ITR 2026: अपने इनकम टैक्स रिटर्न पर चाहिए मैक्सिमम रिफंड तो आईटीआर फाइल करते समय अपनाएं ये 5 शानदार तरीके

Income Tax Return Best Strategies: इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने का सीजन आते ही टैक्सपेयर्स के मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि वे अपना टैक्स रिफंड कैसे बढ़ाएं। टैक्स रिफंड को अधिकतम करना सिर्फ आखिरी समय में डिडक्शन ढूंढने तक सीमित नहीं है बल्कि इसकी शुरुआत इस बात से होती है कि आपका टैक्स रिटर्न आपकी इनकम, निवेश और पहले से भुगतान किए गए टैक्स को बिल्कुल सही-सही दर्शाता हो।

क्या होता है इनकम टैक्स रिफंड?

इनकम टैक्स रिफंड तब जारी किया जाता है जब किसी वित्तीय वर्ष के दौरान टैक्सपेयर द्वारा चुकाया गया टैक्स, उसकी वास्तविक टैक्स देनदारी से अधिक हो जाता है। यह एक्स्ट्रा टैक्स सोर्स पर टैक्स कटौती (TDS), सोर्स पर टैक्स कलेक्शन (TCS) या एडवांस टैक्स के रूप में जमा हो सकता है। टैक्सपेयर्स अपना आईटीआर दाखिल करके इस एक्स्ट्रा टैक्स अमाउंट को क्लेम कर सकते हैं। आपको बता दें कि रिटर्न फाइल करने के बाद रिफंड का स्टेटस इनकम टैक्स ई-फाइलिंग पोर्टल और दूसरे ऑप्शन की मदद से ऑनलाइन ट्रैक भी किया जा सकता है।

क्लियरटैक्स की टैक्स एक्सपर्ट चांदनी आनंदन के मुताबिक टैक्सपेयर्स को अपने लिए लागू सभी उपलब्ध छूटों और कटौतियों को क्लोजली रिव्यू करना चाहिए। दोनों टैक्स रिजीम के फायदों की तुलना करनी चाहिए और यह वेरिफाई करना चाहिए कि टैक्स डॉक्युमेंट्स में दी गई जानकारी ऑफिशियल रिकॉर्ड से मैच करती हो। आपकी छोटी सी गलती भी रिफंड में देरी कर सकती है या नोटिस का कारण बन सकती है।

मैक्सिमम रिफंड पाने की 5 शानदार स्ट्रैटिजी

अपने इनकम टैक्स रिफंड को अधिकतम करने के लिए टैक्सपेयर्स को नीचे दिए गए तरीकों को अपनाना चाहिए:

1- दोनों टैक्स रिजीम (Old vs New) की तुलना करें

रिटर्न फाइल करने से पहले पुरानी और नई दोनों टैक्स व्यवस्थाओं के तहत अपनी टैक्स देनदारी की तुलना करें। उस रिजीम का चयन करें जिसमें आपका टैक्स आउटगो सबसे कम हो। अगर वित्त वर्ष के दौरान आपका अधिक टीडीएस कट चुका है तो सही रिजीम चुनकर आप अपना रिफंड काफी हद तक बढ़ा सकते हैं।

2- ओल्ड टैक्स रिजीम के तहत डिडक्शंस का पूरा लाभ उठाएं

अगर आप ओल्ड टैक्स रिजीम चुनते हैं तो आप अलग-अलग कटौतियों के माध्यम से अपनी टैक्स योग्य इनकम को कम कर सकते हैं। इसके लिए नीचे दी गई जानकारी को देखें-

सेक्शन 80C: पीपीएफ, ईएलएसएस, ईपीएफ, एनएससी, जीवन बीमा प्रीमियम और 5 साल की टैक्स-सेविंग एफडी में निवेश करके आप ₹1.5 लाख तक की कटौती का दावा कर सकते हैं।

सेक्शन 80D: हेल्थ इंश्योरेंस के प्रीमियम के माध्यम से ₹25000 से ₹50000 तक की अतिरिक्त टैक्स बचत का दावा किया जा सकता है। यह क्लेम इंश्योर्ड शख्स और परिवार के सदस्यों की उम्र पर निर्भर करता है।

सेक्शन 24(b) और HRA: सैलरीड कर्मचारी निर्धारित शर्तों के अधीन हाउस रेंट अलाउंस (HRA) छूट का दावा कर सकते हैं। साथ ही खुद के घर के होम लोन के ब्याज पर ₹2 लाख तक की कटौती पा सकते हैं।

3- नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) का अतिरिक्त फायदा

नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में योगदान करने वाले लोग सेक्शन 80C की सीमा के ऊपर और अतिरिक्त सेक्शन 80CCD(1B) के तहत ₹50000 तक की एक्स्ट्रा कटौती का दावा कर सकते हैं। सेक्शन 80CCD(2) के तहत एंप्लॉयर के योगदान पर भी टैक्स लाभ मिलता है। यह कटौती दोनों टैक्स रिजीम (पुरानी और नई) में उपलब्ध है। इसके तहत एंप्लॉयर की कैटेगिरी के आधार पर ओल्ड रिजीम में वेतन के 10 प्रतिशत तक और न्यू रिजीम में 14 प्रतिशत तक के एंप्लॉयर योगदान पर दावा किया जा सकता है।

