जानिए न्यू-एज पैरेंटिंग के 5 जरूरी नियम, जहां बच्चों का बचपन मार्क्स और रैंक की रेस में नहीं निकलता!

आजकल बच्चों पर पढ़ाई को लेकर काफी दबाव रहता है। अच्छे नंबर लाना, क्लास में फर्स्ट आना और बाकी बच्चों से आगे निकलना, ये सब बातें छोटी उम्र से ही उनके दिमाग में आने लगती हैं। कई बार माता-पिता की ज्यादा उम्मीदों की वजह से भी बच्चों पर दबाव बढ़ जाता है। जब बच्चे को बार-बार उसके मार्क्स या रैंक से जज किया जाता है, तो उसे लगने लगता है कि अच्छे नंबर लाना ही सबसे जरूरी है।

लेकिन हर बच्चा अपने तरीके से सीखता है और हर बच्चे की अपनी खासियत होती है। इसलिए बच्चों की दूसरे बच्चों से तुलना करने या हर बार टॉप करने की उम्मीद रखने के बजाय उनकी मेहनत और पसंद को समझना जरूरी है। माता-पिता को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उनकी बातें बच्चों के मन पर असर डालती हैं। बच्चों को सिर्फ अच्छे नंबर लाने के लिए नहीं, बल्कि खुश रहने, खुद पर भरोसा रखने और अपनी पसंद के काम करने के लिए भी आगे बढ़ाना चाहिए।

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1. सेल्फ-कॉन्फिडेंस बढ़ाएं

कई बार माता-पिता बच्चे के अच्छे नंबर आने के बाद भी इस बात पर ध्यान देते हैं कि वह फर्स्ट क्यों नहीं आया। जैसे, यदि बच्चे को 18 नंबर मिले हैं, तो उसकी तारीफ करने के बजाय उससे कहा जाता है कि तुम फर्स्ट नहीं आए। ऐसी बातें बार-बार सुनने से बच्चे को लग सकता है कि उसकी मेहनत की कोई कीमत नहीं है। धीरे-धीरे उसका सेल्फ-कॉन्फिडेंस कम हो सकता है और उसे हर हाल में दूसरों से आगे निकलने का प्रेशर फील होने लगता है।

2. कॉम्पिटिशन के लिए मोटिवेट करें

बच्चों के बीच थोड़ा कॉम्पिटिशन उन्हें मेहनत करने और बेहतर करने के लिए मोटिवेट कर सकता है। परेशानी तब शुरू होती है, जब बच्चा हर समय दूसरे बच्चों को हराने के बारे में सोचने लगे। माता-पिता को बच्चों को यह समझाना चाहिए कि मुकाबला किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि खुद को बेहतर बनाने के लिए होना चाहिए।

3. अपना काम खुद करना सिखाएं

एक स्कूल स्पोर्ट्स डे की रेस ने इस बात को समझने का एक अच्छा उदाहरण दिया। रेस में बच्चे को दौड़कर एक पानी की बोतल उठानी थी और वापस आना था। उसने अपनी पसंद की नीली बोतल उठाई, लेकिन बाद में अपनी बहन के पसंदीदा रंग की गुलाबी बोतल लेने के लिए भी रुक गया। इस वजह से वह रेस नहीं जीत पाया, लेकिन उसने अपनी बहन के बारे में सोचकर जो किया, वह जीत से कहीं ज्यादा खास था।

4. मार्क्सशीट नहीं, बच्चे की काबिलियत पहचानें

यदि कोई बच्चा दौड़ने में तेज है, तो जरूरी नहीं कि वह ड्राइंग में भी अच्छा हो। इसी तरह कोई बच्चा पढ़ाई में औसत हो सकता है, लेकिन खेल, कला या किसी दूसरी चीज में बहुत अच्छा कर सकता है। इसलिए बच्चों को सिर्फ रैंक या मार्क्स के बेस पर जज नहीं करना चाहिए। उन्हें यह समझाना जरूरी है कि किसी और का किसी चीज में बेहतर होना उनकी काबिलियत को कम नहीं करता। हर बच्चे का फर्स्ट आना जरूरी नहीं है, जरूरी है कि वह अपनी खूबियों को पहचाने और खुद पर भरोसा करना सीखे।

