बच्चों के हाथ में मोबाइल सुविधा या खतरा! स्क्रीन टाइम से संस्कार तक बच्चों को डिजिटल दुनिया में ऐसे रखें सुरक्षित

बच्चे को स्मार्टफोन देना आजकल कई पैरेंट्स के लिए जरूरत बनता जा रहा है। पढ़ाई, ऑनलाइन क्लास, दोस्तों से बात या किसी जरूरी काम के लिए फोन काफी मददगार हो सकता है। लेकिन फोन बच्चे के हाथ में देने से पहले यह सोचना जरूरी है कि वह इसका सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए तैयार है या नहीं।

सिर्फ फोन खरीदकर बच्चे को दे देना काफी नहीं है। उसे स्क्रीन टाइम, ऑनलाइन सेफ्टी और अपनी प्राइवेट इन्फॉर्मेशन को सेफ रखने के बारे में भी समझाना जरूरी है। साथ ही घर में कुछ आसान रूल पहले से तय कर लें, ताकि बच्चा स्मार्टफोन को मनोरंजन के साथ-साथ जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना भी सीखे।

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1. बच्चे की उम्र नहीं समझदारी देखें

स्मार्टफोन देने का फैसला सिर्फ बच्चे की उम्र देखकर न लें। पहले देखें कि वह रूल को समझता है या नहीं, अपनी चीजों का ध्यान रखता है और इंटरनेट के सही-गलत इस्तेमाल को समझने की कैपेसिटी रखता है या नहीं। बच्चा बिना समझे फोन का इस्तेमाल कर सकता है, तो पहले उसे डिजिटल सेफ्टी के बारे में समझाना जरूरी है।

 

 

2. फोन देने से पहले पैरेंटल कंट्रोल लगाएं

बच्चे को फोन देने से पहले उसमें जरूरी पैरेंटल कंट्रोल जरूर सेट करें। स्क्रीन टाइम की लिमिट, ऐप डाउनलोड करने की परमिशन और उम्र के हिसाब से कंटेंट फिल्टर जैसी सेटिंग पहले से कर सकते हैं। इससे बच्चा अनजाने में ऐसी चीजें देखने या डाउनलोड करने से बच सकता है, जो उसके लिए सही नहीं हैं।

 

 

 

3. नो-फोन जोन के स्ट्रिक्ट रूल

बच्चे को फोन देने से पहले घर के कुछ साफ नियम बना लें। जैसे पढ़ाई या होमवर्क के समय फोन का इस्तेमाल नहीं होगा, खाने की टेबल पर फोन नहीं आएगा और रात में फोन बेडरूम में नहीं रखा जाएगा। साथ ही यह भी तय करें कि बच्चा फोन का इस्तेमाल कितने समय तक और किन कामों के लिए कर सकता है। रूल जितने साफ होंगे, बच्चे के लिए उन्हें समझना उतना ही आसान होगा।

 

 

 

4. प्राइवेसी और ऑनलाइन सेफ्टी समझाएं

बच्चे को बताएं कि इंटरनेट पर अपनी निजी जानकारी किसी के साथ शेयर नहीं करनी चाहिए। घर का पता, फोन नंबर, स्कूल की इंफॉर्मेशन, लाइव लोकेशन या प्राइवेट फोटो किसी अनजान व्यक्ति को भेजने से बचना चाहिए। सोशल मीडिया या ऑनलाइन गेम में कोई परेशान करे, धमकाए या गलत बात करने की कोशिश करे, तो उसे छिपाने के बजाय तुरंत माता-पिता को बताना चाहिए।

 

 

 

5. साइबर बुलिंग बताएं

बच्चे को यह समझाना जरूरी है कि ऑनलाइन भी किसी के साथ गलत बिहेव नहीं करना चाहिए और कोई उसके साथ ऐसा करता है, तो उसे चुप रहने की जरूरत नहीं है। उसे समझाएं कि इंटरनेट पर शेयर की गई चीजें आगे फैल सकती हैं, इसलिए फोटो, कमेंट या मैसेज भेजने से पहले सोच लेना चाहिए। कोई परेशानी होने पर ब्लॉक, रिपोर्ट करने और माता-पिता से बात करने का तरीका भी बताएं।

