
-आदिल भट
ओमान की खाड़ी में अमेरिकी हमले में मारे गए एक भारतीय नाविक के मामले से नाविकों की सुरक्षा, जवाबदेही और भारत की प्रतिक्रिया को लेकर जरूरी सवाल उठ रहे हैं। डीडब्ल्यू ने इस हादसे का शिकार हुए नाविक के परिवार से भी बात की। ALSO READ: नाटो प्रमुख से खुश लेकिन यूरोपीय साझेदारों से चिढ़े ट्रंप
सुशीला देवी गहरे सदमे और दुख में डूबी हुई हैं। उनके पति और भारतीय नाविक शिवानंद चौरसिया की बीते 9 जून को ओमान की खाड़ी में एक व्यापारिक जहाज ‘एमटी सेटेबेलो' पर हुए अमेरिकी हमले में मौत हो गई थी।
पेशे से इंजीनियरिंग फिटर, शिवानंद ने अपने परिवार के बेहतर भविष्य के लिए सालों तक समंदर में काम करने की कड़ी ट्रेनिंग ली थी। लेकिन अब, उनका परिवार उनके बिना अपने भविष्य की कल्पना करने और इस कड़वे सच को स्वीकार करने की जद्दोजहद में जुटा है।
इस महीने की शुरुआत में जब अमेरिकी सेना ने पलाऊ के झंडे वाले इस तेल और केमिकल टैंकर जहाज पर हमला किया, तो उसमें तीन भारतीय नाविक मारे गए थे, जिनमें चौरसिया भी एक थे। अमेरिकी सेना का कहना था कि वे ईरान युद्ध के बीच ईरान से होने वाले तेल के निर्यात पर लगी पाबंदी या नाकेबंदी को लागू कर रहे थे। इस हमले में चीफ इंजीनियर पटनाला सुरेश और डेक कैडेट आदित्य शर्मा भी मारे गए थे। जहाज पर मौजूद बाकी 21 भारतीय क्रू सदस्यों को बचा लिया गया था।
अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि टैंकर में ईरानी तेल था और उसे बार-बार चेतावनी दी गई थी। वहीं, जहाज के मैनेजर ने इस बात का खंडन किया है। उनका कहना है कि जहाज का ईरान से कोई संबंध नहीं था और हमले से पहले उन्हें कोई चेतावनी नहीं मिली थी। ALSO READ: UN महासचिव ने AI कंपनियों से मांगा बिजली, पानी और जमीन का हिसाब
‘अमेरिका ने मेरे पति को मारा'
सुशीला देवी ने डीडब्ल्यू से कहा, “उन्होंने मेरी सारी खुशियां छीन ली। अमेरिका ने ही मेरे पति की जान ली है। इसीलिए प्रधानमंत्री [नरेंद्र] मोदी और [उत्तर प्रदेश के] मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुप हैं। उन्हें अपने लोगों के लिए आवाज उठानी चाहिए थी और पूछना चाहिए था कि उन्होंने हमारे साथ ऐसा क्यों किया।”
शिवानंद चौरसिया का परिवार पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के एक खेतिहर गांव में रहता है, जहां मुख्य रूप से धान की खेती होती है। गांव के ज्यादातर मकान मिट्टी और ईंट से बने हुए हैं। ईंट से बने अपने साधारण से घर के भीतर पूरा परिवार गुमसुम और शांत बैठा है। रिश्तेदार और पड़ोसी लगातार घर आ-जा रहे हैं और उन्हें सांत्वना दे रहे हैं। शिवानंद की बहन सोनी चौरसिया कहती हैं, “भाई की मौत से हमें बहुत ज्यादा दुख पहुंचा है। अब मेरा इस दुनिया में जीने का मन नहीं करता, क्योंकि परिवार ने अपनी एकमात्र उम्मीद खो दी है।”
परिवार को लगता है कि भारतीय सरकार की चुप्पी ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया है। किसी भी नेता ने शोक संतप्त परिवार से मुलाकात नहीं की है। सोनी ने कहा, “हम गरीब हैं। इसीलिए, मोदी सरकार को कोई परवाह नहीं है। अगर हम अमीर होते, तो वे हमसे मिलने जरूर आते।”
उत्तर प्रदेश के इस इलाके के ज्यादातर परिवारों की तरह, चौरसिया परिवार भी खेती-बाड़ी पर निर्भर है और बमुश्किल इतना अनाज उगा पाता है जिससे सबका पेट भर सके। समंदर की यह नौकरी शिवानंद चौरसिया के लिए तंगहाली से बाहर निकलने का रास्ता थी। उनके मरीन इंजीनियरिंग के कोर्स की फीस भरने के लिए परिवार ने अपनी जमीन बेच दी थी और करीब 8,60,000 रुपये का कर्ज लिया था। आखिरकार, उन्हें एक ऑयल टैंकर पर नौकरी मिल गई थी।
