यूएन में भारत ने उड़ाई पाकिस्तान के झूठ की धज्जियां, भारतीय डिप्लेमैट त्यागी ने दी अपनी डूबती इकॉनमी पर ध्यान देने की नसीहत

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार काउंसिल में कश्मीर पंडितों के पलायन का मुद्दा उठा कर भारत को घेरने की पाकिस्तान की कोशिश को एक बार फिर करारा झटका लगा है। काउंसिल में भारतीय राजनयिक क्षितिज त्यागी ने पाकिस्तान को नसीहत दी और कहा कि वह बॉर्डर पार आतंकवाद को प्रायोजित करने के बजाय अपनी देश की डूबती अर्थव्यवस्था पर ध्यान दे और सिर्फ बेलआउट पर ही निर्भर न रहे।

भारत ने गुरुवार को यूएन ह्यूमन राइट्स काउंसिल में कश्मीर और भारत में अल्पसंख्यकों पर पाकिस्तान की बातों पर कड़ा एतराज जताया। उसने इस्लामाबाद पर जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों पर गैर-कानूनी कब्जा करने का आरोप लगाया और उससे इलाका खाली करने को कहा। भारतीय डिप्लोमैट क्षितिज त्यागी ने काउंसिल में भारत के जवाब देने के अधिकार का इस्तेमाल किया और पाकिस्तान से कहा कि वह इलाके पर कब्जा करने और बॉर्डर पार आतंकवाद को स्पॉन्सर करने के बजाय अपनी कर्ज में डूबी इकॉनमी और बेलआउट पर निर्भरता पर ध्यान दे।

त्यागी ने कहा, “क्योंकि पाकिस्तान को हर एजेंडा आइटम के तहत याद दिलाने की जरूरत लगती है, जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अटूट हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। जम्मू-कश्मीर का एकमात्र हिस्सा जिस पर विदेशी कब्जा है, वह पाकिस्तान के पास है, जिसे हम फिर से खाली करने को कहते हैं।”

अल्पसंख्यकों पर पाकिस्तान की बातों का जवाब दिया

त्यागी ने अल्पसंख्यकों पर पाकिस्तान की बातों का जवाब देते हुए भारत की मुस्लिम आबादी और सार्वजनिक संस्थानों में प्रतिनिधित्व पर जोर दिया। साथ ही आरोप लगाया कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय को बहुत अधिक जुल्म का सामना करना पड़ा है।

उन्होंने आगे कहा, “भारत दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देशों में से एक है, और हमारे अल्पसंख्यक समुदाय के लोग वोट देते हैं, कानून बनाते हैं, सबसे बड़ी अदालत में बैठते हैं और हमारे इंस्टीट्यूशन को लीड करते हैं। पाकिस्तान में, आजादी के बाद से हिंदू, सिख और ईसाई समुदाय की आबादी बहुत कम हो गई है। उनकी बेटियों को किडनैप किया जाता है, जबरदस्ती धर्म परिवर्तन कर शादी कर दी जाती है।

भारत ने कश्मीरी पंडितों के पलायन को याद किया

त्यागी ने 1990 में कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का भी जिक्र किया और आरोप लगाया कि इसके लिए पाकिस्तान के समर्थन वाले आतंकवादी जिम्मेदार थे। पड़ोसी देश के दोहरे रवैये को सामने लाते हुए, क्षितिज त्यागी ने कहा, “काउंसिल को पाकिस्तान को यह बताने की जरूरत नहीं है कि 1990 में कश्मीरी पंडितों के साथ क्या हुआ था, जिन्हें पाकिस्तान के हथियारबंद, ट्रेंड और बॉर्डर पार भेजे गए आतंकवादियों ने उनके घरों से निकाल दिया था।”

उन्होंने कहा, “उन आतंकवादियों ने हर धर्म के कश्मीरियों को मारा है, जिनमें से कई मुस्लिम थे। जिस देश ने उन्हें प्रायोजित किया, वह अब इस काउंसिल से जांच की मांग कर रहा है। यह काउंसिल इस बात से अनजान नहीं रहेगी।”

आतंकी हाफिज पर सवाल से भागे पाकिस्तान PM:शहबाज UN में पत्रकारों ने पूछा- आतंकियों को पनाह देना कब बंद करेंगे; कोई जवाब नहीं दिया