4- स्टैंडर्ड डिडक्शन और टैक्स रिबेट

सैलरीड टैक्सपेयर्स टैक्स योग्य इनकम की गणना करते समय ऑटोमेटिकली स्टैंडर्ड डिडक्शन के हकदार होते हैं। यह कटौती ओल्ड रिजीम के तहत ₹50000 और न्यू रिजीम के तहत ₹75000 है। इसके अलावा पात्र टैक्सपेयर्स सेक्शन 87A के तहत रिबेट का लाभ उठा सकते हैं जिससे अगर टैक्स योग्य आय निर्धारित सीमा के भीतर रहती है तो टैक्स देनदारी शून्य हो सकती है।

इसके अलावा फैमिली पेंशन प्राप्तकर्ताओं को सेक्शन 57(iia) के तहत कटौती मिलती है। यह कटौती ओल्ड रिजीम में ₹15000 तक और न्यू रिजीम में ₹25000 तक उपलब्ध है, जो टैक्स योग्य आय को कम करके रिफंड की पात्रता में सुधार करती है।

5- रिफंड क्लेम करने के लिए अपनाएं ये जरूरी स्टेप्स

रिफंड का दावा करने के लिए आईटीआर दाखिल करना अनिवार्य है, भले ही टैक्सपेयर के लिए सामान्य रूप से रिटर्न दाखिल करना जरूरी न हो। रिफंड प्रक्रिया को तेज करने के लिए इन बातों का ध्यान रखें:

सही ITR फॉर्म चुनें: इनकम के सोर्स, आवासीय स्थिति और टैक्सपेयर की श्रेणी के आधार पर सही फॉर्म चुनें। गलत फॉर्म चुनने से रिपोर्टिंग में त्रुटियां हो सकती हैं और रिफंड अटक सकता है।

आय की सटीक गणना: अपनी आय के सभी स्रोतों, लागू कटौतियों और छूटों को सही ढंग से घोषित करें।

TDS डिटेल वेरिफाई करें: रिटर्न में पहले से भरे हुए टीडीएस डिटेल का फॉर्म 16, फॉर्म 16A या अन्य संबंधित रिकॉर्ड से मिलान जरूर करें ताकि कोई विसंगति न रहे।

सही बैंक खाते का डिटेल दें: अपने एक्टिव बैंक खाते की सही जानकारी दर्ज करें क्योंकि रिफंड सीधे रिटर्न से लिंक बैंक खाते में ही क्रेडिट किया जाता है। गलत जानकारी देने से ट्रांसफर फेल हो सकता है।

तुरंत ई-वेरिफिकेशन पूरा करें: रिटर्न दाखिल करने के बाद जितनी जल्दी हो सके इसे ई-वेरीफाई करें। वेरिफिकेशन के बाद ही रिटर्न प्रोसेस होता है और समय पर वेरिफिकेशन से रिफंड जल्दी जारी होने में मदद मिलती है।

Personal Loan EMI: कम ब्याज पर पर्सनल लोन चाहिए? अप्लाई करने से पहले जरूर करें ये 7 काम

Personal Loan EMI: पर्सनल लोन सबसे आसान और तेजी से मिलने वाला लोन है। शादी, इलाज, बच्चों की पढ़ाई, घर की मरम्मत या किसी दूसरी जरूरी जरूरत के लिए लोग अक्सर इसका सहारा लेते हैं। लेकिन कई बार लोग बिना तैयारी के लोन के लिए आवेदन कर देते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि या तो लोन महंगे ब्याज पर मिलता है या फिर आवेदन ही रिजेक्ट हो जाता है।

अगर आप चाहते हैं कि बैंक या NBFC आपको कम ब्याज दर पर पर्सनल लोन ऑफर करे, तो आवेदन करने से पहले कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए। आइए जानते हैं ऐसे 7 काम, जो आपकी ब्याज दर कम कराने में मदद कर सकते हैं।

1. CIBIL Score मजबूत रखें

पर्सनल लोन की ब्याज दर तय करने में CIBIL Score सबसे अहम भूमिका निभाता है। अगर आपका स्कोर 750 या उससे ज्यादा है तो बैंक आपको कम जोखिम वाला ग्राहक मानते हैं। ऐसे ग्राहकों को अक्सर बेहतर ब्याज दर मिलने की संभावना रहती है।

अगर स्कोर कम है तो पहले पुराने बकाया चुकाएं, समय पर EMI और क्रेडिट कार्ड बिल भरें। कुछ महीनों में स्कोर बेहतर हो सकता है।

2. नौकरी और आमदनी स्थिर होनी चाहिए

बैंक सिर्फ आपकी सैलरी नहीं देखते, बल्कि यह भी देखते हैं कि आपकी नौकरी कितनी स्थिर है। अगर आप लंबे समय से एक ही कंपनी में काम कर रहे हैं और आपकी आमदनी नियमित है, तो लोन मिलने के साथ-साथ बेहतर ब्याज दर मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है।

अगर अपना रोजगार करते हैं, तो नियमित कमाई और इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) की भी भूमिका अहम हो जाती है।

3. पहले से ज्यादा कर्ज है तो सावधान रहें

अगर आपकी कमाई का बड़ा हिस्सा पहले से EMI चुकाने में जा रहा है, तो बैंक को लगता है कि आपको लोन देने में जोखिम है। इसे डेट टु इनकम रेशियो कहते हैं यानी कर्ज और कमाई का अनुपात।

हमेशा कोशिश करें कि आपकी कुल EMI, मंथली इनकम के बहुत बड़े हिस्से पर कब्जा न करे। इससे कम ब्याज पर लोन मिलने की संभावना बढ़ सकती है।

4. एक साथ कई जगह आवेदन न करें

कई लोग सोचते हैं कि जितने ज्यादा बैंकों में आवेदन करेंगे, लोन मिलने की संभावना उतनी बढ़ जाएगी। लेकिन ऐसा करना उल्टा नुकसान पहुंचा सकता है।

