपर सुबनसिरी जिले का पास का माजा गांव भी इन जगहों में शामिल है। जयरामपुर सुरक्षा बलों के लिए लॉजिस्टिक्स हब चांगलांग जिले का जयरामपुर भी पहचानी गई जगहों में शामिल है। यह एक महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक्स हब है, जो पूर्वी अरुणाचल प्रदेश और म्यांमार सीमा की ओर सुरक्षा बलों की आवाजाही में मदद करता है।
भारत सरकार ने शुक्रवार को अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और भौगोलिक विशेषताओं को सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक नक्शे पर दर्ज किया। यह कदम चीन की ओर से सीमावर्ती राज्य की जगहों के नाम बदलने की कोशिशों के बीच उठाया गया है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, यह काम अरुणाचल प्रदेश सरकार से सलाह लेकर किया गया है। इसका मकसद इन जगहों की सही पहचान सुनिश्चित करना और आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। मंत्रालय ने बयान में कहा, “भारत सरकार ने अरुणाचल प्रदेश की राज्य सरकार से सलाह लेकर राज्य में स्थित कुल 27 जगहों और भौगोलिक विशेषताओं को सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक नक्शे पर उनके मानक नामों के साथ दर्ज किया है।” बयान में कहा गया कि इन जगहों को आधिकारिक नक्शे पर दर्ज करने का उद्देश्य उनकी सटीक पहचान आसान बनाना और आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। चीन अरुणाचल की जगहों के नाम जारी करता रहा है चीन समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश की जगहों के लिए नामों की सूची जारी करता रहा है। वह अरुणाचल प्रदेश को जांगनान कहता है। भारत ने चीन की इन कोशिशों को लगातार खारिज किया है। भारत का कहना है कि इनका भारत की राज्य पर संप्रभुता पर कोई असर नहीं पड़ता। लॉन्गजू में 1959 में चीनी सेना पहुंची थी सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे पर औपचारिक रूप से दर्ज जगहों में वास्तविक नियंत्रण रेखा(LAC) के पास स्थित लॉन्गजू भी शामिल है। 1959 में चीनी सेना के इस इलाके में घुसने के बाद लॉन्गजू भारत-चीन सीमा तनाव के शुरुआती केंद्रों में से एक बना था। अपर सुबनसिरी जिले का पास का माजा गांव भी इन जगहों में शामिल है। जयरामपुर सुरक्षा बलों के लिए लॉजिस्टिक्स हब चांगलांग जिले का जयरामपुर भी पहचानी गई जगहों में शामिल है। यह एक महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक्स हब है, जो पूर्वी अरुणाचल प्रदेश और म्यांमार सीमा की ओर सुरक्षा बलों की आवाजाही में मदद करता है।
अमेरिकी सीनेट ने 86-11 के बहुमत से भारत समेत 5 देशों पर 100% तक का टैरिफ लगाने वाला बिल पास कर दिया है। बिल के मुताबिक भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर 100% टैरिफ लगाया जा सकता है। यह बिल रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों के समर्थन से लाया गया। इसका मकसद रूस की तेल से होने वाली कमाई को कम करना है, ताकि उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता कमजोर हो सके। 23 जुलाई को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया था। इसके तहत रूस के अधिकारियों, शैडो टैंकर बेड़े, केंद्रीय बैंक और सरकारी ऊर्जा परियोजनाओं पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। बिल के शुरुआती मसौदे में 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 100% कर दिया गया। हालांकि, अभी ये कानून नहीं बना है। अभी इसे अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भेजा जाएगा। अगर वहां भी बिल पास हो जाता है, तो इसे राष्ट्रपति ट्रम्प के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। उनकी मंजूरी मिलने के