1 जुलाई से ट्रेन में बेटिकट सफर पड़ेगा भारी, 500 रुपये जुर्माना; दूसरे के टिकट पर यात्रा करने वालों पर भी सख्ती

Railway New Rules 2026

1 जुलाई से ट्रेन में बिना टिकट सफर करना खासा महंगा पड़ा सकता है। ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करते हुए पकड़े जाने पर अब पहले की तुलना में दोगुना जुर्माना देना होगा। दूसरे व्यक्ति के टिकट पर यात्रा करना भी महंगा पड़ेगा। नशे में हंगामा करने और अनुशासनहीनता करने वाले यात्रियों पर भी सख्त कार्रवाई होगी। ALSO READ: EPFO खाताधारकों के लिए बड़ी खुशखबरी, जल्द UPI और ATM से निकाल सकेंगे PF का पैसा

 

रेलवे की ओर से की गई नई व्यवस्था में न्यूनतम जुर्माना बढ़ाकर 500 रुपए कर दिया गया है। अभी बेटिकट यात्रा करने पर यात्री से पूरा किराया वसूला जाता है और कम से कम 250 रुपए जुर्माना लगाया जाता है। जुर्माना नहीं भरने पर 3 माह की जेल की सजा भी हो सकती है। इससे पहले 2013 में रेलवे ने जुर्माने की न्यूनतम राशि को 50 रुपए से बढ़ाकर 250 रुपए किया था।

 

नए नियमों के तहत, दूसरे के टिकट पर यात्रा करने वालों का टिकट जब्त कर लिया जाएगा। यात्री को टिकट का पूरा किराया और कम से कम 500 रुपए अतिरिक्त चार्ज देना होगा। ट्रेन या रेलवे स्टेशन पर बगैर अनुमति सामान बेचने पर भी 2000 रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा। 

 

सभी रेलवे झोनों को आदेश जारी कर नए नियमों की जानकारी दे दी गई है। नए आदेश में भीख मांगने जैसी गतिविधियों पर भी रोक को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं। बार-बार नियम तोड़ने वालों के लिए सख्त सजा का प्रावधान किया है। ALSO READ: E20 पेट्रोल से इंजन खराब हुआ तो क्या इंश्योरेंस क्लेम मिलेगा? सरकार ने बताई सचाई, क्या बोलीं बीमा कंपनियां

 

रेल मंत्रालय के अनुसार, इन बदलावों का मकसद बिना टिकट यात्रा, टिकटों के दुरुपयोग और रेलवे परिसरों में होने वाली अनियमितताओं को कम करना है। इससे यात्रियों को अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित यात्रा सुविधा मिल सकेगी। ALSO READ: मध्यप्रदेश के युवाओं को मिल रहा 50 लाख तक का लोन, ऐसे करें ऑनलाइन आवेदन

edited by : Nrapendra Gupta

क्या सीजेपी की देखादेखी युवाओं के मुद्दे उठा रही है कांग्रेस

Gen Z  and Rahul Gandhi

आदर्श शर्मा

कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक पिटीशन लॉन्च की है, जिसमें वे छात्र-छात्राओं से पूछ रहे हैं कि वे भारत की शिक्षा प्रणाली को 10 में से कितने नंबर देंगे। इसमें यह भी पूछा गया कि शिक्षा प्रणाली किस मामले में उनके लिए बेकार साबित हुई है। इसके विकल्पों में बढ़ती फीस, परीक्षा का दबाव, पेपर लीक, बेकार पाठ्यक्रम और शिक्षा के कमजोर बुनियादी ढांचे जैसे विकल्प दिए गए हैं। ALSO READ: 'कॉकरोच जनता पार्टी': सोशल मीडिया पर धमाल के बाद जमीनी हकीकत

 

यह पिटीशन कांग्रेस के नए ‘छात्रों की गूंज' अभियान का हिस्सा है। कांग्रेस इसे एक “देशव्यापी छात्र आंदोलन” बता रही है, जिसकी मांग “भारत की शोषणकारी शिक्षा प्रणाली को समाप्त करना” है। राजस्थान के कोटा में रैली के साथ इस अभियान की शुरुआत हुई और अगले महीने 10, 11 और 14 जुलाई को इसके तहत इलाहाबाद, पटना और दिल्ली में रैलियों का आयोजन होगा।

 

कांग्रेस का यह नया अभियान दिखाता है कि भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी युवाओं के मुद्दों को कितनी गंभीरता से ले रही है। इस अभियान की घोषणा कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए पहले प्रदर्शन के करीब 12 दिनों बाद की गई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के एक बयान के विरोध में बनी सीजेपी भी युवाओं के मुद्दों पर ही विरोध-प्रदर्शन कर रही है।

 

क्या सीजेपी के नक्शे-कदम पर चल रही है कांग्रेस

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार नीरजा चौधरी का मानना है कि यह कहना गलत होगा कि कांग्रेस, कॉकरोच जनता पार्टी को कॉपी कर रही है। उन्होंने डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में कहा कि सीजेपी युवाओं के मुद्दों को केंद्र में ले आयी है और अब कांग्रेस उन्हें आगे बढ़ा रही है। वे कहती हैं कि कांग्रेस के पास संगठन है, इसलिए वे हर जगह जाकर रैलियां कर सकते हैं लेकिन सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके के लिए ऐसा करना मुश्किल होगा क्योंकि अभी जमीन पर उनका संगठन नहीं है। हालांकि, वे सीजेपी को श्रेय देती हैं कि उसने बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही युवाओं की चिंताओं से रूबरू करवाया है।

 

राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक त्रिभुवन की भी यही राय है कि कांग्रेस, सीजेपी की देखादेखी युवाओं के मुद्दों को नहीं उठा रही है। उन्होंने डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में कहा कि कांग्रेस की छात्र इकाई भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) के अध्यक्ष विनोद जाखड़ शुरुआत से ही नीट परीक्षा का मुद्दा उठा रहे हैं और उनके प्रदर्शनों में खूब भीड़ भी जुट रही है। वे कहते हैं कि विनोद जाखड़ खुद युवा हैं और युवाओं के मुद्दों को समझ भी रहे हैं। उनके मुताबिक, कॉकरोच जनता पार्टी के बनने से पहले से ही एनएसयूआई के बैनर तले कांग्रेस के प्रदर्शन जारी थे, लेकिन अब कांग्रेस ने इस मामले में अपनी आक्रामकता बढ़ाई है। ALSO READ: भविष्य की सैन्य ताकत के लिए भारत का स्वदेशी ड्रोन पर जोर

 

क्या सीजेपी को खतरे के रूप में देख रही है कांग्रेस

वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन का मानना है कि कॉकरोच जनता पार्टी के उदय से कांग्रेस को चिंता जरूर हुई है। वे कहते हैं कि कांग्रेस ने युवाओं के मुद्दों पर आक्रामकता इसलिए दिखाई क्योंकि उन्हें लगा कि कहीं उनके वोट या लोग टूटकर उधर न चले जाएं। उनके मुताबिक, कांग्रेस को लगा कि कहीं ऐसा न हो कि वे इस मामले में कुछ न करें और उनके समर्थक सीजेपी के पाले में चले जाएं, इसलिए उन्होंने भी देशव्यापी अभियान की योजना बनाई।

 

हालांकि, कॉकरोच जनता पार्टी खुद को कांग्रेस के प्रतिस्पर्धी के रूप में नहीं देखती है। सीजेपी के प्रवक्ता विजेता दहिया ने डीडब्ल्यू से कहा कि युवाओं के मुद्दों पर कांग्रेस के अभियान को कॉकरोच जनता पार्टी का पूरा समर्थन है। उन्होंने कहा कि यह हर इंसान का लोकतांत्रिक अधिकार है कि देश अच्छे से चले और इसके लिए अगर कांग्रेस अलग से प्रदर्शन कर रही है तो यह बहुत अच्छी बात है।

 

राजनीतिक टिप्पणीकार नीरजा चौधरी सीजेपी को कांग्रेस के लिए खतरे के रूप में नहीं देखती हैं। वे कहती हैं, “सीजेपी एक ऑनलाइन मूवमेंट की तरह है और वे अब एक पार्टी के तौर पर ऑफलाइन होने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन पार्टी बनाना बहुत आसान चीज नहीं होती है।” वे इस मामले में कांग्रेस की तारीफ करते हुए कहती हैं कि कांग्रेस ने इस बार यह अच्छी चीज की है कि उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी का पल्ला नहीं पकड़ा है।

 

क्या कांग्रेस को इन प्रदर्शनों से फायदा होगा

कोटा में हुई राहुल गांधी की रैली को भारत के पारंपरिक मीडिया खासकर न्यूज चैनलों पर तो बहुत ज्यादा कवरेज नहीं मिली, लेकिन सोशल मीडिया पर इस आयोजन से जुड़ी कई पोस्ट पर खूब प्रतिक्रियाएं आयीं। कांग्रेस ने जुलाई में इलाहाबाद, पटना और दिल्ली में भी ऐसी रैलियां आयोजित करने की योजना बनाई है तो ऐसे में सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या कांग्रेस को बड़े स्तर पर युवाओं के मुद्दे उठाने का राजनीतिक फायदा मिलेगा।

 

नीरजा चौधरी कहती हैं कि इस समय यह कहना मुश्किल है कि फायदा मिलेगा या नहीं मिलेगा लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस का संगठन कितना मजबूत है, वह कितने उत्साह से सामने आता है और कौन लोग उसका नेतृत्व करते हैं। वे कहती हैं कि यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि कांग्रेस क्या संदेश देती है और युवाओं के सामने क्या विजन पेश करती है।

 

इस सवाल पर त्रिभुवन कहते हैं कि अगर जनता का कोई भी वर्ग सरकार से नाराज होता है, तो विपक्ष को इसका फायदा मिलता ही है। लेकिन वे यह चेतावनी भी देते हैं कि इस तरह के अभियानों का पूरा फायदा उठाने के लिए कांग्रेस को पहले अपनी अंदरूनी गुटबाजी से निपटना होगा। इसके लिए वे राजस्थान का उदाहरण देते हैं, जहां करीब 10 साल गुजरने के बाद भी अशोक गहलोत और सचिन पायलट का झगड़ा पूरी तरह सुलझा नहीं है।

Trigrahi Yog 2026: कर्क राशि में 22 जून को एकसाथ मौजूद होंगे तीन बड़े ग्रह, 4 राशियों को मिलेगा मान-सम्मान, पैसा और तरक्की के मौके

Trigrahi Yog 2026: ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों का गोचर अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। राशि या नक्षत्र परिवर्तन के साथ ही ग्रहों का उदय अस्त होना और व्रकी या मार्गी होना भी सभी 12 राशियों के जातकों को प्रभावित करता है। इसके अलावा ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों का संयोग भी कई बार दुर्लभ योग और राजयोगों का निर्माण करता है। ऐसा ही एक योग कर्क राशि में 22 जून से बनने जा रहा है। इस दिन कर्क राशि में गुरु और शुक्र के साथ बुद्ध ग्रह भी गोचर कर जाएंगे, जिससे त्रिग्रही योग का निर्माण होगा।

एक राशि में तीन प्रमुख ग्रह साथ होते हैं, तब त्रिग्रही योग का निर्माण होता है। कर्क राशि में यह संयोग भाग्य, धन, बुद्धि और सफलता का प्रतीक माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में त्रिग्रही योग अत्यंत शुभ और प्रभावशाली माना जाता है। इस योग का प्रभाव सभी 12 राशियों के जातकों पर होगा, लेकिन कुछ राशियों के लिए बुध, गुरु और शुक्र की युति विशेष रूप से लाभकारी साबित हो सकती है। जानें बुध, गुरु और शुक्र का कर्क राशि में संयोग किन राशियों को दिलाएगा सफलता और धन।

