यूपी राइज से युवाओं को नई उड़ान, इनोवेशन के दम पर रोजगार सृजन का संकल्प

यूपी राइज से युवाओं को नई उड़ान, इनोवेशन के दम पर रोजगार सृजन का संकल्प

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 'आत्मनिर्भर यूपी' के विजन को धरातल पर उतारने के उद्देश्य से कानपुर के छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय स्थित वीरांगना लक्ष्मीबाई प्रेक्षागृह में 'यूपी राइज' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में शहर और आसपास के क्षेत्रों से आए 1700 से अधिक छात्र-छात्राओं ने पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लिया। आयोजन का मूल उद्देश्य प्रदेश के युवाओं को केवल नौकरी तलाशने वाला न बनाकर, स्वयं का उद्यम स्थापित कर दूसरों को रोजगार देने वाला 'जॉब क्रिएटर' बनाना है।

 

कार्यक्रम के दौरान युवाओं को योगी सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं और रोजगारपरक नीतियों की विस्तृत जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने विशेष रूप से 'मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना' और महिला सशक्तीकरण से जुड़ी योजनाओं पर जोर दिया। छात्रों को बताया गया कि वे किस प्रकार आसान शर्तों पर वित्तीय सहायता और सब्सिडी प्राप्त करके अपना स्टार्टअप या व्यवसाय शुरू कर सकते हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य राज्य के हर क्षेत्र में नए और ऊर्जावान उद्यमियों को तैयार करना है।

आयोजन की सबसे खास बात युवाओं द्वारा प्रस्तुत किए गए बिजनेस मॉडल और स्टार्टअप आइडियाज रहे। इस कार्यक्रम के लिए कुल 30 आइडिया आए, जिनमें से 10 बेहतरीन आइडियाज को शॉर्टलिस्ट किया गया। इसके बाद 12 चयनित टीमों ने इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स और जूरी मेंबर्स के सामने अपने इनोवेटिव आइडियाज की प्रेजेंटेशन दी। एक्सपर्ट्स ने युवाओं की रचनात्मक सोच की सराहना की और विजेताओं को प्रोत्साहन राशि प्रदान कर उनका हौसला बढ़ाया। इसमें टीम जॉयलिशियस ने प्रथम स्थान हासिल कर 25,000 रुपए का मुख्य पुरस्कार जीता, टीम आयनप्राइम को  (द्वितीय) 15,000 रुपए और टीम कायरो को  (तृतीय) 10,000 रुपए की प्रोत्साहन राशि मिली, जबकि टीम मेडियोटेक रनर-अप रही।

 

'यूपी राइज' कार्यक्रम की शुरुआत कानपुर से हो चुकी है और अब इस अभियान को प्रदेश के 29 अन्य प्रमुख कॉलेजों तक ले जाया जाएगा। इस पहल के माध्यम से राज्य के प्रतिभाशाली छात्रों को सीधे बड़ी और नामी कंपनियों में इंटर्नशिप तथा रोजगार पाने के अवसर प्रदान किए जाएंगे। चयनित टीमों ने कृषि, स्वास्थ्य, डिजिटल तकनीक और पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने व्यावहारिक विचार प्रस्तुत कर यह साबित कर दिया कि यूपी का युवा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

 

युवाओं के अनूठे स्टार्टअप आइडियाज

कार्यक्रम में छात्रों ने रोजमर्रा की समस्याओं और आधुनिक तकनीकों को ध्यान में रखकर बेहद दिलचस्प प्रोजेक्ट पेश किए। टीम दिव्यकेयर ने 10 मिनट में घर पर नर्स, डॉक्टर, दवाइयां और लैब टेस्ट जैसी हेल्थकेयर सेवाएं पहुंचाने वाला मॉडल पेश किया, तो टीम समर्पण ने छात्रों के लिए एआई-आधारित मल्टीप्लेयर लर्निंग प्लेटफॉर्म तैयार किया। टीम कायरो ने युवाओं के लिए विशेष डिजिटल टेक सॉल्यूशन प्रस्तुत किया, वहीं टीम मेडबिड ने फार्मेसी के लिए रिवर्स ऑक्शन आधारित दवा खरीद सिस्टम बनाया। टीम फाइनट्यूनर्स ने सैलून की कतार से बचाने के लिए 'हेयरकार्ट' ऐप पेश किया। टीम जेनहेर ने महिलाओं के लिए पीरियड साइकिल ट्रैकिंग टूल, टीम कोडरवा ने छोटे व्यवसायों को ऑनलाइन टेक सपोर्ट देने की सेवा और पुरस्कार विजेता टीम आयनप्राइम ने बिना लाइन में लगे तुरंत प्रिंटआउट निकालने वाला 'सेल्फ प्रिंटिंग कियोस्क' प्रस्तुत किया।

 

स्वास्थ्य, पर्यावरण और समाज को नई दिशा देते प्रोजेक्ट्स

अन्य टीमों ने भी अपनी रचनात्मक सोच से जूरी को काफी प्रभावित किया। टीम वर्चुअललैब ने 11वीं-12वीं और कॉलेज के छात्रों के लिए 'वर्चुअल केमिस्ट्री लैब' का मॉडल बनाया, जबकि टीम कॉस्मोलिथ ने छोटे अस्पतालों के मरीजों का डेटाबेस और रिकॉर्ड मैनेज करने के लिए 'हेल्थ ओएस' प्लेटफॉर्म तैयार किया। टीम इकोकार्बन ने चाय की पत्तियों और केले के छिलकों से ऑर्गेनिक कार्बन फिल्टर बनाने का पर्यावरण अनुकूल विचार दिया। इसके साथ ही, विजेता टीम जॉयलिशियस ने भारतीय मिठाइयों और वेस्टर्न फ्लेवर्स के शानदार मिश्रण से नए 'फ्यूजन डेजर्ट्स' पेश कर बाजी मारी और रनरअप टीम मेडियोटेक ने अस्पतालों में मरीजों को एक बेड या स्ट्रेचर से दूसरे स्थान पर आसानी से शिफ्ट करने के लिए मोटराइज्ड कन्वेयर-बेस्ड सिस्टम का ढांचा पेश किया।

यूपी-जापान इन्वेस्टमेंट मीट-2026

यूपी-जापान इन्वेस्टमेंट मीट-2026

उत्तर प्रदेश को स्वच्छ एवं हरित ऊर्जा के क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बनाने के उद्देश्य से गोमती नगर स्थित ताज होटल में यूपी-जापान इन्वेस्टमेंट मीट 2026 का आयोजन हुआ। बैठक में नगर विकास एवं ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा, विभागीय वरिष्ठ अधिकारियों और जापान के यामानाशी प्रांत के गवर्नर कोटारो नागासाकी समेत उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने भाग लिया। इस दौरान ग्रीन हाइड्रोजन तकनीक, उत्पादन, अनुसंधान और निवेश के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई। इस अवसर पर दोनों पक्षों के बीच महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) भी संपन्न हुआ।

 

ऊर्जा सुरक्षा और डीकार्बोनाइजेशन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

ऊर्जा मंत्री ने कहा कि ग्रीन हाइड्रोजन भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। उत्तर प्रदेश में इसके उत्पादन और उपयोग को बढ़ावा मिलने से ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी तथा पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग उद्योगों, भारी वाणिज्यिक वाहनों जैसे बसों और ट्रकों, उर्वरक निर्माण तथा अन्य क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

 

यामानाशी मॉडल और पावर-टू-गैस तकनीक का सहयोग

जापान के यामानाशी प्रांत के प्रतिनिधिमंडल ने अपनी अत्याधुनिक पावर-टू-गैस (पी2जी) तकनीक का प्रस्तुतीकरण किया। इस तकनीक में नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करते हुए जल के इलेक्ट्रोलिसिस से ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन किया जाता है।

 

बैठक में यामानाशी हाइड्रोजन कंपनी (वाईएचसी) तथा कानाडेविया कॉरपोरेशन के सहयोग से उत्तर प्रदेश में एक उच्च क्षमता वाली पायलट परियोजना स्थापित करने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। प्रस्तावित परियोजना की फिजिबिलिटी स्टडी फरवरी 2027 तक पूरी करने तथा मार्च 2027 तक व्यावसायीकरण की दिशा में आगे बढ़ने का लक्ष्य रखा गया है।

 

1 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य

उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश में प्रति वर्ष 1 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राज्य सरकार द्वारा निवेश, तकनीकी नवाचार और निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश ग्रीन हाइड्रोजन पॉलिसी-2024 के तहत ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाओं के लिए निवेशकों को विभिन्न प्रोत्साहन एवं सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इनमें परियोजना लागत पर 10 से 30 प्रतिशत तक कैपिटल सब्सिडी, स्टाम्प ड्यूटी में 100 प्रतिशत तक छूट तथा निजी विकासकर्ताओं के माध्यम से भूमि लीज पर उपलब्ध कराने जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

 

आईआईटी कानपुर और आईआईटी-बीएचयू में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस

ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और औद्योगिक विकास को गति देने के लिए आईआईटी कानपुर और आईआईटी (बीएचयू) वाराणसी में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस

स्थापित किए गए हैं। इन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के माध्यम से नई तकनीकों के विकास, अनुसंधान, तकनीकी परीक्षण तथा प्रयोगशाला स्तर की तकनीक को औद्योगिक स्तर पर स्केल-अप करने में मदद मिलेगी।

 

मजबूत कनेक्टिविटी और हाइड्रोजन मोबिलिटी के बड़े अवसर

ऊर्जा मंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश की रणनीतिक भौगोलिक स्थिति और मजबूत कनेक्टिविटी प्रदेश को ग्रीन हाइड्रोजन निवेश के लिए विशेष रूप से आकर्षक बनाती है। प्रदेश में अंतरराष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय हवाई अड्डे, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसी), अंतर्देशीय जलमार्ग, एक्सप्रेसवे, रेलवे और मेट्रो नेटवर्क जैसी आधुनिक परिवहन सुविधाएं उपलब्ध हैं। इससे ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, भंडारण, परिवहन और औद्योगिक उपयोग के लिए मजबूत सप्लाई चेन विकसित करने के अवसर उपलब्ध हैं। उत्तर प्रदेश में विशाल औद्योगिक आधार, बड़ा उपभोक्ता बाजार और भारी परिवहन क्षेत्र के कारण हाइड्रोजन मोबिलिटी के लिए भी व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।

 

जापान के साथ तकनीकी और निवेश सहयोग को नई दिशा

ऊर्जा मंत्री ने जापानी प्रतिनिधिमंडल का स्वागत करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश वैश्विक निवेशकों के लिए सुरक्षित, सक्षम और संभावनाओं से भरपूर निवेश गंतव्य के रूप में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में जापान की उन्नत तकनीक, विशेषज्ञता और निवेश का स्वागत करती है तथा इस क्षेत्र में परियोजनाओं को गति देने के लिए हर संभव नीतिगत एवं प्रशासनिक सहयोग प्रदान करेगी।

 

यूपी-जापान इन्वेस्टमेंट मीट 2026 के दौरान हुआ यह सहयोग उत्तर प्रदेश में ग्रीन हाइड्रोजन इकोसिस्टम के विकास, तकनीकी नवाचार, औद्योगिक निवेश और स्वच्छ ऊर्जा आधारित भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस अवसर पर अपर मुख्य सचिव ऊर्जा एवं यूपीपीसीएल अध्यक्ष डॉ. आशीष कुमार गोयल  समेत तमाम अधिकारी मौजूद रहे।

निवेश से आगे ग्लोबल फ्यूचर की ओर बढ़ रही यूपी-जापान साझेदारी: सीएम योगी

निवेश से आगे ग्लोबल फ्यूचर की ओर बढ़ रही यूपी-जापान साझेदारी: सीएम योगी

 

 

 

 

 

 

 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उत्तर प्रदेश और जापान के रिश्ते अब केवल निवेश तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि लॉन्ग-टर्म, ट्रस्ट-बेस्ड पार्टनरशिप के रूप में नई ऊंचाइयों तक पहुंचेंगे। जापान के प्रिसिजन और टेक्नोलॉजी को उत्तर प्रदेश के स्केल, युवा शक्ति और टैलेंट से जोड़ते हुए प्रदेश को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और इनोवेशन का मजबूत केंद्र बनाने की दिशा में काम होगा। 

