जानिए इतिहास के सबसे तेज धमाके के बारे में, जिसने दो दिन तक रोक दी सूरज की रोशनी!

इंडोनेशिया का एक्टिव ज्वालामुखीय द्वीप अनाक क्राकाटाउ एक बार फिर विस्फोटों के कारण चर्चा में है। इस हफ्ते हुए कई विस्फोटों के दौरान ज्वालामुखी से राख का गुबार करीब 250 मीटर तक आसमान में उठता देखा गया। हालांकि, एक्सपर्ट का कहना है कि फिलहाल आसपास के लोगों के लिए कोई खतरा नहीं है। आइये जानते है इसके बारे में और भी खास बातें:

1883 का विनाशकारी क्राकाटोआ विस्फोट

Anak Krakatau at highest alert | WIRED

इंडोनेशिया के क्राकाटोआ ज्वालामुखी में अगस्त 1883 में इतिहास के सबसे भीषण विस्फोटों में से एक हुआ। इस विस्फोट ने महज 48 घंटों में 36,000 से ज्यादा लोगों की जान ले ली और करीब 165 गांव पूरी तरह तबाह हो गए। इसी विस्फोट के बाद विशाल काल्डेरा बना, जिससे बाद में अनाक क्राकाटाउ का जन्म हुआ। इसे दुनिया की सबसे घातक प्राकृतिक आपदाओं में गिना जाता है।

दो दिन तक नहीं दिखा सूरज

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26 अगस्त 1883 को शुरू हुए विस्फोट के बाद राख और धूल का विशाल गुबार करीब 48 किलोमीटर ऊंचाई तक पहुंच गया। राख का बादल लगभग 3 लाख वर्ग मील क्षेत्र में फैल गया, जिससे पूरे इलाके में दो दिनों से ज्यादा समय तक घना अंधेरा छाया रहा। लोगों को दिन में भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। यह घटना इतिहास की सबसे भयावह ज्वालामुखी आपदाओं में रिकॉर्ड है।

धमाका जिसकी आवाज़ 4,600 किलोमीटर दूर तक सुनाई दी

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27 अगस्त को हुए सबसे बड़े विस्फोट की आवाज़ इतनी तेज थी कि इसे ऑस्ट्रेलिया और मॉरीशस तक सुना गया, जो लगभग 4,600 किलोमीटर दूर हैं। इसे अब तक दर्ज मानव इतिहास की सबसे तेज आवाज़ों में से एक माना जाता है। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि पूरे द्वीप का बड़ा हिस्सा उड़ गया। इसकी गूंज ने दुनिया को हैरान कर दिया।

सुनामी ने मचाई सबसे ज्यादा तबाही

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ज्वालामुखी विस्फोट के बाद समुद्र में गिरे लावा और चट्टानों से कई विशाल सुनामी लहरें उठीं। इन लहरों ने तटीय इलाकों को तबाह कर दिया और करीब 34,000 लोगों की मौत केवल सुनामी से हुई। कई शहर और गांव समुद्र में समा गए। जो लोग सुनामी से बच निकले, उनमें से कई पायरोक्लास्टिक फ्लो की चपेट में आ गए।

पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ा असर

This is the crater created by Mount Tambora's eruption in 1815 was the largest in recorded history. It caused a 'year without a summer,' leading to global crop failures and food shortages. :

विस्फोट से निकली भारी मात्रा में राख वातावरण की ऊपरी परतों तक पहुंच गई और पूरी दुनिया में फैल गई। इसकी वजह से वैश्विक औसत टेम्परेचर लगभग 0.5 डिग्री सेल्सियस तक घट गया। कई वर्षों तक सूर्योदय और सूर्यास्त का रंग गहरा लाल दिखाई देता रहा। वैज्ञानिकों के अनुसार, वातावरण सामान्य होने में करीब पांच साल लगे।

‘द स्क्रीम’ पेंटिंग से भी जोड़ा जाता है संबंध

How two men stole Edvard Munch's The Scream in just 50 seconds — and how authorities managed to get the painting back - ABC News