इन राशियों के लिए लाभकारी होगा त्रिग्रही योग

मिथुन राशि : मिथुन राशि को त्रिग्रही योग के प्रभाव से कार्यों में सफलता मिलेगी। आर्थिक लाभ होगा, जिससे स्थिति मजबूत होगी। पारिवारिक माहौल खुशनुमा रहेगा। परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम बढ़ेगा। करियर में तरक्की नए अवसर मिलेंगे। अपनों का सहयोग मिलेगा। व्यावसायिक उन्नति के प्रबल योग बन रहे हैं।

कर्क राशि : कर्क राशि के लिए यह समय अत्यंत शुभ रहने वाला है। आपके व्यक्तित्व में निखार आएगा। आपकी ओर लोग आकर्षित होंगे। पराक्रम रंग लाएगा। आत्मविश्वास में वृद्धि महसूस करेंगे। व्यावसायिक स्थिति मजबूत होगी। सामाजिक मान-प्रतिष्ठा बढ़ेगी। धन लाभ के नए अवसर बनेंगे।

कन्या राशि : कन्या राशि वालों के लिए करियर और वित्त में मनमुताबिक परिणाम प्राप्त होंगे। कार्यक्षेत्र में आप अपनी योग्यता और क्षमता साबित कर पाएंगे। निवेश के लिए समय अनुकूल है। लंबे समय से टल रहे कार्यों को पूरा करने के लिए अच्छा समय है। कुछ लोगों के लिए विवाह प्रस्ताव आ सकते हैं।

मकर राशि : मकर राशि के लिए यह समय अत्यंत शुभ और फलदायी साबित हो सकता है। इस समय आपको व्यवसाय में विस्तार के अच्छे अवसर मिल सकते हैं। किसी अच्छी डील या सौदे में साइन कर सकते हैं। अटके हुए धन की वापसी हो सकती है। मान-सम्मान में वृद्धि होगी।

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Guru Pushya Yoga: गुरु ने किया पुष्य नक्षत्र में प्रवेश, सेहत, पैसा और करियर को लेकर सावधान रहें ये 3 राशियां

लापतागंज में लापता मानसून!

बारिश

जून आधा बीत गया है लेकिन मानसून लापता है। बावजूद इसके सोशल मीडिया बता दे रहा है कि सावन आया! निश्चित ही भीषण गर्मी के बीच अचानक तेज आंधी-तूफान के साथ मूसलाधार बारिश हुई। पर वह एक के बाद एक मजबूत पश्चिमी विक्षोभों की बारिश है, जबकि मानसून आंध्र प्रदेश के आसपास अटका हुआ है। और पूरी संभावना है कि जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर का चौमासा (आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन) गर्मी, उमस से ऐसा रूलाने वाला होगा कि हर कोई भारत में जलवायु की बरबादी में वैसे ही रोएगा जैसे प्रदूषण से सर्दियों में दिल्ली अधमरी होती है।

यों अधमरी, बरबादी जैसे शब्द बहुत भारी है लेकिन यदि कोई अमेरिकी या रेगिस्तानी अरब-अफ्रीकी देशों के लोग भी भारत की गर्मी-उमस, प्रदूषित सर्दियों में आकर घूमने के हिमाकत करें तो वह अधमरी दशा से सांस लेते हुए होंगे। अमेरिकी विदेश मंत्री जून में  ही दिल्ली आए थे। उन्होने कहा वे खुद  बहुत गर्मी वाले मायामी से है लेकिन दिल्ली की तीखी गर्मी तो असहनीय है। दुनिया के मौसम, जलवायु वैज्ञानिकों की दो टूक भविष्यवाणी है कि जलवायु परिवर्तनों से सर्वाधिक दक्षिण एसिया प्रभावित होगा। सोचें,  बावजूद इस सबके हालिया खबर है कि अडानी धड़ाधड़ कोयले की खदाने ले रहे हैं और मोदीजी के साथ धधकता भारत बना देने की धुन में हैं।

बहरहाल, बात फैल गई। असल मुद्दा 2026 के चौमासे में किसान को दस तरह के संकट झेलने है। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन में वह बारिस के लिए तरसेगा। महीनों से वैश्विक जलवायु मॉडल एल नीनो के असर की चेतावनी दे रहे है। कोई आश्चर्य नहीं जो मध्य भारत और उत्तर भारत में सूखी हवाओं ने मानसूनी धाराओं को रोक दिया है। यदि मौसम एजेंसियों के अनुमान सही निकले तो अगस्त और सितंबर में भारी समस्या होगी।

पर सब कुछ जानते हुए भी सरकार और सोशल मीडिया ने किसानों को सावन का अंधा बना रखा है। सब ठीक है, सामान्य है, समय से पहले ही मानसून चल पड़ा आदि-आदि। किसान क्योंकि सोशल मीडिया को देखता, पढ़ता है। तो वह भी जून में सावन की हवा के मुगालते में है। मेरा इस सप्ताह प्रत्यक्ष अनुभव था, जो दिल्ली से अलवर की और जाते देखा कि बाजारे की बुवाई हो रही है! जबकि दिल्ली और एनसीआर में मानसून यों भी 27-29 जून के बीच पहुंचता है। उत्तरी राजस्थान में एक से पांच जुलाई के बीच बारिस होती है। बावजूद इसके पश्चिमी विक्षोभ की बारिस में ही बाजरे की बुवाई!

