एक पॉडकास्ट में बात करते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने उन सवालों का जवाब दिया, जिनमें कहा गया था कि 15 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अंतरिम समझौते की घोषणा के तुरंत बाद वाशिंगटन और तेहरान के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) का टेक्स्ट सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया
Donald Trump: G7 नेताओं से “मैं बॉस हूं” (I’m the boss) वाली बात कहने के बाद, जब यह टिप्पणी वायरल हो गई और समिट के दौरान दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा और लोगों को इस बात पर हंसी भी आई, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सफाई देते हुए कहा, “मैं मजाक कर रहा था। मैं बॉस बनने की कोशिश नहीं कर रहा था।” ट्रंप ने यह बात The Axios Show पर एक इंटरव्यू के दौरान कही। उन्होंने बताया कि उनकी टिप्पणी का मकसद मजाक करना था, लेकिन उसे गलत संदर्भ में लिया गया।
उस पल को याद करते हुए जब शो के होस्ट ने ट्रंप से पूछा, “आप कमरे में आए और कहा, ‘मैं बॉस हूं।’ उनमें से कितने लोगों ने इस बात पर यकीन किया होगा?”
इस पर ट्रंप ने जवाब दिया कि जब वह उस कमरे में पहुंचे, जहां पहले से ही दुनिया के कई बड़े नेता बैठे थे, तो उन्होंने माहौल हल्का करने के लिए मजाक में यह बात कही थी। उनका कहना है कि इस बयान को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं थी, लेकिन यह तेजी से वायरल हो गया।
“You walked in and you said, ‘I’m the boss.’ How many of them believed that?”@POTUS: “All of them, but I was just being funny.” https://t.co/TuyS6ttu15 pic.twitter.com/KqzkKFWkrk
— Rapid Response 47 (@RapidResponse47) June 19, 2026
“मैं बॉस हूं…” G7 बैठक में बोले ट्रंप
बता दें कि बुधवार को, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने G7 शिखर सम्मेलन के अंतिम दिन बैठक में प्रवेश करते समय एक मजाकिया टिप्पणी की, जिस पर सब हंस पड़े।
जब वह तीन दिवसीय जी7 समिट के अंतिम दिन की सुबह की बैठक में पहुंचे, तो बाकी देश के नेता पहले से अपनी सीटों पर बैठे हुए थे। उसी दौरान ट्रंप ने अंदर आते हुए कहा, “मैं बॉस हूं।”
इसी हंसी-मजाक के बीच, फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने इस टिप्पणी को हल्के-फुल्के अंदाज में लिया। फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने पूछा, “आप कैसे हैं?” ट्रंप ने जवाब दिया, “अच्छा हूं, धन्यवाद।”
“I’m the boss.”
— @POTUS arrives for a working session at the G7 summit in France pic.twitter.com/BvAamZo0sD
— Rapid Response 47 (@RapidResponse47) June 17, 2026
G7 समिट का आयोजन कैसे होता है, और इसमें कितने देश शामिल हैं?
गौरतलब है कि G7 देश बारी-बारी से कार्यक्रमों की मेजबानी और आयोजन करते हैं। इस बार फ्रांस को पिछले साल के मेजबान कनाडा से G7 की अध्यक्षता मिली थी और 2027 में यह अमेरिका को सौंपी जाएगी।
वहीं, इस समूह का पहला शिखर सम्मेलन 1975 में फ्रांस के रैम्बौइलेट में हुआ था। इसमें छह देशों – फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका – के नेता एक साथ आए थे। उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के बाद आई सबसे बड़ी आर्थिक मंदी से उबरने की गति तेज करने के तरीकों पर विचार-विमर्श किया था। अगले साल कनाडा भी इसमें शामिल हो गया, जिससे यह G7 बन गया।

सोचें, डोनाल्ड ट्रंप पर। अमेरिका का कैसा मजाक बना डाला है। चाहे जो कर रहे हैं मगर लोकतंत्र के तकाजे में कोई कुछ भी नहीं कर सकता। ईरान ने अमेरिका को हैसियत दिखा दी है। मेरा मानना है कि साठ दिनों बाद ईरान ही खाड़ी का मालिक होगा। दुनिया का संकट बना रहेगा। बावजूद इसके ट्रंप के झूठ, झांसे हॉट केक की तरह हैं। इसलिए भारत में भी उनका यह कहा अमृत वाक्य है कि नरेंद्र मोदी एक “टफ नेगोशिएटर” हैं। मोदी देखने में देवदूत जैसे लगते हैं और वे राजनीति में “किलर” हैं।
सवाल है क्यों ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह ‘चरित्र प्रमाणपत्र’ दिया? इसलिए क्योंकि दुनिया जानती है कि ज्योंहि प्रमाणपत्र मिलेगा त्योंहि मोदी और उनका मीडिया हिंदू भक्तों के बीच ट्रंपजी के कहे का घर-घर पहुंचा देगा। देखों हमारे भगवान को अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी देवदूत जैसा कहा!