बाद ही यह कानून बनेगा। ईरान के साथ ट्रेड करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध बढ़ेगा अगर यह कानून बन जाता है तो 1996 का ‘ईरान प्रतिबंध कानून’ 2031 तक बढ़ जाएगा। यह कानून उन गैर-अमेरिकी कंपनियों पर पाबंदी लगाता है जो ईरान के साथ व्यापार करती हैं। यह कानून इसी साल खत्म होने वाला था। इस बिल से अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार भी मिल जाएगा कि वे अमेरिका में आने वाले रूसी सामान पर 500% तक टैरिफ लगा सकें। राष्ट्रपति का यह अधिकार 5 साल तक लागू रहेगा। व्हाइट हाउस ने पहले भी रूस पर पाबंदियां लगाने की कोशिश की थी। लेकिन ईरान युद्ध के दौरान जब होर्मुज बंद हुआ, तो तेल का संकट आ गया। इस वजह से अमेरिकी प्रशासन को तेल की बिक्री पर कुछ समय के लिए छूट देनी पड़ी थी। भारत ने जून में आधे से ज्यादा तेल रूस से खरीदा भारत ने जून 2026 में रूस से रिकॉर्ड 26.1 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा, जो देश के कुल तेल आयात का 52.4% था। यानी पिछले महीने भारत में आयात होने वाले हर दो बैरल तेल में एक से ज्यादा बैरल रूस से आया। रूस लगातार भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है। मई के मुकाबले जून में रूस से तेल आयात में करीब 39% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यूरोपीय देशों को टैरिफ में राहत देगा अमेरिका रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले चीन, फ्रांस, जापान, हंगरी और बेल्जियम को भी इसके दायरे में रखा गया है। हालांकि, जो देश रूस की कुल गैस निर्यात का 15% से कम आयात करते हैं और अपनी निर्भरता घटाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उन्हें छूट मिल सकती है। सीनेट में पेश बिल के तहत 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित 100% टैरिफ से छूट दी गई है। इन देशों को राहत इसलिए दी गई है, क्योंकि ये रूस से 15% से कम प्राकृतिक गैस खरीदते हैं और धीरे-धीरे उस पर अपनी निर्भरता भी कम कर रहे हैं। डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि यह बिल यूरोपीय सहयोगियों के खिलाफ नहीं है। इसका निशाना सिर्फ वे देश हैं, जो अब भी रूस के तेल कारोबार को सबसे ज्यादा आर्थिक सहारा दे रहे हैं। बिल में रूस के ऊर्जा उद्योग, वित्तीय संस्थानों, रक्षा औद्योगिक ढांचे, कारोबारियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। —————————– ये खबर भी पढ़ें… UK की व्हिस्की, कारें और ब्यूटी प्रोडक्ट्स सस्ते मिलेंगे:भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट आज से लागू, जानें किन चीजों के दाम बदलेंगे भारत में UK की कारें, व्हिस्की, कपड़े और फुटवियर आज से सस्ते मिलेंगे। आज से भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट लागू हो गया है। यानी अब भारत के 99% सामानों को UK में जीरो टैरिफ पर निर्यात किया जाएगा। वहीं UK के 99% सामान 3% एवरेज टैरिफ पर आयात होंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…
जापान की ओर करीब 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से डॉल्फिन तूफान बढ़ रहा है। इसकी वजह से 2.6 लाख लोगों को घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने के आदेश दिए गए हैं। जबकि 500 से ज्यादा उड़ानें रद्द कर दी गई हैं। हालात को देखते हुए टोयोटा ने भी अपनी 9 फैक्ट्रियों में काम रोक दिया है। जापान मौसम विज्ञान एजेंसी (JMA) के मुताबिक, डॉल्फिन कैटेगरी-1 का तूफान है। इसकी लगातार हवा की रफ्तार 144 किमी प्रति घंटा और झोंकों की रफ्तार 198 किमी प्रति घंटा तक पहुंच रही है। यह तूफान क्यूशू और ओकिनावा के बीच स्थित द्वीपों की ओर बढ़ रहा है। ओकिनावा