अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को 28 लाख करोड़ रुपए देने की बात को फर्जी बताया है। उन्होंने मंगलवार को ट्रुथ सोशल पर लिखा कि यह विपक्षी पार्टी डेमोक्रेट्स की तरफ से फैलाई गई झूठी खबर है। दरअसल, न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि समझौता होने पर अमेरिका, ईरान को आर्थिक मदद के तौर पर करीब 28 लाख करोड़ रुपए का पैकेज देगा। वहीं, ट्रम्प ने फ्रांस में कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल-थानी से मुलाकात में भी बताया कि अमेरिका अभी ईरान में कोई पैसा नहीं लगा रहा है। उन्होंने कहा, हम ईरान में कोई पैसा निवेश नहीं कर रहे हैं, लेकिन हमें भविष्य में कभी भी वहां जाकर निवेश करने का अधिकार है। साथ ही, ट्रम्प ने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को लेबनान मुद्दे पर ज्यादा जिम्मेदारी दिखाने की सलाह दी है। ट्रम्प ने कहा, “मैं न होता, तो इजराइल नहीं होता। किसी दूसरे अमेरिकी राष्ट्रपति ने इजराइल के लिए उतना नहीं किया, जितना मैंने किया है”। पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… 1. ट्रम्प बोले- ईरान शर्तें पूरी करे तभी राहत मिलेगी: अमेरिकी राष्ट्रपति ने साफ किया कि ईरान को प्रतिबंधों से राहत तभी मिलेगी, जब वह समझौते की सभी शर्तों का पालन करेगा। अमेरिका ने फिलहाल किसी भी तत्काल आर्थिक राहत से इनकार किया है। 2. इजराइल ने डील से किनारा किया: इजराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतमार बेन ग्वीर ने कहा कि यह ट्रम्प की डील है और इजराइल इससे बंधा नहीं है। वहीं रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने भी साफ किया कि दक्षिणी लेबनान से सेना नहीं हटेगी। 3. मैक्रों ने यूरेनियम पर शर्त रखी: फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार को निष्क्रिय कर IAEA की निगरानी में रखा जाना चाहिए, ताकि उसका इस्तेमाल परमाणु हथियारों के लिए न हो सके। 4. ईरान ने समझौते को अपनी जीत बताया: ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने अमेरिका के साथ हुए समझौते को ‘जीत का दस्तावेज’ बताया। उन्होंने कहा कि इजराइल की नाराजगी ही साबित करती है कि बातचीत में ईरान मजबूत स्थिति में रहा। 5. दुनियाभर के देशों ने समझौते का स्वागत किया: UAE, कुवैत, स्विट्जरलैंड, कतर और पाकिस्तान समेत कई देशों ने अमेरिका-ईरान समझौते को क्षेत्रीय शांति और स्थिरता की दिशा में बड़ा कदम बताया है। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…
पीएम मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के बीच फ्रांस के एवियन शहर में G-7 समिट के दौरान मुलाकात हुई। दोनों के बीच करीब 5 मिनट तक बात हुई। मीटिंग में दोनों एक-साथ बैठे नजर आए। यह मुलाकात 16 महीनों के बाद हुई है। प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति G7 आउटरीच सेशन में भी साथ-साथ बैठे नजर आए। दोनों की पिछली मुलाकात फरवरी 2025 में व्हाइट हाउस में हुई थी। G-7 समिट के लिए मंगलवार दोपहर एवियन पहुंचने पर मोदी का फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्वागत किया। G-7 के देशों के राष्ट्राध्याक्षों ने ग्रुप फोटो भी खिंचवाई। इसी बीच मोदी और इटालियन पीएम जॉर्जिया मेलोनी की बातचीत भी हुई। मेलोनी ने मोदी से कहा- दोबारा मिलकर अच्छा लगा, हम इंस्टाग्राम पर सबसे फेमस हैं। मोदी पिछले महीने 5 देशों के दौरे पर गए थे। जहां उन्होंने रोम में पीएम मेलोनी को मेलोडी टॉफी दी थी। जिसका वीडियो वायरल हो गया था। पार्टनर देश के तौर पर शिखर सम्मेलन में भारत की 13वीं मौजूदगी है। यह 7वीं बार है जब प्रधानमंत्री इस ग्लोबल फोरम में हिस्सा ले रहे हैं। मोदी-ट्रम्प की मुलाकात की 2 तस्वीरें…. मोदी ट्रम्प की मीटिंग कल, ट्रेड डील पर चर्चा हो सकती है PM मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प कल 17 जून की शाम 6:30 बजे द्विपक्षीय मीटिंग करेंगे। इस दौरान ट्रेड डील पर चर्चा हो सकती है। व्हाइट हाउस के एक बयान के मुताबिक भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ, निवेश और रणनीतिक साझेदारी से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। मोदी- मेलोनी की मुलाकात की तस्वीर मोदी हाई लेवल वर्किंग सेशन में शामिल हुए पीएम मोदी जिस सेशन में शामिल हुए वह हाई लेवल वर्किंग सेशन था। इसकी थीम ‘नई साझेदारियां बनाना और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता को फिर से कायम करना’ थी। इस सेशन में G7 देशों के नेता, सहयोगी देशों के नेता और वर्ल्ड बैंक और अफ्रीकन डेवलपमेंट बैंक के प्रमुख प्रतिनिधि शामिल हुए। सेशन में मोदी की स्पीच के 6 पॉइंट्स G7 समिट की तस्वीरें… G7 समिट में 12 देशों के नेता हिस्सा ले रहे G7 समिट में इसके सदस्य देशों कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका के नेता शामिल होंगे। इसके अलावा यूरोपीय संघ के प्रतिनिधि भी इसमें भाग ले रहे हैं। फ्रांस ने समिट में G7 देशों के अलावा कई अन्य देशों के नेताओं को भी सम्मेलन में आमंत्रित किया है। इनमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज, नासियो लूला दा सिल्वा, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्यंग, केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो भी शामिल हैं। G7 क्या है, इसमें कौन-कौन से देश हैं? G7 यानी ‘ग्रुप ऑफ सेवन’, दुनिया के उन 7 देशों का समूह है, जिन्हें दुनिया की ‘मॉडर्न इकोनॉमी’ वाला देश कहा जाता है। इनमें अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, इटली, कनाडा और जर्मनी शामिल हैं। इसकी शुरुआत 1975 में G6 के रूप में हुई थी। 