
-विवेक कुमार
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के क्षेत्र में दुनिया की दो सबसे बड़ी शक्तियां अमेरिका और चीन अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र बनाने में जुटी हैं। इसलिए दुनिया के कई देश ऐसी रणनीति अपनाने की कोशिश कर रहे हैं जिससे वे दोनों पक्षों की ताकतों का लाभ उठा सकें और तकनीकी प्रतिस्पर्धा में पीछे न रह जाएं। ALSO READ: सदियों पहले छोटी नावों में सात हजार किलोमीटर का सफर करने वाले लोग
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे अमेरिका और चीन के बीच एआई प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, वैसे-वैसे अन्य देशों के लिए दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता जा सकता है। भविष्य में कई देशों को अमेरिकी नेतृत्व वाले “पैक्स सिलिका” और चीन समर्थित “वर्ल्ड एआई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन” के बीच चुनाव करना पड़ सकता है।
यह स्थिति कई देशों के सामने दुविधा पैदा कर रही है। एक ओर अमेरिका के पास दुनिया की सबसे उन्नत चिप तकनीक और एआई सिस्टम्स हैं, जबकि दूसरी ओर चीन अपेक्षाकृत सस्ते और ओपन-सोर्स एआई मॉडल उपलब्ध करा रहा है।
दोनों से दोस्ती, दोनों से लाभ
मध्य एशियाई देश कजाखस्तान इस संतुलन का एक प्रमुख उदाहरण बनकर उभरा है। लगभग 2.1 करोड़ की आबादी वाले कजाखस्तान ने दोनों पक्षों के साथ सहयोग बढ़ाने का प्रयास किया है।
जून में कजाखस्तान के एआई मंत्री जासलान मादियेव वॉशिंगटन गए थे, जहां उन्होंने एआई सप्लाई चेन को मजबूत करने पर काम कर रहे अमेरिकी समूह से मुलाकात की। इसके केवल तीन सप्ताह बाद वह शंघाई पहुंचे, जहां कजाखस्तान ने चीन की वैश्विक एआई पहल के संस्थापक सदस्यों में शामिल होने के समझौते पर हस्ताक्षर किए।
कजाखस्तान को उम्मीद है कि अमेरिकी पहल का हिस्सा बनने से उसे तकनीकी साझेदारियां, हाई टेक मैन्युफैक्चरिंग में रोजगार और वैश्विक एआई सप्लाई चेन में अहम जगह मिलेगी। वहीं चीन के नेतृत्व वाले संगठन में शामिल होकर वह क्षेत्रीय और वैश्विक एआई मानकों के निर्धारण की प्रक्रिया में भी अपनी भूमिका सुनिश्चित करना चाहता है।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय से जुड़ी रिसर्चर और पूर्व कजाख राजनयिक दाना मसालिमोवा का कहना है कि लगभग सभी देश फिलहाल संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। उनके अनुसार, कई देश इस प्रतिस्पर्धा को केवल दो विकल्पों तक सीमित नहीं देखना चाहते।
कजाखस्तान के पास एआई विकास के लिए जरूरी महत्वपूर्ण खनिज संसाधन हैं और वहां डेटा सेंटर चलाने के लिए अपेक्षाकृत सस्ती बिजली उपलब्ध है। इसी साल कजाखस्तान सरकार ने एनवीडिया से जुड़े 10 अरब डॉलर तक के निवेश समझौते पर दस्तखत किए, जिसके तहत देश में “डेटा सेंटर वैली” विकसित की जाएगी।
दूसरी ओर चीनी कंपनियां भी कजाखस्तान में निवेश बढ़ा रही हैं। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार 2025 में कजाखस्तान में चीन का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश रिकॉर्ड 2.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया। जुलाई में चीनी राष्ट्रपति शी चिनपिंग और कजाख राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट तोकायेव ने भी सहयोग विस्तार पर चर्चा की। ALSO READ: डोनाल्ड ट्रंप की ‘सुपर इंटेलिजेंस फोर्स’ क्या है
रणनीतिक हथियार बना एआई
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका और चीन दोनों एआई तक पहुंच को अपने वैश्विक प्रभाव बढ़ाने के साधन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि “जो एआई की दौड़ जीतेगा, वही विजेता होगा।”
