Bhadli Navami 2026 Date: कब है भड़ली नवमी और क्यों मनाई जाती है? इस दिन बिना अच्छा मुहूर्त देखे कर सकते हैं कोई भी शुभ कार्य

Bhadli Navami 2026 Date: भड़ली नवमी को भड़रिया नवमी या कंदर्प नवमी भी कहते हैं। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। हिंदू धर्म में इस दिन का बहुत बड़ा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इस दिन को अक्षय तृतीया और देवउठनी एकादशी के समान ही ‘अबूझ मुहूर्त’ माना गया है। इसका मतलब यह है कि इस पूरे दिन ग्रह और नक्षत्र की स्थिति इतनी अनुकूल होती है कि किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए पंचांग या ज्योतिषी से अलग से मुहूर्त निकलवाने की आवश्यकता नहीं होती।

कब मनाई जाएगी भड़ली नवमी 2026?

वैदिक पंचांग के अनुसार तिथियों का समय कुछ इस प्रकार रहेगा:

नवमी तिथि प्रारंभ : 22 जुलाई 2026 को सुबह 05:16 बजे से

नवमी तिथि समाप्त : 23 जुलाई 2026 को सुबह 07:03 बजे तक

उदयातिथि के नियमों के अनुसार नवमी तिथि का सूर्योदय 22 जुलाई को हो रहा है, इसलिए मुख्य रूप से भड़ली नवमी का त्योहार और पूजा इसी दिन संपन्न की जाएगी।

भड़ली नवमी 2026 धार्मिक महत्तव

भड़ली नवमी के ठीक दो दिन बाद ‘देवशयनी एकादशी’ आती है, जिससे चातुर्मास की शुरुआत होती है। मान्यता है कि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार, इस अवधि में विवाह, मुंडन, जनेऊ या गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते क्योंकि इस दौरान उनका प्रत्यक्ष आशीर्वाद नहीं मिल पाता। इसलिए, भड़ली नवमी को विवाह और अन्य शुभ कार्यों के लिए सीजन का आखिरी दिन मानकर धूमधाम से मनाया जाता है। इसके अलावा, इसके बाद भगवान विष्णु अगले चार महीनों के लिए विश्राम अवस्था में चले जाते हैं, इसलिए श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। लोग व्रत रखते हैं, मंदिरों में जाते हैं और आने वाले चार महीनों के लिए भगवान का संरक्षण व आशीर्वाद मांगते हैं। यह दिन आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का अंतिम दिन भी होता है। इस वजह से तांत्रिक और आध्यात्मिक साधना करने वाले लोगों के लिए मां दुर्गा (शक्ति) की पूजा करने और हवन अनुष्ठान संपन्न करने के लिहाज से यह बेहद पवित्र तिथि मानी जाती है।

इस दिन से करना माना जाता है शुभ

  • गुप्त नवरात्रि का अंतिम दिन होने के कारण इस दिन कन्या पूजन करना और गरीबों को दान देना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • यदि किसी के विवाह में रुकावटें आ रही हों, तो भड़ली नवमी के अबूझ मुहूर्त का लाभ उठाकर विवाह संपन्न कराया जाता है।
  • नया वाहन खरीदना, सोने-चांदी की खरीदारी करना या नए घर में प्रवेश करने के लिए भी लोग इस दिन को चुनते हैं।

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Devshayani Ekadashi Vrat 2026: देवशनी एकादशी का व्रत हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के आनुसार, इस दिन से सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु चाह माह की योगनिद्र में पाताल लोक चले जाते हैं और चतुर्मास आरंभ हो जाता है। इस अवधि में विवाह, मुंडन, जनेऊ, गृह प्रवेश आदि शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। श्री हरि सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी तक योग निद्रा में लीन रहते हैं। इस दौरान सृष्टि का कामकाज भगवान शिव के पास रहता है।

हिंदू धर्म में देवशयनी एकादशी का विशेष स्थान है। इसे साल की कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण एकादशी तिथियों में से एक माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन को बड़ी श्रद्धा और विधि-विधान से मनाते हैं। आइए जानें इस साल देव शयनी एकादशी तिथि का व्रत किस दिन किया जाएगा।

कब है हरिशयनी एकादशी?

साल 2026 में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी या हरिशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई 2026, शनिवार को किया जाएगा। चूंकि उदयातिथि 25 जुलाई को मिल रही है, इसलिए वैष्णव और सामान्य श्रद्धालु दोनों ही इस दिन व्रत रखेंगे। इसी दिन से चातुर्मास की शुरुआत होगी और अगले 4 महीनों के लिए सभी मांगलिक कार्य बंद हो जाएंगे।

देवशयनी एकादशी 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि की शुरुआत और समाप्ति का समय इस प्रकार है :

एकादशी तिथि प्रारंभ : 24 जुलाई 2026 को सुबह 09:12 बजे से

एकादशी तिथि समाप्त : 25 जुलाई 2026 को सुबह 11:34 बजे तक

उदयातिथि के अनुसार व्रत की तारीख : 25 जुलाई 2026 (शनिवार)