हर आवेदन पर आपकी क्रेडिट रिपोर्ट में हार्ड इन्क्वायरी दर्ज होती है। कम समय में कई हार्ड इन्क्वायरी होने पर CIBIL Score प्रभावित हो सकता है और बैंक इसे जोखिम का संकेत मान सकते हैं।

5. जिस बैंक से रिश्ता पुराना है, वहां पहले बात करें

अगर आपका सैलरी अकाउंट, फिक्स्ड डिपॉजिट, होम लोन या दूसरी बैंकिंग सेवाएं पहले से किसी बैंक में हैं, तो उसी बैंक से पहले ऑफर जरूर चेक करें।

मौजूदा ग्राहकों को कई बैंक प्री-अप्रूव्ड पर्सनल लोन या कम ब्याज दर की पेशकश करते हैं।

6. सिर्फ पहली पेशकश पर हामी न भरें

हर बैंक और NBFC की ब्याज दर, प्रोसेसिंग फीस और दूसरी शर्तें अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए पहला ऑफर मिलते ही लोन लेने की बजाय अलग-अलग संस्थानों के ऑफर की तुलना करें।

अगर आपका क्रेडिट प्रोफाइल मजबूत है, तो कई मामलों में ब्याज दर पर सौदेबाजी की भी गुंजाइश होती है।

7. जितनी जरूरत हो, उतना ही लोन लें

जरूरत से ज्यादा रकम का लोन लेने पर EMI का बोझ बढ़ जाता है। वहीं बहुत लंबी अवधि चुनने पर कुल ब्याज भी ज्यादा देना पड़ सकता है।

इसलिए उतना ही लोन लें, जिसकी वास्तव में जरूरत हो। साथ ही, लोन की अवधि भी अपनी सहूलियत के हिसाब से रखें। ताकि EMI भी आराम से चुकाई जा सके और कुल ब्याज भी ज्यादा न बढ़े।

इन बातों को भी नजरअंदाज न करें

सिर्फ ब्याज दर देखकर फैसला न करें। प्रोसेसिंग फीस, फोरक्लोजर चार्ज, प्रीपेमेंट नियम, लेट पेमेंट पेनल्टी और दूसरी शर्तों को भी ध्यान से पढ़ें। कई बार कम ब्याज वाला लोन भी छिपे हुए चार्ज की वजह से महंगा पड़ सकता है।

कम ब्याज पर पर्सनल लोन पाना सिर्फ किस्मत की बात नहीं है। ये सिबिल स्कोर, कमाई और आपकी सौदेबाजी के हुनर पर काफी निर्भर करता है। इसलिए आवेदन करने से पहले थोड़ी तैयारी कर लें। इससे आपकी जेब पर EMI का बोझ भी कम रहेगा और लोन चुकाना भी आसान होगा।

Income Tax Refund: पूरा इनकम टैक्स रिफंड नहीं मिला? ये 7 कारण हो सकते हैं जिम्मेदार

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

Income Tax Refund: पूरा इनकम टैक्स रिफंड नहीं मिला? ये 7 कारण हो सकते हैं जिम्मेदार

Income Tax Refund: ITR फाइल करने के बाद ज्यादातर लोगों को 4 से 5 हफ्तों में टैक्स रिफंड मिल जाता है। लेकिन कई बार खाते में उतनी रकम नहीं आती, जितनी आपने क्लेम की थी। इसकी वजह यह है कि इनकम टैक्स विभाग रिटर्न प्रोसेस करते समय आपकी जानकारी का दोबारा मिलान करता है। अगर कोई गड़बड़ी मिलती है, तो रिफंड की रकम कम हो सकती है।

पूरा रिफंड क्यों नहीं मिलता?

रिटर्न प्रोसेस करते समय इनकम टैक्स विभाग Form 26AS, AIS, TIS, TDS स्टेटमेंट और दूसरी जानकारियों का मिलान करता है। अगर इनमें अंतर मिलता है, तो रिफंड कम हो सकता है। इसके लिए ये 7 कारण जिम्मेदार हो सकते हैं।

  • TDS या TCS की जानकारी में गड़बड़ी
  • बैंक ब्याज या कैपिटल गेन जैसी टैक्स योग्य आय छूट जाना
  • गलत टैक्स छूट (Deduction) का दावा
  • एडवांस टैक्स या सेल्फ-असेसमेंट टैक्स की गलत जानकारी
  • टैक्स के कैलकुलेशन में गलती
  • धारा 234A, 234B और 234C के तहत ब्याज लगना
  • पुराने असेसमेंट ईयर की बकाया टैक्स डिमांड

अगर विभाग कोई बदलाव करता है, तो धारा 143(1) के तहत इंटिमेशन भेजता है। इसमें रिफंड कम होने की वजह भी बताई जाती है।

रिफंड की रकम कैसे तय होती है?

इनकम टैक्स विभाग आपकी आय, टैक्स छूट और टैक्स क्रेडिट का मिलान करता है। इसके लिए वह कंपनी, बैंक और दूसरी वित्तीय संस्थाओं से मिली जानकारी का इस्तेमाल करता है।

इसके बाद आपकी कुल टैक्स देनदारी दोबारा निकाली जाती है। फिर TDS, TCS, एडवांस टैक्स और सेल्फ-असेसमेंट टैक्स को एडजस्ट किया जाता है। अगर आपने जरूरत से ज्यादा टैक्स जमा किया है, तो बची हुई रकम रिफंड के रूप में मिलती है। अगर पुराने साल का कोई टैक्स बकाया है, तो उसे भी रिफंड से एडजस्ट किया जा सकता है।

पुराने टैक्स बकाया का क्या होगा?