द्वीप पर सबसे ज्यादा असर तूफान की वजह से जापान का ओकिनावा द्वीप बुरी तरह प्रभावित हुआ है। वहां छुट्टियां मनाने गए कई हांगकांग के पर्यटक उड़ानें रद्द होने के कारण फंस गए हैं। उन्हें अब जरूरी सामान की कमी, बिजली कटने और पानी की सप्लाई बाधित होने की आशंका का सामना करना पड़ रहा है। हांगकांग से जुड़े ट्रैवल सोशल मीडिया अकाउंट्स पर साझा की गई तस्वीरों में सुपरमार्केट की ब्रेड की अलमारियां खाली दिखाई दे रही हैं। वहीं, कई इलाकों में मूसलाधार बारिश और तेज हवाएं चल रही हैं। रविवार को चीन पहुंच सकता है तूफान डॉल्फिन तूफान तेजी से चीन के पूर्वी तट की ओर बढ़ रहा है। चीन के मौसम विभाग के मुताबिक, शुक्रवार तक यह तूफान तट से करीब 820 किलोमीटर दूर था। इसके रविवार दोपहर से सोमवार सुबह के बीच झेजियांग और उत्तरी फुजियान के बीच कहीं टकराने की आशंका है। मौसम विभाग ने येलो अलर्ट जारी रखा है, जो चार स्तरों वाली चेतावनी प्रणाली में तीसरा सबसे गंभीर स्तर है। झेजियांग, फुजियान और ताइवान में तेज हवाओं और भारी बारिश की चेतावनी दी गई है। मौसम वैज्ञानिक शेन यूयांग के मुताबिक, शुक्रवार सुबह तक इस तूफान का दायरा झेजियांग प्रांत से करीब 13 गुना बड़ा हो चुका था। झेजियांग का आकार भारत के बिहार राज्य के बराबर है। मौसम विभाग ने कहा कि तूफान का दायरा बहुत बड़ा है, इसलिए सिर्फ तटीय नहीं बल्कि अंदरूनी इलाकों के लोगों को भी सतर्क रहने की जरूरत है। चीन में AI और ड्रोन की मदद से बचाव कार्य फिलहाल यह साफ नहीं है कि चीन में टकराने के बाद यह किस दिशा में जाएगा। तूफान के 48 घंटे के अलर्ट जोन में पहुंचने के बाद चीन ने तैयारियां और तेज कर दी हैं। सरकारी टीवी सीसीटीवी के मुताबिक, नेशनल मरीन एनवायरनमेंटल फोरकास्टिंग सेंटर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम तैयार किया है, जो अगले 240 घंटे (10 दिन) तक तूफान की दिशा, ताकत और कहां टकराएगा, इसका अनुमान लगा सकता है। इसके साथ ही ड्रोन और अन्य आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है।
जापान की ओर करीब 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से डॉल्फिन तूफान बढ़ रहा है। इसकी वजह से 2.6 लाख लोगों को घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने के आदेश दिए गए हैं। जबकि 500 से ज्यादा उड़ानें रद्द कर दी गई हैं। हालात को देखते हुए टोयोटा ने भी अपनी 9 फैक्ट्रियों में काम रोक दिया है। जापान मौसम विज्ञान एजेंसी (JMA) के मुताबिक, डॉल्फिन कैटेगरी-1 का तूफान है। इसकी लगातार हवा की रफ्तार 144 किमी प्रति घंटा और झोंकों की रफ्तार 198 किमी प्रति घंटा तक पहुंच रही है। यह तूफान क्यूशू और ओकिनावा के बीच स्थित द्वीपों की ओर बढ़ रहा है। ओकिनावा द्वीप पर सबसे ज्यादा असर तूफान की वजह से जापान का ओकिनावा द्वीप बुरी तरह प्रभावित हुआ है। वहां छुट्टियां मनाने गए कई हांगकांग के पर्यटक उड़ानें रद्द होने के कारण फंस गए हैं। उन्हें अब जरूरी सामान की कमी, बिजली कटने और पानी की सप्लाई बाधित होने की आशंका का सामना करना पड़ रहा है। हांगकांग से जुड़े ट्रैवल सोशल मीडिया अकाउंट्स पर साझा की गई तस्वीरों में सुपरमार्केट की ब्रेड की अलमारियां खाली दिखाई दे रही हैं। वहीं, कई इलाकों में मूसलाधार बारिश और तेज हवाएं चल रही हैं। रविवार को चीन पहुंच सकता है तूफान डॉल्फिन तूफान तेजी से चीन के पूर्वी तट की ओर बढ़ रहा है। चीन के मौसम विभाग के मुताबिक, शुक्रवार तक यह तूफान तट से करीब 820 किलोमीटर दूर था। इसके रविवार दोपहर से सोमवार सुबह के बीच झेजियांग और उत्तरी फुजियान के बीच कहीं टकराने की आशंका है। मौसम विभाग ने येलो अलर्ट जारी रखा है, जो चार स्तरों वाली चेतावनी प्रणाली में