Muharram 2026: मुहर्रम की 10वीं तारीख क्यों है खास? जानिए यौम-ए-आशूरा की पूरी कहानी

A depiction of the historical event observed on Youm-e-Ashura during the month of Muharram

Martyrdom of Imam Hussain: मोहर्रम/ मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर (हिजरी सन) का पहला महीना है, और इस महीने की 10वीं तारीख को 'यौम-ए-आशूरा' (Yoom-e-Ashura) कहा जाता है। यह दिन पूरी दुनिया के मुसलमानों, विशेषकर शिया समुदाय के लिए बेहद भावुक, ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण है। यह दिन विशेष रूप से इमाम हुसैन और उनके साथियों की कर्बला में दी गई महान शहादत की याद दिलाता है। यह कोई खुशी या जश्न का त्योहार नहीं है, बल्कि यह शहादत, हक (सच्चाई) और सब्र (धैर्य) का प्रतीक है।ALSO READ: Muharram month 2026: मोहर्रम मास का इस्लाम धर्म में महत्व और परंपरा जानें

 

आइए जानते हैं कि यह दिन इतना खास क्यों है और इसकी पूरी कहानी क्या है…

 

यौम-ए-आशूरा की ऐतिहासिक कहानी (कर्बला का युद्ध)

यौम-ए-आशूरा का सीधा संबंध आज से लगभग 1400 साल पहले इराक के 'कर्बला' के मैदान में हुई एक ऐतिहासिक और दर्दनाक घटना से है। यह कहानी है इस्लाम के आखिरी नबी (पैगंबर) हजरत मोहम्मद साहब के नवासे (नाती) हजरत इमाम हुसैन की।

 

1. यजीद का जुल्म और इमाम हुसैन का इंकार

उस दौर में सीरिया का शासक यजीद था, जो एक क्रूर, अत्याचारी और भ्रष्ट राजा था। वह खुद को खलीफा/ इस्लामिक शासक घोषित कर चुका था और चाहता था कि इमाम हुसैन उसके शासन और उसकी गलत नीतियों को अपनी मान्यता दे दें।

 

इमाम हुसैन जानते थे कि अगर उन्होंने यजीद के सामने सिर झुका दिया, तो इस्लाम के मूल सिद्धांत- न्याय, दया और सच्चाई हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे। इसलिए उन्होंने यजीद की अधीनता स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया।

 

2. कर्बला की घेराबंदी

यजीद के अत्याचारों से बचने और शांति बनाए रखने के लिए इमाम हुसैन अपने परिवार- जिसमें छोटे बच्चे और महिलाएं शामिल थीं और कुछ वफादार साथियों के साथ मदीना छोड़ चुके थे। सफर के दौरान यजीद की विशाल फौज ने उन्हें इराक के कर्बला के तपते रेगिस्तान में घेर लिया।

 

पानी पर रोक: मुहर्रम की 7वीं तारीख को यजीद की फौज ने इमाम हुसैन के खेमे के लिए फरात नदी का पानी बंद कर दिया। तपती धूप, भूख और भयंकर प्यास के बावजूद इमाम हुसैन और उनके साथियों ने यजीद के क्रूर शासन के आगे घुटने नहीं टेके।

 

3. 10वें मुहर्रम की महा-शहादत (आशूरा)

मुहर्रम की 10वीं तारीख को यजीद की हजारों की सेना और इमाम हुसैन के महज 72 साथियों के बीच युद्ध हुआ। यह युद्ध सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांतों की रक्षा के लिए था।

 

एक-एक करके इमाम हुसैन के भाई, बेटे, भतीजे और साथी शहीद होते गए। यहां तक कि उनके 6 महीने के मासूम बेटे हजरत अली असगर को भी यजीद की फौज ने प्यासा ही तीर से शहीद कर दिया। अंत में, 10वें मुहर्रम के दिन अस्र (शाम) की नमाज के वक्त इमाम हुसैन का भी बेरहमी से कत्ल कर दिया गया।

 

कहावत है: 'कत्ल-ए-हुसैन असल में मर्ग-ए-यजीद है, इस्लाम जिंदा होता है हर करबला के बाद।'

– अर्थात: हुसैन की शहादत ने यजीद के क्रूर तंत्र को हमेशा के लिए वैचारिक रूप से मार दिया और इस्लाम के सच्चे मूल्यों को जीवित रखा।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Muharram 2026: कब से शुरू हो रहा है मोहर्रम मास, जानें सही डेट

24 जून: मध्य प्रदेश में आज मनेगा रानी दुर्गावती गौरव दिवस, जानें उनके बलिदान की कहानी

A scene depicting the courage, self-respect, and dignity of the heroic Queen Durgavati on the day of her martyrdom

Rani Durgavati Martyrdom Day 24 June: रानी दुर्गावती के बलिदान की कहानी भारतीय इतिहास के सबसे गौरवशाली अध्यायों में से एक है। जब मुगल सम्राट अकबर के सेनापति आसफ खान ने गोंडवाना पर आक्रमण किया, तब रानी दुर्गावती ने आत्मसमर्पण करने के बजाय युद्ध का रास्ता चुना। उनके बलिदान की 3 सबसे खास बातें, जो उन्हें अन्य शासकों से अलग और महान बनाती हैं, इस प्रकार हैं:ALSO READ: रानी दुर्गावती के बलिदान की कहानी की 3 खास बातें

1. स्वाभिमान बनाम गुलामी: मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से साफ इनकार

मुगल सम्राट अकबर की सेना बहुत विशाल और आधुनिक हथियारों से लैस थी। अकबर चाहता था कि रानी दुर्गावती उसकी अधीनता स्वीकार कर लें और टैक्स/ खिराज दें। रानी के मंत्रियों ने भी उन्हें समझौता करने की सलाह दी थी। लेकिन रानी का मानना था कि 'अपमानजनक जीवन जीने से अच्छा है गरिमा के साथ मर जाना।' उन्होंने झुकने के बजाय लड़कर मरने का रास्ता चुना। सीमित संसाधनों और छोटी सेना के बावजूद उन्होंने अद्भुत साहस का परिचय दिया और अंतिम क्षण तक रणभूमि में डटी रहीं।