5. बच्चों की बात ध्यान से सुनकर दें सही सॉल्यूशन

हर बच्चे की अपनी पसंद, सोच और सीखने का तरीका अलग होता है। इसलिए सिर्फ यह पूछने के बजाय कि कितने नंबर आए या कौन-सी रैंक मिली, माता-पिता को यह भी पूछना चाहिए कि बच्चे को पढ़ाई में क्या अच्छा लगा, कहां परेशानी हुई और वह किस चीज में दिलचस्पी रखता है। जब बच्चों को अपनी बात खुलकर कहने का मौका मिलता है, तो वे ज्यादा सहज महसूस करते हैं और माता-पिता के साथ अपनी परेशानियां भी आसानी से शेयर कर पाते हैं।

बच्चों का बचपन मार्क्स और रैंक की रेस नहीं होना चाहिए। हर बच्चे की अपनी अलग खूबी होती है और जरूरी नहीं कि हर कोई पढ़ाई में ही सबसे आगे हो। माता-पिता बच्चों को मेहनत के लिए जरूर एप्रिशिएट करें, लेकिन उनकी तुलना दूसरों से न करें। उनकी मेहनत, रुचि और खूबियों की तारीफ करने से उनका सेल्फ-कॉफिडेंस बढ़ेगा। क्योंकि फर्स्ट आने से ज्यादा जरूरी है कि बच्चा खुश रहे और अच्छा इंसान बने।

फ्रिज डोर नहीं, कॉन्फिडेंस बूस्टर है! इसपर लगी एक तस्वीर बदल सकती है आपके बच्चे की सोच

बच्चों की ड्रॉइंग, स्कूल के सर्टिफिकेट, फोटो या मेडल को रेफ्रिजरेटर पर लगाना कई घरों में आम बात है। देखने में यह डेकोरेशन या बच्चे की अचीवमेंट को दिखाने का तरीका लग सकता है, लेकिन इसके पीछे माता-पिता के इमोशन भी जुड़े होते हैं। जब माता-पिता बच्चे की बनाई पेंटिंग या मिले अवार्ड को ऐसी जगह लगाते हैं, जहां सबकी नजर पड़े, तो बच्चे को महसूस हो सकता है कि उसकी मेहनत और कोशिश को महत्व दिया जा रहा है। यह जरूरी नहीं कि ऐसा किसी को दिखाने के लिए किया जा रहा हो, कई बार माता-पिता बस बच्चे के अचीवमेंट पर गर्व करते हैं और उन पलों को यादगार बनाना चाहते हैं।

साइकोलॉजी के अनुसार, बच्चों के काम को पहचान और तारीफ मिलने से उनके कॉन्फिडेंस पर अच्छा असर पड़ सकता है। माता-पिता का प्रोत्साहन बच्चों को अपनी क्षमता समझने और आगे कुछ नया करने के लिए इंस्पायर कर सकता है। जब बच्चा अपनी ड्रॉइंग या मेडल को रोज देखता है, तो उसे अपनी मेहनत पर गर्व महसूस हो सकता है और यह संदेश मिलता है कि उसकी कोशिश मायने रखती है।prixe

बच्चे की मेहनत को मिलता है सम्मान

साइकोलॉजिस्ट एलिजाबेथ गुंडरसन, कैरोल ड्वेक और उनके साथियों की रिसर्च में पाया गया कि बचपन में माता-पिता जब बच्चे की कोशिश और मेहनत की तारीफ करते हैं, तो इसका संबंध आगे चलकर सीखने और अपनी काबिलियत को बेहतर बनाने वाली सोच से हो सकता है। यानी बच्चा यह समझने लगता है कि किसी काम में अच्छा बनने के लिए लगातार कोशिश और सीखना जरूरी है। यह बात अलग है कि बच्चे की ड्रॉइंग को फ्रिज पर लगाना और उसकी कोशिश की सीधे तारीफ करना एक ही चीज नहीं है। रिसर्च से यह साबित नहीं हुआ है कि फ्रिज पर पेंटिंग लगाने से सीधे बच्चे में ग्रोथ माइंडसेट बनता है।

