Commonwealth Games में 10 हजार मीटर की दौड़ में एतिहासिक सिल्वर मेडल पाया इस एथलीट ने

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Commonwealth Games 2026 में भारतीय एथलीटों ने यह बता दिया है कि भारत को पदक जीतने के लिए अब सिर्फ नीरज चोपड़ा की तरफ देखने की जरूरत नहीं। अन्य एथलीट भी ओलंपिक नहीं तो कम से कम कॉमनवेल्थ गेम्स जीतने की काबिलियत रखते। 

पांचवें दिन धावक गुलवीर सिंह ने ऐतिहासिक प्रदर्शन कर पुरुषों की 10 हजार मीटर दौड़ में रजत पदक जीता ।मंगलवार को गुलवीर सिंह ने राष्ट्रमंडल खेल 2026 में इतिहास रच दिया। वे राष्ट्रमंडल खेलों में पुरुषों की 10,000 मीटर दौड़ में पदक जीतने वाले पहले भारतीय एथलीट बन गए।

मौजूदा एशियाई चैंपियन गुलवीर ने स्कॉट्सटाउन स्टेडियम में 27:49.78 का समय लिया और ऑस्ट्रेलिया के काई रॉबिन्सन (27:48.93) के बाद दूसरे स्थान पर रहे, जबकि आइल ऑफ मैन के डेविड मुल्लार्की ने 27:50.28 के समय के साथ कांस्य पदक जीता।वहीं दूसरी ओर, टीनएज हाई जम्पर पूजा सिंह अपने पहले कॉमनवेल्थ गेम्स में आठवें स्थान पर रहीं, जबकि विशाल टीके पुरुषों की 400 मीटर दौड़ के सेमीफाइनल में पहुँच गए।

25-लैप की इस दौड़ के ज़्यादातर हिस्से में लगातार बारिश के बीच दौड़ते हुए, गुलवीर शुरू से ही आगे रहने वाले ग्रुप के साथ बने रहे। उन्होंने 3000 मीटर की दूरी 8:39.2 में पूरी की, पांचवें स्थान पर खिसकने के बावजूद 6000 मीटर तक मुकाबले में बने रहे, और आखिरी लैप का संकेत देने वाली घंटी बजने से पहले तीसरे स्थान पर आ गए। इसके बाद भारत के इस बेहतरीन लंबी दूरी के धावक ने शानदार फ़िनिशिंग की और रजत पदक पक्का किया।

यह 1986 के कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद पहली बार था जब पुरुषों की 10,000 मीटर दौड़ में कोई भी अफ़्रीकी एथलीट टॉप तीन में जगह नहीं बना पाया। यह मेडल पिछले दो सालों में गुलवीर की शानदार तरक्की में एक और उपलब्धि है।

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28 वर्षीय भारतीय एथलीट ने 2023 एशियाई खेलों में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता था, 2024 से कई बार भारतीय 10,000 मीटर का रिकॉर्ड तोड़ा है और उनके नाम 27:00.22 का नेशनल रिकॉर्ड है। इस साल की शुरुआत में, उन्होंने इस इवेंट में वर्ल्ड एथलेटिक्स रैंकिंग के टॉप 10 में भी जगह बनाई थी।गुलवीर ग्लासगो में 5000 मीटर दौड़ में भी हिस्सा लेंगे।

गोल्ड मेडल जीतकर शर्मिला धनकड़ ने रचा इतिहास, इस खिलाड़ी को मिला ब्रोंज (Video)

ग्लास्गो में चल रहे Commonwealth games 2026 में भारत की शर्मिला धनकड़ ने इतिहास रचते हुए लंबे समय से चला आ रहा भारत का पदक का सूखा खत्म करते हुए पैरा शूटपूट में स्वर्ण पदक जीत लिया।40 वर्षीय शर्मिला ने 9.81 मीटर का सत्र का सर्वश्रेष्ठ थ्रो लगाकर स्वर्ण पदक जीता और राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के पैरा एथलेटिक्स पदक के 20 साल के इंतजार को खत्म किया।