 

2. अद्भुत युद्ध रणनीति (War Strategy) और नेतृत्व

रानी ने केवल महल में बैठकर आदेश नहीं दिए, बल्कि खुद युद्ध के मैदान में उतरीं। उनकी सबसे खास बात थी उनकी युद्ध रणनीति। उन्होंने जबलपुर के पास 'नरई नाला' के इलाके को युद्ध के लिए चुना, जो चारों तरफ से जंगलों, पहाड़ों और नदियों से घिरा था। इस भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर उन्होंने पहली दो लड़ाइयों में अकबर की बेहद आधुनिक और बड़ी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।

 

3. बंदी बनने के बजाय अपने प्राण त्यागना

24 जून 1564 को जब रानी युद्ध के मैदान में गंभीर रूप से घायल हो गईं और जब एक तीर उनकी आंख में और दूसरा उनकी गर्दन में लगा और उनका घोड़ा भी थक चुका था, तब उन्हें समझ आ गया कि अब जीतना असंभव है। दुश्मन सेना उन्हें जिंदा पकड़ना चाहती थी। मुगलों के हाथों बंदी बनने और अपमानित होने के बजाय, रानी ने अपनी ही कटार अपनी छाती में घोंप ली और वीरगति को प्राप्त हुईं।

 

रानी दुर्गावती का यह कदम दिखाता है कि उनके लिए देश और नारी का आत्मसम्मान उनकी जान से कहीं ज्यादा कीमती था। यही कारण है कि आज भी उनका बलिदान दिवस 'गौरव दिवस' के रूप में मनाया जाता है। स्वाभिमान की रक्षा के लिए दिया गया उनका यह सर्वोच्च बलिदान है। 

 

आज, 24 जून को मध्य प्रदेश में वीरांगना रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस को गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है और इस अवसर पर जबलपुर के मदन महल तथा मंडलासहित प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में रानी दुर्गावती के प्रतिमाओं पर पुष्पांजलि अर्पित करके उनके शौर्य, स्वाभिमान और साहस को याद किया जाता है। इसके साथ ही इस दिन मध्य प्रदेश सरकार तथा सामाजिक संगठनों द्वारा रैलियों व गोष्ठियों के माध्यम से विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करके उनके बलिदान को याद किया जाता है।

 

रानी दुर्गावती का बलिदान केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि साहस, आत्मसम्मान और मातृभूमि के प्रति समर्पण का प्रेरक संदेश है। यही कारण है कि आज भी उन्हें भारत की महानतम वीरांगनाओं में गिना जाता है।

 

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Rani Durgavati: रानी दुर्गावती का बलिदान दिवस: इतिहास की वीर नायिका को नमन

An image featuring Rani Durgavati, the brave ruler of Gondwana and a symbol of self-respect and patriotism

Gondwana Queen Rani Durgavati: भारतीय इतिहास में अनेक वीर योद्धाओं और वीरांगनाओं ने अपने साहस, त्याग और देशभक्ति से अमिट छाप छोड़ी है। ऐसी ही महान वीरांगनाओं में रानी दुर्गावती का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उन्होंने न केवल अपने राज्य की रक्षा के लिए शत्रुओं का डटकर सामना किया, बल्कि मातृभूमि और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने प्राणों का भी बलिदान दे दिया।ALSO READ: Sanjay Gandhi: पुण्यतिथि विशेष: संजय गांधी कौन थे, जानें राजनीति में उनका योगदान

रानी दुर्गावती का बलिदान दिवस हमें उनके अदम्य साहस, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रप्रेम की याद दिलाता है। आज भी उनका जीवन देश की महिलाओं और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

 

आइए, उनके इस शौर्य दिवस पर जानते हैं मध्य प्रदेश के गोंडवाना साम्राज्य की इस महान रानी की वीरता और बलिदान की अमर गाथा…

 

चंदेल राजवंश की बेटी, गोंडवाना की रानी

रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल के यहां हुआ था। उनका विवाह गोंडवाना साम्राज्य के राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से हुआ था। विवाह के कुछ वर्षों बाद ही राजा दलपत शाह का असमय निधन हो गया। उस समय उनका बेटा नारायण केवल 5 वर्ष का था। ऐसे कठिन समय में रानी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने छोटे बेटे को सिंहासन पर बैठाकर खुद गोंडवाना की कमान संभाली और जबलपुर को अपना केंद्र बनाकर शासन किया।

 

एक कुशल और न्यायप्रिय शासिका

रानी दुर्गावती केवल युद्ध कौशल में ही माहिर नहीं थीं, बल्कि एक बेहद दूरदर्शी शासिका भी थीं। उनके शासनकाल में गोंडवाना बेहद समृद्धशाली बना:

 

* धार्मिक सहिष्णुता: वे हिंदू धर्म की अनुयायी थीं, लेकिन उन्होंने अपने राज्य में जैन और अन्य संप्रदायों के विकास के लिए भी खुलकर दान दिया।

 

* जल संरक्षण: उन्होंने अपने राज्य में पानी की कमी को दूर करने के लिए कई तालाबों का निर्माण कराया, जिनमें जबलपुर का प्रसिद्ध 'चेरीताल' और 'आधारताल' आज भी उनके नाम की गवाही देते हैं।

 

* मजबूत सेना: उन्होंने एक विशाल और अनुशासित सेना तैयार की, जिसमें 20,000 से अधिक घुड़सवार, हजारों हाथी और बड़ी संख्या में पैदल सैनिक शामिल थे।ALSO READ: रानी दुर्गावती के बलिदान की कहानी की 3 खास बातें

 

अकबर की सेना से ऐतिहासिक टकराव

गोंडवाना की समृद्धि और एक महिला के बढ़ते प्रभाव को देखकर मुगल सम्राट अकबर विचलित हो उठा। उसने अपने सिपहसालार आसफ खान को एक विशाल सेना के साथ गोंडवाना पर आक्रमण करने के लिए भेजा। मुगल सेना आधुनिक हथियारों और तोपों से लैस थी, जबकि रानी की सेना संख्या में कम थी। इसके बावजूद रानी दुर्गावती ने खुद युद्ध का नेतृत्व किया।
 