1976 में कनाडा के जुड़ने के बाद यह G7 बन गया। 1998 में रूस को शामिल कर इसका नाम G8 कर दिया गया, लेकिन 2014 में यूक्रेन के क्रीमिया क्षेत्र पर रूस के कब्जे के बाद उसे समूह से बाहर कर दिया गया। इसके बाद यह फिर से G7 कहलाने लगा। भारत G7 में गेस्ट नेशन, पीएम 7वीं बार शामिल हुए भारत G7 का सदस्य नहीं है, लेकिन दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्था और महत्वपूर्ण वैश्विक भूमिका के कारण उसे अक्सर विशेष आमंत्रित देश (गेस्ट नेशन) के रूप में बुलाया जाता है। आमतौर पर भारत के प्रधानमंत्री को समिट का न्यौता मिलता है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 से 2013 के बीच पांच बार G7 (पहले G8) समिट में हिस्सा लिया था। PM मोदी को पहली बार 2019 में फ्रांस के बियारिट्ज में आयोजित G7 समिट में आमंत्रित किया गया था। 2020 में अमेरिका को मेजबानी करनी थी, लेकिन उसने तब समिट रद्द कर दी। इसके बाद 2021 में ब्रिटेन की मेजबानी में आयोजित सम्मेलन में PM मोदी वर्चुअली शामिल हुए। इसके अलावा मोदी 2022 में जर्मनी, 2023 में जापान, 2024 में इटली और 2025 में कनाडा में आयोजित G7 समिट में शामिल हुए। G7 समिट क्या है, इस बार इसके एजेंडे की खास बात क्या है एक तय एजेंडे पर बातचीत के लिए हर साल G7 समिट होती है, जिसका आयोजन G7 का अध्यक्ष देश करता है। दरअसल, G7 के सभी 7 देश बारी-बारी से इसकी अध्यक्षता करते हैं। इस साल फ्रांस अध्यक्षता कर रहा है। ऐसे में G7 समिट फ्रांस के एवियन शहर में हो रही है। इस समिट के एजेंडे में जियोपॉलिटिक्स क्राइसेस (यूक्रेन युद्ध, ईरान-इजराइल तनाव, गाजा, लेबनान और होर्मुज रूट की स्थिति, मध्य पूर्व की सुरक्षा चुनौतियां), वैश्विक आर्थिक सहयोग और असंतुलन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के मुद्दे शामिल हैं। इसके अलावा G7 के सदस्य देशों के लीडर्स और ऑफिसर्स साल में कई बैठकें करते हैं, जिनमें कई समझौते होते हैं और दुनिया की बड़ी घटनाओं पर आधिकारिक बयान जारी किए जाते हैं। शुरुआत में G7 का एजेंडा आर्थिक चुनौतियों और क्लाइमेट चेंज जैसे मुद्दों का हल निकालना था। बाद में राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी इसमें शामिल हो गए। वैश्विक मुद्दों पर G7 के फैसलों का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। उदाहरण के लिए G7 ने 2002 में मलेरिया और एड्स से लड़ने के लिए ग्लोबल फंड बनाया। 1998 में वित्तीय संकट के दौरान इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों को आर्थिक मदद की। रूस-यूक्रेन जंग के दौरान रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने और यूक्रेन की मदद करने का फैसला किया। G20 से कैसे अलग है G7 G7 का कोई स्थायी कार्यालय नहीं है और इसके सदस्य देश कोई अंतरराष्ट्रीय कानून पारित नहीं कर सकते। G20 में सबसे बड़ा मुद्दा वर्ल्ड इकोनॉमी होता है, जबकि G7 के लिए राजनीतिक मुद्दे भी अहम होते हैं। 1999 में बने G20 में G7 के देशों के अलावा BRICS के देश भी शामिल हैं। इन देशों में भारत के अलावा अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, चीन, इंडोनेशिया, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, तुर्किये और यूरोपीय संघ शामिल हैं। राजन कुमार के मुताबिक G20 में नई और बढ़ती हुई इकोनॉमी वाले देशों को भी शामिल किया गया है। भले ही G7 और G20 का एजेंडा एक जैसा हो, लेकिन इस समय G20 ज्यादा प्रभावी गुट है। 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी G7 को बहुत आउटडेटेड ग्रुप कहा था। ————————— ये खबरें भी पढ़ें… भारत-फ्रांस के बीच FTA, डिफेंस और AI से जुड़े 13 बड़े समझौते हुए फ्रांस के नीस शहर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ रविवार को द्विपक्षीय बैठक की। इसमें प्रधानमंत्री के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, विदेश सचिव विक्रम मिस्री भी शामिल रहे। इस दौरान दोनों देशों के बीच 13 बड़े समझौते हुए। पढ़ें पूरी खबर… पीएम मोदी ने स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री को भारत आने का न्योता दिया; मोदी का ब्रेड-नमक से स्वागत हुआ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्लोवाकियन पीएम रॉबर्ट फिको के बीच बातचीत के बाद द्विपक्षीय डिफेंस और ट्रेड डील हुई। ब्रातिस्लावा के महल में स्लोवाकिया के पीएम रॉबर्ट फिको से मुलाकात के बाद मोदी ने फिको को भारत आने का न्योता भी दिया। मोदी को पारंपरिक स्लोवाक रीति से ब्रेड और नमक भेंट किया गया। पढ़ें पूरी खबर…

