फ्रांस में चल रहे G7 शिखर सम्मेलन के दौरान नेताओं की अनौपचारिक बातचीत माइक्रोफोन में रिकॉर्ड हो गई। इन नेताओं को सिगरेट, फुटबॉल, तोहफों जैसी बातों पर हल्के-फुल्के मजाक करते हुए सुना गया। इन सबमें से इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की सिगरेट छोड़ देने वाली बातचीत की खूब चर्चा हो रही है। दरअसल, बैठक शुरू होने से पहले मेलोनी ने नेताओं से बातचीत में कहा कि आज उन्होंने 3 कप कॉफी पी है। यह सुनकर यूरोपीय यूनियन की चीफ उर्सला वॉन डेर लेयेन ने चौंकते हुए पूछा- क्या आज सुबह, उठने के लिए? इस पर जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्त्ज ने मजाक में कहा- और सिगरेट कितनी पी? मेलोनी ने इससे इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने एक महीने से सिगरेट नहीं पी है। यह सुनते ही कनाडा, ब्रिटेन, जापान और यूरोपीय संघ के नेताओं ने उन्हें बधाई दी। मेलोनी ने खुशी में दोनों हाथ उठा दिए। इसके बाद कनाडाई PM मार्क कार्नी ने मजाकिया अंदाज में अपने हाथ की ओर इशारा कर पूछा, क्या आपने निकोटिन पैच लगाया है? इस पर आसपास मौजूद लोग हंस पड़े। निकोटिन पैच शरीर की त्वचा पर लगाया जाता है। यह धीरे-धीरे शरीर में थोड़ी मात्रा में निकोटिन पहुंचाता है, जिससे सिगरेट, बीड़ी या तंबाकू छोड़ने वाले लोगों को उसकी तलब कम लगती है और छोड़ने में आसानी होती है। इस बातचीत से जुड़ी 4 मोमेंट देखिए G7 में नेताओं की और भी मजेदार बातचीत सुनाई दी… मैक्रों ने फ्रांस फुटबॉल टीम का समर्थन किया अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको में चल रहे फीफा विश्व कप के बीच नेता खेलों पर चर्चा करते नजर आए। मैक्रों ने फ्रांस की टीम का समर्थन करते हुए कहा, अलेज ले ब्लू यानी आगे बढ़ो फ्रांस। एक नेता ने पेरिस सेंट-जर्मेन (PSG) क्लब की हालिया चैंपियंस लीग जीत की तारीफ की। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने भी केप वर्डे की टीम की सराहना की, जिसने मौजूदा विश्व चैंपियन स्पेन के खिलाफ 0-0 से ड्रॉ खेला था। स्टार्मर ने कहा, यह वास्तव में हैरान करने वाला प्रदर्शन था। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी फुटबॉल से इतर UFC मुकाबले का जिक्र किया। दरअसल, ट्रम्प के जन्मदिन 14 जून पर व्हाइट हाउस में UFC मुकाबला हुआ था। ट्रम्प ने इसके आयोजक डाना व्हाइट की खूब तारीफ की। ग्रीनलैंड का जिक्र करना नहीं भूले ट्रम्प समिट में एक रहस्यमय बातचीत भी रिकॉर्ड हुई। ट्रम्प यूरोपीय परिषद के चीफ एंटोनियो कोस्टा से बात कर रहे थे। बातचीत के दौरान ट्रम्प ने कहा, आप जानते होंगे। कुछ देर रुकने के बाद उन्होंने कोस्टा की तरफ देखते हुए कहा- ग्रीनलैंड। बातचीत का बाकी हिस्सा साफ नहीं सुनाई दिया। ट्रम्प की यह टिप्पणी इसलिए चर्चा में आ गई क्योंकि वह पहले भी कई बार डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा जता चुके हैं। उनके इस प्रस्ताव ने पिछले वर्षों में कई यूरोपीय नेताओं को नाराज किया था। हालांकि, इस बार ट्रम्प का क्या मतलब था, यह स्पष्ट नहीं हो सका। मैक्रों घड़ी ले जाना भूले तो ट्रम्प ने कहा- ये मुझे दे दो सम्मेलन के दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों अपनी घड़ी कहीं छोड़ गए। जब नेता दोपहर खाने के लिए जा रहे थे, तब कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा, मैक्रों अपनी घड़ी यहां छोड़ गए हैं। हमारे पास उनकी घड़ी है। इस पर ट्रम्प ने तुरंत मजाक करते हुए कहा, अगर उन्होंने छोड़ दी है तो मुझे दे दो। उनकी बात सुनकर वहां मौजूद लोग हंस पड़े। समिट में तोहफों का आदान-प्रदान भी हुआ। मैक्रों ने सभी G7 नेताओं को व्यक्तिगत साइकिल भेंट की। ट्रम्प को साइकिल मिलने पर कई लोगों ने हैरानी जताई क्योंकि वह गोल्फ को छोड़कर अन्य शारीरिक गतिविधियों और खासकर साइकिल चलाने में रुचि नहीं दिखाते। हालांकि उस समय पास में कोई माइक्रोफोन नहीं था, इसलिए उनकी बातें रिकॉर्ड नहीं हो सकी। जर्मन चांसलर मर्त्ज भी ट्रम्प के लिए एक खास तोहफा लेकर पहुंचे। उन्होंने ट्रम्प को जर्मनी की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम की जर्सी भेंट की, जिस पर ट्रम्प का नाम और 47 नंबर लिखा था। यह उनके अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति होने का संकेत था। ट्रम्प ने मुस्कुराते हुए जर्सी को कैमरों के सामने दिखाया और फोटो खिंचवाई। बाद में मर्त्ज ने इसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा करते हुए लिखा, आखिरकार हम एक ही टीम में हैं। मोदी से मेलोनी बोलीं- हम इंस्टाग्राम पर सबसे फेमस इसी बीच मोदी और इटालियन पीएम जॉर्जिया मेलोनी की बातचीत भी हुई। मेलोनी ने मोदी से कहा- दोबारा मिलकर अच्छा लगा, हम इंस्टाग्राम पर सबसे फेमस हैं। मोदी पिछले महीने 5 देशों के दौरे पर गए थे। जहां उन्होंने रोम में पीएम मेलोनी को मेलोडी टॉफी दी थी। जिसका वीडियो वायरल हो गया था। सम्मेलन के दौरान जब इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आमने-सामने आए। मेलोनी ने मुस्कुराते हुए मोदी से कहा, आपसे फिर मिलकर अच्छा लगा। बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने इंस्टाग्राम का जिक्र किया, जिस पर मेलोनी ने मजाकिया अंदाज में जवाब दिया, हां, हम इंस्टाग्राम पर सबसे ज्यादा मशहूर हैं। उनकी इस टिप्पणी पर आसपास मौजूद लोग हंस पड़े। मैक्रों ने जेलेंस्की और ट्रम्प की मुलाकात कराने की बात कही सभी बातचीत मजाकिया नहीं थीं। एक माइक्रोफोन में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की बातचीत भी रिकॉर्ड हुई। यूक्रेन युद्ध को लेकर ट्रम्प के साथ हुई पिछली बातचीत का जिक्र करते हुए मैक्रों ने जेलेंस्की से कहा, कल कैमरों के सामने हमारी एक मुश्किल बातचीत हुई थी। इसके बाद उन्होंने पूछा कि क्या जेलेंस्की की ट्रम्प के साथ अलग से कोई बैठक तय है। जब जेलेंस्की ने बताया कि वह अगले दिन ब्रसेल्स जाने वाले हैं, तो मैक्रों ने जवाब दिया, ठीक है, मैं इसकी व्यवस्था कर दूंगा। कार्नी ने ट्रम्प को चीन के साथ हुए समझौते के बारे में बताया एक और बातचीत में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और ट्रम्प चीन से जुड़े एक समझौते पर चर्चा करते सुनाई दिए। कार्नी ने बताया कि चीन की हालिया यात्रा के दौरान एक ऐसा समझौता हुआ है जिसके तहत कनाडा में सीमित संख्या में चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों के आयात की अनुमति होगी। ट्रम्प को यकीन दिलाने के लिए कार्नी ने कहा- यह हमारे बाजार का 3% से भी कम हिस्सा है, यानी लगभग 49 हजार कारें। हमने इस पर सख्त सीमा तय की है। मुझे लगा कि आपको यह पसंद आएगा। ट्रम्प ने कहा- यह अच्छा है, मुझे पसंद आया। ———————————– G7 समिट से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… मोदी 16 महीने बाद ट्रम्प से मिले:G–7 समिट में दोनों ने 5 मिनट बात की; मोदी से मेलोनी बोलीं- हम इंस्टाग्राम पर सबसे फेमस पीएम मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के बीच फ्रांस के एवियन शहर में G-7 समिट के दौरान मुलाकात हुई। दोनों के बीच करीब 5 मिनट तक बात हुई। मीटिंग में दोनों एक-साथ बैठे नजर आए। यह मुलाकात 16 महीनों के बाद हुई है। प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति G7 आउटरीच सेशन में भी साथ-साथ बैठे नजर आए। दोनों की पिछली मुलाकात फरवरी 2025 में व्हाइट हाउस में हुई थी। पूरी खबर पढ़ें
कानपुर में लव मैरिज के 9 साल बाद पत्नी ने प्रेमी के कहने पर पति की चाकू गोदकर हत्या कर दी। परिजनों के मुताबिक पत्नी से उसके प्रेमी ने फोन पर कहा था कि आज इसका काम तमाम कर दो। इसके बाद ही उसने ये खौफनाक कदम उठाया।
अस्पताल से लौटा तो फिर मारूंगी… ऐसा एक पत्नी ने अपने पति के लिए कहा। उसने अपने पति को चाकू से गोदा। इसके बाद पति का 11 दिन तक अस्पताल में इलाज चला। वहीं. 11 दिन बाद युवक की मौत हो गई। प्रेमी के लिए पत्नी ने पति की हत्या कर दी।
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने घोषणा की है कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों मिजोरम और मणिपुर में रहने वाले बेने मेनाशे समुदाय के सभी शेष सदस्यों को अगले चार वर्षों में इजराइल लाया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह समुदाय यहूदी लोगों का अभिन्न हिस्सा है और इजराइल उनका घर है। हाल ही में इजराइल के नोफ हा-गलील शहर में बसे भारतीय मूल के यहूदी प्रवासियों को संबोधित करते हुए नेतन्याहू ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मजबूत संबंधों के कारण दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष की शुरुआत से अब तक समुदाय के करीब 600 सदस्य इजराइल पहुंच चुके हैं। वर्ष 2026 के अंत तक लगभग 600 और लोगों के आने की उम्मीद है। बेने मेनाशे का अर्थ है “मनश्शे के पुत्र”। यह समुदाय मुख्य रूप से मिजोरम और मणिपुर में रहता है। समुदाय के लोग सबाथ का पालन, यहूदी त्योहारों का आयोजन, कोषेर भोजन परंपरा और अन्य यहूदी रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। वे स्वयं को इजराइल की “दस खोई हुई जनजातियों” में से एक मनश्शे जनजाति का वंशज मानते हैं, जिसे लगभग 2,700 वर्ष पहले असीरियाई साम्राज्य ने निर्वासित कर दिया था। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी अन्य बड़ी खबरें… पाकिस्तान में सैनिटरी पैड और गर्भनिरोधक प्रोडक्ट्स पर 18% टैक्स खत्म करेगा पाकिस्तान सरकार सैनिटरी पैड और गर्भनिरोधक प्रोडक्ट्स पर लगने वाला 18% सेल्स टैक्स खत्म करने की तैयारी कर रही है। पिछले हफ्ते पेश किए गए बजट में सरकार ने टैक्स हटाने का प्रस्ताव रखा था। पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने कहा कि सैनिटरी प्रोडक्ट्स महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और सामाजिक जीवन में उनकी भागीदारी के लिए बेहद जरूरी हैं। इसके पीछे उन्होंने देश की तेजी से बढ़ती आबादी को वजह बताया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान आबादी के मामले में दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा देश है और परिवार नियोजन सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। यूनिसेफ के अनुसार पाकिस्तान में केवल 12% महिलाएं और लड़कियां ही बाजार में मिलने वाले सैनिटरी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करती हैं। बाकी महिलाएं कपड़े या घर में तैयार किए गए अन्य विकल्पों का सहारा लेती हैं। यूनिसेफ के मुताबिक स्थानीय और अन्य टैक्स को जोड़ने के बाद पाकिस्तान में महिलाओं को सैनिटरी प्रोडक्ट्स खरीदने के लिए करीब 40% अतिरिक्त टैक्स चुकाना पड़ता है। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और कमजोर वर्ग की महिलाओं पर पड़ता है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार 2025 के मध्य तक पाकिस्तान की लगभग 45% आबादी प्रतिदिन 4.20 डॉलर (करीब 1,175 पाकिस्तानी रुपए) की आय वाली निम्न-मध्यम आय गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिता रही थी।
