वर्ल्ड अपडेट्स:अमेरिका के 25 राज्य ट्रम्प के टैरिफ के खिलाफ कोर्ट पहुंचे, फोर्स्ड लेबर के नाम पर लगाया शुल्क अवैध

अमेरिका के 25 डेमोक्रेटिक पार्टी शासित राज्यों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नए टैरिफ फैसले को अदालत में चुनौती दी है। राज्यों ने अमेरिकी कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में याचिका दाखिल कर इन टैरिफ को अवैध घोषित करने की मांग की है। फैसले के तहत ट्रम्प ने 60 अर्थव्यवस्थाओं पर नए टैरिफ लगाए गए हैं। ये 60 देश अमेरिकी आयात का 99.4 फीसदी हिस्सा हैं। याचिका में कहा गया है कि इस कदम से देश में महंगाई बढ़ जाएगी। पिछले महीने अमेरिका ने जबरन मजदूरी (फोर्स्ड लेबर) के मुद्दे पर 60 देशों पर 10 फीसदी से 12.5 फीसदी के बीच नए टैरिफ लगाए थे। भारत समेत 17 देशों पर 10 फीसदी की दर से टैरिफ लगाया गया है। डेमोक्रेटिक राज्यों का तर्क है कि प्रशासन ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 का गलत इस्तेमाल कर रहा है। अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स का कहना है कि अमेरिकी संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के पास किसी भी देश पर मनमाने ढंग से टैरिफ लगाने की शक्ति नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें… इथियोपिया में भूस्खलन से 14 की मौत, पवित्र जल लेने थे पहुंचे थे लोग इथियोपिया के अम्हारा इलाके में भारी बारिश के कारण सोमवार को हुए भूस्खलन में 14 लोगों की मौत हो गई और 7 अन्य घायल हो गए। कई लोग अभी भी लापता हैं। यह भूस्खलन त्सदकाने डेब्रे मिटमाक सेंट मैरी मठ में हुआ, जहां सैकड़ों श्रद्धालु पवित्र जल से शुद्धि की रस्म के लिए जमा हुए थे। डायोसिस के जनरल मैनेजर मेगाबे हादिस नेका तिबेब अबाबू ने एसोसिएटेड प्रेस को बताया- “मरने वालों में से कई लोग पवित्र जल लेने के लिए जमा हुए थे। मरने वालों में से 11 लोगों को मठ में ही दफना दिया गया है, जबकि बाकी लोगों के शव उनके घर दिए गए हैं।”

वर्ल्ड अपडेट्स:अमेरिका के 25 राज्य ट्रम्प के टैरिफ के खिलाफ कोर्ट पहुंचे, दावा- फोर्स्ड लेबर के नाम पर लगाया शुल्क अवैध

अमेरिका के 25 डेमोक्रेटिक पार्टी शासित राज्यों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नए टैरिफ फैसले को अदालत में चुनौती दी है। राज्यों ने अमेरिकी कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में याचिका दाखिल कर इन टैरिफ को अवैध घोषित करने की मांग की है। फैसले के तहत ट्रम्प ने 60 अर्थव्यवस्थाओं पर नए टैरिफ लगाए गए हैं। ये 60 देश अमेरिकी आयात का 99.4 फीसदी हिस्सा हैं। याचिका में कहा गया है कि इस कदम से देश में महंगाई बढ़ जाएगी। पिछले महीने अमेरिका ने जबरन मजदूरी (फोर्स्ड लेबर) के मुद्दे पर 60 देशों पर 10 फीसदी से 12.5 फीसदी के बीच नए टैरिफ लगाए थे। भारत समेत 17 देशों पर 10 फीसदी की दर से टैरिफ लगाया गया है। डेमोक्रेटिक राज्यों का तर्क है कि प्रशासन ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 का गलत इस्तेमाल कर रहा है। अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स का कहना है कि अमेरिकी संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के पास किसी भी देश पर मनमाने ढंग से टैरिफ लगाने की शक्ति नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें… इथियोपिया में भूस्खलन से 14 की मौत, पवित्र जल लेने थे पहुंचे थे लोग इथियोपिया के अम्हारा इलाके में भारी बारिश के कारण सोमवार को हुए भूस्खलन में 14 लोगों की मौत हो गई और 7 अन्य घायल हो गए। कई लोग अभी भी लापता हैं। यह भूस्खलन त्सदकाने डेब्रे मिटमाक सेंट मैरी मठ में हुआ, जहां सैकड़ों श्रद्धालु पवित्र जल से शुद्धि की रस्म के लिए जमा हुए थे। डायोसिस के जनरल मैनेजर मेगाबे हादिस नेका तिबेब अबाबू ने एसोसिएटेड प्रेस को बताया- “मरने वालों में से कई लोग पवित्र जल लेने के लिए जमा हुए थे। मरने वालों में से 11 लोगों को मठ में ही दफना दिया गया है, जबकि बाकी लोगों के शव उनके घर दिए गए हैं।”