 

1. नरई नाला का मोर्चा

रानी ने जबलपुर के पास 'नरई नाला' नामक स्थान पर मोर्चा संभाला, जो एक तरफ पहाड़ों और दूसरी तरफ उफनती नदी से घिरा था। इस रणनीतिक बढ़त के कारण मुगलों को भारी नुकसान हुआ और वे पीछे हटने पर मजबूर हो गए।

 

2. रात के हमले का प्रस्ताव

रानी मुगलों को संभलने का मौका नहीं देना चाहती थीं। उन्होंने रात में ही मुगल कैंप पर हमला करने की योजना बनाई, लेकिन उनके सेनापतियों ने रात में युद्ध करने से मना कर दिया। यह देरी भारी पड़ी और अगली सुबह आसफ खान ने बड़ी तोपें मंगवा लीं।

 

3 अंतिम सांस तक संघर्ष (24 जून 1564)

अगले दिन भयंकर युद्ध हुआ। रानी का बेटा वीर नारायण घायल हो गया, लेकिन रानी लड़ती रहीं। तभी एक तीर रानी की आंख में और दूसरा उनकी गर्दन में आकर लगा। रानी ने होश खोने से पहले स्थिति को भांप लिया।

 

4 बलिदान (अमर शहादत)

जब रानी को लगा कि वे चारों तरफ से घिर चुकी हैं और बंदी बना ली जाएंगी, तो उन्होंने अपने वफादार सैनिक से खुद पर तलवार चलाने को कहा। सैनिक के मना करने पर रानी ने अपनी ही कटार अपनी छाती में घोंपकर मातृभूमि के लिए प्राण त्याग दिए।

 

मुगल सेना से घिर जाने पर अपनी अंतिम सांसों के दौरान रानी दुर्गावती के शब्द थे- 'जब तक जीवित हूं, कलंक का टीका नहीं लगाऊंगी। अपमानजनक जीवन जीने से अच्छा है गरिमा के साथ मर जाना।'

 

5. विरासत और सम्मान

रानी दुर्गावती का यह सर्वोच्च बलिदान भारतीय महिलाओं के आत्मसम्मान और वीरता का प्रतीक बन गया। जबलपुर के पास स्थित 'बरेला' में आज भी उनकी समाधि बनी हुई है, जहां लोग श्रद्धासुमन अर्पित करने जाते हैं।

 

उनके सम्मान में मध्य प्रदेश सरकार ने जबलपुर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर 'रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय' किया। देश उनके बलिदान दिवस पर इस महान वीरांगना के शौर्य, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति को शत-शत नमन करता है।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: डॉ. श्याम प्रसाद मुखर्जी पुण्यतिथि, जानें 5 अनसुने तथ्य

डॉ. श्याम प्रसाद मुखर्जी पुण्यतिथि, जानें 5 अनसुने तथ्य

A photo in the image providing information regarding the death anniversary of Dr. Syama Prasad Mukherjee

Dr. Syama Prasad Mukherjees Martyrdom Day: भारतीय राजनीति में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने देश की एकता, अखंडता और वैचारिक राजनीति की एक नई नींव रखी। आज, 23 जून को उनकी पुण्यतिथि है। वे एक प्रखर शिक्षाविद्, महान बैरिस्टर और स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग मंत्री थे। उन्होंने 'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे' का नारा देकर कश्मीर को भारत का पूर्ण अंग बनाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। 

 

आइए, उनकी पुण्यतिथि के विशेष अवसर पर जानते हैं डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन से जुड़े 5 अनसुने और बेहद दिलचस्प तथ्य:

 

1. महज 33 वर्ष की उम्र में बने सबसे युवा वाइस चांसलर

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की बुद्धिमत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे केवल 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता (कोलकाता) विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बन गए थे। उनके कार्यकाल (1934-1938) के दौरान ही महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को बंगाली भाषा में संबोधित किया था, जो उस दौर में एक बहुत बड़ा बदलाव था।

 

2. नेहरू कैबिनेट के पहले मंत्री, जिन्होंने खुद इस्तीफा दिया

देश आजाद होने के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अपनी पहली कैबिनेट में उद्योग और आपूर्ति मंत्री (Minister for Industry and Supply) बनाया था। हालांकि, साल 1950 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच 'नेहरू-लियाकत समझौता' हुआ, तो डॉ. मुखर्जी ने इसका कड़ा विरोध किया। वे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों/ हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। नीतिगत मतभेदों के कारण उन्होंने कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। वे आजाद भारत के पहले ऐसे मंत्री थे जिन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया था।

 

3. भारतीय जनसंघ (बीजेपी की नींव) की स्थापना

नेहरू कैबिनेट से अलग होने के बाद, डॉ. मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोग से 21 अक्टूबर 1951 को 'भारतीय जनसंघ' की स्थापना की। यही जनसंघ आगे चलकर 1980 में 'भारतीय जनता पार्टी' (BJP) के रूप में सामने आया। आज बीजेपी उन्हें अपना मार्गदर्शक और वैचारिक संस्थापक मानती है।

 

'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।' 

– यह ऐतिहासिक नारा डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के विरोध में दिया था।

 

4. कश्मीर में प्रवेश के लिए बिना परमिट के किया सफर

1950 के दशक में जम्मू-कश्मीर जाने के लिए भारत के ही नागरिकों को एक विशेष 'परमिट' या अनुमति पत्र लेना पड़ता था। वहां का अपना अलग झंडा या निशान और अलग प्रधानमंत्री/ प्रधान होता था। डॉ. मुखर्जी ने इस व्यवस्था को भारत की संप्रभुता के खिलाफ माना। मई 1953 में, उन्होंने इस कानून को चुनौती देने के लिए बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश किया, जहां लखनपुर बॉर्डर पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

 