वहीं एक पैकेट में मिलने वाले 10 सैनिटरी पैड की कीमत औसतन एक दिन की कमाई के एक-तिहाई से भी ज्यादा होती है। कई मामलों में एक पैकेट पूरे महीने के लिए पर्याप्त भी नहीं होता। अमेरिका में स्काइडाइविंग विमान हादसा: भारतीय टेक प्रोफेशनल समेत 12 की मौत
अमेरिका के मिसौरी राज्य में स्काइडाइविंग के लिए इस्तेमाल होने वाला एक विमान रविवार सुबह टेकऑफ के तुरंत बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया। हादसे में 24 वर्षीय भारतीय टेक प्रोफेशनल साई कार्तिक वर्मा दतला समेत सभी 12 लोगों की मौत हो गई। यह दुर्घटना बेट्स काउंटी स्थित बटलर मेमोरियल एयरपोर्ट के पास हुई। अधिकारियों के मुताबिक, स्काइडाइव कैनसस सिटी द्वारा संचालित पैसिफिक एयरोस्पेस P750XL विमान उड़ान भरने के कुछ देर बाद वापस लौटने की कोशिश करता दिखाई दिया। इसके बाद विमान एयरपोर्ट के नजदीक एक खेत में गिर गया और टक्कर के साथ उसमें आग लग गई। हादसे में विमान में सवार सभी लोगों की मौत हो गई। साई कार्तिक वर्मा दतला कैनसस सिटी क्षेत्र में कार्यरत भारतीय टेक प्रोफेशनल थे। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट्रल मिसौरी से पढ़ाई की थी और हेल्थकेयर टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम कर रहे थे। उनकी विशेषज्ञता क्लाउड कंप्यूटिंग, डेवऑप्स इंजीनियरिंग और आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर में थी। हादसे में यूनाइटेड स्टेट्स पैराशूट एसोसिएशन की टेक्नोलॉजी डायरेक्टर जेन शार्प, संगीत शिक्षक डेव हर्शबर्गर, कैंसर सर्वाइवर और अनुभवी स्काइडाइवर मैथ्यू स्वोप, वीडियोग्राफर डस्टिन मैककिनी, प्रशिक्षक बनने की तैयारी कर रहे विल फिशर समेत कई अनुभवी स्काइडाइवर्स और प्रशिक्षकों की भी मौत हुई। वियतनाम में बिल्ली तस्करी गिरोह का भंडाफोड़: कैट-मीट बाजार में बेचने की थी तैयारी
वियतनाम के हो ची मिन्ह सिटी में पुलिस ने पालतू बिल्लियों की चोरी और तस्करी करने वाले बड़े गिरोह का भंडाफोड़ किया है। कार्रवाई में 400 से ज्यादा जिंदा बिल्लियों को बचाया गया, जिन्हें अवैध कैट-मीट बाजार में बेचने के लिए वधशालाओं तक पहुंचाने की तैयारी थी। मामले में नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया है। आरोपियों ने पूछताछ में स्वीकार किया कि वे पिछले तीन वर्षों से इस नेटवर्क का संचालन कर रहे थे। पालतू जानवरों की चोरी की लगातार मिल रही शिकायतों के आधार पर पुलिस ने गिरोह के सप्लाई नेटवर्क का पता लगाया और एक वितरण केंद्र पर छापा मारा। छापेमारी के दौरान 400 से अधिक जिंदा बिल्लियां बरामद की गईं। वहीं, बर्फ में संरक्षित 80 मृत बिल्लियां भी मिलीं, जिन्हें कथित तौर पर खाद्य प्रसंस्करण के लिए तैयार रखा गया था। पशु अधिकार संगठनों ने इस कार्रवाई को वियतनाम के इतिहास में सबसे बड़े पशु बचाव अभियानों में से एक बताया है।

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो किसी साम्राज्य, किसी युद्ध या किसी राजवंश से बड़े हो जाते हैं। महाराणा प्रताप ऐसा ही एक नाम हैं।
आज भी जब उनका उल्लेख होता है तो सबसे पहले हल्दीघाटी का युद्ध, चेतक की वीरता और जंगलों में घास की रोटी खाने की कथा याद की जाती है। लेकिन क्या सचमुच महाराणा प्रताप का इतिहास केवल इतना ही है?
यदि ऐसा होता तो वे इतिहास की एक वीर गाथा बनकर रह जाते। लेकिन चार सौ साल बाद भी उनका नाम भारतीय जनमानस में जीवित है। इसका कारण कोई एक युद्ध नहीं, बल्कि वह अदम्य संघर्ष है जो हल्दीघाटी के बाद शुरू हुआ और जीवन के अंतिम क्षण तक चलता रहा।
महाराणा प्रताप की सबसे बड़ी उपलब्धि हल्दीघाटी में लड़ना नहीं थी। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि हल्दीघाटी के बाद भी उन्होंने लड़ना नहीं छोड़ा।
इतिहास में ऐसे अनेक राजा हुए जिन्होंने बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ीं। कुछ जीते, कुछ हारे और धीरे-धीरे इतिहास के धुंधले पन्नों में खो गए। लेकिन महाराणा प्रताप की कहानी अलग है। उन्होंने उस समय के सबसे शक्तिशाली सम्राट अकबर के सामने झुकने से इनकार किया, वर्षों तक जंगलों और पहाड़ों में संघर्ष किया, अपने राज्य का पुनर्गठन किया और अंततः मेवाड़ के बड़े हिस्से को वापस हासिल किया। यही कारण है कि उन्हें केवल मेवाड़ का शासक नहीं, बल्कि प्रतिरोध, स्वाभिमान और स्वतंत्र चेतना का प्रतीक माना जाता है।
क्या वास्तव में हल्दीघाटी में अकबर जीत गया था?