तीसरा सबसे गंभीर स्तर है। झेजियांग, फुजियान और ताइवान में तेज हवाओं और भारी बारिश की चेतावनी दी गई है। मौसम वैज्ञानिक शेन यूयांग के मुताबिक, शुक्रवार सुबह तक इस तूफान का दायरा झेजियांग प्रांत से करीब 13 गुना बड़ा हो चुका था। झेजियांग का आकार भारत के बिहार राज्य के बराबर है। मौसम विभाग ने कहा कि तूफान का दायरा बहुत बड़ा है, इसलिए सिर्फ तटीय नहीं बल्कि अंदरूनी इलाकों के लोगों को भी सतर्क रहने की जरूरत है। चीन में AI और ड्रोन की मदद से बचाव कार्य फिलहाल यह साफ नहीं है कि चीन में टकराने के बाद यह किस दिशा में जाएगा। तूफान के 48 घंटे के अलर्ट जोन में पहुंचने के बाद चीन ने तैयारियां और तेज कर दी हैं। सरकारी टीवी सीसीटीवी के मुताबिक, नेशनल मरीन एनवायरनमेंटल फोरकास्टिंग सेंटर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम तैयार किया है, जो अगले 240 घंटे (10 दिन) तक तूफान की दिशा, ताकत और कहां टकराएगा, इसका अनुमान लगा सकता है। इसके साथ ही ड्रोन और अन्य आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। जापान और चीन में बार-बार टाइफून क्यों आते हैं? 1. भूमध्य रेखा के पास और उत्तर में स्थित होना पश्चिमी प्रशांत महासागर में हर साल सबसे ज्यादा 25 से 30 तूफान आते हैं। यह दुनिया भर में आने वाले कुल तूफानों का लगभग 30% है। इसकी वजह इस इलाके का भूमध्य रेखा के पास (उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में) स्थित होना है। पृथ्वी के घूमने के कारण यहां हवाओं को गोल घुमाने वाला बल (कोरियोलिस इफेक्ट) बहुत मजबूत होता है। तूफान बनने के बाद ये हवाओं के बहाव के साथ जापान, ताइवान, चीन, कोरिया और फिलीपींस की तरफ बढ़ते हैं। यही वजह है कि इन देशों में सबसे ज्यादा तूफान आते हैं। 2. समुद्र का तेजी से गर्म होना टाइफून बनने और मजबूत होने की सबसे बड़ी वजह गर्म समुद्र है। जब समुद्र की सतह का तापमान बढ़ता है, तो पानी तेजी से भाप बनकर ऊपर उठता है। यह भाप तूफान के लिए ईंधन का काम करती है, जिससे हवाएं और बारिश दोनों बेहद तेज हो जाती हैं। 1901 में दुनिया भर के महासागरों की सतह का औसत तापमान लगभग 15.2°C से 15.3°C था। बीते कुछ साल में यह औसतन वैश्विक समुद्र सतह तापमान 21.1°C को पार कर गया है, जो इतिहास में सबसे ज्यादा है।
RPG एंटरप्राइजेज के चेयरमैन ने चीनी रिटेल चेन ‘पैंग डोंग लाई’ के फाउंडर और रिटेल टाइकून ‘यू डोंग लाई’ द्वारा शुरू की गई एक अनोखी पॉलिसी का जिक्र किया। यह पॉलिसी एक आसान सिद्धांत पर काम करती है- “अगर आप खुश नहीं हैं, तो काम पर न आएं।” इस सिस्टम के तहत, मैनेजमेंट छुट्टी देने से मना नहीं कर सकता, क्योंकि इसका मकसद कर्मचारियों को आराम का समय खुद तय करने की आजादी देना है।
हर्ष गोयनका ने एक्स पर पोस्ट शेयर किया है। उन्होंने लिखा- चीन की रिटेल कंपनी ‘पैंग डोंग लाई’ अपने कर्मचारियों को 10 दिन की पेड “अनहैपी लीव” देती है। कंपनी के फाउंडर यू डोंगलाई की सोच साफ है- “अगर आप खुश नहीं हैं, तो काम पर न आएं।” कहा जाता है कि मैनेजर इस तरह की छुट्टी की रिक्वेस्ट को मना नहीं कर सकते।
उन्होंने आगे लिखा-क्या यह कुछ ज़्यादा ही है? शायद। हमें इस बात पर और गहराई से सोचने की ज़रूरत है कि क्या भारतीय माहौल में ‘अनहैपी लीव’ की जरूरत है या फिर क्या बर्नआउट (काम के तनाव से होने वाली थकान) को रोकने और ऐसा वर्कप्लेस बनाने का कोई बेहतर तरीका हो सकता है, जहां लोग सच में काम पर आना चाहें।
Chinese retailer Pang Dong Lai gives employees 10 days of paid “unhappy leave.” Founder Yu Donglai’s philosophy is simple “If you’re not happy, don’t come to work.” Managers are reportedly not allowed to refuse the request.