 

 

6. फोन एंटरटेनमेंट नहीं जिम्मेदारी है समझाएं

बच्चे को यह बताएं कि स्मार्टफोन सिर्फ एंटरटेनमेंट की चीज नहीं है, बल्कि इसे जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करना भी जरूरी है। बच्चा तय नियमों का पालन करता है, तो धीरे-धीरे उसे ज्यादा आजादी दी जा सकती है। जैसे-जैसे उसकी समझ और जिम्मेदारी बढ़े, वैसे-वैसे फोन से जुड़े नियम भी बदले जा सकते हैं।

 

 

7. बच्चे से खुलकर बात करते रहें

बच्चे के फोन की हर चीज पर छिपकर नजर रखने के बजाय उसके साथ खुलकर बात करना ज्यादा बेहतर है। समय-समय पर पूछें कि वह फोन पर क्या देखता है, किन ऐप्स का इस्तेमाल करता है और ऑनलाइन कोई उसे परेशान तो नहीं कर रहा। बच्चे को यह भरोसा दें कि अगर इंटरनेट पर उसके साथ कुछ गलत होता है, तो वह बिना डरे आपसे बात कर सकता है।

 

 

बच्चे के लिए स्मार्टफोन कई तरह से फायदेमंद हो सकता है, लेकिन इसे सही समय और सही तरीके से देना ज्यादा जरूरी है। पैरेंट्स का भरोसा, समझ और गाइडेंस बच्चे को टेक्नोलॉजी के साथ बेहतर तालमेल बनाने में मदद कर सकता है।

फ्रिज डोर नहीं, कॉन्फिडेंस बूस्टर है! इसपर लगी एक तस्वीर बदल सकती है आपके बच्चे की सोच

बच्चों की ड्रॉइंग, स्कूल के सर्टिफिकेट, फोटो या मेडल को रेफ्रिजरेटर पर लगाना कई घरों में आम बात है। देखने में यह डेकोरेशन या बच्चे की अचीवमेंट को दिखाने का तरीका लग सकता है, लेकिन इसके पीछे माता-पिता के इमोशन भी जुड़े होते हैं। जब माता-पिता बच्चे की बनाई पेंटिंग या मिले अवार्ड को ऐसी जगह लगाते हैं, जहां सबकी नजर पड़े, तो बच्चे को महसूस हो सकता है कि उसकी मेहनत और कोशिश को महत्व दिया जा रहा है। यह जरूरी नहीं कि ऐसा किसी को दिखाने के लिए किया जा रहा हो, कई बार माता-पिता बस बच्चे के अचीवमेंट पर गर्व करते हैं और उन पलों को यादगार बनाना चाहते हैं।

साइकोलॉजी के अनुसार, बच्चों के काम को पहचान और तारीफ मिलने से उनके कॉन्फिडेंस पर अच्छा असर पड़ सकता है। माता-पिता का प्रोत्साहन बच्चों को अपनी क्षमता समझने और आगे कुछ नया करने के लिए इंस्पायर कर सकता है। जब बच्चा अपनी ड्रॉइंग या मेडल को रोज देखता है, तो उसे अपनी मेहनत पर गर्व महसूस हो सकता है और यह संदेश मिलता है कि उसकी कोशिश मायने रखती है।prixe

बच्चे की मेहनत को मिलता है सम्मान

साइकोलॉजिस्ट एलिजाबेथ गुंडरसन, कैरोल ड्वेक और उनके साथियों की रिसर्च में पाया गया कि बचपन में माता-पिता जब बच्चे की कोशिश और मेहनत की तारीफ करते हैं, तो इसका संबंध आगे चलकर सीखने और अपनी काबिलियत को बेहतर बनाने वाली सोच से हो सकता है। यानी बच्चा यह समझने लगता है कि किसी काम में अच्छा बनने के लिए लगातार कोशिश और सीखना जरूरी है। यह बात अलग है कि बच्चे की ड्रॉइंग को फ्रिज पर लगाना और उसकी कोशिश की सीधे तारीफ करना एक ही चीज नहीं है। रिसर्च से यह साबित नहीं हुआ है कि फ्रिज पर पेंटिंग लगाने से सीधे बच्चे में ग्रोथ माइंडसेट बनता है।