 

शुक्रवार को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित यूपी-जापान इन्वेस्टमेंट मीट के वेलेडक्टरी सेशन में मुख्यमंत्री ने कहा कि जापान उत्तर प्रदेश के लिए केवल इन्वेस्टर नहीं, बल्कि को-क्रिएटर है। एमओयू को प्रोडक्शन, प्रोडक्शन को ग्लोबल एक्सपोर्ट और निवेश को रोजगार में बदलना सरकार का लक्ष्य है। 2047 के भारत के उद्योग आज डिजाइन हो रहे हैं और उत्तर प्रदेश चाहता है कि जापान के साथ मिलकर इन उद्योगों का भविष्य तैयार किया जाए।

 

जापानी भाषा में मुख्यमंत्री ने दिया दोस्ती और साझेदारी का संदेश

मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में जापानी भाषा का प्रयोग करते हुए जापानी प्रतिनिधिमंडल का आत्मीय स्वागत किया। उन्होंने “कोनिचिवा मिनासान” कहकर सभी जापानी अतिथियों का अभिवादन किया और भारत-जापान के मजबूत होते संबंधों के प्रति सम्मान व्यक्त किया। संबोधन के समापन पर मुख्यमंत्री ने जापानी भाषा में “अरिगातो गोजाइमासु” कहकर प्रतिनिधिमंडल और उपस्थित जापानी अतिथियों का आभार जताया। जापानी भाषा में मुख्यमंत्री के इस आत्मीय संवाद ने कार्यक्रम में सांस्कृतिक जुड़ाव और दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास का संदेश दिया। सीएम योगी के इस भाव ने उपस्थित मेहमानों का उत्साहवर्धन भी किया।

 

जापान के साथ बातचीत अब स्ट्रांग बिजनेस पार्टनरशिप में बदल रही

मुख्यमंत्री ने कहा कि कुछ दिन पूर्व जापान की धरती पर जो संकल्प लिया गया था, आज लखनऊ की धरती पर उसे साकार रूप लेते हुए देखा जा रहा है। जापान में हुई बातचीत अब स्ट्रांग बिजनेस पार्टनरशिप में बदल रही है, जो उत्तर प्रदेश में इन्वेस्टमेंट, इंडस्ट्री और एम्प्लॉयमेंट के नए अवसरों का आधार बनेगी। यह भारत-जापान के साथ-साथ उत्तर प्रदेश और यामानाशी के संबंधों में भी नई साझेदारी के युग की शुरुआत है। जापान ने दुनिया को दिखाया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद डिसिप्लिन, विल पावर, हाई क्वालिटी स्टैंडर्ड, इनोवेशन और नेशन फर्स्ट की भावना के साथ सही दिशा में प्रयास किया जाए तो कोई भी चुनौती मार्ग में बाधा नहीं बन सकती। जापान आज विश्व की प्रमुख इकोनॉमिक एंड इंडस्ट्रियल पावर के रूप में स्थापित है। ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रोबोटिक्स और हाई क्वालिटी मैन्युफैक्चरिंग के साथ क्लीनलीनेस और कलेक्टिव रिस्पॉन्सिबिलिटी के लिए भी उसकी पूरी दुनिया में अलग पहचान है। काइजेन, मोनोजुकुरी और ‘वा’ यानी सामाजिक सामंजस्य जापान की लाइफस्टाइल और वर्क कल्चर के महत्वपूर्ण आधार हैं। इन मूल्यों की झलक जापान के एडमिनिस्ट्रेशन, इंडस्ट्री, एजुकेशन और सोशल लाइफ के हर क्षेत्र में दिखाई देती है। शिंकानसेन, यानी जापान की बुलेट ट्रेन, टेक्निकल एफिशिएंसी, पंक्चुअलिटी, सेफ्टी और रिलायबिलिटी के लिए पूरी दुनिया में विख्यात है। यह जापान की उस सोच का प्रतीक है, जहां टेक्नोलॉजी के साथ प्रिसिजन, स्पीड के साथ सेफ्टी और डेवलपमेंट के साथ रिलायबिलिटी को समान महत्व दिया जाता है।

 

जापान का इंडस्ट्रियल एक्सीलेंस और यूपी की युवा शक्ति मिलकर रचेंगे नई कहानी

मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश आज एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट्स, हाई-स्पीड कनेक्टिविटी और मॉडर्न ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के मार्गदर्शन में तेजी से आगे बढ़ रहा है। प्रदेश का लक्ष्य केवल कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना नहीं, बल्कि ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर इकोसिस्टम तैयार करना है, जो इंडस्ट्री को स्पीड, आम नागरिक को सेफ्टी और इन्वेस्टर्स को रिलायबिलिटी दे सके। जापान के पास इंडस्ट्रियल एक्सीलेंस की असाधारण विरासत है, जबकि उत्तर प्रदेश के पास सीखने, सृजन करने और नेतृत्व करने के लिए तैयार युवाओं की ऊर्जावान पीढ़ी है। यूपी के युवाओं को ऐसी स्किल, प्रिसिजन और वर्क कल्चर से जोड़ा जाएगा, जिसकी मांग टोक्यो से लेकर दुनिया के किसी भी एडवांस मैन्युफैक्चरिंग हब तक हो। लैंग्वेज उन्हें जापान से, टेक्निकल स्किल इंडस्ट्री से और जापानी वर्क कल्चर उन्हें ग्लोबल स्टैंडर्ड से जोड़ेगा। आज ग्लोबल कंपनियां ऐसे स्थान की तलाश में हैं, जहां रेजिलिएंस, रिलायबिलिटी, ग्लोबल सप्लाई चेन के लिए डायवर्सिफिकेशन और बड़े पैमाने पर ग्रोथ की क्षमता हो। उत्तर प्रदेश इन चारों आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता रखता है।

 

600 करोड़ के फंड से बढ़ेगा जापानी निवेश

मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछले तीन दिनों में जापानी डेलीगेशन के साथ हुई बातचीत में वर्किंग रिलेशनशिप मजबूत करने, उत्तर प्रदेश की पॉलिसीज और बिजनेस एनवायरमेंट को समझने तथा निवेश के अवसरों पर विस्तृत चर्चा हुई। जापानी प्रतिनिधियों ने प्रदेश में पॉलिसी रिफॉर्म और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में हुए सुधारों की सराहना की है। उन्होंने सीमलेस अप्रूवल, लैंड अलॉटमेंट की सरल प्रक्रिया और रिड्यूस्ड कंप्लायंसेज को सकारात्मक बदलाव बताया। वहीं मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक हब, इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग एंड लॉजिस्टिक क्लस्टर्स, इंडस्ट्रियल पार्क्स और बेहतर कनेक्टिविटी को निवेश के लिए महत्वपूर्ण सकारात्मक पहलू माना। सीएम ने कहा कि इन सुविधाओं के कारण प्रदेश में निर्मित उत्पादों की देश के अलग-अलग हिस्सों में सीमलेस मूवमेंट संभव हो रही है। यामानाशी के साथ सहयोग को अब मजबूत और संस्थागत व्यवस्था में बदला जाएगा। इन्वेस्ट यूपी में डेडिकेटेड यामानाशी डेस्क स्थापित की जाएगी, जो यामानाशी सरकार, वहां के उद्योगों और निवेशकों के साथ निरंतर समन्वय करेगी। दोनों पक्ष इन्वेस्टमेंट प्रोजेक्ट्स, इंडस्ट्री की आवश्यकताओं, अप्रूवल्स और सामने आ रही चुनौतियों की हर 90 दिन में कोऑर्डिनेशन के साथ रिव्यू करेंगे, ताकि किसी भी स्तर पर कोई गैप न रहे। इससे एमओयू के क्रियान्वयन से लेकर निवेश तक की पूरी प्रक्रिया को नई गति मिलेगी। मुख्यमंत्री ने यामानाशी के गवर्नर को विशेष रूप से धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्होंने यामानाशी की एमएसएमई कंपनियों के उत्तर प्रदेश में निवेश के लिए 600 करोड़ रुपये का फंड घोषित किया है। यह उत्तर प्रदेश में जापानी उद्योग के बढ़ते विश्वास का महत्वपूर्ण प्रमाण है।

 

यामानाशी मॉडल को जापान के अन्य प्रिफेक्चर्स तक विस्तार देंगे

मुख्यमंत्री ने कहा कि फरवरी 2026 की जापान यात्रा के दौरान जापानी सीईओज, बिजनेस एसोसिएशंस और इंडस्ट्री डेलिगेशंस के साथ व्यापक चर्चा हुई थी। इन चर्चाओं में उत्तर प्रदेश सरकार और जापान के अन्य प्रीफेक्चर्स के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी थी। अब यामानाशी के साथ विकसित मॉडल को जापान के अन्य प्रिफेक्चर्स तक भी विस्तार दिया जाएगा। इसके लिए यामानाशी के गवर्नर ने सहयोग की इच्छा जताई है। प्रसन्नता का विषय है कि उत्तर प्रदेश की गलगोटियास यूनिवर्सिटी ने जापानी डेलिगेशन के साथ एमओयू किया है। इसी तरह की साझेदारी यूपी के अन्य विश्वविद्यालयों और जापान के विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों के बीच भी विकसित की जाएगी। हेल्थकेयर और मैन्युफैक्चरिंग प्रोफेशनल्स के साथ-साथ पॉलिटेक्निक, नर्सिंग ग्रेजुएट्स और अन्य टेक्निकल कोर्सेज के छात्रों को जापानी लैंग्वेज में प्रशिक्षित करने तथा उनके लिए रोजगार और ट्रेनिंग के अवसरों का विस्तार किया जाएगा। जापानी कंपनियों के साथ मिलकर उनकी सेक्टर-स्पेसिफिक मैनपावर जरूरतों को समझा जाएगा और उसी आधार पर उत्तर प्रदेश में विशेष ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार किए जाएंगे। हमारा लक्ष्य इंडस्ट्री की जरूरत के अनुसार स्किल और स्किल के अनुसार एंप्लॉयमेंट का मजबूत इकोसिस्टम तैयार करना है। इससे जापानी कंपनियों को प्रशिक्षित वर्कफोर्स और उत्तर प्रदेश के युवाओं को ग्लोबल इंडस्ट्री स्टैंडर्ड के अनुरूप रोजगार के अवसर मिलेंगे।

 

बौद्ध सर्किट से जापानी पर्यटकों को यूपी की ओर आकर्षित करेंगे

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार बौद्ध सर्किट के माध्यम से जापानी पर्यटकों के लिए पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए काम करेगी। इस संबंध में यहां एक एमओयू भी संपन्न हुआ है। उत्तर प्रदेश भारत का प्रमुख स्पिरिचुअल टूरिज्म हब है और यहां आध्यात्मिक, बौद्ध, कल्चरल और हेरिटेज टूरिज्म की अपार संभावनाएं हैं। जापान में आयोजित होने वाले टूरिज्म फेस्टिवल में उत्तर प्रदेश की भागीदारी के माध्यम से भारत की संस्कृति, आध्यात्मिक विरासत और हॉस्पिटैलिटी को वहां प्रस्तुत किया जाएगा।

 