इस स्पर्धा में एक और भारतीय खिलाड़ी शिल्पा शायला को विवाद के बाद कांस्य पदक प्रदान किया गया। शिल्पा ने 7.26 मीटर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ थ्रो किया था।शुरुआत में नाइजीरिया की यूचेरिया इयियाजी कांस्य पदक की स्थिति में थीं, लेकिन भारतीय दल की आपत्ति और आधिकारिक समीक्षा के बाद उनके एकमात्र वैध प्रयास को फाउल करार दिया गया। इसके बाद चौथे स्थान पर रहीं शिल्पा शायला को कांस्य पदक मिल गया।

नाइजीरिया की ओर से हालांकि इस फैसले के खिलाफ आपत्ति दर्ज किए जाने की संभावना है।पदक में बदलाव की घोषणा के बाद भावुक शिल्पा ने शर्मिला के साथ जश्न मनाया। इस तरह भारत ने इस स्पर्धा में दो पदक हासिल किए।एफ57 वर्ग उन खिलाड़ियों के लिए होता है जिनके निचले अंगों में अक्षमता, अंगों की कमी या मांसपेशियों की ताकत में कमी होती है।

मां करती थीं खेतों में मजदूरी और पिता ट्रक ड्राइवर, खुद भी की दिहाड़ी और फिर राष्ट्रमंडल में जीत गए सिल्वर! ऋषिकांत की गजब कहानी

मणिपुर के इंफाल पश्चिम जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर राष्ट्रमंडल खेलों के मंच तक का सफर तय करने वाले वेटलिफ्टर चनांबम ऋषिकांत सिंह की कहानी अदम्य साहस, कड़ी मेहनत और पारिवारिक त्याग की मिसाल है। राष्ट्रमंडल खेलों में पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में सिल्वर मेडल जीतने वाले 28 वर्षीय ऋषिकांत ने एक समय तक जेब खर्च के लिए खेतों और कंस्ट्रक्शन साइट्स पर दिहाड़ी मजदूर के रूप में भी काम किया था। PTI की रिपोर्ट के मुताबिक ऋषिकांत के बड़े भाई अमरजीत ने उनके इस प्रेरणादायक सफर और कठिनाइयों की पूरी कहानी साझा की है।

गरीबी में बीता बचपन, 200 रुपये दिहाड़ी पर काम करती थीं मां

फाल से लगभग 15-20 किलोमीटर दूर स्थित नगैरांगबाम गांव के रहने वाले ऋषिकांत के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। नकी मां चंद्रजिनी देवी पास के खेतों में मजदूरी करती थीं। खेती के सीजन में उन्हें रोजाना 200 से 300 रुपये मिलते थे और बाकी समय में वह दूसरे छोटे-मोटे काम करती थीं। उनके पिता चनामबम इराभोट सिंह बस और ट्रक ड्राइवर थे। परिवार के पास खेती के लिए अपनी एक टुकड़ा जमीन भी नहीं थी और छह लोगों के परिवार का गुजारा रोजमर्रा की कमाई पर ही टिका था।

जेब खर्च के लिए खुद भी की मजदूरी

भाई के मुताबिक ऋषिकांत को करीब 2008 या 2009 में कक्षा 6 में खूमन लंपक स्थित नेशनल स्पोर्ट्स एकेडमी में प्रवेश मिल गया। यह एक आवासीय अकादमी थी, जहां पढ़ाई और खेल प्रशिक्षण मुफ्त था। इसके बावजूद ऋषिकांत को जेब खर्च की जरूरत तो थी ही। पर इसके लिए भी ऋषिकांत ने अपनी मां पर कभी कोई बोझ नहीं डाला। जब भी वे गर्मी या सर्दी की छुट्टियों में घर आते थे, तो अपनी मां के साथ खेतों में मजदूरी करते थे और कंस्ट्रक्शन साइट्स पर भी काम करते थे। इन मुश्किलों ने उन्हें मानसिक रूप से और अधिक मजबूत बनाया।