 

बढ़ता है बच्चे का आत्मविश्वास

बच्चों के लिए यह महसूस करना जरूरी होता है कि वे कुछ कर सकते हैं और उनके काम की अहमियत है। जब माता-पिता बच्चे की पेंटिंग, सर्टिफिकेट या मेडल को गर्व से फ्रिज पर लगाते हैं, तो बच्चे को अपनी कैपेसिटी पर भरोसा बढ़ाने वाला सिग्नल मिलता है। इसका मतलब यह नहीं कि माता-पिता बच्चे को दुनिया का सबसे अच्छा आर्टिस्ट बता रहे हैं।

 

बचपन की यादें रहेंगी ताजा

रेफ्रिजरेटर घर की ऐसी जगह है, जिस पर परिवार के सदस्यों की बार-बार नजर पड़ती है। इसलिए बच्चे की पहली ड्रॉइंग, पहला मेडल या स्कूल का सर्टिफिकेट वहां लगाना दिखावा नहीं, बल्कि वह परिवार की यादों का हिस्सा बन जाता है। कुछ साल बाद वही पेंटिंग देखकर माता-पिता को याद आ सकता है कि बच्चा उस समय कितना छोटा था या उसने पहली बार ड्रॉइंग कब बनाई थी।

 

 

हर अचीवमेंट देता है सेल्फ-कॉन्फिडेंस

जब बच्चे की मेहनत को बार-बार पहचान मिलती है, तो उसे आगे भी कुछ नया करने की इच्छा हो सकती है। उदाहरण के लिए, अगर बच्चे ने कोई पेंटिंग बनाई और माता-पिता ने उसे फ्रिज पर लगा दिया, तो बच्चे को यह एहसास हो सकता है कि उसकी क्रिएटिविटी को घर में जगह मिल रही है। इसी तरह किसी खेल में जीता मेडल सामने दिखाई देने पर बच्चा अपनी मेहनत को याद कर सकता है।

 

 

मायने रखता है माता-पिता का नजरिया

एक ही मेडल या पेंटिंग बच्चे के लिए अलग-अलग संदेश दे सकती है और यह काफी हद तक इस बात पर डिपेंड करता है कि माता-पिता उससे क्या कहते हैं। वे कहते हैं, तुमने इसके लिए बहुत मेहनत की है, तो बच्चे का ध्यान कोशिश और लगन पर जाता है। वहीं बार-बार कहा जाए, तुम तो जन्म से ही सबसे होशियार हो, तो बच्चे को अपनी एक तय खूबी बनाए रखने का प्रेशर हो सकता है। कैरोल ड्वेक और उनके साथियों की रिसर्च इसी तरह की तारीफ के फर्क को समझने में मदद करती है।

 

बच्चों की ड्रॉइंग, मेडल या सर्टिफिकेट को रेफ्रिजरेटर पर लगाना सिर्फ डेकोरेशन या अचीवमेंट दिखाने की बात नहीं है। हर परिवार के लिए इसका मतलब अलग हो सकता है, लेकिन कई माता-पिता के लिए यह बच्चे की मेहनत, कोशिश और खुशी को पहचानने का एक छोटा-सा तरीका होता है। जब बच्चा अपनी बनाई चीज को घर में खास जगह पर देखता है, तो उसे महसूस हो सकता है कि उसके काम और उसकी कोशिश की कद्र की जाती है। इसलिए फ्रिज पर लगी एक छोटी-सी ड्रॉइंग भी बच्चे के लिए प्यार, गर्व और प्रोत्साहन का बड़ा संदेश दे सकती है।