रिलायंस जियो ने मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ (MP-CG) टेलीकॉम सर्किल में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। सर्किल में कंपनी के मोबाइल ग्राहकों की संख्या 5 करोड़ के बेहद करीब पहुंच गई है, वहीं ब्रॉडबैंड उपभोक्ताओं का आंकड़ा 20.3 लाख से अधिक हो गया है।
टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, जियो इस क्षेत्र में शीर्ष पर बना हुआ है। अकेले अप्रैल महीने में मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में जियो से 3.5 लाख नए मोबाइल ग्राहक जुड़े। इसी अवधि में एयरटेल ने लगभग 1 लाख और बीएसएनएल ने करीब 10 हजार नए मोबाइल ग्राहक जोड़े।
सर्किल में सभी कंपनियों के कुल मोबाइल ग्राहकों की संख्या 8.6 करोड़ से अधिक है। बाजार हिस्सेदारी के मामले में भी जियो का दबदबा बरकरार है; मोबाइल सेवाओं में जियो की बाजार हिस्सेदारी 58.1 प्रतिशत और ब्रॉडबैंड सेवाओं में 61 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।
5G नेटवर्क पर डेटा ट्रैफिक में 50% से अधिक की वृद्धि
ग्राहकों की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए जियो अपने 5G नेटवर्क का लगातार विस्तार कर रहा है। बेहतर कवरेज और तेज स्पीड के कारण जियो के 5G नेटवर्क पर डेटा ट्रैफिक में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हाल ही में रायपुर में आयोजित आईपीएल (IPL) मैचों के दौरान भी देखा गया, जहां भारी डेटा उपयोग के बावजूद जियो नेटवर्क और जियोहॉटस्टार सेवाओं ने निर्बाध (seamless) प्रदर्शन किया।
जियोफाइबर और एयरफाइबर का तेजी से विस्तार
वर्क-फ्रॉम-होम और हाइब्रिड कार्य प्रणाली को सपोर्ट करने के लिए जियोफाइबर और जियो एयरफाइबर (FWA) सेवाएं मप्र-छग के अधिकांश ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में उपलब्ध हैं। इसी का परिणाम है कि अप्रैल में 31.5 हजार से अधिक नए ग्राहकों ने जियो ब्रॉडबैंड को अपनाया।
मात्र ₹200 में एंटरटेनमेंट पैक और क्लाउड स्टोरेज
जियो ने ग्राहकों के मनोरंजन के लिए हाल ही में आकर्षक एंटरटेनमेंट पैक लॉन्च किए हैं। इसके तहत उपभोक्ता मात्र ₹200 में 15 ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स, 1000 से ज्यादा टीवी चैनल और 30 जीबी डेटा प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, व्यवसायों के लिए जियो ने इनोवेटिव 'मैनेज्ड वाई-फाई' समाधान पेश किए हैं, जिनकी विशेषता यह है कि ग्राहकों को किसी प्रकार के शुरुआती निवेश या महंगे उपकरण खरीदने की आवश्यकता नहीं होती।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में बढ़ते खर्च को देखते हुए 'जियोपीसी' (JioPC) एक प्रभावी, किफायती और क्लाउड-आधारित कंप्यूटिंग समाधान के रूप में उभर रहा है। इसके साथ ही जियो अपने 5G उपयोगकर्ताओं को 500 जीबी तक की क्लाउड स्टोरेज सुविधा भी दे रहा है, जो छात्रों और प्रोफेशनल्स के लिए बेहद उपयोगी है।
कंपनी का कहना है कि ग्राहकों की बढ़ती डिजिटल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नेटवर्क और सेवाओं का लगातार विस्तार किया जा रहा है। इच्छुक ग्राहक कंपनी की वेबसाइट www.jio.com पर जाकर अपनी आवश्यकतानुसार पंजीकरण करा सकते हैं। Edited by: Sudhir Sharma

शरद पवार ने देश की विदेश नीति पर आंतरिक राजनीतिक व्यवहार के संदर्भ में जो कुछ कहा है उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के बाहर देश की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। हमारे राजनीतिक विचार अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन जब देश के सम्मान की बात आती है तो राजनीतिक मतभेदों को बीच में नहीं लाना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच दिवसीय विदेश यात्रा पर भारत के अंदर राजनीतिक व गैर राजनीतिक मोर्चे पर हो रही टिप्पणियों के संदर्भ में उनका यह मंतव्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात से आरंभ कर स्वीडन, नीदरलैंड, ज्नॉर्वे और इटली की द्विपक्षीय यात्रा की तथा नार्वे की राजधानी ओस्लो में स्कैंडिनेवियाई भारत शिखर सम्मेलन में शामिल हुए।
प्रधानमंत्री के समक्ष अपने राष्ट्रीय हित को साधने का उद्देश्य था और इन यात्राओं पर विशेषज्ञों का मत यही है कि उसमें उन्हें अधिकतम सफलता मिली। किंतु राजनीतिक और गैर राजनीतिक एक्टिविज्म और सोशल मीडिया पर उनके विदेश में रहते हुए ही हमले शुरू हो गए। सारे हमलों व आलोचनाओं के हल्ला बोल में ऐसा एक तथ्य नहीं आया जिसमें बताया गया हो कि अमुक बिंदु पर प्रधानमंत्री ने अपने राष्ट्रीय हित के अनुकूल काम नहीं किया।
जाहिर है कि विरोध केवल राजनीतिक मतभेदों और असहमतियों के इर्द-गिर्द था। यह चिंताजनक है क्योंकि भारत की भौगोलिक सीमाओं के अंदर की राजनीतिक असहमतियां और मतभेद सीमाओं से बाहर चला जाए तो राष्ट्रीय हित प्रभावित होता है। इसका अर्थ है कि हम देश हित को प्राथमिकता देने की जगह अपने राजनीतिक, व्यक्तिगत हित को प्राथमिकता दे रहे हैं या फिर हमारा वैचारिक दुराग्रह हावी है।
