
बांग्लादेश के कपड़ा मिल मजदूरों के आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया। ढाका और आसपास के इलाकों में हालात इतने बिगड़े कि अर्धसैनिक बलों की तैनाती करनी पड़ी। देखते-देखते आंदोलन कई इलाकों में फैल गया। बांग्लादेश में करीब चार हजार पंजीकृत कपड़ा कारखानों में 40 लाख से भी ज्यादा कारीगर काम करते हैं। निर्यात से देश को होने वाली कुल आय में कपड़ा उद्योग का हिस्सा तकरीबन 80 फीसदी है। जाहिर है, इन्हीं कारीगरों की बदौलत मैनुफैक्चरिंग में बांग्लादेश की प्रगति की कहानी बनी है। इस बीच कम वेतन, बढ़ती महंगाई, परिवहन और स्वास्थ्य सुविधाओं पर बढ़े खर्च आदि के कारण उनका जीवन दूभर हो गया है। तो अब वे जीवन यापन के लायक वेतन की मांग कर रहे हैं। कपड़ा मजदूरों को हर महीने न्यूनतम 1,250 टका (101 अमेरिकी डॉलर) की मजदूरी मिलती है।
अब मजदूर इसे बढ़ा कर कम-से-कम 3,000 टका करने की मांग कर रहे हैं। जब वे यह मांग लेकर सड़कों पर उतरे, तो सत्ताधारी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कुछ नेताओं ने उन्हें राजनीति से प्रेरित बताया। कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के समर्थक उन्हें भड़का रहे हैं। कुछ अधिकारियों ने “विदेशी साजिश” की आशंका जताई, हालांकि ऐसे इल्जामों के पक्ष में कोई साक्ष्य पेश नहीं किए गए हैँ। सवा दो साल पहले शेख हसीना के खिलाफ जन विद्रोह भड़का था, तो उनकी सरकार ने भी ऐसे ही इल्जाम लगाए थे। उसके बाद देश भारी उथल-पुथल से गुजरा। अब लोकतंत्र की कथित बहाली हुई है। लोगों का “मताधिकार लौटा” है। लेकिन मेहनतकश आवाम के लिए बुनियादी सवाल जहां के तहां हैं। उन सवालों को देखने का सत्ता का नज़रिया जस का तस है। भारत में जिस समय “वोट चोरी” विपक्ष का बड़ा कथानक बना हुआ है और जब “रेज़ीम चेंज” (निज़ाम में बदलाव) की चर्चा के बीच बांग्लादेश का हवाला अक्सर आ जाता है, तब बांग्लादेश की कथा यह कोण भी गौरतलब होना चाहिए। क्या वोट के अधिकार की सुरक्षा का आजीविका एवं बेहतर जीवन स्तर के अधिकार की सुरक्षा से कोई संबंध है? इस बारे में विपक्ष की क्या सोच है, यह उसे स्पष्ट करना चाहिए।