अभिजीत मुहूर्त (पूजा के लिए श्रेष्ठ): दोपहर 12:19 PM से 01:11 PM तक

व्रत पारण का समय : 26 जुलाई 2026 (रविवार) को सुबह 05:39 AM से 08:22 AM के बीच।

देवशयनी एकादशी 2026 पूजा विधि

देवशयनी एकादशी के दिन भगवान श्री हरि विष्णु योग निद्रा में जाते हैं। इस दिन उनकी विशेष पूजा की जाती है :

सुबह की तैयारी : एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ या पीले रंग के वस्त्र धारण करें।

व्रत का संकल्प : मंदिर के सामने हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।

पूजा स्थापना : भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर को चौकी पर स्थापित करें। उन्हें गंगाजल से स्नान कराएं।

सामग्री अर्पित करें : भगवान को पीले फूल, पीला चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।

तुलसी दल : भगवान विष्णु को तुलसी दल अत्यंत प्रिय हैं, उन्हें भोग में तुलसी जरूर शामिल करें। लेकिन ध्यान रखें, एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते, इसलिए इन्हें एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।

मंत्र और कथा : भगवान विष्णु के मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें और देवशयनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।

शयन कराना : पूजा के अंत में भगवान विष्णु को एक सुंदर छोटे गद्दे और तकिये वाले बिस्तर पर प्रतीकात्मक रूप से सुलाया जाता है यानी योग निद्रा में भेजा जाता है।

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Pradosh Vrat July 2026: आषाढ़ के पहले प्रदोष व्रत पर मासिक शिवरात्रि और रविवार का सुंदर संयोग, जानें पूजा मुहूर्त और प्रदोष काल का समय

Pradosh Vrat July 2026: आज जुलाई का पहला प्रदोष व्रत है। प्रदोष व्रत हर माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। आज आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रवि प्रदोष व्रत किया जा रहा है। रविवार को त्रयोदशी तिथि होने की वजह से यह रवि प्रदोष व्रत है। इस माह प्रदोष व्रत के दिन मासिक शिवरात्रि और रोहिणी नक्षत्र का दुर्लभ संयोग बन रहा है। इस दिन रोहिणी नक्षत्र और रविवार का शुभ संयोग होने के कारण इसे रोहिणी प्रदोष और रवि प्रदोष व्रत माना जाता है। आज प्रदोष व्रत, रविवार और मासिक शिवरात्रि का तीन गुना पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। ये तीनों ही व्रत 2 शुभ योग में किए जाएंगे। आज वृद्धि योग प्रात:काल से लेकर रात 08:06 बजे तक रहेगा, उसके बाद से ध्रुव योग होगा। वृद्धि योग में किए गए कार्यों में बढ़ोत्तरी होगी, वहीं ध्रुव योग में स्थिर या स्थायी कार्य करने चाहिए।

रवि प्रदोष पर आषाढ़ मासिक शिवरात्रि का संयोग

12 जुलाई रविवार को रवि प्रदोष व्रत और आषाढ़ मासिक शिवरात्रि एक साथ हैं। पंचांग के अनुसार, आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी तिथि 12 जुलाई को मध्यरात्रि 02:04 बजे से लेकर रात 10:29 बजे तक है, उसके बाद से आषाढ़ कृष्ण चतुर्दशी तिथि शुरू होगी और अगले दिन 13 जुलाई सोमवार को शाम 6:49 बजे तक है।

उदयातिथि और प्रदोष काल के आधार पर प्रदोष रविवार को है, वहीं शिवरात्रि के लिए निशिता मुहूर्त की गणना करते हैं, इस आधार पर आषाढ़ कृष्ण चतुर्दशी तिथि में निशिता मुहूर्त 12 जुलाई को ही प्राप्त हो रहा है। इसलिए 12 जुलाई को रवि प्रदोष और आषाढ़ शिवरात्रि का व्रत एक साथ रखा जाएगा।

रवि प्रदोष व्रत पूजा विधि

  • प्रात:काल स्नान आदि से निवृत हो जाएं और साफ कपड़े पहनें।
  • उसके बाद सबसे पहले व्रत और पूजा का संकल्प करें।
  • फिर सूर्योदय के समय भगवान सूर्य की पूजा करें और उनको जल से अर्घ्य दें।
  • सूर्य मंत्र का जाप करें।
  • शिव मंदिर जाएं या घर पर ही शिवजी को जलाभिषेक करें।
  • बेलपत्र, भांग, धतूरा, अक्षत्, चंदन, शहद, फूल, माला आदि से शिवरात्रि पूजन करें।
  • शाम को सूर्यास्त के बाद प्रदोष व्रत की पूजा करें। इसमें भी महादेव की पूजा विधिपूर्वक करें।

रवि प्रदोष और आषाढ़ शिवरात्रि का मुहूर्त

प्रदोष व्रत की पूजा हमेशा शाम के समय ही करते हैं, लेकिन शिवरात्रि व्रत में ऐसा नहीं है। आप जब चाहें तब शिव पूजा कर लें। आइए जानें प्रदोष व्रत पूजा मुहूर्त और शिवरात्रि पूजा मुहूर्त