5. जेल में रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु

गिरफ्तारी के बाद उन्हें श्रीनगर की एक जेल में नजरबंद रखा गया। वहां उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। 23 जून 1953 को रहस्यमयी परिस्थितियों में अस्पताल में उनका निधन हो गया। उनकी मां जोगमाया देवी और देश के कई बड़े नेताओं ने इस मौत की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की थी, लेकिन तत्कालीन सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। उनकी यह मृत्यु आज भी भारतीय इतिहास के सबसे बड़े रहस्यों में से एक मानी जाती है।

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रानी दुर्गावती के बलिदान की कहानी की 3 खास बातें

rani durgavati balidan diwas 2026

24 जून का दिन भारतीय इतिहास में एक ऐसी महानायिका के आत्म बलिदान को नमन करने का दिन है, जिसने दिल्ली के मुगल सम्राट के सामने सिर झुकाने के बजाय अपनी मातृभूमि के लिए प्राण न्यौछावर करना बेहतर समझा। वर्ष 2026 में भी उनका यह अदम्य साहस हर देशवासी को गौरवान्वित करता है। आइए, उनके प्रेरक जीवन को 3 मुख्य श्रेणियों में एक नए और ओजस्वी अंदाज़ में समझते हैं।

 

1. चंदेल वंश की बेटी से गोंडवाना की कुशल शासिका (परिचय एवं कुशल नेतृत्व)

तेजस्वी जन्म और नामकरण: बुंदेलखंड के बांदा जिले में स्थित ऐतिहासिक कालिंजर किले के राजा कीर्तिसिंह चंदेल के घर 5 अक्टूबर 1524 को एक कन्या ने जन्म लिया। उस दिन दुर्गाष्टमी का पावन पर्व था, इसलिए नाम रखा गया 'दुर्गावती'। वे बचपन से ही अपने नाम के अनुरूप अद्वितीय सौंदर्य, तीक्ष्ण बुद्धि और अदम्य साहस की धनी थीं।

 

विवाह और अचानक आया संकट: दुर्गावती का विवाह गोंडवाना साम्राज्य के प्रतापी राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से हुआ। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था; विवाह के मात्र 4 वर्ष बाद ही राजा दलपत शाह का असमय निधन हो गया।

 

साम्राज्य का कुशल संचालन: इस संकट की घड़ी में रानी घबराईं नहीं। उनका पुत्र नारायण केवल 3 वर्ष का था, इसलिए रानी ने स्वयं गढ़मंडला (वर्तमान जबलपुर केंद्र) की सत्ता संभाली। उन्होंने लगभग 16 वर्षों तक न केवल कुशलता से राजकाज चलाया, बल्कि अपनी प्रजा की भलाई के लिए कई भव्य मंदिर, मठ, कुएं, बावड़ियां और धर्मशालाएं भी बनवाईं।

 

2. दुश्मनों पर काल बनकर टूटने वाली वीरांगना (शौर्य, पराक्रम और सैन्य कुशलता)

बाजबहादुर को सिखाया सबक: मालवा के स्त्री-लोलुप सूबेदार बाजबहादुर ने जब रानी के राज्य और सम्मान पर बुरी नजर डाली, तो रानी दुर्गावती के पराक्रम के सामने उसे करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। जब उसने दोबारा हिम्मत की, तो रानी ने उसकी पूरी सेना का समूल नाश कर दिया, जिसके बाद उसने कभी गोंडवाना की तरफ आंख उठाकर नहीं देखा।

 

तीन मुस्लिम राज्यों को दी शिकस्त: रानी के सैन्य कौशल का खौफ ऐसा था कि उन्होंने अपने आसपास के तीन बड़े मुस्लिम राज्यों को बार-बार युद्ध में धूल चटाई। इस पराजय से वे राज्य इतने डर गए कि उन्होंने गोंडवाना की सीमाओं से दूरी बना ली। इन जीतों से रानी को अपार वैभव और संपत्ति भी मिली।

 

निडर शिकारी: रानी दुर्गावती के भीतर क्षत्राणी का खून दौड़ता था। उन्हें शिकार का बेहद शौक था। यदि उन्हें राज्य में कहीं शेर होने की सूचना मिलती, तो वे तुरंत उसका शिकार करने निकल पड़ती थीं और जब तक उस हिंसक पशु को मार नहीं लेती थीं, तब तक जल भी ग्रहण नहीं करती थीं।

 

3. अकबर के अहंकार को चुनौती और महाबलिदान (अंतिम संघर्ष एवं अमर सम्मान)

अकबर की कुदृष्टि और रानी का संकल्प: मुगल सम्राट अकबर के सूबेदार ख्वाजा अब्दुल मजीद खां ने अकबर को रानी के खिलाफ भड़काया। अकबर इस स्वाभिमानी रानी को अपने हरम (रनवासे) की शोभा बनाना चाहता था। जब यह संदेश रानी तक पहुंचा, तो उन्होंने मुगलों की गुलामी और इस अपमान को स्वीकार करने के बजाय युद्ध के मैदान में अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ना चुना।

 

ऐतिहासिक कटार और आत्म-बलिदान: 24 जून 1564 को मुगलों के खिलाफ लड़ते हुए रानी ने अद्भुत वीरता दिखाई। जब युद्ध भूमि (जबलपुर-मंडला मार्ग पर बरेला के पास, नारिया नाला) में वे चारों ओर से दुश्मनों से घिर गईं और उन्हें लगा कि जीवित रहते मुगलों के हाथ आना निश्चित है, तो उन्होंने दुश्मन के हाथों अपमानित होने के बजाय अपनी ही कटार अपने सीने में घोंप ली और वीरगति को प्राप्त हुईं। (हालांकि बाद में उनके देवर चंद्रशाह ने मुगलों की अधीनता मान ली)।

 

अमर प्रतीक और सम्मान: जिस पावन धरती पर रानी ने प्राण त्यागे, वहां आज उनका भव्य स्मारक बना है, जहां हर साल 24 जून को 'बलिदान दिवस' मनाया जाता है। इस महान वीरांगना के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए भारत सरकार ने 24 जून 1988 को उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था। रानी दुर्गावती का शौर्य आज भी हर हिंदुस्तानी के दिलों में राष्ट्रभक्ति की अलख जगा रहा है।