कनाडा के गुरुद्वारे में गोलक को लेकर झड़प, VIDEO:हिसाब-किताब की मीटिंग में 2 गुट भिड़े, प्रधान ने मेंबर को थप्पड़ मारा, बरछा उठाया

कनाडा के गुरुद्वारे में गोलक के हिसाब को लेकर 2 गुट आपस में भिड़ गए। जिस वक्त ये घटना हुई, गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की मीटिंग चल रही थी। इस दौरान गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान एक मेंबर की तरफ बरछा (भाला) ताने हुए नजर आए। मेहर सिंह गुट के लोगों ने आरोप लगाया कि प्रधान ने हमला करने की कोशिश की। इसके बाद दोनों गुटों में भिड़ंत हो गई। उन्होंने एक-दूसरे से धक्कामुक्की की और वहां जमकर हंगामा हो गया। इस झगड़े का CCTV फुटेज सामने आया है। जिसे 2 अगस्त को ‘जट्ट वी लाइक कनाडा’ नाम के इंस्टाग्राम पेज पर शेयर किया गया। इसी पेज पर प्रधान का एक कथित ऑडियो भी पोस्ट किया गया, जिसमें उन पर लड़कियों को फोन करने के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, दैनिक भास्कर इस ऑडियो की पुष्टि नहीं करता। 5 पॉइंट में जानें, CCTV में क्या दिख रहा… प्रधान पर क्या आरोप हैं?
गुरुद्वारे के प्रधान सुरजीत सिंह पंजाब के अमृतसर जिले के चिट्टा गांव के रहने वाले हैं। वह पिछले करीब 10 साल से गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी से जुड़े हैं। आरोप है कि गोलक का हिसाब मांगने पर उन्होंने गुस्से में हमला करने की कोशिश की। पुलिस की ओर से आधिकारिक जानकारी नहीं
खबर लिखे जाने तक मॉन्ट्रियाल पुलिस की ओर से इस मामले में किसी शिकायत, केस दर्ज होने या कार्रवाई की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। घटना का CCTV सोशल मीडिया पर वायरल है। घटना के बाद संगत में नाराजगी
वीडियो सामने आने के बाद कनाडा में सिख संगत और भारतीय समुदाय में नाराजगी है। श्रद्धालुओं ने धार्मिक स्थल पर हिंसा और हथियार निकालने को गुरु घर की मर्यादा के खिलाफ बताया। संगत ने गोलक के पैसों की निष्पक्ष जांच, प्रधान को पद से हटाने और नए प्रबंधक की नियुक्ति की मांग की है। ************** ये खबर भी पढ़ें…
अमेरिकी पुलिस गुरुद्वारे में जूते पहनकर घुसी, VIDEO:सिर भी नंगा; गोलक को लेकर हुआ था झगड़ा अमेरिका की पुलिस एक गुरुद्वारे में जूते पहनकर ही अंदर घुस गई। जिस जगह पुलिस वाले खड़े थे, वहीं पर श्री गुरू ग्रंथ साहिब का पवित्र स्वरूप भी रखा हुआ था। इसका वीडियो सामने आते ही पंजाब में सिख संगठनों में गुस्सा है। उन्होंने इसे मर्यादा के उलट बताया है। पुलिस यहां गोलक को लेकर हुए विवाद के बाद आई थी (पढ़ें पूरी खबर)

लश्कर-ए-तयैबा का आतंकी बोला- हमारे 30 लोग मारे गए:भारतीय खुफिया एजेंसियों ने एजेंट भेजकर हत्या कराई

