राजनीतिक लोगों को आगे करेंगे या..

कांग्रेस में अध्यक्ष और प्रभारी महासचिवों के खाली पदों पर नियुक्तियों की चर्चा के साथ ही कांग्रेस में इस बात की भी चर्चा है कि राहुल गांधी राजनीतिक लोगों को आगे करेंगे या गैर राजनीतिक लोगों पर ज्यादा भरोसा करेंगे? यह सवाल भी है कि अगर राजनीतिक लोगों को आगे करेंगे तो पुराने और अनुभवी लोगों को तरजीह देंगे या अपने प्रति निष्ठा रखने वाले ऐसे युवाओं को आगे करेंगे, जिनमें अनुभव की कमी है? गौरतलब है कि राहुल गांधी ने पिछले कुछ सालों में जो नियुक्तियां की हैं उनमें अराजनीतिक और कम अनुभव वाले लोगों को ज्यादा महत्व दिया है। राहुल के करीबियों का कहना है कि पार्टी में नई लीडरशिप पैदा करने के लिए ऐसा जरूरी है। लेकिन समस्या यह है कि ऐसे नेताओं के साथ प्रदेश कमेटी का तालमेल नहीं बैठता है या फिर सहयोगी दलों के साथ किसी न किसी तरह का विवाद हो जाता है। ऐसा न भी हो तो ये नेता अपने कामकाज से कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं।

जैसे बिहार में राहुल ने अपने करीबी कृष्णा अल्लावरू को राज्य का प्रभारी बनाया। लेकिन वे पिछले साल के चुनाव में बुरी तरह फेल हुए। वे प्रदेश के नेताओं को साथ लेकर नहीं चल सके, गुटबाजी नहीं रोक सके, राजद के साथ सीट बंटवारा नहीं करा सके उसके लिए अशोक गहलोत को जाना पड़ा और सीट बंटवारे में पैसे के लेन देन के आरोप लगे और अंततः पार्टी बुरी तरह से हारी। उसके बाद पिछले आठ महीने में वे सिर्फ एक बार बिहार गए हैं। ऐसे ही राहुल ने झारखंड में के राजू को प्रभारी बनाया। उनका प्रदेश की राजनीति में कोई मतलब नहीं बन पाया है। राहुल ने केशव महतो कमलेश को झारखंड का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। लेकिन वे कोई असर नहीं छोड़ पा रहे हैं। अपनी करीब मीनाक्षी नटराजन को राहुल गांधी ने तेलंगाना का प्रभारी बनाया है। हर्षवर्धन सपकाल को उन्होंने महाराष्ट्र का प्रदेश अध्यक्ष बनाया तो सबको हैरानी हुई। तभी यह सवाल पूछा जा रहा है कि वे ऐसे लोगों को नियुक्त करेंगे या कुछ अनुभवी नेताओं को भी मौका देंगे?

भाजपा ने क्या टाल दिया बदलाव?

भारतीय जनता पार्टी में अचानक संगठन के बदलाव की चर्चा थम गई है। सिर्फ संगठन ही नहीं, बल्कि सरकार में होने वाली फेरबदल की भी बात नहीं हो रही है। ध्यान रहे नितिन नबीन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बने पांच महीने हो गए हैं। लेकिन अभी तक उन्होंने अपनी टीम नहीं बनाई। जेपी नड्डा की टीम ही उनके साथ काम कर रही है। प्रदेशों में जहां कांग्रेस ने नए अध्यक्ष नियुक्त किए वहां तो फटाफट कमेटी का गठन हो गया। लेकिन केंद्रीय कमेटी का गठन नहीं हो पा रहा है। पार्टी के एक प्रभावी महासचिव तरुण चुघ को मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजा गया है। उसके बाद से उनके केंद्र में मंत्री बनने की चर्चा शुरू हो गई है, जबकि पंजाब में अगले साल चुनाव हैं, जहां के वे प्रभारी हैं।

भाजपा के एक और महासचिव विनोद तावड़े के बारे में भी केंद्र में मंत्री बनने की चर्चा है। जब नितिन नबीन राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे तब इस बात की चर्चा थी कि तरुण चुघ और तावड़े संगठन में ही रहेंगे। महासचिवों में से एक राधामोहन दास अग्रवाल को बदले जाने की चर्चा थी। साथ ही सुनील बंसल के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बनने की भी चर्चा थी। सरकार के कई लोगों को संगठन में लाने और नितिन नबीन की नई टीम बनाने की चर्चा थी। उत्तर प्रदेश से नया नेता राष्ट्रीय संगठन में लाना था। लेकिन सारी चर्चाएं अचानक थम गई हैं। 20 जून तक सरकार और संगठन दोनों में बदलाव हो जाने की खबर थी। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मंत्रिपरिषद की बैठक की थी और उसके बाद तीसरी सरकार के दो साल पूरे होने का जश्न भी हुआ। लेकिन अब बदलाव की चर्चा नहीं हो रही है। उसकी जगह अगले मानसून सत्र में होने वाले बड़े घटनाक्रम की चर्चा ज्यादा तेज हो गई है।

शरद पवार की मुश्किलें बढ़ीं

संसद के मानसून सत्र से पहले महाराष्ट्र के सबसे बड़े मराठा क्षत्रप शरद पवार की मुश्किलें बढ़ी हैं। उद्धव ठाकरे की शिव सेना में टूट की खबरों के बाद सबसे ज्यादा बेचैनी शरद पवार की एनसीपी में है। कांग्रेस, उद्धव और शरद पवार की पार्टियों के महाविकास अघाड़ी ने पिछले लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया था और राज्य की 48 में से 31 सीटें जीती थीं। लेकिन चार महीने बाद ही विधानसभा चुनाव में तीनों पार्टियां का बुरा हाल हो गया। अब उद्धव ठाकरे के नौ में से छह या सात सात सांसद एकनाथ शिंदे की शिव सेना में जा रहे हैं। इस बीच शरद पवार की एनसीपी के आठ सांसदों में से पांच या छह के टूटने की चर्चा शुरू हो गई है।

