सावन मास पर एक भावपूर्ण और मौलिक हिंदी कविता

A beautiful photo for Shravan, the month dear to Lord Shiva


यह रही सावन मास पर एक भावपूर्ण और मौलिक हिंदी कविता:

 

सावन की सरगम

 

जब सावन की पहली बूंदें,

धरती का आंचल छू जाती हैं।

सूखी डालों पर हरियाली,

जीवन की धुन गुनगुनाती हैं।

 

काले-काले मेघ घिर आए,

रिमझिम वर्षा गीत सुनाए।

मोर पंख फैलाकर नाचे,

प्रकृति खुशियों के दीप जलाए।

 

शिवालय में गूंजे “हर-हर”,

बजे घंटियों की मधुर पुकार।

बेलपत्र, गंगाजल लेकर,

भक्त करें भोले का श्रृंगार।

 

सावन केवल ऋतु नहीं है,

श्रद्धा का यह पावन द्वार।

मन में प्रेम, हृदय में सेवा,

यही है इसका सच्चा सार।

 

झूले पड़ते पीपल डाली,

कजरी गाती हर इक नारी।

मिट्टी की सौंधी-सी खुशबू,

भर देती है दुनिया सारी।

 

हरियाली का संदेश लिए,

सावन खुशियों का उपहार।

प्रेम, दया, विश्वास जगाए,

जीवन हो उज्ज्वल हर बार।

 

आओ मिलकर प्रण यह लें हम,

पेड़ लगाएँ, प्रकृति सँवारें।

भोलेनाथ का नाम जपें हम,

प्रेम और सद्भाव निखारें।

 

सावन आया, सुख बरसाया,

मन-मंदिर में दीप जलाए।

हर घर में मंगल ही मंगल,

शिव कृपा से जीवन मुस्काए।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

सावन मास पर हिन्दी में बेहतरीन कविता

sawan maas par kavita

सावन के पावन महीने, शिव भक्ति और प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य को समेटती एक विशेष कविता जो सावन के दोनों रूपों को दर्शाती है-पहला, जब बारिश की बूंदें सूखी धरती को हरा-भरा कर देती हैं और चारों तरफ लोकगीतों की गूंज होती है; और दूसरा, जब कांवड़िए और शिवभक्त महादेव की आराधना में लीन होकर पूरे माहौल को आध्यात्मिक बना देते हैं।

 

रिमझिम बरसा सावन आया

लो रिमझिम बरसा सावन आया,

धरती पर हरी चुनरिया लाया।

तपती धूप का अंत हुआ अब,

अंबर ने ठंडी बूंदों को बरसाया।

 

बागों में देखो झूले सज गए,

कजरी और मल्हार के सुर जग गए।

मेहंदी रची हथेलियों ने शर्माकर,

खुशियों के नए गीत गुनगुनाया।

 

कंठ में विष, जटा में गंगा,

भोले की भक्ति में डूबा जग सारा।

कांवड़ियों ने थामी है राहें,

गूंज उठा 'बम-बम' का जयकारा।

 

पीपल चूमे बूंदों की बौछारें,

नदियां गातीं कल-कल के तराने।

प्रकृति का यह रूप सलोना,

हर मन को शिवमय करने आया।

 

लो रिमझिम बरसा सावन आया,

भक्ति और हरियाली का उत्सव लाया।

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Shravan Essay: आस्था, प्रकृति और पवित्रता का उत्सव श्रावण मास, पढ़ें रोचक निबंध

Images and photographs related to the sacred festival of the Shravan month, featuring Lord Shiva, devotees performing worship, and the Kanwar Yatra, a procession that unites religion, nature, and human life

Shravan Festival Essay: श्रावण मास के दौरान देशभर के शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान करके शिवलिंग पर जल, गंगाजल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, भांग और पुष्प अर्पित करते हैं। 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व माना जाता है। इस महीने के प्रत्येक सोमवार को पड़ने वाले सावन सोमवार व्रत को अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की उपासना करने से मनोकामनाओं की पूर्ति और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