बॉक्सर बनने का था सपना, लेकिन किस्मत में लिखा था वेटलिफ्टिंग

ऋषिकांत की पहली पसंद मुक्केबाजी थी। वे डिंको सिंह, मैरी कॉम और सरिता देवी जैसे मणिपुर के खेल दिग्गजों से प्रभावित थे। जब नेशनल स्पोर्ट्स एकेडमी में दाखिले का ट्रायल हुआ तो उनका चयन वेटलिफ्टिंग के लिए हो गया। शुरुआत में उन्होंने बॉक्सिंग चुनने की काफी जिद की और उनके बड़े भाई ने अधिकारियों से गुहार भी लगाई। लेकिन नियम के मुताबिक खेल बदलना संभव नहीं था। इसके बाद उन्होंने वेटलिफ्टिंग को अपनाया और धीरे-धीरे उन्हें इस खेल से प्यार हो गया। लगभग पांच साल पहले उन्होंने अपने भाई से वादा किया था कि वे राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने वाले मणिपुर के पहले पुरुष वेटलिफ्टर बनेंगे।

राष्ट्रमंडल खेलों में रचा इतिहास

रविवार को ऋषिकांत ने पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में 264 किलो (स्नैच में 121 किलो और क्लीन एंड जर्क में 143 किलो) वजन उठाकर सिल्वर मेडल जीत लिया। घुटने की चोट की वजह से वो गोल्ड मेडल जीतने से चूक गए लेकिन इसके बावजूद वे राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने वाले मणिपुर के पहले पुरुष वेटलिफ्टर बन गए। मणिपुर ने देश को मीराबाई चानू और कुंजारानी देवी जैसी महिला वेटलिफ्टर दी हैं लेकिन पुरुषों के वर्ग में यह उपलब्धि हासिल कर ऋषिकांत ने इतिहास रच दिया।

टीवी पर पहली बार माता-पिता ने देखा लाइव प्रदर्शन

अभी भारतीय नौसेना में काम कर रहे और गुजरात में तैनात ऋषिकांत चार भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर हैं। उनके बड़े भाई अमरजीत भारतीय वायुसेना में बाड़मेर (राजस्थान) में एयरमैन के पद पर तैनात हैं, जबकि उनकी दो बहनें शादीशुदा हैं। ऋषिकांत के माता-पिता फिलहाल राजस्थान में अमरजीत के साथ हैं, जहां उनके पिता का इलाज चल रहा है। उनके माता-पिता ने पहली बार टीवी पर ऋषिकांत को लाइव खेलते और राष्ट्रमंडल खेलों में मेडल जीतते देखा। अमरजीत के मुताबिक गांव वाले घर में ऋषिकांत का कमरा जूनियर और सीनियर स्तर पर जीती गई मेडल से भरा पड़ा है। ये सब उनकी मां के त्याग का परिणाम है।

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लगातार दूसरे Commonwealth मेडल की तलाश में श्रीशंकर पहुंचे ऊंची कूद के फाइनल में

नीरज चोपड़ा 31 जुलाई को राष्ट्रमंडल खेलों में शिरकत करेंगे लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि ट्रैक एंड फील्ड यानि कि एथलेटिक्स में भारत को पहले ही अपना पहला पदक मिल जाए। ऊंची कूद में श्रीशंकर ने अपने पहले ही प्रयास में 8.01 मीटर का क्वालिफिकेशन मार्क को पार कर लिया है।  इस स्पर्धा का फाइनल 29 जुलाई देर रात 11.54 बजे खेला जाएगा।

