पिथौरागढ़ में भारत के बनाए पुल पर नेपाल की आपत्ति:कहा- बोर्ड पर नाम बदलें, यह हमारा इलाका; पुल चालू होने से बचेगा 200km का सफर

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में धारचूला के पास काली नदी पर बने भारत-नेपाल मोटर पुल के स्वागत बोर्ड को लेकर दोनों देशों की सीमा पर विवाद खड़ा हो गया है। पुल के नेपाल वाले हिस्से में लगाए गए बोर्ड पर भारतीय क्षेत्र के गांव ‘छारछुम’ का नाम लिखे जाने पर नेपाल ने आपत्ति जताई है। नेपाली पक्ष का कहना है कि नेपाल की जमीन पर लगे बोर्ड में भारतीय पता नहीं, बल्कि नेपाल के संबंधित क्षेत्र का नाम होना चाहिए। 32.98 करोड़ रुपए की लागत से बने इस पुल का पूरा खर्च भारत ने उठाया है, जबकि इसका दूसरा छोर नेपाल में है। आपत्ति के बाद भारत की तरफ से नाम ढक दिया गया है। पिथौरागढ़ से नेपाल जाने के लिए अब तक कोई मोटर पुल नहीं होने के कारण लोगों को करीब 200 किलोमीटर दूर बनबसा जाना पड़ता था। इससे समय और खर्च दोनों बढ़ते थे। छारछुम पुल शुरू होने के बाद धारचूला से नेपाल के सीमावर्ती इलाकों तक सड़क संपर्क आसान होगा और आवाजाही के साथ व्यापारिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। विवाद से जुड़ी दो तस्वीरें- 5 पॉइंट में पूरी खबर… 1. उद्घाटन से पहले बोर्ड पर विवाद- पिथौरागढ़ के धारचूला में छारछुम के पास काली नदी पर भारत और नेपाल को जोड़ने वाला मोटर पुल बनकर तैयार है। संचालन शुरू होने से पहले नेपाल की ओर लगाए गए स्वागत बोर्ड को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। नेपाली हिस्से में लगे बोर्ड पर भारतीय क्षेत्र के गांव ‘छारछुम’ का नाम लिखे जाने पर स्थानीय स्तर पर आपत्ति जताई गई है। 2. नेपाली हिस्से में भारतीय गांव का नाम लिखने पर आपत्ति- नेपाल की ओर लगे ‘वेलकम टू नेपाल’ बोर्ड पर ‘काली नदी, छारछुम’ लिखा गया है। नेपाल के स्थानीय नागरिकों और राजनीतिक दलों ने इस पर आपत्ति जताते हुए बोर्ड पर नेपाली क्षेत्र का नाम लिखने की मांग की है। नेपाल की ओर इस स्थान का पता महाकाली नगरपालिका-8, असिगड़ा, दार्चुला बताया गया है। मामले की जानकारी नेपाल के परराष्ट्र मंत्रालय और जिला प्रशासन को भी दी गई है। 3. आपत्ति के बाद भारतीय पक्ष ने सुधार का दिया आश्वासन- स्थानीय स्तर पर आपत्ति के बाद भारतीय पक्ष की ओर से बोर्ड में सुधार का आश्वासन दिए जाने की बात सामने आई है। धारचूला के एसडीएम आशीष जोशी के अनुसार, नेपाल की ओर लगे बोर्ड में भारतीय गांव के नाम को ढक दिया गया है। वहां नेपाल के स्थानीय क्षेत्र का नाम दर्ज करते हुए नया बोर्ड लगाए जाने की तैयारी है। 4. 2022 में शिलान्यास, ₹32.98 करोड़ की लागत- मल्ला छारछुम में काली नदी पर बने इस करीब 110 मीटर लंबे मोटर पुल का शिलान्यास सितंबर 2022 में किया गया था। इसकी निर्माण लागत 32 करोड़ 98 लाख रुपए है। भारत सरकार के अनुसार, फरवरी 2022 में भारत और नेपाल के बीच महाकाली नदी पर मोटरेबल पुल बनाने के लिए समझौता हुआ था। परियोजना का वित्तीय सहयोग भारत सरकार की अनुदान सहायता के तहत किया गया है। 5. 200 KM का चक्कर बचेगा, व्यापार को भी बढ़ावा- पिथौरागढ़ जिले में भारत-नेपाल के बीच मोटर पुल नहीं होने के कारण वाहनों से नेपाल जाने के लिए लोगों को करीब 200 किलोमीटर दूर बनबसा जाना पड़ता था। छारछुम पुल शुरू होने के बाद धारचूला से नेपाल के सीमावर्ती इलाकों तक सड़क संपर्क आसान होगा। इससे यात्रा का समय और खर्च कम होने के साथ व्यापारिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। पिथौरागढ़ की नेपाल से करीब 275 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है और दोनों देशों के बीच आवाजाही के लिए जिले में 10 अंतरराष्ट्रीय झूलापुल भी हैं। ————————————– ये खबर भी पढ़ें… टनल के अंदर चार मंजिला बिल्डिंग, बिना ऑक्सीजन फंसे मजदूर:माउंट एवरेस्ट विजेता रेस्क्यू में जुटे; कहीं बिना सिर की बॉडी, कहीं सिर्फ पैर मिला ‘मैं टनल में रेस्क्यू के लिए घुसा, तो दलदल में धंसने लगा। जितना हिलता, उतना ही धंसता गया। फिर समझ आया कि यहां जमीन ही निगल रही है। मैं कमर तक धंसा था। निकलने में करीब 1 घंटे लग गए। रसुवा की इस टनल में जो देखा, ऐसा अनुभव पहले कभी नहीं हुआ।’ ये बता रहे माउंटेन गाइड विक्रम कर्के रसुवा की टनल में चल रहे रेस्क्यू ऑपरेशन का हिस्सा हैं। वे चिलिमे, त्रिशूली-1 और त्रिशूली-3 A टनल के रेस्क्यू में शामिल हैं, जहां 100 से ज्यादा लोग फंसे हुए हैं। इन्हें निकालने के लिए नेपाल और भारतीय सेना समेत कई देशों की रेस्क्यू टीमें जुटी हैं। टनल के अंदर का हाल बताते हुए विक्रम कहते हैं, ‘मशीनों के बिना यहां फंसे लोगों तक पहुंचना मुश्किल है। विक्रम ने हमें रेस्क्यू की पूरी कहानी बताई…(पढ़ें पूरी खबर)