ग्रीन हाइड्रोजन पर मिलकर करेंगे काम

सीएम ने कहा कि ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भी यामानाशी के साथ सहयोग को अगले चरण तक ले जाया जाएगा। आईआईटी कानपुर और आईआईटी बीएचयू के सहयोग से ग्रीन हाइड्रोजन के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए जा रहे हैं। इसी मॉडल की तर्ज पर और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस विकसित किए जा सकते हैं, ताकि रिसर्च एंड डेवलपमेंट, न्यू टेक्नोलॉजी के एडॉप्शन और क्लीन एनर्जी में इनोवेशन को तेजी से आगे बढ़ाया जा सके। यामानाशी के साथ एक पायलट प्रोजेक्ट विकसित करने पर सहमति हुई है, जिसे उत्तर प्रदेश सरकार मिलकर इंप्लीमेंट करेगी। इसके लिए भारतीय और जापानी कंपनियों के बीच टेक्नोलॉजी एवं बिजनेस पार्टनरशिप विकसित की जाएगी। यूपी के उद्यमी और इन्वेस्टर इस टेक्नोलॉजी को अपनी-अपनी इंडस्ट्री में लागू करने के लिए आगे आ सकते हैं। आवश्यकता पड़ने पर उनके डेलिगेशन को यामानाशी प्रीफेक्चर की यात्रा पर भेजा जाएगा, ताकि वे वहां इन कार्यों का अनुभव कर सकें। साथ ही, उद्योग जगत के साथ समन्वय कर एक उपयुक्त ऑफ-टेकर की पहचान की जाएगी, जिससे पायलट परियोजना को बड़े स्तर पर विस्तार योग्य कमर्शियल मॉडल में बदला जा सके। अक्टूबर 2026 में यामानाशी में आयोजित होने वाले इंटरनेशनल हाइड्रोजन समिट में उत्तर प्रदेश अपना डेलिगेशन अवश्य भेजेगा।

 

जापानी जीसीसी कंपनियों को यूपी में निवेश और बिजनेस सेटअप का न्योता

मुख्यमंत्री ने कहा कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) की स्थापना के लिए मजबूत इकोसिस्टम तैयार हो रहा है। उन्होंने जापानी जीसीसी कंपनियों को उत्तर प्रदेश में आने, निवेश करने और अपना बिजनेस सेटअप करने के लिए आमंत्रित करते हुए कहा कि इस विषय में एक एमओयू भी संपन्न हुआ है। प्रदेश का लक्ष्य केवल निवेश लाना नहीं, बल्कि जापान के साथ लॉन्ग-टर्म, ट्रस्ट-बेस्ड पार्टनरशिप विकसित करना है। जापानी कंपनियां यूपी में निवेश और उत्पादन करें तथा यहां से पूरे भारत और ग्लोबल मार्केट तक पहुंच बनाएं, यही सरकार का प्रयास है। भारत और जापान ऐसे देश हैं, जिन्होंने अपनी विरासत और परंपरा को दैनिक जीवन और कार्य संस्कृति का हिस्सा बनाए रखा है। जापान की संस्कृति हजारों वर्षों की समृद्ध परंपरा से विकसित हुई है और उस पर शिंतो तथा बौद्ध परंपराओं का गहरा प्रभाव रहा है। भारतीय जीवन पद्धति भी प्रकृति के प्रति सम्मान, समाज के प्रति दायित्व और समस्त मानवता को एक परिवार मानने की भावना पर आधारित है। हमारी संस्कृति का संदेश ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ है। 2047 में भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी का महोत्सव मनाएगा। तब हमारी आकांक्षा है कि उत्तर प्रदेश में काम कर रही जापानी कंपनियां केवल यह न कहें कि हमने भारत में निवेश किया है, अपितु गर्व से कहें कि हमने अपना ग्लोबल फ्यूचर उत्तर प्रदेश से बनाया है। उत्तर प्रदेश एक रिलायबल और लॉन्ग-टर्म पार्टनर के रूप में जापान के साथ खड़ा है।

 

इस अवसर पर यामानाशी प्रीफेक्चर के गवर्नर कोटारो नागासाकी, यामानाशी प्रीफेक्चर के वाइस गवर्नर जुनिची इशिदेरा, औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह, श्रम एवं सेवायोजन मंत्री अनिल राजभर, औद्योगिक विकास राज्य मंत्री जसवंत सिंह सैनी, अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास आयुक्त दीपक कुमार, यूपी ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन के सीईओ मनोज कुमार सिंह, उद्योग विभाग के अपर मुख्य सचिव आलोक कुमार और गवर्नर यामानाशी के साथ आए उच्चस्तरीय डेलीगेशन के इंडस्ट्री लीडर्स, सीईओज व अन्य अतिथिगण उपस्थित रहे।

असम में क्यों हो रहा है इतना निवेश?

असम में क्यों हो रहा है इतना निवेश?

investment in assam

प्रभाकर मणि तिवारी

असम अपनी बेहतर क्वालिटी की चाय के उत्पादन के लिए पूरी दुनिया में मशहूर रहा है। अस्सी के दशक में घुसपैठ और उग्रवाद ने इसकी छवि एक ऐसे राज्य के तौर पर बना दी जहां निवेशक तो दूर बाहरी राज्यों के लोग भी आने से डरते थे। लेकिन अब बीते कुछ साल से यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। पहले उद्योग के नाम पर राज्य में या तो चाय बागान थे या फिर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम। लेकिन अब बड़े पैमाने पर देशी विदेशी निवेश की वजह से असम दक्षिण एशिया का सप्लाई चेन हब बनने की राह पर बढ़ रहा है। ALSO READ: राज्यपालों के कार्यकाल पर क्या कहता है भारत का संविधान

 

राज्य सरकार ने अगले पांच साल में राज्य में बुनियादी ढांचे को विकसित करने पर करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये खर्च करने का एलान किया है।

 

असम का असंगठित क्षेत्र

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, असम की करीब सवा तीन करोड़ की आबादी में से एक तिहाई युवा है। लेकिन राज्य में चाय बागानों, खेती, हथकरघा के अलावा रोजगार का कोई साधन नहीं है। चाय बागान मजदूरों और छोटे किसानों के अलावा राज्य के पारंपरिक हथकरघा और रेशम उद्योग में काम करने वाले लाखों कारीगर असंगठित क्षेत्र का हिस्सा हैं।

 

तिनसुकिया के एक कालेज में समाज विज्ञान के प्रोफेसर रहे डा. सुकांत कर डीडब्ल्यू से कहते हैं, राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों में काम करने वाले ज्यादातर लोग बाहरी राज्यों के हैं। राज्य सरकार के उपक्रमों में स्थानीय लोग जरूर हैं। लेकिन सरकारी कर्मचारियों की संख्या करीब साढ़े चार लाख ही है। ऐसे में निजी निवेशकों के आने से युवा आबादी के लिए रोजगार के नए मौके पैदा होंगे।

 

विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा के नेतृत्व में असम के एक प्रतिनिधिमंडल ने इस साल जनवरी में पहली बार दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) में शिरकत की। वहां शर्मा ने असम को देश के विकास के परिदृश्य में एक स्वाभाविक मंजिल बताते हुए विदेशी निवेशकों से हरित ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और पर्यटन के क्षेत्र में राज्य की अपार संभावनाओं का पता लगाने और इन क्षेत्रों में निवेश करने की अपील की। सरकार का दावा है कि दावोस में बातचीत के दौरान विभिन्न कंपनियों ने राज्य में हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में करीब एक लाख करोड़ रुपये के निवेश का भरोसा दिया है। ALSO READ: भारत में नए नए हाईवे और एक्सप्रेसवे आखिर टूट क्यों रहे हैं?

 

असम में बढ़ता निवेश

टाटा समूह ने राज्य के जागी रोड में करीब तीस हजार करोड़ की लागत से एक सेमीकंडक्टर प्लांट लगाया है। अब इसकी वजह से छोटे-छोटे पुर्जे बनाने वाली कंपनियां और विदेशी निवेशक भी आकर्षित हो रहे हैं। इसके ऑटोमोटिव मॉड्यूल के लिए मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर के तौर पर अग्रणी वैश्विक कंपनी क्वालकॉम भी राज्य में पहुंची है। इससे असम पहली  बार ग्लोबल सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का हिस्सा बन गया है।

 

सरकार का दावा है कि कई जापानी कंपनियों ने भी राज्य में बड़े पैमाने पर निवेश की योजना बनाई है। जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची को बीते जून में असम के दौरे पर आना था। लेकिन किसी वजह से वह दौरा टल गया था और प्रस्तावित बैठक दिल्ली में हुई। जापानी कंपनियों की ओर से राज्य में बड़े पैमाने पर संभावित निवेश को ध्यान में रखते हुए राज्य की ओर से संचालित पूर्वोत्तर कौशल केंद्र सक्रिय रूप से जापानी भाषा के अलावा कई तकनीकी कार्यक्रम चला रहा है।

 

जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोआपरेशन और कुछ निजी निवेशक गोलाघाट जिले के नुमलीगढ़ में एक बायोरिफाइनरी के लिए 408 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता दे रहे हैं। इसमें बांस से इथेनॉल बनाया जाएगा। इस साझा उपक्रम में फिनलैंड की दो कंपनियां फोर्टम और केमपोलिस भी शामिल है। यह दोनों बायो रिफाइनरी को तकनीक मुहैया कराएंगी। इस रिफाइनरी के लिए पूर्वोत्तर के करीब तीस हजार किसानो से कच्चा माल यानी बांस खरीदा जाएगा।

 

जापानी कंपनी सुजुकी ने राज्य में एक बायोगैस संयंत्र की स्थापना के लिए स्थानीय सहयोगियों के साथ हाथ मिलाया है।

 

केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत डिपार्टमेंट फार प्रमोशन आफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (डीपीआईआईटी) के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में अक्तूबर, 2019 से इस साल मार्च तक 26.10 मिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया है।

 

राज्य सरकार ते मुताबिक, सिंगापुर की कई कंपनियां असम के लॉजिस्टिक्स सेक्टर में तेजी से निवेश कर रही हैं। इसके अलावा एससीजी इंटरनेशनल और ग्लोबल पावर सिनर्जी  जैसे थाई ग्रुप असम में हरित ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और मैटीरियल सप्लाई चेन सेक्टर में निवेश की संभावनाएं तलाशते हुए अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। ALSO READ: मानसून का बदलता पैटर्न बढ़ा रहा भारत का जलवायु संकट

 

क्यों असम को चुन रहे हैं निवेशक

लेकिन आखिर राज्य के बदलते औद्योगिक परिदृश्य की क्या वजह है? विश्लेषकों का कहना है कि हाल के वर्षों में राज्य में सुरक्षा का परिदृश्य बदला है। राज्य सरकार बुनियादी ढांचा विकसित करने पर काफी जोर दे रही है। वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक समुद्र गुप्त कश्यप डीडब्ल्यू से कहते हैं, “हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने असम को निवेश के आकर्षक ठिकाने के तौर पर बढ़ावा देकर इसे भारत की एक्ट ईस्ट नीति के लिए एक रणनीतिक प्रवेश द्वार के के तौर पर स्थापित किया है।”

 

उनका कहना है, “खासकर टाटा समूह की ओर से सेमीकंडक्टर संयंत्र स्थापित किए जाने के बाद देशी, विदेशी कंपनियों में यह ठोस संदेश गया है कि असम में निवेश के अनुकूल सुरक्षित माहौल है।”

 

राजनीतिक विश्लेषक श्यामाकांत बरुआ डीडब्ल्यू से कहते हैं, असम की भौगोलिक स्थिति भी बड़े उद्योगों के लिए अनुकूल है। दक्षिण एशिया के नजदीक होने के कारण यहां से निर्यात में सहूलियत होगी।

 

कश्यप भी उनसे सहमत हैं। वो कहते हैं, “अब पूर्वोत्तर में ज्यादातर राज्यों तक रेलवे और सड़क का बेहतर नेटवर्क है। इसके अलावा ब्रह्मपुत्र में जल परिवहन भी शुरू हो गया है। ऐसे में यहां बनने वाले सामान को पूर्वोत्तर के अलावा देश के दूसरे राज्यों तक भेजना काफी आसान हो गया है।”

 

उनका कहना था, “यहां से निर्यात के लिए जल मार्ग के जरिए कोलकाता पोर्ट तक सामान भेजा जा सकता है। इसके साथ ही बांग्लादेश से देर-सबेर रिश्ते सुधरने के बाद चटगांव पोर्ट तक भी पहुंच आसान हो जाएगी। इसके साथ ही म्यांमार के सितवे पोर्ट को विकसित करने और वहां से मिजोरम की राजधानी आइजल को जोड़ने वाली सड़क का काम भी चल रहा है।” ALSO READ: क्या स्वस्थ रहने के लिए 8 घंटे सोना सच में जरूरी है?

