भारत सरकार ने मंगलवार को उन खबरों पर प्रतिक्रिया दी, जिनमें कहा गया था कि पाकिस्तान के कुछ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और GenZ समूहों ने दिल्ली में हुए CJP के छात्र आंदोलन का समर्थन किया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान का सीमा पार आतंकवाद है। पाकिस्तानी इन्फ्लुएंसर्स ने समर्थन किया था पाकिस्तान के कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने CJP आंदोलन के समर्थन में पोस्ट किए थे। उन्होंने भारत और पाकिस्तान के साझा इतिहास का जिक्र करते हुए छात्रों के साथ एकजुटता दिखाई। इंस्टाग्राम पर करीब तीन लाख फॉलोअर्स वाले पाकिस्तानी इन्फ्लुएंसर बिलाल हसन ने वीडियो जारी कर कहा कि दोनों देशों के बीच नफरत फैलाई गई है, लेकिन पाकिस्तान के लोग आंदोलन के पोस्टर, नारों और संदेशों को समझते हैं। उन्होंने कहा, “हम खुद को इस आंदोलन में देखते हैं। आखिर हम एक बंटे हुए परिवार के बच्चे हैं।” उन्होंने प्रदर्शन कर रहे छात्रों को बहादुर बताया और कहा कि वे अपने देश का बेहतर भविष्य चाहते हैं। साथ ही छात्रों से अपील की कि वे एकजुट रहें और कोई भी जोखिम सोच-समझकर उठाएं। पाकिस्तानी क्रिएटर्स ने मीम्स और वीडियोज भी बनाए कई पाकिस्तानी कंटेंट क्रिएटर्स ने आंदोलन पर वीडियो भी बनाए। कुछ ने मजाक में कहा कि उन्हें जंतर-मंतर पहुंचने से सिर्फ भारत-पाकिस्तान की सीमा रोक रही है। कुछ लोगों ने पाकिस्तानी पासपोर्ट के साथ प्रदर्शन में पहुंचने की कल्पना वाले वीडियो बनाए। एक अन्य वीडियो में एक पाकिस्तानी महिला ने कहा कि भारत के GenZ की वजह से उसके लिए भारत से नफरत करना मुश्किल होता जा रहा है। पाकिस्तानी इन्फ्लुएंसर महविश एजाज ने भी छात्र आंदोलन की तारीफ की। उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले छात्रों की संघर्ष की कहानियों ने उन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित किया। वहीं, एक दूसरे पाकिस्तानी इंफ्लुएंसर अहसान मिर्जा ने कहा, “छात्रों को हमेशा छात्रों का साथ देना चाहिए। हम एक जैसे हैं। हमारे पूर्वजों ने एक ही रोटी खाई और अंग्रेजों के खिलाफ साथ लड़ाई लड़ी।” पाकिस्तान से चल रहे 480 से ज्यादा हैंडल्स पर सरकार की नजर पाकिस्तानी सरकार ने छात्र आंदोलन पर टिप्पणी नहीं की कुछ दिन पहले ही, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस आंदोलन पर आधिकारिक टिप्पणी करने से इनकार कर दिया था। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी से पूछा गया था कि क्या भारत में प्रदर्शनकारियों के साथ हुआ व्यवहार मानवाधिकार उल्लंघन माना जा सकता है। इस पर अंद्राबी ने कहा, “यह भारत का आंतरिक मामला है। हम ऐसे मामलों पर टिप्पणी नहीं करते।” NEET पेपर लीक विवाद से शुरू हुआ था आंदोलन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में छात्रों ने प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों और खास तौर पर NEET पेपर लीक के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर कई सप्ताह तक प्रदर्शन किया। छात्रों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की थी। आंदोलन में छात्र आत्महत्याओं का मुद्दा भी उठाया गया। 20 जुलाई को ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के बाद आंदोलन और तेज हो गया। बाद में 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद CJP ने धरना खत्म करने का ऐलान किया।
जापान के दक्षिणी मुख्य द्वीप क्यूशू के कुमामोटो इलाके में मंगलवार देर शाम भूकंप के तेज झटके महसूस किए गए। जापान मौसम विज्ञान एजेंसी (JMA) के अनुसार, भूकंप की प्रारंभिक तीव्रता 7.1 मापी गई है। झटकों के बाद प्रशासन ने सुनामी की चेतावनी जारी कर दी है। जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने बताया कि भूकंप का केंद्र समुद्र की सतह से 10 किलोमीटर (6 मील) की गहराई में स्थित था। भूकंप के झटके महसूस होते ही स्थानीय स्तर पर अलर्ट जारी कर दिया गया है। फिलहाल, एजेंसी की ओर से सुनामी को लेकर एहतियाती कदम उठाए जा रहे हैं। इस घटना को लेकर अभी तक किसी बड़े नुकसान या हताहतों की जानकारी सामने नहीं आई है। एजेंसी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। भूकंप से जुड़े फुटेज… खबर अपडेट हो रही है….