प्रदोष पूजा का शुभ मुहूर्त : आज, शाम 7:22 बजे से रात 9:24 बजे तक

शिवरात्रि पूजा मुहूर्त : सुबह 07:15 बजे से दोपहर 12:27 बजे तक

12 जुलाई के अन्य शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त : प्रात:काल 04:10 बजे से 04:51 बजे तक

अभिजीत मुहूर्त : दिन में 11:59 बजे से दोपहर 12:54 बजे तक

लाभ-उन्नति मुहूर्त : सुबह 08:59 बजे से 10:43 बजे तक

अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त : सुबह 10:43 बजे से दोपहर 12:27 बजे तक

शुभ-उत्तम मुहूर्त : शाम 07:22 बजे से 08:38 बजे तक

अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त : रात 08:38 बजे से 09:54 बजे तक

Yogini Ekadashi 2026 Vrat Today: आज कर रहे हैं योगिनी एकादशी का व्रत, जानें कब से कब तक रहेगा राहुकाल

Yogini Ekadashi 2026 Vrat Today: आज कर रहे हैं योगिनी एकादशी का व्रत, जानें कब से कब तक रहेगा राहुकाल

Yogini Ekadashi 2026 Vrat Today: योगिनी एकादशी का व्रत आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत करने से 88000 ब्राह्मणों को भोजन कराने जितना पुण्य फल मिलता है। इस बार योगिनी एकादशी का व्रत दो दिन किया जा रहा है, 10 जुलाई और 11 जुलाई 2026 को। 10 जुलाई को आषाढ़ माह की एकादशी तिथि सूर्योदय के समय व्यप्त नहीं थी, जबकि आज यानी 11 जुलाई को सूर्योदय एकादशी तिथि में हुआ है। इसलिए, उदयातिथि के अनुसार आज भी योगिनी एकादशी का व्रत किया जा रहा है। कल जहां भगवान विष्णु के गृहस्थ भक्तों ने व्रत किया था, वहीं आज श्री हरि के वैष्णव भक्त यह उपवास कर रहे हैं। आज के दिन पूजा करते समय राहुकाल का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। आइए जानें आज राहुकाल का समय क्या है?

11 जुलाई राहुकाल का समय

11 जुलाई दिन शनिवार को राहुकाल सुबह 8 बजकर 59 मिनट से सुबह 10 बजकर 43 मिनट तक रहेगा।

राहु जल्दबाजी में लिए फैसलों का प्रतीक

राहु भ्रम, माया, अचानक इच्छा, प्रलोभन और जल्दबाजी में लिए गए निर्णयों का प्रतीक है। राहुकाल के दौरान, मन स्पष्ट नहीं होता है। इसलिए वैदिक ज्योतिष के अनुसार, राहुकाल नए प्रोजेक्ट शुरू करने, महत्वपूर्ण निर्णय लेने या बड़ी मात्रा में धन खर्च करने के लिए एक अशुभ समय माना गया है।

राहुकाल के दौरान बड़े खर्चों से बचें

ज्योतिष में राहुकाल को ऐसा समय माना जाता है जब नए और शुभ कार्यों की शुरुआत करने से बचना चाहिए। वैदिक ज्योतिष में राहु को भ्रम, अनिश्चितता, लालच और अप्रत्याशित घटनाओं का कारक माना जाता है। इसलिए इस समय किए गए बड़े आर्थिक निर्णयों में बाधा या पछतावे की आशंका की स्थिति बन सकती है। ज्योतिष के अनुसार, महत्वपूर्ण कार्य ऐसे समय में शुरू हों जब ग्रहों का प्रभाव अनुकूल माना जाए। इसलिए घर, वाहन, सोना, जमीन, या किसी बड़े निवेश की शुरुआत राहुकाल में अशुभ मानी जाती है। वित्तीय निर्णयों के लिए एक स्पष्ट और शांत दिमाग की जरूरत होती है। राहुकाल एक ऐसा समय हो सकता है जब लोग डर, लालच, दबाव या उत्तेजना से प्रभावित हो सकते हैं।

राहुकाल में न लें ये अहम वित्तीय फैसले

इस अवधि के दौरान कार, फोन, लैपटॉप, सोना, संपत्ति, महंगे कपड़े, उपकरण या लक्जरी उत्पाद ना खरीदें। इसी तरह, कोई भी फाइनेंस से संबंधित डॉक्यूमेंट्स पर साइन ना करें, पैसा उधार ना दें, संदिग्ध योजनाओं में निवेश ना करें, आपातकाल को छोड़कर किसी भी तरह के बड़े भुगतान करने से बचें, लिखित डॉक्यूमेंट्स के बिना कोई अग्रिम भुगतान ना करें।

राहुकाल के दौरान सरल उपाय

राहुकाल के दौरान ॐ राहवे नमः का 108 बार जप करें या कुछ मिनटों के लिए शांत रहें। किसी से भी बहस ना करें, झूठ ना बोलें, शॉर्टकट ना अपनाएं, लालची ना बनें। साथ ही, शनिवार को आप किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन, काले तिल या कंबल दान करना चुन सकते हैं।

