Trump Tariffs: जेनेरिक्स पर ट्रंप का एक ऐलान, फार्मा सेक्टर में कोहराम, भारतीय कंपनियों पर पड़ेगा इतना गहरा असर

Trump Tariffs: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार 22 जुलाई को 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ लगाने की नई टाइमलाइन का ऐलान किया है। इस ऐलान के बाद अब सन फार्मा (Sun Pharma), ल्यूपिन (Lupin), सिप्ला (Cipla) समेत देश की कई दवा कंपनियां निवेशकों के रडार पर आ गई हैं। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा कि अमेरिका में आयात होने वाली दवाईयों पर सभी जेनेरेकि दवाओं पर अब दो साल तक कोई टैरिफ नहीं लगाया जाएगा। ट्रंप के ऐलान के मुताबिक इसके बाद 1 अगस्त 2028 से इन पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा और 1 अगस्त 2029 से इसे बढ़ाकर 200% कर दिया जाएगा।

Trump Tariffs: अमेरिका के लिए कितना अहम है जेनेरिक्स?

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के मुकाबिक जेनेरिक दवाओं का उत्पादन अमेरिका में करने के लिए टैरिफ पॉलिसी बनाई गई है। उन्होंने कहा कि जो कंपनियां तय समय के भीतर अमेरिका में अपने प्लांट और इक्विपमेंट नहीं लगाएंगी, उन्हें टैरिफ झेलना पड़ेगा। इससे पहले ट्रंप ने जो टैरिफ लगाए थे, उसके दायरे में ब्रांडेड और पेटेंट वाली दवाईयां थीं, जिसमें अभी भी कोई बदलाव नहीं किया गया है। पहले वाली पॉलिसी में जेनेरिक्स दवाईयां शामिल नहीं थीं क्योंकि अमेरिका में डॉक्टर्स करीब 90% जेनेरिक्स दवाईयां ही लिखते हैं। ट्रंप सरकार ने ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट के सेक्शन 232 के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर फार्मा इंडस्ट्री की जांच भी शुरू की थी। इसके अलावा आम लोगों सीधे सस्ती दवाओं की बिक्री के लिए Trump RX नाम से एक प्लेटफॉर्म भी लॉन्च किया।

भारतीय फार्मा कंपनियों पर क्या असर?

जेनेरिक्स पर अमेरिकी टैरिफ का भारतीय कंपनियों पर बहुत असर पड़ सकता है। इसकी वजह ये है कि भारतीय दवा कंपनियों का अमेरिका में जितना सेल्स वॉल्यूम है, उसका करीब 90% तो जेनेरिक्स दवाईयों का है तो अमेरिका जितना जेनेरिक्स आयात करता है, उसमें 40% भारत से है। भारत से अमेरिका को करीब $1 हजार करोड़ का फार्मा एक्सपोर्ट है। इसके अलावा भारत के बाहर अमेरिकी दवा नियामक एफडीए से मंजूरी मिली हुई मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स में सबसे अधिक भारतीय कंपनियों की ही हैं, जिनकी संख्या लगभग 670 है।

अमेरिका की तुलना में भारत में क्यों बनती हैं अधिक दवाईयां

भारत में दवा बनाने की लागत अमेरिका की तुलना में 30-50% तक सस्ती पड़ती है। सीएनबीसी-टीवी18 की रिपोर्ट के मुताबिक इंडस्ट्री के कई जानकारों का मानना है कि अभी यह देखना बाकी है कि इस नीति को वास्तव में कैसे लागू किया जाएगा और ट्रंप के कार्यकाल के बाद इस पर क्या होगा। एक्सपर्ट्स के मुताबिक लगातार कीमतों में गिरावट, तगड़े कॉम्पटीशन , अलग-अलग प्रकार की डोजेज और सख्त मैन्युफैक्चरिंग क्वालिटी के चलते अमेरिका में बड़े पैमाने पर जेनेरिक दवाओं का उत्पादन आसान नहीं है। एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि अमेरिका में बड़े वॉल्यूम में प्रोडक्शन कैपेसिटी डेवलप करने में कई दशक लग सकते हैं, क्योंकि कम लागत वाली जेनेरिक दवाइयां बनाने को लेकर अमेरिका की क्षमता काफी हद तक कम हो चुकी है।

अमेरिका में किन भारतीय कंपनियों की है मौजूदगी

कई भारतीय कंपनियों की अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स हैं। अरबिंदो फार्मा की अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग में अच्छी मौजूदगी है तो डॉ रेड्डीज लैबोरेटरीज, ल्यूपिन, सिप्ला और जाइडस लाइफ जैसी कंपनियों का भी अमेरिका में कारोबार फैला हुआ है। वहीं एल्केम लैब्स और टोरेंट फार्मा जैसी कंपनियां पूरी तरह से भारत में मौजूद मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स पर निर्भर हैं और अमेरिका से उनकी कमाई बहुत अधिक नहीं होती है। बायोकॉन जैसी कंपनियां बायोसिमिलर और जेनेरिक दवाओं के प्रोडक्शन के लिए भारत और मलेशिया की यूनिट्स पर निर्भर हैं, जबकि सेनोरेस फार्मा की अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग मौजूदगी है।