Extreme? Perhaps.
We do need a broader conversation if…
— Harsh Goenka (@hvgoenka) August 7, 2026
गोयनका ने बदलते ग्लोबल वर्क कल्चर को देखते हुए यह पोस्ट शेयर किया है। लेकिन उनके प्रोफेशनल नेटवर्क में इसे लेकर बहुत अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कमेंट बॉक्स में लोग-लोग अपने विचार शेयर कर रहे हैं।
कुछ लोगों को उनका ये सजेशन पसंद नहीं आया। लोगों का कहना है कि अगर पूरी टीमें परफॉर्मेंस टारगेट पूरे न होने के बाद महीने के आखिरी दिनों जैसी अहम तारीखों पर “अनहैप्पी लीव” (unhappy leave) के लिए अप्लाई करती हैं, तो यह खतरनाक हो सकता है। कंपनी पर गहरा असर पड़ेगा।
वहीं कई प्रोफेशनल्स का तर्क है कि छुट्टी देने से सिस्टम की कई समस्याओं को ठीक नहीं किया जा सकता है। वहीं कुछ ने कहा कि लीडर्स को अटेंडेंस मैनेज करने के बजाय “उत्साह बढ़ाने” पर ध्यान देना चाहिए, जिससे मेंटल हेल्थ की वजह से छुट्टी लेने की जरूरत अपने आप कम हो जाएगी।
Sugar Price : फेस्टिवल सीजन में चीनी का स्वाद फीका पड़ सकता है। पिछले एक महीने में कुछ राज्यों में चीनी के दाम 15% तक बढ़े हैं। इसका उत्पादन बढ़ाने के लिए चीनी मिलों ने शुगर क्रशिंग पहले शुरू करने का फैसला लिया है। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद चीनी के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। पिछले एक महीने के अंदर चीनी के दाम औसतन 8 फीसदी तक बढ़ गए हैं। ऐसे में चीनी का उत्पादन बढ़ा कर इसके बढ़ते दाम को थामने के लिए चीनी मिलों ने इस साल शुगर क्रशिंग पहले शुरू करने का फैसला किया है।
इस साल फेस्टिवल सीजन में चीनी का स्वाद फीका हो सकता है। दरअसल,इस साल अनुमान के मुताबिक चीनी का उत्पादन नहीं हुआ है। इस साल चीनी का उत्पादन 293 लाख टन रहने का अनुमान था लेकिन ये 280 लाख टन ही रहा,जो अनुमान के मुकाबले करीब 5% कम है। पिछले साल का करीब 50 लाख टन स्टॉक उपलब्ध है लेकिन देश में कुल चीनी की खपत 280 लाख टन होती है। इस साल करीब 8 लाख टन चीनी निर्यात हुई है। पिछले महीने चीनी के होलसेल दाम में 400 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है। इसे देखते हुए कंपनियों ने इस साल चीनी का उत्पादन 10-15 दिन पहले शुरू करने का फैसला किया है।