 

बढ़ता है बच्चे का आत्मविश्वास

बच्चों के लिए यह महसूस करना जरूरी होता है कि वे कुछ कर सकते हैं और उनके काम की अहमियत है। जब माता-पिता बच्चे की पेंटिंग, सर्टिफिकेट या मेडल को गर्व से फ्रिज पर लगाते हैं, तो बच्चे को अपनी कैपेसिटी पर भरोसा बढ़ाने वाला सिग्नल मिलता है। इसका मतलब यह नहीं कि माता-पिता बच्चे को दुनिया का सबसे अच्छा आर्टिस्ट बता रहे हैं।

 

बचपन की यादें रहेंगी ताजा

रेफ्रिजरेटर घर की ऐसी जगह है, जिस पर परिवार के सदस्यों की बार-बार नजर पड़ती है। इसलिए बच्चे की पहली ड्रॉइंग, पहला मेडल या स्कूल का सर्टिफिकेट वहां लगाना दिखावा नहीं, बल्कि वह परिवार की यादों का हिस्सा बन जाता है। कुछ साल बाद वही पेंटिंग देखकर माता-पिता को याद आ सकता है कि बच्चा उस समय कितना छोटा था या उसने पहली बार ड्रॉइंग कब बनाई थी।

 

 

हर अचीवमेंट देता है सेल्फ-कॉन्फिडेंस

जब बच्चे की मेहनत को बार-बार पहचान मिलती है, तो उसे आगे भी कुछ नया करने की इच्छा हो सकती है। उदाहरण के लिए, अगर बच्चे ने कोई पेंटिंग बनाई और माता-पिता ने उसे फ्रिज पर लगा दिया, तो बच्चे को यह एहसास हो सकता है कि उसकी क्रिएटिविटी को घर में जगह मिल रही है। इसी तरह किसी खेल में जीता मेडल सामने दिखाई देने पर बच्चा अपनी मेहनत को याद कर सकता है।

 

 

मायने रखता है माता-पिता का नजरिया

एक ही मेडल या पेंटिंग बच्चे के लिए अलग-अलग संदेश दे सकती है और यह काफी हद तक इस बात पर डिपेंड करता है कि माता-पिता उससे क्या कहते हैं। वे कहते हैं, तुमने इसके लिए बहुत मेहनत की है, तो बच्चे का ध्यान कोशिश और लगन पर जाता है। वहीं बार-बार कहा जाए, तुम तो जन्म से ही सबसे होशियार हो, तो बच्चे को अपनी एक तय खूबी बनाए रखने का प्रेशर हो सकता है। कैरोल ड्वेक और उनके साथियों की रिसर्च इसी तरह की तारीफ के फर्क को समझने में मदद करती है।

 

बच्चों की ड्रॉइंग, मेडल या सर्टिफिकेट को रेफ्रिजरेटर पर लगाना सिर्फ डेकोरेशन या अचीवमेंट दिखाने की बात नहीं है। हर परिवार के लिए इसका मतलब अलग हो सकता है, लेकिन कई माता-पिता के लिए यह बच्चे की मेहनत, कोशिश और खुशी को पहचानने का एक छोटा-सा तरीका होता है। जब बच्चा अपनी बनाई चीज को घर में खास जगह पर देखता है, तो उसे महसूस हो सकता है कि उसके काम और उसकी कोशिश की कद्र की जाती है। इसलिए फ्रिज पर लगी एक छोटी-सी ड्रॉइंग भी बच्चे के लिए प्यार, गर्व और प्रोत्साहन का बड़ा संदेश दे सकती है।