18 जून 1576 को हल्दीघाटी की संकरी घाटी में एक ऐसा युद्ध हुआ जिसने भारतीय इतिहास में स्थायी स्थान बना लिया। एक ओर मेवाड़ के महाराणा प्रताप थे, तो दूसरी ओर मुगल सम्राट अकबर की ओर से भेजी गई विशाल सेना, जिसका नेतृत्व आमेर के राजा मानसिंह कर रहे थे।
फारसी और मुगल इतिहासकारों ने इस युद्ध को मुगल विजय के रूप में दर्ज किया। यह भी सच है कि युद्ध के अंत में मैदान पर नियंत्रण मुगल सेना के पास रहा। लेकिन इतिहास केवल युद्धभूमि पर सूर्यास्त तक की स्थिति का नाम नहीं होता। इतिहास इस बात से भी तय होता है कि युद्ध के बाद क्या हुआ।

“यदि हल्दीघाटी वास्तव में अकबर की निर्णायक विजय थी, तो फिर महाराणा प्रताप अगले बीस वर्षों तक संघर्ष कैसे करते रहे? यदि मेवाड़ पूरी तरह जीत लिया गया था, तो फिर मुगल साम्राज्य को बार-बार सैन्य अभियान चलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?”
युद्ध के दौरान प्रताप की सेना संख्या में कम थी, लेकिन भूगोल की समझ, स्थानीय समर्थन और अद्भुत मनोबल उसके साथ था। स्वयं महाराणा प्रताप अग्रिम मोर्चे पर लड़े। उनके प्रिय अश्व चेतक की वीरता आज भी लोकस्मृति का हिस्सा है।
इतिहासकारों में युद्ध के सामरिक परिणाम को लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है—मुगल सेना न तो महाराणा प्रताप को बंदी बना सकी और न ही मेवाड़ के प्रतिरोध को समाप्त कर सकी। यही कारण है कि अनेक आधुनिक इतिहासकार हल्दीघाटी को “निर्णायक मुगल विजय” के बजाय एक ऐसे युद्ध के रूप में देखते हैं जिसने संघर्ष को और लंबा कर दिया।
राजस्थान की इतिहासकार डॉ. रीमा हूजा भी संकेत करती हैं कि हल्दीघाटी किसी पक्ष को पूर्ण सफलता नहीं दिला सका। युद्ध समाप्त हुआ, लेकिन संघर्ष नहीं।
जब मुगल इतिहासकार ने भी प्रताप की वीरता स्वीकार की
हल्दीघाटी युद्ध का एक दिलचस्प विवरण स्वयं मुगल इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूनी के लेखन में मिलता है, जो युद्ध में मौजूद थे। अपने ग्रंथ मुन्तख़ब-उत-तवारीख़ में बदायूनी लिखते हैं कि राजपूतों के शुरुआती हमलों ने मुगल सेना की पंक्तियों में भारी अव्यवस्था पैदा कर दी थी। कई स्थानों पर मुगल सैनिकों को पीछे हटना पड़ा और युद्ध अत्यंत भीषण रूप ले चुका था। यह उल्लेख महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह प्रताप की वीरता का वर्णन किसी राजस्थानी कवि ने नहीं, बल्कि विरोधी पक्ष के इतिहासकार ने किया था।
अकबर बनाम प्रताप : आखिर दांव पर क्या था?
महाराणा प्रताप और अकबर के संघर्ष को अक्सर दो राजाओं की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल थी।
1568 में चित्तौड़गढ़ के पतन के बाद अकबर ने राजपूताना के अधिकांश प्रमुख राज्यों को अपने प्रभाव क्षेत्र में शामिल कर लिया था। आमेर, बीकानेर, जोधपुर और अन्य कई राजवंश किसी न किसी रूप में मुगल व्यवस्था का हिस्सा बन चुके थे, लेकिन मेवाड़ अलग था।
मेवाड़ केवल एक राज्य नहीं था; वह राजपूती स्वाधीनता और सिसोदिया प्रतिष्ठा का केंद्र माना जाता था। चित्तौड़ का नाम केवल एक दुर्ग का नाम नहीं था, बल्कि वह राजपूत अस्मिता का प्रतीक बन चुका था। इतिहासकार जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि मेवाड़ का प्रश्न अकबर के लिए केवल क्षेत्रीय विस्तार का विषय नहीं था, बल्कि साम्राज्य की सार्वभौमिकता का प्रश्न बन चुका था।
अकबर जानता था कि यदि महाराणा प्रताप भी अन्य राजपूत शासकों की तरह दरबार में उपस्थित होकर अधीनता स्वीकार कर लेते हैं, तो यह केवल एक राजनीतिक सफलता नहीं होती; यह एक प्रतीकात्मक विजय भी होती।
दूसरी ओर प्रताप के लिए यह संघर्ष केवल भू-भाग का नहीं था। उनके सामने प्रश्न था कि क्या मेवाड़ अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखेगा या मुगल साम्राज्य का हिस्सा बन जाएगा। यही कारण है कि हल्दीघाटी का युद्ध केवल तलवारों का टकराव नहीं था; वह दो अलग राजनीतिक दृष्टिकोणों का संघर्ष भी था।
अकबर की सबसे बड़ी विफलता : प्रताप को झुका न पाना
अकबर के शासनकाल में अधिकांश राजपूत रियासतें किसी न किसी रूप में मुगल सत्ता से जुड़ गई थीं। कई शक्तिशाली राजवंशों ने सैन्य और राजनीतिक समझौते स्वीकार कर लिए थे। लेकिन, महाराणा प्रताप ने अलग रास्ता चुना।
उनके लिए यह केवल एक राज्य की लड़ाई नहीं थी। यह स्वाधीनता, प्रतिष्ठा और राजनीतिक आत्मनिर्णय का प्रश्न था। कई बार संधि के प्रस्ताव आए, लेकिन प्रताप ने मुगल दरबार में जाकर अधीनता स्वीकार नहीं की।
अकबर के लिए मेवाड़ केवल एक राज्य नहीं था; वह उसकी सार्वभौमिक सत्ता की परीक्षा बन चुका था। यही कारण है कि विशाल मुगल साम्राज्य को एक अपेक्षाकृत छोटे पहाड़ी राज्य के पीछे वर्षों तक अपनी ऊर्जा और संसाधन लगाने पड़े।
दिवेर : जहां संघर्ष ने करवट बदली
यदि हल्दीघाटी प्रतिरोध का प्रतीक है, तो 1582 का दिवेर युद्ध प्रताप की वापसी का प्रतीक है।
इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने दिवेर को मेवाड़ के इतिहास का निर्णायक मोड़ माना है। उनके अनुसार हल्दीघाटी की तुलना में दिवेर का महत्व अधिक दूरगामी था, क्योंकि यहीं से मेवाड़ की पुनर्प्राप्ति का अभियान निर्णायक रूप से सफल होने लगा।

इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगल चौकियों पर व्यापक आक्रमण किया और मेवाड़ के बड़े हिस्से पर पुनः अधिकार स्थापित किया। कई इतिहासकारों ने दिवेर को “मेवाड़ का मैराथन” कहा है। जिस प्रकार यूनान का मैराथन युद्ध विदेशी प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक बन गया, उसी प्रकार दिवेर मेवाड़ के पुनरुत्थान का प्रतीक बना। यही वह क्षण था जब यह स्पष्ट होने लगा कि हल्दीघाटी युद्ध ने प्रताप को समाप्त नहीं किया था; बल्कि संघर्ष को और अधिक दृढ़ बना दिया था।
गोगुंदा से अरावली तक : गुरिल्ला युद्ध का अद्भुत अध्याय
महाराणा प्रताप की सबसे बड़ी सैन्य प्रतिभाओं में से एक थी परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता। हल्दीघाटी के बाद उन्होंने प्रत्यक्ष युद्धों के साथ-साथ गुरिल्ला रणनीति अपनाई। अरावली की पर्वतमालाएं उनकी सबसे बड़ी सहयोगी बन गईं। छोटे-छोटे सैन्य दल मुगल चौकियों पर लगातार दबाव बनाते रहे।
गोगुंदा, कुंभलगढ़ और अरावली का विस्तृत क्षेत्र प्रतिरोध का केंद्र बना रहा। भील समुदाय ने इस संघर्ष में असाधारण भूमिका निभाई। स्थानीय भूगोल, जनसमर्थन और गतिशील युद्धनीति ने प्रताप को वह बढ़त दी जो किसी भी बड़ी सेना के लिए चुनौतीपूर्ण थी।
क्या अकबर मेवाड़ को पूरी तरह जीत पाया था?
अकबर ने चित्तौड़गढ़ पर अधिकार किया था। उसने गुजरात, बंगाल, मालवा और काबुल तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। लेकिन मेवाड़ उसके जीवनकाल की उन चुनौतियों में शामिल रहा जिसे वह पूरी तरह समाप्त नहीं कर सका।
महाराणा प्रताप के अंतिम वर्षों तक चित्तौड़ और मांडलगढ़ को छोड़कर मेवाड़ का अधिकांश पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्र पुनः उनके नियंत्रण में आ चुका था। उदयपुर सहित अनेक क्षेत्रों में सिसोदिया सत्ता पुनर्स्थापित हो चुकी थी।
यही कारण है कि हल्दीघाटी के परिणाम को केवल एक दिन के युद्ध से नहीं, बल्कि उसके बाद के दो दशकों के घटनाक्रम से समझना चाहिए।
“घास की रोटी” से कहीं बड़ा है प्रताप का इतिहास
लोककथाओं में घास की रोटी की कथा अत्यंत लोकप्रिय है। लेकिन यदि महाराणा प्रताप की पूरी कहानी को केवल इसी प्रतीक तक सीमित कर दिया जाए, तो उनके वास्तविक योगदान के साथ अन्याय होगा। प्रताप केवल एक योद्धा नहीं थे। वे एक कुशल प्रशासक, रणनीतिकार और संगठनकर्ता भी थे।
उन्होंने सीमित संसाधनों में राज्य का पुनर्गठन किया, प्रशासन को जीवित रखा, सेना का पुनर्निर्माण किया और जनता का विश्वास बनाए रखा। भामाशाह ने आर्थिक आधार प्रदान किया, जबकि भीलों और स्थानीय समुदायों ने संघर्ष की रीढ़ बनकर साथ दिया।
महाराणा प्रताप की सफलता केवल व्यक्तिगत वीरता की कहानी नहीं है; यह नेतृत्व, संगठन और सामूहिक प्रतिरोध की कहानी भी है।
महाराणा प्रताप की सबसे बड़ी जीत : एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना जो झुकी नहीं
यदि प्रताप की सबसे बड़ी उपलब्धि खोजनी हो, तो वह शायद कोई युद्ध नहीं, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना थी जिसने उनके बाद भी संघर्ष को जीवित रखा। उस पीढ़ी का नाम था—कुंवर अमर सिंह।
अमर सिंह ने बचपन से ही महलों का वैभव नहीं, बल्कि अरावली के जंगल, युद्ध शिविर और लगातार संघर्ष का जीवन देखा था। दिवेर और उसके बाद के अभियानों में वे केवल उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि प्रताप के सबसे भरोसेमंद सेनापतियों में से एक बनकर उभरे।
राजस्थानी परंपराओं में दिवेर के युद्ध के दौरान मुगल सरदार सुल्तान खान के विरुद्ध उनके पराक्रम का विशेष उल्लेख मिलता है। कई स्थानीय इतिहासकारों ने लिखा है कि जिस साहस से अमर सिंह ने युद्धक्षेत्र में नेतृत्व किया, उसने यह स्पष्ट कर दिया था कि मेवाड़ का प्रतिरोध महाराणा प्रताप के साथ समाप्त नहीं होगा।
यही वह पक्ष है जिसे लोकप्रिय इतिहास अक्सर नजरअंदाज कर देता है। महाराणा प्रताप की मृत्यु 1597 में हुई, लेकिन मेवाड़ का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। अमर सिंह ने उसे आगे बढ़ाया।
जहांगीर ने अपनी आत्मकथा तुज़ुक-ए-जहांगीरी में स्वीकार किया है कि मेवाड़ को अधीन करना मुगल साम्राज्य के लिए आसान नहीं था। अकबर का अधूरा लक्ष्य जहांगीर के शासनकाल तक चुनौती बना रहा। 1613-15 के अभियानों में स्वयं जहांगीर को मेवाड़ प्रश्न पर विशेष ध्यान देना पड़ा।
यदि प्रताप प्रतिरोध के प्रतीक थे, तो अमर सिंह उस प्रतिरोध की निरंतरता थे।
इतिहासकारों की नजर में महाराणा प्रताप
महाराणा प्रताप की विरासत का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि उनकी प्रशंसा केवल लोककथाओं या राजस्थानी परंपराओं तक सीमित नहीं है। विभिन्न कालखंडों के इतिहासकारों ने भी उन्हें अलग-अलग दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण माना है।
ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी प्रसिद्ध कृति Annals and Antiquities of Rajasthan में हल्दीघाटी को “राजस्थान का थर्मोपाइली” कहा था। “Haldighati is the Thermopylae of Rajasthan.”
