El Nino Counter: अल-नीनो के खतरे के बीच आई बड़ी खुशखबरी! पॉजिटिव IOD लाएगा झमाझम बारिश, WMO की रिपोर्ट में दावा

India Mansoon Update: मानसून सत्र के दौरान जहां अल-नीनो के असर से सामान्य से कम बारिश का खतरा मंडरा रहा है। वहीं इस बीच एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक पॉजिटिव इंडियन ओशन डिपोल (Positive IOD) बनने की संभावना जताई गई है। यह पॉजिटिव IOD अल-नीनो के निगेटिव इंपैक्ट को आंशिक रूप से बेअसर कर सकता है, जिससे देश भर में बारिश की स्थिति में सुधार होने की उम्मीद है।

क्या है अल-नीनो और पॉजिटिव IOD? समझिए मौसम का गणित

मौसम के इस चक्र और मानसून पर इसके प्रभाव को समझने के लिए दोनों स्थितियों का अंतर जानना जरूरी है। अल-नीनो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह के पानी के गर्म होने का एक जलवायवीय पैटर्न है। भारत में इसका सीधा संबंध कमजोर मानसून और भीषण गर्मी से होता है। पॉजिटिव IOD उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर (Indian Ocean) के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों की समुद्री सतह के तापमान का अंतर है। जब पॉजिटिव IOD बनता है तो इससे मानसून की हवाएं मजबूत होती हैं जो देश में बेहतर और झमाझम बारिश में मदद करती हैं।

दक्षिण भारत को राहत की उम्मीद, 22% की कमी होगी पूरी

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के पूर्वानुमान से उन इलाकों को सबसे ज्यादा राहत मिलने की उम्मीद है जहां अब तक बारिश की कमी रही है। 1 अगस्त तक के आंकड़ों के मुताबिक दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में बारिश की 22% कमी दर्ज की गई है। अब पॉजिटिव IOD के सक्रिय होने से न सिर्फ दक्षिण भारत, बल्कि देश के कई अन्य हिस्सों में भी मानसूनी बारिश की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आ सकता है।

सुपर अल-नीनो जैसी कोई आधिकारिक कैटिगरी नहीं: सरकार

उधर पिछले दिनों केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में अल-नीनो से जुड़े भ्रम को दूर करते हुए स्थिति स्पष्ट की। डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि WMO या पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत आने वाले भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा आधिकारिक तौर पर सुपर अल-नीनो नाम की कोई कैटिगरी परिभाषित नहीं है। भूमध्यरेखीय मध्य प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान की विसंगतियों के आधार पर अल-नीनो घटनाओं को कमजोर, मध्यम, मजबूत या बहुत मजबूत श्रेणियों में बांटा जाता है।

जून में कमजोर, जुलाई में मध्यम हुआ अल-नीनो: IMD का अपडेट

राज्यसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक IMD ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान अल-नीनो स्थितियां विकसित होने की भविष्यवाणी की थी। जून 2026 के दौरान अल-नीनो की स्थिति कमजोर थी, जो जुलाई 2026 में बढ़कर मध्यम स्तर तक पहुंच गई।

अक्टूबर से दिसंबर 2026 के सीजन के दौरान अल-नीनो के और मजबूत होने की संभावना है और यह बहुत मजबूत श्रेणी तक पहुंच सकता है। भारत पर इसका सटीक असर सिर्फ अल-नीनो ही नहीं बल्कि महासागर और वायुमंडल के संयुक्त संबंधों के क्रमिक विकास पर निर्भर करता है।

IMD जारी कर रहा है नियमित चेतावनियां और आईबीएफ रिपोर्ट

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) अल-नीनो और अन्य जलवायु घटकों की लगातार निगरानी कर रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ दूसरे स्टेकहोल्डर्स को नियमित रूप से मौसमी, मासिक और विस्तारित सीमा के पूर्वानुमान जारी किए जा रहे हैं।

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इसके अतिरिक्त, आपदा प्रबंधन अधिकारियों, राज्य सरकारों और जिला प्रशासनों की तैयारियों व त्वरित प्रतिक्रिया में सहायता के लिए IMD दैनिक आधार पर अगले 7 दिनों के लिए प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान और जोखिम-आधारित चेतावनियां दी जा रही हैं।

कमजोर मानसून का असर: खरीफ बुवाई पिछले साल से 6% पीछे, दालों-तिलहन की खेती पर पड़ा ये इंपैक्ट