Yogini Ekadashi 2026 Upay: आज योगिनी एकादशी के पावन दिन पर तुलसी के इन उपायों से बदल सकते हैं अपनी किस्मत, पैसा और तरक्की से भर जाएगी झोली

Yogini Ekadashi 2026 Upay: आज योगिनी एकादशी के पावन दिन पर तुलसी के इन उपायों से बदल सकते हैं अपनी किस्मत, पैसा और तरक्की से भर जाएगी झोली

Yogini Ekadashi 2026 Upay: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि सभी तिथियों अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। हर हिंदी माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को एकदशी व्रत किया जाता है। इनमें से ही एक है योगिनी एकादशी, जो आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। आज किया जा रहा योगिनी का व्रत सभी पापों का शमन करने वाला है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, योगिनी एकादशी का व्रत करने वाले भक्तों को 88000 ब्रह्मणों को भोजन कराने जितना पुण्य प्राप्त होता है। माना जाता है कि इस दिन तुलसी के पौधे के कुछ उपाय करना शुभ होता है। इससे लक्ष्मीनारायण की कृपा से जीवन में पैसा और तरक्की आती है। दुख, तकलीफें और दरिद्रता दूर हो जाते हैं।

ये हैं तुलसी से करें 5 उपाय

तुलसी मंजरी से विष्णु जी का अभिषेक : एकादशी के दिन कच्चे दूध में तुलसी की मंजरी मिलाकर भगवान विष्णु का अभिषेक करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से लक्ष्मी-नारायण कृपा प्राप्त होती है और सुख-संपत्ति में वृद्धि होती है।

तुलसी माता को श्रृंगार का सामान : एकादशी के दिन तुलसी माता को लाल चुनरी और सुहाग सामग्री अर्पित करनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन में सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

विष्णु जी की पूजा में तुलसी दल का प्रयोग : इस दिन भगवान विष्णु को भोग लगाते समय तुलसी का पत्ता रखें। कहते हैं कि ऐसा करने से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा से धन-धान्य बढ़ता है। मगर, एकादशी के दिन तुलसी स्पर्श नहीं करना चाहिए और न ही तोड़ना चाहिए। एक दिन पहले तोड़े हुए तुलसी दल या जमीन पर पड़ी पत्तियों का प्रयोग करना चाहिए।

तुलसी माता के नामों का जाप : करियर या व्यापार में आ रही अड़चनों से मुक्ति पाने के लिए तुलसी माता के 8 नामों (मों वृंदा, विश्वपूजिता, पुष्पसारा, वृंदानी, विश्वपावनी, नंदिनी, कृष्णजीवनी और तुलसी) का एकादशी के दिन कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए। मान्यता है कि तुलसी माता के नामों का जाप करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर पर उनका वास होता है।

तुलसी के पास जलाएं दीपक : एकादशी की शाम को तुलसी के सामने घी का दीपक जलाना चाहिए। दीपक जलाते समय ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। इसके बाद तुलसी की 5,7, 11 या 21 बार परिक्रमा करें। मान्यता है कि ऐसा करने से भाग्य का साथ मिलने के साथ ही जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है।

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Yogini Ekadashi 2026 Vrat Katha: गृहस्थ आज करेंगे योगिनी एकादशी का व्रत, आज विष्णु पूजा का पुण्य पाने के लिए जरूर सुनें ये व्रत कथा

Yogini Ekadashi 2026 Vrat Katha: हिंदू धर्म हर हिंदी माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। योगिनी एकादशी का व्रत भी इनमें से एक है। यह व्रत हर साल आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। इस साल योगिनी एकादशी का व्रत 10 जुलाई और 11 जुलाई दो दिन किया जाएगा। 10 जुलाई को श्री हरि के गृहस्थ भक्त योगिनी एकादशी का व्रत रखेंगे, जबकि 11 जुलाई को वैष्णव लोग व्रत रहेंगे। व्रत के दिन पूजा के समय व्रती को योगिनी एकादशी व्रत कथा जरूर सुननी चाहिए। इससे स्वर्ग की प्राप्ति होती है और 80 हजार ब्राह्मणों को भोज कराने के बराबर पुण्य लाभ मिलता है।

अलकापुरी के राजा और हेममाली की कथा

योगिनी एकादशी की व्रत कथा भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी। स्वर्ण नगरी अलकापुरी में धनपति कुबेर राजा करते थे। वे भगवान शिव के परम भक्त थे और रोज उनकी पूजा के लिए मानसरोवर से सुंदर और ताजे फूल लाने का कार्य हेममाली नाम का एक यक्ष करता था।

हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी था, जो अत्यंत रूपवान थी और हेममाली उससे अगाध प्रेम करता था। एक दिन हेममाली रोज की तरह मानसरोवर से शिव पूजा के लिए पुष्प लेकर आया, लेकिन महल जाने के बजाय वह अपनी पत्नी के पास घर पर ही रुक गया। पत्नी के साथ आमोद-प्रमोद में व्यस्त हेममाली को समय का भान ही नहीं रहा। उधर, भगवान शिव की पूजा के लिए फूलों का इंतजार करते रहे। जब बहुत देर हो गई, तो राजा ने क्रोध में आकर अपने सेवकों से हेममाली के बारे में पूछा।

