Gold-Silver ETFs : गोल्ड और सिल्वर ETF 3% तक भागे, US में ब्याज दरों को लेकर नरम रुख की उम्मीद ने भरा जोश

Gold-Silver ETFs : शुक्रवार को भारत में गोल्ड और सिल्वर एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETF) में 2-3 प्रतिशत की बढ़त देखने को मिली है। यह बढ़त ग्लोबल मार्केट में प्रोसियस मेटल्स की कीमतों में आई तेजी के कारण हुई। अमेरिकी लेबर मार्केट के आंकड़े उम्मीद से कमजोर रहे हैं। इससे यह उम्मीद मजबूत हुई कि फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लेकर नरम रुख अपना सकता है।

आज दोपहर के कारोबार में निप्पॉन इंडिया ETF गोल्ड BeES 2.4 प्रतिशत बढ़कर 120.51 रुपये पर पहुंच गया,जबकि ICICI प्रूडेंशियल गोल्ड ETF 2.4 प्रतिशत बढ़कर 124.90 रुपये पर कारोबार करता दिखा। SBI गोल्ड ETF 2.3 प्रतिशत बढ़कर 124.25 रुपये और टाटा गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड 2.3 प्रतिशत बढ़कर 14.14 रुपये पर पहुंच गया।

इंटरनेशनल मार्केट में चांदी की कीमतों में तेज उछाल आने के कारण सिल्वर ETF ने गोल्ड ETF के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया। निप्पॉन इंडिया सिल्वर BeES 2.6 प्रतिशत बढ़कर 221.95 रुपये पर,टाटा सिल्वर एक्सचेंज ट्रेडेड फंड 2.6 प्रतिशत बढ़कर 22.55 रुपये पर,SBI सिल्वर ETF 2.5 प्रतिशत बढ़कर 227.28 रुपये पर और ICICI प्रूडेंशियल सिल्वर ETF 2.4 प्रतिशत बढ़कर 231.28 रुपये पर पहुंच गया।

 स्पॉट गोल्ड 1% बढ़कर $4,165.29 प्रति औंस पर पहुंचा

ग्लोबल मार्केट में बुलियन की कीमतों में आई तेजी के बाद भारतीय बाजार में यह रैली देखने को मिली है। आज स्पॉट गोल्ड 1% बढ़कर $4,165.29 प्रति औंस पर पहुंच गया,जबकि इससे पहले सेशन में यह 23 जून के बाद के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया था। अगस्त डिलीवरी वाला US गोल्ड फ्यूचर्स 1.3% बढ़कर $4,178.50 पर पहुंच गया है। गोल्ड-सिल्वर अपनी पहली साप्ताहिक बढ़त की ओर बढ़ रहे हैं। इस हफ्ते इनमें लगभग 1.8% की बढ़ोतरी हुई है। US नॉन-फार्म पेरोल्स और प्राइवेट पेरोल्स के आंकड़े उम्मीद से कमज़ोर रहे,जिससे लगातार बनी महंगाई और लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरों की आशंका को लेकर चिंताएं कम हुईं है, इसका फायदा सोने-चांदी को मिल रहा है।

चांदी की कीमतों में भी तेजी जारी

चांदी की कीमतों में भी तेजी जारी है। इसका हाजिर भाव 2.1 प्रतिशत बढ़कर $62.28 प्रति औंस हो गया है। दूसरी कीमती धातुओं की बात करें तो प्लेटिनम की कीमत 2.4 प्रतिशत बढ़कर $1,655.15 पर आ गई है। जबकि पैलेडियम 0.9 प्रतिशत बढ़कर $1,278.89 पर पहुंच गया है। ये तीनों धातुएं एक हफ्तो से ज्यादा समय के अपने उच्चतम स्तर के करीब कारोबार कर रही है।

शेयर बाजार का भी मूड सुधरा

गोल्ड-सिल्वर ETF में बढ़त के साथ ही आज शेयर बाजार का मूड भी अच्छा बना हुआ था। 3 बजे के आसपास सेंसेक्स 287.65 अंक या 0.37 प्रतिशत बढ़कर 77,789.77 पर और निफ्टी 101.95 अंक या 0.42 प्रतिशत बढ़कर 24,277.65 पर दिख रहा था। लगभग 2016 शेयरों में बढ़त दिख रही थी। 1828 शेयरों में गिरावट आई थी और 178 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ था। वोलैटिलिटी इंडेक्स इंडिया VIX में 3.34 प्रतिशत की गिरावट आई। यह बाजार में उतार-चढ़ाव की उम्मीदों में कमी का संकेत है। इससे तेजड़ियों को राहत मिल सकती है।

 