इस्लामाबाद में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े आतंकी रिजवान हनीफ ने दावा किया है कि पिछले तीन-चार साल में उनके संगठन के 30 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। उसके मुताबिक ये हमले पेशावर, कराची, रावलपिंडी, रावलकोट और मुजफ्फराबाद में अज्ञात हमलावरों ने किए। उसने आरोप लगाया कि ये हमलावर भारतीय एजेंट थे। इससे जुड़ा एक वीडियो सामने आया है। इसमें हनीफ कहता है, हमारे लोगों को भारतीय खुफिया एजेंसियों ने आजाद कश्मीर में अमन और चेन से नहीं रहने दिया। अपने एजेंट्स के जरिए उन्होंने हमारे लोगो को शहीद किया। पाकिस्तान पहले भी भारत पर ऐसे आरोप लगा चुका पाकिस्तान इससे पहले भी अपनी सरजमीं पर आतंकियों की हत्याओं के लिए भारत पर आरोप लगाता रहा है। जनवरी 2024 में तत्कालीन विदेश सचिव मुहम्मद साइरस सज्जाद काजी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा किया था कि भारतीय एजेंसियां पाकिस्तान में सीमा पार टारगेट किलिंग की घटनाओं में शामिल हैं। भारत ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था। इसके कुछ महीने बाद, अप्रैल 2024 में ब्रिटिश अखबार द गार्डियन ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि 2020 के बाद पाकिस्तान में करीब 20 आतंकियों और उग्रवादियों की अज्ञात हमलावरों ने हत्या की। इनमें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों से जुड़े कई लोगों के नाम भी शामिल बताए गए थे। रिपोर्ट में पाकिस्तानी अधिकारियों और कथित खुफिया सूत्रों के हवाले से इन घटनाओं के पीछे भारतीय एजेंसियों की भूमिका होने का दावा किया गया था। हालांकि भारत के विदेश मंत्रालय ने द गार्डियन की रिपोर्ट को भी खारिज कर दिया था। मंत्रालय ने इसे झूठा और दुर्भावनापूर्ण भारत-विरोधी प्रचार बताया था। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी कहा था कि दूसरे देशों में टारगेट किलिंग करना भारत सरकार की नीति नहीं है। 40 साल पहले हुआ लश्कर ए तैयबा का गठन लश्कर-ए-तैयबा की स्थापना 1987 में पाकिस्तान में हुई थी। यह संगठन सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान बने जिहादी नेटवर्क से निकला था। ओसामा बिन लादेन के मेंटर माने जाने वाले अब्दुल्ला अज्जाम और उसके दो साथियों ने मिलकर मरकज-अद-दावा-वल-इरशाद नाम के धार्मिक संगठन की स्थापना की। मरकज-अद-दावा-वल-इरशाद संगठन का सशस्त्र (मिलिटेंट) विंग बाद में लश्कर-ए-तैयबा कहलाया। अरबी में इसका अर्थ है पवित्र लोगों की सेना। शुरुआती दौर में संगठन के लड़ाके अफगानिस्तान में सोवियत सेना के खिलाफ लड़ने के लिए भेजे जाते थे। 1989 में सोवियत सेना की वापसी के बाद संगठन का फोकस जम्मू-कश्मीर पर आ गया। इसी साल पेशावर में एक बम धमाके में अब्दुल्लाह अज्जाम की मौत हो गई। इसके बाद हाफिज सईद ने इस संगठन की कमान संभाल ली। भारत, अमेरिका और कई पश्चिमी देशों का आरोप रहा है कि लश्कर-ए-तैयबा को लंबे समय तक पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI का समर्थन मिलता रहा। पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर इन आरोपों से इनकार करता है।