जानकार सूत्रों का कहना है कि शरद पवार की पार्टी के नेता उनके ऊपर दबाव डाल रहे हैं कि वे अपनी पार्टी का विलय सुनेत्रा पवार की एनसीपी के साथ कर दें। अगर ऐसा नहीं होता है तो कई सांसद और विधायक पाला बदल सकते हैं। उनकी पार्टी के सांसद मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के संपर्क में बताए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि अगर विलय हो जाता है तो शरद पवार खेमे के भी कुछ लोगों को महाराष्ट्र सरकार में जगह मिल जाएगी और उनकी बेटी सुप्रिया सुले को दिल्ली में मोदी सरकार में मंत्री बना दिया जाएगा। इस तरह परिवार के सभी सदस्यों की भूमिका स्पष्ट हो जाएगी। सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र में तो सुप्रिया दिल्ली में राजनीति करेंगी। पता नहीं सुनेत्रा पवार इस व्यवस्था में कितनी सहज होंगी। अपने बेटे पार्थ पवार को लेकर उनकी बड़ी योजना है और उनको यह भी लग रहा है कि उसके लिए परिवार का एकजुट होना जरूरी है। जो हो अभी शरद पवार की पार्टी पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं।

सपा सांसदों को लेकर संशय बढ़ा

समाजवादी पार्टी के सांसदों को लेकर संशय बढ़ गया है। सिर्फ इसलिए नहीं कि सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओमप्रकाश राजभर ने एक बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि पार्टी में टूट हो सकती है। वे कई पुराने घोटालों आदि की मिसाल दे रहे हैं और रामगोपाल यादव के अमित शाह से मिलने की चर्चा कर रहे हैं। हालांकि बाद में शिवपाल यादव ने कहा कि इन बातों में कोई दम नहीं है और सैफई परिवार एकजुट है। सैफई परिवार हो सकता है कि एकजुट हो लेकिन पूरी सपा तो सैफई परिवार नहीं है।

कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों के बाद उत्तर प्रदेश के भी अनेक सपा और कांग्रेस नेता संशय में हैं। उनको लग रहा है कि भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण हुआ तो अगला चुनाव मुश्किल होगा। कई नेताओं के बारे में खबर है कि वे विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं या परिवार से किसी को टिकट दिलाना चाहते हैं और मान रहे हैं कि भाजपा में जीतने के चांस ज्यादा हैं।

हालांकि अखिलेश यादव ने भी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की राजनीति का माहौल बनाया है। ऊपर से अभी राममंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले से भी भाजपा बैकफुट पर आई है। फिर भी कहा जा रहा है कि अगर पार्टी टूटती नहीं भी है तो भाजपा की योजना मानसून सत्र में परिसीमन बिल पर कुछ सांसदों को गैरहाजिर कराने की है। पिछली बार अलग अलग पार्टियों के एक दर्जन सांसद गैरहाजिर रहे थे। इस बार 20 सांसदों को गैरहाजिर कराने की योजना है, जिसमें ‘इंडिया’ ब्लॉक की तीन प्रादेशिक पार्टियों सपा, राजद और जेएमएम पर नजर है।

क्या टेलीग्राम पर पाबंदी से नीट परीक्षा सही होगी?

सरकार को तकनीकी, प्रशासनिक और कानूनी सुधारों के साथ आगे बढ़ना चाहिए ताकि नीट जैसी परीक्षाएं मेरिट का प्रतीक बनें, न कि विवाद का। छात्रों का भविष्य दांव पर है, ऐसे में आधी-अधूरी कोशिशें पर्याप्त नहीं हो सकती। पूर्ण सुधार से ही विश्वास बहाल होगा।

राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) और केंद्र सरकार द्वारा NEET-UG 2026 के पुनर्परीक्षा 21 जून से ठीक पहले ‘टेलीग्राम’ ऐप पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया है। मेडिकल की परीक्षा प्रक्रिया में बढ़ती डिजिटल धोखाधड़ी और पेपर लीक की समस्या को लेकर सरकार का यह कदम गंभीर चिंता का प्रतीक है। यह कदम सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत लिया गया है, जो सार्वजनिक व्यवस्था के हित में किया गया है। एनटीए के अनुसार, पेपर लीक का  गिरोह टेलीग्राम चैनलों का इस्तेमाल फर्जी पेपर बेचने, गलत सूचना फैलाने और अभ्यर्थियों को ठगने के लिए कर रहे थे। इसलिए सरकार को ऐसा कदम उठाना पड़ा।

यह प्रतिबंध 22 जून तक है, जो परीक्षा के दिन और उसके तुरंत बाद को कवर करता है। साथ ही, टेलीग्राम के मैसेज एडिटिंग फीचर को भी 30 जून तक अक्षम कर दिया गया है ताकि फर्जी सबूत न बनाए जा सकें। यह फैसला पिछले मई के पेपर लीक कांड के बाद आया है, जिसमें परीक्षा रद्द करनी पड़ी और इस मामले पर सीबीआई जांच चल रही है। सरकार ने परीक्षा पेपर की सुरक्षित डिलीवरी के लिए भारतीय वायुसेना की मदद ली है, जो सुरक्षा की दिशा में सकारात्मक कदम है।

परंतु यदि इस समस्या का विश्लेषण किया जाए तो लीक रोकने में यह कदम कितना प्रभावी साबित होगा? नीट जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में पेपर लीक एक पुरानी समस्या है, जो छात्रों के भविष्य और मेरिट को नष्ट करती है। वहीं ‘टेलीग्राम’ ऐप की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो अन्य ऐप में नहीं पाई जाती। मिसाल के तौर पर एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन, बड़े ग्रुप/चैनल, फाइल शेयरिंग, मैसेज एडिटिंग और अपेक्षाकृत कम मॉनिटरिंग। यह सभी विशेषताएँ इस ऐप को धोखेबाजों के लिए आकर्षक बनाती हैं। पिछले घटनाक्रमों में ऐसे चैनल फर्जी पेपर बेचते पाए गए, जिससे अभ्यर्थी लाखों रुपये गंवा बैठे और परीक्षा की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठे।

