ट्रंप के प्रिय मुनीर है या मोदी?

उस समय के अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिगर ने लिखा है कि भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने प्रेसिडेन्ट निक्सन को ऐसे डपटा जैसे एक प्रोफेसर अपने किसी कमजोर स्टूडेंट की झाड़ लगाता है।… अभी फ्रांस में सबने देखा उसी देश के प्रधानमंत्री ट्रंप को एक्सीलेंसी बोल रहे थे। मतलब महामहिम। अपने समकक्ष नहीं। बहुत उंचे दर्जें पर समझकर। जिनसे बात नहीं होती है। केवल निवेदन होता है। 6 बार बोला।

शिमला समझौता, जो भारत की विजय का नाद था उसकी भाजपा ने (उस समय जनसंघ था) कितनी आलोचना की थी? वही आज इस्लामाबाद और उसके समझौते की दुनिया में वाहवाही है। विश्व नेताओं उसकी बधाई दे रहे हैं। उसी सिलसिले में प्रधानमंत्री मोदी ने भी ट्रंप के सामने कि आपका हम अभिनंदन करते हैं। क्या इसकी जरूरत थी?और इससे भारत का क्या मैसेज बना है?

12 वर्षों से पाकिस्तान, ट्रंप और विदेशी नीति को ले कर मोदी सरकार ने भक्तों और गोदी मीडिया से एक अलग ही शेखी फैलाई हुई थी। पाकिस्तान मवाली देश और भारत विश्व नेता, विश्व गुरू। भक्त और मीडिया क्योंकि किसी के भी प्रति जवाबदेह नहीं हैं तो चाहे जो प्रचार हुआ। इस सबसे दुनिया में भारत की इमज कैसी बनती है इसकी उन्हें कोई चिंता नहीं है। इसी सप्ताह प्रधानमंत्री मोदी के आगे ट्रंप ने कहा कि मैं आपके मीडिया को पंसद करता हूं। अच्छे अच्छे सवाल करता है। हमारा तो फंसाने वाले सवाल करता है। मतलब भारत का मीडिया  अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी गोदी मीडिया के रूप में प्रचारित हो गया!

बहराहल अमेरिका और ईरान के एमओयू का इस्लामाबाद समझौता हो गया है। इसमें नई दिल्ली कहीं नहीं है। भारत बधाई देने वालों की कतार में है। कांग्रेस छोड़ दीजिए। राजनीति भी। लेकिन विदेश सेवा के उन वरिष्ठ अधिकारियों की उस तड़प और दर्द का आप क्या करेंगे जिन्होंने अपना पूरा करियर भारत को विश्व मंच पर स्थापित करने में बिताया। और पाकिस्तान जो इस काबिल कभी था ही नहीं और उसे भारत से ऊपर तो क्या बराबर भी कभी नहीं आने दिया।

पाकिस्तान की वह स्थिति अभी भी नहीं है। मगर हमने अपनी स्थिति जरूर खो दी है। लेकिन गोदी मीडिया इसी बात को लेकर खुशी मना रहा है कि ट्रंप ने कहा कि अगर मोदी रहेंगे और भारत पर हमला हुआ तो वे भारत के साथ खड़े रहेंगे। साथ ही यह भी कहा कि अगर कोई दूसरा होगा तो वे नहीं कह सकते। वाह! अन्तरराष्ट्रीय संबंध ऐसे चलते हैं? जिस अमेरिका-ईरान समझौते की बात हो रही है क्या वह ट्रंप और मसूद पेजेश्कियान, जिन्होंने ईरान की तरफ से साइन किए के बीच का समझौता है? कल को जब ट्रंप प्रेसिडेन्ट नहीं रहेंगे तो ईरान कह सकता है कि समझौता खत्म!

संयुक्त राष्ट्र किन -न के हस्ताक्षरों से बना था? सब खत्म हो गए। संगठन बना हुआ है। पर वहा की बहस बेमानी है। यह भी बहस बेमतलब कि वह कितना काम कर पा रहा है या नहीं? सवाल यह है जैसा ट्रंप ने कहकर मोदी भक्तों को बहला दिया कि अगर वे सत्ता में रहेंगे और मोदी रहेंगे तो यह होगा। नहीं तो नहीं!

सवाल है ट्रंप के न रहने से अमेरिका खत्म हो जाएगा? भारत के बारे में तो ट्रंप ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि अमेरिका को बहुत कड़वा अनुभव है भारत के बारे में गलत बोलने का। राष्ट्रपति निक्सन ने बोला था। बहुत ही गंदा। क्या? वह हम यहां नहीं लिख रहे। मगर हां यह जरूर बता रहे हैं कि उसका जवाब तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने कैसा दिया था। जो ट्रंप सहित वहां बनने वाले सभी राष्ट्रपतियों को आज भी याद है। सुनी सुनाई नहीं। किताबों में लिखा है। उस समय के अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसंगर ने लिखा है कि भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने प्रेसिडेन्ट निक्सन को ऐसे डपटा जैसे एक

प्रोफेसर अपने किसी कमजोर स्टूडेंट की झाड़ लगाता है। उससे पहले अमेरिका के अधिकारियों ने भारत के अमेरिका स्थित राजदूत से पूछा था कि प्रेसिडेन्ट निक्सन अपने समकक्षों को मिस्टर लगा कर बोलते हैं क्या आपके प्राइममिनिस्टर को भी बोल सकते हैं? सवाल इन्दिरा जी तक आया। उन्होंने हंस कर कहा बोल सकते हैं। यह था इन्दिरा गांधी का आत्मविश्वास। और एक अभी फ्रांस में सबने देखा उसी देश के प्रधानमंत्री ट्रंप को एक्सीलेंसी बोल रहे थे। मतलब महामहिम। अपने समकक्ष नहीं। बहुत उंचे दर्जें पर समझकर। जिनसे बात नहीं होती है। केवल निवेदन होता है। 6 बार बोला।

ऐसी भारत की आज स्थिति हो गई है। गोदी मीडिया भक्तों को तो कुछ नहीं मालूम। मगर भाजपा में कुछ पढ़े लिखे नेता हैं। उन्हें मालूम होगा कि यह सारे अन्तरराष्ट्रीय समझौते इन्टरनेशनल स्टेडी में, सिविल सर्विस की परीक्षाओं  मे पढ़ाए जाते हैं। हमारे नेतृत्व की कमजोरी से पाकिस्तान ने वह दर्जा हासिल कर लिया कि जो अब सब जगह इस्लामाबाद समझौता भी पढ़ाया जाएगा। कूटनीति के कौशल, पाठ में हर जगह चर्चा में रहेगा।

पहले इस इस्लामाबाद का नाम आतंकवाद फैलाने के लिए आता था। 2008 के मुंबई आतंकवादी हमले के बाद उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस्लामाबाद को अन्तरराष्ट्रीय जगत से अलग थलग कर दिया था। और आज उसी अमेरिका जो हमें कमजोर समझकर अपनी शान बताने के लिए कह रहा है कि हमला हुआ तो मैं तुम्हारे साथ खड़ा होऊंगा। मगर असल में ट्रंप की मेहरबानी से पाकिस्तान एक नई हैसियत में आज खड़ा है।  विश्व ताकत बन कर खड़ा हो गया है। वहां के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ

इस्लामाबाद से इसकी घोषणा कर रहे हैं।

वह कहते हैं ना –

और क्या देखने को बाकी है

आप से दिल लगाकर देख लिया!

मोदी से आपने दिल लगाया। और मोदी ने ट्रंप से। फैज की इस गजल का अगला शेर है –

वो मेरे हो के भी मेरे न हुए

उन को अपना बना कर देख लिया!

माई डियर फ्रेंड से हिज एक्सीलेंसी तक।

वे एक हाईपोथेटिकल ( काल्पनिक) सवाल के जवाब में कहते हैं कि अगर भारत पर हमला हुआ तो। यह बिल्कुल ऐसा ही जैसे कोई खुद को दबंग समझने वाला कमजोर पर रौब झाड़े कि ऐ अगर कोई तुमसे बात करे तो हमें बताना… हम उसका ऐसा कर देंगे वैसा कर देंगे। और डरा हुआ कमजोर कहे जी साहब आपका ही सहारा है।

और दूसरी तरफ सोचिए जरा। किसी आत्मविश्वास वाले ठीक आदमी से कोई कहे कि अगर कोई तुम पर हमला करे तो हम हैं। तो वह छूटते ही कहेगा किसकी मजाल है?

अभी पहलगाम में जब हमारे निर्दोष नागरिकों को पाकिस्तानी आतंकवादी हमले में मार दिया गया था तो ट्रंप आए थे मोदी के साथ? उसके बाद आपरेशन सिंदूर में? उसमें तो जब हमारी सेनाएं हमेशा के लिए एक फैसला करने की स्थिति में थीं तब ट्रंप ने आदेश के स्वर में स्टाप इट स्टाप इट कहकर उन्हें रोक दिया था।

वह सीजफायर जिसके लिए सौ बार ट्रंप ने बोला कि मैंने करवाया हमने तत्काल माना। और पाकिस्तान उसके बाद चौबीस घंटे तक हमले करता रहा।

मैं आपके साथ आ जाऊंगा! उस वक्त कहां थे? भारत को विश्व राजधानियों में नेताओं को भेजना पड़ा। कांग्रेस के और दूसरे विपक्षी दलों के लेकर! अमेरिका भी। क्यों? क्योंकि कोई आपके साथ नहीं था। जो देश परपंरागत रूप से भारत के साथ रहते आए थे उन्हें भी आपने अपनी व्यक्तिगत छवि बनाने वाली नीतियों से दूर कर दिया।

अन्तरराष्ट्रीय संबंधों में व्यक्ति का महत्व नहीं होता है। और अगर पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसा प्रतिष्ठित कोई व्यक्ति हो या इन्दिरा गांधी जैसी साहसी याद कर लें पहला परामाणु परीक्षण उन्होंने ही किया था तो या मनमोहन सिंह जैसा विद्वान तो फिर भी उसका कोई असर होता है मगर यह कहकर कि मेरी छाती 56 इंच की है। लाल आंखे हो जाती हैं। एक अकेला सब पर भारी हूं। गोदी मीडिया और भक्त तो मुरीद हो जाते हैं मगर अन्तरराष्ट्रीय जगत में इन चुटकुलों का कोई असर नहीं होता है।

अमेरिका-ईरान समझौता अच्छा है। शांति के हर प्रयास का स्वागत है। मगर हमने अपना जो अन्तरराष्ट्रीय स्थान गंवाया है और जो कभी इसके बिल्कुल योग्य नहीं था क्योंकि उसने अपनी जनता की भलाई के बदले धर्म, बड़े जमींदारों, पूंजीपतियों और अमेरिका के पिछलग्गू की भूमिका निभाई गई है उस राह से वैश्विक मंच पर आगे बहुत मुश्किल है।

जिस हकीकत को देश और दुनिया समझ रही है मगर मोदी और ट्रंप नहीं समझ रहे है। मोदी को ट्रंप प्रिय हैं हालांकि अब वे दोस्त से बॉस हो गए हैं। मतलब महामहिम! इससे कुछ भी नहीं सधना है।दुनिया ने जान लिया है की ट्रंप के प्रिय पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर है। वही मुनीर, जिन्हें पहलगाम आतंकवादी हमले का मास्टर माइंड बताया जाता है।

66 दिन बाद खुला हार्मुज स्ट्रेट: अमेरिका ने हटाई नाकेबंदी, फिर दौड़ने लगे तेल टैंकर

strait of hormuz

Strait of Hormuz blockade-ended : अमेरिका ने ईरान के साथ शांति समझौते के बाद आज स्ट्रेट ऑफ हार्मुज से नाकेबंदी खत्म कर दी है। अमेरिकी सेना (सेंटकॉम) द्वारा नाकेबंदी खत्म करने की घोषणा के बाद यहां से तेल टैंकर्स और अन्य जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू हो गई। ALSO READ: ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई पर अमेरिकी जांच, मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के आरोपों की पड़ताल तेज

 

यूए सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, राष्ट्रपति के निर्देश के अनुसार, अमेरिकी सेना ने ईरानी बंदरगाहों और तटीय इलाकों में आने-जाने वाले सभी समुद्री जहाजों पर लगी नाकेबंदी हटा ली है। अमेरिकी सेना ईरानी बंदरगाहों पर आने-जाने वाले जहाजों को नहीं रोक रही है।

 

सेंट्रल कमांड ने कहा कि नाकेबंदी हटने के बाद भी हमारे नेवी जहाज उस इलाके में मौजूद रहेंगे, ताकि यह पक्का किया जा सके कि समझौते की सभी बातों का पालन हो रहा है और वे पूरी तरह से लागू हैं।

 

66 दिन बाद हटी नाकेबंदी

गौरतलब है कि अमेरिका ने 28 फरवरी को इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया था। अमेरिकी-इजरायल हमले के जवाब में ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया था। इस पर अमेरिका ने हार्मुज की नाकेबंदी कर दी थी। 66 दिनों तक यहां अमेरिका की नाकेबंदी रही। इस वजह से दुनियाभर में तेल सप्लाय बुरी तरह प्रभावित हुई थी। बहरहाल MoU पर साइन होने के बाद अमेरिका ने अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की 14 शर्तों में स्ट्रेट ऑफ हार्मुज से अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करने की शर्त भी शामिल थी।

 

अमेरिका ईरान वार्ता टली

व्हाइट हाउस के अनुसार, अमेरिकी उपराष्‍ट्रपति जेडी वेंस ईरान से वार्ता के लिए स्विट्जरलैंड नहीं जा रहे हैं। इसके बाद ईरान ने जिनेवा जा रहे अपने प्रतिनिधिमंडल को रोक दिया है। इस वजह से आज अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली वार्ता टल गई है।

 

अमेरिकी नाकेबंदी हटने से क्या फायदा?

कच्चे तेल की सप्लाई सुचारु होगी : हार्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है। वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20% हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। मार्ग खुला रहने से सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, इराक और कतर से तेल और गैस की आपूर्ति सुचारु होगी।

 

कम होगी महंगाई : भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। हार्मुज में तनाव कम होने से भारत को तेल और LNG की नियमित आपूर्ति मिलती रहती है। इससे महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।

 

तेल की कीमतों पर दबाव कम होगा : हार्मुज बंद होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा हो गया था। मार्ग खुलने से सप्लाई की चिंता घटेगी और कीमतों में स्थिरता आएगी।
 

शिपिंग और बीमा लागत घटेगी : तनाव के दौरान जहाजों के बीमा प्रीमियम और सुरक्षा खर्च बढ़ जाते हैं। स्थिति सामान्य होने पर परिवहन लागत कम होती है, जिससे आयातित वस्तुएं अपेक्षाकृत सस्ती पड़ सकती हैं।

edited by : Nrapendra Gupta

अमेरिका-ईरान ‘डील साइन’

नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच निर्धारित समय से एक दिन पहले 18 जून को ही युद्धविराम समझौते पर दस्तखत हो गए। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के वर्साय पैलेस में समझौते पर दस्तखत करने के बाद बाहर निकल कर मीडिया के सामने चिल्ला कर कहा ‘डील साइन’। ईरान की तरफ से राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने समझौते पर दस्तखत किया। पिछले करीब 50 साल में पहली बार अमेरिका और ईरान ने किसी समझौते पर दस्तखत किया है।

अंतरिम समझौते पर दस्तखत के समय दोनों देशों के राष्ट्रपति आमने सामने नहीं बैठे थे, बल्कि डिजिटल तरीके से जुड़े थे। राष्ट्रपति ट्रंप ने बुधवार की रात को फ्रांस के वर्साय पैलेस में युद्धविराम से जुड़े समझौता ज्ञापन पर दस्तखत किए। इस दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों मौजूद थे। समझौते के दस्तावेज पर दस्तखत करने के बाद ट्रम्प वर्साय पैलेस से बाहर आए। इस दौरान किसी रिपोर्टर ने उनसे पीस डील को लेकर पूछा, तो उन्होंने चिल्लाते हुए कहा, ‘डील साइन हो गई है’। गौरतलब है कि वर्साय में पहले विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी के साथ ऐतिहासिक समझौता हुआ था।

राष्ट्रपति ट्रंप के बाद ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने भी ईरान से डिजिटल तरीके से दस्तखत किए। समझौते का ऐलान भारतीय समय के मुताबिक गुरुवार सुबह साढ़े पांच बजे किया गया। यह तत्काल प्रभाव से लागू हो गया। इस समझौते के तहत ईरान और लेबनान में सैन्य अभियान खत्म किया जाएगा। साथ ही होर्मुज की खाड़ी को दोबारा खोला जाएगा और अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी खत्म की जाएगी।

गौरतलब है कि इस समझौते पर 19 जून को स्विटजरलैंड में जेनेवा के पास लूसर्न शहर में दस्तखत होने थे, लेकिन निर्धारित कार्यक्रम से एक दिन पहले ही इस पर दस्तखत कर दिए गए। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने अमेरिका के साथ हुए समझौते को ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हुए कहा कि यह दुनिया के लिए एक मजबूत ईरान का संदेश है। पेजेशकियान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि ईरान वैश्विक शांति, अपनी गरिमा और स्वतंत्रता बनाए रखने के साथ साथ विकास और क्षेत्रीय सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है।

इस बीच खबर है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर दस्तखत होने के बाद होर्मुज की खाड़ी में जहाजों की आवाजाही तेज हो गई है। सऊदी अरब के झंडे वाले तीन बड़े तेल टैंकर होर्मुज की खाड़ी से गुजरे। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इन सुपर टैंकरों में करीब 60 लाख बैरल कच्चा तेल भरा हुआ था। दूसरी ओर यह भी खबर है कि इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अगले 60 दिन में अमेरिका औरर ईरान के अंतिम समझौते को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। ‘इजराइल टाइम्स’ के मुताबिक, नेतन्याहू दक्षिणपंथी मीडिया हस्तियों और इजराइल समर्थक अमेरिकी सांसदों के जरिए राष्ट्रपति ट्रंप पर दबाव बनाना चाहते हैं।

जनभावना का ध्यान रखने की जरुरत नहीं!