अगर किसी पुराने असेसमेंट ईयर का टैक्स बकाया है, तो इनकम टैक्स विभाग उसे आपके रिफंड से एडजस्ट कर सकता है। हालांकि, ऐसा करने से पहले विभाग ई-फाइलिंग पोर्टल पर सूचना देता है।

टैक्सपेयर्स को डिमांड स्वीकार करने, आंशिक रूप से मानने या उस पर आपत्ति दर्ज कराने का मौका मिलता है। तय समय तक जवाब नहीं मिलने या जवाब पर फैसला होने के बाद ही एडजस्टमेंट किया जाता है।

ब्याज भी घटा सकता है रिफंड

अगर आपने ITR देर से फाइल की है, एडवांस टैक्स कम भरा है या उसकी किस्त समय पर जमा नहीं की है, तो धारा 234A, 234B और 234C के तहत ब्याज देना पड़ सकता है।

यह ब्याज आपकी कुल टैक्स देनदारी में जुड़ जाता है। ऐसे में TDS पूरा कटा होने पर भी रिफंड कम मिल सकता है।

अगर रिफंड कम मिले तो क्या करें?

अगर आपको लगता है कि रिफंड गलत तरीके से कम किया गया है, तो सबसे पहले धारा 143(1) के तहत मिला इंटिमेशन पढ़ें। उसमें पूरी वजह लिखी होती है।

अगर कोई गलती दिखे, तो रेक्टिफिकेशन के लिए आवेदन करें। Form 16, Form 16A, Form 26AS, AIS, TIS, टैक्स चालान, निवेश के दस्तावेज, कैपिटल गेन का हिसाब, ITR की कॉपी और पुराने टैक्स रिकॉर्ड संभालकर रखें। जरूरत पड़ने पर यही दस्तावेज काम आएंगे।

रिफंड कम होने से कैसे बचें?

ITR फाइल करने से पहले Form 26AS, AIS और TIS का अच्छी तरह मिलान करें। बैंक ब्याज, कैपिटल गेन और दूसरी सभी टैक्स योग्य आय जरूर शामिल करें। सही ITR फॉर्म चुनें। टैक्स छूट और टैक्स क्रेडिट का दावा दस्तावेजों के आधार पर ही करें।

बैंक अकाउंट पहले से प्री-वैलिडेट रखें। ITR फाइल करने के बाद समय पर ई-वेरिफिकेशन करें। रिटर्न सबमिट करने से पहले एक बार पूरी जानकारी जरूर जांच लें। इससे रिफंड में कटौती या देरी की संभावना काफी कम हो जाती है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Post Office TD vs Bank FD: पोस्ट ऑफिस या बैंक FD, किसमें निवेश पर मिलेगा ज्यादा फायदा? समझिए पूरा हिसाब

Post Office TD vs Bank FD: अगर आप बिना जोखिम के तय रिटर्न चाहते हैं, तो पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉजिट (TD) और बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) दोनों अच्छे विकल्प हैं। दोनों में आपका पैसा सुरक्षित रहता है और तय ब्याज मिलता है।

लेकिन सुरक्षा, ब्याज, पैसे निकालने की सुविधा और टैक्स बेनिफिट्स जैसे मामलों में दोनों के बीच बड़ा अंतर है। ऐसे में निवेश से पहले यह जानना जरूरी है कि आपके लिए कौन-सा विकल्प ज्यादा सही रहेगा।

सुरक्षा के मामले में कौन बेहतर?

अगर पैसों की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है, तो पोस्ट ऑफिस TD आगे है। इसकी वजह यह है कि इस पर सरकार की गारंटी होती है। यानी आपका मूलधन और ब्याज, दोनों पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं।

वहीं, बैंक FD पर डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (DICGC) का बीमा मिलता है। लेकिन इसकी सीमा 5 लाख रुपये तक ही है। इसमें मूलधन और ब्याज दोनों शामिल होते हैं। अगर किसी बैंक में आपकी जमा राशि इससे ज्यादा है, तो अतिरिक्त रकम पर बीमा नहीं मिलता।

कहां मिल रहा है ज्यादा ब्याज?

पोस्ट ऑफिस TD की ब्याज दरें सरकार हर तीन महीने में तय करती है। एक बार जिस ब्याज दर पर निवेश कर दिया, वही दर पूरी अवधि तक लागू रहती है।

मौजूदा पोस्ट ऑफिस TD ब्याज दरें

अवधिब्याज दर
1 साल6.90%
2 साल7.00%
3 साल7.10%
5 साल7.50%

वहीं, बैंक FD की ब्याज दरें हर बैंक में अलग-अलग होती हैं। ये समय-समय पर भी बदलती रहती हैं। फिलहाल कई प्राइवेट और स्मॉल फाइनेंस बैंक 7.5% से 8.10% तक ब्याज दे रहे हैं। कई लोग सुरक्षा के लिहाज सरकारी बैंकों को भी प्राथमिकता देते हैं। हालांकि, उनकी ब्याज दर प्राइवेट और स्मॉल फाइनेंस बैंकों के मुकाबले कम रहती है।

पैसे निकालने की सुविधा किसमें बेहतर?

