अमेरिका के इमिग्रेशन सिस्टम में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। EB-5 वीजा के लिए आवेदन करने वाले भारतीयों की संख्या अब चीन से ज्यादा हो गई है। पिछले तीन साल में 12,900 भारतीयों ने EB-5 के लिए आवेदन किया, जबकि चीन से 9,875 आवेदन आए। EB-5 अमेरिका का ऐसा वीजा प्रोग्राम है, जिसमें विदेशी नागरिक अमेरिका में पैसा निवेश करके ग्रीन कार्ड पाने का रास्ता बना सकते हैं। इसके लिए करीब 7.5 करोड़ रुपए का निवेश करना होता है। ग्रीन कार्ड पाने का रास्ता है EB-5 EB-5 के जरिए अमेरिका में निवेश करने वाले लोगों को स्थायी रूप से वहां रहने यानी ग्रीन कार्ड हासिल करने का मौका मिलता है। H-1B वीजा के नियमों में सख्ती बढ़ने के बीच कुछ भारतीयों की दिलचस्पी EB-5 में बढ़ी है। हालांकि, EB-5 वीजा मिलने का मतलब सीधे अमेरिकी नागरिक बन जाना नहीं है। पहले आवेदक को ग्रीन कार्ड के लिए जरूरी शर्तें पूरी करनी होती हैं। इसके बाद अमेरिका में स्थायी रूप से रहने और आगे नागरिकता पाने की प्रक्रिया अलग होती है। प्रोफेसर और वैज्ञानिकों के लिए EB-1 कोटा समय से पहले खत्म अमेरिका में EB-1 वीजा का कोटा इस साल तय तारीख से करीब एक महीने पहले ही पूरा हो गया। इस कैटेगरी में हर साल करीब 7 हजार वीजा उपलब्ध होते हैं। इस बार यह कोटा 1 सितंबर को ही खत्म हो गया, जबकि इसे 30 सितंबर तक चलना था। EB-1 वीजा कैटेगरी में प्रोफेसर, वैज्ञानिक और रिसर्च स्कॉलर जैसे लोग आवेदन कर सकते हैं। कोटा जल्दी खत्म होने से पता चलता है कि इस वीजा के लिए इस साल मांग काफी ज्यादा रही। ट्रम्प गोल्ड कार्ड के लिए 165 आवेदन, सिर्फ 1 को मिला ट्रम्प ने 2025 में गोल्ड कार्ड स्कीम शुरू की थी। इसे उन्होंने EB-5 वीजा के विकल्प के तौर पर पेश किया था। इसका मकसद था कि अमीर विदेशी नागरिक अमेरिका में पैसा निवेश करके स्थायी निवास पाने का रास्ता बना सकें। हालांकि, अब तक इस स्कीम को ज्यादा सफलता नहीं मिली है। अप्रैल 2026 में वित्त मंत्री लटनिक ने बताया था कि 338 लोगों ने गोल्ड कार्ड में रुचि दिखाई, 165 लोगों ने आवेदन फीस जमा की और सिर्फ एक व्यक्ति को गोल्ड कार्ड जारी किया गया। गोल्ड कार्ड के लिए अमेरिका में करीब 9.5 करोड़ रुपए का निवेश करना होता है। ऐसे में इसकी तुलना EB-5 से भी की जा रही है और माना जा रहा है कि इसी वजह से EB-5 में भारतीयों की दिलचस्पी बढ़ी है। गोल्ड कार्ड की कानूनी मान्यता पर सवाल ट्रम्प गोल्ड कार्ड को लेकर सबसे बड़ा सवाल इसकी कानूनी मान्यता को लेकर है। ट्रम्प ने इसे राष्ट्रपति के तौर पर मिली अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके शुरू किया है। इसलिए एक सवाल यह भी है कि अगर ट्रम्प राष्ट्रपति पद पर नहीं रहते हैं तो आगे क्या होगा? ऐसी आशंका है कि उनके बाद आने वाला राष्ट्रपति इस योजना को खत्म कर सकता है। अमेरिका के 144 अप्रवासी अरबपतियों में 19 भारतवंशी अमेरिका में रहने वाले 144 अप्रवासी अरबपतियों में 19 भारत में जन्मे लोग हैं। यह अब तक की सबसे बड़ी संख्या है। फोर्ब्स की 2026 की अमेरिका के सबसे अमीर अप्रवासियों की सूची में 45 देशों से आए अरबपति शामिल हैं। इनमें भारत में जन्मे अरबपतियों की संख्या 19 है। इन 19 भारतवंशी अरबपतियों की कुल संपत्ति करीब 207 लाख करोड़ रुपए है। भारतीयों में विनोद खोसला सबसे ऊपर हैं। वे 13वें नंबर पर हैं। जय चौधरी 8.2 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ 25वें नंबर पर हैं। इस साल 7 भारतवंशियों के नाम जुड़े पिछले साल इस सूची में 12 भारतवंशी अरबपति शामिल थे। इस साल इसमें 7 नए भारतवंशी नाम जुड़े हैं। इनमें हेमंत तनेजा, संजय गजेंद्र, जितेंद्र मोहन और श्याम शंकर शामिल हैं। अमेरिका के सबसे अमीर लोगों की इस सूची में एलन मस्क पहले, सर्गेई ब्रिन दूसरे और जेनसन हुआंग तीसरे नंबर पर हैं। इसमें सत्य नडेला और सुंदर पिचाई के नाम भी शामिल हैं। ————————– ये खबर भी पढ़ें… अमेरिका- 10 लाख भारतवंशी वोटरों के नाम कटने का खतरा: ट्रम्प ने SIR जैसी वोटर लिस्ट जांच शुरू की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) की तर्ज पर वोटर लिस्ट की जांच शुरू कर दी