क्या भारतीय जनता पार्टी इतनी बड़ी और इतनी ताकतवर हो गई है उसे चुनाव जीतने के लिए जनभावना का ध्यान रखने की भी जरुरत नहीं है? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और अमित शाह का प्रबंधन इस स्तर तक पहुंच गया है कि जनभावना विपरीत होने के बावजूद वे भाजपा को चुनाव जिता दें? यह सवाल इसलिए है क्योंकि कई बार भारतीय जनता पार्टी जनभावना के खिलाफ काम करती दिखती है। ऐसे मुद्दों पर भी, जिन पर एक खास किस्म की जनभावना का निर्माण स्वंय भाजपा ने किया है। नागरिक इस बात को समझते भी हैं और सार्वजनिक विमर्श में इसकी चर्चा भी होती है। लोग सवाल भी उठाते हैं लेकिन मतदान के समय उनकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं और वे भाजपा के विरोध की मनःस्थिति के बावजूद उसी को वोट करते हैं। यह स्टॉकहोम सिंड्रोम है या नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने कुछ ऐसे मुद्दे लोगों के अवचेतन में बैठा दिए हैं, जो मतदान के समय उनकी मनःस्थिति को प्रभावित करने वाले तात्कालिक मुद्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं? यह गहरे विश्लेषण का विषय है। इसके तत्व धर्म, जाति और सांप्रदायिक आधार पर गहरे राजनीतिक व सामाजिक विभाजन में खोजे जा सकते हैं।

अगर जनभावना की बात करें तो सबसे पहले उदाहरण के लिए भ्रष्टाचार का मुद्दा लिया जा सकता है। भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमत बनाया था और नारा दिया था कि ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’। लेकिन भाजपा भ्रष्टाचार के आरोपियों को खुले दिल से पार्टी में शामिल करती है और उन्हें उच्च पद पर बैठाती है। महाराष्ट्र में अजित पवार के ऊपर भाजपा ने 70 हजार करोड़ रुपए के सिंचाई घोटाले का आरोप लगाया था और कोऑपरेटिव बैंक व चीनी मिल से जुड़े कई घोटाले से थे। अमित शाह ने कहा था कि अजित पवार जेल जाएंगे और चक्की पीसेंगे। लेकिन वही अजित पवार भाजपा के साथ आ गए। उनको उप मुख्यमंत्री बना दिया गया और चुनाव में भाजपा को इसका फायदा भी मिला। यह कहानी एक के बाद एक कई राज्य में दोहराई गई। हिमंत बिस्वा सरमा के ऊपर कई गंभीर आरोप लगे थे। सीबीआई ने उनकी जांच की थी। वे भाजपा के मुख्यमंत्री हैं। सुवेंदु अधिकारी एक स्टिंग ऑपरेशन में कैमरे पर पैसे लेते पकड़े गए थे। लेकिन वे भी भाजपा के मुख्यमंत्री हैं। अभी ही तृणमूल कांग्रेस के जो सांसद सरोगेट तरीके से भाजपा से जुड़ रहे हैं उनमें कई भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों के आरोपी हैं और उन्हीं के खिलाफ बंगाल के लोगों ने गुस्सा निकाला। लेकिन भाजपा को इसकी परवाह नहीं है। ऐसी अनगिनत मिसाले हैं। आम आदमी पार्टी के जिस सांसद के यहां ईडी ने छापा मार उसने 10 दिन के बाद ही भाजपा के बड़े नेताओं के सामने पार्टी ज्वाइन कर ली। ऐसा लग रहा है जैसे भाजपा भ्रष्टाचार को नापंसद करने वाले अपने समर्थकों को चिढ़ाने के लिए ऐसा काम कर रही है।

भ्रष्टाचार के बाद भाजपा और नरेंद्र मोदी का दूसरा बड़ा मुद्दा वंशवाद का था। उन्होंने जिस तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावना का निर्माण किया वैसे ही वंशवाद के खिलाफ भी किया। परिवारवाद को लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। लेकिन बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक से लेकर आंध्र प्रदेश तक परिवारवादी पार्टियों को अपने साथ जोड़ा, उन्हें प्रश्रय दिया, उनको अपनी सरकार में मंत्री बनाया और राज्यों में सत्ता का सुख भोगने के बंदोबस्त किए। अपनी पार्टी में भी दूसरी या तीसरी पीढ़ी के नेताओं के आगे बढ़ाया।

ऐसे ही महंगाई का मामला है। 2014 में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर नरेंद्र मोदी ने ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’ का नारा दिया। लेकिन सरकार में आने के बाद पिछले 12 साल में महंगाई बेतहाशा बढ़ी है। कच्चे तेल की कीमतें तो अब बढ़ी हैं, जब आपूर्ति प्रभावित हुई। परंतु भारत में तो पेट्रोल की कीमत एक सौ रुपए की मनोवैज्ञानिक सीमा पांच साल पहले ही पार कर गई थी। भाजपा ने 60 रुपए लीटर पेट्रोल को महंगा बताया था लेकिन उसकी सरकार ने 2021 में पेट्रोल की कीमत सौ रुपए लीटर कर दी। भाजपा ने चार सौ रुपए के रसोई गैस सिलेंडर के खिलाफ अभियान चलाया था लेकिन सरकार में आने के थोड़े दिन बाद ही उसने इसकी कीमत नौ सौ रुपए कर दी। मोदी के अनेक वीडियो आज भी शेयर किए जाते हैं, जिसमें 60 रुपए में एक डॉलर की कीमत को देश की प्रतिष्ठा के साथ जोड़ रहे थे। लेकिन आज 96 रुपए का डॉलर मिल रहा है फिर भी देश की प्रतिष्ठा बढ़ रही है!

प्रधानमंत्री ‘परीक्षा पर चर्चा’ करते हैं। उन्होंने ‘एग्जाम वॉरियर्स’ नाम से किताब लिखी है। आज नीट यूजी पेपर लीक और दोबारा परीक्षा के कारण 23 लाख और सीबीएसई की गड़बड़ियों के कारण 18 लाख छात्र परेशान हैं। परंतु प्रधानमंत्री ने एक शब्द नहीं कहा है। लाखों छात्र और करोड़ों अभिभावकों में असंतोष और गुस्सा है। प्रतियोगिता परीक्षाओं में गड़बड़ी और नौकरी की कमी से लोग नाराज हैं। सड़कों पर भी लोगों का गुस्सा निकल रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी फल फूल रही है। इसके बावजूद भाजपा और उसकी सरकार को इसकी परवाह नहीं है। नरेंद्र मोदी ने हर साल दो करोड़ नौकरी का वादा किया था। आज चार हजार पद के लिए 14 लाख लोग आवेदन कर रहे हैं। आठवीं पास की योग्यता जिस नौकरी के लिए चाहिए उसमें एमए पास लोग लाइन लगा कर खड़े होते हैं। रेलवे की एक लाख नौकरी के लिए एक करोड़ आठ लाख लोगों ने आवेदन किया और कई साल बीत जाने के बाद भी उसकी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी।

सो, भ्रष्टाचार हो, परिवारवाद हो, महंगाई हो या नौकरी और रोजगार का मामला हो, हर मामले में जनभावना सरकार के विरूद्ध दिखती है। इसके बावजूद भाजपा चुनाव जीत रही है तो इसका मतलब यह है कि सामान्य दिनों में जनभावना का ज्वार और मतदान के दिन की प्राथमिकता दोनों में समानता नहीं भी हो सकती है। पहले ऐसा होता था कि अगर लोगों में गुस्सा था तो वह मतदान में और चुनाव नतीजों में प्रकट होता था। आज ऐसा नहीं होता है। इसका कारण यह है कि अपने जीवन से जुड़ी रोजमर्रा की चीजों पर सरकार से नाराज होने के बावजूद किसी बड़ी प्रत्याशा में या किसी बड़े नैरेटिव के असर में लोग भाजपा को वोट दे रहे हैं। जैसे जैसे यह धारणा स्थापित होती जा रही है वैसे वैसे भाजपा जनभावना का ख्याल करना बंद या कम करती जा रही है। वह सरेआम ऐसे तमाम काम कर रही है, जिसके खिलाफ उसने खुद जनभावना का निर्माण किया है।

सोने के आयात में 70% गिरावट, मोदी की अपील और बढ़े शुल्क का दिखा असर

Gold import reduced in india

Gold Import : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक साल तक सोना नहीं खरीदने की अपील और 13 मई से शुल्क 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी किए जाने के बाद सोने के आयात में भारी गिरावट। एक महीने में देश में सोने का आयात पहले के 75-100 टन से करीब 70 फीसदी घटकर 30 फीसदी रह गया है। हालांकि ज्यादा कीमतों की वजह मूल्य के लिहाज से मई में सोने का आयात सालाना आधार पर 34 फीसदी बढ़कर 3.41 अरब डॉलर पहुंच गया। ALSO READ: Top News 19 June : हार्मुज स्ट्रेट से अमेरिकी नाकेबंदी हटी, ईरान से वार्ता टली; सोने के आयात में 70% गिरावट

 

आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-मई के दौरान सोने का आयात 60.14 फीसदी बढ़कर 9.04 अरब डॉलर पहुंच गया। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर मूल्य का सोना खरीदा था, जो सालाना आधार पर 24 फीसदी की बढ़ोतरी है। हालांकि, मात्रा के लिहाज से इसमें 4.76 फीसदी की गिरावट आई और यह 721.03 टन रहा। देश के कुल आयात में सोने की हिस्सेदारी पांच फीसदी से अधिक है।

 

क्या है आयात में 70% की गिरावट का मतलब?

 

यदि किसी महीने में आयात में 70% की गिरावट दर्ज हुई है, तो यह आमतौर पर संकेत देता है कि ऊंची कीमतों और कमजोर मांग के कारण आयातकों ने नई खरीद को काफी हद तक रोक दिया है। यह जरूरी नहीं कि लोगों की सोने में रुचि खत्म हो गई हो, महंगे इंपोर्ट टैक्स की वजह से भी इसी खरीदारी फिलहाल टली हुई है। ALSO READ: 30,000 करोड़ का NSE IPO! टूट सकता है LIC और Hyundai का रिकॉर्ड, जानिए कौन बेच रहा है सबसे ज्यादा शेयर

 

भारत में क्यों घट रहा है सोने का आयात?  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से एक साल तक सोना नहीं खरीदने की अपील की है। इसके साथ ही भारत में सोने के आयात में गिरावट के पीछे कई कारण हैं, जिनमें सबसे प्रमुख हैं:

 

सोने की ऊंची कीमतें : अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची हैं। भारत में भी 24 कैरेट सोना 1.5 लाख प्रति 10 ग्राम के आसपास पहुंचने के बाद उपभोक्ताओं की खरीदारी प्रभावित हुई है। कीमत बढ़ने से ज्वेलरी की मांग घटती है और आयात कम हो जाता है।

 

भू-राजनीतिक अनिश्चितता में कमी: जब वैश्विक तनाव बढ़ता है तो निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में सोना खरीदते हैं। लेकिन यदि अमेरिका-ईरान जैसे संकटों में तनाव कम होने की उम्मीद बनती है, तो सोने की मांग कमजोर पड़ सकती है।

 

आयात शुल्क और कर व्यवस्था : सरकार द्वारा सोने के आयात पर लगने वाले शुल्क और नियमों में बदलाव भी आयात को प्रभावित करते हैं। अधिक लागत होने पर आयातक खरीद कम कर देते हैं।

 

घरेलू मांग में नरमी : शादी-ब्याह और त्योहारों के सीजन के बाहर आमतौर पर ज्वेलरी की मांग कम रहती है। ऊंची कीमतों के कारण उपभोक्ता खरीद टाल रहे हैं या हल्के वजन के आभूषण चुन रहे हैं।

 

रुपये और डॉलर का असर : सोने का आयात डॉलर में होता है। यदि रुपया कमजोर होता है तो आयात महंगा हो जाता है, जिससे आयातक खरीद घटा सकते हैं।

 

रीसाइक्लिंग और पुराने सोने की बिक्री : कीमतें बढ़ने पर लोग पुराने गहने बेचते हैं। इससे बाजार में घरेलू स्तर पर सोने की उपलब्धता बढ़ती है और आयात कम होता है।
edited by : Nrapendra Gupta

भविष्य की सैन्य ताकत के लिए भारत का स्वदेशी ड्रोन पर जोर

MQ-9B drones

मुरली कृष्णन अनुवादः शिवांगी सक्सेना

कई दशकों तक भारत की सेना अपनी सीमाओं की निगरानी के लिए मुख्य रूप से सैनिकों, लड़ाकू विमानों, सेटेलाइट और पारंपरिक निगरानी तंत्र पर निर्भर रही। 2020 में लद्दाख में चीन के साथ तनाव के दौरान पता चला कि ऊंचे पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में फैली लंबी सीमाओं पर हर समय नजर रखना कितना चुनौतीपूर्ण है।

 

अब भारत अपनी सेना के लिए बड़ी लागत में सैन्य ड्रोन खरीदने की तैयारी कर रहा है। ये ड्रोन भारतीय कंपनियों जैसे अडानी ग्रुप, टाटा एडवांस सिस्टम्स, लार्सन एंड टूब्रो और साथ में स्टार्टअप आइडियाफोर्ज और एसटेरिया एयरोस्पेस से खरीदे जाएंगे। यह भारत की अब तक की सबसे बड़ी ड्रोन खरीद होगी।

 

ड्रोन को अब युद्ध के मैदान की आंख और कान माना जाता है। वे दुश्मन की गतिविधियों की जानकारी जुटा सकते हैं और सैनिकों की आवाजाही पर नजर रख सकते हैं। जरूरी सामान पहुंचने और सटीक हमले के लिए भी ड्रोन का इस्तेमाल होने लगा है।

 

इन ड्रोन को भारत की सबसे संवेदनशील सीमाओं पर तैनात किए जाने की उम्मीद है। इनमें चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी), पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमाएं, और हिंद महासागर शामिल हैं।

 

ऊपरी तौर पर यह सिर्फ एक बड़ा रक्षा सौदा लगता है। हालांकि असल में यह दिखाता है कि भारत भविष्य के युद्ध को किस तरह से देख रहा है और ड्रोन तेजी से सैन्य योजनाओं के छोटे हिस्से से निकलकर उनकी सबसे महत्वपूर्ण जरूरत बन गए हैं। इस बदलाव के पीछे कई घटनाओं का प्रभाव रहा है।

 

जंग के मैदान से मिला चेतावनी का संकेत

मई 2025 में, भारत- शासित कश्मीर के पहलगाम में हुए हमले के बाद भारत और पकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया था। दोनों देशों ने ड्रोन और आधुनिक लड़ाकू विमानों की ताकत का इस्तेमाल किया। बाद में अमेरिका की मध्यस्थता से दोनों पक्ष लड़ाई रोकने पर राजी हुए।

 

इसके बाद भारत ने अपने इतिहास का सबसे बड़ा ड्रोन युद्ध अभ्यास 'कोल्ड स्टार्ट' शुरू किया, जिसमें थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों ने भाग लिया।

 

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय की पूर्व सदस्य तारा कार्था ने डीडब्ल्यू से बातचीत में बताया कि भारत को ड्रोन के खतरे का पहला बड़ा एहसास साल 2021 में हुआ, जब जम्मू के एयरफोर्स  स्टेशन पर ड्रोन से हमला हुआ था।

 

कार्था कहती हैं, “इस घटना ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था की उन कमजोरियों को उजागर किया, जो ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल के साथ और बढ़ गई हैं। ड्रोन का उपयोग निगरानी, तस्करी और हमलों के लिए किया जा रहा है।”

 

वह आगे बताती हैं, “अब सिर्फ तकनीक होना ही काफी नहीं है। बल्कि यह भी अहम है कि सेना कितनी जल्दी बदलते हालात के हिसाब से इसे अपनाती है, खुद को ढालती है और नई रणनीति बनाती है। जो देश कम ऊंचाई पर होने वाले ड्रोन युद्ध में आगे रहेगा, वही बड़े युद्ध में भी मजबूत स्थिति में होगा।”

 

भारत अकेला देश नहीं है जो हाल के संघर्षों से सीख ले रहा है।

 

रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया भर की सेनाओं के सोचने के तरीके को बदला है। सस्ते ड्रोन ने करोड़ों डॉलर के टैंकों को नष्ट कर दिया, तोपों को सही निशाना लगाने में मदद दी और दुश्मन की सीमाओं के बहुत पीछे तक हमले भी किए हैं। जिसे पहले केवल सहायक तकनीक माना जाता था, वह अब आधुनिक युद्ध का मुख्य हिस्सा बन गया है। नई दिल्ली में सेना के योजनाकार इन बदलावों को बहुत ध्यान से देख रहे हैं।

 

भारत की खरीद में लॉजिस्टिक्स ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और स्ट्राइक सिस्टम शामिल हैं।  इन सबकी मदद से सेना को लंबे समय तक अलग-अलग क्षेत्रों में निगरानी रखने और जल्दी प्रतिक्रिया देने की क्षमता मिलेगी। कार्था इस पर कहती हैं, “यूक्रेन में युद्ध ने यह बात और पक्की कर दी है कि ड्रोन अब केवल  सहायक उपकरण नहीं रह गए हैं, बल्कि आधुनिक युद्ध में उनकी भूमिका अहम हो गई है।”

 

भारत क्यों स्वदेशी ड्रोन चाहता है

यह कहानी सिर्फ सुरक्षा से नहीं, बल्कि उद्योग नीति से भी जुड़ी है। पहले की तरह ना होकर, इस बार यह ऑर्डर ज्यादातर घरेलू निर्माताओं से ही पूरा करने की उम्मीद है।

 

यह खरीदारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के प्रयासों के अनुरूप है और ऐसे समय में हुई है जब भारत घरेलू ड्रोन उद्योग विकसित करने का प्रयास कर रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हो।

 

सरकार का कहना है कि लंबे समय तक अपनी सुरक्षा और रक्षा जरूरतों के लिए अन्य देशों पर निर्भर रहना ठीक नहीं है। भारत ड्रोन सेक्टर में अपनी तकनीक और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है क्योंकि उसका मानना है कि इस क्षेत्र में देश जल्दी प्रगति कर सकता है।

 

विंग कमांडर राजीव कुमार नारंग ने बताया कि यूक्रेन और ईरान में हालिया संघर्षों और साथ ही पहलगाम हमले के बाद शुरू हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' ने ड्रोन टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता के महत्व को और मजबूत किया है। 

 

‘इंडियाज क्वेस्ट फॉर यूएवी एंड चैलेंजेज' के लेखक नारंग के अनुसार ईरान ने यह करके दिखाया कि कैसे स्वदेशी सिस्टम, टेक्नोलॉजी पर अपना अधिकार और स्मार्ट तरीके अपनाकर दुश्मन की तकनीकी बढ़त का मुकाबला किया जा सकता है।