कुल मिलाकर मुद्दा यह कि जलवायु के हर तरह गडबडा जाने के बावजूद सरकारी स्तर पर कुछ भी जोखिम प्रबंधन नहीं। मतलब एल नीनो यदि मानसून को भटकाएगा तो किसानों को क्या करना चाहिए, ऐसी कोई सलाह नहीं। सावधानी बरतने की नसीहत नहीं। बारिस धोखा दे सकती है सो फला-फला वैकल्पिक फसल योजनाएँ हैं। सूखा-सहिष्णु बीजों की फला व्यवस्था हैं।

ट्रंप का सर्टिफिकेट, अब बाजार बनना तय

सोचें, डोनाल्ड ट्रंप पर। अमेरिका का कैसा मजाक बना डाला है। चाहे जो कर रहे हैं मगर लोकतंत्र के तकाजे में कोई कुछ भी नहीं कर सकता। ईरान ने अमेरिका को हैसियत दिखा दी है। मेरा मानना है कि साठ दिनों  बाद ईरान ही खाड़ी का मालिक होगा। दुनिया का संकट बना रहेगा। बावजूद इसके ट्रंप के झूठ, झांसे हॉट केक की तरह हैं। इसलिए भारत में भी उनका यह कहा अमृत वाक्य है कि नरेंद्र मोदी एक “टफ नेगोशिएटर” हैं। मोदी देखने में देवदूत जैसे लगते हैं और वे राजनीति में “किलर” हैं।

सवाल है क्यों ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह ‘चरित्र प्रमाणपत्र’ दिया? इसलिए क्योंकि दुनिया जानती है कि ज्योंहि प्रमाणपत्र मिलेगा त्योंहि मोदी और उनका मीडिया हिंदू भक्तों के बीच ट्रंपजी के कहे का घर-घर पहुंचा देगा। देखों हमारे भगवान को अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी देवदूत जैसा कहा!

ध्यान रहे, ट्रंप अपने आपको धूर्त, मास्टर सौदेबाज कहते हैं। उन्हे हर किसी को बेवकूफ बनाना आता है। वे प्रोपर्टी डीलर हैं। मिट्टी को भी सोने के भाव बेच सकते हैं। अमेरिका को जैसा अभी चूना लगा रहे हैं, वैसा एक भी राष्ट्रपति अमेरिकी इतिहास में नहीं हुआ है। ऐसे व्यापारी, सौदेबाज की पहली कला यह होती है कि सौदा करने से पहले सामने वाले को उसकी कीमत से थोड़ा ज्यादा महान महसूस करा दिया जाए।

ट्रंप ने आज ही लिखा है कि वे अपने आपको हिटलर, स्टालिन, माओं, सिकंदर आदि से बड़ा शक्तिमान मानते हैं। उन्हे भी इतिहास ऐसे ही याद करेगा। ट्रंप और नरेंद्र मोदी में फर्क यह है कि ट्रंप का लक्ष्य पृथ्वी के इतिहास का नंबर एक युगपुरुष होना है वही नरेंद्र मोदी को कलियुगी भारत का सबसे बड़ा देवता कहलाना है। एक की महानता का लेवल पृथ्वी का आधुनिक इतिहास है। वही दूसरे का कलियुगी हिंदुओं का नंबर एक भगवान बनना है। बारह साल, बारह युग! भारत में कभी चंद्रशेखर नाम के एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे। उनके चेलों ने चालीस दिन बनाम चालीस साल के ऐसे नारे बनाए थे कि देश भर के चिरकूट उनका  कीर्तन करते थे।

भटक गया हूं। असल मुद्दा है कि जल्द भारत का बाजार अमेरिकी का कैप्टिव बाजार होगा। ट्रंप अमेरिका से भारत को पशुओं की खुराक भिजवाएँगे तो सोयाबीन, मक्का से लेकर वे सामान भी आएंगे, जिससे भारत के विदेश व्यापार की कंगाली में आटा और गीला होगा। अब अमेरिका का बनवाया समझौता आसानी से लापतागंज में बिकेगा। 140 करोड़ ग्राहकों के बाजार में अमेरिका की उपस्थिति इसलिए बड़ी होनी है क्योंकि अमेरिका यह भी वचन ले रहा है कि इतने वर्षों में इतना अमेरिकी सामान भारत को खरीदना ही है। सोचें, एक के बाद एक मुक्त व्यापार समझौतों की बाढ़ में फंसता बाजार। यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ईएफटीए, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, ओमान, न्यूजीलैंड, अमेरिका से व्यापार (खरीद) के सौदे ही सौदे तो वही चीन बिना सौदे के पहले से ही सबसे बड़ा विक्रेता।

पता है व्यापारिक घाटे में सबसे बड़ा घाटे वाला कौन सा देश है? भारत। यों नंबर एक पर अमेरिका है। मगर वह इसलिए है क्योंकि अमेरिकी इतने अमीर है कि उन्हे काले हाथ करके सामान बनाना पसंद नहीं। अमेरिकियों की कमाई के असल जरिए दूसरे हैं। वह डॉलर छापता है। दुनिया को पूंजी, तकनीक देता है। अब वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भी मालिक है जिससे उसे डालर मिलेगा तो भारत की आईटी, सेवा क्षेत्र की डालर कमाई भी लापता होनीं है।

ट्रंप के मजाक की गंभीर व्याख्या

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के एवियन शहर में जी 7 बैठक से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ज्यादातर बातें मजाक में कहीं। अमेरिका मीडिया ने इसे इसी रूप में लिया। जब ट्रंप ने कहा कि भारत पर हमला हुआ तो अमेरिका उसके बचाव में आएगा। तो उन्होंने साथ ही नरेंद्र मोदी की ओर से इशारा करके कहा कि मोदी अगर सत्ता में रहे तो अमेरिका बचाने आएगा। अगर कोई दूसरा रहा तो फिर सोचना होगा।

यह मोदी की अबकी बार ट्रंप सरकार वाली कूटनीति का जवाब था। जैसे मोदी ने अमेरिका के लोगों से ट्रंप को चुनने को कहा था वैसे ही ट्रंप ने भारत के लोगों से मोदी को चुनने को कह दिया। हालांकि जब मोदी नारा लगा कर आए थे तब अमेरिका के लोगों ने ट्रंप को हरवा दिया था।