यहां श्रावण मास पर एक रोचक, सरल और ज्ञानवर्धक हिन्दी निबंध प्रस्तुत है।
 

प्रस्तावना

हिंदू कैलेंडर में 'श्रावण मास' यानी सावन को सभी महीनों में सबसे पवित्र और आनंददायक माना गया है। यह केवल एक महीना नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आत्मा का उत्सव है। ग्रीष्म ऋतु की तपती गर्मी के बाद जब सावन की फुहारें धरती पर गिरती हैं, तो न केवल प्रकृति का श्रृंगार होता है, बल्कि इंसानी मन भी भक्ति और उत्साह से सराबोर हो उठता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो सावन में वर्षा ऋतु के कारण हमारी पाचन शक्ति यानी जठराग्नि मंद हो जाती है। इसलिए आयुर्वेद और शास्त्रों में इस महीने के दौरान हल्का, सुपाच्य और सात्विक भोजन करने की सलाह दी गई है।

 

सावन का धार्मिक महत्व और शिव भक्ति

श्रावण मास पूरी तरह से देवाधिदेव महादेव भगवान शिव को समर्पित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी महीने में समुद्र मंथन हुआ था। मंथन से निकले हलाहल विष को ब्रह्मांड की रक्षा के लिए भगवान शिव ने अपने कंठ में समाहित कर लिया था, जिससे उनका नाम 'नीलकंठ' पड़ा। विष की तीव्र जलन को शांत करने के लिए सभी देवताओं ने शिव जी पर शीतल जल वर्षण किया था। यही कारण है कि सावन में शिव जी का जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने की अनूठी परंपरा है।

 

प्रकृति का अनुपम श्रृंगार

सावन का महीना अध्यात्म के साथ-साथ पर्यावरण के उत्सव का भी समय है। रिमझिम बारिश के कारण सूखी धरती पर मखमली हरी घास उग आती है, पेड़ों पर नए पत्ते आ जाते हैं और नदियां-झरने कल-कल कर बहने लगते हैं।

 

कांवड़ यात्रा

सावन के दौरान देश भर में भक्ति का एक अद्भुत रंग देखने को मिलता है। लाखों 'कांवड़िए' केसरिया वस्त्र धारण कर, नंगे पैर पवित्र नदियों से जल भरकर लाते हैं और मीलों पैदल चलकर अपने स्थानीय शिवलिंगों का अभिषेक करते हैं। 'बम-बम भोले' के जयकारों से पूरा माहौल शिवमय हो जाता है।

 

सावन के सोमवार

इस महीने में आने वाले सोमवार के व्रत का विशेष महत्व है। कुमारी कन्याएं अच्छे वर के लिए और विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत रखती हैं। इस महीने में हरे रंग का विशेष महत्व है। प्रकृति की इस हरियाली से तालमेल बिठाते हुए महिलाएं हरे रंग के वस्त्र और चूड़ियां पहनती हैं। यह रंग समृद्धि, खुशहाली और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।

 

सावन के लोक-रंग और परंपराएं

सावन का महीना भारतीय लोक संस्कृति को जीवंत कर देता है। गांवों से लेकर शहरों तक, बागों में पेड़ों पर झूले डाल दिए जाते हैं। मल्हार और कजरी जैसे पारंपरिक लोकगीत हवाओं में गूंजने लगते हैं।

 

रसोई के लिहाज से भी यह महीना बेहद स्वादिष्ट होता है। बारिश की फुहारों के बीच घरों में गरमा-गरम घेवर, मालपुआ, खीर और पकोड़े बनाए जाते हैं। इस महीने में सात्विक जीवनशैली का पालन किया जाता है, जिससे तन और मन दोनों शुद्ध रहते हैं।

 

सावन के प्रमुख त्योहार में हरियाली तीज, नाग पंचमी और रक्षाबंधन पर्व मनाया जाता है।

 

क्या है खास?