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Healthcare Stocks : कमजोर बाजार में भी फार्मा और हेल्थकेयर शेयरों में आई बहार, मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट ने भरा दम

Healthcare Stocks : कमजोर बाजार में फार्मा और हेल्थकेयर शेयरों में आज जोरदार खरीदारी का मूड देखने को मिला। इसके चलते निफ्टी फार्मा इंडेक्स में 0.92 प्रतिशत की बढ़त हुई, जबकि बीएसई हेल्थकेयर इंडेक्स 0.62 प्रतिशत बढ़ा। चुनिंदा हेल्थकेयर शेयरों में डिफेंसिव बाइंग देखने को मिली। सिप्ला में 1.5 प्रतिशत,डॉ. रेड्डीज़ लैबोरेटरीज में 1.05 प्रतिशत और सन फार्मा में 0.98 प्रतिशत की बढ़त हुई। वहीं, ग्लैंड फार्मा के शेयरों में 4.79 प्रतिशत की बढ़त हुई और यह BSE मिडकैप गेनर्स में सबसे आगे रहा। लॉरस लैब्स में 3.12 प्रतिशत और ऑरोबिंदो फार्मा में 2.99 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। इस बीच मोतीलाल ओसवाल की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक हेल्थकेयर स्पेस में ग्रोथ के काफी मौके हैं। इसके चलते भी इस सेक्टर को शेयरों में तेजी रही।

हेल्थकेयर पर MOFSL की राय

हेल्थकेयर पर MOFSL की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रेटर नोएडा सैटेलाइट टाउन से अर्बन हब बन गया है। ग्रेटर नोएडा की जनसंख्या सालाना 5.4% बढ़कर 1.3 करोड़ पर पहुंच गई है। ग्रेटर नोएडा में जनसंख्या राष्ट्रीय औसत से ज्यादा बढ़ी है। ग्रेटर नोएडा में सिर्फ 4500 सुपर स्पेशलिटी बेड मौजूद हैं जो जरुरत से काफी कम हैं। वेस्टर्न यूपी और पश्चिमी दिल्ली से भी डिमांड को सपोर्ट मिल रहा है। यहां ऑर्गन ट्रांसप्लांट,रोबोटिक सर्जरी और क्रिटिकल केयर में बडे़ मौके हैं।

MOFSL के पसंदीदा शेयर

MOFSL ने मेदांता को BUY रेटिंग देते हुए 1490 रुपए प्रति शेयर का टारगेट दिया है। ब्रोकरेज का कहना है कि इसके 382 बेड्स ऑपरेशनल हैं। इनकी रेवेन्यू 200-250 करोड़ करोड़ रुपए महीना है। कंपनी के EBITDA घाटे में तेजी से कमी आई है। मजबूत ब्रांड से मरीज बढ़े हैं। FY26-28 में रेवेन्यू 11%, EBITDA 24% और मुनाफा 31% CAGR संभव है।

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मैक्स हेल्थकेयर पर MOFSL

मैक्स हेल्थकेयर पर MOFSL ने BUY रेटिंग देते हुए 1260 रुपए प्रति शेयर का टारगेट दिया है। ब्रोकरेज का कहना है कि Jaypee के अधिग्रहण के बाद ऑक्यूपेंसी 64% से बढ़कर 72% हो गई है। इसकी रेवेन्यू 36-37 करोड़ रुपए प्रति महीना से बढ़कर 57 करोड़ रुपए प्रति महीना हो गई है। कंपनी की 100 बेड और 5 OT जोड़ने की तैयारी है। इसका कार्डियोलॉजी,ऑन्कोलॉजी और ऑर्गन ट्रांसप्लांट पर फोकस है। FY26-28 में रेवेन्यू 14%,EBITDA 15% और मुनाफा 20% CAGR संभव है।

फोर्टिस पर MOFSL

फोर्टिस पर MOFSL ने BUY रेटिंग देते हुए 1140 रुपए प्रति शेयर का टारगेट दिया है। ब्रोकरेज का कहना है कि कंपनी 22 साल पुरानी है। बेड फैसिलिटी अच्छी है। इसकी ऑक्यूपेंसी 77-78% है। 22% EBITDA मार्जिन और 15% सालाना ग्रोथ की उम्मीद है। कंपनी को नोएडा में दूसरे साइट की तलाश है। FY26-28 में रेवेन्यू 13%, EBITDA 17% और मुनाफा 21% CAGR संभव है।

 

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