ऐसा नहीं है कि पवार की मोदी से पूरी तरह सहमति है। महाराष्ट्र में आज शरद पवार की राकांपा शक्तिहीन है तो इसी कारण क्योंकि स्वर्गीय अजीत पवार ने विद्रोह कर भाजपा से हाथ मिला लिया। बावजूद हमारी पारंपरिक राजनीति, जिसका प्रतिनिधित्व करने वाले गिने-चुने नेता रह गए हैं, में यही व्यवहार लंबे समय तक रहा है। देश में हमारी असहमति होती है, आरोप – प्रत्यारोप करते हैं लेकिन जब विदेशों की, अंतरराष्ट्रीय मंच की बात आती है तो देश साथ खड़ा होता है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर या विदेश में प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक दल का नहीं भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहां केवल राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए। पत्रकारिता में भी अनेक बार प्रधानमंत्री या दूसरे मंत्रियों के विदेश में दिए बयानों से असहमति होती थी लेकिन वरिष्ठ लोग बताते थे कि विदेश नीति पर हमारी आलोचना का स्वर ऐसा नहीं हो सकता। अपवाद हर समय रहे हैं पर पर वह कभी मुख्य धारा नहीं बना।
इसलिए ज्यादातर विदेशी यात्राओं या विदेशी मेहमानों के भारत आगमन पर हुए समझौते आदि पर राजनीतिक दलों व मीडिया की ध्वनि एक समान होती थी। जैसे-जैसे राजनीतिक मतभेद बढ़े, भारत और वैश्विक स्तर पर अलग-अलग राजनीतिक धाराओं, निहित स्वार्थी संगठनों, समूहों के बीच संपर्क संबंध बढ़ा इस स्वाभाविक व्यवहार में अंतर आता गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता शीर्ष पर आने के बाद यह अतिवाद तक चला गया है। इसी का प्रकटीकरण इस समय दिखा है।
एक भारतवासी के नाते इस समय हमारा उद्देश्य क्या होना चाहिए? पश्चिम एशिया संकट यानी ईरान अमेरिका इजरायल टकराव और तनाव ने ईंधन आपूर्ति में उथल-पुथल पैदा कर दिया है। हार्मूज जलडमरूमध्य की खतरनाक नाकेबंदी से निपटना विश्व के लिए मुश्किल हो रहा है।
इसमें पेट्रोल डीजल आदि के लिए आयात पर निर्भर भारत या अन्य देशों के लिए दूरगामी दृष्टि से आपूर्ति की सुनिश्चित व्यवस्था करना, देशों के संबंधों में हो रहे बदलावों के साथ सामंजस्य स्थापित करना या अस्थिरता के काल में उसका आधार बनाते रहना तथा भविष्य में बनने वाले अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की दृष्टि से ऐसी स्थिति में होना ताकि देश के रूप में हम कहीं अलग-थलग न पड़ें।
मोटा-मोटी प्रधानमंत्री की यात्रा में यही लक्ष्य समाहित होंगे। इन सबमें यहां विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं। आप चाहे भाजपा के सरकार के विरोधी हों या समर्थक दृष्टि एक ही होनी चाहिए कि प्रधानमंत्री की यात्राओं के दौरान उन देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय और प्रतिनिधिमंडलों की बातचीत, संयुक्त घोषणाओं तथा संपन्न समझौतों में क्या-क्या हुआ? जब आप गहराई से उन सबको देखेंगे तो आपका विचार अपने आप बदल जाएगा। दुर्भाग्य से हम उन पर सरसरी दृष्टि भी डालना नहीं चाहते।
किसी पत्रकार ने नॉर्वे में दोनों प्रधानमंत्रियों के स्वागत वक्तव्य में निर्धारित प्रोटोकॉल के विपरीत जबरन कैमरे घूमाकर भारत के प्रधानमंत्री से मानवाधिकार एवं प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रश्न पूछे और वह हमारे लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गया। नॉर्वे के साथ हमारे समझौते, हमारे यहां पेंशन फंड से 28 अरब डॉलर के निवेश की योजना, ब्लू इकोनामी साझेदारी, हरित साझेदारी आदि पर हमने चर्चा नहीं की।
यही नहीं नॉर्दिक भारत शिखर सम्मेलन में औपचारिक रूप से ट्रस्टेड ग्रीन टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप यानी विश्वसनीय हरित तकनीक एवं अन्वेषण रणनीतिक साझेदारी का दर्जा मिलना और कातिक परिषद में भी पर्यवेक्षक की हैसियत हासिल करना इनके लिए हास्य पर चला गया।
इसी तरह इटली की यात्रा में प्रधानमंत्री ने पार्ले कंपनी के सामान्य मेलोडी ट्रॉफी वहां की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी को भेंट करते हुए एक रोचक वीडियो पोस्ट किया। इटली के साथ हमारी ठोस विशेष रणनीतिक साझेदारी कायम हुई, भारत और इटली में निर्माण करो तथा विश्व को आपूर्ति करो का ढांचा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत के स्थान की दृष्टि से महत्वपूर्ण था, अनेक मुद्दों पर हमारे साथ सहमति बनी जिनमें आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष भी है।
इस यात्रा में स्वीडन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया और काम करने वाली पत्रकार और कार्टून छापने वाले अखबार के देश नार्वे ने भी। संयुक्त राष्ट्र संघ की खाद्य और कृषि संगठन ने प्रधानमंत्री को विशेष रूप से सम्मानित किया। इन सब पर चर्चा की जगह हमारे यहां टौफी वीडियो को लेकर ऐसी टिप्पणियां की जा रही है जिनमें कई को देखने सुनने या पढ़ने में शर्म आए। भारत जैसे देश में विमर्श का यह स्तर किसी को भी अंदर से परेशान कर देगा।
