Birsa Munda: आदिवासी स्वाभिमान और स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बिरसा मुंडा

Portrait of Birsa Munda, a brave warrior of the Indian freedom struggle and a rich historical personality

Birsa Munda Biography: स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बिरसा मुंडा का बलिदान दिवस 9 जून को मनाया जाता है। भारतीय इतिहास में ‘धरती आबा’ (धरती पिता) के नाम से पूजे जाने वाले बिरसा मुंडा मात्र एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे आदिवासी चेतना, स्वाभिमान और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के सबसे बड़े प्रतीक थे। 19वीं सदी के अंत में जब ब्रिटिश हुकूमत और जमींदार मिलकर आदिवासियों का शोषण कर रहे थे, तब बिरसा मुंडा ने एक ऐसी अलख जगाई जिसने अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी।

 

1. प्रारंभिक जीवन और चेतना का उदय

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को वर्तमान झारखंड के खूंटी जिले के उलीहातु गांव में हुआ था। भारत सरकार द्वारा उनके जन्मदिन 15 नवंबर को हर साल 'जनजातीय गौरव दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

 

बचपन और शिक्षा: उनका बचपन चाईबासा के जंगलों और खेतों में बीता। पढ़ाई के लिए उन्होंने कुछ समय ईसाई मिशनरी स्कूल में दाखिला लिया, जहां उनका नाम 'बिरसा डेविड' रखा गया।

 

शोषण के खिलाफ आवाज: स्कूल के दिनों में ही उन्होंने महसूस किया कि मिशनरी और ब्रिटिश व्यवस्था आदिवासियों की संस्कृति, भाषा और उनके पारंपरिक अधिकारों को नष्ट कर रही है। इसके बाद उन्होंने मिशनरी स्कूल छोड़ दिया और अपनी संस्कृति की रक्षा का संकल्प लिया।

 

2. 'बिरसा संप्रदाय' और सामाजिक सुधार

क्रांति से पहले बिरसा मुंडा ने समाज को अंदर से मजबूत करने का काम किया। उन्होंने देखा कि अंधविश्वास और नशे के कारण आदिवासी समाज कमजोर हो रहा है।

 

एकेश्वरवाद की सीख: उन्होंने आदिवासियों को केवल एक ईश्वर (सिंगबोंगा) की पूजा करने की सलाह दी।

 

सामाजिक बुराइयों का अंत: उन्होंने शराबबंदी, पशु बलि के विरोध और स्वच्छता पर जोर दिया।

 

उनके इन विचारों से प्रभावित होकर हजारों लोग उनके अनुयायी बन गए और लोग उन्हें प्यार से 'धरती आबा' कहने लगे।

 

3. 'उलगुलान' (महान विद्रोह) की शुरुआत

'उलगुलान' मुंडारी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है 'महान उथल-पुथल' या 'विद्रोह'। यह आंदोलन ब्रिटिश सरकार की 'दिक्षु' (बाहरी शोषक, जमींदार और सूदखोर) नीति के खिलाफ था, जो आदिवासियों की ज़मीनें छीन रहे थे।

 

नारा: बिरसा मुंडा ने सिंहभूम और रांची के जंगलों में आदिवासियों को एकजुट किया और नारा दिया- 'अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडू जाना (अर्थात: अब हमारा राज शुरू हो गया है और महारानी का राज खत्म हो गया है)।

 

गुरिल्ला युद्ध: मुंडा तीर-कमान और पारंपरिक हथियारों से लैस होकर ब्रिटिश चौकियों, थानों और जमींदारों पर हमला करते थे। डोम्बारी पहाड़ी का युद्ध इस आंदोलन का एक ऐतिहासिक केंद्र बना।

 

4. महानायक का बलिदान

ब्रिटिश सेना आधुनिक हथियारों से लैस थी, फिर भी बिरसा मुंडा की रणनीतियों के सामने उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। आखिरकार, अंग्रेजों ने चाल चली और बिरसा मुंडा पर इनाम रख दिया।

 