सरकार का यह कदम तात्कालिक रूप से लीक की संभावना को कम कर सकता है। प्रतिबंध के दौरान ऐसे चैनल एक्सेसिबल नहीं रहेंगे, जिससे रीयल-टाइम शेयरिंग रुक सकती है। लेकिन स्वतंत्र नजरिये से देखें तो यह पूरी तरह प्रभावी नहीं है। पेपर लीक मुख्य रूप से स्रोत (पेपर सेटर्स, प्रिंटिंग प्रेस, ट्रांसपोर्ट) से शुरू होता है, न कि सिर्फ सोशल मीडिया से। सोशल मीडिया तो केवल एक माध्यम है। टेलीग्राम बंद होने पर पेपर लीक गिरोह व्हाट्सएप, सिग्नल, एन्क्रिप्टेड ईमेल, डार्कवेब या यहां तक कि ऑफलाइन नेटवर्क (USB, हार्ड ड्राइव) का सहारा भी ले सकते हैं। टेलीग्राम सीईओ पावेल दुरोव ने भी कहा है कि ऐसा करने से समस्या जड़ से नहीं सुलझेगी, बल्कि अन्य प्लेटफॉर्म्स पर शिफ्ट हो जाएगी।

ऐसा करने से इन पेपर लीक गिरोह के अलावा, 15 करोड़ से ज्यादा भारतीय यूजर्स प्रभावित होंगे, जो वैध संचार (बिजनेस, शिक्षा, परिवार) के लिए इस ऐप का इस्तेमाल करते हैं। विपक्षी नेता राहुल गांधी समेत कई लोगों ने इसे आलोचना का विषय बनाया है। यह कदम डिजिटल स्वतंत्रता और परीक्षा सुरक्षा के बीच संतुलन की चुनौती को उजागर करता है।

तो सवाल उठता है कि लीक रोकने के लिए सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए? इस ऐप पर प्रतिबंध अस्थायी राहत है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए बहुआयामी रणनीति जरूरी है। जैसे कि स्रोत-स्तरीय सुरक्षा: पेपर सेटिंग, प्रिंटिंग और ट्रांसपोर्ट को पूरी तरह डिजिटल और बायोमेट्रिक निगरानी में रखें। वायु सेना जैसी व्यवस्था को स्थायी बनाएं, GPS ट्रैकिंग और सील्ड बॉक्स को अनिवार्य करें। साइबर इंटेलिजेंस और मॉनिटरिंग: NTA और MeitY को AI-आधारित टूल्स से सोशल मीडिया, डार्क वेब और एन्क्रिप्टेड ऐप्स पर निरंतर निगरानी करनी चाहिए। बड़े चैनल्स/ग्रुप्स की प्रोएक्टिव ब्लॉकिंग और गिरोहों पर छापेमारी की जानी चाहिए। परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता: प्रश्न बैंक का डिजिटलीकरण, रैंडमाइज्ड पेपर, सीसीटीवी और जामर का व्यापक इस्तेमाल किया जाए। अभ्यर्थियों के लिए व्हिसलब्लोअर मैकेनिज्म और त्वरित शिकायत निस्तारण पर भी विचार किया जाना चाहिए। शिक्षा सुधार: कोचिंग माफिया पर सख्ती, मेरिट-आधारित सिलेक्शन को मजबूत करें ताकि लीक का आर्थिक प्रलोभन कम हो। कानूनी और संस्थागत मजबूती: लीक को राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा मानकर सख्त सजा (जैसे UFSPA जैसी विशेष प्रावधान) और फास्ट-ट्रैक कोर्ट होना चाहिए। एनटीए को स्वायत्त और जवाबदेह बनाएं जिससे कि ज़िम्मेदार व्यक्ति को कड़ी से कड़ी सज़ा मिले।

सरकार पूर्ण गारंटी नहीं दे सकती, क्योंकि कोई भी सिस्टम 100% मज़बूत नहीं होता। लेकिन बेहतर तैयारी से जोखिम को न्यूनतम किया जा सकता है। अगर फिर भी लीक होता है, तो जिम्मेदारी एनटीए, शिक्षा मंत्रालय, MeitY और संबंधित राज्य एजेंसियों की होगी। ऐसे में सीबीआई या विशेष जांच टीम तुरंत सक्रिय होनी चाहिए।

सरकार को इस संदर्भ में ऐसा कानून बनाना कहिए जहाँ दोषी पाए जाने पर, फिर वो चाहे कोई भी हो, पेपर सेटर, ट्रांसपोर्टर, गिरोह सदस्य या भ्रष्ट अधिकारी, ना सिर्फ़ कठोर कार्रवाई हो, बल्कि गिरफ्तारी, संपत्ति जब्ती, नौकरी से बर्खास्तगी और लंबी जेल तक का प्रावधान हो। इस क़ानून में अभ्यर्थियों को मुआवजा और पुनर्परीक्षा का अधिकार मिलना चाहिए। इसके साथ ही पारदर्शी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए ताकि सरकार पर जनता का विश्वास बहाल हो।

टेलीग्राम प्रतिबंध एक आवश्यक लेकिन अपर्याप्त कदम है। यह परीक्षा की अखंडता बचाने की दिशा में सकारात्मक अवश्य है, परंतु इस उद्योग के जड़ों (भ्रष्टाचार, कमजोर सुरक्षा और माफिया नेटवर्क) को नहीं छूता। सरकार को तकनीकी, प्रशासनिक और कानूनी सुधारों के साथ आगे बढ़ना चाहिए ताकि नीट जैसी परीक्षाएं मेरिट का प्रतीक बनें, न कि विवाद का। छात्रों का भविष्य दांव पर है, ऐसे में आधी-अधूरी कोशिशें पर्याप्त नहीं हो सकती। पूर्ण सुधार से ही विश्वास बहाल होगा।

ट्रंप के प्रिय मुनीर है या मोदी?