गौरतलब है कि श्रीशंकर ही वह एथलीट है जिन्होंने पिछले संस्करण में 44 साल बाद इस स्पर्धा में भारत को मेडल दिलाया था। उनसे पहले 1978 में सुरेश बाबू ने कांस्य पदक जीता था।वह बाबू, अंजू बॉबी जॉर्ज (2002 में मैनचेस्टर खेलों में कांस्य), और एमए प्रजुषा (2010 में नयी दिल्ली खेलों में रजत) के बाद इन खेलों में लंबी कूद में पदक जीतने वाले चौथे भारतीय खिलाड़ी हैं।

पिछली बार वह मामूली अंतर से गोल्ड मेडल चूक गए थे और उनको सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा था। लंबे कद के इस एथलीट के लिए पदक जीतना आसान नहीं रहा था क्योंकि तीसरे प्रयास में बाद 7.84 मीटर कूद लगाकर छठे स्थान पर खिसक गए थे। इसके बाद उन्होंने अच्छी वापसी की और चौथे प्रयास में 8.08 मीटर कूद लगाई जिससे वह ऐतिहासिक रजत पदक हासिल करने में सफल रहे थे।

श्रीशंकर ने कहा, ‘‘हर एथलीट इस दौर से गुज़रा है। (वर्तमान ओलंपिक चैंपियन) मिल्टियाडिस टेंटोग्लू ने यूनान में मुझसे कहा कि वह भी कई बार छठे और सातवें स्थान पर आए हैं और फिर उन्होंने तोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता। यह कदम दर कदम आगे बढ़ने की प्रक्रिया है।’’

कारगिल विजय दिवस पर भारतीय सेना के मुक्केबाज ने पाकिस्तानी को किया 5-0 से पस्त (Video)

 

 

भारतीय मुक्केबाज जदुमनी सिंह ने स्कॉटलैंड के ग्लासगो में खेले जा रहे राष्ट्रमंडल खेल 55 किग्रा मुक्केबाजी मुकाबले में पाकिस्तानी मुक्केबाज सुमामा रहमान को 5-0 से हराकर क्वार्टरफाइनल में जगह बना ली। इस एकतरफा जीत के बाद उन्होंने इस जीत को कारगिल के योद्धाओं को समर्पित किया। गौरतलब है कि यह मुकाबला रविवार को खेला गया और तारीख थी 26 जुलाई जब देश कारगिल विजय दिवस मना रहा था।

सेना के इस मुक्केबाज ने अपनी बेहतरीन तकनीक, तेज गति और रिंग पर नियंत्रण के दम पर प्रभावशाली जीत दर्ज की। करगिल विजय दिवस पर अपनी जीत को करगिल युद्ध के वीरों को समर्पित करने वाले जदुमणि ने एक और शानदार प्रदर्शन के बाद अपना लक्ष्य दोहराया। उन्होंने कहा, ‘‘मैं यह जीत करगिल के वीरों को समर्पित करना चाहता हूं। मैं सभी को हराकर भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतना चाहता हूं।’’ पहले दौर में जदुमणि ने अपने प्रतिद्वंद्वी को परखा, लेकिन जल्द ही उन्होंने रहमान की रणनीति समझ ली और मुकाबले पर पूरी तरह नियंत्रण बना लिया।

उन्होंने लगातार सटीक हुक और सीधे पंच लगाए। दूसरे राउंड में उनके दायें हाथ के करारे पंच के बाद रेफरी को रहमान को स्टैंडिंग काउंट देना पड़ा। अंतिम राउंड में बढ़त लगभग तय होने के बावजूद जदुमणि आत्मविश्वास के साथ रिंग में डटे रहे। उन्होंने बीच में खड़े होकर रहमान को आक्रमण के लिए आमंत्रित किया और फिर अपनी तेज गति व बेहतर मूवमेंट से जवाब दिया। जदुमणि के सामने मंगलवार को खेले जाने वाले क्वार्टर फाइनल में जाम्बिया के म्वेंगो म्वाले की चुनौती होगी। जदुमणि अब पदक से सिर्फ एक जीत दूर हैं।