हरियाली तीज- महिलाएं सुहाग की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं और पारंपरिक झूले झूलती हैं।

नाग पंचमी- नाग देवताओं की पूजा की जाती है, जो जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान को दर्शाता है।

रक्षाबंधन- श्रावण पूर्णिमा के दिन भाई-बहन के पवित्र प्रेम का यह त्योहार मनाया जाता है।

 

उपसंहार

श्रावण मास हमें सिखाता है कि कैसे ईश्वर की भक्ति, प्रकृति के सौंदर्य और मानवीय रिश्तों को एक सूत्र में पिरोया जाता है। यह महीना हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और जीवन को नए उत्साह से जीने की प्रेरणा देता है। सावन की हर बूंद धरती को जीवन देती है और इसकी भक्ति इंसानी जीवन को धन्य बनाती है। यह महीना केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति की हरियाली, वर्षा की फुहारों और आध्यात्मिक चेतना का भी संदेश देता है। 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

August 2026 eclipse: अगस्त में 15 दिनों के अंतर पर लगेंगे सूर्य और चंद्र ग्रहण, जानें भारत में दिखेगा या नहीं, तारीख और सूतक काल

August 2026 eclipse: इस साल का अगला महीना अगस्त का होगा, जो दो बड़ी खगोल घटनाओं का गवाह बनेगा। इस माह में साल 2026 का दूसरा और अंतिम सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण लगेगा। ग्रहण एक खगोलीय घटना है, जो सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी के एक सीधी रेखा में आ जाने पर लगता है। लेकिन यह धार्मिक और ज्योतिष रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। साल के अंतिम सूर्य और चंद्र ग्रहण 15 दिनों के अंतराल पर लगेंगे। यह खगोलीय घटना सावन के महीने लगने से इसका महत्व और भी बढ़ गया है।

सूर्य ग्रहण जहां 12 अगस्त 2026 को हरियाली अमावस्या के दिन लगेगा, वहीं चंद्र ग्रहण 28 अगस्त को सावन पूर्णिमा पर रक्षा बंधन के दिन लगेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के दौरान सूतक काल लग जाता है और इस दौरान पूजा-पाठ और शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। सूतक काल खत्म होने के बाद ही दोबारा मंदिरों और घरों में पूजा-पाठ आदि धार्मिक कार्य शुरू होते हैं। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण का असर सभी 12 राशियों पर पड़ता है और विशेषज्ञ ग्रहण के प्रभावों का अध्ययन करते हैं।

अगस्त 2026 में दूसरा सूर्य ग्रहण

साल 2026 का दूसरा और आखिरी सू्र्य ग्रहण 12 अगस्त सावन अमावस्या के मौके पर लगेगा। यह पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा, लेकिन भारत में नहीं दिखाई देगा। इसलिए भारत में इसका सूतक काल नहीं माना जाएगा।

अगस्त 2026 में दूसरा चंद्र ग्रहण

अगस्त 2026 में साल का दूसरा और आखिरी चंद्र ग्रहण, श्रावण मास की पूर्णिमा पर 28 अगस्त 2026 को लगेगा। इस दिन भारत में रक्षाबंधन का त्योहार भी मनाया जाएगा। सूर्य ग्रहण की तरह चंद्र ग्रहण भी भारत में दिखाई नहीं देगा। इस वजह से इस दिन रक्षाबंधन का त्योहार अप्रभावित रहेगा।

सूतक काल के नियम

सावन के माह में लगने वाले साल के अंतिम सूर्य और चंद्र ग्रहण भारत में नजर नहीं आएंगे और इनका सूतक भी नहीं रहेगा। इसलिए इन दोंनों दिनों के पर्व और धार्मिक अनुष्ठानों पर कोई प्रभाव नहीं होगा। हालांकि इसके ज्योतिषीय प्रभावों का अध्ययन किया जाएगा।

ग्रहण काल में अशुभ प्रभाव से बचने के उपाय?

  • सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के दौरान महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है। इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होने के साथ सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • ग्रहण काल के बाद पूजा-पाठ और इच्छा के अनुसार दान करना चाहिए।
  • ग्रहण काल के बाद नहाना चाहिए और शिवलिंग पर जला अर्पित करना चाहिए।

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Ashadha Amavasya 2026: आषाढ़ अमावस्या पर बन रहा ये दुर्लभ संयोग, हनुमान जी की कृपा पाने और शनि दोष निवारण के लिए है शुभ

Ashadha Amavasya 2026: आषाढ़ माह हिंदी कैलेंडर का चौथा महीना है। हर माह की तरह इस माह के कृष्ण पक्ष का समापन अमावस्या तिथि से होता है। इसे ही आषाढ़ अमावस्या के रूप में जाना जाता है। इस साल आषाढ़ अमावस्या पर एक ऐसा दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे यह दिन संकटमोचन हनुमान की कृपा पाने और शनि दोष निवारण के लिए अत्यंत शुभ माना जा रहा है। यह अमावस्या तिथि मंगलवार के दिन पड़ रही है। इसलिए इसका महत्व और बढ़ गया है।

हर हिंदू माह में अमावस्या तिथि आती है, जो पितृ तर्पण और स्नान-दान के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करके पितरों की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। माना जाता है कि इस दिन पितरों की शांति के लिए तर्पण और श्राद्ध करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनकी कृपा से जीवन सुखमय होता है। यह दिन जीवन से नकारात्मकता को दूर करने के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

आषाढ़ अमावस्या 2026 तारीख

पंचांग के अनुसार, इस साल आषाढ़ अमावस्या मंगलवार, 14 जुलाई, 2026 को मनाई जाएगी। अमावस्या तिथि की शुरुआत 13 जुलाई 2026 को शाम 06:50 बजे से होगी और इसका समापन 14 जुलाई 2026 को दोपहर 03:14 बजे होगा। उदयातिथि के नियमों के कारण स्नान-दान और व्रत की अमावस्या 14 जुलाई को ही रहेगी। इस दिन मंगलवार होने के कारण इसे भौमवती अमावस्या का विशेष संयोग भी मिल रहा है।

आषाढ़ अमावस्या का महत्व

हिंदू धर्म में आषाढ़ अमावस्या का बहुत गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह तिथि पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंड दान और श्राद्ध कर्म करने के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान करने से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

भौमवती अमावस्या का विशेष संयोग

इस साल आषाढ़ अमावस्या मंगलवार के दिन पड़ रही है। हिंदू धर्म में ‘भौम’ शब्द मंगल ग्रह के लिए प्रयोग किया जाता है, इसलिए मंगलवार और अमावस्या के इस विशेष संयोग का बहुत अधिक धार्मिक महत्व है। मंगवार के दिन अमावस्या पड़ने से मंगल जनित दोषों और कर्ज से मुक्ति के लिए इस दिन की गई पूजा विशेष फल देती है। साथ ही, यह दिन हनुमान जी की कृपा पाने और शनि दोष निवारण के लिए बहुत शुभ है।

आषाढ़ अमावस्या पूजा विधि

इस दिन पितरों की प्रसन्नता और भगवान विष्णु व शिव जी की कृपा पाने के लिए नीचे दी गई सरल विधि से पूजा करें :