 

नारंग डीडब्ल्यू से कहते हैं, “वे देश जिनके पास खुद का विकसित ड्रोन तकनीकी सिस्टम होगा और तेजी से इनोवेशन कर सकते हैं, उन्हें भविष्य की लड़ाइयों में बढ़त मिलेगी। भारत के लिए चुनौती अब सिर्फ ड्रोन बनाना नहीं रह गया। उनके पीछे की तकनीक में महारत हासिल करना और उन्हें जल्द सेना में शामिल करना है।”

 

भारत अमेरिका से 31 एमक्यू -9B प्रीडेटर ड्रोन भी खरीद रहा है। यह नई घरेलू ड्रोन की खरीदारी उस योजना को और मजबूत करेगी।

 

जहां अमेरिकी प्लेटफॉर्म लंबी दूरी तक निगरानी और हमला करने की क्षमता देते हैं, वहीं भारत में बने ड्रोन संघर्ष क्षेत्रों में बड़ी संख्या में तैनात किए जा सकेंगे।

 

ये सभी मिलकर हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक फैले बहु-स्तरीय निगरानी और युद्ध नेटवर्क के निर्माण की ओर इशारा करते हैं।

Top News 19 June : हार्मुज स्ट्रेट से अमेरिकी नाकेबंदी हटी, ईरान से वार्ता टली; सोने के आयात में 70% गिरावट

top news 19 june

Top News 19 June : ईरान से शांति समझौते के बाद ईरान ने हार्मुज स्ट्रेट से नाके बंदी खत्म कर दी। अमेरिका और ईरान के बीच आज स्विट्जरलैंड में होने वाली वार्ता टली। भारत के सोने के आयात में 70 फीसदी की गिरावट। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज अयोध्या में रामलला के दर्शन करेंगे। 19 जून की बड़ी खबरें :

 

हार्मुज स्ट्रेट में अमेरिकी नाकेबंदी खत्म

अमेरिका ने शांति समझौते के बाद आज स्ट्रेट ऑफ हार्मुज से नाकेबंदी खत्म कर दी है। अमेरिकी सेना ने हार्मुज के पास अमेरिकी ऑपरेशन खत्म करने की घोषणा की। हालांकि व्हाइट हाउस के अनुसार, अमेरिकी उपराष्‍ट्रपति जेडी वेंस ईरान से वार्ता के लिए स्विट्जरलैंड नहीं जा रहे हैं। इस वजह से आज होने वाली वार्ता टल गई है।

 

ईरान की चेतावनी

जिनेवा जा रहे प्रतिनिधिमंडल को ईरान ने रोका। ईरानी संसद के स्पीकर एमबी गालीबाफ ने कहा कि अगर डील की शर्ते नहीं मानी तो ईरान करारा जवाब देगा। ALSO READ: ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई पर अमेरिकी जांच, मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के आरोपों की पड़ताल तेज

 

सोने के आयात में भारी गिरावट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक साल तक सोना नहीं खरीदने की अपील और 13 मई से शुल्क 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी किए जाने के बाद सोने के आयात में भारी गिरावट। एक महीने में देश में सोने का आयात पहले के 75-100 टन से करीब 70 फीसदी घटकर 25-30 रह गया है।

 

अयोध्या में सीएम योगी

दानराशि में गड़बड़ी की जांच के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज अयोध्या में रामलला के दर्शन करेंगे। कहा जा रहा है कि वे इस दौरान राम मंदिर ट्रस्ट के चंपत राय से दूरी बनाए रखेंगे। जिला प्रशासन की ओर से जारी सुरक्षा एवं प्रोटोकॉल कार्यक्रम में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से मुख्यमंत्री के दर्शन-पूजन कार्यक्रम की व्यवस्थाओं के लिए एक अधिकृत प्रतिनिधि नामित करने का अनुरोध किया गया है। ALSO READ: Ayodhya Ram Temple Donation Row : राम मंदिर चढ़ावा घोटाले में SIT का बड़ा एक्शन, ट्रस्टी अनिल मिश्रा तलब; 5 आरोपियों ने खोले कई बड़े नाम

 

नाइजर में एयरपोर्ट पर बड़ा आतंकी हमला

अफ्रीकी देश नाइजर की राजधानी नियामी में स्थित अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हथियारबंद हमलावरों ने बड़ा हमला कर दिया। इस आतंकी हमले में 11 सैनिकों और 2 नागरिकों की मौत हो गई, जबकि सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई में 22 हमलावर भी मारे गए।

 

edited by : Nrapendra Gupta

PM मोदी-ट्रंप बैठक का असर, अंतिम चरण में पहुंचा भारत-अमेरिका व्यापार समझौता

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भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौता (Interim Bilateral Trade Agreement) अब अंतिम चरण में पहुंच गया है। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने गुरुवार को यह जानकारी दी। यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच फ्रांस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई मुलाकात के एक दिन बाद आया है।

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विक्रम मिस्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर महत्वपूर्ण प्रगति हुई है और अब दोनों देश इसे अंतिम रूप देने के करीब हैं। एक्सपर्ट्‍स के मुताबिक इस समझौते के लागू होने से दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ेगा, बाजारों तक पहुंच आसान होगी और निवेश के नए अवसर पैदा होंगे। उन्होंने बताया कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर अगले सप्ताह भारत का दौरा करेंगे, जहां इस समझौते को आगे बढ़ाने पर चर्चा होगी।

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मिस्री के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बैठक में व्यापार समझौता प्रमुख मुद्दों में शामिल रहा। दोनों नेताओं ने अधिकारियों को इस प्रक्रिया में तेजी लाने का निर्देश दिया है। इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने भी कहा था कि भारत और अमेरिका लंबे समय से प्रतीक्षित व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के बेहद करीब हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को दुनिया के सबसे सख्त और कुशल वार्ताकारों में से एक बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को लेकर लगातार सकारात्मक बातचीत हो रही है।

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ट्रंप ने भारत द्वारा अमेरिका में किए जा रहे निवेश की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका में बड़े पैमाने पर निवेश को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे दोनों देशों के आर्थिक संबंध मजबूत हो रहे हैं। गौरतलब है कि भारत और अमेरिका ने फरवरी में लगभग एक वर्ष तक चली बातचीत के बाद व्यापार को लेकर अंतरिम सहमति बनाई थी। इसके बाद से दोनों देश इस समझौते को अंतिम रूप देने में जुटे हैं।