दुनिया के सबसे चर्चित यौन अपराधियों में शामिल जेफ्री एपस्टीन की मौत को सात साल हो चुके हैं, लेकिन उसकी अरबों की संपत्ति को लेकर विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है। अमेरिकी जांच एजेंसियों के नए दस्तावेज सामने आने के बाद माना जा रहा है कि बेलारूस की रहने वाली 37 साल की डेंटिस्ट कारिना शुलियाक एपस्टीन की संपत्ति की सबसे बड़ी दावेदार हैं। दस्तावेजों के मुताबिक, एपस्टीन ने मरने से पहले अपनी वसीयत में उनके लिए करीब 959 करोड़ रुपए तक की संपत्ति और 33 कैरेट की हीरे की अंगूठी छोड़ी थी। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, डॉ. शुलियाक एपस्टीन की गर्लफ्रेंड रही हैं। 10 अगस्त 2019 को न्यूयॉर्क की जेल में आत्महत्या करने से पहले एपस्टीन ने आखिरी फोन भी उन्हें ही किया था। दोनों के निजी ईमेल-तस्वीरें जारी हुए डॉ. कारिना शुलियाक 2019 में एपस्टीन की मौत के बाद से लोगों की नजरों से दूर रहकर सामान्य जिंदगी जीने की कोशिश कर रही थी। लेकिन उनकी यह कोशिश ज्यादा समय तक नहीं चल सकी। जनवरी के आखिर में अमेरिकी न्याय विभाग ने जेफ्री एपस्टीन से जुड़े करीब 30 लाख पन्नों के दस्तावेज और ईमेल जारी कर दिए। इन रिकॉर्ड में डॉ. शुलियाक और एपस्टीन के बीच हुए हजारों निजी ईमेल और दोनों की साथ में ली गई कई तस्वीरें भी शामिल थीं। इसके बाद दोनों का करीब 8 साल लंबा रिश्ता सबके सामने आ गया। रिकॉर्ड के मुताबिक, बेलारूस में जन्मीं शुलियाक ने खुद को कभी एपस्टीन की पीड़िता नहीं बताया। वहीं, एफबीआई ने भी उनसे एपस्टीन के मामले में कभी पूछताछ नहीं की। एपस्टीन की सैकड़ों पीड़िताओं की ओर से केस लड़ने वाले वकीलों ने भी उनका बयान कभी दर्ज नहीं कराया। 21 साल की उम्र में एपस्टीन से मिली थी जांच रिकॉर्ड के मुताबिक, मार्च 2011 के आखिर में डॉ. कारिना शुलियाक की मुलाकात जेफ्री एपस्टीन से हुई थी। तब वह 21 साल की थीं और न्यूयॉर्क आए सिर्फ नौ महीने हुए थे। वह बेलारूस से अस्थायी स्टूडेंट वीजा पर अमेरिका आई थीं, ताकि वहां डेंटिस्ट की अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें। उस समय एपस्टीन फ्लोरिडा में एक नाबालिग लड़की से वेश्यावृत्ति कराने के मामले में अपना अपराध स्वीकार कर चुका था और उस पर दर्जनों नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण के आरोप भी थे। द न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, साइबेरिया की एक लड़की ने दोनों की मुलाकात कराई थी। उस महिला ने बताया कि उससे समय-समय पर दूसरी युवा महिलाओं को भी एपस्टीन के पास लाने के लिए कहा जाता था। शुरुआती मुलाकातों में एपस्टीन ने महंगे तोहफों और दूसरी सुविधाओं से शुलियाक को प्रभावित करने की कोशिश की। पहली ही मुलाकात के दौरान उसने उनके डेंटिस्ट बनने के सपने को पूरा कराने में मदद करने की पेशकश भी की। डॉ. शुलियाक पर जमकर खर्च करता था एपस्टीन एपस्टीन डॉ. शुलियाक को अपनी सबसे पसंदीदा बता चुका था और अक्सर कहता था कि वह उनसे प्यार करता है। उसने उन्हें अपनी क्रेडिट कार्ड से मनचाही खरीदारी करने की पूरी छूट दे रखी थी। दोनों कई देशों में साथ घूमते थे। एपस्टीन ने कई सालों में उन्हें करीब 10 लाख डॉलर दिए। इतना ही नहीं, उसने बेलारूस में रहने वाले उनके माता-पिता को भी हजारों डॉलर भेजे थे। ईमेल से यह भी पता चलता है कि 2012 में एपस्टीन ने उन्हें कोलंबिया यूनिवर्सिटी के डेंटल स्कूल में दाखिला दिलाने में मदद की थी और तीन साल की पढ़ाई की पूरी फीस भी भरने का फैसला किया था। समय के साथ डॉ. शुलियाक ने जेफ्री एपस्टीन का इतना भरोसा जीत लिया कि वह उसकी संपत्तियों और कर्मचारियों के मैनेजमेंट में भी मदद करने लगीं। एपस्टीन ने ग्रीन कार्ड दिलाने में भी मदद की 2012 में डॉ. कारिना शुलियाक ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में दाखिले के लिए आवेदन किया। तब तक उनका स्टूडेंट वीजा खत्म हो चुका था और वह तय समय से