ध्यान रहे, ट्रंप अपने आपको धूर्त, मास्टर सौदेबाज कहते हैं। उन्हे हर किसी को बेवकूफ बनाना आता है। वे प्रोपर्टी डीलर हैं। मिट्टी को भी सोने के भाव बेच सकते हैं। अमेरिका को जैसा अभी चूना लगा रहे हैं, वैसा एक भी राष्ट्रपति अमेरिकी इतिहास में नहीं हुआ है। ऐसे व्यापारी, सौदेबाज की पहली कला यह होती है कि सौदा करने से पहले सामने वाले को उसकी कीमत से थोड़ा ज्यादा महान महसूस करा दिया जाए।
ट्रंप ने आज ही लिखा है कि वे अपने आपको हिटलर, स्टालिन, माओं, सिकंदर आदि से बड़ा शक्तिमान मानते हैं। उन्हे भी इतिहास ऐसे ही याद करेगा। ट्रंप और नरेंद्र मोदी में फर्क यह है कि ट्रंप का लक्ष्य पृथ्वी के इतिहास का नंबर एक युगपुरुष होना है वही नरेंद्र मोदी को कलियुगी भारत का सबसे बड़ा देवता कहलाना है। एक की महानता का लेवल पृथ्वी का आधुनिक इतिहास है। वही दूसरे का कलियुगी हिंदुओं का नंबर एक भगवान बनना है। बारह साल, बारह युग! भारत में कभी चंद्रशेखर नाम के एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे। उनके चेलों ने चालीस दिन बनाम चालीस साल के ऐसे नारे बनाए थे कि देश भर के चिरकूट उनका कीर्तन करते थे।
भटक गया हूं। असल मुद्दा है कि जल्द भारत का बाजार अमेरिकी का कैप्टिव बाजार होगा। ट्रंप अमेरिका से भारत को पशुओं की खुराक भिजवाएँगे तो सोयाबीन, मक्का से लेकर वे सामान भी आएंगे, जिससे भारत के विदेश व्यापार की कंगाली में आटा और गीला होगा। अब अमेरिका का बनवाया समझौता आसानी से लापतागंज में बिकेगा। 140 करोड़ ग्राहकों के बाजार में अमेरिका की उपस्थिति इसलिए बड़ी होनी है क्योंकि अमेरिका यह भी वचन ले रहा है कि इतने वर्षों में इतना अमेरिकी सामान भारत को खरीदना ही है। सोचें, एक के बाद एक मुक्त व्यापार समझौतों की बाढ़ में फंसता बाजार। यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ईएफटीए, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, ओमान, न्यूजीलैंड, अमेरिका से व्यापार (खरीद) के सौदे ही सौदे तो वही चीन बिना सौदे के पहले से ही सबसे बड़ा विक्रेता।
पता है व्यापारिक घाटे में सबसे बड़ा घाटे वाला कौन सा देश है? भारत। यों नंबर एक पर अमेरिका है। मगर वह इसलिए है क्योंकि अमेरिकी इतने अमीर है कि उन्हे काले हाथ करके सामान बनाना पसंद नहीं। अमेरिकियों की कमाई के असल जरिए दूसरे हैं। वह डॉलर छापता है। दुनिया को पूंजी, तकनीक देता है। अब वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भी मालिक है जिससे उसे डालर मिलेगा तो भारत की आईटी, सेवा क्षेत्र की डालर कमाई भी लापता होनीं है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के एवियन शहर में जी 7 बैठक से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ज्यादातर बातें मजाक में कहीं। अमेरिका मीडिया ने इसे इसी रूप में लिया। जब ट्रंप ने कहा कि भारत पर हमला हुआ तो अमेरिका उसके बचाव में आएगा। तो उन्होंने साथ ही नरेंद्र मोदी की ओर से इशारा करके कहा कि मोदी अगर सत्ता में रहे तो अमेरिका बचाने आएगा। अगर कोई दूसरा रहा तो फिर सोचना होगा।
यह मोदी की अबकी बार ट्रंप सरकार वाली कूटनीति का जवाब था। जैसे मोदी ने अमेरिका के लोगों से ट्रंप को चुनने को कहा था वैसे ही ट्रंप ने भारत के लोगों से मोदी को चुनने को कह दिया। हालांकि जब मोदी नारा लगा कर आए थे तब अमेरिका के लोगों ने ट्रंप को हरवा दिया था।
बहरहाल, अमेरिका मीडिया में जो रिपोर्ट छपी या जो वीडिया आए है उसमें रिपोर्टर्स कह रहे थे कि ट्रंप ने मजाक किया। फॉक्स न्यूज की वीडियो में कहा गया, ‘प्रेसिडेंट ट्रंप क्रैक्स ए जोक अबाउट अमेरिकाज कमिटमेंट टू डिफेंड इंडिया ऐज लॉन्ग ऐज प्राइम मिनिस्टर मोदी इज स्टिल लीडिंग द कंट्री…’। लेकिन भारत में मीडिया ने इसे बहुत गंभीरता से लिया। ब्रह्मा चैलानी ने ट्विट करके यह फॉक्स न्यूज का वीडियो साझा किया और कहा कि इस मजाक को भारतीय मीडिया ने भारत की रक्षा करने के अमेरिका के पवित्र संकल्प के रूप में प्रस्तुत किया।
भारतीय मीडिया को लेकर ट्रंप का मजाक और भी ऐतिहासिक था। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक भारतीय पत्रकार ने अपने सवाल की शुरुआत यह कहते हुए की, ‘राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के साथ समझौता करके आप एक इतिहास बनाने जा रहे हैं..’। इस पर ट्रंप ने मोदी की ओर देख कर कहा कि यह रिपोर्टर मुझे बहुत अच्छा लगा। उन्होंने मोदी से कहा कि आपके वाले रिपोर्टर्स हमारे से बहुत अच्छे हैं!
अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चल रहे टकराव को खत्म करने और बातचीत का नया रास्ता खोलने के लिए 14-पॉइंट वाले समझौते पर दस्तखत होने के कुछ ही घंटों बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने दावा किया कि ईरान मजबूरी में वॉशिंगटन के पास आया था और जोर देकर कह
अमेरिका की राजनीति और खुफिया विभाग से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। अमेरिका की निवर्तमान डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस (DNI) तुलसी गबार्ड ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिन कुछ ऐसे सीक्रेट दस्तावेज जारी किए हैं, जिसने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया है। गबार्ड ने सीधे तौर पर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के मुख्य चिकित्सा सलाहकार रहे डॉ. एंथनी फाउची पर कोरोना महामारी (COVID-19) के सच को दबाने और अमेरिका की संसद से झूठ बोलने का गंभीर आरोप लगाया है।
गबार्ड के दफ्तर से जारी बयान के मुताबिक, डॉ. फाउची ने चीन की उसी वुहान लैब (WIV) को पैसे दिए थे, जहां से कोरोना वायरस के लीक होने का दावा पूरी दुनिया में किया जाता है।
Today, on my final day as Director of National Intelligence, I’m releasing never-before-seen communications and documents exposing how Dr. Fauci provided millions in US taxpayer dollars to fund dangerous gain-of-function research at the Wuhan lab, worked with politicized elements… pic.twitter.com/ZMdliW4zyS
— DNI Tulsi Gabbard (@DNIGabbard) June 19, 2026
चीनी लैब को दिए अमेरिकी टैक्सपेयर्स के करोड़ों डॉलर
तुलसी गबार्ड ने अपने आखिरी दिन “पहले कभी न देखे गए” खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करते हुए सनसनीखेज दावे किए हैं:
खतरनाक रिसर्च की फंडिंग: डॉ. फाउची ने अमेरिकी जनता के टैक्स के लाखों-करोड़ों डॉलर चीन के ‘वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी’ (WIV) को दिए थे। इस पैसे का इस्तेमाल चमगादड़ों के कोरोना वायरस पर बेहद खतरनाक ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ (वायरस की ताकत और फैलने की क्षमता बढ़ाने वाली) रिसर्च के लिए किया गया था।
सच्चाई को दबाया: जब 2020 की शुरुआत में कोरोना महामारी फैली, तो फाउची ने खुफिया एजेंसियों के कुछ बड़े अधिकारियों के साथ मिलकर इस बात को पूरी तरह दबा दिया कि यह वायरस चीन की लैब से लीक (Lab-Leak) हुआ था।
‘डीप स्टेट’ का हथकंडा: खुफिया एजेंसियों को मोहरा बनाया