सेवकों ने पता लगाकर राजा को बताया, “महाराज! हेममाली अपनी पत्नी के प्रेम में अंधा होकर अपने घर पर ही रुक गया है और वहीं रमण कर रहा है।” यह सुनकर राजा कुबेर अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने तुरंत हेममाली को दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया। डर से कांपता हुआ हेममाली राजा के सामने उपस्थित हुआ। क्रोधित कुबेर ने उससे कहा, “अरे पापी! तूने मेरे परम आराध्य देवों के देव महादेव की पूजा का अनादर किया है। तू कर्तव्यच्युत हुआ है, इसलिए मैं तुझे श्राप देता हूं कि तू स्त्री के वियोग को भोगेगा और मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जाकर कोढ़ी (कुष्ठ रोगी) हो जाएगा।”

राजा कुबेर के श्राप के प्रभाव से हेममाली उसी क्षण स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसका सुंदर शरीर कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गया और उसकी त्वचा गलने लगी। उसकी पत्नी भी उससे बिछड़ गई। वह पृथ्वी पर भूख, प्यास और भयंकर शारीरिक पीड़ा से तड़पता हुआ जंगलों में भटकने लगा। शिव पूजा के प्रभाव के कारण उसकी याददाश्त नष्ट नहीं हुई थी, इसलिए वह अपने पाप पर निरंतर पश्चाताप करता रहता था।

घूमते-घूमते एक दिन वह हिमालय पर्वत पर मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम पहुंचा। हेममाली की दयनीय स्थिति देखकर ऋषि मार्कण्डेय ने दयापूर्वक उससे पूछा, “तुमने ऐसा कौन सा घोर पाप किया है, जिसके कारण तुम्हारी यह दुर्दशा हुई है?” हेममाली ने रोते हुए अपनी पूरी कहानी और राजा कुबेर के श्राप के बारे में ऋषि को सच-सच बता दिया। उसने कहा, “हे मुनिवर! मैंने अज्ञानता और काम के वश में आकर भूल की है। कृपया मुझ पर कृपा करें और इस कष्ट से मुक्ति का कोई उपाय बताएं।”

ऋषि मार्कण्डेय ने कहा, “तुमने मेरे सामने सच बोला है, इसलिए मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूँ। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत करो। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और तुम पुनः अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त कर लोगे।”

हेममाली ने विधि-विधान और निष्ठा के साथ योगिनी एकादशी का व्रत रखा और रात्रि जागरण किया। इस व्रत के प्रभाव से हेममाली का कुष्ठ रोग पूरी तरह ठीक हो गया। वह पहले की तरह अत्यंत सुंदर और दिव्य स्वरूप वाला हो गया। इसके बाद वह वापस अलकापुरी लौट गया और अपनी पत्नी विशालाक्षी के साथ पुनः सुखपूर्वक रहने लगा।

Guru Purnima 2026: इस साल गुरु पूर्णिमा पर अपने गुरु को राशि अनुसार दें उपहार, जानें आपकी राशि के अनुसार क्या दे सकते हैं भेंट

Guru Purnima 2026: इस साल गुरु पूर्णिमा पर अपने गुरु को राशि अनुसार दें उपहार, जानें आपकी राशि के अनुसार क्या दे सकते हैं भेंट

Guru Purnima 2026: भारतीय संस्कृति में “गुरु” का स्थान भगवान से भी ऊपर माना गया है, क्योंकि गुरु ही शिष्य को अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। इस दिन लोग अपने गुरुओं के पास जाते हैं, उनका आशीर्वाद लेते हैं और उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। जिनके गुरु इस संसार में नहीं हैं, वे उनके चित्र की पूजा करते हैं या गुरु स्वरूप मानकर माता-पिता और शिक्षकों का सम्मान करते हैं। गुरु पूर्णिमा हर साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। इस पावन अवसर पर अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए अपनी राशि के अनुसार शुभ वस्तुओं को भेंट या दान करना बेहद फलदायी माना जाता है।

हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को गुरु पूर्णिमा कहा जाता है। चूंकि यह दिन महान ऋषि वेदव्यास जी के जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। साल 2026 में गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई 2026, बुधवार को मनाई जाएगी। नीचे सभी 12 राशियों के अनुसार गुरु को भेंट करने या दान देने योग्य वस्तुओं की सूची दी गई है :

आपकी राशि अनुसार गुरु के लिए भेंट

मेष राशि : मेष राशि के जातकों को गुरु पूर्णिमा पर अपने गुरु को लाल रंग के वस्त्र, मूंगा, या लाल चंदन भेंट करना चाहिए। इसके साथ ही गेहूं और गुड़ का दान करना भी शुभ रहेगा।

वृषभ राशि : इस राशि के लोग अपने गुरु को सफेद या रेशमी वस्त्र भेंट कर सकते हैं। इसके अलावा मिश्री, चांदी या चावल का दान करने से गुरु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

मिथुन राशि : मिथुन राशि वालों को अपने गुरु को हरे रंग के वस्त्र, धार्मिक पुस्तकें, या मूंग की दाल भेंट करनी चाहिए। गुरु के सानिध्य में गायत्री मंत्र का जाप करना भी आपके लिए लाभकारी रहेगा।

कर्क राशि : कर्क राशि के जातकों को गुरु को सफेद चंदन, चावल, या चांदी का कोई पात्र भेंट करना चाहिए। जरूरतमंदों को दूध या मिठाई का दान देना भी उत्तम माना जाता है।

सिंह राशि : सिंह राशि के लोग अपने गुरु को पीले या सुनहरे रंग के वस्त्र, केसर, या तांबे का पात्र भेंट करें। इसके अलावा गेहूं और धार्मिक ग्रंथों का दान भी बहुत फलदायी होता है।

कन्या राशि : कन्या राशि वालों को गुरु को किताबें, पेन, या शिक्षण सामग्री भेंट करनी चाहिए। इसके साथ ही हरे फल या मूंग की दाल का दान करना आपके बौद्धिक विकास के लिए शुभ है।

तुला राशि : तुला राशि के जातकों को अपने गुरु को सफेद रेशमी वस्त्र या मिश्री भेंट करनी चाहिए। आप आश्रम या मंदिर में चावल और घी का दान भी कर सकते हैं।

वृश्चिक राशि : इस राशि के लोग अपने गुरु को लाल या महरून रंग के वस्त्र, तांबे के बर्तन, या कलावा भेंट करें। जरूरतमंदों को भोजन कराना भी आपके लिए शुभ रहेगा।

धनु राशि : धनु राशि के स्वामी स्वयं बृहस्पति (गुरु) हैं। आपको अपने गुरु को पीले वस्त्र, चना दाल, केसर, या हल्दी भेंट करनी चाहिए। गुरु से गुरु मंत्र दीक्षा लेना आपके लिए सबसे सर्वोत्तम रहेगा।

मकर राशि : मकर राशि वालों को गुरु को नीले या भूरे रंग के वस्त्र या कोई उपयोगी कंबल भेंट करना चाहिए। साथ ही, गुरु के चरणों में तिल या उड़द की दाल का दान समर्पित करें।

कुंभ राशि : इस राशि के जातक अपने गुरु को सफेद या नीले रंग के वस्त्र, सूखे मेवे (जैसे काजू, बादाम) या औषधि भेंट कर सकते हैं। इसके अलावा अनाथालय या वृद्धाश्रम में अन्न दान करना विशेष फल देता है।

मीन राशि : मीन राशि के जातकों को गुरु को पीले वस्त्र, सोने की कोई छोटी वस्तु, पुखराज (यदि सामर्थ्य हो) या धार्मिक पुस्तकें (जैसे भगवद गीता या रामायण) भेंट करनी चाहिए। हल्दी और चने की दाल का दान करना भी बहुत शुभ है।

Yogini Ekadashi 2026: 10 या 11 जुलाई कब किया जाएगा योगिनी एकादशी का व्रत? जानें सही तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त

Yogini Ekadashi 2026: 10 या 11 जुलाई कब किया जाएगा योगिनी एकादशी का व्रत? जानें सही तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त

Yogini Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। हर हिंदी माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत करने वाले भक्तों को भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके सभी दुख तकलीफें भगवान की कृपा से दूर हो जाती हैं। ऐसा ही एक व्रत है योगिनी एकादशी का, जो आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, योगिनी एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। पद्म पुराण में बताया गया है कि इस व्रत का फल 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य देता है। इस साल योगिनी एकादशी व्रत का संयोग दो दिन, 10 और 11 जुलाई को पड़ रहा है। 10 जुलाई को एकादशी तिथि सूर्योदय के बाद लग रही है, जबकि 11 जुलाई को एकादशी तिथि में सूर्योदय तो हो रहा है, लेकिन यह बहुत जल्दी समाप्त हो जा रही है। इसलिए इस व्रत की तारीख को लेकर भक्तों में कंफ्यूजन है। आइए जानें इसकी सही तारीख

दो दिन होगा योगिनी एकादशी व्रत

पंचांग के अनुसार, इस साल आषाढ़ कृष्ण एकादशी तिथि का प्रारंभ 10 जुलाई शुक्रवार को सुबह 8 बजकर 16 मिनट पर हो रहा है। यह 11 जुलाई शनिवार को प्रात: 5 बजकर 22 मिनट तक मान्य रहेगी। 11 जुलाई को हरि वासर सुबह 10 बजकर 32 मिनट पर खत्म हो रहा है, इस वजह से योगिनी एकादशी का व्रत दो दिन रखा जाएगा। 10 जुलाई को गृहस्थ लोग योगिनी एकादशी का व्रत रहेंगे, वहीं 11 जुलाई को वैष्णव संप्रदाय के लोग यह व्रत रखेंगे।

योगिनी एकादशी 2026 पूजा का मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त (पूजन के लिए): सुबह 04:54 बजे से सुबह 05:26 बजे तक

अभिजित मुहूर्त: दोपहर 01:24 बजे से दोपहर 02:28 बजे तक

पारण का समय

शास्त्रों के नियमों के अनुसार, एकादशी व्रत का पारण हरि वासर समाप्त होने के बाद और द्वादशी तिथि के भीतर किया जाता है।

10 जुलाई को व्रत रखने वालों के लिए पारण समय : 11 जुलाई 2026 (शनिवार) को दोपहर 01:50 बजे से शाम 04:36 बजे के बीच। इस दिन सुबह 10:32 बजे तक हरि वासर रहेगा, इसलिए पारण दोपहर के इस शुभ समय में करना श्रेष्ठ है।

11 जुलाई को व्रत रखने वालों के लिए पारण समय : 12 जुलाई 2026 (रविवार) को सुबह 05:32 बजे से सुबह 08:18 बजे के बीच।

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Avatar Meher Baba: अवतार मेहेर बाबा कौन थे, कब और क्यों मनाया जाता है मौन पर्व?

The picture shows Avatar Meher Baba, who observed silence continuously for 44 years

Spiritual Guru Merwan Sheriar Irani: अवतार मेहेर बाबा 20वीं शताब्दी के प्रसिद्ध आध्यात्मिक संत और गुरु थे। उनका वास्तविक नाम मेरवान शेरियार ईरानी था। वे प्रेम, करुणा, सेवा और मानव एकता का संदेश देने के लिए जाने जाते हैं। मेहेर बाबा का सबसे अनूठा संकल्प था कि उन्होंने 10 जुलाई 1925 से आजीवन मौन धारण किया और फिर कभी बोलकर संवाद नहीं किया। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में हर वर्ष 10 जुलाई को मौन पर्व/ Silence Day मनाया जाता है।ALSO READ: कब है गुरु पूर्णिमा 2026 में? जानें तिथि, मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि

 

अवतार मेहेर बाबा कौन थे?

जन्म और मूल नाम: उनका जन्म 25 फरवरी 1894 को पुणे में एक पारसी (ईरानी) परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम मेरवान शेरियर इरानी था। 'मेहेर बाबा' नाम उन्हें उनके शुरुआती शिष्यों ने दिया, जिसका अर्थ है 'दयालु पिता'।

 

आध्यात्मिक यात्रा: जब वे 19 वर्ष के थे, तब उनकी मुलाकात एक प्रसिद्ध सूफी संत हजरत बाबाजान से हुई, जिन्होंने मेरवान के भीतर आध्यात्मिक चेतना जागृत की। इसके बाद वे शिरडी के साईं बाबा, उपासना महाराज, नारायण महाराज और ताजुद्दीन बाबा जैसे महान आध्यात्मिक गुरुओं के संपर्क में आए।ALSO READ: Devshayani Ekadashi 2026: देवशयनी एकादशी से शुरू होंगे चातुर्मास, 4 महीने के लिए लग जाएगी मंगल कार्यों पर रोक

 

कार्य: उन्होंने महाराष्ट्र के अहमदनगर के पास 'मेहेराबाद' को अपना मुख्य केंद्र बनाया। उन्होंने कुष्ठ रोगियों, गरीबों और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों, जिन्हें वे 'मस्त' कहते थे की सेवा के लिए कई औषधालय, स्कूल और आश्रम खोले।

 

प्रसिद्ध संदेश: उनका सबसे प्रसिद्ध कथन है: 'I have come not to teach, but to awaken' (उन्होंने अपने प्रसिद्ध 'यूनिवर्सल मैसेज'/ Universal Message में कहा था, मैं यहां सिखाने नहीं, बल्कि जगाने आया हूं) और उनका एक सार्वभौमिक नारा है— 'Don't worry, be happy' (चिंता मत करो, खुश रहो)। 31 जनवरी 1969 को मेहराबाद, अहमदनगर (महाराष्ट्र) में उन्होंने महासमाधि ली। 

 

मौन पर्व (Silence Day) कब मनाया जाता है?

मेहेर बाबा के अनुयायियों और प्रेमियों द्वारा हर साल 10 जुलाई को 'मौन पर्व' के रूप में मनाया जाता है। आध्यात्मिक गुरु मेहेर बाबा के अनुयायियों के लिए आज का दिन बेहद खास है। मेहेर बाबा ने 10 जुलाई 1925 से आजीवन मौन धारण किया था, इसलिए उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए प्रतिवर्ष 10 जुलाई को 'मौन दिवस' मनाया जाता है।

 

मौन पर्व क्यों मनाया जाता है?

मेहेर बाबा ने 10 जुलाई 1925 को मौन धारण किया था, जो उनके जीवन के अंत (1969 में देहत्याग) तक यानी 44 वर्षों तक लगातार जारी रहा। इसी ऐतिहासिक दिन की याद में हर साल 10 जुलाई को मौन पर्व मनाया जाता है। 

 

बाबा के मौन रहने और इस पर्व को मनाए जाने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

 

शब्दों से परे संवाद: मेहेर बाबा का मानना था कि ईश्वर अनादि काल से मौन रहकर काम कर रहा है। इंसानों ने ईश्वर की वाणी यानी शब्दों को समझने के बजाय उन पर विवाद करना शुरू कर दिया। इसलिए उन्होंने कहा कि वे वाणी से नहीं, बल्कि सीधे लोगों के 'हृदय' से संवाद करेंगे।