ज्यादा अमेरिका में रह रही थीं। अमेरिकी न्याय विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक, 2013 की शुरुआत में जेफ्री एपस्टीन ने उन्हें अमेरिका में रखने का रास्ता निकाला। उस समय न्यूयॉर्क में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता मिल चुकी थी। एपस्टीन का मानना था कि अगर कारिना की शादी किसी अमेरिकी महिला से करा दी जाए, तो उन्हें ग्रीन कार्ड और बाद में नागरिकता मिलने का रास्ता आसान हो जाएगा। इसके लिए उसने अपनी एक महिला असिस्टेंट से कारिना की शादी कराई। एक ईमेल में एपस्टीन ने लिखा था कि ग्रीन कार्ड पाने का सबसे तेज तरीका समलैंगिक विवाह है। बाद में अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट सांसदों ने आरोप लगाया कि एपस्टीन ने अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम का गलत इस्तेमाल किया। उनका कहना था कि यह शादी सिर्फ कागजों पर दिखाई गई थी। मई 2018 में डॉ. शुलियाक अमेरिकी नागरिक बन गईं और करीब एक साल बाद उनका तलाक हो गया। मौत से पहले एपस्टीन ने डॉ. शुलियाक के नाम की संपत्ति जुलाई 2019 में जैफ्री एप्सटीन की गिरफ्तारी हो गई। इसके एक महीने बाद उनकी डॉ. शुलियाक से आखिरी बार करीब 20 मिनट फोन पर बातचीत हुई। एपस्टीन ने कहा कि सेक्स ट्रैफिकिंग का मामला उम्मीद से ज्यादा लंबा चलेगा। अगले ही दिन, 10 अगस्त 2019 को एपस्टीन अपनी जेल में मृत मिला। अधिकारियों ने उसकी मौत को आत्महत्या बताया। दस्तावेजों के मुताबिक, मौत से कुछ समय पहले एपस्टीन ने अपनी वसीयत में बदलाव किया था। एक नोट में उसने अपनी उस समय की 60 करोड़ डॉलर की संपत्ति का बड़ा हिस्सा डॉ. शुलियाक के नाम करने की बात लिखी थी। इसमें शादी के इरादे से दी जाने वाली एक बड़ी हीरे की अंगूठी का भी जिक्र था।
दुनिया के सबसे कुख्यात यौन अपराधियों में शामिल जेफ्री एपस्टीन की मौत को सात साल हो चुके हैं, लेकिन उसकी अरबों रुपए की संपत्ति को लेकर विवाद अब भी जारी है। अमेरिकी जांच एजेंसियों के नए दस्तावेजों से पता चला है कि बेलारूस की 37 वर्षीय डेंटिस्ट कारिना शुलियाक उसकी संपत्ति की सबसे बड़ी दावेदार हो सकती हैं। दस्तावेजों के मुताबिक, एपस्टीन ने अपनी वसीयत में कारिना के नाम करीब 959 करोड़ रुपए की संपत्ति और 33 कैरेट की हीरे की अंगूठी छोड़ी थी। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, कारिना शुलियाक एपस्टीन की गर्लफ्रेंड थीं। 10 अगस्त 2019 को न्यूयॉर्क की जेल में आत्महत्या से पहले एपस्टीन ने आखिरी फोन कॉल भी उन्हें ही किया था। दोनों के प्राइवेट ईमेल और तस्वीरें सार्वजनिक हुईं जेफ्री एपस्टीन की 2019 में मौत के बाद डॉ. कारिना शुलियाक लोगों की नजरों से दूर रहकर सामान्य जिंदगी जी रही थीं। हालांकि, यह ज्यादा समय तक नहीं चल सका। जनवरी के आखिर में अमेरिकी न्याय विभाग ने एपस्टीन से जुड़े करीब 30 लाख पन्नों के दस्तावेज, ईमेल और रिकॉर्ड जारी किए। इनमें डॉ. कारिना शुलियाक और एपस्टीन के बीच हुए हजारों निजी ईमेल और दोनों की साथ में ली गई कई तस्वीरें भी शामिल हैं। इन दस्तावेजों से दोनों के करीब 8 साल पुराने रिश्ते का खुलासा हुआ। रिकॉर्ड के मुताबिक, बेलारूस में जन्मीं कारिना शुलियाक ने कभी खुद को एपस्टीन की पीड़िता नहीं बताया। वहीं, एफबीआई ने भी एपस्टीन मामले में उनसे कभी पूछताछ नहीं की। एपस्टीन की सैकड़ों कथित पीड़िताओं की ओर से केस लड़ने वाले वकीलों ने भी उनका बयान कभी दर्ज नहीं कराया। 