 

बढ़ते निवेश के साथ चिंता भी बढ़ी

दूसरी ओर, इस तेज औद्योगीकरण ने चिंता भी बढ़ाई है। खासकर पर्यावरणविदों को आशंका है कि नए उद्योगों को लिए जंगल और पेड़ों की कटाई तेज हो सकती है। इसका पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

 

पर्यावरणविद दिनेश हाजरा डीडब्ल्यू से बातचीत में काजीरंगा नेशनल पार्क में कुछ साल पहले पंचसितारा होटल खोलने के सरकार के फैसले और उस पर होने वाले विवाद की मिसाल देते हैं। उनका कहना था, “असम को उद्योग, निवेश और रोजगार की जरूरत तो है। लेकिन पर्यावरण की कीमत पर ऐसा नहीं किया जाना चाहिए।”

 

हाजरा कहते हैं, “काजीरंगा नेशनल पार्क का इलाका पहले ही घट रहा है। हर साल आने वाली बाढ़ के दौरान इसका बड़ा इलाका नदी में समा जाता है। ऐसे में किसी बड़े उद्योग को अनुमति देने से पहले पर्यावरण के नियमों का पालन किया जाना चाहिए। राज्य में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का असर पहले से ही नजर आ रहा है। अब औद्योगीकरण के साथ पर्यावरण को सुरक्षित रखने के उपायों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।”

सावधान! क्या आपको भी है तेज बुखार और खांसी? नजरंदाज न करें H1N1 का यह खतरा

सावधान! क्या आपको भी है तेज बुखार और खांसी? नजरंदाज न करें H1N1 का यह खतरा

H1N1 swine flu

देश के बड़े शहरों में एक बार फिर स्वाइन फ्लू (H1N1 वायरस) के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। मौसम में बदलाव और लापरवाही के चलते यह खतरनाक वायरस तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, समय रहते इसके लक्षणों को पहचानकर बचाव न किया जाए, तो यह गंभीर रूप ले सकता है। आइए जानते हैं स्वाइन फ्लू के शुरुआती लक्षण, इससे बचने के उपाय और किन लोगों को सबसे ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। ALSO READ: H1N1 Cases: दिल्ली-NCR में 1,700 से ज्यादा मामले, मुंबई में भी तेजी, बच्चों में फ्लू जैसे लक्षण बढ़े, जानें बचाव और कब कराएं टेस्ट

 

क्या है H1N1 (स्वाइन फ्लू) और यह कैसे फैलता है?

H1N1 एक श्वसन तंत्र (Respiratory) से जुड़ा संक्रमण है, जो इन्फ्लूएंजा वायरस के कारण होता है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में बहुत तेजी से फैलता है। जब संक्रमित व्यक्ति खासता या छींकता है, तो हवा में मौजूद बूंदों के जरिए यह स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाता है।

 

स्वाइन फ्लू के शुरुआती लक्षण (Early Symptoms)

स्वाइन फ्लू के लक्षण आम फ्लू जैसे ही शुरू होते हैं, लेकिन इनकी तीव्रता काफी ज्यादा होती है। इन संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें:

 

तेज बुखार और कंपकंपी: अचानक से तेज बुखार आना और ठंड लगना।

लगातार खांसी और गले में खराश: सूखी या बलगम वाली तेज खांसी।

शरीर और सिरदर्द: मांसपेशियों में तेज दर्द और भयंकर सिरदर्द।

बेहद कमजोरी और थकान: शरीर में ऊर्जा की कमी और हर समय थकावट महसूस होना।

सांस लेने में तकलीफ: गंभीर मामलों में सीने में जकड़न और सांस फूलना (विशेषकर बुजुर्गों और बच्चों में)।

पेट से जुड़ी समस्याएं: कुछ मामलों में उल्टी और दस्त की शिकायत भी देखी जाती है।

 

किसे है सबसे ज्यादा खतरा?

कुछ विशेष वर्गों के लोगों के लिए H1N1 का यह संक्रमण जानलेवा साबित हो सकता है, जिन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए:

  • 5 साल से छोटे बच्चे और बुजुर्ग
  • गर्भवती महिलाएं
  • अस्थमा, डायबिटीज, दिल या किडनी की पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोग
  • कमजोर इम्युनिटी वाले मरीज

स्वाइन फ्लू से बचाव के असरदार उपाय

मास्क का उपयोग करें: भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों पर जाने से बचें और मास्क पहनें।

हाथों की स्वच्छता: अपने हाथों को बार-बार साबुन और पानी से धोएं या सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करें। आंखों, नाक और मुंह को गंदे हाथों से छूने से बचें।

खांसते-छींकते वक्त रखें सावधानी: खांसते या छींकते समय अपने मुंह और नाक को रुमाल या टिश्यू पेपर से ढकें।

हाइड्रेटेड रहें और आराम करें: खूब पानी पिएं, पौष्टिक आहार लें और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रखें।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें: यदि आपको लगातार तेज बुखार या सांस लेने में परेशानी हो रही है, तो खुद से दवा (सेल्फ-मेडिकेशन) लेने के बजाय तुरंत डॉक्टर से सलाह लें और H1N1 की जांच करवाएं।

 

विशेष नोट: थोड़ी सी भी लापरवाही भारी पड़ सकती है। यदि आपको या आपके परिवार में किसी को भी ऐसे लक्षण दिखें, तो तुरंत चिकित्सीय परामर्श लें।

शरीर के हर अंग को प्रभावित करता है जंगल की आग का धुआं

शरीर के हर अंग को प्रभावित करता है जंगल की आग का धुआं

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नाओमी मिहारा

शोधकर्ता अब इंसान की सेहत पर जंगल के धुएं के लंबे समय तक पड़ने वाले असर को समझने लगे हैं। और सच कहें, तो यह काफी डरावना है। अटलांटा की एमोरी यूनिवर्सिटी में पर्यावरण स्वास्थ्य के प्रोफेसर यांग लियू का कहना है, “यह धुआं आपके पूरे शरीर को प्रभावित करता है। यह शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव (अंदरूनी क्षति) पैदा करता है और बीमारियों को बहुत तेजी से बढ़ाता है या उनके होने की रफ्तार तेज कर देता है।” ALSO READ: इसराइली मंत्री के “टारगेट किलिंग” वाले बयान पर उबाल

 

जनवरी 2026 में इससे जुड़ा एक अध्ययन प्रकाशित हुआ है। इसमें यांग लियू और दूसरे शोधकर्ताओं ने पाया कि कम मात्रा में भी बार-बार धुएं के संपर्क में आने से बुजुर्गों में स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। एक महीने बाद, एक और अध्ययन में पाया गया कि 2006 और 2020 के बीच अमेरिका में जंगल की आग के धुएं के लंबे समय तक संपर्क में रहने से हर साल औसतन 24,100 लोगों की मौत हुई।

 

वनाग्नि के धुएं में कई तरह के खतरनाक और जहरीले वायु प्रदूषक घुले होते हैं। लेकिन इनमें से सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला तत्व धूल और धुएं के अतिसूक्ष्म कण होते हैं, जिन्हें पार्टिकुलेट मैटर, पीएम2।5 कहा जाता है।

 

पीएम2.5 राख, धूल और अन्य पदार्थों से बना होता है, जो स्पंज की तरह काम करता है और जहरीली धातुओं व ऑर्गेनिक कंपाउंड को अपने अंदर सोख लेता है। सांस के जरिए शरीर में घुसने पर पीएम2.5 के ये कण फेफड़ों और खून की नसों तक पहुंच जाते हैं। वहां से ये शरीर के बाकी अंगों में जलन, सूजन और भारी नुकसान पहुंचाते हैं।

 

लंबे समय तक पीएम2.5 के संपर्क में रहने से अस्थमा जैसी फेफड़ों की बीमारियों के साथ-साथ दिल की बीमारी, डायबिटीज, डिमेंशिया और कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है।

 

जंगल की आग का धुआं गर्भवती महिलाओं के लिए खास तौर पर खतरनाक होता है। इससे समय से पहले बच्चे के जन्म और जन्म के समय बच्चे का वजन कम होने का खतरा बढ़ सकता है। ALSO READ: जलवायु परिवर्तन से बचने के लिए जर्मन शहर ने उठाए कदम

 

जंगल की आग के धुएं में मौजूद पीएम 2.5 इतना जहरीला क्यों होता है?

जंगल की आग से निकलने वाला पीएम 2.5 बहुत ज्यादा जहरीला होता है, क्योंकि इसमें जलने वाली कई चीजों का मिश्रण होता है। गांव, देहात के जंगलों की आग और शहरों तक फैलने वाली आग में जलने वाली चीजें अलग होती हैं। इसलिए, इनका असर भी बदल जाता है।

 

हार्वर्ड टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के एनवायर्नमेंटल हेल्थ डिपार्टमेंट में प्रिंसिपल रिसर्च साइंटिस्ट मैरी जॉनसन का कहना है, “यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आग कहां लगी है। यहां तक कि एक ही शहर के अलग अलग मोहल्लों में भी धुएं का असर बदल सकता है, क्योंकि इसमें घुले तत्व अलग अलग हो सकते हैं।”

 

मैरी जॉनसन ने एक अंतरराष्ट्रीय टीम का नेतृत्व किया, जिसने हाल ही में वनाग्नि के धुएं के संपर्क में आए स्वस्थ दमकलकर्मियों और आम नागरिकों पर धुएं के जहरीले असर का अध्ययन किया। वे यह समझना चाहते थे कि ये जहरीले तत्व हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को कैसे नुकसान पहुंचाते हैं और शरीर को संक्रमणों व पुरानी बीमारियों के प्रति कितना संवेदनशील बना देते हैं।

 

शोधकर्ताओं को इसमें पारा और कैडमियम जैसी जहरीली धातुएं मिलीं, जो कुदरती रूप से पौधों और मिट्टी में पाई जाती हैं और ये इंसान की बनाई चीजों में भी होती हैं। इसके अलावा, उन्हें कैंसर पैदा करने वाले तत्व और कभी न खत्म होने वाले केमिकल भी मिले, जिन्हें ‘फॉरएवर केमिकल्स' या पीफास कहा जाता है।

 

पीफास इंसानों द्वारा बनाए गए रसायन (सिंथेटिक केमिकल) हैं, जिनका इस्तेमाल रोजमर्रा की कई चीजों और निर्माण सामग्री में होता है। इन्हें कई तरह के कैंसर और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी बीमारियों से जोड़कर देखा जाता है।

 

इन नतीजों के आधार पर शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि भविष्य में किए जाने वाले शोध में बच्चों, बुजुर्गों और पुरानी बीमारियों से जूझ रहे लोगों जैसे संवेदनशील वर्गों के लिए इलाज ढूंढने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। ALSO READ: मानसून का बदलता पैटर्न बढ़ा रहा भारत का जलवायु संकट

 

समय और दूरी के साथ ज्यादा घातक हो जाता है जंगल की आग का धुआं

जंगल की आग का धुआं हवा में जितने ज्यादा समय तक रहता है, उतना ही जहरीला होता जाता है। वक्त के साथ इसमें ऐसे केमिकल रिएक्शन होते हैं कि यह हमारे शरीर की कोशिकाओं को और भी बुरी तरह से नुकसान पहुंचाने लगता है।

 

ग्रीस के शोधकर्ताओं ने पाया कि आग लगने के अगले कुछ दिनों में धुआं चार गुना तक ज्यादा जहरीला हो सकता है। यह लंबी दूरी भी तेजी से तय कर सकता है और जहां आग लगी थी, वहां से हजारों मील दूर के इलाकों में भी फैल सकता है।

 

नेशनल ऑब्जर्वेटरी ऑफ एथेंस के इंस्टीट्यूट फॉर एनवायर्नमेंटल रिसर्च एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट के निदेशक निकोलॉस मिहालोपोलोस ने बताया, “अगर इन कणों को साफ करने के लिए बारिश न हो, तो ये हवा में दस दिन या उससे भी ज्यादा समय तक बने रह सकते हैं। इतने समय में ये पूरे गोलार्ध का चक्कर लगाकर वापस अपनी शुरुआत वाली जगह पर आ सकते हैं।”