बहरहाल, अमेरिका मीडिया में जो रिपोर्ट छपी या जो वीडिया आए है उसमें रिपोर्टर्स कह रहे थे कि ट्रंप ने मजाक किया। फॉक्स न्यूज की वीडियो में कहा गया, ‘प्रेसिडेंट ट्रंप क्रैक्स ए जोक अबाउट अमेरिकाज कमिटमेंट टू डिफेंड इंडिया ऐज लॉन्ग ऐज प्राइम मिनिस्टर मोदी इज स्टिल लीडिंग द कंट्री…’। लेकिन भारत में मीडिया ने इसे बहुत गंभीरता से लिया। ब्रह्मा चैलानी ने ट्विट करके यह फॉक्स न्यूज का वीडियो साझा किया और कहा कि इस मजाक को भारतीय मीडिया ने भारत की रक्षा करने के अमेरिका के पवित्र संकल्प के रूप में प्रस्तुत किया।

भारतीय मीडिया को लेकर ट्रंप का मजाक और भी ऐतिहासिक था। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक भारतीय पत्रकार ने अपने सवाल की शुरुआत यह कहते हुए की, ‘राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के साथ समझौता करके आप एक इतिहास बनाने जा रहे हैं..’। इस पर ट्रंप ने मोदी की ओर देख कर कहा कि यह रिपोर्टर मुझे बहुत अच्छा लगा। उन्होंने मोदी से कहा कि आपके वाले रिपोर्टर्स हमारे से बहुत अच्छे हैं!

डीजल, खाद, बीज भी लापता

मानसून लापता है। बंगाल की खाड़ी में कम दबाव वाला क्षेत्र नहीं बन रहा है। जो बन रहा है वह इतना मजबूत नहीं है कि मानसून को पुश करक आगे बढ़ा सके। सो, इस साल दक्षिण पश्चिम मानसून दूसरी बार अटक गया है। पहले केरल के तट पर पहुंचने पहले कई दिन तक अटका रहा और फिर तेजी से आगे बढ़ने के बाद दोबारा अटक गया। 14 जून को सेटेलाइट की तस्वीरों में मानसून के बादल दिख रहे थे लेकिन 15 जून को लापता हो गए। प्री मानसून बारिश कई जगह हुई है लेकिन बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल सहित ज्यादातर पूर्वी राज्यों में मानसून की निर्धारित तिथि निकल गई है और बारिश नहीं हुई। अभी पूरे हफ्ते यही स्थिति रहनी है। 25 जून के म्यांमार की ओर से बंगाल की खाड़ी में एक कमजोर गतिविधि की संभावना है। इससे पहले गुजरात में 79 फीसदी, महाराष्ट्र में 78 फीसदी और झारखंड में 70 फीसदी कम बारिश होने की खबर है। जानकारों का मानना है कि इस साल सामान्य से 50 फीसदी कम बारिश हो सकती है।

सो, बारिश नहीं है तो पानी नहीं है और खरीफ की खेती के लिए तैयार किसान चिंता में है। बारिश नहीं हुई है तो नदियां और नहरें भी सूखी हैं और पूर्वी भारत भी भूमिगत जल स्तर नीचे जाने के उस संकट से घिरा है, जो अब तक पश्चिम में दिखाई देता था। भूमिगत जल स्तर नीचे चला गया है और बोरिंग या पम्पिंग सेट के जरिए पानी निकालना निरंतर मुश्किल होता जा रहा है। अगर किसान के पास बोरवेल है या पम्पिंग सेट है तो उसे चलाने के लिए बिजली या डीजल की जरुरत है। पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में तो बोरवेल है लेकिन उनके उलट बिहार, झारखंड आदि राज्यों में किसान पम्पिंग सेट का इस्तेमाल किया जाता है और उसके लिए डीजल चाहिए, जो बाजार से

लापता है। सरकार कह नहीं रही है लेकिन ऐसे उपाय कर रही है, जिससे लोगों को डीजल मिलने में मुश्किल हो।

सरकार ने अनिवार्य कर दिया है कि गैलन या कंटेनर में पेट्रोल पंप से डीजल नहीं ले सकते हैं। सवाल है कि क्या किसान अपना पम्पिंग सेट लेकर पेट्रोल पंप पर जाएं और डीजल खरीदें? छोटे किसानों के लिए यह संभव ही नहीं है। इसलिए वे बड़े किसानों या गांव के साहूकारों पर निर्भर हैं और ज्यादा कीमत देकर डीजल खरीद रहे हैं। अगर कोई किसान अपना पम्पिंग सेट लेकर पेट्रोल पंप पर जा रहा है तो वहां से 20 लीटर से ज्यादा डीजल नहीं मिल रही है। सरकार ने आदेश जारी करके सामान्य पेट्रोल पंप पर दो सौ लीटर से ज्यादा डीजल नहीं देने का नियम बनाया है लेकिन बिहार जैसे राज्यों में आम लोगों के लिए इसे घटा कर 20 लीटर कर दिया गया है। सोचें, कीमत एक सौ रुपए लीटर तक पहुंची है और उपलब्धता कम हो गई है। किसान सारे दिन इस जुगाड़ में घूम रहे हैं कि कैसे डीजल मिले ताकि खेत में पानी पहुंचे और धान के बीज गिराए जाएं या जिनका बिचड़ा तैयार है वे रोपनी कर सकें।

