महाकाल के दरबार से खूबसूरत नजारों तक की सैर! IRCTC लाया 5 दिन का खास एयर टूर पैकेज

सितंबर 2026 में घूमने के साथ धार्मिक स्थलों के दर्शन करने के लिए IRCTC का यह हवाई टूर पैकेज अच्छा ऑप्शन हो सकता है। 4 रात और 5 दिन के इस पैकेज में ट्रैवलर को मध्य प्रदेश के कई प्रसिद्ध शहरों और टूरिस्ट डेस्टिनेशन की सैर कराई जाएगी। इसमें दार्शनिक स्थल और कुछ शहरों में घूमने का मौका मिलेगा। यात्रा में आने-जाने की व्यवस्था फ्लाइट से की गई है।

इस टूर में धार्मिक स्थलों के साथ ऐतिहासिक और खूबसूरत जगहों को भी शामिल किया गया है। ट्रैवलर को उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर समेत कई मंदिरों के दर्शन कराए जाएंगे। इसके अलावा कुछ प्रमुख दर्शनीय स्थलों की सैर होगी। पैकेज में तीन सितारा होटल में ठहरने और खाने की व्यवस्था भी शामिल है, जिससे यात्रियों को यात्रा के दौरान रहने और खाने की ज्यादा चिंता नहीं करनी पड़ेगी।

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टूरिस्ट डेस्टिनेशन

इस 5 दिन के टूर में ट्रैवलर को मध्य प्रदेश की कई पॉपुलर डेस्टिनेशन पर ले जाया जाएगा। उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर, चिंतामन गणेश मंदिर, हरसिद्धि मंदिर और मंगलनाथ मंदिर के दर्शन कराए जाएंगे। इसके बाद ओंकारेश्वर में ओंकारेश्वर मंदिर के दर्शन होंगे। महेश्वर में अहिल्याबाई किला और महल, अखिलेश्वर मंदिर, सहस्त्रधारा और नर्मदा घाट घूमने का मौका मिलेगा। वहीं मांडू में जहाज महल और हिंडोला महल की सैर कराई जाएगी। यात्रा के दौरान इंदौर में पितृ पर्वत और गणपति मंदिर खजराना भी घूमने का मौका मिलेगा।

 

 

 

फ्लाइट और होटल फैसिलिटीज

IRCTC के इस पैकेज में ट्रैवलर के आने-जाने की सुविधा फ्लाइट से रखी गई है। यात्रा की शुरुआत लखनऊ से इंदौर के लिए होगी और वापसी में इंदौर से लखनऊ लाया जाएगा। यानी ट्रैवलर को लंबी ट्रेन यात्रा करने की जरूरत नहीं होगी। पैकेज में थ्री स्टार होटल में ठहरने की व्यवस्था भी शामिल है। इसके साथ यात्रा में खाने की फैसिलिटी दी जाएगी, जिससे ट्रैवलर को अलग से होटल और भोजन की व्यवस्था करने की परेशानी कम होगी।

 

 

 

पैकेज की कीमत

इस टूर पैकेज की कीमत अलग-अलग तरीके से रखी गई है। अगर कोई सोलो ट्रैवलर पैकेज लेता है, तो प्रति व्यक्ति 48,500 रुपये किराया देना होगा। दो लोग एक साथ पैकेज लेते हैं, तो प्रति व्यक्ति 42,500 रुपये का खर्च आएगा। वहीं तीन लोगों के साथ ठहरने पर प्रति व्यक्ति 40,300 रुपये किराया होगा। माता-पिता के साथ बच्चे के ठहरने पर बेड सहित 36,100 रुपये और बिना बेड 19,500 रुपये प्रति बच्चे का पैकेज मूल्य रखा गया है।

 

 

ऐसे करें बुकिंग

IRCTC के अनुसार इस टूर की बुकिंग पहले आओ, पहले पाओ के बेस पर की जाएगी। ट्रैवलर अपनी बुकिंग के लिए पर्यटन भवन, गोमती नगर, लखनऊ में IRCTC ऑफिस से कांटेक्ट कर सकते हैं। इसके अलावा ऑनलाइन बुकिंग IRCTC टूरिज्म की वेबसाइट पर की जा सकती है। पैकेज से जुड़ी ज्यादा जानकारी या बुकिंग के लिए 8287930912, 8287930902, 9236391909 और 9236391911 नंबरों पर कांटेक्ट किया जा सकता है।

भारत से सीमा विवाद के बीच नेपाल का बड़ा कबूलनामा! क्या गायब हो गए 210 साल पुरानी सुगौली संधि के असली कागज?