गिरफ्तारी: मार्च 1900 में, चक्रधरपुर के जामकोपाई जंगल से सोते समय उन्हें धोखे से गिरफ्तार कर लिया गया।

 

शहादत: मात्र 24 वर्ष की आयु में, 9 जून 1900 को रांची जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में (अंग्रेजों के अनुसार हैजे के कारण) उन्होंने अंतिम सांस ली। लेकिन इतिहासकारों और उनके अनुयायियों का मानना है कि उन्हें अंग्रेजों द्वारा जेल में धीमा जहर दिया गया था। उनकी शहादत के बाद अंग्रेजों को आदिवासियों की जमीन की रक्षा के लिए छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act, 1908) कानून बनाना पड़ा, जिसने बाहरी लोगों को आदिवासी जमीन खरीदने से रोका।

 

'धरती आबा बिरसा मुंडा का जीवन हमें सिखाता है कि जब बात अपनी संस्कृति, अस्मिता और अधिकारों की हो, तो संसाधनों की कमी कभी भी आपके हौसलों को डिगा नहीं सकती।'

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

सूर्यकुमार की छुट्टी? ‘रेडीमेड कप्तान है यह खिलाड़ी, 2022 से 2026 तक… हर बड़े मैच का हीरो

33 गेंद… 93 रन… 5 चौके… 9 आसमानी छक्के… और 281.81 का खतरनाक स्ट्राइक रेट!

धर्मशाला की ठंडी रात में रजत पाटीदार ने ऐसा तूफान उठाया कि गुजरात टाइटंस की पूरी टीम उड़ गई। आईपीएल 2026 के क्वालिफायर-1 में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के कप्तान ने सिर्फ मैच नहीं जीता, बल्कि टीम इंडिया के दरवाजे पर जोरदार दस्तक दे दी। RCB लगातार दूसरी बार और कुल चौथी बार आईपीएल फाइनल में पहुंच चुकी है, और इस सफर के सबसे बड़े हीरो बने हैं रजत पाटीदार। अब सवाल सिर्फ इतना नहीं कि उन्हें टीम इंडिया में मौका मिलना चाहिए या नहीं… सवाल ये है कि क्या भारत को सूर्यकुमार यादव के बाद अपना अगला टी20 कप्तान मिल चुका है?

 

रजत सिर्फ रन नहीं बना रहे, वो मैच की दिशा बदल रहे हैं। जिस तरह उन्होंने विराट कोहली और देवदत्त पडिक्कल के आउट होने के बाद दबाव को मौके में बदला, उसने बता दिया कि ये खिलाड़ी बड़े मंच के लिए बना है। यही वजह है कि अब क्रिकेट एक्सपर्ट्स से लेकर फैंस तक हर कोई कह रहा है—“रजत पाटीदार को अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”

 

 


 

 1. मिडिल ऑर्डर का सबसे खतरनाक मैच फिनिशर

 

टीम इंडिया लंबे समय से ऐसे बल्लेबाज की तलाश में है जो नंबर 4 या 5 पर आते ही मैच का टेम्पो बदल दे। रजत पाटीदार वही खिलाड़ी साबित हो रहे हैं।

 

आईपीएल 2026 में उनका स्ट्राइक रेट 200 के करीब रहा। वो उन बल्लेबाजों में नहीं हैं जो 30-40 गेंदें खेलकर सेट होते हैं। रजत आते ही गेंदबाजों पर हमला बोलते हैं। गुजरात के खिलाफ 33 गेंदों में नाबाद 93 रन की पारी हो, मुंबई के खिलाफ 20 गेंदों में 53 रन, लखनऊ के सामने 31 गेंदों में 61 या राजस्थान के खिलाफ 63 रन—हर बार उन्होंने दिखाया कि दबाव उन्हें डराता नहीं, बल्कि और खतरनाक बना देता है।

 

सबसे खास बात ये है कि वो पावरप्ले की आक्रामकता को मिडिल ओवर्स तक खींच ले जाते हैं। आधुनिक टी20 क्रिकेट में यही सबसे बड़ी कला मानी जाती है।