21 साल की उम्र में एपस्टीन से मिली थीं कारिना जांच रिकॉर्ड के मुताबिक, मार्च 2011 के आखिर में डॉ. कारिना शुलियाक की मुलाकात जेफ्री एपस्टीन से हुई थी। तब वह 21 साल की थीं और न्यूयॉर्क आए उन्हें सिर्फ नौ महीने हुए थे। वह बेलारूस से स्टूडेंट वीजा पर अमेरिका आई थीं, ताकि डेंटिस्ट की पढ़ाई पूरी कर सकें। उस समय एपस्टीन फ्लोरिडा में एक नाबालिग लड़की से वेश्यावृत्ति कराने के मामले में अपना अपराध स्वीकार कर चुका था। उस पर दर्जनों नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण के आरोप भी लग चुके थे। एक महिला ने कराई थी मुलाकात द न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, दोनों की मुलाकात एक महिला ने कराई थी। उस महिला ने बताया कि उससे समय-समय पर दूसरी युवा महिलाओं को भी एपस्टीन के पास लाने के लिए कहा जाता था। महंगे तोहफों से प्रभावित करने की कोशिश शुरुआती मुलाकातों में एपस्टीन ने कारिना को महंगे तोहफे और दूसरी सुविधाएं देकर प्रभावित करने की कोशिश की। पहली मुलाकात में ही उसने उनके डेंटिस्ट बनने के सपने को पूरा करने में मदद की पेशकश भी की। शुलियाक पर जमकर खर्च करता था एपस्टीन जांच रिकॉर्ड के मुताबिक, जेफ्री एपस्टीन डॉ. कारिना शुलियाक को अपनी सबसे पसंदीदा बताता था और अक्सर कहता था कि वह उनसे प्यार करता है। उसने उन्हें अपने क्रेडिट कार्ड से मनचाही खरीदारी की पूरी छूट दे रखी थी। दोनों कई देशों की यात्रा भी साथ करते थे। रिकॉर्ड के अनुसार, एपस्टीन ने कई वर्षों में कारिना को करीब 10 लाख डॉलर दिए। उसने बेलारूस में रहने वाले उनके माता-पिता को भी हजारों डॉलर भेजे थे। ईमेल से यह भी पता चलता है कि 2012 में एपस्टीन ने कारिना का कोलंबिया यूनिवर्सिटी के डेंटल स्कूल में दाखिला कराने में मदद की। उसने तीन साल की पढ़ाई की पूरी फीस भरने का भी फैसला किया था। समय के साथ कारिना ने एपस्टीन का इतना भरोसा जीत लिया कि वह उसकी संपत्तियों और कर्मचारियों के प्रबंधन में भी मदद करने लगीं। ग्रीन कार्ड दिलाने के लिए कराई थी समलैंगिक शादी 2012 में डॉ. कारिना शुलियाक ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में दाखिले के लिए आवेदन किया। तब तक उनका स्टूडेंट वीजा खत्म हो चुका था और वह तय समय से ज्यादा अमेरिका में रह रही थीं। अमेरिकी न्याय विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक, 2013 की शुरुआत में जेफ्री एपस्टीन ने उन्हें अमेरिका में रखने का रास्ता निकाला। उस समय न्यूयॉर्क में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता मिल चुकी थी। एपस्टीन का मानना था कि किसी अमेरिकी महिला से शादी होने पर कारिना के लिए ग्रीन कार्ड और बाद में नागरिकता हासिल करना आसान हो जाएगा। इसी योजना के तहत उसने अपनी एक महिला कर्मचारी से कारिना की शादी कराई। एक ईमेल में एपस्टीन ने लिखा था कि ग्रीन कार्ड पाने का सबसे तेज तरीका समलैंगिक विवाह है। बाद में अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट सांसदों ने आरोप लगाया कि एपस्टीन ने अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम का दुरुपयोग किया। उनका कहना था कि यह शादी सिर्फ कागजों पर थी। मई 2018 में डॉ. कारिना शुलियाक अमेरिकी नागरिक बन गईं और करीब एक साल बाद उनका तलाक हो गया। मौत से पहले वसीयत में कारिना का नाम जोड़ा जुलाई 2019 में जेफ्री एपस्टीन को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के करीब एक महीने बाद उसकी डॉ. कारिना शुलियाक से आखिरी बार करीब 20 मिनट फोन पर बात हुई। इस दौरान उसने कहा था कि सेक्स ट्रैफिकिंग का मामला उसकी उम्मीद से ज्यादा लंबा चलेगा। अगले ही दिन, 10 अगस्त 2019 को एपस्टीन न्यूयॉर्क की जेल में मृत मिला। अधिकारियों ने उसकी मौत को आत्महत्या बताया। दस्तावेजों के मुताबिक, मौत से कुछ समय पहले एपस्टीन ने अपनी वसीयत में बदलाव किया था। एक नोट में उसने अपनी उस समय की 60 करोड़ डॉलर की संपत्ति का बड़ा हिस्सा डॉ. कारिना शुलियाक के नाम करने की बात लिखी थी। इसमें शादी के इरादे से दी जाने वाली एक बड़ी हीरे की अंगूठी का भी जिक्र था।
