कुछ वक्त पहले एक फिल्म में एक गाना आया था… सखी सैंया तो खूब ही कमात है, महंगाई डायन खाए जात है… इसमें कवि कह रहा है कि उसके सैंया तो खूब कमाते हैं, लेकिन महंगाई नाम की डायन ऐसी है कि कुछ बचता ही नहीं, यहां मैं कवि से कुछ कम इत्तेफाक रखता हूं। इस दौर में महंगाई तो आग की तरह फैल रही है लेकिन सैंया की आय वहीं की वहीं है।
हम देशभर की महंगाई की बात तो करते ही हैं, लेकिन फिलहाल हम सिर्फ इंदौर की महंगाई की बात कर रहे हैं। पिछले कुछ ही महीनों में या यूं कहें कुछ ही वक्त में शहर में जिस तरह से रोजमर्रा की चीजों के जो दाम बढ़े हैं, उससे इंदौर का आदमी एक तरह से रोज…मर्ररररा है। बल्कि घुट-घुटकर मर रहा है।
आपको बता दें कि इंदौर में चाय, पोहा और अंडा जैसी चीजों का उठाव ज्यादा है। ये रोजमर्रा के उत्पाद हैं। यहां चाय और पोहे से दिन की शुरुआत होती है और शाम होते ही अंडों के ठेलों पर भीड़ जमा हो जाती है। इसलिए हमने इंदौर की रोजमर्रा जिंदगी में इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पादों के भावों की पड़ताल की है। चाय-सिगरेट हो या कपड़े स्त्री करना हो, दाढ़ी कटवाना हो या हेयर कट, हर काम और उत्पाद के भाव में आग लगी हुई है।
अनुज शुक्ला, (उम्र 36 वर्ष, निवासी विधानसभा क्षेत्र 3)
सब घट रहा है, सिर्फ महंगाई बढ़ रही है : एक फिल्म का गाना है कि सैंया तो खूब ही कमात है, महंगाई डायन खाए जात है, लेकिन इंदौर का सैंया कहां कमा रहा है, उसकी तो आय वहीं की वहीं है। सबकुछ घट रहा है, सिर्फ महंगाई बढ़ रही है। उन्होंने सिस्टम पर तंज करते हुए कहा कि हरियाली घट रही है, बारिश घट रही है, पैकेट में सामान की क्वांटिटी घट रही है, आय घट रही है। लेकिन वहीं टैक्स बढ़ रहा है, महंगाई बढ़ रही है। क्या करें, जो भी है सामने है, हमने ही ऐसी सरकारें चुनी है तो भोगना भी हमें ही है।
(मुख्तार सिंह, उम्र 60 वर्ष निवासी विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 2)
कभी सोचा नहीं था ये जमाना आएगा : क्या जमाना देखा है भैया हमने, कभी चवन्नी में कटिंग हो जाती थी, इसमें नाई भी घर आ जाता था दाढ़ी कटिंग के लिए। अब तो इतने पैसे देने के बाद भी नंबर लगाना पड़ता है। ठीक है यह सही भी है कि समय समय पर महंगाई बढ़ती है, लेकिन यह दौर भी आएगा कि रुपए दो रुपए के काम में सौ और 200 रुपए लगेंगे कभी सोचा नहीं था। इतना ही नहीं भिया, 10 रुपए में 5 किलो गेंहू मैंने खुद ने साल 83 में खरीदे हैं।
राजेश व्यास (उम्र 48 वर्ष, दुकानदार, निवासी जूनी इंदौर)
इब्तता ए इश्क है रोता है क्या, आगे-आगे देखिए होता है : यह महंगाई का चरम दौर नहीं है, अभी और इंतजार करो, महंगाई अभी और बहुत बढेगी। उन्होंने मीर तक़ी 'मीर' का एक शेर सुनाया और कहा…. “इब्तदा-ए-इश्क़ है, रोता है क्या, आगे-आगे देखिए होता है क्या।
रमेश कुमार (उम्र: 48 वर्ष, प्राइवेट नौकरी, अन्नपूर्णा रोड निवासी)
सैलरी वहीं की वहीं है, पर घर का बजट हर महीने बिगड़ रहा है : इंदौर अब वो पुराना और सस्ता शहर नहीं रहा। सुपर कॉरिडोर और नए आईटी पार्क्स आने से विकास तो हुआ है, लेकिन हम जैसे मध्यमवर्गीय (मिडल क्लास) लोगों के लिए जीना महंगा हो गया है। पहले जो किराना 4,000 रुपए में आ जाता था, आज उसके लिए 10,000 रुपए भी कम पड़ते हैं। बच्चों की स्कूल फीस और कोचिंग का खर्च अलग से कमर तोड़ रहा है। शहर बढ़ने के चक्कर में पेट्रोल का खर्च दोगुना हो गया है, क्योंकि अब दूरियां बढ़ गई हैं। विकास अच्छा है, लेकिन आम आदमी की जेब भी तो देखनी चाहिए।
अंजलि शर्मा (उम्र: 26 वर्ष, आईटी प्रोफेशनल, विजय नगर में किराए से रहने वाली)
सिंगल लोगों और स्टूडेंट्स के लिए इंदौर अब जेब पर बहुत भारी पड़ रहा है : मैं तीन साल पहले भोपाल से इंदौर आई थी। तब से अब तक यहाँ मकानों के किराए सीधे 40-50% तक बढ़ गए हैं। विजय नगर या भवरकुआं जैसे इलाकों में एक अदद अच्छा वन-रूम (1BHK) मिलना भी मुश्किल हो गया है। सिर्फ मकान ही नहीं, टिफिन सर्विस, ऑटो-रैपिडो के किराए और यहाँ तक कि जो इंदौरी पोहा कभी 10-15 रुपए में पेट भर देता था, अब अच्छी जगहों पर 25-30 रुपए का हो गया है। वीकेंड पर दोस्तों के साथ बाहर जाने का मतलब है कम से कम हजार-पंद्रह सौ का फटका। बचत करना अब एक सपना जैसा लगता है।
राहुल यादव (उम्र: 21 वर्ष, भवरकुआं क्षेत्र में रहकर MPPSC की तैयारी कर रहे छात्र)
अब तो 'मिनिमम बजट' में सरवाइव करना भी एक टास्क बन गया है : इंदौर को स्टूडेंट्स का हब कहा जाता है, लेकिन पिछले दो-तीन सालों में यहाँ रहना बहुत महंगा हो गया है। सबसे बड़ी मार रूम रेंट (किराए) और ब्रोकरेज पर पड़ी है। भवरकुआं या गीता भवन जैसे कोचिंग एरिया में एक छोटा सा सिंगल रूम या पीजी (PG) का किराया ही अब 6,000 से 8,000 रुपए तक छू रहा है, जो पहले 4,000 के आसपास मिल जाता था।
सिर्फ कमरा ही नहीं, टिफिन सर्विस के दाम हर छह महीने में बढ़ जाते हैं, पर खाने की क्वालिटी वही रहती है। चाय-पोहा जो हम स्टूडेंट्स की लाइफलाइन हैं, उनके दाम भी अब डबल हो चुके हैं। घर से जो लिमिटेड पॉकेट मनी मिलती है, उसमें से कोचिंग की फीस, किताबों और टेस्ट सीरीज़ का खर्च निकालने के बाद हाथ में कुछ नहीं बचता। लाइब्रेरी की फीस और इंटरनेट का खर्च अलग। हालत ये है कि अब दोस्तों के साथ भवरकुआं चौराहे पर खड़े होकर दो कप चाय पीने से पहले भी बजट देखना पड़ता है। इंदौर पढ़ाई के लिए बेस्ट है, लेकिन मिडिल क्लास स्टूडेंट की जेब के लिए अब ये काफी भारी होता जा रहा है।”