क्राकाटोआ विस्फोट के बाद दुनिया भर में आसमान लंबे समय तक लाल दिखाई देता था। कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि फेमस पेंटर एडवर्ड मंक की मशहूर पेंटिंग द स्क्रीम में दिखाया गया लाल आसमान इसी घटना से इंस्पायर्ड हो सकता है। यह सिर्फ साइंटिफिक अनुमान है, न कि पूरी तरह से सच। यह विस्फोट आर्ट और साइंस दोनों पर अपनी छाप छोड़ गया।

साइंटिस्ट को मिली जेट स्ट्रीम की अहम जानकारी

जेट स्ट्रीम - विकिपीडिया

इस आपदा ने वैज्ञानिकों को वायुमंडल की ऊपर की लेयर में बहने वाली जेट स्ट्रीम के बारे में समझ विकसित करने में मदद की। जब राख के महीन कण हजारों किलोमीटर दूर तक पहुंचे, तब पता चला कि तेज ऊंचाई वाली हवाएं इन्हें पूरी दुनिया में फैला सकती हैं। इस घटना ने यह भी दिखाया कि पृथ्वी का मौसम और पर्यावरण आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। बाद में इसी सोच ने ग्लोबल क्लाइमेट और एनवायरनमेंट पर होने वाले इम्पैक्ट को समझने के लिए बस तैयार किया।

Sabang Port Deal: ग्रेट निकोबार से सिर्फ 100 मील दूर! PM मोदी कर आये वो डील जो हिंद महासागर में चीन को देगी शिकस्त

होर्मुज की अहमियत को देखने के बाद भारत ने स्ट्रेट ऑफ मलक्का में अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने जा रहा है। भारत और इंडोनेशिया ने इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के उत्तरी हिस्से में स्थित रणनीतिक रूप से अहम सबांग बंदरगाह को मिलकर विकसित करने के लिए एक समझौता किया है। इस समझौते से दोनों देशों के बीच समुद्री सहयोग और मजबूत होगा। साथ ही, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति भी और बेहतर होगी। सबांग पोर्ट भारत में बन रहे ग्रेट निकोबार ट्रांसशिपमेंट पोर्ट से करीब 160 किलोमीटर दूर है। यह मलक्का स्ट्रेट के पास स्थित है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का समुद्री व्यापार और तेल-गैस की आपूर्ति होती है।

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब भारत विदेशी पोर्ट पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और पूर्वी हिंद महासागर में अपनी समुद्री ताकत और मौजूदगी को लगातार मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है।

सबांग पोर्ट क्यों है इतना अहम?

मलक्का स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। दुनिया के बड़े हिस्से का व्यापार और तेल-गैस की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। चीन के लिए भी यह समुद्री मार्ग बेहद अहम है। उसके कच्चे तेल का करीब 80 प्रतिशत आयात और लगभग 60 प्रतिशत सामान का व्यापार इसी रास्ते से होकर गुजरता है। भारत के लिए सबांग पोर्ट की अहमियत भी काफी ज्यादा है। यह परियोजना भारत में बन रहे ग्रेट निकोबार ट्रांसशिपमेंट पोर्ट को और मजबूत करेगी। दोनों बंदरगाह मिलकर मलक्का स्ट्रेट के आसपास भारत की रणनीतिक मौजूदगी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

रणनीतिक महत्व के साथ-साथ सबांग बंदरगाह भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ को भी मजबूती देगा। इससे अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और इंडोनेशिया के आचे प्रांत के बीच समुद्री संपर्क बेहतर होगा। इसके अलावा बंगाल की खाड़ी में व्यापार, पर्यटन और माल ढुलाई से जुड़ी सुविधाओं का भी विस्तार होने की उम्मीद है।

व्यापार और भविष्य की संभावनाएं

फिलहाल सबांग एक छोटा पोर्ट है, जहां करीब 50 हजार टन तक के जहाज आ सकते हैं। यहां माल चढ़ाने और उतारने का काम अभी ज्यादातर जहाजों में लगी क्रेनों की मदद से किया जाता है। समुद्री मामलों के जानकारों का मानना है कि भविष्य में सबांग को एक बड़े क्षेत्रीय ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे दक्षिण-पूर्व एशिया के छोटे बंदरगाहों तक सामान पहुंचाना आसान होगा और इस क्षेत्र में व्यापार को नई गति मिलेगी।

नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन के पूर्व निदेशक विजय सखूजा के अनुसार, भविष्य में सबांग बंदरगाह को बंगाल की खाड़ी के कई बड़े बंदरगाहों, जैसे चट्टोग्राम और यांगून, से कंटेनर जहाजों के जरिए जोड़ा जा सकता है। इसके अलावा हल्दिया, चट्टोग्राम और दावेई जैसे बंदरगाहों के साथ कच्चा तेल, पेट्रोलियम उत्पाद, कोयला, लौह अयस्क, उर्वरक और अनाज जैसी वस्तुओं की आवाजाही भी आसान हो सकती है।

एक्सपर्ट का मानना है कि यह सिर्फ व्यापार के लिए ही नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है। जरूरत पड़ने पर पूर्वी हिंद महासागर में गश्त, मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियानों के दौरान भारतीय नौसेना इस बंदरगाह का इस्तेमाल ईंधन भरने, जरूरी सामान उपलब्ध कराने और जहाजों के रखरखाव के लिए भी कर सकती है। इससे भारत और इंडोनेशिया के बीच समुद्री सहयोग और मजबूत होने की उम्मीद है।

भारत की विकास की सफलताओं से प्रेरणा ले रहा है इंडोनेशिया, पीएम मोदी के दौरे से दोनों देशों के संबंधों को मिलेगी नई गति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 6-8 जुलाई 2026 को होने वाली इंडोनेशिया यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब दोनों देशों की साझेदारी पारंपरिक सहयोग से आगे बढ़ रही है। आज इंडोनेशिया भारत को न केवल एक रणनीतिक साझेदार के रूप में, बल्कि तकनीक, नीतिगत विचारों और विकास समाधानों के एक भरोसेमंद स्रोत के रूप में भी देख रहा है। खाद्य सुरक्षा और डिजिटल गवर्नेंस से लेकर स्वास्थ्य सेवा, कृषि और रक्षा तक, भारत की सफल सार्वजनिक नीति मॉडल इंडोनेशिया की अपनी विकास यात्रा के लिए महत्वपूर्ण रोल मॉडल बन रहे हैं।

भारत के डिजिटल भुगतान बना इंडोनेशिया का रोल मॉडल

इंडोनेशिया डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में भारत की विशेषज्ञता का लाभ उठा रहा है। प्रस्तावित UPI-QRIS लिंकेज से दोनों देशों के यात्रियों और व्यवसायों के लिए बिना किसी रुकावट के सीमा-पार भुगतान संभव हो सकेगा। इस पहल से पर्यटन, व्यापार और डिजिटल कॉमर्स को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, साथ ही लेनदेन तेज, सस्ता और अधिक सुविधाजनक हो जाएगा। इंडोनेशिया में व्यापार या निवेश करने वाले भारतीय व्यवसायों और हर साल बाली व इंडोनेशिया के अन्य स्थलों पर जाने वाले लगभग 17 लाख भारतीय पर्यटकों के लिए, एक लाइव UPI-QRIS कॉरिडोर क्रांतिकारी साबित होगा।

भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर भी सहयोग के एक प्रमुख क्षेत्र के रूप में उभरा है। इंडोनेशिया का ओपन नेटवर्क (ION) भारत के ONDC मॉडल से प्रेरित है और इसका उद्देश्य इंडोनेशिया में 65 मिलियन से अधिक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए एक अधिक खुला और समावेशी डिजिटल मार्केटप्लेस बनाना है। Beckn 2.0 ओपन प्रोटोकॉल पर आधारित ION का पहला लाइव लेनदेन 7 जुलाई को मोदी-प्राबोवो शिखर सम्मेलन के दौरान होने की उम्मीद है।

डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में भारतीय मॉडल को अपनाने की तैयारी में इंडोनेशिया