CWG 2026: ‘इस शख्स ने मेरा साथ हमेशा…’, गले में चमकता गोल्ड मेडल, आंखों में आंसू…इमोशनल हुईं मीरा बाई चानू

भारतीय स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने 2026 ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में इतिहास रच दिया है। मीराबाई चानू ने 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 190 किलोग्राम वजन उठाकर स्वर्ण पदक जीता। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में गोल्ड मेडल जीतने के बाद मीराबाई चानू काफी इमोशल हो गई और पोडियम पर उनकी आंखें नम हो गईं। वहीं मीराबाई ने अपनी इस उपलब्धि को अपनी मां टॉम्बी देवी और कोच विजय सिंह को समर्पित किया।

ग्लासगो में गोल्ड जीतने के साथ ही मीराबाई चानू ने कॉमनवेल्थ गेम्स में लगातार तीन बार गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली महिला वेटलिफ्टर बनने का गौरव भी हासिल किया। इससे पहले 2018 और 2022 में भी स्वर्ण पदक जीत चुकी है। 2026 में मीराबाई ने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्नैच में 85 किलोग्राम और क्लीन एंड जर्क में 105 किलोग्राम, यानी कुल 190 किलोग्राम वजन उठाया।

इमोशनल हुई मीराबाई

मेडल जीतने के बाद मीडिया से बात करते हुए मीराबाई चानू ने कहा, “मुझे हर किसी का भरपूर सहयोग मिला, लेकिन सबसे बड़ा साथ मेरी मां का रहा। वह हमेशा मुझसे कहती थीं कि ‘तुम ये कर सकती हो।’ उनकी यही बातें मुझे हमेशा आगे बढ़ने की हिम्मत देती रहीं।” मीराबाई ने इस जीत के लिए अपने कोच को भी धन्यवाद किया।

 

उन्होंने आगे कहा, “मेरे कोच विजय सर ने भी हर कदम पर मेरा साथ दिया। वेटलिफ्टिंग में चोट लगने का खतरा हमेशा रहता है और बढ़ती उम्र के साथ इस खेल में खुद को फिट रखना आसान नहीं होता। लेकिन उन्होंने मेरी ट्रेनिंग, खान-पान और आराम, हर चीज का पूरा ध्यान रखा।” मीडिया से बात करते हुए मीराबाई चानू अपने आंसू को रोक नहीं पा रही थी। वह काफी इमोशनल हो गई थी।

कैसा रहा मुकाबला

मीराबाई चानू की शुरुआत उम्मीद के मुताबिक नहीं रही और वह स्नैच में 82 किलोग्राम वजन उठाने की पहली कोशिश में सफल नहीं हो सकीं। लेकिन, उन्होंने तुरंत वापसी करते हुए दूसरी कोशिश में 82 किलोग्राम वजन उठाकर नया कॉमनवेल्थ गेम्स रिकॉर्ड बना दिया। इसके बाद तीसरे प्रयास में 85 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया और एक और नया रिकॉर्ड अपने नाम करते हुए मुकाबले में बढ़त मजबूत कर ली। क्लीन एंड जर्क में भी मीराबाई चानू की पहली 105 किलोग्राम की कोशिश सफल नहीं रही, लेकिन उन्होंने दूसरी बार में यही वजन उठाकर नया कॉमनवेल्थ गेम्स रिकॉर्ड बना दिया और स्वर्ण पदक लगभग तय कर लिया।

मीराबाई ने स्नैच में 85 किलोग्राम और क्लीन एंड जर्क में 105 किलोग्राम के साथ कुल 190 किलोग्राम वजन उठाया। इस प्रदर्शन के दम पर उन्होंने नाइजीरिया की रूथ असुको न्योंग को 22 किलोग्राम के बड़े अंतर से पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया।