टोल फ्री हुई कानपुर-लखनऊ एक्‍सप्रेसवे! NHAI ने सड़क बनाने वाली कंपनी पर लिया ये एक्शन

कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर सड़क में आई खराबी के बाद नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने बड़ा फैसला लिया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर फिलहाल टोल वसूली बंद कर दी है। ये फैसला एक्सप्रेसवे के करीब 300 मीटर लंबे हिस्से पर सड़क के फिसलन भरे होने की शिकायत सामने आने के बाद लिया गया। सड़क की स्थिति को देखते हुए मरम्मत का काम तेजी से कराया जा रहा है। टोल बंद रहने से होने वाले रेवेन्यू नुकसान की भरपाई निर्माण कंपनी PNC इंफ्राटेक लिमिटेड से कराई जाएगी।

शुरू किए जांच

NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने कहा है कि जब तक सड़क का खराब हिस्सा पूरी तरह ठीक नहीं हो जाता, तब तक इस एक्सप्रेसवे पर टोल नहीं वसूला जाएगा। साथ ही, टोल बंद रहने से होने वाले रेवेन्यू नुकसान की भरपाई निर्माण कंपनी PNC इंफ्राटेक लिमिटेड से कराई जाएगी। NHAI ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए निर्माण कंपनी PNC इंफ्राटेक, परियोजना के स्वतंत्र इंजीनियर और निर्माण कार्य की निगरानी से जुड़े अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। NHAI ने कहा कि मामले की जांच की जा रही है और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कदम उठाए जाएंगे।

NHAI ने कंपनी को जारी किया नोटिस 

प्रभावित हिस्से पर ट्रैफिक डायवर्ट कर दिया गया है और मरम्मत का पूरा खर्च PNC इंफ्राटेक उठाएगी। वहीं, NHAI ने कंपनी को नोटिस जारी कर उसे ‘नॉन-परफॉर्मर’ घोषित करने का प्रस्ताव रखा है। साथ ही कंपनी पर जुर्माना लगाने और परियोजना से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। प्रोजेक्ट मैनेजर, स्वतंत्र इंजीनियर की टीम के प्रमुख और रेजिडेंट इंजीनियर को उनके पद से हटा दिया गया। साथ ही उन्हें अगले दो साल तक सड़क परिवहन मंत्रालय, NHAI और NHIDCL की परियोजनाओं में काम करने से रोक दिया गया है। इसके अलावा, लापरवाही के आरोप में मौजूदा और पूर्व प्रोजेक्ट डायरेक्टर के खिलाफ भी चार्जशीट जारी करने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

सड़क बनने के बाद लगेगा टैक्स

NHAI ने बताया कि, परियोजना के स्वतंत्र इंजीनियर थीम इंजीनियरिंग सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है और उसे भविष्य की परियोजनाओं से बाहर किया जा सकता है। वहीं, सड़क में आई खराबी की वजह पता लगाने के लिए IIT खड़गपुर के प्रोफेसर के. एस. रेड्डी की अगुवाई में विशेषज्ञों की टीम बनाई गई है। NDTV ने बताया कि इसके अलावा, एक्सप्रेसवे की सड़क की स्थिति की जांच के लिए लेजर प्रोफाइलोमीटर तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा। NHAI ने स्पष्ट किया है कि सड़क के खराब हिस्से की पूरी तरह मरम्मत होने के बाद ही एक्सप्रेसवे पर दोबारा टोल वसूली शुरू की जाएगी।

300 मीटर हिस्सा होगा रिपेयर

NHAI के अनुसार, 26 जुलाई को एक्सप्रेसवे के दाहिने कैरिजवे पर किलोमीटर 64 के पास सड़क में फिसलन की समस्या सामने आई। ये मामला 13 जुलाई को एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद सामने आया। उन्नाव जिले के कोरारी गांव के पास हुई भारी बारिश के बाद सड़क के इस हिस्से के खराब होने की तस्वीरें भी सामने आई थीं। शुरुआती रिपोर्ट में 5 से 7 मीटर तक सड़क प्रभावित होने की बात कही गई थी, लेकिन NHAI की जांच में करीब 300 मीटर लंबे हिस्से में फिसलन मिलने की पुष्टि हुई।

यूरोप में 40°C पर पिघलने लगीं सड़कें पर भारत में 45°C+ की गर्मी कैसे झेल जाते हैं हाईवे? Science Explained

अपनी ठंडी और बर्फीली वादियों के लिए मशहूर यूरोप के कई देश इन दिनों भीषण गर्मी और हीटवेव (Heatwave) की मार झेल रहे हैं। स्पेन, जर्मनी, स्विटजरलैंड, पुर्तगाल, डेनमार्क और फ्रांस समेत ज्यादातर देशों में तापमान करीब 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। इस भीषण गर्मी के बीच ब्रिटेन (यूके) के कुछ इलाकों में तेज गर्मी के कारण सड़कें नरम पड़ने और कुछ जगहों पर पिघलने की खबरें सामने आई हैं। इसके बाद लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि जब भारत में गर्मियों के दौरान तापमान अक्सर 45 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर पहुंच जाता है, तब यहां सड़कें इस तरह क्यों नहीं पिघलतीं?

