पानी पर तैरेंगे सोलर पैनल! जानिए क्या है प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना और किसे मिलेगा फायदा

Pradhan Mantri Surya Sarovar Yojana – PM-SSY: देश में रीन्यूबल एनर्जी को बढ़ावा देने और जल निकायों का सही इस्तेमाल करने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना को अपनी मंजूरी दे दी है। इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य उद्देश्य एनर्जी स्टोरेज सिस्टम के साथ फ्लोटिंग सोलर फोटोवोल्टिक (FSPV) यानी पानी पर तैरने वाले सोलर प्रोजेक्ट्स को डेवलप करना है। सरकार ने इस योजना के लिए कुल 5070 करोड़ रुपये के बजट की व्यवस्था की है।

क्या है योजना का लक्ष्य और क्षमता?

प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना के तहत ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के साथ 5000 मेगावाट (MW) क्षमता की फ्लोटिंग सोलर फोटोवोल्टिक परियोजनाओं को विकसित करने का लक्ष्य बनाया गया है। इन परियोजनाओं के साथ कम से कम दो घंटे की न्यूनतम भंडारण क्षमता वाली एनर्जी स्टोरेज सिस्टम होगी। यानी कुल 10,000 MWh की स्टोरेज क्षमता जोड़ी जाएगी। इन परियोजनाओं को वित्तीय वर्ष 2026-27 से 2030-31 के दौरान मंजूरी दी जाएगी जबकि वित्तीय सहायता का भुगतान वित्तीय वर्ष 2032-33 तक जारी रहेगा। अभी भारत में फ्लोटिंग सोलर पीवी क्षमता केवल सिर्फ 700 मेगावाट है। इस योजना से इसमें 5000 मेगावाट की बड़ी वृद्धि होगी।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोलर एनर्जी द्वारा हाल ही में किए गए एक आकलन के मुताबिक देश में जलाशयों और दूसरे इनलैंड वॉटर बॉडीज में करीब 102,18 GWp फ्लोटिंग सोलर की क्षमता का अनुमान लगाया गया है।

कितना मिलेगा वित्तीय अनुदान?

योजना को सफल बनाने और इससे जुड़े जोखिम कम करने के लिए सरकार वित्तीय मदद भी देगी। एलिजिबल फ्लोटिंग सोलर फोटोवोल्टिक परियोजनाओं को सफलतापूर्वक चालू होने के बाद 1 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट की केंद्रीय वित्तीय सहायता दी जाएगी। इसके अलावा परियोजना विकास के जोखिमों को कम करने के लिए जरूरी फिजिबिलिटी स्टडीज, बाथिमेट्री और हाइड्रोग्राफी एनालिसिस, पर्यावरणीय स्टडी और दूसरी तैयारियों के लिए प्रति प्रोजेक्ट 50 लाख रुपये तक अनुदान दिया जाएगा।

किसे और क्या-क्या मिलेगा फायदा?

प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना के फायदे देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मिलेंगे। ये परियोजनाएं मौजूदा जलाशयों और औद्योगिक तालाबों का पूरा फायदा उठाने का मौका देंगी। इससे लैंड रिसोर्स के लिए होने वाली मारामारी खत्म होगी। ऊर्जा भंडारण प्रणाली के इंटिग्रेशन से पावर ग्रिड की विश्वसनीयता को मजबूत करने में मदद मिलेगी। इस योजना से सालाना लगभग 10 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जन में कमी आएगी। परियोजना वैल्यू चेन में करीब 16000 से 17000 फुल टाइम जॉब के मौके क्रिएट होंगे। आपको बता दें कि यह योजना फ्लोटेशन सिस्टम के साथ-साथ सोलर पीवी सेल्स, मॉड्यूल्स और एनर्जी स्टोरेज सिस्टम जैसे पूरे वैल्यू चेन के घरेलू निर्माण को भी बढ़ावा देगी।

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Taslima Nasreen: ‘मैं बंगाल का हिस्सा बनकर आई हूं’ 19 साल बाद कोलकाता लौटने पर बोलीं बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन

Taslima Nasreen: बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन 19 साल बाद पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता लौटी हैं। नसरीन रवींद्र सदन में एक साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होंगी, जहां उनकी आत्मकथा का विमोचन किया जाएगा। इस कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के भी शामिल होने की उम्मीद है।

