
IDBI Bank Privatization Row: केंद्र की मोदी सरकार और कांग्रेस के बीच बैंकिंग सेक्टर के अतीत और वर्तमान को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा आईडीबीआई बैंक के निजीकरण और उसकी बिक्री पर उठाए गए सवालों पर कड़ा पलटवार करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस शासनकाल के दौरान बैंकों के कथित दुरुपयोग और घोटालों की लंबी फेरिस्ट सामने रखी है। इस तीखे राजनीतिक टकराव ने एक बार फिर बैंकिंग सेक्टर की रीढ़ और वित्तीय नीतियों पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। ALSO READ: कांग्रेस के समय बैंक बनते थे, मोदी के समय बिकते हैं… IDBI बैंक निजीकरण पर राहुल गांधी का केंद्र पर तीखा हमला
निर्मला सीतारमण ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा कि हम सब जानते हैं कि किस तरह कांग्रेस पार्टी ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों का इस्तेमाल व्यक्तिगत इकाइयों के रूप में किया और समझदारी भरे ऋण नियमों को दरकिनार करते हुए अपनी मर्जी से लोन देने के लिए बैंक कर्मचारियों पर दबाव बनाया।
उन्होंने इसके कुछ उदाहरण गिनाते हुए कहा कि 1957 में, कांग्रेस नेताओं के प्रभाव के कारण हरिदास मुंद्रा को एलआईसी से पैसा मिला था। 1976 में, इंदिरा गांधी की सरकार ने एसबीआई के चेयरमैन आर.के. तलवार को तब हटा दिया था जब उन्होंने संजय गांधी के करीबी से जुड़ी एक कंपनी के लिए लोन की शर्तों में ढील देने के राजनीतिक दबाव को मानने से इनकार कर दिया था। संजय गांधी ने मारुति को दिए जाने वाले लोन को लेकर सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया पर दबाव डाला था।
सीतारमण ने कहा, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के कार्यकाल में वित्त राज्य मंत्री रहे बी. जनार्दन पुजारी ने 1980 के दशक में बैंक कर्मचारियों पर लोन जारी करने के लिए दबाव डाला था। पवन कुमार बंसल ने यूपीए सरकार में मंत्री रहते हुए, केनरा बैंक पर अपने परिवार से जुड़े व्यवसायों को लोन देने के लिए दबाव बनाया था।
उन्होंने कहा कि आईडीबीआई बैंक हमें बहुत खराब हालत में सौंपा गया था, क्योंकि आईडीबीआई को खुद कांग्रेस के नेताओं से करीबी संबंध रखने वाले बड़े व्यावसायिक समूहों जैसे वीडियोकॉन, विनसम, एबीजी शिपयार्ड, किंगफिशर आदि को लोन देने के लिए मजबूर किया गया था। ये लोन एनपीए में बदल गए, जिससे आईडीबीआई बैंक को भारी नुकसान हुआ, जिसे हमने स्वीकार किया।
We all know how @INCIndia has used Banks and financial institutions as personal entities and pressured bank employees to extend loans at their whim, bypassing prudent lending norms. Let me list a few instances. – In 1957, Haridas Mundra got money from LIC due to influence by the Congress leaders. – In 1976, Indira Gandhi’s government removed SBI Chairman R.K. Talwar after he refused political pressure to relax lending conditions for a company linked to Sanjay Gandhi’s circle. – Sanjay Gandhi pressured the Central Bank of India over loans to Maruti. – B. Janardhana Poojary, MoS Finance under Indira Gandhi and Rajiv Gandhi — pressured bank employees to issue loans in the 1980s. – Pawan Kumar Bansal, as a minister in the UPA, pressured Canara Bank to give loans to his family-linked businesses. The IDBI Bank was handed over to us in poor shape, as IDBI itself was forced to lend to large business groups with close connections to @INCIndia leaders such as Videocon, Winsome, ABG Shipyard, Kingfisher, etc. These turned into bad loans, causing huge losses for IDBI Bank, which we recognised. The NDA govt led by Hon’ble PM Shri @narendramodi revived the IDBI bank through professionalism, prudence and recapitalisation of more than Rs 25,000 crores. The IDBI Bank is now poised for its next phase of growth. All due process has been followed in the IDBI Bank strategic restructuring, and we have already clarified this yesterday. Check this: https://t.co/EjAOziADyf Many more instances of blatant scams and economic mismanagement have been covered in the White Paper on the Indian Economy released in February 2024. It remains relevant even now. Read here: https://t.co/MojSe36Zb2 Your lies with respect to Rafale had failed and were exposed. You had to apologise. The same will happen here. Congress-era banking had a phonebook for the powerful and a rulebook for the common citizens. The era of ‘connection and setting banking’ is over. Common people now have easy access to loans, and employees are not under pressure to extend loans over the phone calls.
— Nirmala Sitharaman (@nsitharaman) October 30, 2026
सीतारमण के अनुसार, एनडीए सरकार ने व्यावसायिकता, विवेक और 25,000 करोड़ रुपये से अधिक के पुनर्पूंजीकरण के माध्यम से आईडीबीआई बैंक को पुनर्जीवित किया। आईडीबीआई बैंक अब अपने विकास के अगले चरण के लिए तैयार है। आईडीबीआई बैंक की रिस्ट्रक्चरिंग में सभी उचित प्रक्रियाओं का पालन किया गया है, और इस बारे में हमने कल ही स्पष्ट कर दिया है।
उन्होंने कहा कि फरवरी 2024 में जारी भारतीय अर्थव्यवस्था पर श्वेत पत्र में खुलेआम हुए घोटालों और आर्थिक कुप्रबंधन के कई अन्य उदाहरणों को शामिल किया गया है। यह आज भी प्रासंगिक है। राफेल को लेकर आपके झूठ असफल रहे और बेनकाब हो गए। आपको माफी मांगनी पड़ी थी। यहा भी यही होगा। कांग्रेस के समय की बैंकिंग व्यवस्था में ताकतवरों के लिए ‘फोनबुक’ होती थी और आम नागरिकों के लिए ‘नियम पुस्तिका’। ‘पहचान और सेटिंग से लोन मिलने’ का दौर अब खत्म हो चुका है। अब आम लोगों को आसानी से लोन मिल जाता है और कर्मचारी फोन कॉल पर लोन देने के दबाव में नहीं रहते हैं।
क्या बोले थे राहुल गांधी?
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने केन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस के समय बैंक बनते थे, जबकि मोदी के समय में बिकते हैं। उन्होंने कहा कि 7 साल पहले IDBI बैंक घाटे में था, लेकिन कर्मचारियों के प्रयास से पिछले साल बैंक ने 9000 करोड़ रुपए से अधिक का शुद्ध मुनाफा कमाया।
आईडीबीआई बैंक के निजीकरण मामले में राहुल ने कहा कि मैं बैंक के कर्मचारियों के साथ खड़ा हूं। गांधी ने 29 अक्टूबर 2026 की तारीख वाले अपने पत्र में लिखा कि पिछले साल IDBI बैंक कर्मचारियों का एक प्रतिनिधिमंडल उनसे संसद भवन में मिला था। उन्होंने सवाल उठाया था कि जिस बैंक को कर्मचारियों ने अपनी मेहनत से मुनाफे में पहुंचाया, उसे सरकार क्यों बेच रही है? राहुल गांधी ने इस मुद्दे को लोकसभा में भी उठाया, लेकिन सरकार की ओर से इसका कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।