है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) की तर्ज पर वोटर लिस्ट की जांच शुरू कर दी है। इसके लिए करीब 125 करोड़ रुपए का फंड जारी किया गया है। इस प्रक्रिया में वोटर लिस्ट की जांच कर नेशनल वोटर डेटाबेस तैयार किया जाएगा। इससे अमेरिका में मौजूद करीब 26 लाख भारतवंशी वोटरों में से लगभग 10 लाख के नाम कटने का खतरा बताया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले यह प्रक्रिया पूरी करने का है। ट्रम्प ने ICE को डेटाबेस की जिम्मेदारी दी ट्रम्प प्रशासन ने अपनी इमिग्रेशन एजेंसी ICE (इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट) को वोटर डेटाबेस की निगरानी की जिम्मेदारी दी है। सभी 50 राज्यों में वोटर लिस्ट की जांच और डेटाबेस अपडेट करने के लिए कंपनियों को काम सौंपा गया है। वोटरों की जानकारी को अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड से मिलाया जाएगा। घर-घर जाकर सर्वे नहीं होगा अमेरिका में भारत की तरह घर-घर जाकर वोटरों का सर्वे नहीं किया जा रहा है। वोटर लिस्ट को कंप्यूटर के जरिए इमिग्रेशन रिकॉर्ड समेत दूसरे रिकॉर्ड से मिलाया जाएगा। रिकॉर्ड में नाम या जानकारी का मिलान नहीं होने पर संबंधित वोटर की जानकारी की दोबारा जांच हो सकती है और नाम हटाए जाने का खतरा रहेगा। भारतवंशी वोटरों पर ज्यादा असर की आशंका क्यों? अमेरिका में करीब 26 लाख भारतवंशी वोटर हैं। न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे राज्यों में इनकी संख्या और राजनीतिक प्रभाव काफी अहम माना जाता है। इन राज्यों में वोटर पहचान और रजिस्ट्रेशन के नियम अलग-अलग हैं। नई जांच प्रक्रिया में रिकॉर्ड का मिलान होने से भारतवंशी वोटरों के नाम भी जांच के दायरे में आएंगे। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतवंशी मतदाताओं के वोटिंग पैटर्न पर भी नजर रखी जा सकती है। हालांकि, कितने लोगों के नाम वास्तव में हटेंगे, यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही साफ होगा। ट्रम्प वोटर आईडी को अनिवार्य करने के समर्थक ट्रम्प अमेरिका में वोटिंग के लिए फोटो आईडी अनिवार्य करने की मांग का समर्थन करते रहे हैं। उनका कहना है कि इससे चुनाव में गड़बड़ी रोकने में मदद मिलेगी। वे अमेरिकी संसद से ‘सेव अमेरिका एक्ट’ पास करने की मांग करते रहे हैं। अब वोटर लिस्ट की देशभर में जांच और एक राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने की कोशिश को लेकर अमेरिका में राजनीतिक विवाद बढ़ सकता है। खासकर उन राज्यों में इसका असर महत्वपूर्ण होगा, जहां भारतवंशी और दूसरे प्रवासी वोटर चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाते हैं। क्या है सेव अमेरिका एक्ट? सेव अमेरिका एक्ट अमेरिका में मतदाता पंजीकरण और मतदान से जुड़े नियमों को और सख्त करने वाला एक विधेयक प्रस्ताव है। इसके तहत वोटर रजिस्ट्रेशन के समय नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण और मतदान के समय फोटो ID दिखाना जरूरी होगा। इस विधेयक में डाक से वोट देने की प्रक्रिया को काफी सीमित करने की बात भी कही गई है। यह विधेयक अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पारित हो चुका है, लेकिन सीनेट में इसे अब तक मंजूरी नहीं मिली है। अमेरिका में चुनाव भारत से अलग तरीके से होते हैं अमेरिका में भारत के चुनाव आयोग जैसी एक केंद्रीय संस्था पूरे देश के चुनाव नहीं कराती। वहां चुनाव की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्य और स्थानीय प्रशासन संभालते हैं। इसी वजह से अलग-अलग राज्यों में वोटर रजिस्ट्रेशन और पहचान के नियम भी अलग हैं। अमेरिका में वोटर पहचान के नियम राज्य के हिसाब से अलग-अलग हैं। कई राज्यों में वोटर से अपनी पहचान की घोषणा कराना ही पर्याप्त होता है, जबकि कुछ राज्यों में पहचान के दस्तावेज जरूरी होते हैं। 