बता दें कि तसलीमा नसरीन साल 2007 के बाद पहली बार कोलकाता लौटी हैं। उस समय उन्हें अपने उपन्यास ‘द्विखंडित’ (Dwikhondito) को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद शहर छोड़ना पड़ा था। जानकारी के अनुसार, यह किताब उनकी आत्मकथा पर आधारित थी, जिसने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था। इसके बाद हुए भारी विरोध प्रदर्शनों के कारण उन्हें उस शहर को छोड़ना पड़ा, जिसे उन्होंने बांग्लादेश छोड़ने के करीब 10 साल बाद अपना घर बना लिया था।

कोलकाता के अखबार ‘द टेलीग्राफ’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शहर पहुंचने से पहले नसरीन ने उम्मीद जताई थी कि यह दौरा अभिव्यक्ति की आजादी और अलग राय रखने वाली आवाजों की सुरक्षा के महत्व को फिर से स्थापित करेगा। उन्होंने कहा कि शहर लौटना “अपने ही देश” में लौटने जैसा महसूस हुआ।

वह क्यों चली गई थीं?

2003 में, जब उनकी आत्मकथा ‘द्विखंडितो’ (Dwikhondito) प्रकाशित हुई, तो इस लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया, क्योंकि आरोप था कि इससे मुसलमानों की भावनाएं आहत हुई थीं। किताब के प्रकाशित होने के बाद शहर भर में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे।

वहीं, बढ़ते दबाव के कारण सरकार ने पश्चिम बंगाल में किताब के वितरण पर रोक लगा दी। जिसके बाद मामला कुछ समय के लिए शांत हो गया।

इसके बाद 2005 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस प्रतिबंध को हटा दिया, जिससे किताब फिर से बाजार में उपलब्ध होने लगी। इसी दौरान कोलकाता में कुछ कट्टरपंथी समूहों ने कथित तौर पर तसलीमा नसरीन और उनकी किताब के खिलाफ विरोध तेज करना शुरू कर दिया।

2007 में, उनकी एक और किताब ‘शोध’ (Shodh) का तेलुगु में अनुवाद किया गया। जिसके बाद हैदराबाद में इसके लॉन्च कार्यक्रम के दौरान कुछ स्थानीय कट्टरपंथियों ने तसलीमा नसरीन पर हमला कर दिया।

इस हिंसक घटना के बाद, कोलकाता में धार्मिक समूहों ने इस माहौल का फायदा उठाने की कोशिश की और उनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया। कुछ संगठनों ने तो उन्हें देश से बाहर निकालने की मांग के लिए भी लामबंदी की।

नवंबर 2007 में हालात तब चरम पर पहुंच गए जब कोलकाता में विरोध-प्रदर्शन हिंसक हो गए और आगजनी व तोड़-फोड़ हुई। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि व्यवस्था बहाल करने के लिए भारतीय सेना को बुलाना पड़ा।

निर्वासन खत्म

PTI से बात करते हुए नसरीन ने कहा कि कोलकाता से दूर बिताए सालों का उस जुड़ाव पर कोई असर नहीं पड़ा जो वह इस शहर और पश्चिम बंगाल के साथ महसूस करती थीं। उन्होंने कहा कि कोलकाता सिर्फ एक ऐसा शहर नहीं था जहां वह रहती थीं, बल्कि इसने उन्हें अपनापन भी दिया है।

उन्होंने कहा, “मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं अपने ही देश लौट रही हूं। मेरे दिल में बंगाल कभी भी किसी बॉर्डर या कंटीले तारों की बाड़ से बंटा नहीं रहा। बंगाल के पूर्वी हिस्से का दरवाजा मेरे लिए बंद है, इसलिए अभी के लिए, बंगाल का यही हिस्सा मेरा घर है।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं खुशी के साथ-साथ दर्द के साथ भी लौट रही हूं। कोलकाता सिर्फ वह शहर नहीं था जहां मैं रहती थी, बल्कि वहां मेरा घर, दोस्त, पाठक और अपनापन महसूस करने का एहसास था। मेरे जीवन के लगभग उन्नीस साल मुझसे छीन लिए गए, और घर वापसी उन खोए हुए सालों को वापस नहीं ला सकती। मैं किसी अजनबी या मेहमान की तरह नहीं लौट रही हूं। मैं एक ऐसी व्यक्ति के तौर पर लौट रही हूं जिसने हमेशा खुद को बंगाल का हिस्सा माना है।”

तसलीमा नसरीन ने कार्यक्रम के आयोजकों का उन्हें आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद दिया और अपनी यात्रा को संभव बनाने में सहयोग देने के लिए सरकार का भी आभार जताया।

उन्होंने कहा कि शहर की यह यात्रा “उस आवाज की वापसी का प्रतीक है जिसे कट्टरपंथियों ने कभी दबाने की कोशिश की थी।”

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