गबार्ड के दफ्तर द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि 85 वर्षीय डॉ. फाउची, जो 38 सालों तक अमेरिका की प्रमुख स्वास्थ्य संस्था (NIAID) के हेड रहे, उन्होंने बड़ी-बड़ी फार्मा कंपनियों (दवा निर्माताओं) के फायदे और ट्रिलियन डॉलर के वैक्सीन बाजार के चक्कर में इस खतरनाक रिसर्च को बढ़ावा दिया।
पीछे से घुमाई पूरी बाजी
बयान के मुताबिक, फाउची ने पर्दे के पीछे से खेल रचा। उन्होंने अपने पसंदीदा वैज्ञानिकों की एक टीम बनाई और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों पर दबाव डाला कि वे जनता के सामने यही कहें कि कोरोना वायरस किसी लैब से नहीं, बल्कि प्राकृतिक रूप से जानवरों के जरिए फैला है। उन्होंने एक फर्जी रिसर्च पेपर भी तैयार करवाया ताकि लैब-लीक थ्योरी को झुठलाया जा सके। जो भी वैज्ञानिक या अधिकारी फाउची की बात से असहमत होता था, उसे नौकरी से हटाने या करियर बर्बाद करने की धमकियां दी जाती थीं।
“संसद के सामने कसम खाकर बोला झूठ”
तुलसी गबार्ड, जिन्होंने हाल ही में अपने बीमार पति की देखभाल के लिए डोनाल्ड ट्रंप की इंटेलिजेंस चीफ का पद छोड़ने का फैसला किया था, उन्होंने कहा कि फाउची के ये पैंतरे सीधे तौर पर ‘डीप स्टेट’ (पर्दे के पीछे से सरकार चलाने वाले सीक्रेट नेटवर्क) जैसे हैं।
गबार्ड ने बताया कि जून 2024 में जब अमेरिकी संसद की सुनवाई के दौरान फाउची से कसम खिलवाकर पूछा गया था कि— “क्या उन्होंने महामारी के पहले या बाद में एफबीआई (FBI), सीआईए (CIA) या किसी अन्य खुफिया एजेंसी से वायरस रिसर्च को लेकर कोई बात की थी?” तो फाउची ने सवालों से बचते हुए साफ झूठ बोल दिया कि उनके संज्ञान में ऐसी कोई बात नहीं है। जबकि नए दस्तावेज गवाही दे रहे हैं कि वे लगातार खुफिया अधिकारियों के संपर्क में थे।
अमेरिकी जनता को चाहिए इंसाफ
तुलसी गबार्ड ने भावुक होते हुए कहा, “कोविड-19 महामारी ने लाखों अमेरिकी नागरिकों और दुनिया भर के अनगिनत लोगों को असहनीय दर्द और तकलीफें दी हैं। सालों के झूठ, सेंसरशिप और सच को छुपाने के खेल के बाद, अब अमेरिकी जनता पारदर्शिता, सच्चाई और इंसाफ की हकदार है।”
गबार्ड के इन बेहद संगीन और सीधे आरोपों पर फिलहाल डॉ. एंथनी फाउची या उनके करीबियों की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या सफाई सामने नहीं आई है। लेकिन इस खुलासे ने दुनिया के सबसे बड़े वैश्विक संकट यानी कोरोना वायरस के जन्म को लेकर एक बार फिर महासंग्राम छेड़ दिया है।
फिर बंद कर दिया होर्मुज? ईरान ने बताई पूरी सच्चाई, लेबनान पर इजरायल के हमले से बढ़ा तनाव!