येन को 40 साल के निचले स्तर से उबारेगा अमेरिका:15 साल बाद जापानी येन खरीदा, ट्रम्प बोले- कमजोर मुद्रा को सहारा देना दुनिया के लिए बेहतर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बताया कि अमेरिका ने एक दशक में पहली बार जापानी येन खरीदा है। येन को डॉलर के मुकाबले उसके 40 साल के सबसे निचले स्तर से उबारने के लिए ऐसा किया गया है। ट्रम्प ने कहा, “उनकी करेंसी कमजोर हो रही थी और वे थोड़ी मदद चाहते थे।” 10 सवाल-जवाब में जानें पूरी डिटेल्स… सवाल 1: जापान और अमेरिका ने हाल ही में बाजार में क्या और क्यों कदम उठाया है? जवाब: पिछले हफ्ते जापानी मुद्रा ‘येन’ डॉलर के मुकाबले 164 के स्तर पर पहुंच गई थी, जो पिछले 40 सालों का सबसे निचला स्तर है। इस तेज गिरावट को नियंत्रित करने के लिए जापान और अमेरिका ने मिलकर फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में हस्तक्षेप किया। इस हस्तक्षेप का मुख्य उद्देश्य येन की अत्यधिक अस्थिरता को रोकना और करेंसी स्पेक्युलेटर्स को नियंत्रित करना था। यह पिछले 15 सालों में यानी साल 2011 के बाद पहला मौका है जब जापान और अमेरिका ने करेंसी मार्केट में एक साथ मिलकर कदम उठाया है। इससे पहले 2011 में पूर्वी जापान में आए भूकंप और सुनामी के बाद दोनों देशों ने येन को कमजोर करने के लिए समन्वित कार्रवाई की थी। इस बार उद्देश्य येन को और अधिक गिरने से बचाना है। सवाल 2: इस हस्तक्षेप में दोनों देशों ने कितनी रकम का इस्तेमाल किया है? उत्तर: बैंक ऑफ जापान के आंकड़ों के अनुसार, टोक्यो ने शुक्रवार के आधिकारिक संयुक्त हस्तक्षेप से ठीक पहले, गुरुवार को न्यूयॉर्क बाजार में येन खरीदने के लिए लगभग 59 अरब डॉलर बेचे थे। अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर अपनी खरीदी की राशि का खुलासा नहीं किया है, लेकिन कैबिनेट बैठक के दौरान अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट की नोटबुक की तस्वीर से संकेत मिला है, जिस पर लिखा था: “To Do: Buy Japanese Yen $5-10 bil” यानी 5 से 10 अरब डॉलर का येन खरीदना। सवाल 3: इस संयुक्त कार्रवाई पर अमेरिका और जापान के अधिकारियों का क्या कहना है? जवाब: जापान का वित्त मंत्रालय: इस संयुक्त कार्रवाई से हाल के महीनों में येन में आई अत्यधिक अस्थिरता और अनियंत्रित चाल को रोकने में सफल रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी: स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि इस समन्वित कार्रवाई ने येन की अनियंत्रित चाल को नियंत्रित किया है। अमेरिका, येन के भारी अवमूल्यन को ठीक करने के लिए जापान के मौद्रिक और बाजार कदमों का पुरजोर समर्थन करता है। अमेरिकी राष्ट्रपति: रविवार को संवाददाताओं से बात करते हुए ट्रम्प ने कहा, “जापानी मुद्रा कमजोर हो रही थी और वे थोड़ी मदद चाहते थे। हम जापान की मदद के लिए हमेशा तैयार हैं।” सवाल 4: अमेरिका को जापान की मदद करने से क्या फायदा है? जवाब: ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स में जापान इकोनॉमिक्स के प्रमुख शिगेतो नागाई ने बताया कि अमेरिका इस समन्वित हस्तक्षेप में शामिल होने के लिए इसलिए सहमत हुआ क्योंकि यह उसके अपने राष्ट्रीय हित में है। यदि येन और जापानी सरकारी बॉन्ड्स में बिकवाली जारी रहती, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता और वॉशिंगटन के लिए भी कर्ज लेने की लागत बढ़ सकती थी। सवाल 5: इस हस्तक्षेप का करेंसी मार्केट पर तुरंत क्या असर देखने को मिला? उत्तर: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टिप्पणियों के बाद डॉलर 0.2% गिरकर 157.07 येन पर आ गया, जो पिछले महीने के 164 के रिकॉर्ड निचले स्तर से काफी बेहतर स्थिति है। सवाल 6: आगे क्या उम्मीद है? क्या दोनों देश भविष्य में भी ऐसा हस्तक्षेप करेंगे? जवाब: विशेषज्ञ शिगेतो नागाई के अनुसार, दोनों देश आगे भी समय-समय पर रुक-रुक कर और समन्वित तरीके से हस्तक्षेप जारी रख सकते हैं। जापान के वित्त मंत्रालय और अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी दोनों ने स्पष्ट किया है कि जरूरत पड़ने पर वे दोबारा कदम उठाने से नहीं हिचकेंगे। सवाल 7: जापानी येन 40 साल के निचले स्तर पर क्यों पहुंचा? इसके पीछे क्या कारण हैं? जवाब: 1990 के दशक की मंदी के बाद से जापान ने अपनी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए लंबे समय तक अपनी ब्याज दरों को शून्य या नकारात्मक बनाए रखा था। 2024 में जापान ने ब्याज दरें बढ़ाईं जरूर, लेकिन फिर भी ये दुनिया के मुकाबले काफी कम रहीं। कम ब्याज दरों के कारण अंतरराष्ट्रीय निवेशकों ने येन में कर्ज लेकर उसे ज्यादा रिटर्न देने वाली करेंसी में लगाया। इसके अलावा जापानी कंपनियों का भारी विदेशी निवेश और उनकी विदेशी कमाई का विदेशों में ही बने रहना भी येन पर भारी पड़ा। इसने येन को 40 साल के निचले स्तर पर पहुंचा दिया था। सवाल 8: क्या अमेरिका-ईरान जंग का असर भी येन की गिरावट पर पड़ा? जवाब: हां। ईरान जंग ने येन की गिरावट को और तेज कर दिया। केइओ यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सायुरी शिराई के अनुसार, पूरी तरह ऊर्जा आयात पर निर्भर रहने के कारण तेल-गैस की बढ़ती कीमतों ने जापान के व्यापार संतुलन को बिगाड़ा। इससे महंगाई बढ़ी और येन की रिकवरी रुक गई। सवाल 9: मजबूत डॉलर और कमजोर येन से दोनों देशों को क्या फायदा-नुकसान हो रहा था? जवाब: अमेरिका के लिए: मजबूत डॉलर अमेरिकी एक्सपोर्ट को विदेशी उपभोक्ताओं के लिए महंगा बना देता है। इसका नुकसान अमेरिकी कंपनियों को होता है। जापान के लिए: कमजोर येन से जापानी एक्सपोर्टर्स और पर्यटकों को फायदा जरूर होता है, लेकिन जरूरी सामान का आयात महंगा हो जाता है, जिससे देश में महंगाई बढ़ती है। सवाल 10: क्या इस खरीदारी से येन की स्थिति में स्थायी सुधार आ सकता है? जवाब: बैंक ऑफ अमेरिका सिक्योरिटीज के शुसुके यामादा का मानना है कि करेंसी मार्केट में ऐसी खरीदारी से केवल कुछ समय के लिए ही राहत मिलती है। वहीं बार्कलेज बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साझा कदम का असर शुरुआती दिनों में तो दिखेगा, लेकिन लंबी अवधि में येन पर नीचे जाने का दबाव बना रह सकता है।