क्या हम ऐसा करते समय विचार भी नहीं करते कि एक देश के रूप में विदेश में हमारी कैसी छवि बनेगी? यहीं पर शरद पवार का यह कथन प्रासंगिक हो जाता है कि जब भी राष्ट्रीय हित के लिए सामूहिक रूप से काम करने का मौका मिले तो सभी को एक साझा उद्देश्य के साथ जुड़ना चाहिए और देश की प्रतिष्ठा मजबूत करने में मदद करनी चाहिए। कोई भी प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री देश के बाहर होते हैं तो अपने दृष्टिकोण से वह देश के भविष्य और सम्मान को ही केंद्र में रखते हैं। कई बार इनमें गलतियां भी हुई है।
आज के दौर के अनुसार उनकी आलोचना भी अस्वाभाविक नहीं है किंतु आलोचना तथ्यों के आधार पर होगी। अखिर जॉर्जिया मेलोनी को मेलोडी ट्रॉफी भेंट करने से हमारी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को कैसे नुकसान पहुंचा? इटली प्राचीन सभ्यता संस्कृति वाला यूरोप का महत्वपूर्ण और मजबूत देश है।
वर्तमान तनावपूर्ण अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में दो प्रधानमंत्रियों के बीच इस तरह के सहज संबंध, मुस्कान और ठहाके कूटनीति की दुनिया में बहुत बड़ी उपलब्धि है। एक बार दो नेताओं के बीच सहज सामान्य संवाद निर्मित हो गए तो जटिल से जटिल मुद्दों पर भी सहमति बनती है तथा रास्ता निकल जाता है। दूसरे, इससे हमारे देश के एक सामान्य ब्रांड का भी जबरदस्त विपणन हुआ। इस विषय पर स्थापित अंतरराष्ट्रीय मीडिया की टिप्पणियां देखेंगे तो सकारात्मक भाव पैदा होगा।
कूटनीति में एक सामान्य वस्तु का उपयोग कर माहौल बदल देना, दुनिया को संदेश देना और उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परस्पर व्यवहार का रास्ता दिखा देना सामान्य बात नहीं है। अभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का चीन दौरा हुआ और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी बातचीत के सारे तस्वीर और वीडियो देख लीजिए।
इसके बाद रुस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की चीन यात्रा हुई। दोनों नेताओं के सारे तस्वीर और वीडियो देख लीजिए। पुतिन और शी जिनपिंग के बीच सामान्य संबंध हैं। बावजूद उनके व्यवहार में सहज मुस्कान नहीं दिखेगा।
तनावपूर्ण और अनिश्चितताओं की दुनिया में दो महत्वपूर्ण देश के नेताओं के बीच सरल सहज मुस्कान और संबंध कूटनीति के लिए नया मानक है। कायदे से देश में इसकी प्रशंसा होनी चाहिए। भारत ने अपने लक्ष्य के अनुरूप यात्रा से सारी उपलब्धियां हासिल की जिसकी ओर तत्काल दृष्टि थी।
दूसरे देश भी अपने हित के अनुसार काम कर रहे थे और उन्हें भी प्राप्त हुआ। पर मूल बात यह है कि हम एक राष्ट्र के रुप में कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं? शरद पवार जैसे वरिष्ठ नेता अब ज्यादा उपलब्ध नहीं है कि सामने आकर रास्ता दिखाएं। ज्यादातर जा चुके हैं। हमें ही अपने हर व्यवहार पर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देकर स्वयं को बदलना होगा।
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3-3 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी का असर अब सिर्फ ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की चीजों तक सीमित नहीं रह सकता। बढ़ती ईंधन कीमतों का असर जल्द ही मोबाइल रिचार्ज प्लान पर भी देखने को मिल सकता है। टेलीकॉम सेक्टर से जुड़ी रिपोर्ट्स के अनुसार, डीजल और बिजली की लागत बढ़ने से कंपनियां अपने मोबाइल टैरिफ महंगे करने पर विचार कर सकती हैं।
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मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में पेट्रोल की कीमत 107 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच चुकी है। ऐसे में देशभर में महंगाई को लेकर चिंता बढ़ गई है। अब आशंका जताई जा रही है कि आने वाले महीनों में मोबाइल रिचार्ज प्लान भी महंगे हो सकते हैं।
मोबाइल टावर चलाने में बढ़ेगा खर्च
रिपोर्ट्स के मुताबिक मोबाइल टावर ऑपरेट करने में बिजली और ईंधन की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत होती है। खासतौर पर दूरदराज इलाकों में डीजल जनरेटर के जरिए टावर चलाए जाते हैं। ऐसे में डीजल महंगा होने का सीधा असर टेलीकॉम कंपनियों की लागत पर पड़ेगा।
5G नेटवर्क बना नई चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि 5G नेटवर्क के विस्तार के साथ बिजली की खपत और तेजी से बढ़ी है। 5G टावर पारंपरिक टावरों की तुलना में ज्यादा ऊर्जा इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में बढ़ती ईंधन कीमतों के कारण कंपनियों का खर्च और बढ़ सकता है।
बताया जा रहा है कि बड़ी टेलीकॉम कंपनियों जैसे Reliance Jio, Bharti Airtel और Vodafone Idea को सिर्फ डीजल खर्च में ही हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ सकते हैं।
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बढ़ सकते हैं मोबाइल रिचार्ज प्लान
टेलीकॉम इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि यदि ईंधन कीमतों में लगातार बढ़ोतरी जारी रही तो कंपनियां इसकी भरपाई ग्राहकों से कर सकती हैं। इसके चलते प्रीपेड और पोस्टपेड मोबाइल रिचार्ज प्लान महंगे हो सकते हैं।