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पहुंचे। यहां पत्रकारों ने उनसे लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद को लेकर सवाल किया, लेकिन शहबाज सवालों को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ गए। UN मुख्यालय में दाखिल होते समय पत्रकारों ने शहबाज से पूछा, “प्रधानमंत्री, आप आतंकियों को पनाह देना कब बंद करेंगे?” शहबाज ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया। बाहर निकलते समय पत्रकारों ने फिर पूछा कि पाकिस्तान हाफिज सईद पर कार्रवाई कब करेगा, लेकिन शहबाज ने दोबारा कोई जवाब नहीं दिया। हाफिज सईद 26/11 मामले में आरोपी हाफिज सईद प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का संस्थापक है। भारत ने उसे UAPA के तहत आतंकवादी घोषित किया है। वह 26/11 मुंबई आतंकी हमले के मामले में आरोपी है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले की जांच में दाखिल सप्लीमेंट्री चार्जशीट में भी सईद को आरोपी बनाया है। NIA ने उसे कथित साजिश में आरोपी नंबर 8 बताया है और पाकिस्तान स्थित LeT के आतंकियों की भूमिका का आरोप लगाया है। भारत बोला- PAK आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों को घर छोड़ने पर मजबूर किया संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में कश्मीर और अल्पसंख्यकों को लेकर पाकिस्तान के बयान पर भारत ने पलटवार किया। भारतीय राजनयिक क्षितिज त्यागी ने कहा कि पाकिस्तान ने जिन आतंकियों को हथियार और ट्रेनिंग दी, उन्हीं ने 1990 में कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से निकलने पर मजबूर किया। पाकिस्तान ने भारत में कश्मीर और अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर सवाल उठाए थे। त्यागी ने कहा कि पाकिस्तान को भारत पर सवाल उठाने से पहले अपने यहां के हालात देखने चाहिए। त्यागी ने कहा कि पाकिस्तान ने आतंकियों को हथियार और ट्रेनिंग देकर भारत भेजा। उन्होंने कहा कि यही आतंकी बाद में कश्मीर में अलग-अलग धर्मों के लोगों को निशाना बनाते रहे, जिनमें बड़ी संख्या में मुस्लिम भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि जिस पाकिस्तान ने इन आतंकियों को समर्थन दिया, वही अब UN में मानवाधिकारों की बात कर रहा है। भारत ने पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों का मुद्दा उठाया भारत ने पाकिस्तान में हिंदू, सिख और ईसाई समुदायों की स्थिति का भी मुद्दा उठाया। त्यागी ने जबरन धर्म परिवर्तन और शादी, ईशनिंदा कानून और शिया, अहमदिया, इस्माइली और हजारा समुदायों के खिलाफ भेदभाव का जिक्र किया। त्यागी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा था, है और रहेगा। उन्होंने पाकिस्तान से जम्मू-कश्मीर के उसके कब्जे वाले हिस्से को खाली करने को कहा। साथ ही उन्होंने पाकिस्तान को अपनी कर्ज में डूबी अर्थव्यवस्था पर ध्यान देने की सलाह दी। ————————

धर्म परिवर्तन से अपने आप खत्म नहीं होता ST का दर्जा, इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, बताया किस आधार पर तय होगी आदिवासी पहचान

Allahabad High Court: धर्म परिवर्तन करने मात्र से किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe-ST) का दर्जा अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने एक अहम टिप्पणी में कहा है कि किसी व्यक्ति का ST दर्जा जारी रहेगा या नहीं, इसका फैसला केवल उसके धर्म के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह देखना होगा कि वह व्यक्ति अपनी जनजातीय पहचान, परंपराओं, सामाजिक व्यवस्था और संबंधित जनजातीय समुदाय से जुड़ाव को अब भी बनाए हुए है या नहीं।

जस्टिस अरुण कुमार की पीठ ने यह टिप्पणी चिंताद आनंद बनाम आंध्र प्रदेश सरकार एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2026 के फैसले पर भरोसा करते हुए की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ST दर्जे का सवाल इस बात से जुड़ा है कि संबंधित व्यक्ति अपनी जनजातीय पहचान को लगातार बनाए हुए है या नहीं।

क्या है पूरा मामला?

हाईकोर्ट में निन्हकी उर्फ नैमुनिशा की ओर से याचिकाएं दाखिल की गई थीं। निन्हकी ने खुद को भुइयां (Bhuiya) अनुसूचित जनजाति समुदाय का सदस्य बताया था। मामला सोनभद्र के डिप्टी कलेक्टर की ओर से जारी तीन आदेशों से जुड़ा था, जिनमें उनके पक्ष में हुई जमीन की तीन बिक्री को अमान्य घोषित कर दिया गया था।

रेवेन्यू अधिकारियों ने इन जमीन सौदों को उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 157-B और उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 99 का उल्लंघन माना था। इसके बाद संबंधित जमीन को राज्य सरकार में निहित करने का आदेश दिया गया। इन कानूनी प्रावधानों के तहत अनुसूचित जनजाति के सदस्य की जमीन ऐसे व्यक्ति को ट्रांसफर नहीं की जा सकती, जो अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है।

याचिकाकर्ता ने क्या दलील दी?