दुनिया के तीसरे सबसे छोटे देश ने अपना नाम बदला:अब ‘नौरू’ नहीं ‘नाओएरो’ कहलाएगा; UN रिकॉर्ड्स में आज से नया नाम लागू

प्रशांत महासागर में बसे दुनिया के तीसरे सबसे छोटे देश नौरू ने ऐसा ही एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। अब यह देश आधिकारिक तौर पर ‘रिपब्लिक ऑफ नाओएरो’ कहलाएगा। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी अपने रिकॉर्ड में नया नाम लागू कर दिया है। करीब 12 हजार आबादी वाले इस द्वीपीय देश का कहना है कि ‘नाओएरो’ उसका असली नाम है, जबकि ‘नौरू’ विदेशी लोगों की सुविधा के लिए प्रचलन में आया था। अब सरकार का मानना है कि समय आ गया है कि देश दुनिया के सामने अपनी मूल पहचान के साथ जाना जाए। नाम बदलने का यह फैसला सिर्फ औपचारिकता नहीं है। सरकार इसे अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास को सम्मान देने की पहल मान रही है। इसी सोच के तहत देश ने दशकों पुराना नाम छोड़कर अपनी पारंपरिक पहचान को आधिकारिक रूप से वापस अपना लिया है। आखिर नाम बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? नाओएरो सरकार का कहना है कि ‘नौरू’ उसकी पसंद नहीं, बल्कि विदेशियों की सुविधा का नाम था। असली नाम हमेशा ‘नाओएरो’ ही रहा, लेकिन इसका उच्चारण आसान नहीं होने की वजह से दुनिया ने धीरे-धीरे उसे ‘नौरू’ कहना शुरू कर दिया। समय के साथ यही नाम आधिकारिक पहचान भी बन गया। राष्ट्रपति डेविड एडियांग ने जनवरी में संसद में प्रस्ताव रखते हुए कहा कि अब वक्त आ गया है कि देश दुनिया के सामने उसी नाम से जाना जाए, जिसे उसके अपने लोग पीढ़ियों से बोलते आए हैं। उनके मुताबिक, यह सिर्फ नाम बदलने का फैसला नहीं, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास को उसकी वास्तविक पहचान लौटाने की कोशिश है। शादी में विवाद के बाद 10 साल तक गृहयुद्ध चला 19वीं सदी के आखिर तक नाउरू एक छोटा-सा द्वीप था, जहां 12 स्थानीय जनजातियां रहती थीं। यहां कोई आधुनिक सरकार या सेना नहीं थी। लोगों का जीवन मछली पकड़ने, नारियल की खेती और समुद्र से मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर था। 1870 के दशक में यूरोपीय व्यापारी नाउरू पहुंचने लगे। वे यहां नारियल और दूसरे सामान का व्यापार करते थे। बदले में उन्होंने स्थानीय लोगों को शराब और बंदूकें बेचना शुरू कर दिया। इससे द्वीप का सामाजिक संतुलन बिगड़ने लगा। 1878 में एक शादी समारोह के दौरान रीति-रिवाज को लेकर बहस हुई। बहस के बीच एक व्यक्ति ने पिस्तौल निकालकर गोली चला दी, जिससे एक कबीलाई प्रमुख के बेटे की मौत हो गई। नाउरू की पारंपरिक संस्कृति में ऐसी हत्या का बदला लेना सामाजिक जिम्मेदारी माना जाता था। यहीं से बदले का सिलसिला शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे पूरे द्वीप के 12 कबीलों के बीच गृहयुद्ध में बदल गया। यह संघर्ष करीब 10 साल तक चला, जिसे नाउरू सिविल वॉर के नाम से जाना जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग मारे गए, कई गांव उजड़ गए और लगभग हर परिवार किसी न किसी रूप में इस हिंसा से प्रभावित हुआ। हालात इतने खराब हो गए कि आखिरकार 1888 में जर्मनी ने हस्तक्षेप कर द्वीप पर नियंत्रण स्थापित किया, हथियार जब्त किए और इस लंबे खूनी संघर्ष को समाप्त कराया। जर्मनी के बाद ऑस्ट्रेलिया ने नौरू पर कब्जा किया 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होते ही हालात बदल गए। ऑस्ट्रेलियाई सेना ने बिना ज्यादा प्रतिरोध के नाओएरो पर कब्जा कर लिया। युद्ध खत्म होने के बाद जर्मनी हार गया और उसे अपने कई विदेशी उपनिवेश छोड़ने पड़े। करीब पांच दशक तक विदेशी सरकार के कब्जे में रहने के बाद नाओएरो को 31 जनवरी 1968 को पूर्ण स्वतंत्रता मिली और यह एक संप्रभु गणराज्य बन गया। फॉस्फेट से बदली किस्मत, उसी वजह से कंगाल हुआ 1900 में ऑस्ट्रेलियाई भूवैज्ञानिक अल्बर्ट फुलर एलिस ने नाओएरो में फॉस्फेट के विशाल भंडार की खोज की। इसके छह साल बाद व्यावसायिक खनन शुरू हुआ। उस समय फॉस्फेट की दुनिया भर में जबरदस्त मांग थी, क्योंकि इसका इस्तेमाल खेती में खाद बनाने के लिए होता था। देखते ही देखते यह छोटा-सा द्वीप दुनिया के सबसे बड़े फॉस्फेट निर्यातकों में शामिल हो गया। 