उस समय के अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिगर ने लिखा है कि भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने प्रेसिडेन्ट निक्सन को ऐसे डपटा जैसे एक प्रोफेसर अपने किसी कमजोर स्टूडेंट की झाड़ लगाता है।… अभी फ्रांस में सबने देखा उसी देश के प्रधानमंत्री ट्रंप को एक्सीलेंसी बोल रहे थे। मतलब महामहिम। अपने समकक्ष नहीं। बहुत उंचे दर्जें पर समझकर। जिनसे बात नहीं होती है। केवल निवेदन होता है। 6 बार बोला।

शिमला समझौता, जो भारत की विजय का नाद था उसकी भाजपा ने (उस समय जनसंघ था) कितनी आलोचना की थी? वही आज इस्लामाबाद और उसके समझौते की दुनिया में वाहवाही है। विश्व नेताओं उसकी बधाई दे रहे हैं। उसी सिलसिले में प्रधानमंत्री मोदी ने भी ट्रंप के सामने कि आपका हम अभिनंदन करते हैं। क्या इसकी जरूरत थी?और इससे भारत का क्या मैसेज बना है?

12 वर्षों से पाकिस्तान, ट्रंप और विदेशी नीति को ले कर मोदी सरकार ने भक्तों और गोदी मीडिया से एक अलग ही शेखी फैलाई हुई थी। पाकिस्तान मवाली देश और भारत विश्व नेता, विश्व गुरू। भक्त और मीडिया क्योंकि किसी के भी प्रति जवाबदेह नहीं हैं तो चाहे जो प्रचार हुआ। इस सबसे दुनिया में भारत की इमज कैसी बनती है इसकी उन्हें कोई चिंता नहीं है। इसी सप्ताह प्रधानमंत्री मोदी के आगे ट्रंप ने कहा कि मैं आपके मीडिया को पंसद करता हूं। अच्छे अच्छे सवाल करता है। हमारा तो फंसाने वाले सवाल करता है। मतलब भारत का मीडिया  अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी गोदी मीडिया के रूप में प्रचारित हो गया!

बहराहल अमेरिका और ईरान के एमओयू का इस्लामाबाद समझौता हो गया है। इसमें नई दिल्ली कहीं नहीं है। भारत बधाई देने वालों की कतार में है। कांग्रेस छोड़ दीजिए। राजनीति भी। लेकिन विदेश सेवा के उन वरिष्ठ अधिकारियों की उस तड़प और दर्द का आप क्या करेंगे जिन्होंने अपना पूरा करियर भारत को विश्व मंच पर स्थापित करने में बिताया। और पाकिस्तान जो इस काबिल कभी था ही नहीं और उसे भारत से ऊपर तो क्या बराबर भी कभी नहीं आने दिया।

पाकिस्तान की वह स्थिति अभी भी नहीं है। मगर हमने अपनी स्थिति जरूर खो दी है। लेकिन गोदी मीडिया इसी बात को लेकर खुशी मना रहा है कि ट्रंप ने कहा कि अगर मोदी रहेंगे और भारत पर हमला हुआ तो वे भारत के साथ खड़े रहेंगे। साथ ही यह भी कहा कि अगर कोई दूसरा होगा तो वे नहीं कह सकते। वाह! अन्तरराष्ट्रीय संबंध ऐसे चलते हैं? जिस अमेरिका-ईरान समझौते की बात हो रही है क्या वह ट्रंप और मसूद पेजेश्कियान, जिन्होंने ईरान की तरफ से साइन किए के बीच का समझौता है? कल को जब ट्रंप प्रेसिडेन्ट नहीं रहेंगे तो ईरान कह सकता है कि समझौता खत्म!

संयुक्त राष्ट्र किन -न के हस्ताक्षरों से बना था? सब खत्म हो गए। संगठन बना हुआ है। पर वहा की बहस बेमानी है। यह भी बहस बेमतलब कि वह कितना काम कर पा रहा है या नहीं? सवाल यह है जैसा ट्रंप ने कहकर मोदी भक्तों को बहला दिया कि अगर वे सत्ता में रहेंगे और मोदी रहेंगे तो यह होगा। नहीं तो नहीं!

सवाल है ट्रंप के न रहने से अमेरिका खत्म हो जाएगा? भारत के बारे में तो ट्रंप ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि अमेरिका को बहुत कड़वा अनुभव है भारत के बारे में गलत बोलने का। राष्ट्रपति निक्सन ने बोला था। बहुत ही गंदा। क्या? वह हम यहां नहीं लिख रहे। मगर हां यह जरूर बता रहे हैं कि उसका जवाब तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने कैसा दिया था। जो ट्रंप सहित वहां बनने वाले सभी राष्ट्रपतियों को आज भी याद है। सुनी सुनाई नहीं। किताबों में लिखा है। उस समय के अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसंगर ने लिखा है कि भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने प्रेसिडेन्ट निक्सन को ऐसे डपटा जैसे एक

प्रोफेसर अपने किसी कमजोर स्टूडेंट की झाड़ लगाता है। उससे पहले अमेरिका के अधिकारियों ने भारत के अमेरिका स्थित राजदूत से पूछा था कि प्रेसिडेन्ट निक्सन अपने समकक्षों को मिस्टर लगा कर बोलते हैं क्या आपके प्राइममिनिस्टर को भी बोल सकते हैं? सवाल इन्दिरा जी तक आया। उन्होंने हंस कर कहा बोल सकते हैं। यह था इन्दिरा गांधी का आत्मविश्वास। और एक अभी फ्रांस में सबने देखा उसी देश के प्रधानमंत्री ट्रंप को एक्सीलेंसी बोल रहे थे। मतलब महामहिम। अपने समकक्ष नहीं। बहुत उंचे दर्जें पर समझकर। जिनसे बात नहीं होती है। केवल निवेदन होता है। 6 बार बोला।

ऐसी भारत की आज स्थिति हो गई है। गोदी मीडिया भक्तों को तो कुछ नहीं मालूम। मगर भाजपा में कुछ पढ़े लिखे नेता हैं। उन्हें मालूम होगा कि यह सारे अन्तरराष्ट्रीय समझौते इन्टरनेशनल स्टेडी में, सिविल सर्विस की परीक्षाओं  मे पढ़ाए जाते हैं। हमारे नेतृत्व की कमजोरी से पाकिस्तान ने वह दर्जा हासिल कर लिया कि जो अब सब जगह इस्लामाबाद समझौता भी पढ़ाया जाएगा। कूटनीति के कौशल, पाठ में हर जगह चर्चा में रहेगा।