समंदर में कितने भारतीय कर्मचारी मौजूद
दुनिया भर के समुद्री जहाजों पर काम करने वाले कर्मचारियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा भारत के लोगों का है। उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, दुनिया के कुल नाविकों में से करीब 12 फीसदी भारतीय नागरिक हैं। इनमें से हजारों नाविक उन व्यापारिक जहाजों पर काम करते हैं, जो दुनिया के सबसे अशांत और खतरनाक समुद्री रास्तों से होकर गुजरते हैं।
चौरसिया के घर के पास एक पेड़ के नीचे कुछ लोग इकट्ठा होकर यह चर्चा कर रहे थे कि आखिर वहां क्या हुआ था और इससे उनके जीवन पर क्या असर पड़ेगा। उनमें से कई लोगों के रिश्तेदार समंदर में काम करते हैं, जिनमें से कुछ फारस की खाड़ी में भी तैनात हैं।
जो परिवार पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबे थे, उनके लिए समंदर की यह नौकरी कभी गरीबी से बाहर निकलने के रास्ते के तौर पर दिखती थी। लेकिन अब यह एक ऐसा जुआ बन चुकी है, जहां दांव पर सीधे इंसान की जिंदगी लगी है। गांव के एक व्यक्ति ने कहा, “हम अब अपने आदमियों को समुद्र में नहीं भेजेंगे।” वहां मौजूद दूसरे लोगों ने भी सहमति जताते हुए अपना सिर हिलाया। ALSO READ: ईरान युद्ध के लक्ष्यों में डोनाल्ड ट्रंप को क्या हासिल हुआ
गए थे रोजी-रोटी के लिए, फंस गए जंग में
ईरान-अमेरिका संघर्ष शुरू होने के बाद, ईरानी हमलों में भी भारतीय नाविक घायल हुए हैं। भूमेश (जो सिर्फ अपने पहले नाम से जाने जाते हैं) एक ऐसे नाविक हैं जो 1 मार्च को ‘स्काईलाइट' नामक टैंकर जहाज पर हुए ईरानी हमले में बाल-बाल बचे थे। यह हमला तब हुआ था जब तेहरान होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री जहाजों की आवाजाही पर रोक लगाने के लिए नाकेबंदी कर रहा था। यह जहाज इस युद्ध के दौरान हमले का शिकार होने वाले सबसे शुरुआती जहाजों में से एक था।
जब हमला हुआ, उस वक्त भूमेश जहाज के मुख्य कंट्रोल रूम (ब्रिज) पर ही मौजूद थे। भूमेश ने बताया, “मुझे नहीं पता था कि मैं जिंदा बचूंगा या नहीं। मैं बस लगातार यही सोच रहा था कि मेरे बिना मेरा परिवार इस सदमे को कैसे झेलेगा और क्या मैं कभी सही-सलामत घर वापस लौट पाऊंगा।”
उस धमाके में जहाज के कप्तान और एक अन्य भारतीय नाविक की मौत हो गई थी। भूमेश के मुताबिक, इस हादसे की यादें आज भी उनका पीछा करती हैं। हफ्तों तक वे सो नहीं पाए। उन्होंने कहा, “नाविक वहां कोई जंग लड़ने नहीं जाते हैं। हम तो सिर्फ अपनी रोजी-रोटी कमाने वहां जाते हैं।” अब समंदर में वापस न जाने के कारण, वे दिल्ली के बाहरी इलाके में किराए के एक कमरे में रहते हैं और ट्रक चलाते हैं। तीन महीने से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन वे अब भी शिपिंग कंपनी से मिलने वाले मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं।
भूमेश का यह अनुभव उन दर्जनों मामलों में से एक है, जिन पर भारतीय नाविक यूनियन लगातार नजर रखे हुए है। फॉरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया के जनरल सेक्रेटरी मनोज यादव ने डीडब्ल्यू को बताया, “यह गंभीर चिंता का विषय है। बिना किसी चेतावनी के उन पर हमला क्यों किया गया?” यादव के पास फंसे हुए नाविकों के फोन दिन भर आते रहते हैं। ये नाविक बताते हैं कि खाड़ी में फंसे कई जहाजों पर खाने-पीने की चीजों और जरूरी सामान की भारी किल्लत हो रही है और वे बहुत मुश्किलों से जूझ रहे हैं। यूनियन के पास हर दिन उन नाविकों के परेशान और चिंतित घरवालों के भी ढेरों फोन आते हैं। यादव ने कहा, “वे जानना चाहते हैं कि क्या उनका बेटा सुरक्षित है? क्या उनका पति घर लौट रहा है?”