कनाडा के टोरंटो में स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के बाहर सोमवार सुबह फायरिंग हुई। राहत की बात यह रही कि इस हमले में कोई घायल नहीं हुआ। हालांकि, गोली लगने से दूतावास की इमारत के बाहरी हिस्से को नुकसान पहुंचा है। पुलिस को मौके से एक कारतूस का खोल मिला है। अधिकारियों के मुताबिक, फायरिंग के तुरंत बाद एक सफेद सेडान कार तेज रफ्तार से वहां से निकलती दिखी। पुलिस ने पीछा भी किया, लेकिन कार की रफ्तार ज्यादा होने और लोगों की सुरक्षा को देखते हुए पीछा बीच में ही रोकना पड़ा। अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि वह इस मामले में कनाडा की एजेंसियों के संपर्क में है। वहीं, ओंटारियो के प्रीमियर डग फोर्ड ने कहा कि हमले के पीछे जो भी लोग हैं, उन्हें जल्द पकड़कर सख्त सजा दिलाई जाएगी। यह पहली बार नहीं है। 10 मार्च को भी इसी अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर कई राउंड फायरिंग हुई थी। उस मामले में आरोपियों की तलाश के दौरान एक पुलिस अधिकारी की मौत हो गई थी। टोरंटो पुलिस ने जून में दावा किया था कि कुछ युवाओं को एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स के जरिए भर्ती किया जा रहा है। उन्हें अलग-अलग जगहों पर फायरिंग करने और उसका वीडियो बनाकर भेजने के बदले पैसे देने का लालच दिया जाता है। पुलिस के मुताबिक, निशाने पर यहूदी प्रार्थना स्थल (सिनेगॉग), यहूदी स्कूल, एक कचरा प्रबंधन कंपनी और अमेरिकी वाणिज्य दूतावास जैसी जगहें रही हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोमवार को कहा कि ईरान के साथ बातचीत जारी है। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इसका कोई हल निकल जाएगा। लेकिन अगर बातचीत बेनतीजा रही तो अमेरिका फिर से ईरान पर हवाई हमले शुरू करेगा। एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रम्प ने दावा किया, “पिछले 14 दिनों में ईरान को भारी नुकसान हुआ है। इसके बाद उन्होंने हमसे कहा कि हमले रोकिए और बातचीत करते हैं।” हालांकि, ईरान ने इस दावे को खारिज कर दिया। तेहरान का कहना है कि उसने अमेरिका से बातचीत की पहल नहीं की है। ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका ने फिलहाल ईरान पर हवाई हमले रोक रखे हैं। दोनों देशों के बीच मध्यस्थों के जरिए बातचीत चल रही है, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट समेत कई अहम मुद्दों पर अब भी सहमति नहीं बन सकी है। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…
पाकिस्तानी आतंकी और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर शहजाद भट्टी के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। जालंधर के इन्फ्लुएंसर नवदीप सिंह उर्फ रॉजर संधू के घर पर ग्रेनेड हमले के मामले में मोहाली स्थित NIA की स्पेशल कोर्ट ने उसके खिलाफ ओपन-डेटेड नॉन-बेलेबल वारंट (NBW) जारी किया है। अदालत ने माना कि आरोपी लगातार फरार है। उसके अपराध की गंभीरता को देखते हुए उसे समन या जमानती वारंट के जरिए अदालत में पेश कराना संभव नहीं है। NIA के इनपुट के मुताबिक, शहजाद भट्टी फिलहाल ब्राजील में छिपा हुआ है और वहीं से भारत विरोधी आतंकी एक्टीविटीज का संचालन कर रहा है। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, इस NBW के आधार पर आगे इंटरपोल से रेड कॉर्नर नोटिस जारी कराने और प्रत्यर्पण (एक्सट्राडिशन) की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। यह वारंट आरोपी की गिरफ्तारी तक प्रभावी रहेगा। यह वारंट कुख्यात पाकिस्तानी आतंकी मौलाना मसूद अजहर के खिलाफ भी जारी हो चुका है। जिस मामले में NBW, उसे 4 पॉइंट में समझिए… 1. सोशल मीडिया से शुरू हुआ विवाद, ग्रेनेड हमले तक पहुंचा
यह मामला 16 मार्च 2025 का है। जालंधर के थाना मकसूदां क्षेत्र में इन्फ्लुएंसर नवदीप सिंह उर्फ रॉजर संधू के घर की बालकनी में एक संदिग्ध धातु की वस्तु मिली, जो जांच में हैंड ग्रेनेड निकली। शुरुआत में मामले की जांच पंजाब पुलिस ने की। जांच में सामने आया कि पाकिस्तान में बैठे शहजाद भट्टी ने टिकटॉक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब के जरिए नवदीप संधू पर लाइव स्ट्रीमिंग और ऑनलाइन गिफ्टिंग के माध्यम से पैसे देने का दबाव बनाया। इनकार करने पर उसने अपने भारतीय नेटवर्क के जरिए ग्रेनेड हमला कराने की साजिश रची। 2. व्हाट्सएप ग्रुप से तैयार हुई हमले की साजिश
