Bharat Electronics Share Price : 770 करोड़ रुपये की बड़ी डील भी नहीं भर पाई जोश, 2% से ज्यादा टूटा शेयर

Bharat Electronics Share : 22 अक्टूबर को भारत इलेक्ट्रॉनिक्स के शेयर लाल निशान में कारोबार कर रहे हैं। बता दें कि रक्षा मंत्रालय ने इस सरकारी डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माता कंपनी के साथ 770 करोड़ रुपये का एक करा कियाहै। । यह करार ‘इम्प्रूव्ड लो-लेवल लाइटवेट रडार’ (LLLR-I) के लिए है, जो लड़ाकू विमानों के साथ-साथ मिनी और माइक्रो ड्रोन का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने में सक्षम हैं। रक्षा मंत्रालय से यह बड़ी डील मिलने के बावजूद आज यह शेयर दबाव में कारोबार कर रहा है।

फिलहाल 12.45 बजे के आसपास यह शेयर 5.20 रुपए यानी 1.40 फीसदी की कमजोरी के साथ 366 रुपए के आसपास कारोबार कर रहा था। आज का इसका दिन का लो 361.70 रुपए है। वहीं, इसका दिन का हाई 369.55 रुपए है।

इस करार का मकसद भारतीय सेना के वायु रक्षा नेटवर्क में कम ऊंचाई पर लड़ने के गैप को दूर करना है। रक्षा मंत्रालय (MoD) ने बताया कि LLLR-I प्रणाली लड़ाकू विमान के आकार के लक्ष्यों के साथ-साथ मिनी और माइक्रो ड्रोन का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने में सक्षम है। इसमें हवाई टारगेट को पहचानने की अतिरिक्त खूबी भी है। इससे सेना को मानवरहित हवाई प्रणालियों (UAS) से होने वाले खतरों का मुकाबला करने में मदद मिलेगी।

LLLR-I, ‘अश्लेषा’ रडार का एक अपग्रेडेड वर्ज़न है। इसे रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड रडार डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (LRDE) द्वारा डिजाइन किया गया है और इसका निर्माण BEL द्वारा किया गया है। जहां ‘अश्लेषा’ एक S-बैंड 3D रडार है जिसमें सेमी-एक्टिव ऐरे एंटीना लगा होता है, वहीं इस अपग्रेडेड सिस्टम में गैलियम नाइट्राइड (GaN) आधारित ‘एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे’ (AESA) तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसमें चार फिक्स्ड फेज़्ड-ऐरे पैनल लगे हैं, जो बिना किसी हिलने-डुलने वाले हिस्से के 360 डिग्री कवरेज प्रदान करते हैं।

डिजिटल बीम-फॉर्मिंग और 3D प्रोसेसिंग की मदद से यह राडार, कम राडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) वाले छोटे ड्रोन का पता लगा सकता है। यह स्कैनिंग के दौरान टारगेट को ट्रैक कर सकता है और वायर्ड या वायरलेस लिंक के जरिए हथियार प्रणालियों को डेटा भेज सकता है। यह सिस्टम इतना हल्का है कि इसे इंसान आसानी से उठाकर ले जा सकते हैं और इसे मैदानी इलाकों, रेगिस्तानों तथा अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात किया जा सकता है।

लो-लेवल रडार एक बड़े एयर डिफेंस नेटवर्क में ‘गैप-फिलर’ (कमी पूरी करने वाले) का काम करते हैं। ये कम ऊंचाई वाले उन इलाकों को कवर करते हैं, जहां लंबी दूरी के रडार, जमीनी बनावट और पृथ्वी की गोलाई के कारण ठीक से काम नहीं कर पाते। इसी हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल ड्रोन करते हैं। सेना को ऐसे रडार की तलाश है जो 0.001 वर्ग मीटर के RCS (रडार क्रॉस सेक्शन) वाले लक्ष्यों का पता लगा सकें जो कि एक माइक्रो ड्रोन के बराबर होता है।

 

 

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