किसान का संकट इतने पर समाप्त नहीं हो रहा है। उसकी स्थिति तो मुंशी प्रेमचंद के किसान से भी बदतर दिख रही है। उसे आसमान से बारिश का इंतजार है या पेट्रोल पंप से डीजल मिलने का इंतजार है और साथ ही खाद व बीज की उपलब्धता का भी इंतजार है। सरकार कह रही है कि उसके स्टॉक में खाद पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। कहा गया है कि दो करोड़ मिट्रिक टन खाद है। लेकिन किसानों को 15 किलो की जगह पांच किलो खाद मिल रही है। बिहार, उत्तर  प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे कृषि वाले राज्यों से तस्वीरें आ रही हैं कि किसान खाद और बीज के सेंटर के बाहर रात गुजार रहे हैं ताकि सुबह उनको खाद मिल सके। यूरिया और डीएपी दोनों जरूरी उर्वरक बाजार से लापता हैं। यूरिया की सामान्य कीमत 266 रुपए बोरी और डीएपी की 1,350 रुपए बोरी है। लेकिन यूरिया पांच सौ रुपए और डीएपी दो से ढाई हजार रुपए बोरी के दाम पर बिक रहा है। सरकार कालाबाजारी करने वालों को चेतावनी दे रही है और स्टॉक नहीं करने की सलाह दे रही है लेकिन संकट यह है कि रेलवे के रैक भी समय पर नहीं पहुंच रहे हैं ताकि बाजार में आसानी से खाद उपलब्ध हो। सरकार ने 17 लाख टन यूरिया आयात किया है लेकिन वह यूरिया भी बाजार में आने से पहले ही लापता हो जा रहा है। इस बार तो कहा जा रहा है कि पश्चिम एशिया में जंग की वजह से समस्या हुई है लेकिन खेती के समय डीजल, खाद और पानी की समस्या चिरंतन है। किसान को इससे कभी मुक्ति नहीं मिलती है। ऊपर से प्रेमचंद के किसान की तरह आज भी भारत का किसान साहूकारों के ऊंचे ब्याज वाले कर्ज के तले दबा है। उससे भी मुक्ति नहीं मिल रही है।

Delhi Weather Today: दिल्ली में आज आंधी-तूफान और बारिश का अलर्ट; IMD ने 60 kmph की रफ्तार से हवाएं चलने का अनुमान जताया

Delhi Weather Today: दिल्ली के लोगों को शनिवार, 20 जून को भीषण गर्मी से राहत मिल सकती है, क्योंकि भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने राजधानी के कुछ हिस्सों में हल्की बारिश, आंधी-तूफान और तेज हवाओं का अनुमान लगाया है। ताजा जानकारी के मुताबिक, शहर में आसमान में आंशिक रूप से बादल छाए रहने और खासकर दोपहर और शाम के समय बहुत हल्की या हल्की बारिश के साथ आंधी-तूफान और बिजली कड़कने की संभावना है।

शाम को बारिश और आंधी-तूफान की संभावना

IMD ने 40-50 KMPH की रफ्तार वाली तेज हवाओं के साथ आंधी-तूफान की गतिविधि का अनुमान लगाया है, और मौसम के खराब होने पर हवा की गति 60 KMPH तक पहुंच सकती है।

मौसम की ये स्थितियां उत्तर भारत में चल रही प्री-मानसून गतिविधि के कारण होने की उम्मीद है, जिसके चलते पिछले एक हफ्ते से दिल्ली-NCR में रुक-रुक कर बारिश और धूल भरी आंधी चल रही है।

लोगों को सलाह दी गई है कि वे आंधी-तूफान के दौरान, खासकर दोपहर और शाम के समय यात्रा करते समय सावधानी बरतें।

तापमान 40°C से नीचे रहेगा

अधिकतम तापमान 37°C से 39°C के बीच रहने की उम्मीद है, जबकि न्यूनतम तापमान 25°C से 27°C के बीच रहने की संभावना है। यह अनुमान इस महीने की शुरुआत में पड़ी भीषण गर्मी की तुलना में तापमान में काफी गिरावट का संकेत देता है, जब शहर के कई हिस्सों में तापमान 44°C के पार चला गया था।

IMD के अनुसार, ठंडे मौसम से गर्मी की परेशानी से राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि वीकेंड के दौरान तापमान 40°C से नीचे ही रहेगा।

यह तब हुआ है जब शुक्रवार को दिल्ली में गर्म दिन रहा और अधिकतम तापमान 39.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से एक डिग्री ज्यादा था। मौसम केंद्रों में, रिज (Ridge) में सबसे ज्यादा अधिकतम तापमान 40.0 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, इसके बाद पालम और अयानगर में 39.6 डिग्री सेल्सियस तापमान रहा। लोधी रोड पर अधिकतम तापमान 39.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।

वहीं, न्यूनतम तापमान 27 डिग्री सेल्सियस रहा, जो सामान्य से लगभग 0.5 डिग्री कम था, जबकि दिन भर आसमान में आंशिक रूप से बादल छाए रहे।

सुहावना मौसम बना रहेगा

IMD के अनुमान के मुताबिक, 21 जून को भी मौसम का हाल ऐसा ही रह सकता है; राजधानी में हल्की बारिश, आंधी और तेज हवाएं चलने की संभावना है। इसके अलावा, 22 जून से आसमान में आंशिक रूप से बादल छाए रहने की उम्मीद है, जबकि दिन का तापमान 36°C से 38°C के बीच रहने की संभावना है, जो दिल्ली के लिए मॉनसून-पूर्व के सुहावने मौसम का संकेत है।

बता दें कि यह स्थिति दिल्ली में प्री-मानसून के दौरान अपेक्षाकृत सुहावना और राहत भरा मौसम दर्शाती है।

दिल्ली का AQI

सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के अनुसार, शुक्रवार शाम को दिल्ली की हवा की गुणवत्ता ‘मध्यम’ श्रेणी में रही और एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 143 दर्ज किया गया। ध्यान दें कि

101 से 200 के बीच का AQI ‘संतोषजनक’ श्रेणी में आता है और इससे संवेदनशील लोगों-जैसे बच्चे, बुजुर्ग और सांस की बीमारी से पीड़ित लोगों को सांस लेने में थोड़ी परेशानी हो सकती है।