अगर आपको बीच में पैसे की जरूरत पड़ सकती है, तो बैंक FD ज्यादा सुविधाजनक है। बैंकों में आप 7 दिन से लेकर 10 साल तक की FD करा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर मैच्योरिटी से पहले FD तोड़ भी सकते हैं। हालांकि, इसके लिए आमतौर पर 0.5% से 1% तक ब्याज का जुर्माना देना पड़ता है। कई बैंक FD के बदले लोन की सुविधा भी देते हैं।

वहीं, पोस्ट ऑफिस TD में पहले 6 महीने तक पैसा नहीं निकाला जा सकता। अगर छह महीने बाद लेकिन मैच्योरिटी से पहले खाता बंद करते हैं, तो कम ब्याज मिलता है। इससे आपका कुल रिटर्न घट जाता है।

टैक्स और सीनियर सिटीजन को क्या फायदा?

अगर आप टैक्स बचाना चाहते हैं, तो 5 साल का पोस्ट ऑफिस TD और 5 साल का टैक्स सेवर बैंक FD, दोनों पर आयकर अधिनियम की धारा 80C के तहत 1.5 लाख रुपये तक की टैक्स छूट मिलती है।

हालांकि, सीनियर सिटीजन के लिए बैंक FD ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकती है। ज्यादातर बैंक सामान्य ग्राहकों के मुकाबले 0.25% से 0.75% तक अतिरिक्त ब्याज देते हैं। पोस्ट ऑफिस TD में वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग से कोई अतिरिक्त ब्याज नहीं मिलता।

आखिर किसमें निवेश करना चाहिए?

अगर आपकी पहली प्राथमिकता पूरी सुरक्षा है, तो पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉजिट बेहतर विकल्प हो सकता है। क्योंकि इस पर सरकार की गारंटी होती है। लेकिन अगर आप ज्यादा ब्याज, पैसे निकालने में आसानी, निवेश अवधि चुनने की आजादी और सीनियर सिटीजन के लिए अतिरिक्त ब्याज चाहते हैं, तो बैंक FD बेहतर साबित हो सकती है। कुछ मामलों में FD का ब्याज पोस्ट ऑफिस के मुकाबले ज्यादा होता है।

फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सिर्फ ब्याज दर देखकर निवेश का फैसला नहीं करना चाहिए। सुरक्षा, लिक्विडिटी, टैक्स बेनिफिट और निवेश की अवधि जैसी सभी बातों को ध्यान में रखकर फैसला लें। चाहें तो दोनों विकल्पों में पैसा लगाकर सुरक्षा और बेहतर रिटर्न के बीच संतुलन भी बना सकते हैं।

Tax Refund: टैक्स रिफंड जल्दी चाहते हैं? जानिए किन 5 गलतियों से बचना है जरूरी

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Tax Refund: टैक्स रिफंड जल्दी चाहते हैं? जानिए किन 5 गलतियों से बचना है जरूरी

Tax Refund: इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भरते वक्त कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। गलत जानकारी देने या किसी जरूरी प्रक्रिया को छोड़ने पर आपका रिटर्न प्रोसेस होने में देरी हो सकती है। इसके चलते टैक्स रिफंड आने में भी देरी हो सकती है।

आइए जानते हैं कि ITR भरते वक्त किन 5 बातें का ध्यान रखना चाहिए, ताकि आपका टैक्स रिफंड जल्दी आ सके। साथ ही, रिफंड स्टेटस चेक करने का तरीका भी जानेंगे।

1. PAN-Aadhaar लिंक और प्रोफाइल अपडेट

अगर आप पहली दफा ITR फाइल कर रहे हैं, तो सबसे पहले इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के ई-फाइलिंग पोर्टल पर Taxpayer के तौर पर रजिस्ट्रेशन करें। इसके बाद सुनिश्चित करें कि आपका PAN और Aadhaar लिंक हो।

साथ ही नाम, जन्मतिथि, जेंडर जैसी जानकारी PAN रिकॉर्ड से मेल खानी चाहिए। मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी और पता भी अपडेट रखें, ताकि टैक्स विभाग जरूरत पड़ने पर आपसे संपर्क कर सके।

2. बैंक अकाउंट वैलिडेट करें और सही ITR फॉर्म चुनें

अगर आपका टैक्स रिफंड बनता है, तो वह सीधे बैंक खाते में आएगा। इसके लिए बैंक अकाउंट का इनकम टैक्स पोर्टल पर वैलिडेशन जरूरी है।

बैंक अकाउंट PAN से लिंक होना चाहिए, IFSC और बैंक की जानकारी सही होनी चाहिए। PAN और बैंक खाते में दर्ज नाम एक जैसा होना चाहिए। इसके साथ ही अपनी इनकम के सोर्स के हिसाब से सही ITR फॉर्म चुनें। गलत फॉर्म चुनने पर रिटर्न और रिफंड में देरी हो सकती है।

3. टैक्स छूट और TDS की जानकारी का मिलान करें

अगर आप किसी टैक्स छूट या डिडक्शन का दावा कर रहे हैं, तो उससे जुड़े दस्तावेज जरूर जांच लें। साथ ही Form 26AS, एनुअल इन्फॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) और टोटल इनकम स्टेटमेंट (TIS) में दर्ज TDS, TCS और अन्य टैक्स क्रेडिट का मिलान जरूर करें।

किसी तरह की गड़बड़ी मिलने पर रिटर्न प्रोसेस होने में देरी हो सकती है। अगर आप उसे समय रहते सुधार लेंगे, तो परेशानी से बच जाएंगे।

4. ITR समय से पहले फाइल करें

आखिरी तारीख का इंतजार करने से बचें। समय रहते ITR फाइल करने पर आपको सभी जानकारियां दोबारा जांचने और गलती सुधारने का मौका मिल जाता है। इससे रिटर्न रिजेक्ट होने या प्रोसेसिंग में देरी की आशंका भी कम रहती है।

