Insurance Claim: बढ़ती बीमारी के डर और मेडिकल खर्चों के बोझ से बचने के लिए अब लाइफ इंश्योरेंस करवाना लोगों की पसंद बन रही है। परिवार के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए लाइफ इंश्योरेंस काफी करवाते हैं, लेकिन ऐसे में अगर किसी व्यक्ति ने लाइफ इंश्योरेंस करवाया हो और पॉलिसीधारक की मौत हो जाए। फिर इंश्योरेंस कंपनी क्लेम खारिज कर दें तो ऐसी स्थिति में परिवार क्या करेगा? कुछ ऐसा ही मामला गाजियाबाद से सामने आया है। जहां पर जिला उपभोक्ता आयोग ने लाइफ इंश्योरेंस LIC ऑफ इंडिया को पॉलिसीहोल्डर के नॉमिनी को 30 दिनों के भीतर 10 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
द टाइम्स ऑफ इंडिया के हवाले से मिली खबर के मुताबिक गाजियाबाद जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने LIC ऑफ इंडिया को आदेश दिया है कि वह पॉलिसीहोल्डर के नॉमिनी को 30 दिनों के भीतर 10 लाख रुपये का भुगतान करने के आदेश दिया है। इस रकम में डेथ क्लेम के तौर पर 9.9 लाख रुपये और मानसिक परेशानी व कानूनी खर्च के लिए मुआवजे के तौर पर 5,000 रुपये शामिल हैं।
दरअसल, गाजियाबाद की रहने वाली नीलम मारवाह ने 3 जनवरी, 2017 को शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आयोग के अध्यक्ष अनिल कुमार पुंडीर और सदस्य शैलजा सचान व आरपी सिंह को बताया कि उनके पति पवनीश मारवाह ने 27 नवंबर, 2013 को बीमा कंपनी से 9.95 लाख रुपये की सम एश्योर्ड वैल्यू वाली पॉलिसी खरीदी थी।
5 दिसंबर, 2014 को उनके पति बीमार पड़ गए और बाद में अस्पताल में उनकी मौत हो गई। ऐसे में बीमा कंपनी में पॉलिसी क्लेम करने के बाद LIC ने क्लेम का निपटारा करने से इनकार कर दिया। कंपनी ने नीलम को एक पत्र में बताया कि क्लेम इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि उनके पति ने पॉलिसी लेते समय अपनी पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जानकारी छिपाई थी।
LIC के वकील ने कहा कि शिकायतकर्ता का क्लेम मिलने पर बीमा कंपनी ने कागजात की जांच की और बीमा पॉलिसी की शर्तों के आधार पर क्लेम खारिज कर दिया। साथ ही, 30 मार्च, 2016 को क्लेम खारिज करने का नोटिस भी भेजा गया। इस फैसले से असंतुष्ट होकर कानपुर में बीमा कंपनी के क्षेत्रीय कार्यालय में अपील की गई, लेकिन 30 जुलाई, 2016 को उसे भी खारिज कर दिया गया।
पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जानकारी न देने के आरोप को बेबुनियाद बताते हुए शिकायतकर्ता ने आयोग से राहत की मांग की।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज़ों को देखने के बाद गाजियाबाद आयोग ने कहा कि बीमा अनुबंध पूरी ईमानदारी (utmost good faith) का अनुबंध होता है, लेकिन बीमा कंपनी केवल इसी सिद्धांत के आधार पर मनमाने ढंग से किसी क्लेम को खारिज नहीं कर सकती।
आयोग ने कहा, “जब कोई बीमा कंपनी यह आरोप लगाती है कि बीमा कराने वाले व्यक्ति ने स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरी बातें छिपाई थीं, तो यह साबित करने की जिम्मेदारी उसी कंपनी की होती है कि बताई गई बीमारी असल में थी और पॉलिसी लेते समय वह बीमारी अहम थी और उससे जोखिम पर असर पड़ता था। कंपनी को यह भी साबित करना होगा कि बीमा कराने वाले व्यक्ति को उस बीमारी के बारे में पता था, उसने जान-बूझकर और धोखाधड़ी से ये बातें छिपाई थीं, और बताई गई बीमारी का व्यक्ति की मौत या बीमा से जुड़े जोखिम से अहम और सीधा संबंध था।” आयोग ने आगे कहा कि LIC पेश किए गए दस्तावेज़ों के आधार पर इन बातों को साबित करने में नाकाम रही है।
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