 

विक्रम मिस्री ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक होते हैं, लेकिन दोनों देशों के नेतृत्व ने हमेशा संवाद के माध्यम से चुनौतियों का समाधान निकाला है।

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15 जुलाई से लागू होगा भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौता

इस बीच प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (CETA) के 15 जुलाई से लागू होने का स्वागत किया है। उन्होंने इसे दोनों देशों के संबंधों में एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए कहा कि इससे व्यापार और निवेश को नई गति मिलेगी। ब्रिटेन की भारत में उच्चायुक्त लिंडी कैमरन ने पुष्टि की है कि भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता (FTA) 15 जुलाई से प्रभावी हो जाएगा। करीब तीन वर्षों की बातचीत के बाद जुलाई 2025 में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। Edited by : Sudhir Sharma

PM Modi in Paris : पेरिस में बोले PM मोदी – 12 साल में दोगुनी हुई भारत की GDP, एयरपोर्ट और यूनिवर्सिटी की संख्या में भी बड़ा इजाफा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार को कहा कि उनके 12 वर्षों के कार्यकाल के दौरान भारत ने कई प्रमुख क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है। मोदी ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में भारतीय प्रवासियों को संबोधित करते हुए भारत में अपनी 12 साल की सरकार की उपलब्धियां गिनवाईं। उन्होंने बताया कि इस अवधि में देश की जीडीपी (GDP), एयरपोर्ट और विश्वविद्यालयों की संख्या दोगुनी हो गई है, जबकि राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण की रफ्तार भी दो गुना बढ़ी है।

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पेरिस में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने लगातार 12 वर्षों तक देश की सेवा करने को अपने जीवन का “सबसे बड़ा सौभाग्य” बताया। उन्होंने कहा कि एक चाय बेचने वाले से देश के सर्वोच्च निर्वाचित पद तक पहुंचने का उनका सफर भारतीय लोकतंत्र की ताकत को दर्शाता है।

 

प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले 12 वर्ष 140 करोड़ भारतीयों की अपार क्षमता और सामर्थ्य का प्रमाण हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल में बुनियादी ढांचे, शिक्षा और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में हुए बदलावों को भारत की विकास यात्रा का महत्वपूर्ण अध्याय बताया।

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पीएम मोदी के अनुसार, बीते 12 वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार दोगुना हुआ है। इसी दौरान देश में एयरपोर्ट और विश्वविद्यालयों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि हाईवे निर्माण की गति भी पहले की तुलना में दोगुनी हो गई है, जो देश के तेजी से विकसित होते बुनियादी ढांचे को दर्शाती है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और विकास के नए मानक स्थापित कर रहा है।

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पीएम मोदी ने कहा कि भारत और फ्रांस को कनेक्ट करने वाली एक और चीज है, वो है फुटबॉल। इस वक्त यहां फुटबॉल फीवर पूरे जोर पर है। फ्रांस में इसकी दीवानगी चप्पे-चप्पे में दिखती है, लेकिन भारत में भी फुटबॉल का क्रेज सिर चढ़कर बोलता है। खासतौर पर फ्रांस की टीम के फैन्स भारत में बहुत अधिक हैं। फ्रांस ने इस वर्ल्ड कप की शुरुआत एक जोरदार जीत से की है। मैं फ्रांस की टीम को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। 

 

एक समय था जब देशों के बीच रिश्ते सिर्फ व्यापार से तय होते थे, आज व्यापार के साथ-साथ ट्रस्ट भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। हर देश रिलायबल सप्लाई चेन चाहता है। हर देश स्टेबल पार्टनरशिप चाहता है। हर देश ऐसे साथियों की तलाश में है, जिन पर लंबे समय तक भरोसा किया जा सके और ऐसे समय में भारत, विश्व में एक Trusted Partner के रूप में उभर रहा है। Edited by : Sudhir Sharma

EPFO खाताधारकों के लिए बड़ी खुशखबरी, जल्द UPI और ATM से निकाल सकेंगे PF का पैसा

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) जल्द ही अपने करोड़ों खाताधारकों को बड़ी सुविधा देने जा रहा है। जानकारी के अनुसार, EPFO इस महीने के अंत तक ऐसी सुविधा शुरू कर सकता है, जिसके तहत सदस्य अपने पीएफ (PF) खाते से UPI और ATM के जरिए सीधे पैसे निकाल सकेंगे।

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सरकारी सूत्रों के मुताबिक, नई सुविधा को लागू करने के लिए EPFO आने वाले दिनों में अपने सर्वरों का अपग्रेडेशन करेगा। इसके लिए संगठन के सर्वर लगभग तीन दिनों तक “ब्लैकआउट” मोड में रहेंगे, जिसके दौरान EPFO की अधिकांश सेवाएं अस्थायी रूप से बंद रहेंगी।

 

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सर्वर अपडेट के बाद सदस्यों को UPI और ATM के माध्यम से अपने पीएफ खाते से राशि निकालने की सुविधा मिल जाएगी। इसके तहत खाताधारक अपने EPFO बैलेंस का अधिकतम 75 प्रतिशत हिस्सा निकाल सकेंगे।

 

वर्तमान नियमों के अनुसार, EPF खाते में कम से कम 25 प्रतिशत राशि बनाए रखना अनिवार्य है। यानी सदस्य अपने कुल पीएफ कॉर्पस का 75 प्रतिशत तक निकाल सकते हैं, जबकि शेष 25 प्रतिशत राशि खाते में बनी रहेगी। सूत्रों के अनुसार, EPFO के पास वर्तमान में करीब 26 लाख करोड़ रुपये का कुल फंड है। वहीं संगठन के सक्रिय अंशधारकों (Contributing Members) की संख्या लगभग 7.5 करोड़ है, जबकि कुल सब्सक्राइबर्स की संख्या करीब 30 करोड़ बताई जा रही है।

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नई सुविधा लागू होने के बाद पीएफ निकासी की प्रक्रिया पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज, आसान और डिजिटल हो जाएगी। इससे करोड़ों कर्मचारियों को जरूरत के समय अपने फंड तक तुरंत पहुंच मिल सकेगी। Edited by : Sudhir Sharma