5. फाइलिंग के बाद ई-वेरिफिकेशन न भूलें

ITR फाइल करना आखिरी कदम नहीं है। रिटर्न अपलोड करने के बाद 30 दिनों के भीतर उसका ई-वेरिफिकेशन भी करना जरूरी है।

यह काम Aadhaar OTP, डिजिटल सिग्नेचर या अन्य उपलब्ध माध्यमों से किया जा सकता है। अगर तय समय में ई-वेरिफिकेशन नहीं किया गया, तो ITR अमान्य माना जाएगा। ऐसे में टैक्स रिफंड भी जारी नहीं होगा।

ऐसे चेक करें ITR रिफंड का स्टेटस

  • इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के e-Filing Portal पर लॉग इन करें।
  • e-File मेन्यू में जाकर Income Tax Returns पर क्लिक करें।
  • View Filed Returns विकल्प चुनें।
  • जिस असेसमेंट ईयर का रिफंड देखना है, उसे चुनें।
  • वहां आपको ITR का स्टेटस, प्रोसेसिंग की स्थिति और रिफंड से जुड़ी जानकारी दिखाई दे जाएगी।

या फिर आप NSDL/TIN के रिफंड ट्रैकिंग पोर्टल पर PAN और असेसमेंट ईयर दर्ज करके भी रिफंड का स्टेटस देख सकते हैं।

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मिस हो गई ITR की डेडलाइन? मत होइए परेशान, इस एक तरकीब से अब भी वापस मिल जाएगा आपका टीडीएस रिफंड!

ITR Deadline Missed: क्या आपने किसी वित्तीय वर्ष के लिए इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने की डेडलाइन मिस कर दी है? अगर हां, तो सबसे पहला डर यही सताता है कि जो टैक्स एडवांस में कट चुका है (TDS), क्या वह पैसा अब हमेशा के लिए डूब गया? टैक्सपेयर्स के बीच अक्सर यह उलझन रहती है कि क्या आईटीआर विंडो बंद होने के बाद भी टीडीएस रिफंड क्लेम किया जा सकता है।

जवाब है- हां, आप अभी भी अपना रिफंड पा सकते हैं, लेकिन इसके लिए आपको सही कानूनी रास्ता चुनना होगा। बहुत से लोग सोचते हैं कि अपडेटेड आईटीआर भरकर रिफंड ले लेंगे, लेकिन टैक्स नियम इसके बिल्कुल उलट हैं। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि डेडलाइन चूकने के बाद टीडीएस रिफंड वापस पाने का असली और कानूनी तरीका क्या है।

सवाल: क्या अपडेटेड आईटीआर (U-ITR) भरकर टीडीएस रिफंड मिल सकता है?

जवाब: बिल्कुल नहीं।

अक्सर टैक्सपेयर्स को सलाह मिलती है कि वे इनकम टैक्स एक्ट की धारा 139(8A) के तहत ‘अपडेटेड आईटीआर’ फाइल कर दें। नियम के मुताबिक, आप पिछले चार असेसमेंट ईयर के लिए यू-आईटीआर भर सकते हैं। लेकिन, इसमें एक बहुत बड़ी शर्त जुड़ी हुई है- आप अपडेटेड आईटीआर तब दाखिल नहीं कर सकते जब आपको कोई टैक्स रिफंड क्लेम करना हो या आपके ऊपर टैक्स की देनदारी शून्य से कम हो रही हो। चूंकि आप अपना टीडीएस रिफंड वापस मांग रहे हैं, इसलिए आप कानूनी रूप से अपडेटेड आईटीआर भरने के हकदार नहीं हैं।

इसके अलावा, आप किसी बीते हुए साल का टीडीएस रिफंड अगले नए फाइनेंशियल ईयर के आईटीआर में भी क्लेम नहीं कर सकते हैं। हर साल के टीडीएस का हिसाब उसी साल के रिटर्न में देना जरूरी होता है।

ये है डूबा हुआ टीडीएस वापस पाने का कानूनी तरीका

अगर रेगुलर आईटीआर की तारीख निकल चुकी है और अपडेटेड आईटीआर से रिफंड मिल नहीं सकता, तो फिर रास्ता क्या है? यहीं पर काम आती है इनकम टैक्स एक्ट की धारा 119(2)(b)।

यह धारा सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस को यह विशेष पॉवर देती है कि वह उन करदाताओं को राहत दे सके जो किसी वाजिब वजह से समय पर अपना रिटर्न नहीं भर पाए थे। इसके तहत, सीबीडीटी ने 1 अक्टूबर 2024 को एक नया सर्कुलर जारी किया है। इस सर्कुलर के मुताबिक, अगर कोई जेनयून मामला है, तो टैक्सपेयर ‘कॉन्डोनशेन ऑफ डिले’ यानी देरी के लिए माफी की अर्जी लगा सकता है।

माफी की अर्जी मंजूर होने की शर्तें:

अगर आप इस विशेष प्रावधान के तहत अपना छूटा हुआ टीडीएस रिफंड पाना चाहते हैं, तो आपकी अर्जी में इन बातों का होना जरूरी है:

ठोस और वाजिब कारण: आपको इनकम टैक्स विभाग को यह साबित करना होगा कि आप किसी अपरिहार्य परिस्थितियों या गंभीर कारण जैसे- बीमारी या कोई अन्य बड़ा संकट की वजह से समय पर आईटीआर नहीं भर सके।

वास्तविक कठिनाई: आपको यह दिखाना होगा कि अगर विभाग आपको रिफंड क्लेम करने की इजाजत नहीं देता है, तो आपको बड़ा वित्तीय नुकसान या वास्तविक कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।

स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस: कैसे मिलेगा पैसा वापस?