NIA की जांच में खुलासा हुआ कि शहजाद भट्टी पाकिस्तानी मोबाइल नंबर से एक व्हाट्सएप ग्रुप चला रहा था, जिसमें कई भारतीय नंबर जुड़े हुए थे। एजेंसी के अनुसार, इसी ग्रुप के जरिए हमले की योजना बनाई गई, आरोपियों के बीच संपर्क कराया गया और पूरी साजिश को अंजाम देने की तैयारी की गई। 3. गृह मंत्रालय के आदेश पर NIA ने संभाली जांच
15 दिसंबर 2025 को केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश के बाद NIA ने मामले को दोबारा दर्ज कर जांच शुरू की। इससे पहले पंजाब पुलिस 10 आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी थी और 9 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर चुकी थी। इसके बाद 2 अप्रैल 2026 को NIA ने विशेष अदालत में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की। जिसमें शहजाद भट्टी और दीपेंद्र प्रताप सिंह उर्फ दीपन राणा को आरोपी बनाया। NIA की जांच में यह भी सामने आया कि भट्टी ने भारतीय गुर्गे हार्दिक कंबोज को जालंधर भेजा था, जबकि विदेश में बैठे मोहम्मद जशीर अख्तर उर्फ जस्सी के साथ मिलकर भर्ती और लॉजिस्टिक्स का नेटवर्क संचालित किया जा रहा था। 4. भट्टी ब्राजील में छिपा, अब आगे क्या होगा?
NIA ने अदालत में पंजाब पुलिस की रिपोर्ट भी पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक, शहजाद भट्टी के खिलाफ पंजाब के अलग-अलग थानों में आतंकवाद, आपराधिक साजिश और गैरकानूनी गतिविधियों से जुड़े 15 से अधिक मामले दर्ज हैं। जांच एजेंसी का मानना है कि भट्टी केवल रंगदारी या व्यक्तिगत रंजिश तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशी धरती का इस्तेमाल कर भारत विरोधी गैंगस्टर-टेरर नेटवर्क को संचालित करने वाले बड़े सिंडिकेट का हिस्सा है। NBW जारी होने के बाद अब एजेंसी उसके खिलाफ इंटरनेशनल लेवल पर कानूनी कार्रवाई तेज कर सकती है। ********** ये खबर भी पढ़ें: पाकिस्तानी डॉन ने लॉरेंस को बच्चा कहा: फर्जी गैंगस्टर भी बताया; शहजाद भट्टी बोला- मेरी गोली मारकर हत्या की अफवाह फैलाई पाकिस्तानी डॉन शहजाद भट्टी ने अपनी मौत के दावे को खारिज किया है। भट्टी ने एक ऑडियो जारी कर कहा कि एक पोस्ट में दावा किया जा रहा है कि लॉरेंस गैंग ने उस पर फायरिंग कराई। जिसमें उसकी मौत हो गई। मगर, मैं कभी पुर्तगाल गया ही नहीं और न ही मुझ पर किसी तरह की कोई फायरिंग हुई है। (पढ़ें पूरी खबर)
विदेशी मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के एक अज्ञात अधिकारी ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत एक गंभीर चरण में है।खबरों के मुताबिक, अधिकारी का कहना है कि दोनों पक्षों ने प्रस्तावों का आदान-प्रदान किया है, जो प्रगति का स
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुर्की को F-35 जेट बेचने पर इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के विरोध से जुड़े सवालों को खारिज कर दिया। सोमवार को उन्होंने कहा कि बेचने के बारे में फैसला सिर्फ वही करते हैं, कोई और नहीं।ट्रंप ने इस महीने की शुरुआत में संकेत दिया था कि वह
28 फरवरी को जब अमेरिका और ईरान के बीच जंग शुरू हुई थी, तभी माना जा रहा था कि इसमें ईरान के सहयोगी हूती विद्रोही भी कूद सकते हैं। करीब पांच महीने बाद वही आशंका सच साबित होती दिख रही है। पिछले एक हफ्ते में हूतियों ने सऊदी अरब और रेड सी में जहाजों पर मिसाइल और ड्रोन से कई हमले किए हैं। जवाब में सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने भी हूती ठिकानों पर हवाई हमले शुरू कर दिए हैं। यानी करीब चार साल से किसी तरह टला हुआ यमन का युद्ध फिर भड़कने की कगार पर है। हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी का ऐलान कर दिया है, जबकि दोनों तरफ से हमले लगातार बढ़ रहे