1968 में आजादी मिलने के बाद नाओएरो सरकार ने धीरे-धीरे फॉस्फेट उद्योग पर अपना नियंत्रण हासिल कर लिया। 1970 के दशक तक फॉस्फेट से होने वाली कमाई इतनी बढ़ गई कि यह दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाने लगा। प्रति व्यक्ति आय कई विकसित देशों के बराबर पहुंच गई। सरकार के पास इतना पैसा था कि शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी कई सुविधाएं लोगों को लगभग मुफ्त मिलने लगीं। देश ने विदेशों में होटल, इमारतें और दूसरी संपत्तियां खरीदकर भी निवेश किया। लेकिन यह समृद्धि ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। लगातार खनन की वजह से फॉस्फेट के भंडार तेजी से खत्म होने लगे। आय का सबसे बड़ा स्रोत सूख गया और विदेशों में किए गए कई निवेश भी घाटे में चले गए। 1990 के दशक तक नाओएरो गंभीर आर्थिक संकट में फंस गया। जिस फॉस्फेट ने कभी इस छोटे से द्वीप को दुनिया के सबसे अमीर देशों की सूची में पहुंचाया था, उसी के खत्म होने के बाद देश आर्थिक तंगी से जूझने लगा। आज भी देश उस दौर के असर से पूरी तरह उबर नहीं पाया है। अब जलवायु परिवर्तन से अस्तित्व पर खतरा आर्थिक चुनौतियों के बीच अब नाओएरो के सामने सबसे बड़ा संकट जलवायु परिवर्तन है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर इस द्वीपीय देश के लिए लगातार खतरा बनता जा रहा है। कई वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि अगर यही स्थिति रही तो आने वाले दशकों में देश के कई हिस्से रहने लायक नहीं बचेंगे। 1993 के बाद से नाओएरो के आसपास समुद्र का जलस्तर हर साल औसतन करीब 5 मिलीमीटर बढ़ रहा है, जो वैश्विक औसत से ज्यादा है। अगर यही रफ्तार बनी रही तो इस सदी के अंत तक समुद्र का स्तर 20 से 57 सेंटीमीटर तक और बढ़ सकता है। समस्या सिर्फ समुद्र के बढ़ने की नहीं है। नाओएरो के पास लोगों को बसाने के लिए सुरक्षित जमीन भी बहुत कम बची है। दशकों तक फॉस्फेट खनन की वजह से द्वीप का करीब 80% अंदरूनी हिस्सा बंजर हो चुका है। ऐसे में आबादी का बड़ा हिस्सा समुद्र किनारे रहने को मजबूर है, जहां हर साल तटीय कटाव और ऊंची लहरों का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसी खतरे से निपटने के लिए सरकार ने विदेशी नागरिकों को निवेश के बदले नागरिकता देने की योजना शुरू की है। इससे मिलने वाली रकम का इस्तेमाल लोगों और जरूरी बुनियादी ढांचे को सुरक्षित ऊंचे इलाकों में बसाने और जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर किया जाएगा। चार साल पहले तुर्किये ने भी नाम बदला था नाओएरो का फैसला दुनिया में बढ़ रहे उस चलन का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें देश अपनी स्थानीय भाषा और ऐतिहासिक पहचान को फिर से प्रमुखता दे रहे हैं। इससे पहले 2018 में अफ्रीकी देश स्वाजीलैंड ने अपना नाम बदलकर इस्वातिनी कर लिया था। वहीं 2022 में तुर्की ने संयुक्त राष्ट्र से अनुरोध कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना आधिकारिक नाम तुर्किये करवा लिया था। नाओएरो का मानना है कि किसी देश की पहचान केवल उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी भाषा, संस्कृति और इतिहास से भी तय होती है। इसी सोच के साथ उसने दुनिया के सामने अपनी मूल पहचान को आधिकारिक रूप से वापस स्थापित करने का फैसला किया है।