अर्जी दाखिल करें: सबसे पहले आपको धारा 119(2)(b) के तहत संबंधित टैक्स अथॉरिटी या सीबीडीटी के पास देरी के लिए माफी की ऑनलाइन या ऑफलाइन एप्लीकेशन देनी होगी।

आदेश का इंतजार करें: टैक्स अधिकारी आपके कारणों की समीक्षा करेंगे। अगर वे संतुष्ट होते हैं, तो देरी को माफ करने का एक आधिकारिक आदेश जारी करेंगे।

आईटीआर फाइल करें: एक बार जब आपको माफी का आदेश मिल जाता है, तो आप इनकम टैक्स पोर्टल पर जाकर उस आदेश का रेफरेंस नंबर दर्ज करके अपना पेंडिंग आईटीआर ऑनलाइन दाखिल कर सकते हैं। इसके बाद आपका टीडीएस रिफंड प्रोसेस कर दिया जाएगा।

इसलिए, अगर आपका भी टीडीएस कटा हुआ है और आईटीआर की तारीख निकल चुकी है, तो घबराएं नहीं। अपडेटेड आईटीआर के चक्कर में पड़ने के बजाय किसी एक्सपर्ट की मदद से धारा 119(2)(b) के तहत माफी की अर्जी दाखिल करें और अपना पैसा वापस पाएं।

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल पर विशेषज्ञों द्वारा व्यक्त किए गए विचार और निवेश टिप्स उनके अपने हैं, वेबसाइट या उसके प्रबंधन के नहीं। मनीकंट्रोल यूजर्स को सलाह देता है कि वे कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट्स से जांच कर लें।

ITR Filing 2026: सैलरीड टैक्सपेयर्स अक्सर करते हैं ये 5 गलतियां, रिफंड में देरी से लेकर नोटिस आने का भी खतरा

ITR Filing 2026: सैलरी पाने वाले ज्यादातर लोगों के लिए अब ITR भरना पहले से काफी आसान हो गया है। Form 16, Form 26AS और पहले से भरी जानकारी की वजह से पूरी प्रक्रिया डिजिटल हो चुकी है। फिर भी हर साल कई टैक्सपेयर गलतियां कर बैठते हैं। इनकी वजह से रिफंड अटक जाता है, अतिरिक्त टैक्स देना पड़ता है या इनकम टैक्स डिपार्टमेंट का नोटिस आ जाता है।

  1. सिर्फ Form 16 के भरोसे न रहें

कई लोग मान लेते हैं कि Form 16 में ITR के लिए जरूरी सारी जानकारी होती है। लेकिन, ऐसा नहीं है। इसमें सिर्फ सैलरी और कंपनी की ओर से काटा गया TDS दिखता है।

अगर आपको बैंक ब्याज, FD, RD, डिविडेंड, किराया, कैपिटल गेन, फ्रीलांसिंग या किसी दूसरे स्रोत से कमाई हुई है, तो वह Form 16 में नहीं दिखेगी। ऐसी आय छूटने पर बाद में परेशानी हो सकती है।

2. इन तीनों का मिलान जरूर करें

कई टैक्सपेयर Form 16 डाउनलोड करते हैं और सीधे ITR भर देते हैं। यही बड़ी गलती साबित हो सकती है।

Form 26AS में TDS, TCS और जमा किए गए टैक्स की जानकारी होती है। वहीं AIS में आपकी आय और वित्तीय लेनदेन का काफी विस्तृत रिकॉर्ड मिलता है। अगर इन दस्तावेजों और ITR में अंतर रह जाता है, तो रिफंड प्रभावित हो सकता है या अतिरिक्त टैक्स की मांग आ सकती है।

3. सही ITR फॉर्म चुनना जरूरी

हर टैक्सपेयर के लिए एक ही ITR फॉर्म नहीं होता। आपकी आय के स्रोत के हिसाब से फॉर्म बदलता है।

अगर आपके पास कैपिटल गेन, विदेशी एसेट, एक से ज्यादा मकान या बिजनेस इनकम है, तो अलग ITR फॉर्म लागू हो सकता है। गलत फॉर्म चुनने पर रिटर्न को डिफेक्टिव माना जा सकता है और बाद में सुधार करना पड़ सकता है।

4. सिर्फ सैलरी TDS पर भरोसा न करें

कई लोग सोचते हैं कि कंपनी ने सैलरी से TDS काट लिया है, इसलिए उनका टैक्स पूरा हो गया। लेकिन यह हमेशा सही नहीं होता।

अगर बैंक ब्याज, किराया, डिविडेंड या निवेश से अतिरिक्त कमाई हुई है, तो कुल टैक्स देनदारी बढ़ सकती है। ऐसे मामलों में Advance Tax देना पड़ सकता है। अगर यह समय पर नहीं दिया गया, तो ब्याज भी देना पड़ सकता है।

5. बिना दस्तावेज के छूट का दावा न करें

80C, 80D, होम लोन ब्याज या HRA जैसी छूट का दावा करते समय जरूरी दस्तावेज अपने पास जरूर रखें।

हालांकि ITR के साथ दस्तावेज अपलोड नहीं करने होते, लेकिन जरूरत पड़ने पर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट उन्हें मांग सकता है। गलत दावा करने पर अतिरिक्त टैक्स और ब्याज देना पड़ सकता है।