 

 

 2. कप्तानी में शांत दिमाग, फैसलों में आक्रामक सोच

 

आईपीएल जैसी हाई-प्रेशर लीग में कप्तानी करना आसान नहीं होता, खासकर तब जब सामने विराट कोहली जैसी बड़ी मौजूदगी हो। लेकिन रजत पाटीदार ने पूरे सीजन जिस परिपक्वता से आरसीबी को संभाला, उसने सबको प्रभावित किया। आरसीबी का बैक-टू-बैक फाइनल में पहुंचना सिर्फ बल्लेबाजी का नहीं, बल्कि शानदार नेतृत्व का भी परिणाम है। रजत मैदान पर ज्यादा शोर नहीं मचाते, लेकिन उनके फैसले बहुत कुछ बोलते हैं। गेंदबाजी बदलाव हो या फील्ड सेटिंग, उन्होंने हर मौके पर मैच पढ़ने की क्षमता दिखाई।

 

टीम इंडिया फिलहाल ऐसे कप्तान की तलाश में है जो शांत भी हो और निडर भी। रजत दोनों बॉक्स टिक करते हैं। यही वजह है कि उन्हें “रेडीमेड कप्तानी विकल्प” कहा जा रहा है।

 

 

 

 3. बड़े मैचों के खिलाड़ी, दबाव में और खतरनाक

 

हर खिलाड़ी लीग मैचों में रन बना सकता है, लेकिन असली सुपरस्टार वही होता है जो नॉकआउट में चमके। रजत पाटीदार बार-बार यही साबित कर चुके हैं।

 

IPL 2022 Eliminator में उन्होंने लखनऊ सुपर जायंट्स के खिलाफ 54 गेंदों में नाबाद 112 रन ठोके थे। उस पारी ने पहली बार पूरे देश को एहसास कराया था कि आरसीबी को एक एक्स-फैक्टर बल्लेबाज मिल चुका है। अब आईपीएल 2026 के क्वालिफायर में 33 गेंदों में 93 रन की विस्फोटक पारी ने साबित कर दिया कि 2022 कोई फ्लूक नहीं था। जब मंच बड़ा होता है, तब रजत का खेल और बड़ा हो जाता है। यही वो क्वालिटी है जो किसी खिलाड़ी को सिर्फ अच्छा बल्लेबाज नहीं, बल्कि मैच विनर और लीडर बनाती है।

 4. स्पिन के खिलाफ भारत का सबसे बड़ा हथियार

 

मौजूदा समय में भारतीय बल्लेबाज विदेशी स्पिनर्स के खिलाफ संघर्ष करते नजर आते हैं। लेकिन रजत पाटीदार की सबसे बड़ी ताकत ही स्पिन अटैक को तहस-नहस करना है। वो फ्रंट फुट पर निकलकर छक्के मारते हैं, बैकफुट पर कट खेलते हैं और मिडिल ओवर्स में रनरेट कभी गिरने नहीं देते।

धर्मशाला में कागिसो रबाडा की ऑफ स्टंप के बाहर पड़ी गुड लेंथ गेंद को कवर स्टैंड के ऊपर पहुंचाना उनकी रेंज और आत्मविश्वास दिखाने के लिए काफी था।

 

टी20 क्रिकेट अब सिर्फ तकनीक का नहीं, इंटेंट का खेल बन चुका है। और रजत का इंटेंट हर गेंद पर दिखाई देता है।

 

 अब और इंतजार क्यों?