 

उदाहरण के लिए, 2023 में कनाडा के जंगलों में 6,000 जगहों पर लगी आग से 1.5 करोड़ हेक्टेयर जमीन जल गई थी। इसकी वजह से “दूर तक फैलने वाला पीएम2.5 प्रदूषण” पूरे उत्तरी अमेरिका में फैल गया और यहां तक कि यूरोप और एशिया तक पहुंच गया था।

 

सितंबर 2025 में प्रकाशित एक शोध में शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि 2023 में कनाडा के जंगलों में लगी आग से निकले पीएम2।5 के संपर्क में आने के कारण उत्तरी अमेरिका में करीब 5,400 लोगों की अचानक मौत हुई। वहीं, उत्तरी अमेरिका व यूरोप में करीब 64,300 लोगों की लंबी बीमारी के कारण मौत हो सकती है।

 

हालांकि, यह ध्यान देने वाली बात है कि वायु प्रदूषण के अन्य स्रोत, जैसे कि गाड़ियों से निकलने वाला धुआं, उद्योगों से होने वाला उत्सर्जन और खाना पकाने के लिए ईंधन जलाना, कुल मिलाकर ज्यादा स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनते हैं, क्योंकि लोग रोजाना इनके संपर्क में आते हैं।

 

बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ की एनवायर्नमेंटल एपिडेमियोलॉजिस्ट कैथरीन टोन कहती हैं, “जब हम यह देखते हैं कि पूरी आबादी में मौत की मुख्य वजह क्या है, तो पता चलता है कि वायु प्रदूषण के ये बाकी दूसरे स्रोत ही असल में इतनी मौतों के लिए जिम्मेदार हैं।” ALSO READ: पृथ्वी पर ऑक्सीजन की उत्पत्ति की पहेली थोड़ी और सुलझी

 

वनाग्नि के धुएं से खुद को कैसे बचाएं

जंगल की आग का धुआं बहुत जहरीला होता है, खासकर उन लोगों के लिए जो आग लगने की आशंका वाले इलाकों के पास रहते हैं। बतौर जॉनसन, “आप धुएं से बचने के लिए जितना प्रयास करेंगे, उतना ही अच्छा होगा।”

 

उनकी सलाह है कि आग के दौरान और उसके तुरंत बाद घर के अंदर रहें, हीटिंग और एयर कंडीशनिंग सिस्टम में फिल्टर का इस्तेमाल करें, अपने पास एन95 मास्क रखें और यह ध्यान रखें कि बीमार या संवेदनशील लोगों को उनकी दवाइयां और इनहेलर आसानी से उपलब्ध हों।

 

आग का मौसम शुरू होने से पहले, लोगों को अपने घर और जमीन से आग पकड़ने वाली चीजों को हटा देना चाहिए। साथ ही, आस-पड़ोस में ऐसे निगरानी समूह बनाने चाहिए जो आग के शुरुआती संकेतों पर नजर रखें और छोटी आग को बड़ी तबाही में तब्दील होने से रोकने में मदद करे।

Top News 22 August: इमरान खान की सेहत पर बहन का बड़ा दावा, राम मंदिर निर्माण पर क्या बोले नृपेंद्र मिश्रा?

Top News 22 August: इमरान खान की सेहत पर बहन का बड़ा दावा, राम मंदिर निर्माण पर क्या बोले नृपेंद्र मिश्रा?

top news 22 august

Top News 22 August: पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान से मुलाकात के बाद उनकी बहन ने कहा कि इमरान को बहुत टॉर्चर किया जा रहा है। राम मंदिर निर्माण समिति ने अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा का दावा, मंदिर निर्माण में सरकार का एक भी पैसा नहीं लगा। दिल्ली के जंतर मंतर पर बड़ा प्रदर्शन। रूस का यूक्रेन के शॉपिंग मॉल पर हमला। सुप्रीम कोर्ट पहुंचा झाखंड भर्ती विवाद। 22 अगस्त की बड़ी खबरें : 

 

इमरान के स्वास्थ्य पर क्या बोलीं बहन उज्मा?

पाकिस्तान की जेल में बंद पूर्व PM इमरान खान की बहन उज्मा ने दावा किया कि मुलाकात के दौरान इमरान बार-बार एक ही चीज कही, मेरे साथ जुल्म हुआ है। मुझे बहुत टॉर्चर किया जा रहा है। आंखों के इलाज के लिए इंजेक्शन न लगने पर स्थिति और बिगड़ने का खतरा था। आंख की एक नस खराब होने से बची हुई है। एक इंजेक्शन लगने के बाद अब धीरे-धीरे आंखों की रोशनी वापस आ रही है।

 

मंदिर निर्माण में नहीं लिया सरकार का एक भी पैसा

राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने कहा कि मंदिर निर्माण में निश्चित रूप से ट्रस्ट का योगदान है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिर और परिसर के निर्माण में केंद्र अथवा राज्य सरकार का एक पैसा भी नहीं लगा है।

 

दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ा प्रदर्शन

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के प्रसिद्ध धरना स्थल जंतर-मंतर पर शुक्रवार को एक बार फिर बड़ा प्रदर्शन हुआ। आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के इक्विटी रेगुलेशंस के विरोध में हजारों लोग जुटे। प्रदर्शन का आयोजन ‘Reservation Reform Andolan’ के बैनर तले किया गया। ALSO READ: दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ा प्रदर्शन, आरक्षण और UGC नियमों के विरोध में उतरे हजारों लोग

 

रूस का यूक्रेन के शॉपिंग मॉल पर हमला

रूस ने शुक्रवार दोपहर मध्य यूक्रेन के क्रिवी रिह शहर में कई ड्रोन से हमला किया। इस हमले में शहर के एक बड़े शॉपिंग मॉल को निशाना बनाया गया। मीडिया खबरों के अनुसार, इस हमले में कम से कम 14 लोगों की मौत हुई और 121 लोग घायल हुए। घायलों में 22 बच्चे शामिल हैं।

 

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा झाखंड भर्ती विवाद

झारखंड में परीक्षा रद्द करने और नियुक्तियों को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। रांची में 24 दिन आंदोलन के बाद झारखंड सरकार ने परीक्षाएं रद्द कर दी थी। हाईकोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी थी। मामले में दायर याचिका पर शीर्ष अदालत सोमवार को सुनवाई कर सकती है।

 

वंदे मातरम् पर सबकुछ, जो जानना जरूरी है

वंदे मातरम् पर सबकुछ, जो जानना जरूरी है

vande matram

वंदे मातरम् भारत के उन विरल शब्दों में है, जिन्हें केवल पढ़ा या गाया नहीं जाता—उन्हें महसूस किया जाता है। यह दो शब्द स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान नारा बने, गीत बने, प्रतिरोध की आवाज बने और अंततः स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

आज जब वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में देशभर में कार्यक्रम हो रहे हैं, तब इस गीत को केवल राष्ट्रवाद के भाव से नहीं, बल्कि उसके इतिहास, साहित्य, संगीत, स्वतंत्रता संग्राम, संवैधानिक स्थिति और उससे जुड़े विवादों के साथ समझना जरूरी है। भारत सरकार ने 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक इसका वर्षभर का ‘राष्ट्रीय स्मरणोत्सव’ आयोजित किया है।

सबसे पहले जानिए—‘वंदे मातरम्का अर्थ क्या है?

वंदे मातरम् संस्कृत का वाक्यांश है।
वंदे — मैं नमन करता हूं / प्रणाम करता हूं
मातरम् — हे माता / मातृभूमि को

अर्थात इसका भाव है—
हे मातृभूमि, मैं तुम्हें नमन करता हूं।
यहां ‘माता’ केवल एक व्यक्ति या देवी का बोध नहीं कराती; गीत के शुरुआती हिस्से में वह धरती, प्रकृति, समृद्धि और मातृभूमि का काव्यात्मक रूपक बन जाती है।

इसीलिए इस गीत की सबसे पहली और सबसे शक्तिशाली कल्पना है—देश को मां के रूप में देखना।

किसने लिखा था वंदे मातरम्?

‘वंदे मातरम्’ के रचयिता थे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय—बंगाल के महान उपन्यासकार, कवि और विचारक।
सरकारी अभिलेखों के अनुसार इसकी रचना 7 नवंबर 1875, अक्षय नवमी के दिन मानी जाती है। बाद में यह बंकिमचंद्र के प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा बना, जो 1882 में प्रकाशित हुआ।
यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी जरूरी है।

1875 में रचना और 1882 में प्रकाशनदोनों बातें सही हैं।

150वीं वर्षगांठ 1875 की रचना-तिथि के आधार पर मनाई जा रही है। लेकिन कुछ इतिहासकार प्रकाशन और रचना की कालक्रम संबंधी बारीकियों को लेकर अलग-अलग मत रखते हैं। इसलिए “1875 में रचा गया और “1882 में आनंदमठ में प्रकाशित हुआ—इन दोनों को अलग-अलग समझना चाहिए।

 ‘वंदे मातरम्मूल रूप से कहां आया था?
बंकिमचंद्र ने इसे अपने उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया।
‘आनंदमठ’ की पृष्ठभूमि 18वीं शताब्दी के संन्यासी विद्रोह से जुड़ी थी। उपन्यास में मातृभूमि को एक जीवंत शक्ति के रूप में देखने का विचार सामने आता है।

यही वह बिंदु था जहां साहित्य और राष्ट्रभावना एक-दूसरे से जुड़ने लगे।
बंकिमचंद्र के लिए भारत केवल एक भौगोलिक भू-भाग नहीं था। वह एक ऐसी मां थी, जिसके प्रति संतान का रिश्ता प्रेम, श्रद्धा और त्याग का था।

वंदे मातरम् की भाषा कैसी है?

यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि ‘वंदे मातरम्’ पूरी तरह आधुनिक हिंदी या आधुनिक बंगाली में लिखा हुआ गीत नहीं है। यह गीत संस्कृत और बांग्ला भाषा का एक सुंदर मिश्रण है। इसी कारण इसकी भाषा में एक ओर प्राचीन भारतीय काव्य की गरिमा दिखाई देती है, तो दूसरी ओर बंगाल की साहित्यिक परंपरा की छाप भी मिलती है।

पहली बार सार्वजनिक रूप से किसने गाया?

यहां आता है इस गीत के इतिहास का अगला बड़ा नाम—रवींद्रनाथ ठाकुर (टेगौर)।
1896 में कलकत्ता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने वंदे मातरम्गाया। यह इसका स्वतंत्रता आंदोलन के राजनीतिक मंच पर एक महत्वपूर्ण प्रवेश था।
इसके बाद कांग्रेस के अधिवेशनों में इसे गाने की परंपरा विकसित हुई और धीरे-धीरे यह गीत राष्ट्रीय आंदोलन की पहचान बन गया।

1905 : वह साल जब वंदे मातरम्गीत से आंदोलन का नारा बन गया
अगर 1896 में ‘वंदे मातरम्’ कांग्रेस के मंच पर पहुंचा था, तो 1905 में यह सड़कों पर उतर आया।
ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया।
इसके विरोध में स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ।

1905 के 'बंग-भंग' आंदोलन के दौरान 'वंदे मातरम' अंग्रेजों के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा महामंत्र और क्रांतिकारी नारा बना। 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के समर्थन में आयोजित ऐतिहासिक सभा के दौरान हजारों लोगों ने वंदे मातरम्के नारे लगाए। यही वह समय था जब यह शब्द राजनीतिक प्रतिरोध की सामूहिक आवाज बन गया।

सरकार इससे इतनी चिंतित हुई कि सार्वजनिक रूप से ‘वंदे मातरम्’ के उच्चारण को रोकने के प्रयास किए गए।

ब्रिटिश सरकार इससे क्यों डरती थी?