Sanjay Gandhi: पुण्यतिथि विशेष: संजय गांधी कौन थे, जानें राजनीति में उनका योगदान

A photograph of Sanjay Gandhi, who carved a distinct identity in Indian politics

Sanjay Gandhi remembrance day: संजय गांधी भारतीय राजनीति के एक प्रभावशाली और विवादास्पद व्यक्तित्व थे, जिनका नाम देश के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में विशेष रूप से दर्ज है। वे भारत की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े हुए एक प्रमुख नेता के रूप में जाने जाते हैं। संजय गांधी का राजनीतिक जीवन अपेक्षाकृत छोटा रहा, लेकिन उनके निर्णयों और नीतियों का प्रभाव भारतीय राजनीति पर गहराई से पड़ा। उनका निधन 23 जून 1980 को एक विमान दुर्घटना में हुआ था, जिसके बाद उनकी पुण्यतिथि हर वर्ष उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए मनाई जाती है। 

आइए आज 23 जून को उनकी पुण्यतिथि के मौके पर जानते हैं कि वे कौन थे और भारतीय राजनीति में उनका क्या योगदान और प्रभाव रहा…

 

संजय गांधी कौन थे?

संजय गांधी का जन्म 14 दिसंबर 1946 को हुआ था। वे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के नाती/ नवासे और इंदिरा गांधी व फिरोज गांधी के छोटे पुत्र थे। उनके बड़े भाई राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने।

 

संजय गांधी की रुचि शुरुआत से ही राजनीति के बजाय गाड़ियों और विमानों में थी। उन्होंने इंग्लैंड के रोल्स-रॉयस (Rolls-Royce) कारखाने में अप्रेंटिसशिप भी की थी। बाद में भारत लौटकर उन्होंने 'मारुति लिमिटेड' कंपनी की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य भारतीयों के लिए एक सस्ती और स्वदेशी 'जनता कार' बनाना था। हालांकि, बाद में वे अपनी मां इंदिरा गांधी के सबसे भरोसेमंद राजनीतिक सलाहकार बनकर उभरे।

 

राजनीति में उनका योगदान और प्रभाव

संजय गांधी ने कभी सरकार में कोई आधिकारिक मंत्री पद नहीं संभाला, वे सिर्फ यूथ कांग्रेस के नेता और बाद में सांसद रहे, लेकिन 1975 से 1980 के बीच कांग्रेस पार्टी और सरकार पर उनका प्रभाव अभूतपूर्व था।

 

1. युवा कांग्रेस का कायाकल्प

संजय गांधी को मुख्य रूप से यूथ कांग्रेस को एक आक्रामक और ताकतवर संगठन बनाने का श्रेय जाता है। उन्होंने देश भर के युवाओं को राजनीति से जोड़ा। उनके नेतृत्व में यूथ कांग्रेस मुख्य कांग्रेस पार्टी से भी ज्यादा सक्रिय और प्रभावशाली हो गई थी। कमलनाथ, जगदीश टाइटलर और गुलाम नबी आजाद जैसे नेता उन्हीं के दौर में आगे बढ़े।

 

2. 5-सूत्रीय कार्यक्रम

संजय गांधी ने देश के विकास और सामाजिक सुधार के लिए एक '5-सूत्रीय कार्यक्रम' शुरू किया था, जिसने जमीनी स्तर पर काफी बदलाव किए:

 

परिवार नियोजन: देश की बढ़ती आबादी को रोकने के लिए जागरूकता अभियान।

 

वृक्षारोपण: पर्यावरण को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ लगाना।

 

दहेज प्रथा का विरोध: सामाजिक बुराइयों के खिलाफ अभियान।

 

वयस्क शिक्षा: अनपढ़ वयस्कों को साक्षर बनाना।

 

जातिवाद का खात्मा: समाज में समानता लाना।

 

3. 'मारुति' के जरिए ऑटोमोबाइल क्रांति की नींव

भले ही संजय गांधी के जीवनकाल में मारुति कार सड़क पर नहीं आ सकी, लेकिन भारत में मिडिल क्लास के लिए एक किफायती कार का जो सपना उन्होंने देखा था, वही आगे चलकर 'मारुति सुजुकी' के रूप में साकार हुआ। इसने भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर की पूरी तस्वीर बदल दी।

 

आपातकाल और विवाद

संजय गांधी का राजनीतिक सफर जितने अच्छे कामों के लिए जाना जाता है, उतने ही बड़े विवादों से भी घिरा रहा। 1975 में जब देश में आपातकाल (Emergency) लागू हुआ, तब संजय गांधी सत्ता के केंद्र बिंदु बन गए।

 

जबरन नसबंदी: आबादी नियंत्रण के उनके एजेंडे को अधिकारियों ने बेहद आक्रामक तरीके से लागू किया, जिससे देश भर में खासकर ग्रामीण इलाकों में 'जबरन नसबंदी' के मामले सामने आए। इस वजह से जनता में उनके खिलाफ काफी नाराजगी पैदा हुई।

 

तुर्कमान गेट और सुंदरीकरण: दिल्ली के सुंदरीकरण अभियान के तहत झुग्गी-झोपड़ियों को हटाया गया, जिसके कारण तुर्कमान गेट इलाके में भारी विरोध और पुलिस कार्रवाई हुई थी।

 

इन विवादों के बावजूद, जब 1977 की करारी हार के बाद 1980 में कांग्रेस ने दोबारा सत्ता में वापसी की, तो उसमें संजय गांधी की रणनीति और यूथ कांग्रेस की मेहनत की बड़ी भूमिका थी। 1980 के चुनाव में वे खुद उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से जीतकर पहली बार लोकसभा सांसद बने थे।

 

विमान दुर्घटना में निधन: 