 

रजत पाटीदार कोई “वन सीजन वंडर” नहीं हैं।

वो भारत के लिए टेस्ट (3) और वनडे (1) खेल चुके हैं। घरेलू क्रिकेट में मध्य प्रदेश को रणजी ट्रॉफी जिताने में बड़ी भूमिका निभा चुके हैं। आईपीएल में लगातार असर छोड़ रहे हैं। कप्तानी का अनुभव भी है और बड़े मैचों का टेंपरामेंट भी। सूर्यकुमार यादव ने भारतीय टी20 क्रिकेट को नई दिशा दी, लेकिन अब टीम इंडिया को अगले टी20 वर्ल्ड कप और ओलंपिक साइकल के लिए नया चेहरा तैयार करना होगा।

 

और अगर मौजूदा फॉर्म, कप्तानी, मैच-विनिंग क्षमता और दबाव झेलने की ताकत को देखा जाए…

तो शायद भारतीय क्रिकेट के पास जवाब पहले से मौजूद है

 

नाम है… रजत पाटीदार।

अमेरिका और ईरान युद्ध दोबारा भड़का तो क्या होगा?

अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल को लागू हुआ युद्धविराम फिलहाल बना हुआ है, लेकिन शाब्दिक नोक-झोंक और पूर्ववत तनावों के बीच उनकी बातचीत में प्रगति के संकेत भी मिल रहे हैं।

 

अमेरिकी न्यूज़ पोर्टल एक्सिओस (Axios) के अनुसार, सबसे नई प्रगति यह है कि एक 'समझौता ज्ञापन' (मेमोरैंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग) दोनों देशों के बीच विवाद के सभी प्रमुख मुद्दों को संबोधित करता है। वह कथित तौर पर सभी तरह की शत्रुता को अस्थायी रूप से रोकने तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से संबंधित है। ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाना और अमेरिका द्वारा ज़ब्त ईरानी संपत्तियों को मुक्त करना भी कथित तौर पर चर्चा का विषय है।

 

अमेरिकी के सूत्रों के अनुसार, आशा है कि ईरान युद्धविराम की अवधि के दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाज़ों के गुज़रने में मदद करेगा। कोई टोल (शुल्क) नहीं लिया जाएगा। जहाज़ों का यातायात जल्द ही 'युद्ध-पूर्व के स्तर' पर लौट जाएगा। किंतु, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि यह युद्धविराम कितने समय तक चलेगा। अमेरिकी सूत्रों ने 60 दिनों की अवधि की बात कही है। हालांकि, ईरानी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने सरकारी टेलीविज़न पर '30 से 60 दिनों की अवधि' का ज़िक्र किया।

ईरान बारूदी सुरंगें हटाने के लिए भी तैयार 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बिछाई गई बारूदी सुरंगें हटाने के लिए भी तैयार है। इसके बदले में, अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगी अपनी नाकेबंदी हटा सकता है और ईरान को बिना किसी रोक-टोक के तेल निर्यात करने की अनुमति दे सकता है। किंतु, इस बारे में ईरान से आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएं भी आई हैं। वहां की समाचार एजेंसी 'फ़ार्स' ने लिखा कि ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुज़रने वाले जहाज़ों की संख्या को युद्ध-पूर्व स्तर पर वापस लाने पर सहमति जताई तो है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि युद्ध से पहले जैसी 'मुक्त आवाजाही' की स्थिति फिर से बहाल हो गई है। इसलिए, ट्रंप के बयान को 'अधूरा' माना जा रहा है और कहा जा रहा है कि वह वास्तविकता को नहीं दर्शाता।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य

ईरान ने कथित तौर पर वादा किया है कि वह कभी भी परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा। किंतु, उसके यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को निलंबित करने के संबंध में बातचीत अभी होनी है। अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का भंडार भी चर्चा का विषय है; उसे ईरान से संभवतः हटाया जा सकता है। इसके बदले में, अमेरिका ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने और उस की संपत्तियों को मुक्त करने की बात कही है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने 'कुछ प्रगति' की बात करते हुए, बहुत सावधानी भरी आशावादिता का स्वर अपनाया। उन्होंने संकेत दिया कि वे संभवतः कुछ ही दिनों के भीतर कोई सही घोषणा कर पाएंगे।

 

