पीएम मोदी ने अमेरिकी उप-राष्ट्रपति से फोन पर बात की:भारत-अमेरिका साझेदारी मजबूत करने पर चर्चा; वेंस को बेटे के जन्म पर बधाई दी

पीएम मोदी ने शनिवार रात अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से फोन पर बातचीत की। मोदी ने सोशल मीडिया पोस्ट कर इसकी जानकारी दी। मोदी ने लिखा, “अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का फोन आया। हमने प्रमुख क्षेत्रों में भारत-अमेरिका व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करने के तरीकों पर चर्चा की।” उन्होंने वेंस को बेटे के जन्म पर बधाई और शुभकामनाएं दीं। दरअसल, 19 जुलाई को जेडी वेंस चौथी बार पिता बने थे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति पिछले साल भारत दौरे पर आए थे अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस 3 से 7 मार्च 2025 तक भारत में थे। उनके साथ-साथ उनकी पत्नी उषा और तीनों बच्चे- इवान, विवेक और मिराबेल भी भारत आए थे। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने उन्हें दिल्ली में रिसीव किया था। एयरपोर्ट पर ही उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया था। उन्होंने PM मोदी से भी मुलाकात की थी। उपराष्ट्रपति बनने के बाद यह जेडी वेंस की पहली आधिकारिक भारत यात्रा थी। ट्रम्प भी 2027 की शुरुआत में भारत आ सकते हैं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प साल 2027 की शुरुआत में भारत आ सकते हैं। 27 जून को व्हाइट हाउस में मीडिया से बातचीत के दौरान विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने ये बयान दिया। ये ट्रम्प की राष्ट्रपति रहते हुए दूसरी भारत यात्रा हो सकती है। इससे पहले ट्रम्प साल 2020 में पहली बार भारत यात्रा पर आए थे। वे अहमदाबाद में ‘नमस्ते ट्रम्प’ कार्यक्रम में शामिल हुए थे। उषा वेंस के माता-पिता आंध्र प्रदेश से थे जेडी वेंस की पत्नी ऊषा का जन्म और स्कूली शिक्षा सैन डिएगो में हुआ है। उनके माता-पिता 1980 के दौरान आंध्र से अमेरिका आकर बसे गए थे। अमेरिका में रहने के बावजूद उनके माता-पिता ने वहां की मॉडर्न संस्कृति से प्रभावित हुए बिना उन्हें भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म के अनुसार शिक्षा और संस्कार दिए। बाद में वेंस भी इन संस्कारों से प्रभावित हुए। ऊषा की मां एक बायोलॉजिस्ट हैं और पिता इंजीनियर। ऊषा कहती हैं कि उन्होंने अपने माता-पिता के आदर्शों को ध्यान में रखते हुए ही पढ़ाई की है। येल से बैचलर की डिग्री हासिल करने के बाद ऊषा ने गेट्स कैम्ब्रिज स्कॉलरशिप की मदद से कैम्ब्रिज से मास्टर ऑफ फिलॉसफी की डिग्री हासिल की। ऊषा ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स के लिए क्लर्क के रूप में काम किया। कल ही भारत पर 100% टैरिफ वाला बिल अमेरिका में पास हुआ अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार रात 86-11 के बहुमत से भारत समेत 5 देशों पर 100% तक का टैरिफ लगाने वाला बिल पास कर दिया है। बिल के मुताबिक भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर 100% टैरिफ लगाया जा सकता है। यह बिल रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों के समर्थन से लाया गया। इसका मकसद रूस की तेल से होने वाली कमाई को कम करना है, ताकि उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता कमजोर हो सके। 23 जुलाई को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया था। बिल के शुरुआती मसौदे में 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 100% कर दिया गया। हालांकि, अभी ये कानून नहीं बना है। अभी इसे अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भेजा जाएगा। अगर वहां भी बिल पास हो जाता है, तो इसे राष्ट्रपति ट्रम्प के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। उनकी मंजूरी मिलने के बाद ही यह कानून बनेगा। पूरी खबर पढ़ें… ————————- ये खबर भी पढ़ें… अमेरिका में पहली बार ‘बर्थ टूरिज्म’ पर रोक:यहां पैदा हुए विदेशियों के बच्चे को नागरिकता नहीं मिलेगी; ट्रम्प बोले- बर्थराइट सिटीजनशिप मजाक बनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर अमेरिका में जन्म लेने वाले लोगों को नागरिकता मिलने के दायरे को सीमित करने की कोशिश की है। पूरी खबर पढ़ें…

रूसी तेल खरीदारों पर चलेगा चाबुक? अमेरिका की सीनेट से पास हुआ बिल; भारत समेत 5 देशों पर 100% टैरिफ का खतरा

US Russia Sanctions Bill: US सीनेट (अमेरिकी राज्यसभा) ने शुक्रवार को रूस और उसके पेट्रोलियम उत्पादों के मुख्य खरीदारों (जैसे चीन और भारत) पर फाइन लगाने वाला एक अहम बिल पास कर दिया है। उनका तर्क यह है कि इस तरह का व्यापार यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा देता है।सीनेट ने 86-11 वोटों के बड़

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मुस्लिम नाटो- पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किये के बीच रक्षा समझौता साइन:एक पर हमला तीनों पर माना जाएगा; साझा ट्रेनिंग और सुरक्षा सहयोग बढ़ेगा

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने ‘मुस्लिम नाटो’ की दिशा में बढ़ा कदम उठाया है। तीनों देशों ने शुक्रवार को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के मुताबिक, अगर तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है, तो इसे तीनों देशों पर अटैक माना जाएगा। इस समझौते पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन ने संयुक्त रक्षा शिखर सम्मेलन के दौरान साइन किए। समझौते के तहत तीनों देश आपस में रक्षा सहयोग बढ़ाएंगे। इसके लिए संयुक्त सैन्य ट्रेनिंग, सुरक्षा से जुड़ी जानकारी साझा करने और सुरक्षा समन्वय बढ़ाने पर काम किया जाएगा। साथ ही तीनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग भी मजबूत किया जाएगा। समझौते के तहत सैन्य मदद कितनी तय है विश्लेषकों के मुताबिक, तीनों देशों ने क्षेत्रीय विरोधियों को नाराज करने से बचने की कोशिश की है। यह अभी साफ नहीं है कि समझौता अपने किसी सदस्य पर हमला होने पर बाकी सदस्यों को उसकी रक्षा के लिए कितना मजबूर करेगा। किलोवेन ग्रुप सलाहकार कंपनी के चेयरमैन हार्लन उलमैन ने अल जजीरा से कहा, “हमने अभी मक्का घोषणा नहीं देखी है। हमारा मानना है कि इसमें कहा गया है कि एक पर हमला सभी पर हमला माना जाना चाहिए। यहां ‘माना जाना चाहिए’ महत्वपूर्ण शब्द हैं, क्योंकि इसका मतलब ‘जरूरी तौर पर’ नहीं है।” क्षेत्रीय खतरे इन देशों से दूर नहीं हैं। पाकिस्तान फरवरी से अफगानिस्तान के साथ सीमा संघर्ष में उलझा हुआ है। मई 2025 में उसका परमाणु शक्ति संपन्न भारत के साथ भी कई दिनों तक गोलीबारी का आदान-प्रदान हुआ था। सऊदी अरब पर फरवरी के अंत में ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजराइल युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान और उसके सहयोगी बार-बार हमले कर चुके हैं। तुर्किये कई साल से देश के अंदर और बाहर कुर्द सशस्त्र समूहों से लड़ता रहा है। इजराइल के साथ उसका तनाव भी बढ़ा है। उलमैन जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि अभी यह साफ नहीं है कि मक्का संयुक्त रक्षा समझौता तीनों देशों को इनमें से किसी संघर्ष में कैसे खींच सकता है। उलमैन ने कहा, “मान लीजिए यमन में हूती सऊदी अरब पर हमला करते हैं, तो क्या इससे तुर्किये इसमें शामिल होगा? क्या पाकिस्तान शामिल होगा? यह अभी देखा जाना बाकी है।” मध्य पूर्व में बदलते समीकरण मध्य पूर्व में पिछले कुछ सालों में काफी उथल-पुथल हुई है। इसमें सबसे अहम घटनाएं 7 अक्टूबर 2023 को हमास का इजराइल पर हमला और उसके बाद गाजा में इजराइल का नरसंहार हैं। ईरान और इजराइल के बीच दशकों से चल रही धमकियां भी ऐसे क्षेत्रीय युद्ध में बदल गई हैं, जो अभी खत्म नहीं हुआ है। अब मध्य पूर्व और उसके बाहर के कई देश इस अव्यवस्था से निपटने और अगले दौर की तैयारी का तरीका तलाश रहे हैं। इनमें से कई देश पुराने मतभेद पीछे छोड़कर आपसी खतरों के सामने व्यावहारिक रास्ता अपनाने का फैसला करते दिख रहे हैं। तुर्किये और सऊदी अरब इसके उदाहरण हैं। 2018 में सऊदी पत्रकार जमाल खशोगी की अपने देश के इस्तांबुल वाणिज्य दूतावास में हत्या के बाद दोनों देशों के रिश्तों में गहरी दरार आ गई थी। यह तनाव कई साल तक बना रहा। लेकिन 2022 तक रियाद और अंकारा ने पुराने मतभेद पीछे रखने शुरू कर दिए। सऊदी अरब पूरे क्षेत्र में तनाव कम करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा था, जबकि तुर्किये अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करना चाहता था। इसके बाद से इजराइल और ईरान ने मध्य पूर्व पर दबाव बनाया है और इस क्षेत्र के लिए अलग-अलग योजनाओं पर आगे बढ़े हैं। माना जाता है कि इसी दबाव ने पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये को एक-दूसरे के करीब आने में मदद की है। तीनों देशों की अलग-अलग ताकत मक्का संयुक्त रक्षा समझौते का मकसद तीनों देशों के सामने आने वाले किसी भी खतरे को रोकना है। अल जजीरा के संवाददाता उसामा बिन जावेद ने कहा कि तीनों देश इस समझौते में अलग-अलग ताकत लेकर आए हैं। बिन जावेद ने कहा, “इनमें से हर देश अपनी खास क्षमता लेकर आया है। पाकिस्तान के पास युद्ध का अनुभव रखने वाली सेना, हथियार और परमाणु हथियार हैं। मुस्लिम बहुल देश में परमाणु हथियार रखने वाला यह इकलौता देश है।” उन्होंने कहा, “नाटो के महत्वपूर्ण सदस्य तुर्किये के पास दुनिया की बेहतरीन ड्रोन तकनीक और उन्नत रक्षा निर्माण क्षमता है। सऊदी अरब इन सबको आर्थिक ताकत देने का काम करेगा।” अमेरिका को लेकर उठ रहे सवालों के बीच नए सैन्य गठबंधनों और खतरों से बचाव के नए तरीकों की जरूरत और ज्यादा महसूस की जा रही है। सऊदी अरब और कुछ हद तक तुर्किये लंबे समय से अमेरिका को अपना प्रमुख सुरक्षा सहयोगी मानते रहे हैं। लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की विदेश नीति लगातार बदलती और अनिश्चित होती जा रही है। ऐसे में दुनिया के कई देश दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि मध्य पूर्व में इजराइल अमेरिका की विदेश नीति की सबसे बड़ी प्राथमिकता दिखाई देता है। इससे यह चिंता बढ़ी है कि अमेरिका अपने दूसरे सहयोगियों की रक्षा करने के लिए कितना तैयार होगा। उलमैन ने कहा, “ट्रंप प्रशासन ने कहा है कि सहयोगियों को अपनी रक्षा खुद करनी होगी। मेरे लिए यह साफ है कि हमारे सहयोगी दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं।” इजराइल और ईरान को लेकर सावधानी इजराइल और ईरान ने खुद को क्षेत्रीय खतरे के रूप में दिखाया है। फिर भी मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में शामिल देशों ने यह बताने से सावधानी बरती है कि यह गठबंधन किसी बाहरी ताकत के खिलाफ है। विशेषज्ञों का कहना है कि इजराइल और ईरान से पैदा होने वाले खतरे साफ हैं। बिन जावेद ने कहा, “तीनों देशों के लिए इजराइल क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता का सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है।” उन्होंने कहा, “ईरान इस खतरे की सूची में उसके ठीक बाद आता है। खासकर ईरान की ओर से वॉशिंगटन के हितों पर हमलों के बाद सऊदी अरब के लिए यह खतरा और ज्यादा है।” क्षेत्र के कई लोगों का मानना है कि इजराइल ने 2023 के बाद यह दिखाया है कि वह मतभेदों को बातचीत से सुलझाने के बजाय सैन्य ताकत से सुलझाने में ज्यादा रुचि रखता है। इससे पहले इजराइल ने सऊदी अरब के साथ रिश्ते सामान्य करने की कोशिश की थी। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने उभरते हुए “सुन्नी गठबंधन” के खतरों की बात भी शुरू की है। हालांकि, उन्होंने यह साफ नहीं किया है कि उनका मतलब किस गठबंधन से है। विशेषज्ञों का कहना है कि नेतन्याहू के बयान ऐसी स्थिति पैदा कर सकते हैं, जिसमें सुन्नी बहुल ताकतें वास्तव में एक साथ आ जाएं। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये तीनों देशों में सुन्नी बहुसंख्यक हैं। ईरान पहले ही सऊदी अरब पर हमला कर चुका है। ईरान समर्थित दूसरे समूह भी सऊदी अरब पर हमले कर चुके हैं। इसके जवाब में सऊदी अरब ने इराक में ईरान समर्थित समूहों पर हमले किए हैं। क्या गठबंधन में नए देश जुड़ेंगे यह अभी साफ नहीं है कि मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में मिस्र, कतर, सीरिया और संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई जैसे दूसरे देश भी शामिल होंगे या नहीं। ऐसे गठबंधन के फायदे समझ में आते हैं। मध्य पूर्व के सुन्नी बहुल देश अक्सर अलग-अलग रहे हैं। कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसी वजह से वे इजराइल और ईरान से पैदा होने वाले खतरों से निपट नहीं पाए हैं। हालांकि, पुराने मतभेद और अलग-अलग हित इस गठबंधन के विस्तार को तय नहीं मानने की वजह देते हैं। सीरिया इस समय 13 साल चले भीषण संघर्ष के बाद युद्ध के बाद पुनर्निर्माण पर ध्यान दे रहा है। इजराइल की उत्तरी सीमा पर उसकी स्थिति ऐसी है कि वह ऐसे समझौते में शामिल होने से हिचक सकता है, जिसे इजराइल नकारात्मक नजर से देखे। मिस्र ने भी साफ संकेत दिए हैं कि उसका ध्यान अर्थव्यवस्था पर है और वह देश के अंदर किसी उथल-पुथल से बचना चाहता है। अतीत में वह क्षेत्र में जहाजों के रास्तों की सुरक्षा के लिए सऊदी अरब की अगुआई वाले समुद्री गठबंधन में शामिल होने से हिचक चुका है। मिस्र को डर था कि वह क्षेत्रीय संघर्ष में खिंच सकता है। यूएई भी सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के गठबंधन में संभावित सदस्य हो सकता है। लेकिन हाल के सालों में यूएई के रुख कई बार इन देशों से अलग रहे हैं। यमन और इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने जैसे मुद्दों पर यह अंतर सबसे ज्यादा दिखाई दिया है। अमेरिका के समर्थन से हुए अब्राहम समझौते इजराइल के साथ ज्यादा करीबी रखने वाले एक दूसरे क्षेत्रीय समूह को सामने लाते हैं। इसे मक्का गठबंधन में शामिल देशों के प्रतिद्वंद्वी समूह के रूप में देखा जा सकता है। गठबंधन की असली परीक्षा कब होगी मध्य पूर्व के रिश्तों की जटिलता शुक्रवार को हुए समझौते के बाद नए क्षेत्रीय समीकरण के उभरने वाली किसी भी धारणा की मुश्किलें दिखाती है। इस क्षेत्र में गठबंधन दशकों से बदलते रहे हैं। आगे भी इनमें बदलाव हो सकते हैं। इस गठबंधन का असली आकलन तब होगा, जब इसकी वास्तविक परीक्षा होगी। इजराइल और ईरान ने दिखाया है कि वे युद्ध करने और उसके नतीजे झेलने के लिए तैयार हैं। अब सवाल यह है कि क्या सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान एक-दूसरे के लिए ऐसा करने को तैयार हैं। आज के मध्य पूर्व में ऐसी स्थिति बन सकती है, जो उन्हें यह फैसला लेने के लिए मजबूर करे। आखिरकार, उनके फैसले ही साफ करेंगे कि क्या वास्तव में एक तीसरा क्षेत्रीय ध्रुव उभर रहा है।

अरुणाचल की 27 जगहों को मैप पर अलग से दिखाया:राज्य से सलाह के बाद फैसला; चीन ने कई बार भारतीय सीमा वाले इलाकों के नाम बदले

भारत सरकार ने शुक्रवार को अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और भौगोलिक विशेषताओं को सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक नक्शे पर दर्ज किया। यह कदम चीन की ओर से सीमावर्ती राज्य की जगहों के नाम बदलने की कोशिशों के बीच उठाया गया है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, यह काम अरुणाचल प्रदेश सरकार से सलाह लेकर किया गया है। इसका मकसद इन जगहों की सही पहचान सुनिश्चित करना और आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। मंत्रालय ने बयान में कहा, “भारत सरकार ने अरुणाचल प्रदेश की राज्य सरकार से सलाह लेकर राज्य में स्थित कुल 27 जगहों और भौगोलिक विशेषताओं को सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक नक्शे पर उनके मानक नामों के साथ दर्ज किया है।” बयान में कहा गया कि इन जगहों को आधिकारिक नक्शे पर दर्ज करने का उद्देश्य उनकी सटीक पहचान आसान बनाना और आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। चीन अरुणाचल की जगहों के नाम जारी करता रहा है चीन समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश की जगहों के लिए नामों की सूची जारी करता रहा है। वह अरुणाचल प्रदेश को जांगनान कहता है। भारत ने चीन की इन कोशिशों को लगातार खारिज किया है। भारत का कहना है कि इनका भारत की राज्य पर संप्रभुता पर कोई असर नहीं पड़ता। लॉन्गजू में 1959 में चीनी सेना पहुंची थी सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे पर औपचारिक रूप से दर्ज जगहों में वास्तविक नियंत्रण रेखा(LAC) के पास स्थित लॉन्गजू भी शामिल है। 1959 में चीनी सेना के इस इलाके में घुसने के बाद लॉन्गजू भारत-चीन सीमा तनाव के शुरुआती केंद्रों में से एक बना था। अपर सुबनसिरी जिले का पास का माजा गांव भी इन जगहों में शामिल है। जयरामपुर सुरक्षा बलों के लिए लॉजिस्टिक्स हब चांगलांग जिले का जयरामपुर भी पहचानी गई जगहों में शामिल है। यह एक महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक्स हब है, जो पूर्वी अरुणाचल प्रदेश और म्यांमार सीमा की ओर सुरक्षा बलों की आवाजाही में मदद करता है।

अरुणाचल की 27 जगहों को मैप पर अलग से दिखाया:राज्य से सलाह के बाद फैसला; चीन ने कई बार भारतीय सीमा वाले इलाकों के नाम बदले

भारत सरकार ने शुक्रवार को अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और भौगोलिक विशेषताओं को सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक नक्शे पर दर्ज किया। यह कदम चीन की ओर से सीमावर्ती राज्य की जगहों के नाम बदलने की कोशिशों के बीच उठाया गया है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, यह काम अरुणाचल प्रदेश सरकार से सलाह लेकर किया गया है। इसका मकसद इन जगहों की सही पहचान सुनिश्चित करना और आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। मंत्रालय ने बयान में कहा, “भारत सरकार ने अरुणाचल प्रदेश की राज्य सरकार से सलाह लेकर राज्य में स्थित कुल 27 जगहों और भौगोलिक विशेषताओं को सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक नक्शे पर उनके मानक नामों के साथ दर्ज किया है।” बयान में कहा गया कि इन जगहों को आधिकारिक नक्शे पर दर्ज करने का उद्देश्य उनकी सटीक पहचान आसान बनाना और आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। चीन अरुणाचल की जगहों के नाम जारी करता रहा है चीन समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश की जगहों के लिए नामों की सूची जारी करता रहा है। वह अरुणाचल प्रदेश को जांगनान कहता है। भारत ने चीन की इन कोशिशों को लगातार खारिज किया है। भारत का कहना है कि इनका भारत की राज्य पर संप्रभुता पर कोई असर नहीं पड़ता। लॉन्गजू में 1959 में चीनी सेना पहुंची थी सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे पर औपचारिक रूप से दर्ज जगहों में वास्तविक नियंत्रण रेखा(LAC) के पास स्थित लॉन्गजू भी शामिल है। 1959 में चीनी सेना के इस इलाके में घुसने के बाद लॉन्गजू भारत-चीन सीमा तनाव के शुरुआती केंद्रों में से एक बना था। अपर सुबनसिरी जिले का पास का माजा गांव भी इन जगहों में शामिल है। जयरामपुर सुरक्षा बलों के लिए लॉजिस्टिक्स हब चांगलांग जिले का जयरामपुर भी पहचानी गई जगहों में शामिल है। यह एक महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक्स हब है, जो पूर्वी अरुणाचल प्रदेश और म्यांमार सीमा की ओर सुरक्षा बलों की आवाजाही में मदद करता है।

भारत पर 100% टैरिफ वाला बिल अमेरिकी सीनेट में पास:रूसी तेल खरीदने वाले 5 देशों पर कार्रवाई; 86 सांसदों ने पक्ष में वोट किया, 11 विरोध में

अमेरिकी सीनेट ने 86-11 के बहुमत से भारत समेत 5 देशों पर 100% तक का टैरिफ लगाने वाला बिल पास कर दिया है। बिल के मुताबिक भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर 100% टैरिफ लगाया जा सकता है। यह बिल रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों के समर्थन से लाया गया। इसका मकसद रूस की तेल से होने वाली कमाई को कम करना है, ताकि उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता कमजोर हो सके। 23 जुलाई को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया था। इसके तहत रूस के अधिकारियों, शैडो टैंकर बेड़े, केंद्रीय बैंक और सरकारी ऊर्जा परियोजनाओं पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। बिल के शुरुआती मसौदे में 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 100% कर दिया गया। हालांकि, अभी ये कानून नहीं बना है। अभी इसे अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भेजा जाएगा। अगर वहां भी बिल पास हो जाता है, तो इसे राष्ट्रपति ट्रम्प के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। उनकी मंजूरी मिलने के बाद ही यह कानून बनेगा। ईरान के साथ ट्रेड करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध बढ़ेगा अगर यह कानून बन जाता है तो 1996 का ‘ईरान प्रतिबंध कानून’ 2031 तक बढ़ जाएगा। यह कानून उन गैर-अमेरिकी कंपनियों पर पाबंदी लगाता है जो ईरान के साथ व्यापार करती हैं। यह कानून इसी साल खत्म होने वाला था। इस बिल से अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार भी मिल जाएगा कि वे अमेरिका में आने वाले रूसी सामान पर 500% तक टैरिफ लगा सकें। राष्ट्रपति का यह अधिकार 5 साल तक लागू रहेगा। व्हाइट हाउस ने पहले भी रूस पर पाबंदियां लगाने की कोशिश की थी। लेकिन ईरान युद्ध के दौरान जब होर्मुज बंद हुआ, तो तेल का संकट आ गया। इस वजह से अमेरिकी प्रशासन को तेल की बिक्री पर कुछ समय के लिए छूट देनी पड़ी थी। भारत ने जून में आधे से ज्यादा तेल रूस से खरीदा भारत ने जून 2026 में रूस से रिकॉर्ड 26.1 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा, जो देश के कुल तेल आयात का 52.4% था। यानी पिछले महीने भारत में आयात होने वाले हर दो बैरल तेल में एक से ज्यादा बैरल रूस से आया। रूस लगातार भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है। मई के मुकाबले जून में रूस से तेल आयात में करीब 39% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यूरोपीय देशों को टैरिफ में राहत देगा अमेरिका रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले चीन, फ्रांस, जापान, हंगरी और बेल्जियम को भी इसके दायरे में रखा गया है। हालांकि, जो देश रूस की कुल गैस निर्यात का 15% से कम आयात करते हैं और अपनी निर्भरता घटाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उन्हें छूट मिल सकती है। सीनेट में पेश बिल के तहत 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित 100% टैरिफ से छूट दी गई है। इन देशों को राहत इसलिए दी गई है, क्योंकि ये रूस से 15% से कम प्राकृतिक गैस खरीदते हैं और धीरे-धीरे उस पर अपनी निर्भरता भी कम कर रहे हैं। डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि यह बिल यूरोपीय सहयोगियों के खिलाफ नहीं है। इसका निशाना सिर्फ वे देश हैं, जो अब भी रूस के तेल कारोबार को सबसे ज्यादा आर्थिक सहारा दे रहे हैं। बिल में रूस के ऊर्जा उद्योग, वित्तीय संस्थानों, रक्षा औद्योगिक ढांचे, कारोबारियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। —————————– ये खबर भी पढ़ें… UK की व्हिस्की, कारें और ब्यूटी प्रोडक्ट्स सस्ते मिलेंगे:भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट आज से लागू, जानें किन चीजों के दाम बदलेंगे भारत में UK की कारें, व्हिस्की, कपड़े और फुटवियर आज से सस्ते मिलेंगे। आज से भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट लागू हो गया है। यानी अब भारत के 99% सामानों को UK में जीरो टैरिफ पर निर्यात किया जाएगा। वहीं UK के 99% सामान 3% एवरेज टैरिफ पर आयात होंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

जापान में 200kmph की रफ्तार से बढ़ रहा डॉल्फिन तूफान:2.6 लाख लोगों को घर छोड़ने का आदेश; टोयोटा ने 9 फैक्ट्रियों में काम रोका

जापान की ओर करीब 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से डॉल्फिन तूफान बढ़ रहा है। इसकी वजह से 2.6 लाख लोगों को घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने के आदेश दिए गए हैं। जबकि 500 से ज्यादा उड़ानें रद्द कर दी गई हैं। हालात को देखते हुए टोयोटा ने भी अपनी 9 फैक्ट्रियों में काम रोक दिया है। जापान मौसम विज्ञान एजेंसी (JMA) के मुताबिक, डॉल्फिन कैटेगरी-1 का तूफान है। इसकी लगातार हवा की रफ्तार 144 किमी प्रति घंटा और झोंकों की रफ्तार 198 किमी प्रति घंटा तक पहुंच रही है। यह तूफान क्यूशू और ओकिनावा के बीच स्थित द्वीपों की ओर बढ़ रहा है। ओकिनावा द्वीप पर सबसे ज्यादा असर तूफान की वजह से जापान का ओकिनावा द्वीप बुरी तरह प्रभावित हुआ है। वहां छुट्टियां मनाने गए कई हांगकांग के पर्यटक उड़ानें रद्द होने के कारण फंस गए हैं। उन्हें अब जरूरी सामान की कमी, बिजली कटने और पानी की सप्लाई बाधित होने की आशंका का सामना करना पड़ रहा है। हांगकांग से जुड़े ट्रैवल सोशल मीडिया अकाउंट्स पर साझा की गई तस्वीरों में सुपरमार्केट की ब्रेड की अलमारियां खाली दिखाई दे रही हैं। वहीं, कई इलाकों में मूसलाधार बारिश और तेज हवाएं चल रही हैं। रविवार को चीन पहुंच सकता है तूफान डॉल्फिन तूफान तेजी से चीन के पूर्वी तट की ओर बढ़ रहा है। चीन के मौसम विभाग के मुताबिक, शुक्रवार तक यह तूफान तट से करीब 820 किलोमीटर दूर था। इसके रविवार दोपहर से सोमवार सुबह के बीच झेजियांग और उत्तरी फुजियान के बीच कहीं टकराने की आशंका है। मौसम विभाग ने येलो अलर्ट जारी रखा है, जो चार स्तरों वाली चेतावनी प्रणाली में तीसरा सबसे गंभीर स्तर है। झेजियांग, फुजियान और ताइवान में तेज हवाओं और भारी बारिश की चेतावनी दी गई है। मौसम वैज्ञानिक शेन यूयांग के मुताबिक, शुक्रवार सुबह तक इस तूफान का दायरा झेजियांग प्रांत से करीब 13 गुना बड़ा हो चुका था। झेजियांग का आकार भारत के बिहार राज्य के बराबर है। मौसम विभाग ने कहा कि तूफान का दायरा बहुत बड़ा है, इसलिए सिर्फ तटीय नहीं बल्कि अंदरूनी इलाकों के लोगों को भी सतर्क रहने की जरूरत है। चीन में AI और ड्रोन की मदद से बचाव कार्य फिलहाल यह साफ नहीं है कि चीन में टकराने के बाद यह किस दिशा में जाएगा। तूफान के 48 घंटे के अलर्ट जोन में पहुंचने के बाद चीन ने तैयारियां और तेज कर दी हैं। सरकारी टीवी सीसीटीवी के मुताबिक, नेशनल मरीन एनवायरनमेंटल फोरकास्टिंग सेंटर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम तैयार किया है, जो अगले 240 घंटे (10 दिन) तक तूफान की दिशा, ताकत और कहां टकराएगा, इसका अनुमान लगा सकता है। इसके साथ ही ड्रोन और अन्य आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है।

जापान में 200kmph की रफ्तार से बढ़ रहा डॉल्फिन तूफान:2.6 लाख लोगों को घर छोड़ने का आदेश; टोयोटा ने 9 फैक्ट्रियों में काम रोका