ईरान ने शुक्रवार को उन खबरों का खंडन किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद कर दिया गया है। ईरान ने कहा कि 18 जून को अमेरिका के साथ हुए युद्धविराम समझौते के तहत इस अहम जलमार्ग से कमर्शियल शिपिंग जारी है। सरकारी ब्रॉडकास्टर ‘प्रेस टीवी’ से बात करते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने इन दावों को “बेबुनियाद” और गलत बताया।
बघाई ने स्ट्रेट के बंद होने की खबरों को खारिज करते हुए कहा कि MoU पर हस्ताक्षर के बाद, तेहरान ने सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि इस जलमार्ग से जहाजों की आवाजाही “फिलहाल सामान्य रूप से चल रही है”।
दरअसल कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ये दावा किया गया था कि ईरान की नौसेना ने अचानक एक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला ऐलान कर दिया। ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) को दोबारा पूरी तरह बंद कर दिया है।
रिपोर्ट में कहा गया कि ईरान ने साफ कहा है कि जब तक इजरायल लेबनान से अपनी सेना नहीं हटाता और अमेरिका इस इलाके को खाली नहीं करता, तब तक यह रास्ता बंद रहेगा।
दावा- ईरान ने दी थी खुली धमकी!
इसमें बताया गया कि समुद्री रेडियो चैनलों पर ईरान के सबसे खतरनाक सैन्य संगठन इरेक्ट (IRGC – इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) ने एक बयान जारी कर अमेरिका पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया है। ईरान का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन के बीच बुधवार को जो समझौता हुआ था, अमेरिका उसका पालन नहीं कर रहा है।
ईरानी सेना ने सख्त लहजे में चेतावनी दी, “क्योंकि लेबनान से इजरायल की वापसी, समुद्री नाकाबंदी को पूरी तरह हटाना और अमेरिकी आतंकवादी ताकतों का फारस की खाड़ी से बाहर निकलना हमारी मुख्य शर्तें थीं, इसलिए जब तक ये शर्तें पूरी नहीं होतीं, ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ बंद रहेगा। सभी जहाजों से अनुरोध है कि वे अपनी सुरक्षा के लिए इस रास्ते के पास न आएं। अगर किसी भी जहाज ने इस आदेश को मानने से इनकार किया, तो उसे सीधे निशाना बनाया जाएगा (यानी उड़ा दिया जाएगा)।”
आपको बता दें कि दुनिया का लगभग 20% (पांचवां हिस्सा) तेल और गैस का व्यापार इसी रास्ते से होता है। इसी साल 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद भी इसे बंद कर दिया गया था, जिससे दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम आसमान पर पहुंच गए थे।
लेबनान पर इजरायल के हमले से नाराज हुआ ईरान!