अगर सरकार के आंकड़ों पर नजर डालें तो दिल्ली में 1 महीने पहले चीनी का दाम 45 रुपए प्रति किलो था जो अब बढ़कर 49 रुपए प्रति किलो हो गया है। वहीं,पश्चिम बंगाल में 1 महीने पहले इसका दाम 49 रुपए प्रति किलो था जो अब 55 रुपए प्रति किलो पर पहुंच गया है। चेन्नई में 1 महीने पहले चीनी का दाम 46 रुपए प्रति किलो था जो अब बढ़कर 53 रुपए प्रति किलो हो गया है। मुंबई में 1 महीने पहले चीनी का दाम 46 रुपए प्रति किलो था जो अब बढ़कर 52 रुपए प्रति किलो हो गया है। इसी तरह रांची में 1 महीने पहले चीनी का दाम 47 रुपए प्रति किलो था जो अब बढ़कर 51 रुपए प्रति किलो हो गया है। पिछले एक महीने में चीनी के दाम औसतन 8 फीसदी तक बढ़े हैं। कुछ राज्यों में तो चीनी के दाम में 15 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है।
चीनी की कीमतों को काबू में रखने के लिए सरकार ने स्टॉक लिमिट लगाई है। साथ ही चीनी मिलों के स्टॉक की भी जांच की है। लेकिन एल नीनो और अगले साल चीनी का उत्पादन कम होने की आशंका से दाम लगातार बढ़ रहे हैं।
चीनी कंपनियों मार्जिन में आएगा सुधार
चीनी की कीमतों में बढ़त से उपभोक्ता भले ही परेशान हों लेकिन इससे चीनी मिल कंपनियों को फायदा होगा। चीनी के दाम बढ़ने से बलरामपुर चीनी,द्वारिकेश शुगर,श्री रेणुका शुगर और डालमिया भारत शुगर जैसी कंपनियों के मुनाफे में बढ़ोतरी की उम्मीद है। ऊंचे दाम से उनके मार्जिन सुधर सकते हैं। साथ ही यह सरकार के महत्वाकांक्षी इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के लिए भी झटका साबित हो सकता है। ऊंची कीमतों की वजह से मिलें इथेनॉल बनाने के बजाय चीनी बेचना ज्यादा फायदेमंद समझ सकती हैं, जिससे देश में इथेनॉल का उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
Market Outlook : निफ्टी-सेंसेक्स गिरावट के साथ हुए बंद, जानिए 10 अगस्त को कैसी रह सकती है इनकी चाल

एशियन क्रिकेट काउंसिल ने गुरुवार को घोषणा की कि 2026 महिला एशिया कप का मुख्य मुकाबला भारत और पाकिस्तान के बीच पांच सितंबर को दुबई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में खेला जाएगा। टूर्नामेंट की शुरुआत 28 अगस्त को थाईलैंड और हांगकांग के बीच मैच से होगी। यह महिला एशिया कप का छठा संस्करण होगा जो टी-20 प्रारूप में खेला जाएगा।
आठ टीमों को दो ग्रुप में बांटा गया है; ग्रुप ए में भारत और पाकिस्तान के साथ थाईलैंड, हांगकांग और चीन शामिल हैं, जबकि ग्रुप बी में श्रीलंका, बंगलादेश, यूएई और इंडोनेशिया हैं। टूर्नामेंट का पहला मैच थाईलैंड और हांगकांग के बीच खेला जाएगा।हर ग्रुप की टॉप दो टीमें सेमीफाइनल के लिए क्वालीफाई करेंगी और फाइनल 13 सितंबर को खेला जाएगा। सभी मैच दुबई अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम में फ्लडलाइट्स की रोशनी में खेले जाएंगे।
#India will face arch-rival Pakistan in the marquee match of the 2026 Women’s Asia Cup at the Dubai International Cricket Stadium on September 5.