हैं। इससे मिडिल ईस्ट में एक नई जंग शुरू होने का खतरा बढ़ गया है। हूती और सऊदी के बीच विवाद की शुरुआत हूती और सऊदी के बीच ताजा विवाद 13 जुलाई को शुरू हुआ। दरअसल, कुछ हूती नेता अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में शामिल होने के बाद ईरान से यमन लौट रहे थे। लेकिन यमन की सऊदी समर्थित सरकार ने इस प्लेन को सना एयरपोर्ट पर उतरने ही नहीं दिया। यमन सरकार का कहना था कि हूती अधिकारी यमन की राष्ट्रीय एयरलाइन से ही वापस लौटें। उन्हें ईरान की एयरलाइन में आने नहीं दिया जाएगा। वहीं हूती ईरानी विमान को सीधे सना में उतारने पर अड़े रहे। इसके बाद सरकार समर्थित फोर्स ने सना एयरपोर्ट के रनवे को बम से उड़ा दिया, ताकि ईरानी विमान वहां उतर न सके। नतीजतन, हूती नेताओं वाला प्लेन सना एयरपोर्ट पर उतर ही नहीं सका। प्लेन ने अपना रास्ता बदलकर हूदैदाह एयरपोर्ट पर लैंडिंग की, जो हूतियों के कंट्रोल में है। इस घटना के बाद हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी का ऐलान कर दिया। शुरुआत में ईरान जंग से दूर रहे हूती विद्रोही फरवरी में जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था, तब हूती सीधे इस लड़ाई में शामिल होने से बचते दिखे। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर टूटने के बाद उनका रुख बदल गया। कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान ने हूतियों पर जंग में शामिल होने का दबाव बनाया। हालांकि उनका कहना है कि इससे सिर्फ ईरान को ही नहीं, बल्कि हूतियों को भी फायदा है। वे इस मौके का इस्तेमाल यमन में अपनी राजनीतिक ताकत और पकड़ और मजबूत करने के लिए करना चाहते हैं। 4 साल से यमन-सऊदी के बीच जंग रूकी थी यमन में 2022 हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच हुए युद्धविराम के बाद लड़ाई लगभग रुक गई थी। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं था कि दोनों पक्षों के बीच विवाद खत्म हो गया था। हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच स्थायी शांति समझौते पर बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी। इससे तनाव बना रहा, लेकिन दोनों पक्ष दोबारा बड़े युद्ध से बचना चाहते थे। खासकर सऊदी अरब, क्योंकि कई साल के युद्ध में उसे भारी आर्थिक और सैन्य नुकसान उठाना पड़ा था। हालात तब बदले, जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध छिड़ गया। ईरान हूती विद्रोहियों का सबसे बड़ा समर्थक माना जाता है। इस वजह से पूरे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ गया और इसका असर यमन पर भी पड़ा। पिछले कुछ हफ्तों में हूती और सऊदी अरब के बीच फिर टकराव बढ़ने लगा है और एक बार फिर से जंग का खतरा बढ़ गया है। हूती से जंग नहीं चाहता सऊदी अरब सऊदी अरब इस समय हूतियों के साथ दोबारा युद्ध नहीं चाहता। इसकी वजह पिछला युद्ध है, जो करीब एक दशक तक चला। इस लड़ाई में सऊदी अरब ने भारी पैसा खर्च किया, लेकिन उसे कोई बड़ा फायदा नहीं मिला। उल्टा उसकी छवि खराब हुई और युद्ध, भूख व बीमारियों की वजह से लाखों यमनियों की जान चली गई। दूसरी ओर, हूतियों को लगता है कि अगर वे सऊदी अरब पर दबाव बढ़ाते हैं तो उन्हें फायदा हो सकता है। अधिकारियों के मुताबिक, वे यमन के तेल से होने वाली कमाई में ज्यादा हिस्सा और देश में ज्यादा राजनीतिक ताकत चाहते हैं। यमन मामलों के विशेषज्ञ फारिया अल-मुस्लिमी कहते हैं, “हूतियों के लिए हर समस्या का एक ही जवाब है- युद्ध। वहीं सऊदी अरब हर समस्या को पैसे से सुलझाने की कोशिश करता है, जबकि हूती हथियारों से जवाब देते हैं।” ईरान की मदद से मजबूत हुए हूती विद्रोही हूती कभी यमन के उत्तरी पहाड़ी इलाकों में सक्रिय शिया विद्रोहियों का एक छोटा समूह थे। उनका नारा था- “अमेरिका और इजराइल की मौत।” ईरान के समर्थन से उन्होंने 2014 में गृहयुद्ध शुरू किया और राजधानी सना पर कब्जा कर अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को