दूसरी ओर, अमेरिका में टेक्सास राज्य के रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज़ ने X पर लिखाः अगर इसका नतीजा 'एक ऐसा ईरानी शासन देखने में आता है— जिसका नेतृत्व अभी भी वे इस्लामी कट्टरपंथी ही कर रहे हैं जो ''अमेरिका का नाश हो'' के नारे लगाते हैं— और जिसे अब अरबों डॉलर मिलते हैं, जो यूरेनियम को समृद्ध करने और परमाणु हथियार बनाने में सक्षम है और जो होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर प्रभावी रूप से नियंत्रण रखता है, तो यह एक विनाशकारी ग़लती होगी।' 

ईरानी राष्ट्रपति को अमेरिका पर विश्वास नहीं

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने यथासंभव कूटनीतिक समाधान के प्रति अपनी तत्परता दिखाई, लेकिन उन्होंने वाशिंगटन के प्रति तेहरान के गहरे अविश्वास पर ज़ोर भी दिया। उन्होने कहा, 'हम बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन अमेरिका के साथ पिछली वार्ताओं के अनुभवों ने हमें अत्यधिक सावधानी बरतने पर मज़बूर कर दिया है।'

 

ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के महीनों बाद भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) अभी भी बंद है। 'समझौता ज्ञापन' वाला समाचार आने से दो ही दिन पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का कहना था कि ईरान के साथ बातचीत उम्मीद से कहीं ज़्यादा मुश्किल साबित हो रही है। यदि कोई समझौता हो भी जाता है, तब भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य को निरापद बनाने के अभियान के समय अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की ज़रूरत पड़ेगी।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य लिए एक 'प्लान B' की वकालत

स्वीडन के हेलसिंगबोर्ग नगर में 22 मई को हुई नाटो (NATO) के विदेश मंत्रियों की बैठक में बोलते हुए, मार्को रूबियो ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए एक 'प्लान B' की वकालत की। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ ऐसे किसी भी समझौते का, जिसमें इस जलडमरूमध्य को — जो वैश्विक तेल और गैस बाज़ार के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण जलमार्ग है— फिर से खोलने का प्रावधान हो, हर कोई स्वागत ही करेगा। लेकिन, ईरान यदि इस जलडमरूमध्य को फिर से खोलने से इनकार कर देता है और उस पर अपना नियंत्रण बनाए रखने तथा वहां से गुज़रने के लिए टोल (शुल्क) लगाने पर अड़ा रहता है— तो एक 'प्लान B' की ज़रूरत पड़ेगी।

 

अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो ने बताया कि फ्रांस और ब्रिटेन के नेतृत्व वाला एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन, वर्तमान टकराव खत्म होने के बाद के लिए एक संभावित नौसैनिक मिशन की तैयारी कर रहा है। साथ ही उनका कहना था कि 'तब भी हमें एक 'प्लान B' की ज़रूरत है, यदि कोई गोलीबारी शुरू कर दे, तो ऐसी स्थिति में आप जलडमरूमध्य को फिर से कैसे खोलेंगे?' उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि यह ज़रूरी तौर पर नाटो (NATO) का एक मिशन होना चाहिए या नहीं, 'लेकिन इसमें निश्चित रूप से वे नाटो देश शामिल होंगे जो अपना योगदान देने में सक्षम हैं।'

 

रूबियो ने स्वीडन वाले अपने वक्तव्य में इस बात पर ज़ोर दिया कि अमेरिका अपने सहयोगियों की मदद पर निर्भर नहीं है। उनके शब्दों में, 'संयुक्त राज्य अमेरिका यह कर सकता है, लेकिन कुछ ऐसे देश भी हैं जिन्होंने इस तरह के काम में संभावित रूप से हिस्सा लेने में दिलचस्पी दिखाई — ऐसी नौबत यदि सचमुच आती है।' उन्होंने किसी खास देश का नाम नहीं लिया।