Asian Cricket Council (#ACC) announced the schedule for the Women's T20 Asia Cup 2026, set to be held in Dubai from August 28 with… pic.twitter.com/bXCoupc5oq
— All India Radio News (@airnewsalerts) August 7, 2026
टी-20 प्रारुप में भारत का पलड़ा पाकिस्तान पर हमेशा भारी रहा है। टीम ने कुल 16 मुकाबलों में से 13 मैचों में जीत हासिल की है। हाल में हुए टी-20 विश्वकप मैच में भी भारत ने पाकिस्तान को 60 रनों से बड़ी हार थमाई थी। इसका कारण है पॉवर हिटिंग और स्पिन गेंदबाज जिसका तोड़ सालों साल पाकिस्तान भारत के खिलाफ नहीं निकाल पाया है।पाकिस्तान ने अंतिम बार भारत को इस प्रारुप में साल 2016 के टी-20 विश्वकप में हराया था।
अमेरिका चीन और रूस से बढ़ते तनाव को देखते हुए अपनी परमाणु नीति बदलने की तैयारी कर रहा है। NBC न्यूज के मुताबिक, पेंटागन ऐसी रणनीति बना रहा है, जिसमें बड़े परमाणु हथियारों के साथ छोटे एटम बम (टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार) भी इस्तेमाल का विकल्प होंगे। जरूरत पड़ने पर इनका इस्तेमाल दुश्मन के सैन्य ठिकानों या सीमित युद्ध में किया जा सकेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, इस नई नीति पर पेंटागन के नीति प्रमुख एल्ब्रिज कोल्बी काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि अभी राष्ट्रपति के पास या तो बड़े परमाणु हमले का विकल्प है या फिर कोई जवाबी कार्रवाई नहीं करने का। नई रणनीति में बीच का रास्ता निकाला जा रहा है, ताकि जरूरत पड़ने पर छोटे परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर दुश्मन को रोका जा सके। टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार क्या हैं? टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार कम क्षमता वाले परमाणु हथियार होते हैं। इन्हें पूरे शहर को तबाह करने के बजाय युद्ध के मैदान में दुश्मन के सैन्य ठिकानों, एयरबेस, मिसाइल लॉन्च साइट, टैंक फॉर्मेशन या सैनिकों की तैनाती जैसे सीमित लक्ष्यों पर इस्तेमाल करने के लिए बनाया जाता है। अमेरिका नीति क्यों बदल रहा है? अमेरिका को लगता है कि अगर भविष्य में चीन या रूस से जंग हुई, तो सिर्फ बड़े परमाणु हमले का विकल्प काफी नहीं होगा। इसलिए वह छोटे एटम बमों को भी अपनी सैन्य योजना में शामिल करना चाहता है। उसका मानना है कि इससे दुश्मन पर दबाव बनेगा और जरूरत पड़ने पर सीमित जवाब देना आसान होगा। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर छोटे एटम बम इस्तेमाल का विकल्प बन गए, तो उन्हें चलाने की संभावना भी बढ़ जाएगी। इससे कोई भी सामान्य जंग देखते-देखते परमाणु जंग में बदल सकती है। रूस के पास सबसे ज्यादा परमाणु हथियार रूस दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु जखीरा रखने वाला देश है। SIPRI और FAS के मुताबिक उसके पास 5,459 परमाणु हथियार हैं। अमेरिका 5,177 हथियारों के साथ दूसरे स्थान पर है। दोनों देशों के पास दुनिया के करीब 88% परमाणु हथियार हैं। वहीं, चीन के पास करीब 600 परमाणु हथियार हैं। संख्या में वह काफी पीछे है, लेकिन परमाणु हथियारों का जखीरा सबसे तेजी से वही बढ़ा रहा है। 1945 के बाद परमाणु हथियारों का इस्तेमाल क्यों नहीं हुआ? द्वितीय विश्व युद्ध में अगस्त 1945 में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए थे। इसके बाद दुनिया ने परमाणु हथियारों की विनाशकारी क्षमता देखी। तभी से बड़ी परमाणु शक्तियों ने इन्हें युद्ध में चलाने के बजाय ‘न्यूक्लियर डिटरेंस’ (परमाणु प्रतिरोध) के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया। न्यूक्लियर डिटरेंस क्या है? इस रणनीति का मतलब है कि अगर कोई देश परमाणु हमला करेगा, तो जवाब में उसे भी उतना ही विनाशकारी परमाणु हमला झेलना पड़ेगा। यानी दोनों पक्षों को अस्वीकार्य नुकसान होगा। इसी डर ने अमेरिका, रूस समेत परमाणु शक्तियों को 1945 के बाद युद्ध में परमाणु हथियार इस्तेमाल करने से रोके रखा है।