वर्ल्ड अपडेट्स:5 साल बाद पहली बार दिखीं म्यांमार की पूर्व नेता आंग सान सू ची; रेड क्रॉस प्रतिनिधि से मुलाकात की

म्यांमार की पूर्व नेता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची करीब पांच साल बाद पहली बार नजर आई हैं। सैन्य सरकार ने सोमवार को आंग सान सू ची की कुछ तस्वीरें जारी कीं, जिनमें वह इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस (ICRC) के म्यांमार प्रतिनिधि अर्नो डे बैक से मुलाकात करती दिखाई दे रही हैं। 2021 में सैन्य तख्तापलट के बाद से यह उनका बाहरी दुनिया के साथ सबसे दुर्लभ सार्वजनिक संपर्क माना जा रहा है। सरकार ने बताया कि यह मुलाकात सोमवार सुबह हुई, लेकिन यह नहीं बताया कि बैठक कहां हुई और किन मुद्दों पर चर्चा हुई। जारी तस्वीरों में सू ची अपने 81वें जन्मदिन का केक काटती भी नजर आईं। तस्वीरों में वह मुस्कुराती और सामान्य दिख रही हैं, हालांकि उनकी सेहत को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है। आंग सान सू ची को फरवरी 2021 में सेना द्वारा सत्ता पर कब्जा करने के बाद हिरासत में लिया गया था। तब से उन्हें सार्वजनिक रूप से बहुत कम देखा गया है और बाहरी दुनिया से उनका संपर्क भी बेहद सीमित रहा है। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें… मिस्र के तट पर 5.4 तीव्रता का भूकंप; इजराइल तक महसूस हुए झटके मिस्र के तट के पास सोमवार तड़के 5.4 तीव्रता का भूकंप आया। जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जियोसाइंसेज (GFZ) के मुताबिक, भूकंप का केंद्र जमीन से करीब 10 किलोमीटर की गहराई में था। वहीं, मिस्र के नेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोनॉमी एंड जियोफिजिक्स (NRIAG) ने इसकी तीव्रता 5.6 दर्ज की और बताया कि इसका केंद्र स्वेज शहर से करीब 38 किलोमीटर उत्तर में था। अलग-अलग एजेंसियों द्वारा तीव्रता में मामूली अंतर अलग मापन प्रणालियों की वजह से होता है। भूकंप के झटके काहिरा और उत्तरी मिस्र के कई इलाकों में महसूस किए गए। एहतियात के तौर पर कई लोग घरों और इमारतों से बाहर निकल आए। दक्षिणी इजराइल में भी कंपन महसूस होने की खबर है। भूकंप के बाद मिस्र रेड क्रिसेंट ने प्रभावित इलाकों में आपातकालीन प्रतिक्रिया योजना लागू कर दी। संगठन ने लोगों से क्षतिग्रस्त इमारतों से दूर रहने और केवल सरकारी एजेंसियों की आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करने की अपील की है।

पंजाबी युवक ने 280 की स्पीड में दौड़ाई कार,VIDEO:कनाडा में 81 लाख की कार्वेट गाड़ी से स्टंट, टायरों से धुआं भी निकला

कनाडा के कैलगिरी में पंजाबी युवक की रैश ड्राइविंग का एक वीडियो सामने आया है। युवक ने 280 की स्पीड में अपनी कार्वेट कार को ट्रैफिक भरे रोड पर भगाया। वीडियो में कार का स्पीडोमीटर भी दिखाया गया है। युवक ने कार के टायरों से धुआं निकालने का एक अन्य वीडियो भी शेयर किया है। कनाडा के लोगों ने इस युवक का वीडियो एक्स (पूर्व ट्विटर) पर शेयर कर इसे डिपोर्ट करने और कार्रवाई करने की मांग की है। कार चला रहे युवक की पहचान जस सिंह के रूप में हुई है। युवक पंजाब में कहां का रहने वाला है, इसके बारे में पता नहीं लग पाया है। युवक ने इंस्टाग्राम पर अपने अकाउंट jas_singh_25 से 2 अगस्त को वीडियो अपलोड किया। वीडियो के साथ युवक ने अपने फोटो भी शेयर किए हैं। इसमें गोल्डन टेंपल में माथा टेकते दिख रहा है। फिल्हाल युवक के खिलाफ अभी कनाडा पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया है। बता दें कि कनाडा में इस तरह से रैश ड्राइविंग पर लाइसेंस रद्द हो सकता है। इसके साथ ही मामले की गंभीरता को देखते हुए जेल का भी प्रावधान है। अब पढ़िए वीडियों में क्या दिख रहा है… युवक को डिपोर्ट करने की उठी मांग
सोशल मीडिया यूजर्स ने जस सिंह को कनाडा में पढ़ाई का मौका मिलने के बावजूद कानून और जनसुरक्षा का अनादर करने का आरोप लगाया। कई पोस्ट में कहा गया कि इससे पहले कि कोई गंभीर दुर्घटना हो, उसे देश से बाहर भेज दिया जाए। अभी तक कैलगरी पुलिस या किसी आधिकारिक एजेंसी ने इस मामले में कोई बयान जारी नहीं किया है। इंटरनेशनल स्टूडेंट्स की बढ़ रही शिकायतों पर चिंता
कनाडा में इंटरनेशनल स्टूडेंट्स की संख्या बढ़ने के साथ कई शहरों में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन और खतरनाक ड्राइविंग की शिकायतें पहले भी सामने आ चुकी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी घटनाएं सड़क सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं। स्थानीय प्रशासन से इस वीडियो की जांच की मांग की जा रही है। रैश ड्राइविंग पर कनाडा में 2 साल जेल हो सकती है
कनाडा में खतरनाक ड्राइविंग (क्रिमिनल कोड धारा 320.13) गंभीर अपराध है। चोट और मौत न होने पर अधिकतम 10 साल की जेल या 2 साल से कम या जुर्माना दोनों हो सकते हैं। चोट लगने पर अधिकतम 14 साल जेल, मौत होने पर आजीवन कारावास तक सजा संभव है। पहले अपराध पर न्यूनतम 1000 डॉलर जुर्माना, दोहराए जाने पर जेल की अवधि बढ़ती है। लाइसेंस रद्द, आपराधिक रिकॉर्ड और गैर-नागरिकों के लिए डिपोर्टेशन भी हो सकता है।