दरअसल, इसकी सबसे बड़ी वजह सड़क निर्माण की गुणवत्ता नहीं, बल्कि स्थानीय मौसम के अनुसार सड़क बनाने की तकनीक है। हर देश में सड़कें वहां के मौसम और तापमान को ध्यान में रखकर तैयार की जाती हैं। इसलिए भारत और ब्रिटेन की सड़कों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और तकनीक अलग-अलग होती है।

क्यों पिघल रही हैं यूरोपीय देशों की सड़कें

ब्रिटेन समेत यूरोप के कई देशों में सड़कें वहां की कड़ाके की ठंड को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। इन देशों में सर्दियों के दौरान तापमान कई बार शून्य से नीचे चला जाता है और बर्फ बार-बार जमती और पिघलती रहती है। ऐसे मौसम का सामना करने के लिए सड़क निर्माण में ऐसे डामर (अस्फाल्ट) और बिटुमेन का इस्तेमाल किया जाता है, जो ठंड में लचीले बने रहें और सड़क में दरारें न पड़ें।

लेकिन यही सामग्री तेज गर्मी में समस्या बन जाती है। जब तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक पहुंच जाता है, तो बिटुमेन नरम पड़ने लगता है। ऐसे में भारी वाहनों के लगातार गुजरने से सड़क की सतह दब सकती है, उभर सकती है या कुछ जगहों पर पिघली हुई दिखाई देने लगती है। यही वजह है कि इन दिनों यूरोप के कई इलाकों में सड़कों के नरम पड़ने और खराब होने की घटनाएं सामने आ रही हैं।

भारत की सड़कें तेज गर्मी में क्यों नहीं पिघलतीं?

भारत में सड़कें यहां की भीषण गर्मी को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। देश के कई हिस्सों में गर्मियों के दौरान तापमान 45 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक पहुंच जाता है। इसलिए सड़क निर्माण में ऐसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है, जो तेज गर्मी को आसानी से सह सके। सड़क बनाने के लिए आमतौर पर वीजी-30 और वीजी-40 ग्रेड का सख्त बिटुमेन और बड़े पत्थरों (एग्रीगेट्स) वाले डामर का उपयोग किया जाता है। ये सामग्री ऊंचे तापमान में भी अपनी मजबूती बनाए रखती है और आसानी से नरम नहीं पड़ती।

यही वजह है कि भीषण गर्मी के बावजूद भारत की सड़कें यूरोप के कई देशों की तुलना में अधिक मजबूत रहती हैं और उनके पिघलने या खराब होने की संभावना काफी कम होती है।

भारत की सड़कें ज्यादा मजबूत क्यों रहती हैं?

भारत में सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाला बिटुमेन ज्यादा गाढ़ा और मजबूत होता है। यही वजह है कि सड़कें तेज गर्मी के साथ-साथ भारी ट्रैफिक का दबाव भी आसानी से सहन कर लेती हैं। इससे सड़कों पर गड्ढे बनने, सतह उखड़ने या सड़क का आकार बिगड़ने जैसी समस्याएं कम होती हैं। इसलिए 45 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान में भी भारत की सड़कें सामान्य रूप से काम करती रहती हैं।

यूरोप और भारत की सड़कों के बीच सबसे बड़ा अंतर यह है कि दोनों जगह सड़कें वहां के मौसम को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। यूरोप में सड़कें कड़ाके की ठंड और बर्फबारी को झेलने के लिए तैयार की जाती हैं, इसलिए उनमें लचीली सामग्री का इस्तेमाल होता है। वहीं, भारत में सड़कें भीषण गर्मी को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, इसलिए इनमें ऐसी सामग्री इस्तेमाल की जाती है जो ऊंचे तापमान में भी मजबूत बनी रहती है। इसी कारण यूरोप में असामान्य गर्मी पड़ने पर कुछ जगहों पर सड़कें नरम पड़ जाती हैं, जबकि भारत की सड़कें ऐसे ही, बल्कि इससे भी अधिक तापमान को आसानी से सहन कर लेती हैं।