भले ही अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ रही है और समुद्री रास्ते (होर्मुज जलडमरूमध्य) में तनाव कम हो रहा है, लेकिन वहां फंसे हर एक जहाज को सुरक्षित बाहर निकालने में अब भी कई अड़चनें आ रही हैं। इसी हफ्ते, संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन' (आईएमओ) ने होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे 11,000 से ज्यादा नाविकों और सैकड़ों जहाजों को वहां से सुरक्षित निकालने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया है।
कूटनीति और परिवार की पीड़ा
हमले के कई दिनों बाद भी भारत के ज्यादातर नेता पूरी तरह चुप रहे। जबकि, पीड़ितों के परिवार पल-पल की जानकारी के लिए इंतजार करते रहे। नेताओं की यह चुप्पी जल्द ही एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई।
नई दिल्ली (भारत सरकार) ने एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक के सामने अपनी कड़ी आपत्ति और कड़ा विरोध दर्ज कराया। वहीं दूसरी ओर, भारत के जहाजरानी और बंदरगाह मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इस घटना पर दुख जताते हुए कहा कि यह ‘समुद्री क्षेत्र से जुड़े हमारे परिवार के लिए एक बहुत बड़ी और गहरी क्षति' है।
विपक्ष ने सरकार पर बहुत कम कदम उठाने का आरोप लगाया और हमले को लेकर प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी पर सवाल उठाए। आखिरकार, जी7 सम्मेलन के दौरान मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के सामने यह मुद्दा उठाया और दुनिया भर के शिपिंग रूट पर काम करने वाले भारतीय नाविकों की सुरक्षा के महत्व पर जोर दिया।
हालांकि, चौरसिया परिवार के लिए, यह उच्च-स्तरीय कूटनीति बहुत दूर की बात लग रही थी। उनके मन में अब भी कई ऐसे सवाल थे जिनका कोई जवाब नहीं मिला था। मसलन, क्या उन्हें कोई मुआवजा मिलेगा? क्योंकि उनके घर का कमाने वाला मुख्य सदस्य अचानक उनसे छिन चुका है और सिर पर कर्ज का भारी बोझ अब भी बना हुआ है। वे यह भी जानना चाहते हैं कि क्या उन खतरनाक समुद्री रास्तों पर काम कर रहे अन्य भारतीय नाविकों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं?
आखिरकार, वे बस यही चाहते थे कि उनके परिवार के सदस्य का शव उन्हें वापस मिल जाए। कई दिनों तक, शिवानंद चौरसिया के छोटे भाई रामप्रवेश का ध्यान बस अपने फोन पर ही लगा रहा। फोन की हर घंटी के साथ एक नई उम्मीद जगती थी। फिर, नौवें दिन, आखिरकार वह फोन कॉल आ ही गया। शिवानंद का पार्थिव शरीर आखिरकार उनके गांव पहुंचा।
कुछ घंटों बाद, सैकड़ों ग्रामीण शिवानंद की अंतिम यात्रा में शामिल हुए, चिता से लहरे उठीं और अंतिम संस्कार पूरा हो गया। शिवानंद का शव देश में आने का इंतजार तो खत्म हो गया, लेकिन उनके परिवार के लिए, जवाबदेही, मुआवजे और न्याय की तलाश तो अभी शुरू ही हुई है।