  • अमावस्या के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर किसी पवित्र नदी, जलाशय या घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  • स्नान के बाद साफ वस्त्र धारण करें और तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन और लाल फूल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।
  • इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करें और जल में काले तिल और कुशा मिलाकर अपने पितरों के निमित्त तर्पण करें। पितरों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें।
  • घर के मंदिर में दीपक जलाएं। भगवान विष्णु और भोलेनाथ की विधि-विधान से पूजा करें। चूंकि इस दिन भौमवती अमावस्या है, इसलिए हनुमान जी की पूजा करना और हनुमान चालीसा का पाठ करना भी बेहद शुभ रहेगा।
  • पूजा और तर्पण के बाद किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को अनाज, तिल, वस्त्र, छाता या सामर्थ्य के अनुसार धन का दान अवश्य करें।
  • शाम के समय पीपल के पेड़ के पास जाकर सरसों के तेल का दीपक जलाएं और परिक्रमा करें, इससे भी पितर और देव प्रसन्न होते हैं।

Sawan 2026: इस साल सावन में सोमवार और मंगला गौरी व्रत कितने होंगे? सही तारीखों के साथ देखें पूरा कैलेंडर

Sawan 2026: इस साल सावन में सोमवार और मंगला गौरी व्रत कितने होंगे? सही तारीखों के साथ देखें पूरा कैलेंडर

Sawan 2026: हिंदी कैलेंडर में सावन पांचवां महीना होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। चारों ओर फैली हरियाली और ‘बोल बम’ की गूंज इस माह की पहचान माने जाते हैं। देश ही नहीं पूरी दुनिया के शिव भक्त इस माह में भगवान शिव की भक्ति में लीन होते हैं। यूं तो पूरे साल में आने वाले सभी सोमवार भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित माने जाते हैं, लेकिन सावन के महीने में सोमवार का दिन विशेष स्थान रखता है।

इस दिन सुबह से ही छोटे-बड़े हर शिवालय में भक्त अपने आराध्य का अभिषेक और उपवास करते हैं। सावन के महीने में ही भक्त कांवड़ा भरकर लाते हैं और अपने आराध्य शिव का जलाभिषेक करते हैं। माना जाता है कि इस अवधि में माता पार्वती और भगवान शिव की श्रद्धा और विधि विधान से की गई पूजा बहुत लाभकारी होती है। गौरी शंकर अपने भक्तों की दु:ख-तकलीफें दूर करते हैं और उन्हें सुखी जीवन का आशीर्वाद देते हैं। हर साल की तरह इस साल भी सावन के सोमवार को व्रत करेंगे और मंगलवार को मंगला गौरी का व्रत किया जाएगा। आइए जानें इस साल सावन में कितने सोमवार और मंगला गौरी व्रत का संयोग बन रहा है?

कब से कब तक रहेगा सावन?

सावन का महीना 30 जुलाई गुरुवार से प्रारंभ होगा और 28 अगस्त, शुक्रवार को श्रावण पूर्णिमा के साथ ही यह महीना समाप्त हो जाएगी।

सावन में कितने सोमवार?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन में सोमवार के दिन भगवान शिव का व्रत और पूजन करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है। साल 2026 में सावन में कुल चार सोमवार व्रत रखे जाएंगे।

सावन सोमवार व्रत

पहला सावन सोमवार- 03 अगस्त 2026

दूसरा सावन सोमवार- 10 अगस्त 2026

तीसरा सावन सोमवार- 17 अगस्त 2026

चौथा सावन सोमवार- 24 अगस्त 2026

सावन में 4 मंगला गौरी व्रत का संयोग

सावन का महीना केवल भगवान शिव ही नहीं, बल्कि माता पार्वती की आराधना के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है। इस माह में सोमवार की तरह मंगलवार का भी विशेष महत्व है। इस दिन मंगला गौरी का व्रत रखने की परंपरा है। इस माह में पड़ने वाले हर मंगलवार को मंगला गौरी व्रत किया जाता है।

पहला मंगला गौरी व्रत- 4 अगस्त

दूसरा मंगला गौरी व्रत- 11 अगस्त

तीसरा मंगला गौरी व्रत- 18 अगस्त

चौथा मंगला गौरी व्रत- 25 अगस्त

सावन 2026 के अन्य प्रमुख त्योहार और तिथियां

सावन शिवरात्रि : 11 अगस्त 2026

हरियाली अमावस्या : 12 अगस्त 2026

हरियाली तीज : 15 अगस्त 2026

नाग पंचमी : 17 अगस्त 2026

रक्षाबंधन / सावन पूर्णिमा : 28 अगस्त 2026

कैसे करें भोलेनाथ की पूजा?