India-Nepal Sugauli Treaty: भारत और नेपाल के बीच जारी सीमा विवाद के बीच नेपाल सरकार की ओर से एक हैरान करने वाला कबूलनामा सामने आया है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संसद में स्वीकार किया है कि सरकार को इस बात की पक्की जानकारी नहीं है कि उसके पास 1816 की ऐतिहासिक सुगौली संधि और 1950 की नेपाल-भारत संधि के मूल दस्तावेज मौजूद हैं या नहीं। ब्रिटिश भारत के साथ नेपाल की सीमा तय करने वाली यह संधि दोनों देशों के सीमांकन का मुख्य आधार रही है।

नेपाल की प्रतिनिधि सभा में एक सवाल का जवाब देते हुए विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि सरकार के पास 1816 की संधि से जुड़े दस्तावेजों के रिकॉर्ड तो मौजूद हैं, लेकिन उनमें से कोई आधिकारिक मूल संधि पत्र है या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती।

नेपाल की संसद में विदेश मंत्री बोले- नेशनल आर्काइव्स में हैं रिकॉर्ड, पर मूल दस्तावेज स्पष्ट नहीं

विदेश मंत्री खनाल ने स्पष्ट किया कि वैसे तो देश के नेशनल आर्काइव्स में कुछ कागजात संरक्षित हैं लेकिन तमाम सरकारी विभागों में की गई व्यापक खोजबीन के बाद भी हस्ताक्षर युक्त स्पष्ट और मूल संधि पत्र का पता नहीं चल सका है। संसद में बोलते हुए खनाल ने कहा कि नेपाल सरकार के पास इस बात की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है कि हमारे पास आधिकारिक संधि दस्तावेज मौजूद हैं या नहीं। रिकॉर्ड दिखाते हैं कि कुछ संधियों से संबंधित दस्तावेज नेशनल आर्काइव्स में रखे गए हैं। लेकिन क्या वे वास्तव में आधिकारिक और मूल संधियां हैं, इसे लेकर हमारे पास स्पष्ट जानकारी नहीं है।

आपको बता दें कि 1814-1816 के एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद नेपाल साम्राज्य और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच 1816 में सुगौली की संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस संधि ने नेपाल के क्षेत्र को काफी हद तक कम कर दिया था और इसकी आधुनिक सीमाओं की रूपरेखा तय की थी।

लिपुलेख दर्रे पर भारत-चीन व्यापार और नए विवाद की वजह

नेपाल सरकार का यह बयान ऐसे समय में आया है जब लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत और चीन के बीच व्यापार फिर से शुरू होने को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। नेपाल ने इस व्यापार मार्ग का विरोध करते हुए दावा किया है कि लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा उसके क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।

मौजूदा सीमा विवाद मुख्य रूप से काली (या महाकाली) नदी की व्याख्या पर केंद्रित है, जिसे 1816 की सुगौली संधि ने नेपाल की पश्चिमी सीमा के रूप में स्थापित किया था। नेपाल का तर्क है कि इस नदी का उद्गम लिंपियाधुरा से होता है। इस व्याख्या के आधार पर लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा नदी के पूर्व में स्थित हैं और इसलिए वे नेपाल का हिस्सा हैं।

भारत ने नेपाल के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। भारत का कहना है कि यह पूरा क्षेत्र लंबे समय से उसके प्रशासनिक नियंत्रण में रहा है। भारत ने अपने रुख के समर्थन में ऐतिहासिक रिकॉर्ड और नक्शों का भी हवाला दिया है।

गायब दस्तावेजों की पुरानी पहेली: 1950 की संधि के कागजात भी नदारद

मूल संधियों के गायब होने या न मिलने की यह अनिश्चितता नई नहीं है। साल 2016 में भी नेपाल को तब मुश्किलों का सामना करना पड़ा था जब दोनों देशों के बीच बने प्रबुद्ध व्यक्ति समूह द्वारा 1950 की नेपाल-भारत शांति और मित्रता संधि की समीक्षा या उसे बदलने पर विचार किया जा रहा था। उस समय भी नेपाल सरकार 1950 की संधि की मूल प्रति खोजने में असमर्थ रही थी।

द काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद हुई एक संसदीय जांच में सरकारी दफ्तरों, अभिलेखागारों, संग्रहालयों और दूसरे भंडारों में काफी तलाशी ली गई थी, लेकिन सुगौली संधि और 1950 की संधि की मूल प्रतियां नहीं मिल सकी थीं।