जापान की ओर करीब 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से डॉल्फिन तूफान बढ़ रहा है। इसकी वजह से 2.6 लाख लोगों को घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने के आदेश दिए गए हैं। जबकि 500 से ज्यादा उड़ानें रद्द कर दी गई हैं। हालात को देखते हुए टोयोटा ने भी अपनी 9 फैक्ट्रियों में काम रोक दिया है। जापान मौसम विज्ञान एजेंसी (JMA) के मुताबिक, डॉल्फिन कैटेगरी-1 का तूफान है। इसकी लगातार हवा की रफ्तार 144 किमी प्रति घंटा और झोंकों की रफ्तार 198 किमी प्रति घंटा तक पहुंच रही है। यह तूफान क्यूशू और ओकिनावा के बीच स्थित द्वीपों की ओर बढ़ रहा है। ओकिनावा द्वीप पर सबसे ज्यादा असर तूफान की वजह से जापान का ओकिनावा द्वीप बुरी तरह प्रभावित हुआ है। वहां छुट्टियां मनाने गए कई हांगकांग के पर्यटक उड़ानें रद्द होने के कारण फंस गए हैं। उन्हें अब जरूरी सामान की कमी, बिजली कटने और पानी की सप्लाई बाधित होने की आशंका का सामना करना पड़ रहा है। हांगकांग से जुड़े ट्रैवल सोशल मीडिया अकाउंट्स पर साझा की गई तस्वीरों में सुपरमार्केट की ब्रेड की अलमारियां खाली दिखाई दे रही हैं। वहीं, कई इलाकों में मूसलाधार बारिश और तेज हवाएं चल रही हैं। रविवार को चीन पहुंच सकता है तूफान डॉल्फिन तूफान तेजी से चीन के पूर्वी तट की ओर बढ़ रहा है। चीन के मौसम विभाग के मुताबिक, शुक्रवार तक यह तूफान तट से करीब 820 किलोमीटर दूर था। इसके रविवार दोपहर से सोमवार सुबह के बीच झेजियांग और उत्तरी फुजियान के बीच कहीं टकराने की आशंका है। मौसम विभाग ने येलो अलर्ट जारी रखा है, जो चार स्तरों वाली चेतावनी प्रणाली में तीसरा सबसे गंभीर स्तर है। झेजियांग, फुजियान और ताइवान में तेज हवाओं और भारी बारिश की चेतावनी दी गई है। मौसम वैज्ञानिक शेन यूयांग के मुताबिक, शुक्रवार सुबह तक इस तूफान का दायरा झेजियांग प्रांत से करीब 13 गुना बड़ा हो चुका था। झेजियांग का आकार भारत के बिहार राज्य के बराबर है। मौसम विभाग ने कहा कि तूफान का दायरा बहुत बड़ा है, इसलिए सिर्फ तटीय नहीं बल्कि अंदरूनी इलाकों के लोगों को भी सतर्क रहने की जरूरत है। चीन में AI और ड्रोन की मदद से बचाव कार्य फिलहाल यह साफ नहीं है कि चीन में टकराने के बाद यह किस दिशा में जाएगा। तूफान के 48 घंटे के अलर्ट जोन में पहुंचने के बाद चीन ने तैयारियां और तेज कर दी हैं। सरकारी टीवी सीसीटीवी के मुताबिक, नेशनल मरीन एनवायरनमेंटल फोरकास्टिंग सेंटर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम तैयार किया है, जो अगले 240 घंटे (10 दिन) तक तूफान की दिशा, ताकत और कहां टकराएगा, इसका अनुमान लगा सकता है। इसके साथ ही ड्रोन और अन्य आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। जापान और चीन में बार-बार टाइफून क्यों आते हैं? 1. भूमध्य रेखा के पास और उत्तर में स्थित होना पश्चिमी प्रशांत महासागर में हर साल सबसे ज्यादा 25 से 30 तूफान आते हैं। यह दुनिया भर में आने वाले कुल तूफानों का लगभग 30% है। इसकी वजह इस इलाके का भूमध्य रेखा के पास (उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में) स्थित होना है। पृथ्वी के घूमने के कारण यहां हवाओं को गोल घुमाने वाला बल (कोरियोलिस इफेक्ट) बहुत मजबूत होता है। तूफान बनने के बाद ये हवाओं के बहाव के साथ जापान, ताइवान, चीन, कोरिया और फिलीपींस की तरफ बढ़ते हैं। यही वजह है कि इन देशों में सबसे ज्यादा तूफान आते हैं। 2. समुद्र का तेजी से गर्म होना टाइफून बनने और मजबूत होने की सबसे बड़ी वजह गर्म समुद्र है। जब समुद्र की सतह का तापमान बढ़ता है, तो पानी तेजी से भाप बनकर ऊपर उठता है। यह भाप तूफान के लिए ईंधन का काम करती है, जिससे हवाएं और बारिश दोनों बेहद तेज हो जाती हैं। 1901 में दुनिया भर के महासागरों की सतह का औसत तापमान लगभग 15.2°C से 15.3°C था। बीते कुछ साल में यह औसतन वैश्विक समुद्र सतह तापमान 21.1°C को पार कर गया है, जो इतिहास में सबसे ज्यादा है।

थाईलैंड के स्कूल में छात्र ने फायरिंग की:6 लोगों की मौत, कई घायल; हमलावर छात्र अस्पताल में भर्ती

थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक के पास एक हाई स्कूल में शुक्रवार को एक छात्र ने अचानक गोलियां चला दीं। फायरिंग में 3 टीचर और 3 छात्रों की मौत हो गई, जबकि 15 लोग घायल हैं। इनमें दो की हालत गंभीर बताई जा रही है। पुलिस के मुताबिक, घटना नोंथाबुरी प्रांत के डेबसिरिन नोंथाबुरी स्कूल में हुई। फायरिंग करने वाले छात्र को भी गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है। शुरुआती जांच में पता चला है कि छात्र ने जिस बंदूक से फायरिंग की, वह उसके परिवार के किसी सदस्य की थी। उसने हमला क्यों किया, पुलिस अभी इसकी जांच कर रही है। गोलियां चलते ही क्लासरूम में छिप गए छात्र प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि जैसे ही गोलियों की आवाज आई, छात्र अपनी जान बचाने के लिए क्लासरूम में छिप गए। कुछ देर बाद पुलिस ने दरवाजा खटखटाकर उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला। घटना के बाद स्कूल में अफरा-तफरी मच गई और बाहर मौजूद लोग एक-दूसरे को संभालते नजर आए। थाईलैंड में पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं थाईलैंड में स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर फायरिंग की घटनाएं पहले भी सामने आई हैं। इसी साल फरवरी में दक्षिणी थाईलैंड के एक पब्लिक हाई स्कूल में 17 साल के एक छात्र ने पुलिस से बंदूक चुराकर फायरिंग की थी। उस दो घंटे के हमले में एक व्यक्ति की मौत हुई थी और दो लोग घायल हुए थे। वहीं, 2023 में बैंकॉक के एक बड़े शॉपिंग मॉल में 14 साल के लड़के पर फायरिंग करने का आरोप लगा था।

अमेरिका परमाणु नीति बदल रहा:न्यूक्लियर वेपन सिर्फ डराने के लिए नहीं, रूस-चीन से जंग हुई तो छोटे एटम बम इस्तेमाल होंगे

अमेरिका चीन और रूस से बढ़ते तनाव को देखते हुए अपनी परमाणु नीति बदलने की तैयारी कर रहा है। NBC न्यूज के मुताबिक, पेंटागन ऐसी रणनीति बना रहा है, जिसमें बड़े परमाणु हथियारों के साथ छोटे एटम बम (टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार) भी इस्तेमाल का विकल्प होंगे। जरूरत पड़ने पर इनका इस्तेमाल दुश्मन के सैन्य ठिकानों या सीमित युद्ध में किया जा सकेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, इस नई नीति पर पेंटागन के नीति प्रमुख एल्ब्रिज कोल्बी काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि अभी राष्ट्रपति के पास या तो बड़े परमाणु हमले का विकल्प है या फिर कोई जवाबी कार्रवाई नहीं करने का। नई रणनीति में बीच का रास्ता निकाला जा रहा है, ताकि जरूरत पड़ने पर छोटे परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर दुश्मन को रोका जा सके। अमेरिका नीति क्यों बदल रहा है? अमेरिका का मानना है कि अगर भविष्य में चीन या रूस से टकराव हुआ, तो राष्ट्रपति के पास सिर्फ बड़े परमाणु हमले का ही नहीं, छोटे एटम बम इस्तेमाल करने का भी विकल्प होना चाहिए। इससे दुश्मन पर दबाव बनाया जा सकेगा और अमेरिका के सहयोगी देशों की सुरक्षा भी मजबूत होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर छोटे एटम बम सैन्य योजना का हिस्सा बन गए, तो उनके इस्तेमाल की आशंका भी बढ़ जाएगी। इससे कोई भी सामान्य युद्ध परमाणु युद्ध में बदल सकता है। टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार क्या हैं? टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार कम क्षमता वाले परमाणु हथियार होते हैं। इन्हें पूरे शहर को तबाह करने के बजाय युद्ध के मैदान में दुश्मन के सैन्य ठिकानों, एयरबेस, मिसाइल लॉन्च साइट, टैंक फॉर्मेशन या सैनिकों की तैनाती जैसे सीमित लक्ष्यों पर इस्तेमाल करने के लिए बनाया जाता है। 1945 के बाद परमाणु हथियारों का इस्तेमाल क्यों नहीं हुआ? द्वितीय विश्व युद्ध में अगस्त 1945 में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए थे। इसके बाद दुनिया ने परमाणु हथियारों की विनाशकारी क्षमता देखी। तभी से बड़ी परमाणु शक्तियों ने इन्हें युद्ध में चलाने के बजाय ‘न्यूक्लियर डिटरेंस’ (परमाणु प्रतिरोध) के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया। न्यूक्लियर डिटरेंस क्या है? इस रणनीति का मतलब है कि अगर कोई देश परमाणु हमला करेगा, तो जवाब में उसे भी उतना ही विनाशकारी परमाणु हमला झेलना पड़ेगा। यानी दोनों पक्षों को अस्वीकार्य नुकसान होगा। इसी डर ने अमेरिका, रूस समेत परमाणु शक्तियों को 1945 के बाद युद्ध में परमाणु हथियार इस्तेमाल करने से रोके रखा है।