Nato

होर्मुज़ जलडमरूमध्य का खुलना विवाद का विषय

अमेरिका और ईरान के बीच इस समय रुकी हुई बातचीत में होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलना उनके बीच विवाद के मुख्य बिंदुओं में से एक है। युद्ध शुरू होने के बाद, ईरान ने धमकियां देकर और तेलवाही टैंकरों तथा मालवाही जहाज़ों पर गोलाबारी करके इस जलडमरूमध्य से होकर जहाज़ों की आवाजाही को काफी हद तक बंद कर दिया है। इसके जवाब में, अमेरिका ने भी अपनी तरफ से ईरानी बंदरगाहों की तरफ जहाजों की आवाजाही रोक रखी है।

 

इस दोहरी नाकेबंदी के अलवा, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से हो कर जहाज़ों का आना-जाना तब तक इसलिए भी ख़तरे से खाली नहीं होगा, जब तक ईरान द्वारा जलडमरूमध्य की तलहटी में बिछाई गई विस्फोटक सुरंगों को ढूंढ-ढूंढ कर नष्ट नहीं कर दिया जाता। अमेरिका के लिए यह एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा बन गया है। दैनिक 'द टेलीग्राफ़' के अनुसार, अमेरिकी नौसेना, ईरान द्वारा बिछाई गई समुद्री सुरंगों को हटाने में अभी शायद सक्षम नहीं है— न तो तेज़ी से और न ही अकेले। इस काम में यूरोपीय देशों के सहयोग की भी एक प्रमुख भूमिका हो सकती है।

अनगिनत बारूदी सुरंगें, हटाने में छह महीने लग सकते हैं

'द टेलीग्राफ़' के अनुसार, ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य की तलहटी में 'महाम,' 'सदाफ़,' 'MDM,' और 'EM-52' आदि नाम वाली अनगिनत बारूदी सुरंगें फैला रखी हैं। अमेरिकी कांग्रेस (संसद) को बंद दरवाज़े के पीछे दी गई एक ब्रीफ़िंग में, पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) ने कथित तौर पर कहा कि इन सुरंगों को हटाने के अभियान में छह महीने तक का समय लग सकता है।

 

'द टेलीग्राफ़' के अनुसार, अमेरिकी नौसेना के पूर्व अधिकारी केविन आयर ने कहा, 'लगभग 518 वर्ग किलोमीटर का इलाका साफ़ करना होगा। यह बहुत बड़ा समुद्री विस्तार है।' इससे पता चलता है कि ऐसा कोई अभियान कितना जटिल और जोखिम भरा होगा। जिन नौसैनिक जहज़ों की सहायता से यह काम करना होगा, उनका अभी तक असली युद्ध की परिस्थितियों में परीक्षण तक नहीं हुआ है। एक अंदरूनी सूत्र ने 'द टेलीग्राफ' को बताया: 'गठबंधन के भीतर क्षमताओं का सबसे बड़ा हिस्सा यूरोपीय देशों के पास है।'

अमेरिका के लिए यूरोपीय समर्थन

अतीत के रूस-अमेरिकी 'शीत युद्ध' वाले समय के बाद के दौर में अमेरिका ने मुख्य रूप से विमान वाहक जहाज़ों, पनडुब्बियों और विध्वंसक जहाज़ों पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि कई यूरोपीय देशों ने बारूदी सुरंगों का पता लगाने की अपनी विशेष क्षमताओं को बनाए रखा। 'द टेलीग्राफ' के अनुसार, जर्मनी बारूदी सुरंगों का पता लगाने वाले अपने जहाज़ 'फुल्दा' को पहले ही तैनात कर चुका है। बताया जा रहा है कि ब्रिटेन भी स्वचालित बारूदी सुरंग-खोजी जहाज़ और गोताखोर उपलब्ध करा रहा है, जबकि इटली बारूदी सुरंगें हटाने वाले जहाज़ भेज रहा है।

 

रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका के दो जहाज— यूएस पायोनियर और यूएस चीफ़— पहले ही फ़ारस की खाड़ी की ओर रवाना हो चुके हैं। हालांकि, वहां पहुंचने के बाद उन्हें काफ़ी मदद की ज़रूरत पड़ सकती है। माना जाता है कि बारूदी सुरंगों संबंधी किसी संभावित सफ़ाई अभियान की स्थिति में अमेरिका अपने यूरोपीय सहयोगी देशों के साथ मिलकर ही कोई कदम उठाएगा।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी IEA की चेतावनी