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शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड में हुआ है भारी नुकसान? तब भी क्यों जरूरी है ITR फाइल करना, जानें टैक्स छूट का यह सीक्रेट फॉर्मूला

ITR Filing Rules: क्या शेयर बाजार में मुनाफे की बजाय नुकसान होने पर इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करना चाहिए? अक्सर देखा जाता है कि जिन निवेशकों को किसी फाइनेंशियल ईयर के दौरान इक्विटी या म्यूचुअल फंड में घाटा होता है, वे मान लेते हैं कि उन्हें ITR फाइल करने की कोई जरूरत नहीं है। खासकर तब, जब उनकी कोई अन्य टैक्स योग्य आय न हो।

लेकिन टैक्स एक्सपर्ट्स की मानें तो घाटे वाले साल में आईटीआर फाइल न करना लंबे समय में आपको बहुत भारी पड़ सकता है। अगर आप तय समय सीमा के भीतर अपना रिटर्न दाखिल नहीं करते हैं, तो आप अपने इस कैपिटल लॉस को अगले सालों के लिए कैरी फॉरवर्ड का अधिकार खो देते हैं।

इसका सीधा असर यह होगा कि भविष्य में जब आपको प्रॉफिट होगा, तब आप इस घाटे को उस मुनाफे से एडजस्ट नहीं कर पाएंगे और आपको ज्यादा टैक्स चुकाना पड़ेगा। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि नुकसान के बावजूद आईटीआर भरना क्यों फायदेमंद है।

लॉस कैरी फॉरवर्ड करने का क्या है नियम?

टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, नुकसान के बावजूद समय पर आईटीआर भरने से आपको अपने नुकसान को भविष्य के मुनाफे से एडजस्ट करने की कानूनी अनुमति मिलती है। एनए शाह एसोसिएट्स के टैक्स पार्टनर गोपाल बोहरा बताते हैं कि भले ही किसी टैक्सपेयर की कोई टैक्स देनदारी न बन रही हो और सिर्फ इक्विटी या म्यूचुअल फंड से कैपिटल लॉस हुआ हो, तब भी ड्यू डेट पर या उससे पहले आईटीआर फाइल करना बेहद फायदेमंद है।

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समय पर आईटीआर दाखिल करने से आप इस नुकसान को अगले 8 सालों तक कैरी फॉरवर्ड कर सकते हैं। भविष्य के सालों में जब भी आपको शेयरों या म्यूचुअल फंड से कमाई होगी, तो आप इस पुराने घाटे को उस मुनाफे से घटाकर अपनी टैक्स देनदारी को काफी कम या शून्य कर सकते हैं।

क्या इक्विटी, डेट म्यूचुअल फंड और गोल्ड ETF के नियम अलग हैं?

कई निवेशकों को लगता है कि यह नियम सिर्फ शेयरों के लिए है, लेकिन टैक्स एक्सपर्ट्स ने साफ किया है कि निवेश का माध्यम कोई भी हो, नियम सभी के लिए बिल्कुल एक समान हैं। चाहे आपका नुकसान इक्विटी शेयर्स से हुआ हो, इक्विटी म्यूचुअल फंड से हो, डेट म्यूचुअल फंड से हो या फिर गोल्ड ईटीएफ से, अगर आप इस अन-एडजस्टेड लॉस को आगे ले जाना चाहते हैं, तो आपको तय तारीख के भीतर ही आईटीआर भरना होगा। नियत तारीख चूकने पर घाटे को आगे ले जाने की अनुमति नहीं मिलेगी।

इक्विटी के घाटे को क्या दूसरे एसेट्स के मुनाफे से एडजस्ट कर सकते हैं?

हां, नियमों के दायरे में रहकर आप इक्विटी के घाटे को दूसरे कैपिटल एसेट्स से हुए मुनाफे के खिलाफ एडजस्ट कर सकते हैं और अपना टैक्स बचा सकते हैं:

शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस(STCL): अगर आपको शेयरों से शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस हुआ है, तो इसे आप शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म दोनों तरह के कैपिटल गेन्स से एडजस्ट कर सकते हैं। फिर चाहे वह मुनाफा शेयरों से हो, प्रॉपर्टी बेचने से हो, गोल्ड से हो या डेट म्यूचुअल फंड से।

लॉन्ग-टर्म कैपिटल लॉस(LTCL): अगर आपको शेयरों में लंबी अवधि में घाटा हुआ है, तो नियम कड़े हैं। इसे केवल और केवल लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) के खिलाफ ही एडजस्ट किया जा सकता है।

निवेशकों को कौन सा ITR फॉर्म चुनना चाहिए?