हालांकि अभी कंपनियों की ओर से आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन इंडस्ट्री में टैरिफ बढ़ोतरी की चर्चा तेज हो गई है। पिछले कुछ वर्षों में 5G निवेश और नेटवर्क विस्तार के कारण भी कंपनियों पर आर्थिक दबाव बढ़ा है।
आम लोगों पर बढ़ेगा बोझ
अगर मोबाइल रिचार्ज प्लान महंगे होते हैं तो इसका असर करोड़ों मोबाइल उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा। पहले से ही पेट्रोल-डीजल, दूध, खाने का तेल और रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतों से परेशान लोगों के लिए यह एक और बड़ा झटका साबित हो सकता है। Edited by : Sudhir Sharma

OpenAI के सैकड़ों कर्मचारी अब करोड़पति बन चुके हैं। पिछले साल अक्टूबर में कंपनी ने कर्मचारियों को 3 करोड़ डॉलर तक के शेयर बेचने की अनुमति दी थी, जिससे वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) बूम से सबसे पहले बड़ा फायदा उठाने वालों में शामिल हो गए। AI सेक्टर में तेजी से बढ़ती संपत्ति का यह बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। हालांकि, कुछ कर्मचारियों ने अपने बचे हुए शेयर दान संबंधी फंड्स में डाल दिए, ताकि सामाजिक कार्यों में योगदान देने के साथ टैक्स छूट का लाभ भी मिल सके।
रिपोर्ट के अनुसार, करीब 600 वर्तमान और पूर्व कर्मचारियों ने पिछले साल अपने शेयर बेचे। इस सौदे के तहत निवेशकों को कंपनी के शुरुआती कर्मचारियों के पास मौजूद शेयर खरीदने की अनुमति दी गई थी। सामूहिक रूप से इन कर्मचारियों ने करीब 6.6 अरब डॉलर की कमाई की। The Wall Street Journal की रिपोर्ट के मुताबिक, 75 कर्मचारियों ने अधिकतम सीमा तक शेयर बेचकर करीब 3 करोड़ डॉलर प्रति व्यक्ति हासिल किए, जबकि औसत भुगतान लगभग 1.1 करोड़ डॉलर रहा।
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The Telegraph के अनुसार, OpenAI कर्मचारियों को अपने शेयर नकद कराने से पहले दो साल तक इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में पिछले साल का यह सौदा उन शुरुआती मौकों में से एक था, जब निवेशक कर्मचारियों के शेयर खरीद सके। कंपनी ने 2022 के आखिर में अपना चर्चित AI चैटबॉट ChatGPT लॉन्च किया था।
OpenAI ने 2019 में अपना लाभ कमाने वाला सब्सिडियरी मॉडल शुरू किया था, तब कंपनी का मूल्यांकन करीब 1 अरब डॉलर था। बाद में Microsoft के निवेश और ChatGPT की सफलता के बाद 2023 में कंपनी की वैल्यू 29 अरब डॉलर तक पहुंच गई। रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर 2025 में निजी शेयरों की बिक्री के समय कंपनी का मूल्यांकन 500 अरब डॉलर था। वहीं इस साल मार्च में 122 अरब डॉलर का निवेश जुटाने के बाद OpenAI की वैल्यू 852 अरब डॉलर से ज्यादा आंकी गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह सिर्फ शुरुआत है और आने वाले समय में अमेरिका के बे एरिया समेत कई टेक शहरों में बड़ी संपत्ति बनने की लहर देखने को मिल सकती है। The Wall Street Journal के अनुसार, OpenAI और Anthropic इतिहास के दो सबसे बड़े IPO की तैयारी कर रहे हैं। इससे इन कंपनियों के कर्मचारियों को अपने शेयर बेचने का मौका मिलेगा और बड़ी संख्या में लोग मल्टीमिलियनेयर बन सकते हैं।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि AI बूम से पैदा हो रही यह संपत्ति अभूतपूर्व है। डॉट-कॉम दौर में कई कर्मचारियों को IPO के बाद तक इंतजार करना पड़ता था और कई मामलों में बाजार गिरने से उन्हें लाभ नहीं मिल पाया। हालांकि Google और Facebook के शुरुआती कर्मचारियों ने भी भारी कमाई की थी, लेकिन AI स्टार्टअप्स में इस बार कहीं ज्यादा कर्मचारियों को फायदा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। Edited by : Sudhir Sharma

बैडमिंटन विश्व महासंघ (बीडब्ल्यूएफ) ने शनिवार को डेनमार्क के हॉर्सन में अपनी सालाना आम बैठक में 3×15 स्कोरिंग प्रणाली को अपनाने की मंजूरी दे दी। इस प्रस्ताव को डाले गए वोट में से जरूरी दो-तिहाई बहुमत मिल गया।अब 3×15 स्कोरिंग प्रणाली चार जनवरी 2027 से लागू होगी।बीडब्ल्यूएफ की अध्यक्ष खुनयिंग पटामा लीस्वाड्ट्राकुल ने कहा कि यह फैसला बैडमिंटन के भविष्य के लिए एक अहम मील का पत्थर है।
लीस्वाड्ट्राकुल ने कहा, ‘‘हम एक ऐसा खेल तैयार कर रहे हैं जो अगली पीढ़ी से जुड़ा हो, और साथ ही हम अपने खिलाड़ियों के लंबे समय के भविष्य में भी निवेश करते रहेंगे। ’ उन्होंने कहा, ‘‘3×15 स्कोरिंग प्रणाली का मकसद बैडमिंटन को और भी ज़्यादा रोमांचक और प्रतिस्पर्धी बनाना, बेहतर शेड्यूल, मैचों की अवधि में ज्यादा एकरूपता लाना, और खिलाड़ियों की भलाई और उबरने के लिए संभावित फायदे देना है। ’’
विश्व संस्था ने एक बयान में कहा कि यह फैसला लंबे समय तक चली टेस्टिंग, विश्लेषण और सदस्यों व हितधारकों के साथ सलाह-मशविरे की प्रक्रिया के बाद लिया गया है।
यह बीडब्ल्यूएफ के सदस्यों की सामूहिक राय को दिखाता है जो खिलाड़ियों की भलाई, और खिलाड़ियों को लंबे व ज्यादा सफल करियर बनाने में मदद करने की प्रतिबद्धता से प्रेरित है।
The #BWF membership has voted to approve the adoption of the 3×15 scoring system.