क्योंकि ‘वंदे मातरम्’ केवल गीत नहीं रह गया था।
यह बन चुका था—

  • ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध का नारा
  • विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का प्रतीक
  • स्वदेशी आंदोलन की आवाज
  • छात्रों और युवाओं की प्रेरणा
  • सभाओं और जुलूसों की पहचान
  • जेल जाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों का उद्घोष

पूर्वी बंगाल में प्रशासन ने इसे स्कूल-कॉलेजों और सार्वजनिक स्थानों पर रोकने के प्रयास किए। अप्रैल 1906 में बरिसाल में इसके सार्वजनिक उच्चारण पर प्रतिबंध लगाया गया और आंदोलनकारियों ने इसका विरोध किया।

1906: ‘बंदे मातरम्नाम का अखबार भी निकला

‘वंदे मातरम्’ केवल गीत और नारा नहीं रहा।
1906 में इसी नाम से अंग्रेजी अखबार Bande Mataram शुरू हुआ। इसके संपादकीय लेखन से बिपिन चंद्र पाल और बाद में श्री अरविंद जैसे राष्ट्रवादी नेता जुड़े।
इस अखबार ने स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और राजनीतिक स्वतंत्रता की विचारधारा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यानी एक गीत का नाम धीरे-धीरे पूरे राष्ट्रवादी विमर्श की पहचान बन गया।

क्या गांधीजी भी वंदे मातरम्के समर्थक थे?

महात्मा गांधी ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक भूमिका और उसके राष्ट्रीय महत्व को स्वीकार करते थे। लेकिन गांधीजी के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ ऐसा राष्ट्रवाद नहीं था जो किसी समुदाय को अलग-थलग कर दे।
यही कारण है कि आगे चलकर गीत के कुछ अंशों को लेकर बहस हुई और राष्ट्रीय मंचों पर इसके उपयोग को लेकर सावधानी बरती गई।
यह समझना भी जरूरी है कि वंदे मातरम्का सम्मान और उसके सभी अंतरों को हर अवसर पर गानादो अलग प्रश्न हैं।

विवाद आखिर किस बात पर था?

यह विवाद मुख्यतः गीत के बाद के अंतरों से जुड़ा था।
शुरुआती दो अंतरों में मातृभूमि की प्रकृति, सौंदर्य, हरियाली, जल, फसल और समृद्धि का वर्णन है।
लेकिन बाद के अंतरों में मातृभूमि को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के स्वरूपों से जोड़ने वाली धार्मिक प्रतीकात्मकता आती है।
कुछ मुस्लिम नेताओं और अन्य लोगों को लगा कि इन धार्मिक प्रतीकों के कारण इसे सभी समुदायों के लिए समान रूप से स्वीकार करना कठिन हो सकता है।
यहां इतिहास को न तो छिपाने की जरूरत है और न ही सरल बनाकर पेश करने की।

वंदे मातरम् भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रवादी गीत था, लेकिन उसके धार्मिक बिंबों को लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर भी बहस हुई थी।

1937: केवल पहले दो अंतरे क्यों?

यह इस पूरे इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।
1937 में कांग्रेस ने इस प्रश्न पर विचार किया कि राष्ट्रीय कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ का किस रूप में इस्तेमाल किया जाए।
बहस के बाद पहले दो अंतरों को राष्ट्रीय अवसरों के लिए स्वीकार्य रूप माना गया, क्योंकि उनमें मुख्यतः मातृभूमि और प्रकृति का वर्णन था।
बाद के अंतरों में धार्मिक प्रतीकों की मौजूदगी के कारण उन्हें राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए अलग रखा गया। हालिया ऐतिहासिक विश्लेषणों में यह भी दर्ज है कि इस निर्णय के पीछे रवींद्रनाथ ठाकुर, जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी की व्यापक चिंता धार्मिक समावेशिता को लेकर थी।
यही कारण है कि आज जब वंदे मातरम्के पहले दो अंतरे गाए जाते हैं, तो उसके पीछे 1937 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है।

1947: आजादी की पूर्व संध्या पर भी वंदे मातरम्

14 अगस्त 1947 की रात संविधान सभा की ऐतिहासिक बैठक में स्वतंत्र भारत की सत्ता हस्तांतरण प्रक्रिया शुरू हुई।
बैठक की शुरुआत वंदे मातरम्के प्रथम पद के गायन से हुई, जिसे सुचेता कृपलानी ने गाया।
यानी जिस गीत ने दशकों तक आजादी के लिए संघर्ष कर रहे भारतीयों को आवाज दी थी, वही गीत स्वतंत्र भारत की जन्म-वेला का भी हिस्सा बना।
यह अपने आप में इतिहास का एक असाधारण संयोग है।

15 अगस्त 1947 की सुबह और वंदे मातरम्

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘वंदे मातरम्’ की एक और महत्वपूर्ण प्रस्तुति हुई।
पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने 15 अगस्त 1947 की सुबह ऑल इंडिया रेडियो से ‘वंदे मातरम्’ का प्रसारण किया। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें सरदार वल्लभभाई पटेल के आमंत्रण पर सुबह लगभग 6:30 बजे इसे प्रसारित करने के लिए बुलाया गया था।
यह केवल संगीत प्रस्तुति नहीं थी—यह गुलाम भारत से स्वतंत्र भारत में प्रवेश की सांस्कृतिक ध्वनि थी।

24 जनवरी 1950: ‘वंदे मातरम्को मिला राष्ट्रीय गीत का दर्जा

यह सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक तथ्य है।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठक में तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की—
“The song Vande Mataram, which has played a historic part in the struggle for Indian freedom, shall be honoured equally with Jana Gana Mana and shall have equal status with it.”
इस निर्णय के अनुसार:
जन गण मन राष्ट्रीय गान
वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत
और दोनों को समान सम्मान दिए जाने की बात स्पष्ट रूप से कही गई।
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह निर्णय संविधान के किसी अनुच्छेद में लिखे हुए प्रावधान के रूप में नहीं, बल्कि संविधान सभा के अध्यक्ष की 24 जनवरी 1950 की घोषणा के रूप में सामने आया था।

Vande matram

इसलिए वंदे मातरम्को राष्ट्रीय गान कहना सही नहीं है।
वह भारत का राष्ट्रीय गीत है।
 ‘वंदे मातरम्और जन गण मनमें टकराव नहीं, अलग इतिहास है
दोनों को एक-दूसरे के विकल्प की तरह देखना इतिहास को छोटा करना होगा।
वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष, प्रतिरोध और मातृभूमि के प्रति भावनात्मक समर्पण की आवाज रहा।
जन गण मन स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय-संवैधानिक पहचान का राष्ट्रीय गान बना।
इसीलिए 1950 में संविधान सभा ने दोनों को सम्मान दिया।

क्या वंदे मातरम्का पूरा गीत राष्ट्रीय गीत है?

यह प्रश्न आज फिर चर्चा में है।
ऐतिहासिक रूप से पूरा मूल गीत बंकिमचंद्र की रचना है, लेकिन राष्ट्रीय गीत के रूप में सार्वजनिक राष्ट्रीय उपयोग की परंपरा मुख्यतः पहले दो अंतरों पर केंद्रित रही है।
1937 के कांग्रेस निर्णय और बाद की राष्ट्रीय परंपरा में पहले दो अंतरों को स्वीकार किया गया। 1950 की संवैधानिक घोषणा में भी ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया, लेकिन उस घोषणा में पूरे गीत के प्रत्येक अंतरे को अनिवार्य रूप से गाने का कोई अलग निर्देश नहीं दिया गया।
इसलिए आज की बहस में मूल गीत, राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकृत पाठ और किसी कार्यक्रम का प्रोटोकॉल—इन तीनों को अलग रखना जरूरी है।

संगीत किसने दिया?

यह भी एक रोचक तथ्य है कि ‘वंदे मातरम्’ की धुन का इतिहास एक ही व्यक्ति से सरलता से नहीं जोड़ा जा सकता।
संगीत इतिहास से संबंधित शोध के अनुसार जदुनाथ भट्टाचार्य को इसकी शुरुआती धुन तैयार करने वालों में प्रमुख माना जाता है। बाद में रवींद्रनाथ ठाकुर सहित अनेक संगीतकारों ने इसे अलग-अलग धुनों और शैलियों में प्रस्तुत किया।
राग को लेकर भी मतभेद मिलते हैं—कुछ परंपराएं इसे देश से जोड़ती हैं, जबकि अन्य अलग संगीतात्मक रूपों का उल्लेख करती हैं।
यही कारण है कि ‘वंदे मातरम्’ की एक ही धुन नहीं, बल्कि इसकी कई ऐतिहासिक प्रस्तुतियां मिलती हैं।

 ‘वंदे मातरम्की आवाज रिकॉर्ड भी हुई

रिकॉर्डिंग तकनीक के शुरुआती दौर में भी यह गीत लोगों तक पहुंचा।
20वीं सदी के आरंभ में इसके रिकॉर्ड उपलब्ध होने लगे और बाद में विभिन्न गायकों तथा संगीतकारों ने इसे अपनी-अपनी शैली में प्रस्तुत किया।
रवींद्रनाथ ठाकुर से जुड़ी शुरुआती रिकॉर्डिंग पर भी इतिहासकारों ने चर्चा की है।
इससे पता चलता है कि यह गीत केवल सभाओं और जुलूसों तक सीमित नहीं रहा—वह तेजी से उभरती आधुनिक जनसंचार संस्कृति का भी हिस्सा बन गया।

आजाद हिंद फौज और वंदे मातरम्

‘वंदे मातरम्’ की गूंज केवल कांग्रेस या मुख्यधारा के स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं रही।
सरकारी ऐतिहासिक सामग्री के अनुसार यह गीत आजाद हिंद की अस्थायी सरकार के कार्यक्रमों में भी गाया गया।
अर्थात अलग-अलग राजनीतिक धाराओं और स्वतंत्रता संघर्ष के विभिन्न हिस्सों में इस गीत ने राष्ट्रवादी भावनाओं को अभिव्यक्त किया।
वंदे मातरम् : केवल बंगाल का गीत कैसे बना भारत की आवाज?
यही शायद इसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि है।
इसका जन्म बंगाल के साहित्यिक वातावरण में हुआ।
फिर—

बंगाल कांग्रेस स्वदेशी आंदोलन विद्यार्थी आंदोलन क्रांतिकारी आंदोलन राष्ट्रीय सभाएं स्वतंत्रता संग्राम संविधान सभा स्वतंत्र भारत

इस पूरे सफर में ‘वंदे मातरम्’ लगातार अपना अर्थ विस्तार करता गया।
इसने भाषा और क्षेत्र की सीमाएं पार कीं।

vande matram

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2025–26: 150 साल बाद फिर केंद्र में क्यों है वंदे मातरम्’?

भारत सरकार ने 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ का वर्षभर चलने वाला राष्ट्रीय स्मरणोत्सव आयोजित किया।
7 नवंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में इसकी शुरुआत की। कार्यक्रम में स्मारक डाक टिकट और सिक्का जारी किया गया तथा देशभर में सामूहिक गायन आयोजित किया गया।
2026 के गणतंत्र दिवस पर संस्कृति मंत्रालय की झांकी का विषय भी था—
स्वतंत्रता का मंत्र वंदे मातरम्
इसमें गीत की यात्रा को स्वतंत्रता आंदोलन, सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक भारत से जोड़कर प्रस्तुत किया गया।

अगस्त 2026 में हर घर तिरंगा अभियान भी ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ को समर्पित किया गया।
विधेयक में संशोधन : संसद ने Prevention of Insults to National Honour 1971 (Amendment) Act 2026 के माध्यम से अधिनियम की धारा 3 (Section 3) में संशोधन किया है। यह संशोधन वंदे मातरम के अनादर, अपमान या सामूहिक गायन में बाधा डालने को दंडनीय अपराध बनाता है। गृह मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक दिशानिर्देशों में वंदे मातरम की 150वीं जयंती के अवसर पर सभी 6 अंतरों को (समग्र रूप) औपचारिक राजकीय कार्यक्रमों और शैक्षणिक संस्थानों के आयोजनों में गाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। 

आज फिर विवाद क्यों?