सही आईटीआर फॉर्म का चुनाव पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी कमाई या नुकसान के स्रोत क्या हैं:

ITR-2: जो निवेशक शेयरों, म्यूचुअल फंड या अन्य कैपिटल एसेट्स से होने वाले केवल कैपिटल गेन्स या कैपिटल लॉस को रिपोर्ट कर रहे हैं, उन्हें आमतौर पर ITR-2 फॉर्म भरना होता है।

ITR-3: लेकिन, अगर आप शेयरों में इंट्राडे ट्रेडिंग करते हैं या फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) में ट्रेड करते हैं, जिसे टैक्स की भाषा में बिजनेस इनकम माना जाता है, तो आपको ITR-3 फॉर्म चुनना चाहिए।

कैपिटल लॉस रिपोर्ट करते समय किन बातों का रखें ध्यान?

टैक्सपेयर्स को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि केवल वही नुकसान आगे ले जाए जा सकते हैं जो समय सीमा के भीतर फाइल किए गए रिटर्न में दिखाए गए हों। इसके अलावा, अपने कॉन्ट्रैक्ट नोट्स, ब्रोकर स्टेटमेंट्स और कैपिटल गेन्स स्टेटमेंट्स जैसे सभी जरूरी दस्तावेजों को संभालकर रखें, क्योंकि टैक्स अधिकारियों द्वारा मांगे जाने पर ये सबूत के तौर पर काम आते हैं।

गोपाल बोहरा सलाह देते हैं कि आईटीआर दाखिल करने से पहले निवेशकों को अपने AIS और TIS में दर्ज ट्रांजैक्शन का मिलान अपने ब्रोकर की रिपोर्ट से जरूर कर लेना चाहिए। आईटीआर में शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म नुकसान का सही खुलासा सुनिश्चित करें ताकि भविष्य में टैक्स छूट का लाभ लेने में कोई रुकावट न आए।

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल पर विशेषज्ञों द्वारा व्यक्त किए गए विचार और निवेश टिप्स उनके अपने हैं, वेबसाइट या उसके प्रबंधन के नहीं। मनीकंट्रोल यूजर्स को सलाह देता है कि वे कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट्स से जांच कर लें।

क्या आप बहुत ज्यादा फंड में निवेश कर रहे हैं? जानिए इसके नुकसान

मेरे एक दोस्त ने एक दिन अपने म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि वह हर साल म्यूचु्अल फंड में निवेश बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही उनके पोर्टफोलियो में फंड्स यानी स्कीम की संख्या भी बढ़ रही है। क्या ऐसा करना सही है? जब मैंने उनसे पूछा कि उनके पोर्टफोलियो में कितनी स्कीमें हैं तो वह गिनती करने लगे। दरअसल यह समस्या सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है।

डायवर्सिफिकेशन का सही मतलब कम लोग समझते हैं

ज्यादातर निवेशकों को लगता है कि डायवर्सिफिकेशन के लिए ज्यादा स्कीमों में निवेश करना जरूरी है। लेकिन, कम लोग यह समझते हैं कि डायवर्सिफिकेशन का मतलब ज्यादा फंडों में निवेश करना नहीं है। डायवर्सिफिकेशन का मतलब यह है कि आपके पोर्टफोलियो में अलग-अलग तरह के एसेट्स और स्कीमें होनी चाहिए। उन स्कीमों का पोर्टफोलियो एक जैसे शेयरों का नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए एक से ज्यादा लार्जकैप फंड में निवेश करने का कोई मतलब नहीं है।

एक जैसी कई स्कीम में निवेश करना डायवर्सिफिकेशन नहीं है 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर कोई इनवेस्टर डायवर्सिफिकेशन करना चाहता है तो वह अपने पोर्टफोलियो में एक लार्जकैप फंड, एक मिडकैप फंड, एक स्मॉलकैप फंड को शामिल कर सकता है। लार्जकैप, मिडकैप या स्मॉलकैप के एक से ज्यादा फंड में निवेश करने से डायवर्सिफिकेशन का मकसद पूरा नहीं होता है।

अलग-अलग एसेट में निवेश करने से रिस्क कम हो जाता है

डायवर्सिफिकेशन का मतलब अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश करना है। इसका मतलब है कि पोर्टफोलियो में इक्विटी शामिल होना चाहिए। इक्विटी की हर कैटेगरी के फंड होने चाहिए। डेट यानी बॉन्ड्स जैसे फिक्स्ड रिटर्न इंस्ट्रूमेंट्स भी पोर्टफोलियो का हिस्सा होना चाहिए। साथ ही बुलियन भी होना चाहिए। बुलियन का मतलब सोने और चांदी से है। एक्सपर्ट्स गोल्ड ईटीएफ और सिल्वर ईटीएफ में निवेश की सलाह देते हैं।