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शहर आबाद नहीं हुए, गांव लापता हो गए

देश में सबसे कम शहरीकरण वाला राज्य हिमाचल प्रदेश है और उसके बाद बिहार का नंबर आता है। इसके बाद असम, ओडिशा आदि राज्य आते हैं। इन राज्यों में शहरीकरण नहीं हुआ है लेकिन गांव लापता हो गए हैं। सवाल है कि कहां चले गए हैं गांव के लोग? वह भी इस समय जब खेती किसानी का समय है? पिछले दिनों एक रील सोशल मीडिया में वायरल हुई, जिसमें पंजाब में धान की रोपनी कर रहे बिहार के किसान अपनी पीड़ा बता रहे थे। वे बिहार के नौजवानों से कह रहे थे कि पंजाब में उनका जीवन कितना मुश्किल है। वे अपील भी कर रहे थे कि अगर पढ़ सकते हो तो पढ़ो और कुछ करो। इस रील में सवाल है कि जवाब है। देश के तमाम पिछड़े इलाकों, जिनमें बिहार, झारखंड, ओडिशा, बंगाल का नाम खास तौर पर लिया जा सकता है, से गांव उठ कर दिल्ली, पंजाब, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, वडोदरा, बेंगलुरू और हैदराबाद चले गए हैं।

लेकिन ऐसा नहीं है कि गांव लापता हुए हैं और वहां के लोग देश के बड़े शहरों में चले गए हैं। गांवों से निकल कर ज्यादातर लोग अपने आसपास के शहरों मे गए हैं। अच्छे जीवन की तलाश में, बच्चों की अच्छी शिक्षा व बुजुर्गों के लिए अच्छी स्वास्थ्य सुविधा की तलाश में, शहर में मिलने वाली सुविधाओं की मृग मरीचिका में लोग गांव से निकल कर शहर में आ गए हैं या शहर के नजदीक आ गए हैं। ‘राग दरबारी’ में पहले ही पन्ने पर श्रीलाल शुक्ल ने लिखा है कि ‘शहर का वह छोर, जहां से देहात का महासागर शुरू होता है’। लेकिन अब शहर की सीमा के बाद देहात का महासागर नहीं दिखता है, बल्कि बेहद बदरंग रूप में शहर ही देहात तक पहुंच गया है या शहर ही देहात बन गया है।

लोग गांवों से निकल कर शहरों की ओर भागे तो शहर का भौगोलिक विस्तार तेजी से हुआ। शहर का विकास नहीं हुआ, सुविधाएं नहीं बढ़ीं सिर्फ भौगोलिक विस्तार हुआ। जैसे दिल्ली में भीड़ बढ़ती गई तो एनसीआर का दायरा बढ़ता गया वैसे ही बिहार के किसी शहर का विस्तार हुआ तो नगर निगम या नगरपालिका की सीमा बढ़ती गई। लोग इस बात से खुश हुए कि उनका गांव, टोला या मोहल्ल नगरपालिका की सीमा में आ गया। लेकिन नगरपालिका ने वैसी सुविधाएं भी विकसित नहीं की, जैसी पंचायत में उनको मिलती थी। राष्ट्रपति रहते एपीजे अब्दुल कलाम ने पुरा (पीयूआरए) यानी प्रोविजन ऑफ अर्बन एमेनिटीज टू रूरल एरियाज का जिक्र किया था, जिसे 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने शुरू किया था। इसके तहत ग्रामीण इलाकों में शहरी सुविधाएं यानी सीवेज, पीने के पानी, अच्छी सड़क आदि की सुविधा देनी थी। दुर्भाग्य से उसके 23 साल बाद गांव उजाड़ पड़े हैं और शहरों में भी ये सुविधाएं पूरी तरह से नहीं मिल रही हैं।

गांव के लोग जिन चीजों की तलाश में शहर आए थे वो उनको मिली नहीं और वे गांव से उजड़ गए। शहरों में अच्छी शिक्षा के नाम पर कचरा ज्ञान फैलाने वाले निजी स्कूल और कोचिंग हैं। सरकारी स्कूलों की हालत बदतर है। सरकारी अस्पताल दिन ब दिन खराब हुए हैं तो निजी अस्पताल इतने महंगे हैं कि लोग उसे अफोर्ड नहीं कर सकते हैं। नौकरी और रोजगार की संभावना नगण्य है। लेकिन अब वापस गांव लौटना शर्म की बात मानी जाएगी। इसलिए संघर्ष कर रहे हैं। उधर गांवों में छोटी जोत वाले किसान भी खेत मजदूरों की तलाश में भटक रहे हैं। उनके घर के नौजवान भी अच्छे जीवन की उम्मीद लिए गांव से निकल गए हैं। वे भी कहीं किसी शहर या महानगर में भटक रहे हैं। थोड़े समय पहले तक गांवों में जहां चौपाल पर, मंदिर या मस्जिदों के चबूतरे पर या पेड़ की छांव में लोग बैठे दिखते थे वहां अब सन्नाटा है। सड़क पर कुछ महिलाएं तो दिखती हैं लेकिन कामकाजी उम्र के लोग लापता हैं।

शिक्षा, परीक्षा दोनों लापता

भारत की शिक्षा प्रणाली और परीक्षा की व्यवस्था को लेकर इन दिनों पूरे देश में चर्चा हो रही है। यह चर्चा इसलिए शुरू हुई क्योंकि मेडिकल में दाखिले के लिए हुई नीट यूजी के पेपर लीक हो गए और परीक्षा दोबारा करानी पड़ी। 21 जून को दोबारा परीक्षा होगी और उससे पहले 12 युवाओं ने आत्महत्या करके जान दे दी है। 12वीं की बोर्ड में सीबीएसई ने ऑन स्क्रीन मार्किंग यानी ओएसएम का जो सिस्टम बनाया उसकी गड़बड़ियों से भी लोगों की नजर इसकी ओर गई है। लेकिन ऐसा नहीं है कि ये दोनों बड़ी घटनाएं कोई अपवाद हैं। यह भारत में शिक्षा व्यवस्था की मुख्यधारा है। इन दोनों पर ज्यादा ध्यान इसलिए गया क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक देश, एक कुछ भी कराने की जिद में मेडिकल में दाखिले की सारी परीक्षाएं एक साथ कराने का फैसला किया और इसके लिए एनटीए का गठन हुआ, जिसके नकारेपन की दास्तान पूरे भारत के लोग जानते हैं। उस एक एजेंसी के नकारेपन की वजह से सेना और वायु सेना को नीट यूजी की परीक्षा में शामिल करना पड़ा है।