बताया गया कि ईरान के इस गुस्से के पीछे इजरायल का लेबनान पर किया गया ताजा हमला है। अमेरिका-ईरान डील के तहत यह माना जा रहा था कि इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच भी जंग रुक जाएगी। लेकिन कल आधी रात से इजरायल ने लेबनान के 11 शहरों पर भीषण हवाई हमले किए, जिसमें कम से कम 18 लोगों की मौत हो गई और 33 घायल हो गए।
इस बीच, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कह दिया है कि उनकी सेना “जब तक जरूरी होगा” लेबनान में ही रहेगी। वहीं, इजरायल के धुर दक्षिणपंथी मंत्री इतामार बेन ग्विर ने सोशल मीडिया पर लिख दिया कि “पूरे लेबनान को जल जाना चाहिए।” इस पर ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक्ची ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह किसी मामूली पागल का बयान नहीं है, बल्कि इजरायली सरकार के सुरक्षा मंत्री की सोच है। तेल अवीव (इजरायल) में बैठी यह सरकार पूरी मानवता के लिए खतरा है और इसका मकसद सिर्फ स्थायी युद्ध (Permanent War) करना है।”
अमेरिका का दावा: “हमने तो रास्ता खोल दिया था”
दूसरी तरफ, अमेरिका की सेंट्रल कमांड ने गुरुवार को ही ऐलान किया था कि उसने पिछले दो महीनों से ईरानी बंदरगाहों पर लगाई गई अपनी नाकाबंदी को आधिकारिक रूप से हटा लिया है। ऐसे में अमेरिका के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि ईरान किस अधूरी नाकाबंदी की बात कर रहा है।
यहां तक कि समुद्री जहाजों पर नजर रखने वाली एजेंसी ‘AXSMarine’ के मुताबिक, इस समझौते के तुरंत बाद गुरुवार को रिकॉर्ड 25 कमर्शियल जहाज इस रास्ते से सुरक्षित गुजरे थे, जो पिछले दो महीनों में सबसे बड़ी संख्या थी। लेकिन अब ईरान के इस नए कदम ने पूरी दुनिया को एक बार फिर महायुद्ध और भयंकर आर्थिक संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
मोजतबा खामेनेई का बड़ा दावा, ईरान डील के लिए ‘बेताब’ ट्रंप ने हर तरह के हथकंडे अपनाए
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दुनिया के उन नेताओं में शामिल बताया है, जिनकी वह सबसे ज्यादा सराहना करते हैं। नेतृत्व क्षमता और वैश्विक प्रभाव पर बात करते हुए ट्रंप ने मोदी का नाम चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ लिया। फ्रांस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के बाद समाचार वेबसाइट Axios को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने दुनिया के प्रमुख नेताओं के साथ अपने संबंधों और वैश्विक राजनीति को लेकर अपने विचार साझा किए। इंटरव्यू के दौरान जब उनसे पूछा गया कि वे किन विश्व नेताओं की सबसे अधिक प्रशंसा करते हैं, तो ट्रंप ने भारत और चीन का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग का नाम लिया।
शी जिनपिंग और पीएम मोदी का लिया नाम
Axios की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन विश्व नेताओं में शामिल बताया, जिनकी वह सबसे अधिक प्रशंसा करते हैं। ट्रंप ने शी जिनपिंग को पूरी तरह काम पर केंद्रित नेता बताया, जबकि नरेंद्र मोदी को बेहद मजबूत और सख्त नेतृत्व वाला नेता कहा। हाल के दिनों में ट्रंप की ओर से पीएम मोदी के बारे में की गई सकारात्मक टिप्पणियों में यह एक और महत्वपूर्ण बयान माना जा रहा है। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब G7 शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप और मोदी की 16 महीने से अधिक समय बाद पहली आमने-सामने मुलाकात हुई थी।
भारत और अमेरिका के मजबूत संबंधों पर जोर