  • सावन के सोमवार को सुबह जल्दी उठकर नहा लें और साफ कपड़े पहनें।
  • इसके बाद पास के शिव मंदिर जाएं। सबसे पहले शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाएं।
  • फिर दूध, दही, घी, शहद और गन्ने के रस से बना ‘पंचामृत’ अर्पित करें।
  • भोलेनाथ को सफेद चंदन लगाएं और सफेद फूल, भांग, धतूरा और फल चढ़ाएं।
  • शिव जी के साथ पूरे शिव परिवार की भी पूजा करें।
  • अंत में आरती करें और सच्चे मन से “ॐ नमः शिवाय” या “श्री शिवाय नमस्तुभ्यं” मंत्र का जाप करें।

Ashadha Gupt Navratri 2026: आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि इस दिन से होगी शुरू, आइए जानें घटस्थापना के लिए मिलेगा कितनी देर का मुहूर्त

Ashadha Gupt Navratri 2026: आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि इस दिन से होगी शुरू, आइए जानें घटस्थापना के लिए मिलेगा कितनी देर का मुहूर्त

Ashadha Gupt Navratri 2026: हिंदी कैलेंडर में पूरे वर्ष में चार नवरात्रि पर्व आते हैं। हिंदू वर्ष की शुरुआत चैत्र नवरात्रि से होती है। इसके अलावा शारदीय नवरात्रि का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इनके अलावा आषाढ़ और माघ मास में भी नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है, जिसे गुप्त नवरात्रि कहते हैं। इस दौरान मां दुर्गा के नौ रूपों के साथ ही देवी की दस महाविद्याओं की साधना की जाती है।

मान्यता है कि इन नौ दिनों में देवी की दस महाविद्याओं की साधना करने से अत्यंत शुभ फल की प्राप्ति होती है। मां दुर्गा के भक्त नौ दिनों की इस अवधि में विधि-विधान से उनकी पूजा करते हैं। वहीं अघोरी, तांत्रिक तंत्र मंत्र और सिद्धि प्राप्त करते हैं। आषाढ़ गुप्त नवरात्रि की शुरुआत शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है। आइए जानें इस साल आषाढ़ गुप्त नवरात्रि कब से शुरू हो रही है, घटस्थापना का मुहूर्त कितनी देर का है और इसका क्या महत्व है।

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि की तारीख और समय

इस साल आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का आरंभ 15 जुलाई, बुधवार से हो रहा है। 14 जुलाई, मंगलवार के दिन दोपहर के 3 बजकर 14 मिनट पर आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा तिथि का आरंभ होगा, जो अलगे दिन यानी 15 जुलाई को सुबह 11 बजकर 52 मिनट कर व्याप्त रहेगी। उदया तिथि के अनुसार, 15 जुलाई से ही आषाढ़ गुप्त नवरात्रि की शुरुआत होगी। वहीं, 22 जुलाई, बुधवार के दिन नवमी तिथि रहेगी जिसके साथ ही आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का समापन होगा।

घटस्थापना का शुभ मुहूर्त

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि में घटस्थापना 15, जुलाई को ही की जाएगी। इस दिन पुष्य नक्षत्र का शुभ संयोग बन रहा है। इस दिन सुबह 8 बजकर 2 मिनट पर हर्षण योग का संयोग बन रहा है, इसलिए ये समय घट स्थापना के लिए सर्वोत्तम होगा। इसके उपरांत वज्र योग लग जाएगा। वैसे इस दिन घटस्थापना सुबह 06:01 बजे से सुबह 10:17 बजे के बीच कर सकते हैं। इसके लिए लगभग 4 घंटे 16 मिनट की अवधि मिल रही है।

गुप्त नवरात्रि का धार्मिक महत्व

गुप्त नवरात्रि में भी मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। लेकिन गुप्त नवरात्रि विशेष रूप से तांत्रिक साधना, मंत्र सिद्धि और दस महाविद्याओं की गुप्त रूप से साधना करने के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है।

देवी की दस महाविद्याएं 

  • कमलात्मिका
  • तारा
  • बगलामुखी
  • काली
  • त्रिपुर सुंदरी
  • धूमावती
  • भैरवी
  • भुवनेश्वरी
  • मातंगी
  • छिन्नमस्ता

Sawan 2026: 30 जुलाई से शुरू होगा भगवान शिव का प्रिय महीना सावन, मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए इस माह में जरूर करें तुलसी की मंजरी का उपाय

Sawan 2026: 30 जुलाई से शुरू होगा भगवान शिव का प्रिय महीना सावन, मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए इस माह में जरूर करें तुलसी की मंजरी का उपाय

Sawan 2026: हिंदू धर्म में सावन के महीने को बहुत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस माह का विशेष स्थान है। यह भगवान शिव का प्रिय माह है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व होता है। इस दौरान श्रद्धालु कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ करते हैं। माना जाता है कि सावन में सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं, सुख-शांति और समृद्धि प्राप्त होती है तथा भगवान शिव की कृपा बनी रहती है।

सावन 2026 के करीब आते ही देशभर के शिवभक्त व्रत, पूजा, कांवड़ यात्रा और धार्मिक अनुष्ठानों की तैयारियों में जुट जाएंगे। यह पूरा महीना भगवान शिव की भक्ति, आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर माना जाता है। इस माह में तुलसी का पौधा लगाना और उसमें मंजरी आना बहुत शुभ माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, सावन में तुलसी का पौधा लगाने से सारी नेगेटिविटी दूर हो जाती है।

मां लक्ष्मी की कृपा का संकेत है तुलसी में मंजरी

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी पर मंजरी आना अत्यंत शुभ संकेत माना जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि मां लक्ष्मी की कृपा आपके घर पर बनी हुई है और जल्द ही कोई शुभ समाचार मिल सकता है।

तुलसी की मंजरी करें श्री हरि को अर्पित

सावन के महीने में अक्सर घर में लगी तुलसी में मंजरी आने लगती है। तुलसी में मंजरी आना शुभ संकेत माना जाता है। यह भगवान विष्णु को भी प्रिय है। इसलिए सावन में इसके ये उपाय जरूर करने चाहिए

  • तुलसी की मंजरी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। यदि तुलसी पर मंजरी आ जाए, तो उसे तोड़कर भगवान विष्णु या लड्डू गोपाल को अर्पित करना चाहिए। इससे आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।
  • मंजरी को कभी भी शिवलिंग पर न चढ़ाएं, क्योंकि शास्त्रों में इसे वर्जित माना गया है।
  • यदि मंजरी सूख जाए, तो इसे फेंकने के बजाय गमले की मिट्टी में डाल दें। इससे नए तुलसी के पौधे उगेंगे, जिससे घर में हरियाली और बरकत बनी रहती है।

घर में तुलसी लगाने के नियम

तुलसी का पौधा घर में लगाते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। बहुत से लोग सावन में घर में तुलसी का पौधा लगाते हैं। आइए जानें इसे लगाने के नियम

  • तुलसी का पौधा हमेशा घर की उत्तर या पूर्व दिशा में लगाना चाहिए।
  • तुलसी की पूजा करना अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि के लिए फलदायी है।
  • बारिश के मौसम में नमी के कारण मिट्टी में पानी रुक सकता है, जिससे जड़ें सड़ सकती हैं। अतः तुलसी के गमले में जल निकासी की उचित व्यवस्था रखें।

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