Project Rhino: प्रोजेक्ट चीता के बाद अब देश में शुरू होगा प्रोजेक्ट राइनो, वर्ल्ड राइनो डे पर पीएम मोदी ने किया ऐलान

Project Rhino: प्रोजेक्ट चीता के चार साल बाद और इसकी सफलता के बाद देश में एक ओर वन्यजीव संरक्षण अभियान शुरू किया जा रहा है। प्रोजेक्ट चीता की पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। इसके बाद अब एक सींग वाले गैंडों के संरक्षण के लिए एक बार फिर पीएम ने प्रोजेक्ट राइनो की घोषणा की है। आज विश्व गैंडा दिवस पर प्रधानमंत्री ने इस प्रोजेक्ट को शुरू करने का ऐलान किया। इस प्रोग्राम का मकसद एक सींग वाले बड़े गैंडों की सुरक्षा, रहने और फलने-फूलने की पर्याप्त व्यवस्था और संरक्षण के लिए रेंज राज्यों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देना है।

पीएम मोदी ने एक्स पर की घोषणा

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सरकार की गैंडों के संरक्षण की पहल की घोषणा करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा, “देश में प्रजातियों के संरक्षण को आगे बढ़ाते हुए, मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि रेंज राज्यों को सुरक्षा, हैबिटैट मैनेजमेंट, जेनेटिक सुधार और पॉपुलेशन डायनामिक्स समझने के लिए वित्तीय और तकनीकी मदद देने के लिए प्रोजेक्ट राइनो शुरू किया गया है।”

प्रधानमंत्री ने गैंडों की लोकप्रिय प्रजाति के लिए खुशी जताई और वन्यजीव सुरक्षा में सबसे आगे रहने वाले वनकर्मियों और कंजर्वेशनिस्ट की लगातार कोशिशों की तारीफ की। PM मोदी ने अपने पोस्ट लिखा, “वर्ल्ड राइनो डे पर, हम शानदार एक सींग वाले बड़े गैंडे का जश्न मनाते हैं और इसकी सुरक्षा में सबसे आगे रहने वाले सभी लोगों की तारीफ करते हैं।” प्रधानमंत्री ने दुनिया भर में गैंडों के संरक्षण में असम की अहम भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “असम में अब दुनिया की लगभग 80% गैंडों की आबादी है और गैंडों के शिकार को खत्म करने के लिए काजीरंगा की कोशिशों की बहुत तारीफ हुई है।”

एक्स पर पोस्ट अपने संदेश में पीएम ने ने दूसरे भारतीय राज्यों में गैंडों के संरक्षण और उनकी प्रजाति को लाने में हुई तरक्की पर भी जोर दिया। साथ ही, उन्होंन उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में सफल कोशिशों की ओर इशारा किया। उन्होंने आगे कहा, “एक तरफ, बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में गैंडे या तो वापस आ गए हैं या पूरी तरह सुरक्षित हैं। दूसरी ओर, दुधवा (उत्तर प्रदेश) में गैंडों को फिर से लाने की सफलता इतिहास बना रही है। यह दिखाता है कि हमारे लोग जानवरों की सुरक्षा और रेंज वाले राज्यों में सक्रिय वन्यजीव प्रबंधन के लिए कितना प्रतिबद्ध हैं।”

यह प्रोजेक्ट भारत के वन्यजीव प्रबंधन ढांचे को मजबूत बनाता है और उसे विस्तार देता है। यह असम पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश के दुधवा में सफल एक सींग वाले गैंडों के पुन: दाखिल होने के प्रोग्राम सहित रेंज राज्यों में सफल संरक्षण पहलों पर आगे बढ़ता है।

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Kaziranga National Park: असम सरकार अगले दो महीनों में केंद्र सरकार से काजीरंगा नेशनल पार्क के आस-पास के इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) की मौजूदा 10 किलोमीटर की डिफॉल्ट सीमा को घटाकर 1 किलोमीटर करने की मांग करने की योजना बना रही है। ‘असम ट्रिब्यून’ की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का कहना है कि इस कदम का मकसद नेशनल पार्क के पास, जिसमें बोकाखाट भी शामिल है, विकास परियोजनाओं पर लगी उन पाबंदियों को हटाना है जिन्हें राज्य सरकार अनावश्यक मानती है।

शर्मा ने कहा, “बोकाखाट में विकास से जुड़ी कई चुनौतियां हैं जिन्हें हम हल करना चाहते हैं, जिनमें स्टेडियम का निर्माण, शहर के बुनियादी ढांचे में सुधार और अन्य अहम प्रोजेक्ट शामिल हैं।”

उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव पर शुरुआती बातचीत पहले ही हो चुकी है। काजीरंगा को अंतिम ESZ नोटिफिकेशन मिलने के बाद राज्य सरकार केंद्र के लिए एक औपचारिक प्रस्ताव तैयार करेगी।

उन्होंने आगे कहा, “चूंकि काजीरंगा के लिए अभी तक अंतिम नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ है, इसलिए डिफॉल्ट रूप से इको-सेंसिटिव जोन 10 किलोमीटर का है। नोटिफिकेशन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, हम वैज्ञानिक रूप से तय 1 किलोमीटर के इको-सेंसिटिव जोन का प्रस्ताव रखेंगे।”

शर्मा ने यह भी कहा कि प्रस्तावित बदलाव से बोकाखाट में विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी और साथ ही काजीरंगा के वन्यजीवों और पर्यावरण का संरक्षण भी जारी रहेगा।

पर्यावरणविदों ने राज्य सरकार के प्रस्ताव का विरोध किया?

वहीं, पर्यावरणविदों ने असम सरकार के उस प्रस्ताव का विरोध किया है जिसमें UNESCO की वर्ल्ड हेरिटेज साइट, काजीरंगा नेशनल पार्क के आस-पास के इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) को कम करने की बात कही गई है। उनका कहना है कि सुरक्षित बफर जोन को कम करने से पार्क पर दबाव बढ़ सकता है और वहां के वन्यजीवों पर बुरा असर पड़ सकता है।

उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या पार्क और उसके वन्यजीवों की सुरक्षा की कीमत पर विकास की अनुमति दी जानी चाहिए।

गोलाघाट के पर्यावरण कार्यकर्ता और पत्रकार अपूर्व बल्लभ गोस्वामी ने The Federal को बताया कि ESZ (इको-सेंसिटिव जोन) को कम करने से काजीरंगा में वन्यजीवों, खासकर एक सींग वाले गैंडे के लिए खतरा पैदा हो सकता है, जिसे असम का प्रतीक माना जाता है।

धेकियाजुली के एक और पर्यावरण कार्यकर्ता दिलीप नाथ ने कहा कि प्रस्तावित कटौती इको-सेंसिटिव जोन पर सुप्रीम कोर्ट के 2022 के आदेश के खिलाफ भी हो सकती है। नाथ के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का फैसला दो अहम बातों पर आधारित था – जानवरों को प्रजनन के लिए पर्याप्त जगह देना और उन घास के मैदानों की रक्षा करना जो उनके लिए भोजन का स्रोत हैं।

उन्होंने कहा, “अगर सरकार ESZ का दायरा कम करती है, तो घास के मैदान कम हो जाएंगे और जानवरों की संख्या भी घट जाएगी। अगर वे इस कदम को आगे बढ़ाते हैं, तो हमारे पास सुप्रीम कोर्ट जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचेगा।”

‘दूसरा काजीरंगा नहीं बना सकते…’

RPG एंटरप्राइजेज के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने कहा, “असम एक स्टेडियम और दूसरे विकास कार्यों के लिए काजीरंगा के इको-सेंसिटिव जोन (पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र) को 10 किलोमीटर से घटाकर 1 किलोमीटर करना चाहता है। लेकिन हर मॉनसून में बाढ़ के कारण हाथी और गैंडे इन्हीं रास्तों से ऊंचे इलाकों की ओर जाने को मजबूर होते हैं।”

उन्होंने कहा, आइए स्टेडियम कहीं और बनाएं, क्योंकि हम दूसरा काजीरंगा नहीं बना सकते।

बता दें कि यह मामला ऐसे समय में सामने आया है, जब काजीरंगा के इको-सेंसिटिव जोन को लेकर लंबे समय से अंतिम फैसला नहीं हो पाया है। मार्च में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने भी कहा था कि असम सरकार की ओर से केंद्र को न तो ESZ की अंतिम अधिसूचना भेजी गई है और न ही इसका कोई ड्राफ्ट प्रस्ताव सौंपा गया है। नतीजतन, 10 किलोमीटर के दायरे वाला नियम अभी भी लागू है।

वहीं, असम सरकार का कहना है कि मौजूदा 10 किलोमीटर के जोन की वजह से बोकाखाट में इंफ्रास्ट्रक्चर और शहरी विकास रुका हुआ है। इन पाबंदियों के कारण कई प्रोजेक्ट्स, जिनमें एक आधुनिक स्टेडियम और दूसरे नागरिक विकास के काम शामिल हैं, अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं।

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