23 जून 1980 को नई दिल्ली के सफदरजंग एयरपोर्ट के पास एक बेहद दुखद हादसा हुआ। संजय गांधी एक नए विमान Pitts S-2A में हवाई करतब (aerobatics) दिखा रहे थे, तभी नियंत्रण खोने की वजह से उनका विमान क्रैश हो गया। महज 33 वर्ष की उम्र में इस विमान दुर्घटना में उनका असामयिक निधन हो गया। इसतरह अचानक उनके जीवन के सफर का अंत हो गया।

 

संजय गांधी की मृत्यु ने भारतीय राजनीति की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। उनके जाने के बाद ही उनके बड़े भाई राजीव गांधी ने अनिच्छा के बावजूद राजनीति में प्रवेश किया और बाद में देश के प्रधानमंत्री बने। संजय गांधी, शॉर्ट टर्म में भारतीय राजनीति पर इतना गहरा और अमित प्रभाव छोड़ने वाले नेता है, जो इतिहास में बहुत कम हुए हैं।

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‘अष्टांग योग गीत’

Photo related to a poem on yoga

चित्त की चंचल लहरें रोकें, 

अन्तस आलोक जगाएं हम।

आओ साधक! पतंजलि का, 

अष्टांग योग अपनाएं हम।

 

प्रथम सीढ़ी 'यम' की है भाई,

सत्य-अहिंसा मन में लाना।

अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह को, 

तुम जीवन का मूल बनाना।

शुचिता, संतोष, तप, स्वाध्याय,

'नियम' की राह दिखाता है।

ईश्वर-प्रणिधान का सुमिरन करना, 

मन का मैल मिटाता है।

बाहर भटक रहे तन मन को

अंतर्मुख कर लाएं हम।

आओ साधक! पतंजलि का, 

अष्टांग योग अपनाएं हम।

 

आसन, प्राणायाम, 

'आसन' से यह काया सधती

स्थिर-सुख का भाव जगे।

प्राणों का आयाम बढ़ाकर,

'प्राणायाम' में ध्यान लगे।

'प्रत्याहार' सिखाए हमको,

इन्द्रिय-वेग को कैसे रोकें।

भीतर की गंगा में डूब कर, 

बाहर के भ्रम कैसे टोकें।

पाकर परम शून्य का वैभव, 

शिवमय ही हो जाएं हम।

आओ साधक! पतंजलि का, 

अष्टांग योग अपनाएं हम।

 

'धारणा'' एकाग्र करें मन, 

लक्ष्य एक ही पाएं हम।

अविच्छिन्न चेतना की धारा,

'ध्यान'' रूप कहलाएं हम।

जब ध्याता और ध्यान मिटे, 

बस ध्येय मात्र रह जाता है।

वही विलोप 'समाधि' की

पावन वेला बन जाता है।

बहिरंग साधना से उठकर, 

अंतरंग हो जाएं हम।

आओ साधक! पतंजलि का 

अष्टांग योग अपनाएं हम।

 

चित्त की चंचल लहरें रोकें, 

अन्तस आलोक जगाएं हम।

आओ साधक! पतंजलि का, 

अष्टांग योग अपनाएं हम।


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प्रेरणादायक कहानी: मीनू की ‘कूल’ तरकीब: जब परिंदे बने दोस्त

An inspiring story in pictures about Meenu, teaching the lesson of saving life through water conservation

यहां बच्चों के लिए मीनू की सूझबूझ और पक्षियों के प्रति उसके प्रेम की एक बहुत ही प्यारी और प्रेरणादायक कहानी प्रस्तुत हैं। 

 

शहर की ऊंची इमारतों के बीच मीनू का एक छोटा सा घर था, जिसकी बालकनी में चमेली की बेलें और कुछ गमले लगे थे। मई की दुपहरी में जब लू चलती, तो सड़कें सूनी हो जाती थीं। मीनू अपनी खिड़की से बाहर देख रही थी, तभी उसने देखा कि एक छोटी सी गौरैया (sparrow) हांफ रही थी। उसकी चोंच खुली थी और वह छाया की तलाश में इधर-उधर फड़फड़ा रही थी।

 

एक नन्ही परेशानी

मीनू को बहुत दुख हुआ। उसने देखा कि पास के सारे गड्ढे और नालियां सूख चुकी थीं। उसने बालकनी के कोने में एक प्लास्टिक की कटोरी में पानी रखा, लेकिन तेज धूप के कारण वह पानी कुछ ही देर में गरम हो गया। नन्ही गौरैया ने पानी पीने की कोशिश की, पर गरम पानी पीकर वह उड़ गई।

 

मीनू ने सोचा, 'अगर मुझे ठंडा शरबत चाहिए, तो इन बेजुबान पक्षियों को भी तो 'कूल' पानी चाहिए होगा!'

 

मीनू की 'कूल-कूल' तरकीब

मीनू अपने स्टोर रूम में गई और कुछ पुराना सामान निकाला। उसने एक पुरानी थर्माकोल की पेटी, मिट्टी के सकोरे (कुल्हड़) और कुछ रंग-बिरंगे पत्थर इकट्ठे किए।

 

उसने एक जादुई 'वाटर पार्क' बनाना शुरू किया:

 

इंसुलेशन: उसने मिट्टी के बड़े कटोरे को थर्माकोल की पेटी के बीचों-बीच फिट किया ताकि बाहर की गर्मी पानी को जल्दी गरम न कर सके।

 

नेचुरल फिल्टर: उसने कटोरे के नीचे गीली रेत भरी, जो पानी को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखती थी।

 

बर्ड बाथ: एक चपटे बर्तन में उसने सुंदर पत्थर रखे ताकि पक्षी उस पर बैठकर सुरक्षित महसूस करें और फिसलें नहीं।

 

फूड कोर्ट: पास ही के एक पुराने नारियल के खोल में उसने बाजरा और चावल के दाने डाल दिए।

 

जब बालकनी बनी 'बर्ड रिसॉर्ट'

मीनू ने अपनी इस 'कूल मशीन' को बालकनी के सबसे ठंडे कोने में रख दिया। कुछ ही देर में, वही गौरैया अपने तीन-चार दोस्तों के साथ वापस आई। पहले तो वे डरे, लेकिन जैसे ही उन्होंने ठंडा पानी चखा, वे खुशी से चहकने लगे।