निन्हकी की ओर से कहा गया कि उनका जन्म भुइयां ST समुदाय में हुआ था। उनके पास तहसीलदार की ओर से जारी वैध अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र भी था। उन्होंने यह भी दलील दी कि विवादित जमीन बेचने वाले लोग गोंड ST समुदाय से संबंधित थे। ऐसे में दोनों पक्ष अनुसूचित जनजाति समुदाय से होने के कारण जमीन का लेनदेन कानूनी रूप से वैध था। याचिकाकर्ता का कहना था कि शादी के बाद भी उन्होंने अपनी मूल जनजातीय पहचान नहीं छोड़ी और वह भुइयां समुदाय से ही संबंधित रहीं।

सरकार ने क्यों उठाया ST दर्जे पर सवाल?

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने निन्हकी के वर्तमान जनजातीय दर्जे पर सवाल उठाया। सरकार ने अदालत के सामने ऐसे दस्तावेज और परिस्थितियां रखीं, जिनके मुताबिक निन्हकी ने एक मुस्लिम व्यक्ति से इस्लामी रीति-रिवाज से शादी की थी। शादी के बाद उनका नाम नैमुनिशा के रूप में दर्ज होने लगा। सरकार के मुताबिक वह कई दशकों तक अपने पति के साथ मुस्लिम सामाजिक और धार्मिक परिवेश में रहीं और उनके दो बच्चों के नाम भी मुस्लिम नामों के रूप में दर्ज थे। परिवार रजिस्टर में भी उनका धर्म मुस्लिम दर्ज था।

हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन को लेकर क्या कहा?

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई व्यापक कानूनी सिद्धांत नहीं बनाया जा सकता कि सिर्फ धर्म बदलने से कोई व्यक्ति अनुसूचित जनजाति का सदस्य रहना बंद कर देता है। अदालत के मुताबिक कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद भी किसी जनजाति का सदस्य बना रह सकता है। हालांकि, यह हर मामले में तथ्यों के आधार पर तय किया जाएगा। इसके लिए अदालत को यह देखना होगा कि संबंधित व्यक्ति में उस जनजाति के रीति-रिवाज, परंपराएं, सामाजिक तौर-तरीके, जनजातीय विशेषताएं और समुदाय के साथ निरंतर संबंध अभी भी मौजूद हैं या नहीं।

निन्हकी के मामले में अदालत का निष्कर्ष क्या रहा?

हालांकि, अदालत ने आखिरकार निन्हकी को राहत नहीं दी। हाईकोर्ट ने माना कि वह यह साबित करने में विफल रहीं कि विवादित जमीन की बिक्री के समय भी उनका भुइयां ST दर्जा प्रभावी रूप से कायम था। अदालत ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से पता चलता है कि वह कई दशकों तक एक अलग नाम और अलग धार्मिक एवं सामाजिक परिवेश में रह रही थीं। इस आधार पर अदालत ने माना कि वह यह स्थापित नहीं कर सकीं कि बिक्री के समय भी उनका जनजातीय दर्जा जारी था।

जमीन के सौदों पर क्या असर पड़ा?

हाईकोर्ट ने इसके बाद माना कि विवादित जमीन के लेनदेन उन कानूनी प्रावधानों के दायरे में आते हैं, जो ST सदस्य की जमीन को गैर-ST व्यक्ति के पक्ष में ट्रांसफर करने पर रोक लगाते हैं। इसलिए सोनभद्र के राजस्व अधिकारियों की ओर से जमीन के तीनों ट्रांसफर को अमान्य घोषित करने के आदेश को बरकरार रखा गया। 14 सितंबर के फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निन्हकी की याचिकाएं खारिज कर दीं और रेवेन्यू प्राधिकरण के आदेशों को कायम रखा।

कोर्ट की टिप्पणी का आगे क्या होगा असर?

इस फैसले में हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया है। अदालत ने कहा कि धर्म परिवर्तन और ST दर्जे के बीच कोई ऐसा स्वतः लागू होने वाला नियम नहीं है कि धर्म बदलते ही जनजातीय दर्जा समाप्त हो जाए। लेकिन किसी व्यक्ति का ST दर्जा वास्तव में कायम है या नहीं, यह संबंधित मामले के तथ्यों, जनजातीय पहचान, परंपराओं और समुदाय के साथ उसके संबंधों की जांच के बाद तय किया जा सकता है। यानी केवल धर्म के आधार पर ST दर्जे का फैसला नहीं होगा। बल्कि यह देखा जाएगा कि संबंधित व्यक्ति ने अपनी जनजातीय पहचान और समुदाय से संबंध को किस हद तक बनाए रखा है।

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