थर्मोपाइली वह ऐतिहासिक युद्ध था जहां यूनानियों ने एक विशाल साम्राज्य के विरुद्ध असाधारण प्रतिरोध का प्रदर्शन किया था। टॉड के लिए महाराणा प्रताप उसी प्रतिरोध की भावना के प्रतीक थे। यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि उन्होंने महाराणा प्रताप को वैश्विक ऐतिहासिक विमर्श का हिस्सा बनाया।
कविराज श्यामलदास ने वीर विनोद में प्रताप को केवल योद्धा नहीं, बल्कि मेवाड़ की स्वतंत्र सत्ता के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अपने शोध में विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि प्रताप की वास्तविक उपलब्धि हल्दीघाटी नहीं, बल्कि उसके बाद मेवाड़ के बड़े हिस्से की पुनर्प्राप्ति थी।
मुगल इतिहास के महान अध्येता सर जदुनाथ सरकार ने प्रताप को एक दृढ़ निश्चयी शासक और कुशल सैन्य रणनीतिकार माना। उनके अनुसार प्रताप की सबसे बड़ी शक्ति यह थी कि उन्होंने परिस्थितियों के अनुरूप अपनी युद्धनीति बदली और दीर्घकालिक प्रतिरोध को संभव बनाया।
आधुनिक इतिहासकार डॉ. रीमा हूजा भी इस बात पर जोर देती हैं कि महाराणा प्रताप को केवल हल्दीघाटी के संदर्भ में देखना उनके ऐतिहासिक महत्व को सीमित कर देता है। उनके अनुसार प्रताप का वास्तविक महत्व मेवाड़ की राजनीतिक पहचान और स्वायत्तता को जीवित रखने में था।
दिलचस्प बात यह है कि प्रताप की वीरता का उल्लेख केवल उनके समर्थकों ने ही नहीं किया। मुगल इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूनी ने भी हल्दीघाटी में राजपूतों के शुरुआती आक्रमणों की तीव्रता और युद्ध की भीषणता को स्वीकार किया है।
शायद यही कारण है कि विभिन्न विचारधाराओं और अलग-अलग कालखंडों के इतिहासकारों में मतभेद होने के बावजूद एक बात पर व्यापक सहमति दिखाई देती है—महाराणा प्रताप का महत्व किसी एक युद्ध के परिणाम में नहीं, बल्कि उस संघर्ष में है जिसने मेवाड़ की स्वतंत्र पहचान को जीवित रखा।
इतिहास का अंतिम फैसला
लोककथाएँ हमें घास की रोटी की कहानी सुनाती हैं। इतिहास हमें उससे कहीं बड़ी कहानी बताता है।
- वह कहानी एक ऐसे शासक की है जिसने साम्राज्य की शक्ति से अधिक स्वाभिमान की शक्ति पर विश्वास किया।
- वह कहानी एक ऐसे योद्धा की है जिसने युद्धक्षेत्र छोड़ने के बाद भी संघर्ष नहीं छोड़ा।
- वह कहानी एक ऐसे नेता की है जिसने केवल स्वयं नहीं लड़ा, बल्कि अपने पुत्र अमर सिंह सहित एक पूरी पीढ़ी को प्रतिरोध का अर्थ सिखाया।
महाराणा प्रताप की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं थी कि उन्होंने हल्दीघाटी में तलवार चलाई। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने मेवाड़ को हार नहीं मानने दी।
अकबर अपने समय के सबसे शक्तिशाली शासक थे। उन्होंने उत्तर भारत से लेकर गुजरात, बंगाल और काबुल तक विशाल साम्राज्य स्थापित किया। लेकिन मेवाड़ का प्रश्न उनके जीवनकाल में पूरी तरह हल नहीं हो सका।
शायद इसी कारण भारतीय इतिहास में अकबर एक महान सम्राट के रूप में याद किए जाते हैं, लेकिन महाराणा प्रताप एक आदर्श के रूप में। और इतिहास में आदर्शों की आयु अक्सर साम्राज्यों से अधिक लंबी होती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन हो चुका है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका ने इस युद्ध में अपने तय लक्ष्यों से भी ज्यादा हासिल किया है। फ्रांस में G7 समिट से इतर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रम्प ने कहा कि ईरान का नेतृत्व अब पहले जैसा नहीं रहेगा और वह आगे अलग तरीके से व्यवहार करेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका चाहता तो युद्ध जारी रख सकता था, लेकिन आर्थिक तबाही से बचने के लिए शांति का रास्ता चुना। ट्रम्प ने चेतावनी दी कि अगर अगले 60 दिनों में अंतिम समझौता नहीं हुआ, तो अमेरिका फिर से ईरान पर बमबारी शुरू कर देगा। उन्होंने कहा, “हम कभी नहीं चाहेंगे कि ईरान के पास परमाणु हथियार हो। जरूरत पड़ी तो दोबारा हमला करेंगे।” पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… 1. होर्मुज में सुरक्षित आवाजाही का भरोसा: ईरान और ओमान ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जाएगी। दोनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने पर जोर दिया। 2. ट्रम्प बोले- हिजबुल्लाह से सीरिया निपट सकता है: डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि अगर इजराइल हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई में आम लोगों की मौत नहीं रोक पा रहा है, तो सीरिया यह जिम्मेदारी संभाल सकता है। 3. लेबनान में जंग खत्म करने की मांग: ईरानी संसद स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा कि सिर्फ ईरान में संघर्ष रुकना काफी नहीं है। उन्होंने मांग की कि लेबनान समेत सभी मोर्चों पर युद्ध खत्म हो और इजराइली सेना दक्षिणी लेबनान से पीछे हटे। 4. अमेरिका-ईरान बातचीत पर चीन की चेतावनी: चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि मौजूदा सहमति अंतिम मंजिल नहीं, बल्कि नई शुरुआत है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का दूसरा चरण पहले से ज्यादा मुश्किल होगा और स्थायी शांति के लिए सभी पक्षों को लगातार प्रयास करने होंगे। 5. कुछ दिनों में पूरा ईरान समझौता सार्वजनिक होगा: ट्रम्प ने कहा कि वह अगले कुछ दिनों में अमेरिका-ईरान समझौते का पूरा दस्तावेज सार्वजनिक करेंगे। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो प्रेस कॉन्फ्रेंस कर समझौते को शब्द-दर-शब्द पढ़कर भी सुनाएंगे, ताकि उसकी सही जानकारी सामने आ सके। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार को कहा- जब तक मैं प्रेसिडेंट हूं, व्हाइट हाउस में मोदी का हमेशा अच्छा दोस्त मौजूद रहेगा। अगर भारत या मोदी पर हमला होता है और मोदी लीडर होंगे तो हम उनकी मदद करेंगे। उन्होंने मोदी की तारीफ करते हुए कहा- जब तक मोदी लीडर हैं, इंडिया हर फील्ड में बड़ा रोल निभाएगा। मोदी शांत और जबरदस्त नेता हैं, लेकिन मैं मोदी की तरह नहीं हूं। वहीं ट्रम्प के साथ द्विपक्षीय बैठक में मोदी ने कहा कि समुद्र में भारतीयों की सुरक्षा जरूरी है। उम्मीद है कि ईरान के साथ डील में भारतीयों की सुरक्षा पक्की की जाएगी। पीएम ने कहा कि होर्मुज खुला रहना जरूरी है। मैं वेस्ट एशिया में शांति की कोशिशों में ट्रम्प की लीडरशिप की तारीफ करता हूं। ट्रम्प के नेतृत्व में शांति की उम्मीद दिख रही है। फ्रांस के एवियन में दो दिवसीय 52वें G7 समिट का आयोजन हुआ। आज समिट का दूसरा दिन था। मोदी और ट्रम्प भी समिट में शामिल हुए थे। मोदी-ट्रम्प मुलाकात की 4 तस्वीरें… मोदी ने दोनों दिन भारतीय की मौत का मुद्दा उठाया पीएम मोदी ने G7 समिट में दोनों दिन होर्मुज स्ट्रेट में भारतीय नाविकों की मौत का मुद्दा उठाया। उन्होंने समिट के पहले दिन मंगलवार को आउटरीच सेशन में कहा था कि इस अहम समुद्री मार्ग में कई भारतीयों ने जान गंवाई है और वैश्विक व्यापार को जोड़ने वाले नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सभी देशों की जिम्मेदारी है। मोदी के G7 दौरे से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…
गुजरात सरकार की ओर से कच्छ में एक माफिया पर बड़ी बुलडोजर कार्रवाई की गई है। इस बुलडोजर कार्रवाई में लगभग 10 हजार वर्ग मीटर जमीन मुक्त कराई गई है जिस पर माफिया ने कब्जा कर रखा था।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कनाडा में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान यूक्रेन के राष्ट्रपति वोल्दोमीर जेलेंस्की को नजरअंदाज कर दिया। वायरल वीडियो में ट्रम्प अन्य नेताओं से मुलाकात और हाथ मिलाते नजर आते हैं, लेकिन जेलेंस्की से न तो उन्होंने हाथ मिलाया और न ही कोई खास बातचीत की। यह घटना ऐसे समय हुई है, जब दोनों नेताओं के बीच व्हाइट हाउस में हुई तीखी बहस और तकरार को लेकर पहले भी चर्चा हो चुकी है। दरअसल, ट्रम्प और जेलेंस्की के संबंध पहले भी तनावपूर्ण रहे हैं। इसी साल व्हाइट हाउस में हुई एक बैठक के दौरान दोनों नेताओं के बीच तीखी बहस हुई थी, जिसकी काफी चर्चा हुई थी। फ्रांस के शहर एवियन में G-7 शिखर सम्मेलन 2026 आयोजित हो रहा है। 15 से 17 जून तक होने वाली इस समिट में दुनिया के 7 देशों के नेता वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया की स्थिति, व्यापार, जलवायु परिवर्तन और सप्लाई चैन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं। G-7 समिट के टॉप 8 मोमेंट्स… मोदी की मैक्रों, मेलोनी और ट्रम्प से मुलाकात ———————————- ये खबर भी पढ़ें… पीएम मोदी 16 महीने बाद ट्रम्प से मिले, फ्रांस में G7 समिट में साथ बैठे, 5 मिनट बात की पीएम मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के बीच फ्रांस के एवियन शहर में G-7 समिट के दौरान मुलाकात हुई। दोनों के बीच करीब 5 मिनट तक बात चली। मीटिंग में दोनों एक-साथ बैठे नजर आए। यह मुलाकात 16 महीनों के बाद हुई है। पूरी खबर पढ़ें…