2026 में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर राजनीतिक बहस फिर तेज हुई है।
विवाद का एक प्रमुख बिंदु है—क्या पूरा गीत गाया जाना चाहिए या केवल पहले दो अंतरे?
कांग्रेस ने हाल में अपने कार्यक्रमों में पहले दो अंतरों की परंपरा को 1937 के निर्णय से जोड़ते हुए कायम रखने की बात कही है, जबकि भाजपा नेताओं ने इसे लेकर कड़ी राजनीतिक आपत्ति जताई है।
लेकिन इतिहास को समझने के लिए राजनीति से एक कदम पीछे हटना जरूरी है।
असल सवाल यह है कि—
क्या राष्ट्रीय प्रतीकों को उनकी पूरी ऐतिहासिक जटिलता के साथ समझा जा सकता है?

‘वंदे मातरम्’ का इतिहास बताता है कि भारत की राष्ट्रीय पहचान हमेशा एक सीधी रेखा में नहीं बनी। उसमें आस्था भी थी, संघर्ष भी; साहित्य भी था, राजनीति भी; भावनाएं भी थीं और बहस भी।
वंदे मातरम् का सबसे बड़ा संदेश क्या है?
शायद इसका सबसे बड़ा संदेश उस समय को समझने में है जब यह लिखा गया था।
एक गुलाम देश में किसी लेखक का यह कहना कि—
मातृभूमि केवल जमीन नहीं, मां है।
अपने आप में एक राजनीतिक और भावनात्मक क्रांति थी।
बाद में इसी भावना ने युवाओं को सड़कों पर उतारा, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को जनांदोलन बनाया और हजारों स्वतंत्रता सेनानियों के लिए यह दो शब्द साहस का प्रतीक बने।
और शायद यही वजह है कि 150 साल बाद भी ये दो शब्द जीवित हैं

‘वंदे मातरम्’ की यात्रा को केवल 1875 से 2026 तक की तारीखों में नहीं बांधा जा सकता।
यह यात्रा है—
कविता से क्रांति तक।
साहित्य से राजनीति तक।
नारे से राष्ट्रीय गीत तक।
और अतीत से वर्तमान तक।

बंकिमचंद्र ने जिस मां की कल्पना की थी, स्वतंत्रता सेनानियों ने उसके लिए संघर्ष किया, संविधान सभा ने उसके ऐतिहासिक योगदान को सम्मान दिया और आज की पीढ़ी उसी शब्द को एक नए भारत की आकांक्षाओं के साथ जोड़ रही है।
इसलिए ‘वंदे मातरम्’ को केवल एक गीत मानना उसके इतिहास को छोटा करना होगा।
यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की सांस्कृतिक स्मृति है।
और शायद इसका सबसे सुंदर अर्थ यही है—
देश से प्रेम केवल उसे प्रणाम करने में नहीं, बल्कि उसके प्रति अपने कर्तव्य को समझने में है।

वंदे मातरम्उन्हीं शब्दों में से एक है।
यह बंकिमचंद्र की कविता से निकला, रवींद्रनाथ की आवाज में राष्ट्रीय मंच तक पहुंचा, स्वदेशी आंदोलन में नारा बना, ब्रिटिश सत्ता के लिए चुनौती बना, स्वतंत्रता सेनानियों के होंठों पर गूंजा, आजादी की पूर्व संध्या पर संविधान सभा में गाया गया और 24 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मानित हुआ।
150 साल बाद इसकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता शायद यही है कि हम इसे केवल नारे की तरह नहीं, इतिहास की तरह समझें।
क्योंकि जिस देश ने ‘वंदे मातरम्’ को जन्म दिया, उसकी लोकतांत्रिक ताकत केवल एक स्वर में बोलने में नहीं, बल्कि अलग-अलग स्वरों को साथ लेकर चलने में भी है।
वंदे मातरम्।

ऐतिहासिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण बात

‘वंदे मातरम्’ को समझने के लिए केवल उसके गीतात्मक अर्थ को नहीं, बल्कि 1875 की रचना, 1882 का आनंदमठ, 1896 का कांग्रेस अधिवेशन, 1905 का स्वदेशी आंदोलन, 1937 की स्वीकार्यता-बहस और 24 जनवरी 1950 की संविधान सभा की घोषणा—इन सभी पड़ावों को एक साथ देखना चाहिए। यही इसकी पूरी कहानी है।

संदर्भ और प्राथमिक स्रोत

  1. भारत सरकार, संस्कृति मंत्रालय — 150 Years of Vande Mataram

  2. भारत सरकार, प्रधानमंत्री कार्यालय — 150 Years of Vande Mataram

  3. Press Information Bureau — A Melody That Became a Movement

  4. Constituent Assembly Debates, 24 January 1950 — डॉ. राजेंद्र प्रसाद की मूल घोषणा

  5. Constitution of India Digital Archive — Vande Mataram and Constitutional History

  6. Constituent Assembly Debates, 14 August 1947 — स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर ‘वंदे मातरम्’ का गायन

  7. PIB — 1905 का स्वदेशी आंदोलन और 1906 का बरिसाल आंदोलन

  8. The Indian Express — गीत की संगीत यात्रा और विभिन्न धुनों का इतिहास

दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ा प्रदर्शन, आरक्षण और UGC नियमों के विरोध में उतरे हजारों लोग

दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ा प्रदर्शन, आरक्षण और UGC नियमों के विरोध में उतरे हजारों लोग

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के प्रसिद्ध धरना स्थल जंतर-मंतर पर शुक्रवार को एक बार फिर बड़ा प्रदर्शन हुआ। आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के इक्विटी रेगुलेशंस के विरोध में हजारों लोग जुटे। प्रदर्शन का आयोजन ‘Reservation Reform Andolan’ के बैनर तले किया गया। इसकी अगुवाई NEET अभ्यर्थी हर्ष दुबे ने की। प्रदर्शन में General Sena, Chanakya Sena और Karni Sena समेत कई संगठनों ने हिस्सा लिया।

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प्रदर्शनकारियों की क्या मांग है?

प्रदर्शन में मुख्य रूप से सामान्य यानी अनारक्षित वर्ग से जुड़े लोग शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग की। उनका कहना था कि आरक्षण का लाभ उन लोगों तक पहुंचना चाहिए, जिन्हें वास्तव में सरकारी सहायता की जरूरत है। कई प्रदर्शनकारियों ने आरक्षण का लाभ तय करने में आर्थिक स्थिति को भी आधार बनाए जाने की मांग की। प्रदर्शन में इन्फ्लुएंसर अजीत भारती और Reservation Hatao Mission से जुड़े लोग भी नजर आए।

 

कुछ प्रदर्शनकारियों ने SC/ST Act पर भी आपत्ति जताई और इसमें बदलाव की मांग की। उनका तर्क था कि किसी भी कानून का दुरुपयोग किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं होना चाहिए। यह प्रदर्शन ऐसे समय हुआ है, जब UGC के इक्विटी रेगुलेशंस को फिलहाल रोक दिया गया है। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वे इन नियमों का विरोध करते हैं और सरकार से पूरी आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शन स्थल पर कुछ लोगों ने हनुमान चालीसा का पाठ किया और धार्मिक नारे भी लगाए। सामने आए वीडियो में प्रदर्शनकारी ‘सियारामचंद्र की जय’ के नारे लगाते हुए दिखाई दिए।

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पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच क्यों हुआ भ्रम?

 

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस की अनुमति को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं थी। पुलिस ने सार्वजनिक सूचना जारी कर आयोजकों और प्रदर्शनकारियों से कानून का पालन करने और शांति बनाए रखने की अपील की थी। इसके साथ ही प्रदर्शन स्थल को लेकर भी विवाद सामने आया। सवाल था कि प्रदर्शन जंतर-मंतर या रामलीला मैदान में होगा। हर्ष दुबे ने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पहुंचने की कोशिश कर रहे कुछ लोगों को बाहर ही रोक दिया गया। आयोजकों का दावा था कि उन्हें प्रदर्शन को रामलीला मैदान ले जाने के लिए कहा गया। कुछ प्रदर्शनकारियों ने बताया कि वे रामलीला मैदान गए, लेकिन बाद में वापस जंतर-मंतर लौट आए।

 

बाद में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति दे दी गई। सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस के साथ रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (ITBP) के जवानों को तैनात किया गया। प्रदर्शन स्थल के आसपास बैरिकेडिंग भी की गई। प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों ने कार्रवाई करते हुए कई लोगों को हिरासत में लिया। हालांकि, प्रदर्शनकारियों का कहना रहा कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण था।

प्रधानमंत्री मोदी को ज्ञापन सौंपने की तैयारी

 

हर्ष दुबे ने कहा कि प्रदर्शनकारी तब तक जंतर-मंतर पर रहेंगे, जब तक वे अपना ज्ञापन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं सौंप देते। उन्होंने कहा कि उनकी मुख्य मांग यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का लाभ उन लोगों तक पहुंचे, जिन्हें वास्तव में सरकारी सहायता की जरूरत है। पिछले कुछ हफ्तों में ऑनलाइन मुहिम के जरिए इस अभियान को गति मिली है। आरक्षण सुधार और UGC के इक्विटी रेगुलेशंस के विरोध से जुड़े प्रदर्शन नागपुर, लखनऊ, जयपुर और विशाखापत्तनम में भी सामने आ चुके हैं।

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राजस्थान में श्री राजपूत करणी सेना ने इससे पहले UGC Equity Regulations के विरोध में जयपुर तक करीब 800 किलोमीटर लंबी यात्रा निकाली थी। यह मार्च 24 दिनों तक चला था। बाद में प्रदर्शनकारियों के बैरिकेड पार करने के कथित प्रयास के बाद पुलिस के साथ झड़प भी हुई थी।

 

शुक्रवार को जंतर-मंतर पर हुआ प्रदर्शन आरक्षण के मुद्दे को लेकर एक और बड़े जमावड़े के रूप में सामने आया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वे अपना अभियान जारी रखेंगे और मांगें नहीं माने जाने पर आने वाले दिनों में आंदोलन और बड़ा हो सकता है।

अब प्रदर्शनकारियों का अगला कदम क्या होगा?

 

प्रदर्शनकारियों का अगला फोकस अपनी मांगों को ज्ञापन के माध्यम से केंद्र सरकार तक पहुंचाने पर रहेगा। हर्ष दुबे ने कहा है कि प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर छोड़ने से पहले अपनी मांगें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंचाना चाहते हैं। आयोजकों ने संकेत दिया है कि सरकार की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर अभियान आगे भी जारी रह सकता है। कई शहरों में पहले ही इसी तरह के प्रदर्शन सामने आने के कारण आने वाले दिनों में आंदोलन का दायरा बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।

 

फिलहाल सुरक्षा एजेंसियां जंतर-मंतर पर नजर बनाए हुए हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और UGC नियमों से जुड़ी अपनी चिंताओं को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से अभियान जारी रखना चाहते हैं।

UP-Japan Investment Meet 2026: यूपी और जापान के यामानाशी में पर्यटन सहयोग, सारनाथ-फुजिसान से मजबूत होंगे रिश्ते

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उत्तर प्रदेश सरकार अब अपने तेजी से विकसित हो रहे बौद्ध पर्यटन को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इस कड़ी में जापान को प्रदेश का एक स्वाभाविक और महत्वपूर्ण साझेदार माना जा रहा है। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने शुक्रवार को यामानाशी प्रीफेक्चर के प्रतिनिधिमंडल के साथ हुए संवाद सत्र में कहा कि 'यामानाशी, जापानी पर्यटकों को उत्तर प्रदेश के बौद्ध और आध्यात्मिक स्थलों से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकता है।'

 

लखनऊ स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान (आईजीपी) में आयोजित कार्यक्रम में यामानाशी के गवर्नर कोटारो नागासाकी और डिप्टी-गवर्नर जुनिची इशिदेरा के नेतृत्व में आए प्रतिनिधिमंडल ने हिस्सा लिया। संवाद सत्र में उत्तर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों और पर्यटन उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों ने दोनों क्षेत्रों के बीच मौजूद सांस्कृतिक संबंधों को पर्यटन गतिविधियों और संस्थागत सहयोग में बदलने की संभावनाओं पर चर्चा की।