बातचीत के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और अमेरिका के मजबूत संबंधों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हाल के समय में व्यापार, प्रतिबंधों और ओमान के तट के पास अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में तीन भारतीय नाविकों की मौत जैसे मुद्दों पर कुछ मतभेद जरूर रहे हैं, लेकिन इससे दोनों देशों के रिश्तों की मजबूती पर कोई असर नहीं पड़ा है। मुलाकात के दौरान ट्रंप ने कहा, “हमारे संबंध बेहद अच्छे हैं। इससे ज्यादा करीबी रिश्ते शायद ही हो सकते हैं। हमारे देशों के बीच मजबूत साझेदारी है और इसकी शुरुआत हम दोनों नेताओं से होती है।” ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक सख्त और कुशल वार्ताकार भी बताया। उन्होंने अपनी पहले की टिप्पणी दोहराते हुए कहा कि मोदी बातचीत के दौरान मजबूती से अपनी बात रखते हैं। साथ ही ट्रंप ने संकेत दिया कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है।
ट्रेड डील पर कही ये बात
G7 शिखर सम्मेलन के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील होने के काफी करीब है। उन्होंने इस मौके पर एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातचीत और नेतृत्व क्षमता की सराहना की। ट्रंप ने कहा कि मोदी का व्यक्तित्व बेहद प्रभावशाली है और वह देखने में बहुत शांत और सौम्य लगते हैं। हालांकि, बातचीत और फैसलों के मामले में वह काफी मजबूत और सख्त नेता हैं। ट्रंप के अनुसार, मोदी अपनी बात मजबूती से रखते हैं और सामने वाले को अपने नेतृत्व शैली से प्रभावित कर देते हैं। उन्होंने कहा कि मोदी का शांत स्वभाव और दृढ़ नेतृत्व उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाता है।
इस सवाल से किया इनकार
Axios का यह इंटरव्यू मुख्य रूप से अमेरिका-ईरान शांति प्रयासों के बाद डोनाल्ड ट्रंप की नेतृत्व क्षमता और वैश्विक प्रभाव पर केंद्रित था। बातचीत के दौरान ट्रंप ने दुनिया के कई नेताओं के साथ अपने संबंधों और अनुभवों पर भी चर्चा की। हालांकि, जब उनसे उन नेताओं के बारे में पूछा गया जिन्हें वह कमजोर मानते हैं, तो उन्होंने किसी का नाम लेने से इनकार कर दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने इस बात पर भी खेद जताया कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन G7 समूह का हिस्सा नहीं थे। इसके अलावा उन्होंने फ्रांस में आयोजित शिखर सम्मेलन के दौरान फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की ओर से वर्साय पैलेस में दिए गए स्पेशल स्टेट डिनर का भी जिक्र किया।
अभी कुछ ही दिन पहले फ्रांस के एवियान (Evian) में हुए G7 शिखर सम्मेलन (G7 Summit) (15 से 17 जून) में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के बीच गर्मजोशी भरी मुलाकात की तस्वीरें सामने आई थीं। लेकिन अब इस दोस्ती में बहुत बड़ा धमाका हो गया है। डोनाल्ड ट्रंप ने एक इंटरव्यू में दावा कर दिया कि जॉर्जिया मेलोनी ने उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए बकायदा “भीख मांगी थी” (Begged)। इस दावे के बाद मेलोनी काफी ज्यादा भड़क गई हैं और उन्होंने ट्रंप को करारा जवाब दिया है।
ट्रंप का विवादित दावा: “तरस खाकर खिंचवाई फोटो”
इटली के एक न्यूज चैनल ‘La7 TV’ को दिए फोन इंटरव्यू में डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी ही धुन में मेलोनी का मजाक उड़ाते हुए कहा, “वह शायद खुश होंगी कि मैंने उनसे बात की, जबकि मुझे उनसे बात करने की कोई जरूरत नहीं थी। उन्होंने मेरे साथ एक तस्वीर खिंचवाने के लिए मुझसे भीख मांगी थी। वह मेरे साथ फोटो खिंचवाने के लिए इतनी बेताब थीं कि पूछिए मत। मैं तो फोटो नहीं खिंचवाता, लेकिन मुझे उन पर तरस आ गया, इसलिए मैं मान गया।”
मेलोनी का पलटवार: “ईश्वर गवाह है, इटली कभी भीख नहीं मांगता!”