Read more https://t.co/DkFphb3fgo#badminton pic.twitter.com/18o22irlHf
— BWF (@bwfmedia) April 25, 2026
भारत की प्रमुख खिलाड़ियों ने पहले इस कदम पर अपनी आपत्तियां जताई थीं और मौजूदा 21 अंक की प्रणाली का समर्थन किया था जिनमें दो बार की ओलंपिक पदक विजेता पीवी सिंधू, पूर्व मुख्य कोच विमल कुमार और ओलंपिक पदक विजेता साइना नेहवाल शामिल हैं।
कुछ हितधारकों द्वारा उठाई गई चिंताओं का जवाब देते हुए लीस्वाड्ट्राकुल ने कहा कि बैडमिंटन का मूल स्वरूप नहीं बदलेगा।
उन्होंने कहा, ‘‘हम जानते हैं कि बदलाव से चिंताएं पैदा हो सकती हैं, खासकर ऐसे खेल में जिसकी परंपराएं इतनी मजबूत हैं। लेकिन यह फैसला बैडमिंटन के बुनियादी स्वरूप को नहीं बदलता है। खेल के कौशल, रणनीतियां, शारीरिक और मानसिक चुनौतियां, और इसका रोमांच सब कुछ वैसा ही रहेगा। ’’

नई-नई AI तकनीकों के आने से न सिर्फ टेक्नोलॉजी सेक्टर बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और रोज़मर्रा की जिंदगी में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ वर्षों में AI दुनिया की सबसे प्रभावशाली तकनीक बन सकती है। टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI इंसानों के जीवन का अहम हिस्सा बन जाएगा। ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और स्मार्ट टेक्नोलॉजी के जरिए काम करने का तरीका पूरी तरह बदल सकता है। दुनिया तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दिशा में आगे बढ़ रही है।
AI की दौड़ में बड़ी कंपनियां
दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां AI को लेकर भारी निवेश कर रही हैं। कई कंपनियां ऐसे AI मॉडल विकसित कर रही हैं जो इंसानों की तरह सोचने, समझने और निर्णय लेने में सक्षम होंगे।
कई क्षेत्रों में बदल रही तस्वीर
AI की मदद से अब ऑटोमेशन तेजी से बढ़ रहा है। डेटा एनालिसिस आसान हो रहा है। रोबोटिक्स और मशीन लर्निंग का उपयोग बढ़ रहा है। इससे उद्योगों की कार्यक्षमता भी काफी बढ़ रही है। AI तकनीक का असर अब कई क्षेत्रों में साफ दिखाई देने लगा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में AI की मदद से बीमारियों का जल्दी पता लगाया जा रहा है।
शिक्षा क्षेत्र में AI आधारित लर्निंग टूल छात्रों की पढ़ाई को आसान बना रहे हैं। व्यापार और उद्योग में कंपनियां AI के जरिए बड़े डेटा का विश्लेषण कर बेहतर निर्णय ले रही हैं।
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चुनौतियां भी कम नहीं
AI तकनीक के कारण स्मार्ट सिटी, स्मार्ट ट्रांसपोर्ट और ऑटोमेटेड सिस्टम का विकास भी तेजी से हो रहा है। कई देशों में AI आधारित ट्रैफिक मैनेजमेंट और सुरक्षा सिस्टम लागू किए जा रहे हैं। हालांकि AI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कई पारंपरिक नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं डेटा सुरक्षा और प्राइवेसी का खतरा बढ़ सकता है। AI के गलत इस्तेमाल को रोकना भी बड़ी चुनौती होगी।
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भविष्य में क्या होगा?
तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI इंसानों के जीवन का अहम हिस्सा बन जाएगा। ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और स्मार्ट टेक्नोलॉजी के जरिए काम करने का तरीका पूरी तरह बदल सकता है। कुल मिलाकर, AI तकनीक आने वाले समय में दुनिया की अर्थव्यवस्था, शिक्षा और जीवनशैली को नई दिशा देने वाली है।
क्या होंगी चुनौतियां
हालांकि AI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई पारंपरिक नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं। डेटा सुरक्षा और प्राइवेसी का खतरा बढ़ सकता है । AI के गलत इस्तेमाल को रोकना भी बड़ी चुनौती होगी। Edited by : Sudhir Sharma

– 7 साल में करेंगे 10 लाख करोड़ रुपए निवेश, जामनगर में गीगावॉट-स्केल AI इंफ्रा
– अंबानी ने कहा- AI, प्रधानमंत्री के विकसित भारत के विज़न को नई गति देगा
– शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि के लिए AI प्लेटफॉर्म लॉन्च
Mukesh Ambani's big announcement : उद्योगपति मुकेश अंबानी ने इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में ऐलान किया कि जिस तरह जियो ने देश में डेटा सस्ता किया, उसी तरह अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को भी आम भारतीय तक किफायती दरों पर पहुंचाया जाएगा। उन्होंने कहा कि 'भारत इंटेलिजेंस किराए पर नहीं ले सकता' और जियो देश को इंटरनेट युग के बाद अब 'इंटेलिजेंस एरा' से जोड़ेगा।
इस दिशा में जियो और रिलायंस इंड्स्ट्रीज अगले सात वर्षों में 10 लाख करोड़ रुपए का निवेश करेंगे। अंबानी ने कहा कि यह निवेश भारत में मजबूत AI ढांचा खड़ा करने और आने वाले दशकों के लिए आर्थिक मजबूती सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया जाएगा।
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कंपनी जामनगर में चरणबद्ध तरीके से मल्टी-गीगावॉट AI-रेडी डेटा सेंटर पार्क विकसित कर रही है। 2026 के अंत तक 120 मेगावॉट क्षमता शुरू करने का लक्ष्य है, जिसे आगे गीगावॉट स्तर तक बढ़ाया जाएगा। यह पूरा ढांचा ग्रीन एनर्जी पर आधारित होगा। साथ ही जियो अपने नेटवर्क के जरिए देशभर में ऐसी कंप्यूट क्षमता उपलब्ध कराएगा, जिससे AI सेवाएं कम लागत और तेज़ गति से लोगों, दुकानों, स्कूलों, अस्पतालों और खेतों तक पहुंच सकें।
अंबानी ने जोर देकर कहा कि जियो AI भारतीय भाषाओं में काम करेगा, ताकि किसान, युवा, छात्र और छोटे व्यवसायी अपनी भाषा में इसका लाभ उठा सकें। इसी क्रम में शिक्षा के लिए जियो शिक्षा AI, स्वास्थ्य के लिए जियो आरोग्य AI, कृषि के लिए जियो कृषि और आम उपयोग के लिए जियो भारत IQ जैसे प्लेटफॉर्म पेश किए गए, जो स्थानीय भाषाओं में AI आधारित सहायता उपलब्ध कराएंगे।