‘मैं लोगों की जान नहीं लेना चाहता’, डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ कैंसिल किए ‘भीषण हमले’, ईरानी मीडिया ने कस दिया तंज

Donald Trump: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले का फैसला टाल दिया है। उन्होंने अपने इस निर्णय को लेकर कहा कि ने निर्दोषों की जान नहीं लेना चाहते हैं। युद्ध में लोगों की मौत होती है और वे ऐसा नहीं चाहते। उन्होंने दावा किया कि इस बाबत उन्होंने सऊदी अरब के किंग और क्र

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अमेरिका-ईरान में आज से फिर बातचीत शुरू होगी:ट्रम्प ने एलान किया; बोले- कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन लोगों को मारना नहीं चाहता

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि सोमवार से अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत शुरू होगी। एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि वार्ता मध्यस्थों के जरिए होगी। ट्रम्प ने कहा, “हम जब चाहें कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन मैं लोगों को मारना नहीं चाहता। अगर समझौता हो जाता है तो बहुत-सी जानें बच जाएंगी। देखते हैं बातचीत का क्या नतीजा निकलता है।” ट्रम्प के मुताबिक, सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ईरान के साथ हुई कूटनीतिक बातचीत के बाद उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित बड़ा हमला टाल दिया। उन्होंने दावा किया कि बातचीत में होर्मुज स्ट्रेट और ईरान के परमाणु कार्यक्रम जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होगी। हालांकि, ईरान ने ट्रम्प के कई दावों से इनकार किया है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अभी कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ है। पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… 1. ट्रम्प ने फिलहाल ईरान पर हमला टाला: ट्रम्प ने दावा किया कि ईरान और दूसरे पश्चिम एशियाई देशों की ओर से समझौते का प्रस्ताव मिलने के बाद अमेरिका ने फिलहाल ईरान पर प्रस्तावित हमला टाल दिया है। 2. ईरान की चेतावनी- हमला हुआ तो अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाएंगे: ईरानी सांसद इब्राहिम रेजाई ने कहा कि अगर अमेरिका ने हमला किया तो ईरान सिर्फ खाड़ी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि जहां-जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं, उन्हें निशाना बनाएगा। 3. ट्रम्प और सऊदी क्राउन प्रिंस ने तनाव कम करने पर की बात: ट्रम्प और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने फोन पर पश्चिम एशिया के हालात पर चर्चा की। दोनों नेताओं ने बातचीत और सीजफायर के जरिए तनाव कम करने पर जोर दिया। 4. अमेरिका के मिसाइल डिफेंस सिस्टम का स्टॉक तेजी से घटा: CSIS की रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार सैन्य अभियानों के कारण अमेरिका के पैट्रियट और THAAD इंटरसेप्टर मिसाइलों का भंडार तेजी से कम हुआ है। रिपोर्ट में इसे भविष्य के संभावित संघर्षों के लिए बड़ी चुनौती बताया गया है। 5. रूबियो बोले- होर्मुज स्ट्रेट का विकल्प तैयार करना होगा: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि दुनिया को तेल और गैस की सप्लाई के लिए सिर्फ होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। इसके लिए वैकल्पिक समुद्री मार्ग विकसित करने होंगे, हालांकि एक्सपर्ट्स इसे आसान नहीं मानते। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…