इसके बाद साल 2019 में तत्कालीन विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावली ने भी स्वीकार किया था कि नेपाल के पास दोनों समझौतों की प्रतियां (कॉपी) तो हैं लेकिन वे मूल प्रतियां हैं या नहीं, यह स्थापित नहीं किया जा सका है। तब ज्ञावली ने कहा था कि हमारे पास दोनों संधियां मौजूद हैं, लेकिन हमें फोरेंसिक रूप से यह सत्यापित करना होगा कि ये प्रतियां ओरिजनल हैं या नहीं।

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Palamu Jyotirlinga Temple: झारखंड के इस मंदिर में एक साथ कर सकते हैं 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन, उज्जैन की मिट्टी से बनी है महाकाल की प्रतिमूर्ति

Palamu Jyotirlinga Temple: शिव भक्तों के लिए महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों की यात्रा बेहद पावन और पवित्र यात्रा है। लेकिन, इनमें से कुछ बेहद दुर्गम स्थानों पर स्थित हैं, जहां हर किसी के लिए पहुंचना संभव नहीं है। इसके बावजूद, हर शिवभक्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने की इच्छा अपने मन में जरूर रखता है। शायद झारखंड के पलामू स्थिति भगवती भवन मंदिर का निर्माण भी इसी सोच के साथ किया गया होगा। इस मंदिर के परिसर में एक ही छत के नीचे सभी 12 ज्योतिर्लिंग विराजमान हैं। यानी श्रद्धालु एक यात्रा में द्वादश ज्योतिर्लिंगों की यात्रा का पुण्य पा सकते हैं।

उज्जैन की मिट्टी से बनी महाकाल की प्रतिमूर्ति

अपनी इस अनोखी विशेषता के कारण यह शिवभक्तों के बीच दिलचस्पी का केंद्र है। खासतौर से उन भक्तों के लिए, जो कम भीड़-भाड़ वाली धार्मिक जगहों पर घूमना पसंद करते हैं। भगवती भवन मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण परिसर में 12 ज्योतिर्लिंगों प्रतिरूप होने के साथ ही यहां स्थित महाकाल की प्रतिमूर्ति भी है। मंदिर के मुख्य पुजारी शिबुल पंडित ने लोकल18 को बताया कि यहां महाकाल की प्रतिमूर्ति को उज्जैन से लाई गई मिट्टी से बनाया गया है। पारंपरिक रूप से, भक्त 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने के लिए भारत के अलग-अलग हिस्सों की यात्रा करते हैं। हालांकि, भगवती भवन में, इन पवित्र रूपों का अनुभव एक ही परिसर में किया जा सकता है।

प्रकृति की गोद में बसा है झारखंड का पलामु

शिव भक्तों के लिए, भगवती भवन एक अलग तरह का तीर्थ अनुभव देता है। कई राज्यों में घूमने के बजाय, श्रद्धालु एक ही जगह पर 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन कर सकते हैं। पलामू अपने जंगलों, जंगली जानवरों और खूबसूरत नजारों के लिए ज्यादा जाना जाता है। हालांकि इस इलाके में कई धार्मिक और ऐतिहासिक जगहें भी हैं। जिला प्रशासन के अथक प्रयासोंक की बदौलत यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक जगहों के साथ-साथ अन्य टूरिस्ट आकर्षण का केंद्र बन रहा है।

कैसे पहुंचें पलामु

पलामू का जिला हेडक्वार्टर मेदिनीनगर (डाल्टनगंज) है, जो सड़क और रेल से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। सबसे पास का एयरपोर्ट रांची में बिरसा मुंडा एयरपोर्ट है, जो मेदिनीनगर से लगभग 165 km दूर है।

ट्रेन से यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए डाल्टनगंज रेलवे स्टेशन जिले का मुख्य रेलवे स्टेशन है। यहां पर रेगुलर पैसेंजर और एक्सप्रेस सर्विस हैं, जिनमें नई दिल्ली, कोलकाता, रांची और पटना जैसे शहरों के लिए सीधे ट्रेनें शामिल हैं।

पलामू रांची, पटना, वाराणसी और आस-पास के दूसरे शहरों से सड़क के रास्ते भी पहुंचा जा सकता है। जिला प्रशासन का कहना है कि डाल्टनगंज रांची से लगभग 165 km दूर है, और रांची और झारखंड के दूसरे बड़े शहरों और पड़ोसी राज्यों से रेगुलर बस सर्विस उपलब्ध हैं।

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