इंडोनेशिया के साथ भारत की डिजिटल साझेदारी अब सफल मॉडलों को साझा करने से आगे बढ़कर देश के अगली पीढ़ी के डिजिटल बैकबोन (बुनियादी ढांचे) के निर्माण में मदद करने की दिशा में बढ़ रही है। इंडोनेशिया की महत्वाकांक्षी ‘डिजिटल नुसंतारा’ पहल का उद्देश्य एक एकीकृत और इंटरऑपरेबल राष्ट्रीय डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना है, और इस यात्रा में भारतीय तकनीकी विशेषज्ञता एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में उभर रही है।

आधार, UPI, डिजिलॉकर, ई-KYC और ONDC की सफलता का आधार बनने वाले भारतीय डिजिटल समाधान अब इंडोनेशिया के अपने डिजिटल बदलाव में भी प्रासंगिक साबित हो रहे हैं। यह बदलाव टेक्नोलॉजी अपनाने से आगे बढ़कर गहरे संस्थागत सहयोग की ओर है, जिसमें भारतीय कंपनियाँ सुरक्षित और बड़े पैमाने पर डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का अपना अनुभव साझा कर रही हैं। सहयोग का दायरा वित्तीय बाज़ारों तक भी बढ़ रहा है। दोनों पक्ष AI-आधारित बाज़ार निगरानी, डिजिटल निवेश प्लेटफॉर्म और टेक्नोलॉजी-आधारित कैपिटल मार्केट सुधारों में भारत की विशेषज्ञता का इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे हैं। टेक्नोलॉजी के ज़रिए अपने स्टॉक मार्केट को आधुनिक बनाने का भारत का अनुभव इंडोनेशिया के साथ सहयोग के नए रास्ते खोल रहा है।

इंडोनेशिया का विज़न सिर्फ़ टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने वाले देश तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पूरे आसियान (ASEAN) क्षेत्र में डिजिटल समाधानों का उत्पादक और निर्यातक बनने की बड़ी सोच रखता है। इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ते हुए, भारत का ओपन, समावेशी और संप्रभु डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने का दशकों पुराना अनुभव बहुत काम का साबित हो रहा है। इंडोनेशिया के कई प्रतिनिधिमंडलों ने भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक कल्याण योजनाओं, जैसे कि हमारी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), चावल फोर्टिफिकेशन योजना, उर्वरक सब्सिडी सुधार, AGRISTACK आदि से सीखने के लिए भारत का दौरा किया है।

भारत की समाज कल्याण की योजनाओं और रक्षा क्षेत्र में सहयोग के लिए तैयार इंडोनेशिया

इंडोनेशिया का महत्वाकांक्षी ‘मुफ़्त पौष्टिक भोजन कार्यक्रम’ भारत की ‘मिड-डे मील’ (PM POSHAN) योजना से प्रेरित है। इसी तरह, उनकी ‘रेड एंड व्हाइट विलेज कोऑपरेटिव्स’ पहल ‘जन औषधि’ मॉडल के ज़रिए सस्ती दवाएँ उपलब्ध कराने के लिए भारत के साथ सहयोग की संभावनाएँ तलाश रही है, जिससे ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बेहतर हो सकेगी। यह साझेदारी रक्षा क्षेत्र में भी बढ़ रही है। इंडोनेशिया रक्षा निर्माण, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, सैन्य प्रशिक्षण और समुद्री सहयोग के मामलों में भारत के साथ मिलकर काम कर रहा है। ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत स्वदेशी रक्षा उत्पादन में भारत का अनुभव लंबे समय तक सहयोग के नए अवसर पैदा कर रहा है।

ये सभी पहल मिलकर एक बड़े ट्रेंड को दर्शाती हैं। भारत की विकास यात्रा अब न केवल अपने नागरिकों को फ़ायदा पहुँचा रही है, बल्कि मित्र देशों के लिए भी एक रोल मॉडल के तौर पर काम कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान, ज्ञान-साझेदारी का यह बढ़ता हुआ दायरा द्विपक्षीय संबंधों के सबसे मज़बूत स्तंभों में से एक के रूप में उभर रहा है, जिससे इनोवेशन, आर्थिक विकास और लंबे समय तक रणनीतिक सहयोग के अवसर पैदा हो रहे हैं।