6. छोटी गलती भी पड़ सकती है भारी

ज्यादातर मामलों में टैक्स से जुड़ी परेशानी किसी जटिल नियम की वजह से नहीं, बल्कि ऐसी छोटी गलतियों की वजह से होती है। सभी आय की सही जानकारी देना, AIS और Form 26AS का मिलान करना और सही ITR फॉर्म चुनना आपको नोटिस, रिफंड में देरी और अतिरिक्त टैक्स की मांग से बचा सकता है।

ITR Filing 2026: रिटर्न फाइल करने के बाद रिवाइज कर रहे हजारों टैक्सपेयर, जानिए क्या है इसकी वजह

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ITR Filing 2026: कब तक भरना है ITR, देरी पर कितना लगेगा जुर्माना; जानिए हर एक डिटेल

ITR Filing 2026: इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइलिंग का सीजन शुरू हो चुका है। टैक्सपेयर्स लगातार AY 2026-27 की डेडलाइन सर्च कर रहे हैं। असेसमेंट ईयर (AY) 2026-27, फाइनेंशियल ईयर (FY) 2025-26 की कमाई से जुड़ा है। ऐसे में हर टैक्सपेयर के लिए यह जानना जरूरी है कि उसे कब तक ITR फाइल करना है। तय समयसीमा चूकने पर लेट फीस, ब्याज और दूसरी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

AY 2026-27 के लिए ITR फाइलिंग की डेडलाइन

इनकम टैक्स विभाग ने अलग-अलग तरह के टैक्सपेयर्स के लिए अलग-अलग डेडलाइन तय की हैं।

टैक्सपेयर की कैटेगरीआखिरी तारीख
ITR-1 या ITR-2 भरने वाले व्यक्ति और HUF (ऑडिट नहीं)31 जुलाई 2026
ITR-3 या ITR-4 भरने वाले बिजनेस और प्रोफेशनल टैक्सपेयर (ऑडिट नहीं)31 अगस्त 2026
जिनके खातों का ऑडिट जरूरी है31 अक्टूबर 2026
ट्रांसफर प्राइसिंग नियमों के दायरे में आने वाले टैक्सपेयर30 नवंबर 2026
बिलेटेड रिटर्न31 दिसंबर 2026
रिवाइज्ड रिटर्न31 मार्च 2027

इस बार एक अहम बदलाव भी हुआ है। ITR-3 और ITR-4 भरने वाले नॉन-ऑडिट टैक्सपेयर्स को अब 31 जुलाई की जगह 31 अगस्त 2026 तक रिटर्न दाखिल करने का समय मिलेगा।

डेडलाइन छूट गई तो क्या होगा?

अगर आप तय तारीख तक ITR फाइल नहीं कर पाते हैं तो भी रिटर्न दाखिल करने का मौका खत्म नहीं होता। आप 31 दिसंबर 2026 तक बिलेटेड रिटर्न भर सकते हैं। हालांकि, इसके कुछ नुकसान हो सकते हैं।

सबसे पहले आपको लेट फाइलिंग फीस देनी पड़ सकती है। अगर कोई टैक्स बकाया है तो उस पर ब्याज भी लगेगा। कुछ नुकसान (Losses) को अगले सालों में कैरी फॉरवर्ड करने की सहूलियत भी नहीं मिलेगी। कई मामलों में टैक्स रिफंड मिलने में भी देरी हो जाती है।

समय पर ITR भरने के फायदे

समय पर ITR फाइल करना सिर्फ नियमों का पालन भर नहीं है, बल्कि इसके कई व्यावहारिक फायदे भी हैं। समय पर रिटर्न भरने से टैक्स रिफंड जल्दी मिलता है।

अगर आपको भविष्य में होम लोन, पर्सनल लोन या किसी अन्य तरह की क्रेडिट सुविधा लेनी है तो ITR अहम दस्तावेज माना जाता है। वीजा और इमिग्रेशन से जुड़ी प्रक्रियाओं में भी ITR काम आता है। समय पर फाइलिंग करने से टैक्स विभाग की ओर से नोटिस या पेनाल्टी का जोखिम भी कम हो जाता है।

ITR भरने से पहले ये बातें जरूर जांच लें

रिटर्न फाइल करने से पहले कुछ जरूरी चीजों को चेक कर लेना चाहिए ताकि बाद में कोई गलती न हो।

सबसे पहले यह सुनिश्चित करें कि आपने सही ITR फॉर्म चुना है। इसके बाद Form 26AS, AIS और प्री-फिल्ड डेटा का मिलान करें। अपनी आय के सभी स्रोतों की सही जानकारी दें और बैंक अकाउंट डिटेल्स को दोबारा जांच लें।

सिर्फ उन्हीं डिडक्शन और छूट का दावा करें जिनके लिए आप वास्तव में पात्र हैं। रिटर्न जमा करने से पहले पूरी जानकारी ध्यान से पढ़ें और फाइलिंग के बाद ई-वेरिफिकेशन करना बिल्कुल न भूलें।

लेट फाइलिंग पर कितना जुर्माना?

डेडलाइन चूकने पर सेक्शन 234F के तहत लेट फाइलिंग फीस लग सकती है। अगर आपकी कुल सालाना आय 5 लाख रुपये से ज्यादा है तो अधिकतम 5,000 रुपये तक की फीस देनी पड़ सकती है। वहीं, अगर आपकी कुल आय 5 लाख रुपये या उससे कम है तो अधिकतम 1,000 रुपये की फीस लग सकती है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह फीस तब भी देनी होगी, जब आप बाद में तय समयसीमा के भीतर बिलेटेड रिटर्न दाखिल कर दें।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।