आसमान में बादलों की लुकाछिपी और मानसून की लेटलतीफी ने इस बार इंदौर के घरों में भोजन का स्वाद बिगाड़ कर रख दिया है। बारिश में देरी का सीधा असर अब लोगों के किचन पर दिखने लगा है, जहां हरी सब्जियों के आसमान छूते दामों ने गृहिणियों का बजट पूरी तरह झुलसा दिया है।
चोइथराम और निरंजनपुर मंडी में बाहरी आवक कम होने के कारण जो टमाटर कुछ दिन पहले आम आदमी की थाली का हिस्सा था, वह अब 'लाल' होकर तेवर दिखा रहा है। वहीं गिलकी, लौकी और तुरई जैसी आम सब्जियां भी अब आम नहीं रहीं, बल्कि मंडियों से लेकर कॉलोनियों के ठेलों तक खूब भाव खा रही हैं।
क्या कहती हैं इंदौर की गृहिणियां?
सब्जियों के इस तीखे तेवर पर शहर की महिलाओं का दर्द साफ छलक रहा है: साकेत नगर में रहने वाली अल्पना जोशी ने बताया कि मानसून की देरी ने तो रसोई का पूरा बजट ही बिगाड़ दिया है। पहले लगता था कि हरी सब्जियां सेहत और जेब दोनों के लिए अच्छी हैं, लेकिन अब तो लौकी और गिलकी जैसी साधारण सब्जियां भी वीआईपी हो गई हैं। 20-30 किलो मिलने वाला टमाटर अब सीधा 60 के पार जा रहा है। समझ नहीं आता कि थाली में रंग कहां से लाएं।
महालक्ष्मी नगर की निवासी रीना शर्मा ने बताया कि मंडी में आवक इतनी कम है कि ताजी सब्जी ढूंढना मुश्किल हो रहा है, और जो मिल रही है, उसके दाम सुनकर ही पसीना आ जाता है। दालें पहले ही महंगी थीं, अब सब्जी भी हाथ से निकल रही है। अगर एक-दो हफ्ते और पानी नहीं गिरा, तो किचन संभालना भारी पड़ जाएगा। अब तो तड़के में टमाटर डालना भी एक लग्जरी जैसा लगने लगा है।
आसमान छू रहे सब्जियों के दाम : बता दें कि भीषण गर्मी और मानसून में हो रही देरी ने मध्यप्रदेश में आम जनजीवन को बुरी तरह से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इस मौसमी संकट की सबसे सीधी गाज रसोई के बजट पर गिरी है, जिससे हरी सब्जियों की आवक में भारी कमी आई है और उनके दाम आसमान छूने लगे हैं। मंडियों में गिलकी, लौकी, टमाटर, पालक और बैंगन जैसी रोजमर्रा की सब्जियों की आवक बहुत कम हो गई है, जिसके चलते बाजार में कीमतों का ग्राफ लगातार ऊपर चढ रहा है।
टमाटर महंगा, गिलकी-लोकी-पालक दिखा रहे आंख : चोइथराम मंडी के सब्जी व्यापारी अंकित शर्मा ने बताया कि सब्जियों की महंगाई का सबसे गहरा असर टमाटर पर देखने को मिल रहा है, जिसकी कीमतें अचानक बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं। रिटेल बाजारों में टमाटर की कीमतें 60 रुपए प्रति किलोग्राम के स्तर को छू चुकी हैं, जिससे मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों की थाली से टमाटर पूरी तरह गायब होने की कगार पर पहुंच गया है। टमाटर के साथ-साथ बाजार में गिलकी 60 रुपए, लौकी 40 से 50 रुपए, पालक 40 से 50 रुपए और बैंगन भी 60 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहे हैं।
सब्जियां सूखने से आवक भी प्रभावित हुई : दरअसल, इस महंगाई के पीछे मुख्य कारण पड़ोसी राज्यों से होने वाली सप्लाई का ठप हो जाना भी है। ग्रीष्मकाल के इस विशेष सीजन में मध्यप्रदेश के मालवा निमाड़ सहित अन्य प्रमुख हिस्सों में राजस्थान से भारी मात्रा में सब्जियां आती हैं, लेकिन इस साल भीषण तपिश के कारण कई इलाकों में सब्जियों की फसलें अपने निर्धारित समय से एक सप्ताह पहले ही पूरी तरह सूखकर समाप्त हो गई हैं। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि राजस्थान से प्रदेश की बड़ी मंडियों में आने वाले मालवाहक वाहनों के पहिए पूरी तरह थम गए हैं।
महाराष्ट्र के भरोसे इंदौर की मंडियां : बता दें कि राजस्थान की तरफ से आवक नहीं होने से मध्यप्रदेश की थोक मंडियां अब पूरी तरह से महाराष्ट्र की फसलों के भरोसे टिक गई हैं। मौजूदा समय में इंदौर सहित कई अन्य बड़े शहरों में महाराष्ट्र के कन्नड़, चालीसगांव, संभाजी नगर और कलवन जैसे क्षेत्रों से सब्जियां मंगवाई जा रही हैं। साथ ही महाराष्ट्र में पड़ रही रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने सब्जियों के पौधों को झुलसा कर रख दिया है, जिसके कारण वहां भी कुल उत्पादन अपने न्यूनतम स्तर पर आ चुका है।
इंदौर के सब्जी व्यापारियों की जुबानी मंडी का हाल
पानी की कमी से फसलें खेतों में ही झुलस गई : आढ़तिया व थोक व्यापारी, चोइथराम मंडी रमेश यादव कहते हैं कि इस बार मानसून की लेटलतीफी ने पूरा गणित बिगाड़ दिया है। लोकल बेल्ट (इंदौर के आसपास के ग्रामीण इलाकों) से जो गिलकी, लौकी और तुरई की आवक जून के इस हफ्ते तक भरपूर हो जाती थी, वो इस बार आधी भी नहीं है। गर्मी और पानी की कमी से फसलें खेतों में ही झुलस गई हैं। आवक कम होने से थोक में ही दाम दोगुने हो चुके हैं, जिससे चिल्ला (रिटेल) बाजार तक पहुंचते-पहुंचते ये सब्जियां आम जनता की पहुंच से बाहर हो रही हैं।
भाड़ा बढ़ने और माल की किल्लत : सब्जी सप्लायर व व्यापारी, निरंजनपुर मंडी सतीश पाटीदार ने बताया कि इंदौर में टमाटर का सबसे बड़ा सहारा दूसरे राज्यों (जैसे महाराष्ट्र और कर्नाटक) की सप्लाई होती है। लेकिन वहां भी मौसम की मार के कारण इस बार गाड़ियां बहुत कम आ रही हैं। जो टमाटर की गाड़ियां पहले रोज इंदौर पहुंचती थीं, उनकी संख्या अब आधी रह गई है। भाड़ा बढ़ने और माल की किल्लत के कारण टमाटर मंडियों में ही 'लाल' हो रहा है। जब तक अच्छी बारिश नहीं होती और नई खेप नहीं आती, तब तक दामों में नरमी की उम्मीद कम ही है।
Edited By: Naveen R Rangiyal