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एक साथ सभी एसेट क्लास में नहीं आती है गिरावट 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि डायवर्सिफिकेशन का मकसद यह है कि किसी एसेट क्लास में गिरावट का असर पोर्टफोलियो पर कम से कम पड़े। आम तौर पर यह देखा जाता है कि सभी एसेट क्लास में एक साथ गिरावट नहीं आती है। कई बार इक्विटी में गिरावट आने पर गोल्ड में तेजी होती है। डेट में निवेश आपके पोर्टफोलियो को शेयरों में तेज गिरावट की स्थिति में नुकसान से बचाता है। इसलिए एक्सपर्ट्स पोर्टफोलियो में डेट को शामिल करने सलाह देते हैं।

Gold Silver Rates Today: देश और विदेश में सोने और चांदी में तेजी, इन वजहों से कीमती मेटल्स की बढ़ी चमक

देश और विदेश में सोने और चांदी में 22 जून को तेजी लौट आई। इससे विदेशी बाजारों में तीन दिनों से सोने में जारी गिरावट पर ब्रेक लग गया। इधर, भारत में गोल्ड और फ्यूचर्स में तेजी आई। दिल्ली सर्राफा बाजार में भी दोनों कीमती मेटल्स की चमक बढ़ी।

चांदी में 4800 रुपये का उछाल

दिल्ली सर्राफा बाजार में सोना 1,700 रुपये चढ़कर 1.52 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। चांदी 4,800 रुपये के उछाल के साथ 2,45,500 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई। 19 जून यानी शुक्रवार को चांदी में 8,040 रुपये प्रति किलोग्राम की गिरावट आई थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड 1.2 फीसदी चढ़कर 4,028 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया। 19 जून को सोना गिरकर 11 जून के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गया था।

गोल्ड फ्यूचर्स-सिल्वर फ्यूचर्स में भी तेजी

इधर, इंडिया में गोल्ड फ्यूचर्स और सिल्वर फ्यूचर्स में भी तेजी दिखा। शाम के कारोबार में कमोडिटी एक्सचेंज एमसीएक्स में गोल्ड फ्यूचर्स 1.21 फीसदी यानी 1,777 रुपये चढ़कर 1,48,980 रुपये प्रति 10 ग्राम पर चल रहा था। सिल्वर फ्यूचर्स 2 फीसदी के उछाल के साथ 2,37,877 रुपये प्रति किलोग्राम पर चल रहा था।

क्रूड में गिरावट का सेंटीमेंट पर असर

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अमेरिका-ईरान के बीच डील की बातचीत पॉजिटिव रहने पर क्रूड में गिरावट आई। उधर, फेडरल रिजर्व के आक्रामक रुख का असर इनवेस्टर्स पर पड़ा है। इंडिपेंडेंट एनालिस्ट रॉस नोरमैन ने कहा कि हॉट मनी ऑयल से निकलकर गोल्ड में आ रहा है। इसका असर सोने की कीमतों पर पड़ रहा है।

फेड के रुख से सोने में तेजी पर लगेगी लगाम

हालांकि उन्होंने कहा कि अभी इस तेजी को गोल्ड के रुख में बदलाव के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसकी वजह यह है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने अपना रुख आक्रामक बनाए रखने का संकेत दिया है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि फेड की कमेंट्री से लगता है कि शॉर्ट टर्म में इंटरेस्ट रेट बढ़ सकता है। यह गोल्ड की कीमतों के लिए अच्छा नहीं होगा।

गोल्ड ईटीएफ में फिर से बढ़ रही दिलचस्पी

इस बीच, मॉर्गन स्टेनली के एनालिस्ट्स ने 19 जून को एक रिपोर्ट में पेश की। इसमें कहा गया है कि इस साल की दूसरी तिमाही में गोल्ड के 5,200 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच जाने का अनुमान है। इसकी बड़ी वजह यह है कि फिर से गोल्ड ईटीएफ में इनवेस्टर्स की दिलचस्पी बढ़ती दिख रही है।

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मध्यपूर्व में शांति का पॉजिटिव असर

एचडीएफसी सिक्योरिटीज के सीनियर एनालिस्ट सौमिल गांधी ने कहा कि जियोपॉलिटिकल टेंशन में कमी का असर सेंटिमेंट पर पड़ा है। अमेरिका-ईरान के बीच डील को लेकर बातचीत जारी रहने की खबरें हैं। इससे मध्यपूर्व में शांति बहाल होगी। इससे फिर से सोने और चांदी में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ सकती है। 28 फरवरी को अमेरिका-ईरान के बीच लड़ाई शुरू होने के बाद से बुलियन में गिरावट देखने को मिली थी।