12 राज्यों में पासपोर्ट या जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। कैलिफोर्निया में वोटर के हस्ताक्षर का मिलान किया जाता है। टेक्सास में पहले भी नाम हटाने पर विवाद हुआ टेक्सास में करीब 24 हजार लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने के बाद मामला अदालत पहुंचा था। फेडरल कोर्ट से इस मामले में राहत मिली थी और संबंधित मामला अभी लंबित है। इसी वजह से ट्रम्प प्रशासन की नई वोटर लिस्ट जांच को लेकर भी अदालत में चुनौती मिलने की संभावना है। ———————- ये खबर भी पढ़ें… अमेरिका ने ईरान के 3 तेल टैंकरों को निशाना बनाया:खार्ग आइलैंड के पास धमाका; ट्रम्प ने परमाणु ठिकाने पिकैक्स को उड़ाने की धमकी दी होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ गया है। अमेरिका ने शनिवार को ईरान के 3 तेल टैंकरों को निशाना बनाया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, तीनों टैंकर तेल ले जा रहे थे। पूरी खबर यहां पढ़ें…
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर अब तक कई लोग सवाल उठा चुके हैं। वहीं अब एसआईआर पर भारत के पूर्व राजदूत नवदीप सूरी ने चिंता जताई है। कई देशों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके सूरी ने बताया कि उन्हें भी अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज देने पड़ रहे हैं। सूरी पंजाब में वोटर लिस्ट की जांच और अपडेट के लिए चल रही SIR प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए है। नवदीप सूरी यूएई व मिस्र में भारत के राजदूत के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया में उच्चायुक्त की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।
उन्होंने पंजाब में चल रही SIR प्रक्रिया के दौरान अपने अनुभव सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शेयर किया है। सूरी ने कई पोस्ट के जरिए बताया कि वोटर लिस्ट के सत्यापन के दौरान उन्हें किन परेशानियों और प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा।
नवदीप सूरी ने बताई अपनी परेशानी
नवदीप सूरी ने बताया कि, SIR के दौरान उन्होंने अपने बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से संपर्क कर वोटर आईडी और आधार कार्ड जमा किए थे। उस समय उन्हें बताया गया कि उनके दस्तावेज और दी गई जानकारी सही है। लेकिन, कुछ समय बाद एक वॉलंटियर ने उन्हें संदेश भेजकर बताया कि उनकी कुछ जानकारी साल 2003 की पुरानी वोटर लिस्ट के रिकॉर्ड से मेल नहीं खा रही है। इसके बाद सूरी ने इस मामले को समझने और आगे की प्रक्रिया जानने के लिए BLO से दोबारा संपर्क किया।
नोटिस जारी कर फिर बुलाया
सूरी के अनुसार, इसके बाद उन्हें एक नोटिस लेने के लिए फिर से बुलाया गया। वहां उनसे ऐसे कागजात जमा करने को कहा गया, जिनसे उनकी भारतीय नागरिकता की पुष्टि हो सके। इस मांग को लेकर उन्होंने SIR की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब पूर्व राजनयिक को भी नागरिकता साबित करने में दिक्कत हो रही है, तो आम लोगों के लिए यह प्रक्रिया कितनी मुश्किल होगी। उन्होंने चुनाव आयोग से सफाई मांगी।
बताया क्यों नहीं है रिकॉर्ड
सूरी ने बताया कि, साल 2003 में वह भारत से बाहर तैनात थे, इसलिए उस समय के पुराने मतदाता रिकॉर्ड से उनका डिटेल्स नहीं मिल पाया। अधिकारियों ने उनसे भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए पासपोर्ट दिखाने को कहा। उन्होंने कहा कि उनके पास वोटर आईडी और आधार के अलावा भी कई जरूरी डॉक्युमेंट मौजूद हैं, जिससे वह अपनी नागरिकता साबित कर सकते हैं। सूरी की इस बात से SIR के दौरान पुराने रिकॉर्ड और मौजूदा दस्तावेजों के मिलान को लेकर चल रही चर्चा और बढ़ सकती है।
क्या है SIR
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची की गहन जांच और उसे अपडेट करने की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वोटर लिस्ट में केवल योग्य मतदाताओं के नाम ही दर्ज रहें। यह प्रक्रिया जून 2025 में बिहार से शुरू हुई थी, जहां सत्यापन के दौरान मृत लोगों समेत कई नाम मतदाता सूची से हटाए गए। इसके बाद पश्चिम बंगाल में भी चुनाव से पहले मतदाता रिकॉर्ड की जांच और सुधार का काम किया गया। SIR के दौरान अगर किसी मतदाता का नाम 2002 या 2003 की पुरानी वोटर लिस्ट में नहीं मिलता है, तो उससे अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। ऐसे लोगों को पुराने मतदाता रिकॉर्ड से अपना या अपने परिवार का संबंध साबित करने के लिए जरूरी कागजात देने पड़ सकते हैं।