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मुकेश अंबानी ने विश्वास जताया कि भारत 21वीं सदी में अग्रणी AI शक्ति बन सकता है, बशर्ते तकनीक सुलभ, किफायती और देश की जरूरतों के अनुरूप विकसित की जाए। जियो की इन घोषणाओं से संकेत मिलता है कि कनेक्टिविटी के बाद अब कंपनी AI को अगला राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
AI से पैदा होने वाली चिंताओं पर अंबानी ने कहा कि एआई वह मंत्र है जो हर यंत्र को तेज, बेहतर और स्मार्ट तरीके से काम करने की शक्ति देता है। मैं एआई को आधुनिक अक्षय पात्र के रूप में देखता हूं, जो अंतहीन पोषण प्रदान कर सकता है। AI नौकरियां नहीं छीनेगा, बल्कि यह उच्च-कौशल वाले कार्यों में नए अवसर पैदा करेगा।
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अपने संबोधन की शुरुआत में अंबानी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न की सराहना करते हुए कहा कि AI आधारित विकास की यह पहल भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य को नई गति देगी। उन्होंने कहा कि यह पहल न केवल भारत, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों के लिए भी एक प्रेरक मॉडल बन सकती है।
Edited By : Chetan Gour

भारत 19-20 फरवरी 2026 को राजधानी के भारत मंडपम में वैश्विक स्तर का इंडिया–AI इम्पैक्ट समिट 2026 आयोजित करने जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), भारत सरकार इस शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। समिट करीब 65 देश शामिल होंगे। यह पहली बार है जब यह अंतरराष्ट्रीय मंच किसी विकासशील देश में आयोजित किया जा रहा है।
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600 से ज्यादा स्टार्टअप्स की मौजूदगी रहेगी। इस समिट की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस AI एक्शन समिट के दौरान की थी। भारत ने खुद को AI विस्तार के एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करना शुरू कर दिया है। Alphabet की Google, Microsoft और Amazon ने मिलकर 2030 तक भारत में AI और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगभग 68 अरब डॉलर निवेश करने का वादा किया है।
शिखर सम्मेलन को संबोधित करने वाले प्रमुख वक्ताओं में Alphabet के CEO सुंदर पिचाई, OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन, Anthropic के CEO डारियो अमोदेई, रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी और Google DeepMind के CEO डेमिस हसाबिस शामिल हैं। इंडिया–AI इम्पैक्ट समिट 2026 को भारत की AI कूटनीति और वैश्विक तकनीकी नेतृत्व की दिशा में एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है। यह ‘ग्लोबल साउथ’ में आयोजित होने वाला पहला वैश्विक AI शिखर सम्मेलन होगा।
प्रधानमंत्री इस सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे। इसे वर्ष का प्रमुख वैश्विक AI मंच माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य वैश्विक सहयोग के जरिए समावेशी, प्रभावशाली और कार्रवाई-उन्मुख आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को बढ़ावा देना है।
वैश्विक सहयोग की नई दिशा
यूके AI सेफ्टी समिट, AI सियोल समिट, फ्रांस AI एक्शन समिट और ग्लोबल AI समिट ऑन अफ्रीका जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों की निरंतरता में यह सम्मेलन एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। इसका लक्ष्य केवल राजनीतिक घोषणाओं तक सीमित न रहकर, ठोस परिणाम और वास्तविक प्रगति सुनिश्चित करना है। यह समिट वैश्विक AI सहयोग के लिए नई प्राथमिकताओं, ठोस पहल और बहुपक्षीय ढांचे को मजबूत करेगा।
मानवता और सतत विकास पर फोकस
समिट का उद्देश्य AI की परिवर्तनकारी शक्ति को मानवता की सेवा, समावेशी विकास, सामाजिक उन्नति और पर्यावरण संरक्षण के लिए उपयोग करना है। साथ ही, यह ग्लोबल साउथ की आवाज को वैश्विक AI गवर्नेंस में मजबूत करने का प्रयास करेगा, ताकि तकनीकी प्रगति कुछ देशों तक सीमित न रह जाए।
तीन ‘सूत्र’ होंगे आधार
इंडिया–AI इम्पैक्ट समिट तीन मूल स्तंभों या ‘सूत्रों’ पर आधारित होगा—
People (लोग), Planet (पृथ्वी) और Progress (प्रगति)।
ये तीनों सूत्र यह तय करेंगे कि बहुपक्षीय सहयोग के जरिए AI का उपयोग सामूहिक लाभ के लिए कैसे किया जाए।
सात ‘चक्र’ में होगी चर्चा
इन तीन सूत्रों के आधार पर चर्चा सात प्रमुख क्षेत्रों (चक्रों) में संगठित की जाएगी-
- मानव पूंजी (Human Capital)
- सामाजिक सशक्तिकरण के लिए समावेशन
- सुरक्षित और भरोसेमंद AI
- लचीलापन, नवाचार और दक्षता
- विज्ञान
- AI संसाधनों का लोकतंत्रीकरण
- आर्थिक विकास और सामाजिक हित के लिए AI
- प्री-समिट कार्यक्रम भी शुरू
समिट से पहले MeitY कई प्रमुख पहलें आयोजित कर रहा है, जिनका मकसद समावेशी विकास और नवाचार के लिए AI के उपयोग को बढ़ावा देना है।
इनमें शामिल हैं:
AI for ALL: विभिन्न क्षेत्रों में प्रभावी AI समाधान खोजने की वैश्विक चुनौती।
AI by HER: महिला नेतृत्व वाले AI समाधानों को बढ़ावा देने की पहल।
YUVAi: 13-21 वर्ष के युवाओं के लिए वैश्विक नवाचार प्रतियोगिता।
आवेदन और पंजीकरण खुले
इन कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इच्छुक संगठन और प्रतिभागी आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं। आयोजकों को ऐसे सत्र डिजाइन करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है, जो People, Planet और Progress की थीम के अनुरूप हों और वैश्विक AI संवाद को ठोस दिशा दें।
Edited by : Sudhir Sharma