 

आध्यात्मिक अनुशासन: जब बाबा मौन थे, तो वे शुरू में एक 'अल्फाबेट बोर्ड'/ अक्षर पट्टिका की मदद से और बाद में केवल हाथ के इशारों से बात करते थे। उन्होंने अपने शिष्यों को सिखाया कि जीभ का मौन दरअसल मन को शांत करने और आंतरिक ऊर्जा को संचित करने की पहली सीढ़ी है।

 

प्रेम की गहराई: बाबा के शिष्यों के अनुसार, बाबा का कहना था कि जब दो लोग गुस्से में होते हैं तो उनके दिलों की दूरी बढ़ जाती है, इसलिए वे चिल्लाते हैं। लेकिन जब दो लोग गहरे प्रेम में होते हैं, तो वे बहुत धीरे बोलते हैं, और जब प्रेम पराकाष्ठा पर होता है, तो शब्दों की जरूरत ही नहीं पड़ती; केवल मौन ही काफी होता है।

 

मौन पर्व कैसे मनाया जाता है?

हर साल 10 जुलाई को मेहेर बाबा के अनुयायी स्वेच्छा से 24 घंटे (9 जुलाई की आधी रात से 10 जुलाई की आधी रात तक) का पूर्ण मौन व्रत रखते हैं। आज भी इस दिन वे अपनी सामान्य दिनचर्या के काम करते हुए भी किसी शब्द का उच्चारण नहीं करते और ईश्वर के नाम का मानसिक स्मरण करते हैं। उनका प्रमुख आश्रम मेहराबाद (अहमदनगर, महाराष्ट्र) में स्थित है, जहां देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। उनके अनुयायी भारत के अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और अन्य देशों में भी बड़ी संख्या में हैं। 

 

अवतार मेहेर बाबा मौन पर्व- FAQs

 

1. अवतार मेहेर बाबा कौन थे?

वे 20वीं शताब्दी के प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु थे, जिन्होंने प्रेम, सेवा और मानव एकता का संदेश दिया।

 

2. मौन पर्व कब मनाया जाता है?

हर वर्ष 10 जुलाई को मौन पर्व मनाया जाता है।

 

3. मेहेर बाबा ने मौन कब धारण किया था?

उन्होंने 10 जुलाई 1925 को मौन धारण किया था।

 

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Yogini Ekadashi 2026 Date: योगिनी एकादशी पर त्रिपुष्कर योग के साथ रहेगा भरिणी नक्षत्र, जानें कब किया जाएगा योगिनी एकादशी का व्रत

Yogini Ekadashi 2026 Date: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। हर हिंदी माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि श्री हरि भगवान विष्णु को समर्पित है। माना जाता है कि पूरे साल में आने वाली सभी 24 एकादशी का व्रत करने वाले भक्तों के भगवान विष्णु के आशीर्वाद से सभी दुख दूर होते हैं और जीवन में खुशहाली आती है। योगिनी एकादशी का व्रत भी इनमें से एक है। यह व्रत आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है।

यह व्रत बहुत खास माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस एकादशी का व्रत रखने से पापों से मुक्ति मिलती है और और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। यह व्रत भक्तों को रोग, दरिद्रता, दुख व कलंक से दूर करता है। इस अवसर पर ठाकुरजी का आकर्षक शृंगार, विशेष पूजन, भजन-कीर्तन और प्रसाद वितरण का आयोजन किया जाएगा।

कब है योगिनी एकादशी?

पंचांग के अनुसार, आषाढ़ कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि 10 जुलाई को सुबह 8.16 बजे से एकादशी तिथि शुरू होगी। एकादशी तिथि 11 जुलाई को सुबह 5:00 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर गृहस्थजन 10 जुलाई को ही योगिनी एकादशी का व्रत रखेंगे। व्रती अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना के बाद पारण करेंगे।

त्रिपुष्कर योग और भरिणी नक्षत्र का शुभ संयोग

इस बार योगिनी एकादशी के दिन भरणी नक्षत्र और त्रिपुष्कर योग का संयोग बन रहा है। यह संयोग भगवान विष्णु की पूजा के लिए बहुत खास माना जाता है। इसमें भगवान विष्णु की पूजा करने से श्रीहरि प्रसन्न होते हैं और सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

योगिनी एकादशी पूजा विधि

योगिनी एकादशी व्रत के दिन प्रात:काल गंगा स्नान करें या घर में नहाने के पाने में गंगा जल मिला कर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। भगवान सूर्य को जल अर्पित करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद एक चौकी पर मां लक्ष्मी और विष्णु जी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। प्रतिमाओं को शंख से स्नान करवाकर उन्हें मंजरी युक्त तुलसी अर्पित करें। ध्यान रहे तुलसी एकादशी के दिन न तोड़ें, इससे एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें। एकादशी व्रत के दिन पीपल के पेड़ पर दीपक जलाना चाहिए और इस दिन तुलसी की पूजा भी की जाती है। इस व्रत में चावल नहीं खाया जाता है। चावल से श्रीहरि की पूजा भी नहीं की जाती है।

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