Housing Prices: घर बनवाना महंगा हुआ! 5 साल में 34% बढ़ी लागत; ईरान संकट ने और बढ़ाई मुश्किल

Housing Prices: देश के सात बड़े शहरों में घरों की कीमत तेजी से बढ़ी है। 2021 से 2025 के बीच इनमें 59% का उछाल आया। वहीं, इसी दौरान घर बनाने की लागत करीब 34% बढ़ी। यानी घरों का दाम निर्माण लागत के मुकाबले काफी तेज बढ़ी है। Anarock Research की रिपोर्ट में इसकी बड़ी वजह जमीन की बढ़ती कीमतों को बताया गया है।

दाम किस तरह से बढ़ रहे हैं?

2021 में एक स्टैंडर्ड-प्लस रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट की औसत निर्माण लागत ₹2,681 प्रति वर्ग फुट थी। 2025 में यह बढ़कर ₹3,604 प्रति वर्ग फुट हो गई। यानी सालाना करीब 6.9% की बढ़ोतरी हुई।

दूसरी तरफ, घरों की औसत कीमत 2021 में ₹5,826 प्रति वर्ग फुट थी। 2025 में यह बढ़कर ₹9,260 प्रति वर्ग फुट हो गई। इसकी सालाना बढ़ोतरी करीब 12% रही।

निर्माण लागत का कितना हाथ?