अमेरिकी अधिकारियों और एआई कंपनियों का आरोप है कि चीन अमेरिकी अग्रणी एआई मॉडलों की क्षमताएं कम करने की कोशिश कर रहा है। चीन इन आरोपों को खारिज करता है। उसका कहना है कि अमेरिका एआई क्षेत्र में एकाधिकार स्थापित करना चाहता है और चीन की अत्याधुनिक चिप्स तक पहुंच सीमित कर रहा है।
अमेरिका ने संकेत दिया है कि पैक्स सिलिका केवल भरोसेमंद साझेदारों के लिए है। वहीं चीन अपनी एआई पहल को खुला और समावेशी मंच बताता है। वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास का कहना है कि एआई किसी एक या कुछ बड़े देशों की संपत्ति नहीं होना चाहिए।
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के शोधकर्ता काइल चान के कहते हैं कि चीन को अपने विकल्प के लिए नए साझेदारों की जरूरत है, जबकि अमेरिका के पास पहले से मजबूत सहयोगी नेटवर्क मौजूद है। इससे उन देशों का महत्व बढ़ जाता है जो दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने की क्षमता रखते हैं।
इंडोनेशिया भी ऐसी ही रणनीति अपना रहा है। निकेल और तांबे जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों से समृद्ध यह देश चीन के एआई संगठन में शामिल हो चुका है, लेकिन साथ ही अमेरिकी तकनीकी निवेश का भी लाभ लेना चाहता है। इंडोनेशियाई राष्ट्रीय आर्थिक परिषद की उपाध्यक्ष मारी पांगेस्टु ने कहा कि उनका देश दोनों व्यवस्थाओं का हिस्सा बनना और सबसे उपयुक्त मॉडल का चयन करना चाहता है।
सिंगापुर भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। अमेरिकी एआई कंपनी एंथ्रोपिक वहां अपना नया एशिया ऑफिस स्थापित कर रही है। सिंगापुर चीन के एआई संगठन में शामिल होने पर भी विचार कर रहा है।
सऊदी अरब ने सितंबर में एक ऐसे मंच की शुरुआत की जो एक चीनी एआई कंपनी के ओपन मॉडल पर आधारित है। साथ ही उसने एनवीडिया के साथ उन्नत एआई कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने के लिए समझौता भी किया है।
फ्रांस भी एआई क्षेत्र में अपेक्षाकृत स्वतंत्र रास्ता अपनाने की कोशिश कर रहा है। उसकी कंपनी मिस्ट्राल ने इस महीने एक नया मॉडल पेश किया है, जिसके बारे में कहा गया है कि वह कुछ उन्नत चीनी मॉडलों से बेहतर प्रदर्शन करता है।
जापान रणनीतिक और सुरक्षा मामलों में अमेरिका के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है, लेकिन वहां के विशेषज्ञों का मानना है कि कम जोखिम वाले कार्यों के लिए सस्ते चीनी एआई मॉडल पूरी तरह खारिज नहीं किए जाएंगे।
चीन और अमेरिका में होड़
विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों के सामने भी चुनौती है। उनके पास मजबूत अर्थव्यवस्थाएं और सैन्य क्षमता तो है, लेकिन अपने अत्याधुनिक एआई मॉडल नहीं हैं। ऐसे देशों की उन्नत एआई प्रणालियों तक पहुंच काफी हद तक वॉशिंगटन और बीजिंग की नीतियों पर निर्भर हो सकती है।
इस बीच चीन एआई और चिप निर्माण तकनीक में अमेरिका के साथ अंतर कम कर रहा है। हालांकि अभी भी वह कुछ प्रमुख अमेरिकी क्षमताओं से पीछे माना जाता है। चीन की ओपन-सोर्स रणनीति कई देशों को अमेरिकी तकनीक पर पूरी तरह निर्भर होने से बचाने का विकल्प भी उपलब्ध करा रही है।
विलियम एंड मैरी विश्वविद्यालय की एडडेटा रिसर्च लैब के अनुसार चीन अब तक कम और मध्यम आय वाले कम से कम 77 देशों में एआई से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए अनुदान और कर्ज उपलब्ध करा चुका है। इनमें नाइजीरिया, जाम्बिया, घाना, बांग्लादेश, सेनेगल, कैमरून और केन्या जैसे देश शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल अधिकांश देश किसी एक पक्ष को चुनना नहीं चाहते क्योंकि अमेरिकी और चीनी तकनीकी प्रणालियों दोनों के अपने-अपने फायदे और सीमाएं हैं। लेकिन वैश्विक एआई प्रतिस्पर्धा के तेज होने के साथ यह संतुलन बनाए रखना भविष्य में और कठिन हो सकता है।


