Cricketer बनने का सपना था पर बन गया Actor | Ramandeep Yadav | Raakh Web Series | Rajjo

राख’ वेब सीरीज़ में ‘राज्जो’ का किरदार निभाने वाले रामनदीप यादव क्रिकेटर बनने का सपना लिया हर रात सोते थे पर क़िस्मत में उन्हें अभिनय से मिलवा दिया थिएटर, नुक्कड़ नाटक और लगातार ऑडिशन, Manmarziyan, Cat जैसे प्रोजेक्ट का हिस्सा रहे लेकिन फिर चार साल तक काम का इंतज़ार करना पड़ा पर फिर एक ऐसा किरदार जिसने उन्हें नई पहचान दिलाई, Raakh Web Series में रज्जो का किरदार। रमनदीप का सफ़र बताता है कि हुनर, धैर्य और खुद पर भरोसा कितनी दूर तक ले जा सकते हैं।
@_ramandeep_yadav

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बास्केटबॉल कोर्ट से हॉलीवुड तक: अली फज़ल का सफर | Ali Fazal, Raakh web series

‘राख़’ में अली फज़ल की दमदार एक्टिंग तो आपने देखी होगी, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनका सपना कभी अभिनेता बनने का था ही नहीं?
अली फज़ल भारत के लिए बास्केटबॉल खेलना चाहते थे। उन्होंने अपने स्कूल की टीम की कप्तानी भी की थी। लेकिन एक गंभीर चोट ने उनका यह सपना तोड़ दिया। मगर उसी टूटे हुए सपने ने उन्हें थिएटर तक पहुंचाया, और थिएटर ने उन्हें 3 इडियट्स, फुकरे, मिर्जापुर और फिर हॉलीवुड तक।
अली फज़ल की कहानी हमें याद दिलाती है कि हर अधूरा सपना हार की कहानी नहीं होता। आपको अली फज़ल का कौन-सा किरदार सबसे ज्यादा पसंद है?

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Ali Fazal: ‘राजनीति के बिना कला अधूरी है’, सेलेब्स के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर राय रखने पर बोले अली फजल

Ali Fazal: अली फ़ज़ल और सोनाली बेंद्रे ने हाल ही में इस बहस पर अपनी राय दी कि क्या मशहूर हस्तियों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बात रखें। ‘युवा’ (Yuvaa) के साथ बातचीत के दौरान, अली से पूछा गया कि क्या मशहूर लोगों से सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय रखने की उम्मीद की जानी चाहिए।

जवाब में, एक्टर ने कहा कि उनका मानना ​​है कि राजनीति के बिना कला अधूरी है। उन्होंने कहा कि अपनी बात रखना ज़रूरी है, और इसका मतलब हमेशा ज़ोर-शोर से सार्वजनिक बयान देना या “ऊंचे मंच से चिल्लाना” नहीं होता, क्योंकि योगदान देने के कई तरीके हैं। सोनाली बेंद्रे की राय इससे अलग थी। उन्होंने कहा कि उनका मानना ​​है कि अगर किसी को किसी खास विषय के बारे में पूरी जानकारी या ज्ञान न हो, तो उस पर कमेंट करने से बचना चाहिए।

अली फ़ज़ल ने कहा कि कलाकारों में स्वाभाविक रूप से दया की भावना होती है और वे अपने काम को उस समाज से पूरी तरह अलग नहीं कर सकते, जिसमें वे रहते हैं। अली का तर्क था कि कला और राजनीति अक्सर आपस में जुड़े होते हैं। एक्टर ने कहा कि एक कलाकार के तौर पर, मुझे लगता है कि हममें बहुत दया-भाव होता है। लेकिन राजनीति या उस समाज के बिना कला अधूरी है, जिसमें हम रहते हैं। कभी-कभी यह उसकी झलक होती है, तो कभी-कभी उससे कुछ लेती है। यह लगभग एक मैच या टेनिस गेम जैसा है। आप खुद को इससे अलग नहीं कर सकते। मैं इस बात का सम्मान करता हूँ कि आज के दौर में बहुत से लोग ऐसा नहीं करना चुनते हैं, और यह ठीक भी है। कभी-कभी हम सभी को अपना घर-बार चलाना होता है और यह मुश्किल हो जाता है। लेकिन इसके बावजूद, मेरा हमेशा से यह मानना ​​रहा है कि हमें कम से कम अपने-अपने तरीके से कुछ न कुछ ज़रूर करना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि आवाज़ उठाने का मतलब हमेशा सार्वजनिक भाषण देना या ज़ोर-शोर से अपना पक्ष रखना नहीं होता। हर किसी का अपना तरीका होता है। ज़रूरी नहीं कि आप किसी ऊंचे मंच पर खड़े होकर चिल्लाएं। कभी-कभी इसके लिए लोगों का एक साथ आना, कुछ बेहतरीन बातें लिखना, उन्हें शूट करना और उन्हें खुद अपनी बात कहने देना ही काफ़ी होता है। कभी-कभी यही सबसे ज़ोरदार आवाज़ होती है। लेकिन व्यक्तिगत तौर पर, हां, वह भी एक तरीका है।”

वहीं, सोनाली बेंद्रे ने मुश्किल मुद्दों पर कमेंट करते समय जानकारी और विशेषज्ञता के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि भले ही कलाकार अपने काम में माहिर हों, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे हर विषय पर अधिकार के साथ बात करने के लिए योग्य हैं।

सोनाली बेंद्रे ने कहा कि वे किसी ऐसे विषय पर कमेंट करने से बचना पसंद करेंगी, जिसे वे पूरी तरह से नहीं समझती हैं, बजाय इसके कि वे बिना जानकारी के कोई बयान दें। उन्होंने कहा, “जब आप ‘योग्य’ होने की बात करते हैं, तो हम कलाकार हो सकते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि एक कलाकार के तौर पर मुझे उस खास विषय के बारे में सब कुछ पता हो। इसलिए मैं कहूंगी कि एक कलाकार के तौर पर अगर मुझे उस विषय के बारे में सब कुछ नहीं पता है, तो मैं गलत कमेंट करने के बजाय कमेंट न करना ही बेहतर समझूंगी।”

सोनाली बेंद्रे ने कहा, “साथ ही, अगर मैं एक कलाकार हूं, तो मुझे उसे उसी तरह दिखाना चाहिए। मुझे समझना चाहिए कि वह क्या है। अगर मैं पेंटर हूं, तो मुझे पेंटिंग करनी चाहिए। अगर मैं कवि हूं, तो मुझे कविता लिखनी चाहिए। अगर मैं फिल्ममेकर हूं, तो मैं वह करूंगी। अगर मैं एक्टर हूं, तो मैं ऐसा विषय चुनूंगी, जो कुछ कहता हो। इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे अपने दायरे से बाहर निकलकर किसी ऐसी चीज़ पर कमेंट करनी चाहिए, जिस पर मैं शायद पूरी तरह योग्य न होऊं। मुझे लगता है कि उनमें से ज़्यादातर लोग उस चीज़ पर टिप्पणी करने के लिए योग्य नहीं हैं, जिस पर वे टिप्पणी कर रहे हैं। वे यह नहीं समझते कि हर स्थिति के कई पहलू (360 डिग्री) होते हैं।”