पहले इस इस्लामाबाद का नाम आतंकवाद फैलाने के लिए आता था। 2008 के मुंबई आतंकवादी हमले के बाद उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस्लामाबाद को अन्तरराष्ट्रीय जगत से अलग थलग कर दिया था। और आज उसी अमेरिका जो हमें कमजोर समझकर अपनी शान बताने के लिए कह रहा है कि हमला हुआ तो मैं तुम्हारे साथ खड़ा होऊंगा। मगर असल में ट्रंप की मेहरबानी से पाकिस्तान एक नई हैसियत में आज खड़ा है।  विश्व ताकत बन कर खड़ा हो गया है। वहां के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ

इस्लामाबाद से इसकी घोषणा कर रहे हैं।

वह कहते हैं ना –

और क्या देखने को बाकी है

आप से दिल लगाकर देख लिया!

मोदी से आपने दिल लगाया। और मोदी ने ट्रंप से। फैज की इस गजल का अगला शेर है –

वो मेरे हो के भी मेरे न हुए

उन को अपना बना कर देख लिया!

माई डियर फ्रेंड से हिज एक्सीलेंसी तक।

वे एक हाईपोथेटिकल ( काल्पनिक) सवाल के जवाब में कहते हैं कि अगर भारत पर हमला हुआ तो। यह बिल्कुल ऐसा ही जैसे कोई खुद को दबंग समझने वाला कमजोर पर रौब झाड़े कि ऐ अगर कोई तुमसे बात करे तो हमें बताना… हम उसका ऐसा कर देंगे वैसा कर देंगे। और डरा हुआ कमजोर कहे जी साहब आपका ही सहारा है।

और दूसरी तरफ सोचिए जरा। किसी आत्मविश्वास वाले ठीक आदमी से कोई कहे कि अगर कोई तुम पर हमला करे तो हम हैं। तो वह छूटते ही कहेगा किसकी मजाल है?

अभी पहलगाम में जब हमारे निर्दोष नागरिकों को पाकिस्तानी आतंकवादी हमले में मार दिया गया था तो ट्रंप आए थे मोदी के साथ? उसके बाद आपरेशन सिंदूर में? उसमें तो जब हमारी सेनाएं हमेशा के लिए एक फैसला करने की स्थिति में थीं तब ट्रंप ने आदेश के स्वर में स्टाप इट स्टाप इट कहकर उन्हें रोक दिया था।

वह सीजफायर जिसके लिए सौ बार ट्रंप ने बोला कि मैंने करवाया हमने तत्काल माना। और पाकिस्तान उसके बाद चौबीस घंटे तक हमले करता रहा।

मैं आपके साथ आ जाऊंगा! उस वक्त कहां थे? भारत को विश्व राजधानियों में नेताओं को भेजना पड़ा। कांग्रेस के और दूसरे विपक्षी दलों के लेकर! अमेरिका भी। क्यों? क्योंकि कोई आपके साथ नहीं था। जो देश परपंरागत रूप से भारत के साथ रहते आए थे उन्हें भी आपने अपनी व्यक्तिगत छवि बनाने वाली नीतियों से दूर कर दिया।

अन्तरराष्ट्रीय संबंधों में व्यक्ति का महत्व नहीं होता है। और अगर पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसा प्रतिष्ठित कोई व्यक्ति हो या इन्दिरा गांधी जैसी साहसी याद कर लें पहला परामाणु परीक्षण उन्होंने ही किया था तो या मनमोहन सिंह जैसा विद्वान तो फिर भी उसका कोई असर होता है मगर यह कहकर कि मेरी छाती 56 इंच की है। लाल आंखे हो जाती हैं। एक अकेला सब पर भारी हूं। गोदी मीडिया और भक्त तो मुरीद हो जाते हैं मगर अन्तरराष्ट्रीय जगत में इन चुटकुलों का कोई असर नहीं होता है।

अमेरिका-ईरान समझौता अच्छा है। शांति के हर प्रयास का स्वागत है। मगर हमने अपना जो अन्तरराष्ट्रीय स्थान गंवाया है और जो कभी इसके बिल्कुल योग्य नहीं था क्योंकि उसने अपनी जनता की भलाई के बदले धर्म, बड़े जमींदारों, पूंजीपतियों और अमेरिका के पिछलग्गू की भूमिका निभाई गई है उस राह से वैश्विक मंच पर आगे बहुत मुश्किल है।

जिस हकीकत को देश और दुनिया समझ रही है मगर मोदी और ट्रंप नहीं समझ रहे है। मोदी को ट्रंप प्रिय हैं हालांकि अब वे दोस्त से बॉस हो गए हैं। मतलब महामहिम! इससे कुछ भी नहीं सधना है।दुनिया ने जान लिया है की ट्रंप के प्रिय पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर है। वही मुनीर, जिन्हें पहलगाम आतंकवादी हमले का मास्टर माइंड बताया जाता है।

66 दिन बाद खुला हार्मुज स्ट्रेट: अमेरिका ने हटाई नाकेबंदी, फिर दौड़ने लगे तेल टैंकर

strait of hormuz

Strait of Hormuz blockade-ended : अमेरिका ने ईरान के साथ शांति समझौते के बाद आज स्ट्रेट ऑफ हार्मुज से नाकेबंदी खत्म कर दी है। अमेरिकी सेना (सेंटकॉम) द्वारा नाकेबंदी खत्म करने की घोषणा के बाद यहां से तेल टैंकर्स और अन्य जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू हो गई। ALSO READ: ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई पर अमेरिकी जांच, मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के आरोपों की पड़ताल तेज

 

यूए सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, राष्ट्रपति के निर्देश के अनुसार, अमेरिकी सेना ने ईरानी बंदरगाहों और तटीय इलाकों में आने-जाने वाले सभी समुद्री जहाजों पर लगी नाकेबंदी हटा ली है। अमेरिकी सेना ईरानी बंदरगाहों पर आने-जाने वाले जहाजों को नहीं रोक रही है।

 