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ उपयोगी बातचीत की आशा में उस पर नए हमलों को फिलहाल रोक रखा है। यदि फिर से युद्ध भड़का तो कच्चे तेल की कीमतों में विस्फोटक बढ़ोतरी होनी तय है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने कहा है कि ज़रूरत पड़ने पर वह और अधिक तेल-भंडारों से तेल जारी करने के लिए तैयार है, लेकिन दीर्घकालिक नुकसान से बचने के लिए हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को जल्द खोलना भी बेहद ज़रूरी है।

 

ईरान के भौगोलिक नियंत्रण वाले इस 21 किलोमीटर चौड़े जलमार्ग के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा है। IEA ने चेतावनी दी कि यदि हॉर्मुज जलडरूमध्य दोबारा नहीं खुला या ऊर्जा निर्यात के वैकल्पिक रास्ते नहीं बनाए गए, तो दुनिया तेल की आपूर्ति के और भी बड़े संकट में फंस सकती है।

वैश्विक ऊर्जा संकट की सबसे गंभीर चेतावनी

ऐसे में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने वैश्विक ऊर्जा संकट को लेकर अब तक की सबसे गंभीर चेतावनी जारी की है। एजेंसी के प्रमुख फ़ेथ बिरोल ने कहा है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुज़रने वाला यातायात ठप होने से दुनिया के बाजारों से प्रतिदिन करीब 1.4 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति कम हो गई है। वैश्विक तेल भंडार तेजी से घट रहे हैं। मार्च में IEA और उसके 32 सदस्य देशों ने रिकॉर्ड 40 करोड़ बैरल तेल बाज़ार में जारी किया था, लेकिन अब ये भंडार भी लगभग ख़त्म होने की स्थिति में पहुंच गए हैं। फ़ेथ बिरोल ने चेतावनी दी कि हालत यदि सुधरी नहीं, तो जुलाई तक वैश्विक तेल बाज़ार ख़तरे की घंटी वाले ''रेड ज़ोन'' में पहुंच सकता है।

 

''रेड ज़ोन'' का अर्थ ऐसी स्थिति है, जब वैश्विक तेल आपूर्ति मांग के दबाव को संभालने में असमर्थ हो जाए। यानी, तेल भंडार इतने कम हो जाएं कि कोई भी अतिरिक्त बाधा आपूर्ति संकट और कीमतों में तेज़ उछाल पैदा कर दे। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें फिलहाल 104 से 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी हैं, जबकि ईरान युद्ध शुरू होने से पहले यह क़रीब 72 डॉलर प्रति बैरल थी। बिरोल पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि वर्तमान तेल संकट 1973, 1979 और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान आए तेल संकटों से भी ज्यादा गंभीर है। उन्होंने कहा कि वैश्विक बाजार से प्रतिदिन 1.4 करोड़ बैरल तेल पहले ही ग़ायब हो चुका है।

दोबारा युद्ध भड़का तो क्या होगा?

मई की शुरुआत में कच्चे तेल की क़ीमतें 114 डॉलर तक पहुंची थीं। यदि युद्ध दोबारा भड़का तो क़ीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। IEA के अनुसार, 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान 18.27 करोड़ बैरल तेल जारी किया गया था, लेकिन इस बार 40 करोड़ बैरल जारी करने के बावजूद संकट काबू में नहीं आ रहा है। बिरोल ने कहा कि इस भयावः स्थिति का सबसे अधिक असर गरीब देशों पर पड़ेगा, ख़ासकर अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में तो खाद्य संकट तक पैदा हो सकता है! कहने की आवश्यकता नहीं कि तब भारत में भी कुहराम मच जायेगा। किंतु, प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक अंध विरोधी तब भी तेल के अकाल के लिए उन्हें ही दोषी ठहराएंगे।