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने बीजिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात के दौरान कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख विवाद का मुद्दा उठाया। उन्होंने भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे के इस्तेमाल को लेकर हुए समझौते पर सवाल उठाते हुए पूछा कि यह व्यवस्था किस आधार पर बनाई गई और इसकी प्रकृति क्या है। इसके जवाब में वांग यी ने कहा कि यह मूल रूप से भारत और नेपाल के बीच का मामला है और इसका समाधान बातचीत से ही निकलेगा। उन्होंने कहा कि इस तरह के मुद्दे संबंधित देशों के बीच कूटनीतिक वार्ता के जरिए सुलझाए जाने चाहिए। नेपाल ने दोहराया कि कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख उसके क्षेत्र का हिस्सा हैं। काठमांडू पहले भी नई दिल्ली और बीजिंग को विरोध नोट भेजकर कह चुका है कि उसकी सहमति के बिना इस इलाके से जुड़ा कोई समझौता स्वीकार नहीं होगा। 2020 में हुआ था भारत-चीन समझौता भारत और चीन ने 2020 में लिपुलेख दर्रे के जरिए कैलाश मानसरोवर यात्रा और सीमा पार व्यापार को फिर से शुरू करने पर सहमति बनाई थी। दोनों देशों ने इस मार्ग को तीर्थयात्रा और व्यापार के लिए इस्तेमाल करने की व्यवस्था पर सहमति जताई थी। नेपाल ने उस समय इसका विरोध किया था। काठमांडू का कहना था कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा उसके क्षेत्र का हिस्सा हैं, इसलिए उससे बिना राय लिए इस मार्ग को लेकर कोई भी समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके बाद नेपाल ने भारत और चीन दोनों को राजनयिक विरोध नोट भेजा था। इसके बावजूद भारत और चीन कैलाश मानसरोवर यात्रा और सीमावर्ती व्यापार के लिए इस मार्ग का इस्तेमाल करते रहे हैं। खनाल ने भारत दौरे पर नहीं उठाया था मुद्दा दिलचस्प बात यह है कि शिशिर खनाल ने हाल की भारत यात्रा के दौरान यह मुद्दा नहीं उठाया था। उस समय उन्होंने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बातचीत की थी। बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में भी कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख का जिक्र नहीं था। ऐसे में कूटनीतिक हलकों में इस बात पर चर्चा है कि नेपाल ने नई दिल्ली के मुकाबले बीजिंग में ज्यादा सख्त रुख दिखाया। विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल दोनों पड़ोसियों के साथ संतुलन बनाए रखते हुए सीमा विवाद को जिंदा रखना चाहता है, लेकिन खुलकर टकराव से भी बचना चाहता है। भारत-चीन में लिपुलेख दर्रा से व्यापार शुरू भारत-चीन सीमा पर स्थित लिपुलेख दर्रे से व्यापार दोबारा शुरू होने जा रहा है। गलवान घाटी में 2020 में हुए संघर्ष के बाद यह मार्ग बंद हो गया था। करीब छह साल बाद अब इस रास्ते से व्यापार बहाल करने की तैयारी शुरू हो गई है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से करीब 300 व्यापारियों के नाम विदेश मंत्रालय को भेजे गए हैं। इन्हें पासपोर्ट और वीजा के बजाय ट्रेड पास के जरिए तिब्बत के तकलाकोट बाजार तक जाने की अनुमति दी जाएगी। इस बार सीमा तक सड़क पहुंचने से व्यापारियों को बड़ा फायदा मिलेगा। पहले सामान घोड़े-खच्चरों के जरिए ले जाया जाता था, लेकिन अब वाहन सीधे सीमा तक पहुंच सकेंगे। इससे व्यापार की लागत और समय दोनों कम होंगे। लिपुलेख दर्रा भारत और तिब्बत के बीच सदियों पुराने व्यापार का हिस्सा रहा है। तिब्बती व्यापारी नमक, ऊन और बोरेक्स लेकर भारत आते थे, जबकि भारतीय व्यापारी कपड़ा, अनाज और मसाले तिब्बत ले जाते थे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह मार्ग बंद हो गया था। 1991 में दोनों देशों के बीच समझौते के बाद इसे फिर खोला गया था। हालांकि 2020 के गलवान संघर्ष के बाद व्यापारिक गतिविधियां बंद हो गई हुई थीं। दो नदियों से तय हुई भारत-नेपाल की सीमा भारत, नेपाल और चीन सीमा से लगे इस इलाके में हिमालय की नदियों से मिलकर बनी एक घाटी है, जो नेपाल और भारत में बहने वाली काली या महाकाली नदी का उद्गम स्थल है। इस इलाके को कालापानी भी कहते हैं। यहीं पर लिपुलेख दर्रा भी है। यहां से उत्तर-पश्चिम की तरफ कुछ दूरी पर एक और दर्रा है, जिसे लिंपियाधुरा कहते हैं। अंग्रेजों और नेपाल के गोरखा राजा के बीच 1816 में हुए सुगौली समझौते में काली नदी के जरिए भारत और नेपाल के बीच सीमा तय की थी। समझौते के तहत काली नदी के पश्चिमी क्षेत्र को भारत का इलाका माना गया, जबकि नदी के पूर्व में पड़ने वाला इलाका नेपाल का हो गया। काली नदी के उद्गम स्थल, यानी ये सबसे पहले कहां से निकलती है, इसे लेकर दोनों देशों के बीच विवाद रहा है। भारत पूर्वी धारा को काली नदी का उद्गम मानता है। वहीं नेपाल पश्चिमी धारा को उद्गम धारा मानता है और इसी आधार पर दोनों देश कालापानी के इलाके पर अपना-अपना दावा करते हैं। —————————– ये खबर भी पढ़ें…. नेपाल बोला- भारतीय यात्री लिपुलेख से मानसरोवर न जाएं:ये हमारा इलाका; भारत बोला- नेपाल के दावे का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं नेपाल सरकार ने पिछले महीने भारतीय तीर्थयात्रियों से लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा न करने की अपील की। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि 1816 की सुगौली संधि के मुताबिक लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र नेपाल का हिस्सा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