सेंट्रल कमांड ने कहा कि नाकेबंदी हटने के बाद भी हमारे नेवी जहाज उस इलाके में मौजूद रहेंगे, ताकि यह पक्का किया जा सके कि समझौते की सभी बातों का पालन हो रहा है और वे पूरी तरह से लागू हैं।

 

66 दिन बाद हटी नाकेबंदी

गौरतलब है कि अमेरिका ने 28 फरवरी को इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया था। अमेरिकी-इजरायल हमले के जवाब में ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया था। इस पर अमेरिका ने हार्मुज की नाकेबंदी कर दी थी। 66 दिनों तक यहां अमेरिका की नाकेबंदी रही। इस वजह से दुनियाभर में तेल सप्लाय बुरी तरह प्रभावित हुई थी। बहरहाल MoU पर साइन होने के बाद अमेरिका ने अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की 14 शर्तों में स्ट्रेट ऑफ हार्मुज से अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करने की शर्त भी शामिल थी।

 

अमेरिका ईरान वार्ता टली

व्हाइट हाउस के अनुसार, अमेरिकी उपराष्‍ट्रपति जेडी वेंस ईरान से वार्ता के लिए स्विट्जरलैंड नहीं जा रहे हैं। इसके बाद ईरान ने जिनेवा जा रहे अपने प्रतिनिधिमंडल को रोक दिया है। इस वजह से आज अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली वार्ता टल गई है।

 

अमेरिकी नाकेबंदी हटने से क्या फायदा?

कच्चे तेल की सप्लाई सुचारु होगी : हार्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है। वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20% हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। मार्ग खुला रहने से सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, इराक और कतर से तेल और गैस की आपूर्ति सुचारु होगी।

 

कम होगी महंगाई : भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। हार्मुज में तनाव कम होने से भारत को तेल और LNG की नियमित आपूर्ति मिलती रहती है। इससे महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।

 

तेल की कीमतों पर दबाव कम होगा : हार्मुज बंद होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा हो गया था। मार्ग खुलने से सप्लाई की चिंता घटेगी और कीमतों में स्थिरता आएगी।
 

शिपिंग और बीमा लागत घटेगी : तनाव के दौरान जहाजों के बीमा प्रीमियम और सुरक्षा खर्च बढ़ जाते हैं। स्थिति सामान्य होने पर परिवहन लागत कम होती है, जिससे आयातित वस्तुएं अपेक्षाकृत सस्ती पड़ सकती हैं।

edited by : Nrapendra Gupta

अमेरिका-ईरान ‘डील साइन’

नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच निर्धारित समय से एक दिन पहले 18 जून को ही युद्धविराम समझौते पर दस्तखत हो गए। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के वर्साय पैलेस में समझौते पर दस्तखत करने के बाद बाहर निकल कर मीडिया के सामने चिल्ला कर कहा ‘डील साइन’। ईरान की तरफ से राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने समझौते पर दस्तखत किया। पिछले करीब 50 साल में पहली बार अमेरिका और ईरान ने किसी समझौते पर दस्तखत किया है।

अंतरिम समझौते पर दस्तखत के समय दोनों देशों के राष्ट्रपति आमने सामने नहीं बैठे थे, बल्कि डिजिटल तरीके से जुड़े थे। राष्ट्रपति ट्रंप ने बुधवार की रात को फ्रांस के वर्साय पैलेस में युद्धविराम से जुड़े समझौता ज्ञापन पर दस्तखत किए। इस दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों मौजूद थे। समझौते के दस्तावेज पर दस्तखत करने के बाद ट्रम्प वर्साय पैलेस से बाहर आए। इस दौरान किसी रिपोर्टर ने उनसे पीस डील को लेकर पूछा, तो उन्होंने चिल्लाते हुए कहा, ‘डील साइन हो गई है’। गौरतलब है कि वर्साय में पहले विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी के साथ ऐतिहासिक समझौता हुआ था।

राष्ट्रपति ट्रंप के बाद ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने भी ईरान से डिजिटल तरीके से दस्तखत किए। समझौते का ऐलान भारतीय समय के मुताबिक गुरुवार सुबह साढ़े पांच बजे किया गया। यह तत्काल प्रभाव से लागू हो गया। इस समझौते के तहत ईरान और लेबनान में सैन्य अभियान खत्म किया जाएगा। साथ ही होर्मुज की खाड़ी को दोबारा खोला जाएगा और अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी खत्म की जाएगी।

गौरतलब है कि इस समझौते पर 19 जून को स्विटजरलैंड में जेनेवा के पास लूसर्न शहर में दस्तखत होने थे, लेकिन निर्धारित कार्यक्रम से एक दिन पहले ही इस पर दस्तखत कर दिए गए। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने अमेरिका के साथ हुए समझौते को ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हुए कहा कि यह दुनिया के लिए एक मजबूत ईरान का संदेश है। पेजेशकियान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि ईरान वैश्विक शांति, अपनी गरिमा और स्वतंत्रता बनाए रखने के साथ साथ विकास और क्षेत्रीय सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है।

इस बीच खबर है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर दस्तखत होने के बाद होर्मुज की खाड़ी में जहाजों की आवाजाही तेज हो गई है। सऊदी अरब के झंडे वाले तीन बड़े तेल टैंकर होर्मुज की खाड़ी से गुजरे। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इन सुपर टैंकरों में करीब 60 लाख बैरल कच्चा तेल भरा हुआ था। दूसरी ओर यह भी खबर है कि इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अगले 60 दिन में अमेरिका औरर ईरान के अंतिम समझौते को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। ‘इजराइल टाइम्स’ के मुताबिक, नेतन्याहू दक्षिणपंथी मीडिया हस्तियों और इजराइल समर्थक अमेरिकी सांसदों के जरिए राष्ट्रपति ट्रंप पर दबाव बनाना चाहते हैं।

जनभावना का ध्यान रखने की जरुरत नहीं!