 

बौद्ध सर्किट को वैश्विक बाजार से जोड़ने पर जोर

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि 'मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में वर्ष 2017 के बाद प्रदेश में बौद्ध पर्यटन के विकास की सोच में व्यापक बदलाव आया है। अब सरकार का फोकस केवल स्मारकों के विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि बेहतर कनेक्टिविटी, पर्यटक सुविधाओं, ठहरने की व्यवस्था और पर्यटन स्थलों पर बेहतर अनुभव उपलब्ध कराने पर भी है। उन्होंने कहा कि बौद्ध सर्किट के प्रमुख स्थलों पर मजबूत आधारभूत ढांचा तैयार किया गया है। अब सरकार की प्राथमिकता इस विकास को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने की है। भगवान बुद्ध की विरासत सदियों से भारत और जापान के लोगों को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से जोड़ती रही है, इसलिए जापान उत्तर प्रदेश के लिए एक स्वाभाविक और महत्वपूर्ण साझेदार है।'

 

यामानाशी बनेगा जापान में यूपी पर्यटन का नया प्रवेश द्वार : जयवीर सिंह

मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि 'यामानाशी जापानी पर्यटकों को उत्तर प्रदेश से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार की मंशा यामानाशी को उत्तर प्रदेश के पर्यटन के लिए जापान में एक मजबूत प्रवेश द्वार के रूप में विकसित करने की है। वहीं, उत्तर प्रदेश को बौद्ध धर्म, अध्यात्म, वेलनेस और भारतीय संस्कृति में रुचि रखने वाले जापानी पर्यटकों के लिए स्वाभाविक पर्यटन गंतव्य बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है। सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती, कपिलवस्तु, कौशाम्बी और संकिसा जैसे स्थल भगवान बुद्ध के जीवन और उनकी यात्राओं के अलग-अलग अध्यायों से पर्यटकों को जोड़ते हैं।

 

'आर्थिक प्रगति और बौद्ध विरासत से निवेशकों को लुभा रहा यूपी' 

अपर मुख्य सचिव पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग अमृत अभिजात ने कहा कि उत्तर प्रदेश अब सिर्फ अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत ही नहीं, अपितु तेज आर्थिक विकास और मजबूत होते बुनियादी ढांचे के कारण भी निवेशकों की पसंद बन रहा है। उन्होंने कहा कि हाईवे, नागरिक उड्डयन, उद्योग और निवेश के क्षेत्र में प्रदेश ने तेजी से प्रगति की है। साथ ही उत्तर प्रदेश भगवान बुद्ध से जुड़े छह प्रमुख स्थलों की भूमि है, जहां जापानी पर्यटकों को शांति और आध्यात्मिक अनुभव के साथ समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर मिलेगा। उन्होंने कहा कि जापानी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा को पूर्व निर्धारित कार्यक्रम से पहले आगे बढ़ाया जाना उत्तर प्रदेश और जापान के बीच बढ़ते संवाद और मजबूत होते संबंधों का सकारात्मक संकेत है। अमृत अभिजात ने जापानी निवेशकों को प्रदेश के पर्यटन क्षेत्र में मौजूद संभावनाओं का लाभ उठाने और पर्यटन उत्पादों व अनुभवों के विकास में निवेश करने के लिए आमंत्रित किया।

 

उत्तर प्रदेश की पर्यटन विविधता को कोइजुमी ने सराहा

यामानाशी के पर्यटन, संस्कृति एवं खेल विभाग के महानिदेशक योशीयुकी कोइजुमी ने उत्तर प्रदेश की पर्यटन विविधता और प्रतिनिधिमंडल के आत्मीय स्वागत की सराहना की। उन्होंने कहा कि 'प्रदेश में विरासत, आध्यात्मिकता, प्राकृतिक सौंदर्य और संस्कृति का अनूठा संगम है। कोइजुमी ने यह भी कहा कि यामानाशी और उत्तर प्रदेश के बीच मौजूद गहरे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंध दोनों प्रान्त के लोगों के बीच पर्यटन, आपसी आदान-प्रदान और बेहतर समझ को बढ़ावा देने का मजबूत आधार बन सकते हैं।'

 

दोनों ओर पर्यटकों की आवाजाही बढ़ाने पर संवाद

संवाद सत्र में उत्तर प्रदेश और यामानाशी के बीच पर्यटकों की आवाजाही बढ़ाने के लिए व्यावहारिक अवसरों और आवश्यकताओं पर भी चर्चा हुई। इस बीच, टॉर्नोस के संस्थापक एवं सीईओ तथा फिक्की पर्यटन समिति के अध्यक्ष प्रतीक हीरा ने कहा कि 'उत्तर प्रदेश और जापान की साझा सांस्कृतिक विरासत पर्यटन सहयोग के लिए स्वाभाविक आधार तैयार करती है। उत्तर प्रदेश भगवान बुद्ध की भूमि है और जापान में शिव, गणेश, सरस्वती, कुबेर, लक्ष्मण और यहां तक कि भगवान कृष्ण जैसे भारतीय देवी-देवताओं के प्रति भी श्रद्धा का भाव देखने को मिलता है। यामानाशी को जापान के 'फ्रूट बाउल' के रूप में जाना जाता है और उत्तर प्रदेश की मजबूत कृषि पहचान दोनों क्षेत्रों के बीच एक और समानता है। उन्होंने यह भी कहा कि हर वर्ष करीब दो लाख भारतीय जापान की यात्रा करते हैं और दोनों दिशाओं में पर्यटन बढ़ाने की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।'

 

सत्र के दौरान तबीज़ुकी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के राजन कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश की आतिथ्य परंपरा और खान-पान जापानी पर्यटकों के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करने का अहम माध्यम बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत का समृद्ध इतिहास और विविधता, उत्तर प्रदेश की आतिथ्य परंपरा तथा लखनऊ के मशहूर खानपान को जापान की प्रसिद्ध खाद्य संस्कृति के साथ जोड़कर पर्यटन के नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।

 

जापानी पर्यटकों के अनुरूप आतिथ्य सुविधाओं पर जोर

पर्यटन पर संवाद सत्र में जापानी पर्यटकों की जरूरतों और उनकी पसंद के अनुरूप आतिथ्य सुविधाएं विकसित करने पर भी जोर दिया गया। लोटस निक्को की नेहा राय ने कहा कि 'जापानी पर्यटकों के लिए विश्वसनीयता, समयबद्ध सेवाएं और खान-पान का विशेष महत्व है। उन्होंने बताया कि उनका समूह श्रावस्ती और कुशीनगर में होटल संचालित कर रहा है और जापानी पर्यटक बाजार के साथ भी उसका अनुभव रहा है। बौद्ध सर्किट से गुजरने वाले जापानी पर्यटकों की सुविधा को देखते हुए इन होटलों में जापानी भोजन की भी व्यवस्था की गई है।'

 

शीराज टूर्स की निदेशक हिना शीराज जैदी ने कहा कि दोनों देशों के बीच पर्यटन को लेकर रुचि लगातार बढ़ रही है। खासकर युवा भारतीय पर्यटक जापानी संस्कृति, खान-पान, चेरी ब्लॉसम, माउंट फूजी और वहां के आधुनिक पर्यटन आकर्षणों को लेकर उत्साहित हैं। उन्होंने कहा कि स्कूल समूहों की यात्राएं भी दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक समझ बढ़ाने और संपर्क मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

 

बौद्ध पर्यटन को मिल रही रफ्तार- मृदुल चौधरी

विशेष सचिव एवं पर्यटन निदेशक मृदुल चौधरी ने कहा कि 'उत्तर प्रदेश सरकार बौद्ध पर्यटन के नए चरण के लिए जरूरी पर्यटन सुविधाओं और आधारभूत ढांचे को मजबूत करने में जुटी है। उन्होंने बताया कि राज्य योजना के तहत बौद्ध स्थलों पर 51 पर्यटन परियोजनाओं पर 218 करोड़ रुपए से अधिक की लागत से विकास कार्य कराए जा रहे हैं। वहीं, विश्व बैंक की सहायता से सारनाथ और कुशीनगर में एकीकृत पर्यटन विकास की योजना पर काम चल रहा है, जबकि श्रावस्ती में एसएएससीआई के तहत बड़े स्तर पर विकास कार्य प्रस्तावित हैं। उन्होंने कहा कि विभाग का प्रयास पर्यटन सुविधाओं, स्थलों की बेहतर व्याख्या, आतिथ्य सेवाओं और विभिन्न बौद्ध स्थलों के बीच सुगम आवागमन को एक साथ विकसित करने का है, ताकि पर्यटक पूरे बौद्ध सर्किट को अलग-अलग पड़ावों के बजाय एक संपूर्ण यात्रा के रूप में अनुभव कर सकें।'

 

बौद्ध पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी

उत्तर प्रदेश के बौद्ध पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की बढ़ती संख्या ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की संभावनाओं को और मजबूत किया है। प्रदेश के छह प्रमुख बौद्ध पर्यटन स्थलों पर वर्ष 2022 में 22.4 लाख पर्यटक पहुंचे थे, जो वर्ष 2025 में बढ़कर 81.8 लाख से अधिक हो गए। इसी अवधि में विदेशी पर्यटकों की संख्या 48 हजार से बढ़कर करीब 4.43 लाख पहुंच गई। वर्ष 2026 में जनवरी से जून के बीच ही बौद्ध सर्किट के प्रमुख स्थलों पर 30.07 लाख पर्यटक पहुंचे, जिनमें 2.02 लाख विदेशी पर्यटक शामिल रहे।

 

यूपी और यामानाशी मिलकर बढ़ाएंगे पर्यटन, एमओयू पर हस्ताक्षर

उत्तर प्रदेश सरकार और यामानाशी प्रीफेक्चर के बीच पर्यटन सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। इस अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह मौजूद रहे। एमओयू के तहत पर्यटन क्षेत्र में ज्ञान और अनुभवों का आदान-प्रदान, संयुक्त प्रचार अभियान, पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों के बीच संपर्क, धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन मार्गों का विकास और दोनों क्षेत्रों के बीच पर्यटकों की आवाजाही बढ़ाने की दिशा में सहयोग किया जाएगा। समझौते में विशेष रूप से बौद्ध, आध्यात्मिक और वेलनेस पर्यटन को शामिल किया गया है। इसके अलावा संयुक्त प्रचार अभियान, प्रदर्शनियां, सेमिनार और डिजिटल सामग्री के माध्यम से दोनों क्षेत्रों के पर्यटन को बढ़ावा दिया जाएगा।

 

एमओयू के तहत उत्तर प्रदेश के सारनाथ और जापान के फुजिसान से जुड़े यूनेस्को विश्व धरोहर मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर भी सहमति बनी है। इसके साथ ही भविष्य में दोनों क्षेत्रों के बीच बौद्ध विरासत की बेहतर व्याख्या, बहुभाषी पर्यटक सुविधाओं, ध्यान और वेलनेस पर्यटन, आतिथ्य, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, पेशेवर प्रशिक्षण और ज्ञान हस्तांतरण जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं भी तलाशी जाएंगी।

 

अब वाराणसी और सारनाथ का दौरा

जापानी प्रतिनिधिमंडल की उत्तर प्रदेश यात्रा को प्रदेश की पर्यटन विविधता से परिचित कराने के उद्देश्य से विशेष रूप से तैयार किया गया है। आगरा में ताजमहल और ब्रज की सांस्कृतिक परंपराओं से रूबरू होने तथा लखनऊ में पर्यटन और उद्योग से जुड़े संवाद के बाद जापानी प्रतिनिधिमंडल वाराणसी और सारनाथ का दौरा करेगा। यहां काशी की आध्यात्मिक परंपराएं, गंगा आरती और सारनाथ की बौद्ध विरासत जापानी मेहमानों को भारत और जापान के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक व आध्यात्मिक रिश्तों से रूबरू कराएंगी।