
भारत में मानसून की बदलती प्रकृति को लेकर वैज्ञानिकों ने एक नया और महत्वपूर्ण खुलासा किया है। अब तक भारतीय मानसून पर एल नीनो (El Niño) के प्रभाव को सबसे अहम माना जाता था, लेकिन एक नए अध्ययन में पाया गया है कि उत्तर अटलांटिक महासागर में मौजूद एक विशाल ठंडा समुद्री क्षेत्र, जिसे ‘कोल्ड ब्लॉब’ (Cold Blob) कहा जाता है, भी भारतीय मानसून को प्रभावित करने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।
ALSO READ: Electric Scooter खरीदने से पहले 14 जरूरी बातें जो आपके लिए जानना जरूरी
एक्सपर्ट्स के मुताबिक पिछले दो दशकों में भारतीय मानसून के पैटर्न में आए बदलावों के पीछे केवल प्रशांत महासागर की घटनाएं ही नहीं, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर स्थित अटलांटिक महासागर की गतिविधियां भी जिम्मेदार हो सकती हैं।
क्या है ‘कोल्ड ब्लॉब’?
अध्ययन के अनुसार, ग्रीनलैंड के दक्षिण में उत्तर अटलांटिक महासागर का एक बड़ा हिस्सा सामान्य से अधिक ठंडा बना हुआ है, जिसे वैज्ञानिक कोल्ड ब्लॉब कहते हैं। यह समुद्री क्षेत्र वैश्विक जलवायु प्रणाली को प्रभावित करता है और इसके असर दूरदराज के क्षेत्रों तक महसूस किए जा सकते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह ठंडा क्षेत्र भारतीय मानसून की तीव्रता और उसके व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।
ALSO READ: Telegram vs WhatsApp : कौन-सा मैसेजिंग ऐप है बेहतर और दोनों में क्या है अंतर?
मानसून के पूर्वानुमान में बढ़ सकती है सटीकता
यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका AGU Advances में प्रकाशित हुआ है। इसमें बताया गया है कि जब वैज्ञानिकों ने जलवायु मॉडल में कोल्ड ब्लॉब के प्रभाव को शामिल किया, तो भारतीय मानसून के पूर्वानुमान पहले की तुलना में अधिक सटीक पाए गए। अध्ययन के मुताबिक मानसून को प्रभावित करने वाली यह प्रक्रिया वातावरण और महासागर के बीच जटिल अंतःक्रियाओं से जुड़ी है।
‘बारोट्रॉपिक गवर्नर मैकेनिज्म’ की भूमिका
वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को “बारोट्रॉपिक गवर्नर मैकेनिज्म” नाम दिया है। सरल शब्दों में कहें तो यह एक ऐसी जलवायु प्रणाली है, जो समुद्र की सतह के तापमान और वायुमंडलीय परिसंचरण के बीच संबंध स्थापित कर मौसम के पैटर्न को प्रभावित करती है।
भारत ही नहीं, दुनिया के अन्य क्षेत्रों पर भी असर
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस खोज का महत्व केवल भारतीय मानसून तक सीमित नहीं है। इससे दुनिया के अन्य क्षेत्रों में मौसम और वर्षा के पूर्वानुमान को बेहतर बनाने में भी मदद मिल सकती है।
एक अरब से अधिक लोगों पर पड़ता है मानसून का असर
दक्षिण एशिया में एक अरब से अधिक लोगों की आजीविका और आर्थिक गतिविधियां मानसून पर निर्भर हैं। ऐसे में मानसून के पूर्वानुमान को अधिक सटीक बनाना कृषि, जल प्रबंधन और आपदा तैयारी के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि भविष्य के जलवायु मॉडल अटलांटिक महासागर के इस “कोल्ड ब्लॉब” और भारतीय मानसून के बीच संबंध को बेहतर ढंग से समझ सकें, तो मानसून की भविष्यवाणी पहले से कहीं अधिक विश्वसनीय हो सकती है।
IMD ने बताया कहा हो सकती है बारिश
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 लगातार आगे बढ़ रहा है। वर्तमान में मानसून की उत्तरी सीमा से होकर गुजर रही है। मौसम विभाग ने बताया कि आगामी दिनों में मानसून के और आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल बनी हुई हैं। अनुमान है कि 23 जून 2026 के आसपास दक्षिण-पश्चिम मानसून महाराष्ट्र, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और बिहार के कुछ और हिस्सों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों में भी आगे बढ़ सकता है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, मानसून की इस प्रगति से इन राज्यों में बारिश की गतिविधियों में बढ़ोतरी होने की संभावना है, जिससे किसानों को राहत मिलेगी और खरीफ फसलों की बुवाई को गति मिल सकती है।
7 राज्यों में पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार
देश के कई हिस्सों में लोग भीषण गर्मी से परेशान हैं। ऐसे में मानसून की आगे बढ़त से तापमान में गिरावट और मौसम में राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। IMD लगातार मानसून की स्थिति पर नजर बनाए हुए है और समय-समय पर अपडेट जारी कर रहा है। मानसून में देरी के बीच मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र और ओडिशा के कई शहरों में बुधवार को पारा 40°C से ज्यादा रहा। देश में सबसे ज्यादा पारा उत्तर प्रदेश के बांदा में 43.2°C दर्ज किया गया। महाराष्ट्र के ब्रह्मपुरी में 42.3°C, ओडिशा के बौध में 42.8°C, छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में 41.6°C, झारखंड के डाल्टनगंज में 42°C, बिहार के छपरा में 41.6°C और मध्यप्रदेश के खजुराहो 41.4°C रहा। Edited by : Sudhir Sharma