क्या भारतीय जनता पार्टी इतनी बड़ी और इतनी ताकतवर हो गई है उसे चुनाव जीतने के लिए जनभावना का ध्यान रखने की भी जरुरत नहीं है? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और अमित शाह का प्रबंधन इस स्तर तक पहुंच गया है कि जनभावना विपरीत होने के बावजूद वे भाजपा को चुनाव जिता दें? यह सवाल इसलिए है क्योंकि कई बार भारतीय जनता पार्टी जनभावना के खिलाफ काम करती दिखती है। ऐसे मुद्दों पर भी, जिन पर एक खास किस्म की जनभावना का निर्माण स्वंय भाजपा ने किया है। नागरिक इस बात को समझते भी हैं और सार्वजनिक विमर्श में इसकी चर्चा भी होती है। लोग सवाल भी उठाते हैं लेकिन मतदान के समय उनकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं और वे भाजपा के विरोध की मनःस्थिति के बावजूद उसी को वोट करते हैं। यह स्टॉकहोम सिंड्रोम है या नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने कुछ ऐसे मुद्दे लोगों के अवचेतन में बैठा दिए हैं, जो मतदान के समय उनकी मनःस्थिति को प्रभावित करने वाले तात्कालिक मुद्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं? यह गहरे विश्लेषण का विषय है। इसके तत्व धर्म, जाति और सांप्रदायिक आधार पर गहरे राजनीतिक व सामाजिक विभाजन में खोजे जा सकते हैं।

अगर जनभावना की बात करें तो सबसे पहले उदाहरण के लिए भ्रष्टाचार का मुद्दा लिया जा सकता है। भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमत बनाया था और नारा दिया था कि ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’। लेकिन भाजपा भ्रष्टाचार के आरोपियों को खुले दिल से पार्टी में शामिल करती है और उन्हें उच्च पद पर बैठाती है। महाराष्ट्र में अजित पवार के ऊपर भाजपा ने 70 हजार करोड़ रुपए के सिंचाई घोटाले का आरोप लगाया था और कोऑपरेटिव बैंक व चीनी मिल से जुड़े कई घोटाले से थे। अमित शाह ने कहा था कि अजित पवार जेल जाएंगे और चक्की पीसेंगे। लेकिन वही अजित पवार भाजपा के साथ आ गए। उनको उप मुख्यमंत्री बना दिया गया और चुनाव में भाजपा को इसका फायदा भी मिला। यह कहानी एक के बाद एक कई राज्य में दोहराई गई। हिमंत बिस्वा सरमा के ऊपर कई गंभीर आरोप लगे थे। सीबीआई ने उनकी जांच की थी। वे भाजपा के मुख्यमंत्री हैं। सुवेंदु अधिकारी एक स्टिंग ऑपरेशन में कैमरे पर पैसे लेते पकड़े गए थे। लेकिन वे भी भाजपा के मुख्यमंत्री हैं। अभी ही तृणमूल कांग्रेस के जो सांसद सरोगेट तरीके से भाजपा से जुड़ रहे हैं उनमें कई भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों के आरोपी हैं और उन्हीं के खिलाफ बंगाल के लोगों ने गुस्सा निकाला। लेकिन भाजपा को इसकी परवाह नहीं है। ऐसी अनगिनत मिसाले हैं। आम आदमी पार्टी के जिस सांसद के यहां ईडी ने छापा मार उसने 10 दिन के बाद ही भाजपा के बड़े नेताओं के सामने पार्टी ज्वाइन कर ली। ऐसा लग रहा है जैसे भाजपा भ्रष्टाचार को नापंसद करने वाले अपने समर्थकों को चिढ़ाने के लिए ऐसा काम कर रही है।

भ्रष्टाचार के बाद भाजपा और नरेंद्र मोदी का दूसरा बड़ा मुद्दा वंशवाद का था। उन्होंने जिस तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावना का निर्माण किया वैसे ही वंशवाद के खिलाफ भी किया। परिवारवाद को लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। लेकिन बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक से लेकर आंध्र प्रदेश तक परिवारवादी पार्टियों को अपने साथ जोड़ा, उन्हें प्रश्रय दिया, उनको अपनी सरकार में मंत्री बनाया और राज्यों में सत्ता का सुख भोगने के बंदोबस्त किए। अपनी पार्टी में भी दूसरी या तीसरी पीढ़ी के नेताओं के आगे बढ़ाया।

ऐसे ही महंगाई का मामला है। 2014 में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर नरेंद्र मोदी ने ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’ का नारा दिया। लेकिन सरकार में आने के बाद पिछले 12 साल में महंगाई बेतहाशा बढ़ी है। कच्चे तेल की कीमतें तो अब बढ़ी हैं, जब आपूर्ति प्रभावित हुई। परंतु भारत में तो पेट्रोल की कीमत एक सौ रुपए की मनोवैज्ञानिक सीमा पांच साल पहले ही पार कर गई थी। भाजपा ने 60 रुपए लीटर पेट्रोल को महंगा बताया था लेकिन उसकी सरकार ने 2021 में पेट्रोल की कीमत सौ रुपए लीटर कर दी। भाजपा ने चार सौ रुपए के रसोई गैस सिलेंडर के खिलाफ अभियान चलाया था लेकिन सरकार में आने के थोड़े दिन बाद ही उसने इसकी कीमत नौ सौ रुपए कर दी। मोदी के अनेक वीडियो आज भी शेयर किए जाते हैं, जिसमें 60 रुपए में एक डॉलर की कीमत को देश की प्रतिष्ठा के साथ जोड़ रहे थे। लेकिन आज 96 रुपए का डॉलर मिल रहा है फिर भी देश की प्रतिष्ठा बढ़ रही है!