लेकिन अखिल भारतीय परीक्षाओं के साथ साथ हर राज्य में शिक्षा और परीक्षा को लेकर एक जैसी कहानी है। शिक्षा का सत्र समय से नहीं चलना और परीक्षा समय पर नहीं होना या परीक्षा होने के बाद नतीजों का प्रकाशन समय से नहीं होना या नतीजे आने के बाद भी नियुक्ति नहीं होना, हर राज्य की समस्या है। बिहार में करीब दो साल पहले 70वीं बीपीएससी की परीक्षा हुई थी लेकिन अभी तक नतीजे घोषित नहीं किए गए हैं। नतीजों में देरी से लाखों की संख्या में छात्र अगली परीक्षा होने तक उम्र की सीमा पार कर जाएंगे। परीक्षा के सत्र में देरी से लाखों छात्र प्रतियोगिता परीक्षाओं से वंचित रह जाते हैं। छोटी छोटी परीक्षाओं के रद्द होने पर लोग ध्यान भी देते हैं। दिल्ली में सीयूईटी की परीक्षा में 36 सौ से ज्यादा अभ्यर्थी तकनीकी गड़बड़ी से परीक्षा नहीं दे सके। उनको बाद में फिर परीक्षा के लिए जाना पड़ा। ऐसी गड़बड़ियां आम होती हैं। एक ही दिन दो बड़ी परीक्षा हो जाना भी एक समस्या है, जिससे छात्रों को जूझना पड़ता है।

दूसरी ओर परीक्षा का आयोजन सरकार के लिए या परीक्षा कराने वाली एजेंसियों के लिए कमाई का साधन बन गया है। बेरोजगारी इतनी ज्यादा है कि एक एक नौकरी के लिए हजारों लोग आवेदन दे रहे हैं। बिहार में एक नौकरी के लिए चार हजार पद निकले तो 14 लाख लोगों ने आवेदन किया। सोचें, न्यूनतम फीस भरने पर भी कितने पैसे जमा हुए होंगे? ऐसी परीक्षाओं के लिए सरकारें यातायात की अतिरिक्त व्यवस्था नहीं करती हैं और परीक्षा के केंद्र अभ्यर्थी के घर से तीन तीन सौ किलोमीटर दूर रखे जाते हैं। बिहार में पिछले ही दिनों रेलवे स्टेशनों की भयावह तस्वीरें सोशल मीडिया पर सारे देश ने देखी। हजारों छात्र परीक्षा केंद्रों पर पहुंच ही नहीं पाए। कई साल पहले रेलवे ने एक लाख पदों की बहाली निकाली थी, जिसके लिए एक करोड़ आठ लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किया। अभी तक वह परीक्षा नहीं हो पाई है।

असल में प्रतियोगिता परीक्षाएं छात्रों और अभिभावकों के आर्थिक, शारीरिक व मानसिक शोषण का पर्याय बन गई हैं। राहुल गांधी ने पिछले दिनों कोटा में छात्रों के साथ संवाद में एक आंकड़ा देश के सामने रखा। अभी तक उसका खंडन नहीं किया गया और कई जानकार उसकी पुष्टि कर रहे हैं। उस आंकड़े के मुताबिक देश की सिर्फ पांच बड़ी परीक्षाओं नीट, जेईई, एसएससी, यूपीएससी और आरआरबी की तैयारी से लेकर परीक्षा तक देश के छात्रों का साढ़े तीन लाख करोड़ रुपया खर्च होता है। यह बिहार जैसे राज्य के साल भर के बजट से ज्यादा है। केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों के बजट से ज्यादा है यह रकम। सिर्फ नीट की परीक्षा में 23 लाख छात्रों के एक लाख 32 हजार करोड़ रुपए खर्च होते हैं। यह हकीकत भी सामने आई है कि यूपीएससी की परीक्षा में करीब डेढ़ हजार प्रतियोगियों मे से एक को नौकरी मिलती है। बाकियों के लिए संघर्ष ही रास्ता है। शिक्षा की गुणवत्ता में कैसी गिरावट आई है उस पर तो कई ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। कोरोना के बाद हुए एक सर्वे में पता चला है कि बिल्कुल प्राथमिक स्तर पर ही बच्चों के सीखने की प्रक्रिया प्रभावित हुई है और छठी क्लास के बच्चे अपने से दो क्लास नीचे की किताबें नहीं पढ़ पाते हैं। उच्च शिक्षा और रिसर्च की हालत दुनिया में सबसे खराब है। हाल ही में दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटीज की क्यूएस रैंकिंग आई है, जिसमें टॉप एक सौ यूनिवर्सिटीज में भारत की एक भी यूनिवर्सिटी नहीं है और टॉप दो सौ में तीन को जगह मिली है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं जैसे अमेरिका, चीन आदि अपने जीडीपी का तीन से चार फीसदी तक रिसर्च पर खर्च करती हैं। ध्यान रहे अमेरिका की जीडीपी 30 ट्रिलियन डॉलर है, जो भारत से सात गुने से ज्यादा है और चीन की 20 ट्रिलियन डॉलर है। भारत की जीडीपी चार ट्रिलियन डॉलर की है और उसमें से 0.70 फीसदी रिसर्च पर खर्च होता है।