ट्रंप के इस बयान के बाद जॉर्जिया मेलोनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो जारी कर ट्रंप के दावों की धज्जियां उड़ा दीं।
मेलोनी ने वीडियो में साफ-साफ कहा, “डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान पूरी तरह मनगढ़ंत और झूठा है। मैं सच में उनके इस व्यवहार से हैरान हूं। मुझे नहीं पता कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपने ही सहयोगियों के साथ ऐसा बर्ताव क्यों करते हैं; वैसे यह कोई पहली बार नहीं है।”
Io e l’Italia non imploriamo mai. pic.twitter.com/sTpKlqWB67
— Giorgia Meloni (@GiorgiaMeloni) June 19, 2026
मेलोनी यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने ट्रंप की दुखती रग पर हाथ रखते हुए आगे कहा, “बड़े दुख की बात है कि ट्रंप अपनी यह आक्रामकता और तेवर पश्चिमी देशों या अमेरिका के असली दुश्मनों के खिलाफ नहीं दिखाते, बल्कि उनके सामने तो वह बेहद नरम पड़ जाते हैं। खैर, उन्हें एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए: मैं और मेरा देश इटली, कभी किसी के आगे भीख नहीं मांगते।”
इटली में भारी गुस्सा: डिप्टी पीएम ने रद्द किया अमेरिका दौरा
ट्रंप की इस टिप्पणी से पूरे इटली के नेताओं में गुस्सा उबल पड़ा है। इसे पूरे देश का अपमान माना जा रहा है।
इटली के डिप्टी पीएम एंटोनियो तायानी ने गुस्से में अपना 21 और 22 जून का अमेरिका दौरा रद्द कर दिया है। उन्होंने कहा, “ट्रंप के ये शब्द पूरे इटली का अपमान हैं, इसलिए मैं अमेरिका नहीं जा रहा।”
इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेटो ने कहा, “मैं तो बंदूक की नोक पर भी मेलोनी को किसी से फोटो के लिए भीख मांगते नहीं देख सकता। मेलोनी ने इटली और यूरोप के भले के लिए ट्रंप की पुरानी कड़वी बातों को भुलाकर उनसे मुलाकात की थी, लेकिन ट्रंप ने फिर से अपनी खराब तहज़ीब (Lapse in style) दिखा दी।”
कभी पक्के दोस्त थे, अब क्यों आई इतनी कड़वाहट?
आपको बता दें कि जॉर्जिया मेलोनी कभी डोनाल्ड ट्रंप की बहुत बड़ी समर्थक हुआ करती थीं। यहां तक कि साल 2025 में जब ट्रंप ने दोबारा राष्ट्रपति पद की शपथ ली, तो मेलोनी उस समारोह में शामिल होने वाली अकेली यूरोपीय नेता थीं।
लेकिन फिर रिश्ते क्यों बिगड़े?
दरअसल ट्रंप ने ईसाई धर्मगुरु पोप लियो (Pope Leo) पर कुछ विवादित टिप्पणियां की थीं, जिससे मेलोनी नाराज हो गईं। इस साल शुरू हुए ईरान युद्ध को लेकर दोनों के विचार बिल्कुल अलग हो गए और मेलोनी ने ट्रंप से दूरी बना ली।
हालांकि, इस G7 समिट में दोनों ने पैच-अप (रिश्ते सुधारने) की कोशिश की थी, लेकिन ट्रंप के इस एक बयान ने दोनों देशों के बीच एक नया ‘विवाद’ खड़ा कर दिया है।
मोजतबा खामेनेई का बड़ा दावा, ईरान डील के लिए ‘बेताब’ ट्रंप ने हर तरह के हथकंडे अपनाए
वाइट हाउस में हुए एक कार्यक्रम का वीडियो इंटरनेट पर खूब वायरल हो रहा है। इसकी वजह हैं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। असल में वाइट हाउस में एक पूर्व अमेरिकी मेजर निकोलस डॉकरी का सम्मान समारोह चल रहा था।