Weak Monsoon Impact: देश के कई प्रमुख फसल उत्पादक क्षेत्रों में मानसून की भारी कमी और बारिश में देरी का सीधा असर इस साल खरीफ फसलों की बुवाई पर देखने को मिल रहा है। मनी कंट्रोल के ईशान गेरा की रिपोर्ट के मुताबिक 17 जुलाई तक देश में खरीफ फसलों का रकबा पिछले साल की तुलना में 6 प्रतिशत पीछे चल रहा है। किसानों ने इस अवधि तक 65.82 मिलियन हेक्टेयर में बुवाई की है जबकि 2025 की इसी अवधि के दौरान यह आंकड़ा 70.05 मिलियन हेक्टेयर था। बारिश की इस लगातार बनी हुई कमी से सबसे ज्यादा मार दालों, मोटे अनाज, तिलहन और कपास की खेती पर पड़ी है। आइए जानते हैं कि मानसून की सुस्ती ने किस फसल की बुवाई को कितना प्रभावित किया है और देश में पानी के जलाशयों का क्या हाल है.

दालों की बुवाई में आई सबसे बड़ी गिरावट (15.1% की कमी)

खरीफ फसलों में दालों की खेती सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। दालों का कुल रकबा पिछले साल के 81.52 लाख हेक्टेयर से 15.1 प्रतिशत घटकर अब 69.23 लाख हेक्टेयर रह गया है। अरहर की बुवाई में करीब 18 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है और यह घटकर 2.48 मिलियन हेक्टेयर पर आ गई है। मूंग का रकबा 11 प्रतिशत घटकर 2.398 मिलियन हेक्टेयर रहा। उड़द की बुवाई में लगभग 6 प्रतिशत की कमी आई है और यह 1.351 मिलियन हेक्टेयर दर्ज की गई।

क्यों चिंताजनक है यह गिरावट?

दालों की बुवाई में यह कमी बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत घरेलू उत्पादन और खपत के बीच के अंतर को पूरा करने के लिए पहले से ही आयात पर निर्भर रहता है।

धान, मोटे अनाज, तिलहन और कपास का क्या है हाल?

राहत की बात यह है कि धान की बुवाई पर मानसून की कमी का असर अपेक्षाकृत कम पड़ा है। यह 16.64 मिलियन हेक्टेयर पर पहुंच चुकी है जो पिछले साल की इसी अवधि के 16.78 मिलियन हेक्टेयर की तुलना में सिर्फ 0.8 प्रतिशत कम है। मोटे अनाज के रकबे में 11.2 प्रतिशत की तेज गिरावट आई है। यह पिछले साल के 13.41 मिलियन हेक्टेयर से गिरकर 11.9 मिलियन हेक्टेयर पर आ गया है। इसमें बाजरा की बुवाई में 18.5 प्रतिशत और मक्का की बुवाई में 5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। तिलहन का रकबा 5.5 प्रतिशत घटकर 14.71 मिलियन हेक्टेयर रह गया है। कपास की बुवाई में भी 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

मानसून में 24% की कमी, इन राज्यों में गंभीर सूखा

1 जून से 19 जुलाई के बीच भारत में 253.2 मिमी बारिश दर्ज की गई है जो सामान्य स्तर से 24 प्रतिशत कम है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश का यह घाटा अलग अलग है-

  • पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत: सामान्य से 35 प्रतिशत कम बारिश
  • दक्षिण प्रायद्वीप: 27 प्रतिशत की कमी
  • उत्तर-पश्चिम भारत: 23 प्रतिशत की कमी
  • मध्य भारत: 14 प्रतिशत की कमी

राज्यों के स्तर पर बारिश का घाटा

कृषि के लिहाज से महत्वपूर्ण कई राज्यों में बारिश का गंभीर संकट बना हुआ है। बिहार में सामान्य से 44 प्रतिशत कम बारिश हुई है। झारखंड में 41 प्रतिशत की कमी देखने को मिली है। पंजाब में ये कमी 41 प्रतिशत की है। केरल में 34 प्रतिशत कम बारिश हुई है। तेलंगाना में 31 प्रतिशत बारिश कम हुई है। तटीय कर्नाटक में 31 फीसदी कम बारिश देखने को मिली है।

जलाशयों का जलस्तर पिछले साल से 39% नीचे

कम बारिश की वजह से देश के जलाशयों में पानी का भंडारण भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। अभी देश के 166 प्रमुख जलाशयों में कुल क्षमता का सिर्फ 34.46 प्रतिशत पानी ही बचा है। यह उपलब्ध पानी पिछले साल की इसी अवधि के जलस्तर का सिर्फ 60.84 प्रतिशत ही है। यानी 39 प्रतिशत की भारी गिरावट देखने को मिली है। यह जलस्तर पिछले 10 वर्षों के औसत स्तर से भी 1.8 प्रतिशत नीचे चला गया है।