वहां से हटा दिया। यमन की उत्तरी सीमा से लगे सऊदी अरब को अपने पड़ोस में ईरान समर्थित हूती संगठन का मजबूत होना बड़ा खतरा लगा। साल 2015 में सऊदी अरब ने 8 और अरब देशों के साथ मिलकर एक गठबंधन बनाया और हूतियों के खिलाफ जंग छेड़ दी। इसका मकसद राष्ट्रपति अब्दरब्बुह मंसूर हादी की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को फिर से सत्ता में लाना था, जिसे हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना से हटा दिया था। करीब 8 साल तक जंग लड़ने के बाद सऊदी अरब को समझ आ गया कि सिर्फ सैन्य ताकत से हूती को हराना संभव नहीं है। इसलिए 2022 के बाद उसने बातचीत का रास्ता अपनाया और सीधे हूती नेताओं से भी संपर्क शुरू किया। फिलहाल हूती विद्रोहियों का उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर अपना प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लिया था। वहीं दक्षिणी यमन पर अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का कंट्रोल है, लेकिन वह आर्थिक और सैन्य मदद के लिए काफी हद तक सऊदी अरब पर निर्भर है। आज भी यमन के कई अहम मामलों में सऊदी अरब का प्रभाव बना हुआ है। गाजा जंग की वजह से शांति प्रक्रिया पटरी से उतरी 2022 में युद्धविराम लागू होने के बाद पहली बार लगा कि यमन में शांति लौट सकती है। संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में सऊदी अरब और हूतियों के बीच समझौते की बातचीत आगे बढ़ी। दोनों पक्ष ऐसे फॉर्मूले पर काम कर रहे थे, जिससे वर्षों से चला आ रहा युद्ध खत्म हो सके। इस बातचीत में सबसे बड़ा विवाद यमन के तेल के पैसों को लेकर था। हूती चाहते थे कि तेल से होने वाली कमाई का हिस्सा उनके नियंत्रण वाले इलाकों में सरकारी कर्मचारियों के वेतन पर भी खर्च किया जाए। सऊदी अरब भी इस पर बातचीत कर रहा था और समझौता लगभग तय माना जा रहा था। लेकिन अक्टूबर 2023 में हमास ने इजराइल पर हमला कर दिया। इसके बाद गाजा युद्ध शुरू हुआ और हूतियों ने फिलिस्तीन के समर्थन में इजराइल और रेड सी से गुजरने वाले जहाजों पर मिसाइल व ड्रोन हमले शुरू कर दिए। यहीं से यमन की शांति प्रक्रिया फिर पटरी से उतर गई। सऊदी अरब और उसके सहयोगियों का कहना था कि हूतियों की इन कार्रवाइयों ने युद्धविराम की भावना को खत्म कर दिया। वहीं हूतियों का तर्क था कि उनका समझौता सिर्फ सऊदी अरब के साथ था, इसलिए शांति वार्ता जारी रहनी चाहिए। हूती ने सऊदी पर वादे पूरे नहीं करने का आरोप लगाया गाजा युद्ध के दौरान हूतियों ने सऊदी अरब पर सीधे हमले नहीं किए। लेकिन उन्होंने रेड सी से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। इससे दुनिया के कई देशों का समुद्री व्यापार प्रभावित हुआ। इसके बाद 2025 में राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने हूतियों को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया और उनके खिलाफ बड़े पैमाने पर हवाई हमले शुरू कर दिए। यमन मामलों के विशेषज्ञ फारिया अल-मुस्लिमी का कहना है कि इस फैसले से हूतियों के कब्जे वाले इलाकों की पहले से खराब अर्थव्यवस्था और बिगड़ गई। इससे वहां रहने वाले लोगों में नाराजगी भी बढ़ने लगी। न्यूयॉर्क टाइम्स से बातचीत में हूती नेता मोहम्मद अल-बुखैती ने मौजूदा तनाव के लिए सऊदी अरब को जिम्मेदार ठहराया। उनका आरोप है कि सऊदी अरब ने शांति वार्ता के दौरान किए गए वादे पूरे नहीं किए। खासकर हूती नियंत्रित इलाकों के सरकारी कर्मचारियों की रुकी हुई तनख्वाह बहाल नहीं की गई। हालांकि सऊदी अरब ने इन आरोपों से इनकार किया है। यमन में सऊदी राजदूत मोहम्मद अल-जाबेर ने कहा कि उनका देश तनाव कम करना चाहता है और यमन में स्थायी शांति का समर्थन करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि हूती लगातार हिंसा का रास्ता चुन रहे हैं और बाहरी ताकतों के हितों के लिए काम कर रहे हैं, जिसका नुकसान यमन की जनता को उठाना पड़ रहा है।