 

देखते ही देखते मीनू की बालकनी में मैना, कबूतर और तोतों का तांता लग गया। वे पानी पीते, उसमें डुबकी लगाते और मीनू की खिड़की के पास आकर 'चीं-चीं' करते। मीनू को ऐसा लगता जैसे वे उसे 'थैंक यू' कह रहे हों।

 

परिंदों से दोस्ती

एक शाम मीनू को सपना आया कि वही नन्ही गौरैया उसकी खिड़की पर बैठकर कह रही है, 'मीनू, तुम्हारी इस तरकीब ने हमारी जान बचा ली! तुम शहर की सबसे 'कूल' दोस्त हो।'

 

उस दिन के बाद से मीनू ने अपने स्कूल के दोस्तों को भी यह तरकीब सिखाई। अब पूरे मोहल्ले की बालकनियों में पक्षियों के लिए 'कूल' वाटर पार्क बन गए थे।

 

इस कहानी की खास बातें 

संवेदनशीलता: दूसरों की तकलीफ को समझना ही इंसानियत है।

 

जुगाड़ और विज्ञान: मिट्टी और रेत का उपयोग करके हम बिना बिजली के भी पानी ठंडा रख सकते हैं।

 

प्रकृति से जुड़ाव: छोटे-छोटे प्रयासों से हम अपने पर्यावरण को बेहतर बना सकते हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

स्वस्थ, जागरूक और विकसित भारत की आधारशिला है ‘योग’

'समत्वं योग उच्यते' अर्थात् संतुलन ही योग है… श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण का यह संदेश जहां समूचे विश्व को संतुलित करने का सूत्र है, वहीं महर्षि पतंजलि ने पतंजलि योग सूत्र में 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोध' के माध्यम से मानव जीवन को स्वस्थ और निरोग रहने का मार्ग प्रदान किया है। भारत की यही सनातन योग परंपरा विश्व को शरीर, मन और आत्मा के स्तर पर संतुलित और समृद्ध बनाने का आधार है।

सदियों पूर्व ऋषि-मुनियों द्वारा विकसित जीवन पद्धति आज संपूर्ण विश्व के लिए सुख, शांति और संतुलन का मार्ग है। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि योग विश्व मानवता के कल्याण का माध्यम बन गया है। यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व और अथक प्रयासों से संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 21 जून को अंतरराष्‍ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता प्रदान की गई।

यह निर्णय भारतीय संस्कृति और जीवन-दर्शन के प्रति विश्व समुदाय के सम्मान का प्रतीक है। दुनियाभर के 190 से अधिक देशों में करोड़ों लोग योग को अपने जीवन का हिस्सा बना चुके हैं। यह भारत की सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक नेतृत्व का प्रमाण है। इस वर्ष अंतरराष्‍ट्रीय योग दिवस की थीम 'स्वस्थ आयु के लिए योग' रखी गई है।

 

मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता है कि इस वर्ष अंतरराष्‍ट्रीय योग दिवस पर मध्यप्रदेश की पावन धरती पर आयोजित समारोह में माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगी। उनका आगमन मध्यप्रदेश के लिए गौरव का विषय है। यह सुखद संयोग है कि योग के वैश्विक आंदोलन में मध्यप्रदेश को विशेष भूमिका निभाने का अवसर प्राप्त हो रहा है।

 

प्रसन्नता का विषय है कि मध्यप्रदेश सरकार ने योग को जन-जन तक पहुंचाने के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास किए हैं। स्वस्थ नागरिक विकसित और समृद्ध राष्ट्र का आधार है। प्रदेश के प्रत्येक व्यक्ति के स्वस्थ और सुखी जीवन के लिए 'घर-घर योग- हर व्यक्ति निरोग' अभियान शुरू किया गया है।

प्रदेश में 800 से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिरों, स्वास्थ्य एवं कल्याण केन्द्रों तथा विभिन्न चिकित्सालयों में नियमित योग गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। प्रशिक्षित योग शिक्षकों द्वारा छोटे-छोटे समूहों में भी नागरिकों को योगाभ्यास करवाया जा रहा है। योग-सखी और योग-दूत गांव-गांव और शहर-मोहल्लों तक योग का संदेश पहुंचा रहे हैं।

 

प्रदेश में 12 मई से आरंभ हुआ अंतरराष्‍ट्रीय योग दिवस आयोजन 'हर घर योग अभियान' से जनभागीदारी का नया अध्याय लिख रहा है। इसी क्रम में आयुष मंत्रालय द्वारा आयोजित ऑनलाइन योग सत्रों का लाभ प्रदेश के लोगों को प्राप्त हो रहा है।

हम सभी के लिए गौरव की बात है कि विगत दिनों इंदौर स्थित मालवांचल यूनिवर्सिटी में आयोजित योग महोत्सव में 35 हजार से अधिक विद्यार्थियों ने सामूहिक योग कर एक नया विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया। योग 'वन अर्थ-वन हेल्थ' विचार को व्यवहार में उतारने का माध्यम है जो हमें स्वयं, समाज और प्रकृति से जोड़ता है। यह शरीर को स्वस्थ रखने के साथ जीवन को संतुलित, सार्थक और उत्कृष्ट बनाता है।

 

मध्यप्रदेश सरकार ने योग को पर्यावरण-संरक्षण और जनकल्याण से भी जोड़ा है। विश्व पर्यावरण दिवस से लेकर अंतरराष्‍ट्रीय योग दिवस तक विशेष जन-अभियान संचालित किया जा रहा है। 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान से पर्यावरण-संरक्षण और योग से स्वास्थ्य संरक्षण पर कार्य किया जा रहा है। प्रकृति और मानव स्वास्थ्य का गहरा संबंध है। योग हमें प्रकृति संग सह-अस्तित्व का जीवन जीने की प्रेरणा देता है। यही भारतीय जीवन-दर्शन का मूल तत्व भी है।

 