प्रधानमंत्री ‘परीक्षा पर चर्चा’ करते हैं। उन्होंने ‘एग्जाम वॉरियर्स’ नाम से किताब लिखी है। आज नीट यूजी पेपर लीक और दोबारा परीक्षा के कारण 23 लाख और सीबीएसई की गड़बड़ियों के कारण 18 लाख छात्र परेशान हैं। परंतु प्रधानमंत्री ने एक शब्द नहीं कहा है। लाखों छात्र और करोड़ों अभिभावकों में असंतोष और गुस्सा है। प्रतियोगिता परीक्षाओं में गड़बड़ी और नौकरी की कमी से लोग नाराज हैं। सड़कों पर भी लोगों का गुस्सा निकल रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी फल फूल रही है। इसके बावजूद भाजपा और उसकी सरकार को इसकी परवाह नहीं है। नरेंद्र मोदी ने हर साल दो करोड़ नौकरी का वादा किया था। आज चार हजार पद के लिए 14 लाख लोग आवेदन कर रहे हैं। आठवीं पास की योग्यता जिस नौकरी के लिए चाहिए उसमें एमए पास लोग लाइन लगा कर खड़े होते हैं। रेलवे की एक लाख नौकरी के लिए एक करोड़ आठ लाख लोगों ने आवेदन किया और कई साल बीत जाने के बाद भी उसकी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी।

सो, भ्रष्टाचार हो, परिवारवाद हो, महंगाई हो या नौकरी और रोजगार का मामला हो, हर मामले में जनभावना सरकार के विरूद्ध दिखती है। इसके बावजूद भाजपा चुनाव जीत रही है तो इसका मतलब यह है कि सामान्य दिनों में जनभावना का ज्वार और मतदान के दिन की प्राथमिकता दोनों में समानता नहीं भी हो सकती है। पहले ऐसा होता था कि अगर लोगों में गुस्सा था तो वह मतदान में और चुनाव नतीजों में प्रकट होता था। आज ऐसा नहीं होता है। इसका कारण यह है कि अपने जीवन से जुड़ी रोजमर्रा की चीजों पर सरकार से नाराज होने के बावजूद किसी बड़ी प्रत्याशा में या किसी बड़े नैरेटिव के असर में लोग भाजपा को वोट दे रहे हैं। जैसे जैसे यह धारणा स्थापित होती जा रही है वैसे वैसे भाजपा जनभावना का ख्याल करना बंद या कम करती जा रही है। वह सरेआम ऐसे तमाम काम कर रही है, जिसके खिलाफ उसने खुद जनभावना का निर्माण किया है।

सोने के आयात में 70% गिरावट, मोदी की अपील और बढ़े शुल्क का दिखा असर

Gold import reduced in india

Gold Import : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक साल तक सोना नहीं खरीदने की अपील और 13 मई से शुल्क 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी किए जाने के बाद सोने के आयात में भारी गिरावट। एक महीने में देश में सोने का आयात पहले के 75-100 टन से करीब 70 फीसदी घटकर 30 फीसदी रह गया है। हालांकि ज्यादा कीमतों की वजह मूल्य के लिहाज से मई में सोने का आयात सालाना आधार पर 34 फीसदी बढ़कर 3.41 अरब डॉलर पहुंच गया। ALSO READ: Top News 19 June : हार्मुज स्ट्रेट से अमेरिकी नाकेबंदी हटी, ईरान से वार्ता टली; सोने के आयात में 70% गिरावट

 

आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-मई के दौरान सोने का आयात 60.14 फीसदी बढ़कर 9.04 अरब डॉलर पहुंच गया। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर मूल्य का सोना खरीदा था, जो सालाना आधार पर 24 फीसदी की बढ़ोतरी है। हालांकि, मात्रा के लिहाज से इसमें 4.76 फीसदी की गिरावट आई और यह 721.03 टन रहा। देश के कुल आयात में सोने की हिस्सेदारी पांच फीसदी से अधिक है।

 

क्या है आयात में 70% की गिरावट का मतलब?

 

यदि किसी महीने में आयात में 70% की गिरावट दर्ज हुई है, तो यह आमतौर पर संकेत देता है कि ऊंची कीमतों और कमजोर मांग के कारण आयातकों ने नई खरीद को काफी हद तक रोक दिया है। यह जरूरी नहीं कि लोगों की सोने में रुचि खत्म हो गई हो, महंगे इंपोर्ट टैक्स की वजह से भी इसी खरीदारी फिलहाल टली हुई है। ALSO READ: 30,000 करोड़ का NSE IPO! टूट सकता है LIC और Hyundai का रिकॉर्ड, जानिए कौन बेच रहा है सबसे ज्यादा शेयर

 

भारत में क्यों घट रहा है सोने का आयात?  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से एक साल तक सोना नहीं खरीदने की अपील की है। इसके साथ ही भारत में सोने के आयात में गिरावट के पीछे कई कारण हैं, जिनमें सबसे प्रमुख हैं:

 

सोने की ऊंची कीमतें : अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची हैं। भारत में भी 24 कैरेट सोना 1.5 लाख प्रति 10 ग्राम के आसपास पहुंचने के बाद उपभोक्ताओं की खरीदारी प्रभावित हुई है। कीमत बढ़ने से ज्वेलरी की मांग घटती है और आयात कम हो जाता है।

 

भू-राजनीतिक अनिश्चितता में कमी: जब वैश्विक तनाव बढ़ता है तो निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में सोना खरीदते हैं। लेकिन यदि अमेरिका-ईरान जैसे संकटों में तनाव कम होने की उम्मीद बनती है, तो सोने की मांग कमजोर पड़ सकती है।

 

आयात शुल्क और कर व्यवस्था : सरकार द्वारा सोने के आयात पर लगने वाले शुल्क और नियमों में बदलाव भी आयात को प्रभावित करते हैं। अधिक लागत होने पर आयातक खरीद कम कर देते हैं।

 

घरेलू मांग में नरमी : शादी-ब्याह और त्योहारों के सीजन के बाहर आमतौर पर ज्वेलरी की मांग कम रहती है। ऊंची कीमतों के कारण उपभोक्ता खरीद टाल रहे हैं या हल्के वजन के आभूषण चुन रहे हैं।

 

रुपये और डॉलर का असर : सोने का आयात डॉलर में होता है। यदि रुपया कमजोर होता है तो आयात महंगा हो जाता है, जिससे आयातक खरीद घटा सकते हैं।

 

रीसाइक्लिंग और पुराने सोने की बिक्री : कीमतें बढ़ने पर लोग पुराने गहने बेचते हैं। इससे बाजार में घरेलू स्तर पर सोने की उपलब्धता बढ़ती है और आयात कम होता है।
edited by : Nrapendra Gupta