Anarock के मुताबिक, घरों की कीमत बढ़ने में करीब 66% योगदान निर्माण लागत का रहा। बाकी 34% बढ़ोतरी जमीन की कीमत, डेवलपर मार्जिन और मांग-सप्लाई जैसे कारणों से हुई।

Anarock Group के वाइस चेयरमैन संतोष कुमार के मुताबिक, पिछले पांच साल में बड़े शहरों में जमीन की कीमत तेजी से बढ़ी है। इंफ्रास्ट्रक्चर, मांग-सप्लाई, लोकेशन और डेवलपर की कीमत तय करने की रणनीति का भी असर पड़ा है।

जमीन की कीमत 120% तक बढ़ी

रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 से 2026 की पहली छमाही के बीच सात बड़े शहरों में जमीन की कीमत 50-120% तक बढ़ी। NCR में जमीन की कीमत 70-130% तक बढ़ी। बेंगलुरु में भी इसमें 60-120% का उछाल आया।

संतोष कुमार के मुताबिक, महंगी जमीन का सीधा असर प्रोजेक्ट की लागत और घर की कीमत पर पड़ता है। खासकर उन इलाकों में जहां इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से बन रहा है। ऐसे इलाकों में प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले ही जमीन महंगी हो जाती है।

पश्चिम एशिया तनाव से भी बढ़ा दबाव

निर्माण लागत पर अब ईरान युद्ध यानी पश्चिम एशिया विवाद का भी असर पड़ा है। Anarock का अनुमान है कि इससे कुल निर्माण लागत में 8-10% की और बढ़ोतरी हुई है। स्टील और ईंधन से जुड़ी लॉजिस्टिक्स लागत सबसे ज्यादा बढ़ी है।

स्टील की कीमत करीब 20% बढ़ी है। TMT बार करीब ₹72,000 प्रति टन पहुंच गया है। ईंधन और साइट लॉजिस्टिक्स की लागत 15-20% बढ़ी है। टाइल्स, ग्लास और हार्डवेयर जैसे फिनिशिंग मटेरियल भी 8-12% महंगे हुए हैं। वहीं MEP यानी मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और प्लंबिंग की लागत 9-13% बढ़ी है।

लेबर अभी भी सबसे बड़ा खर्च

किसी प्रोजेक्ट की कुल लागत में लेबर का हिस्सा करीब 25-30% है। हालांकि, इसकी लागत में बढ़ोतरी बाकी चीजों के मुकाबले कम रही। लेबर कॉस्ट करीब 5-6% बढ़ी है। सीमेंट की कीमत में भी करीब 4-5% की बढ़ोतरी हुई है।

MEP लागत में तेजी ज्यादा रही। 2023 से 2025 के बीच कोर बिल्डिंग की लागत 13% बढ़कर ₹2,212 प्रति वर्ग फुट हो गई। वहीं MEP लागत 17% से ज्यादा बढ़कर ₹788 प्रति वर्ग फुट पहुंच गई। 2025 में कुल निर्माण लागत में MEP का हिस्सा करीब 22% था।

नए और पुराने प्रोजेक्ट पर अलग असर

बढ़ती लागत से पहले लॉन्च और बिक चुके प्रोजेक्ट पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे प्रोजेक्ट में डेवलपर के पास कीमत बढ़ाने की गुंजाइश कम होती है। इससे मार्जिन प्रभावित हो सकता है।

नए प्रोजेक्ट में कीमत बढ़ाने की गुंजाइश ज्यादा है। लेकिन यहां भी एक सीमा है। मिड-इनकम और अफोर्डेबल हाउसिंग में ज्यादा कीमत बढ़ाना मुश्किल हो सकता है। इसकी वजह घर खरीदारों की सीमित भुगतान क्षमता है।

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