मध्यप्रदेश सरकार आयुष चिकित्सा, योग वेलनेस सेंटर, आरोग्य मंदिरों तथा जनजागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से योग को जनांदोलन बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। हमारा प्रयास है कि प्रदेश का प्रत्येक नागरिक योग से लाभ प्राप्त करे और स्वस्थ जीवन की दिशा में कदम बढ़ाए।

 

मुझे यह बताते हुए हर्ष है कि मध्यप्रदेश में जनवरी 2027 में 'एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य और एक चेतनाः समग्र कल्याण के लिए योग' विषय पर वैश्विक सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। इसमें मध्यप्रदेश, भारत की सभ्यतागत चेतना का वैश्विक प्रतिनिधित्व करेगा।

 

आज जब दुनिया तनाव, अवसाद, जीवनशैली जनित रोगों और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रही है, ऐसे समय में योग मानवता के लिए बड़ा संबल है। ऐसे यह स्वस्थ शरीर, शांत मन और सुखी जीवन का आधार है।अंतरराष्‍ट्रीय योग दिवस स्वस्थ, जागरूक और आत्मनिर्भर समाज के निर्माण का संकल्प है। यह भारत की उस प्राचीन चेतना का उत्सव है, जिसने सदियों से मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया है।

हमें गर्व है कि आज पूरी दुनिया योग को अपनाकर भारत के इस अमूल्य ज्ञान का लाभ प्राप्त कर रही है। मैं, प्रदेश के सभी नागरिकों, युवाओं, महिलाओं, वरिष्ठजन, विद्यार्थियों, शासकीय सेवकों और सामाजिक संगठनों से आग्रह करता हूं कि वे योग गतिविधियों से जुड़ें और इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।

 

आइए, हम सभी मिलकर योग को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएं। अपने परिवार और समाज को इससे जोड़ें तथा स्वस्थ मध्यप्रदेश, विकसित भारत और समृद्ध विश्व के निर्माण में सहभागी बनें। अंतरराष्‍ट्रीय योग दिवस की प्रदेशवासियों को हार्दिक मंगलकामनाएं…
(लेखक- मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)

योगा दिवस 2026: सेहतमंद बने रहने के लिए करें ये 5 शानदार योगासन

Girl practicing meditation and yoga

21 जून: विश्व योग दिवस 2026: आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी, काम का स्ट्रेस और बिगड़ा हुआ लाइफस्टाइल हमें शारीरिक और मानसिक रूप से थका देता है। ऐसे में खुद को रीबूट करने और सेहतमंद बनाए रखने के लिए योग से बेहतर और कुछ नहीं। योग सिर्फ कसरत नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा को एक सूत्र में पिरोने का विज्ञान है। इस योग दिवस पर अपने दैनिक जीवन में शामिल करें ये 5 शानदार योगासन, जो आपको ताउम्र निरोगी और ऊर्जावान बनाए रखेंगे।

 

1. सूर्य नमस्कार (Sun Salutation)- संपूर्ण शरीर का वर्कआउट

अगर आपके पास समय की कमी है और आप केवल एक ही आसन करना चाहते हैं, तो सूर्य नमस्कार को चुनें। यह 12 शक्तिशाली आसनों का एक खूबसूरत क्रम है।

फायदे: यह सिर से लेकर पैर तक पूरे शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को दुरुस्त करता है, वजन घटाने में मदद करता है और शरीर को गजब का लचीलापन (Flexibility) देता है।

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2. ताड़ासन (Mountain Pose)- सुदृढ़ पोस्चर और संतुलन

सीधे खड़े होकर हाथों को ऊपर की ओर खींचते हुए पंजों के बल आना, ताड़ासन कहलाता है। यह दिखने में जितना सरल है, इसके लाभ उतने ही गहरे हैं।

फायदे: यह रीढ़ की हड्डी (Spine) को सीधा और मजबूत करता है, शरीर का पोस्चर सुधारता है और बच्चों की लंबाई बढ़ाने में बेहद मददगार है।

 

3. पश्चिमोत्तानासन (Seated Forward Bend)- तनाव से मुक्ति

बैठकर पैरों को सीधे फैलाते हुए, आगे की ओर झुककर अंगूठे को छूना पश्चिमोत्तानासन है। यह आसन आज के समय की सबसे बड़ी समस्या 'तनाव' पर सीधा वार करता है।

फायदे: यह रीढ़ की हड्डी और हैमस्ट्रिंग की मांसपेशियों को स्ट्रेच करता है। साथ ही, यह पेट के अंगों को टोन करके पाचन क्रिया को मजबूत बनाता है और मन को गहरी शांति देता है।

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4. भुजंगासन (Cobra Pose)- पीठ दर्द का काल

पेट के बल लेटकर शरीर के अग्रभाग (धड़) को ऊपर उठाना भुजंगासन या कोबरा पोज कहलाता है। दिनभर कंप्यूटर के सामने बैठने वालों के लिए यह वरदान है।

फायदे: यह पीठ और कमर के निचले हिस्से के दर्द को जड़ से खत्म करता है। यह फेफड़ों को खोलता है जिससे श्वसन तंत्र मजबूत होता है और रीढ़ की हड्डी लचीली बनती है।

 

5. शवासन (Corpse Pose)- गहरी शिथिलता और ध्यान

सभी आसनों को करने के बाद अंत में पीठ के बल लेटकर शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ देना ही शवासन है। इसे करना सबसे आसान है, लेकिन इसके मानसिक लाभ अद्भुत हैं।

फायदे: यह शरीर की थकान को तुरंत मिटाकर नई ऊर्जा भरता है। हाई ब्लड प्रेशर, अनिद्रा (Insomnia) और एंग्जायटी से परेशान लोगों के लिए यह आसन किसी रामबाण से कम नहीं है।

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एक छोटा सा संकल्प:-

योग किसी एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। इस योग दिवस पर खुद से वादा करें कि आप रोज़ाना कम से कम 20 से 30 मिनट योग को ज़रूर देंगे। स्वस्थ रहें, मस्त रहें और योग को अपनाएं!